Friday, July 30, 2010

नक्सल आंदोलन और रामकथा [बकलमखुद-]

…जब आंदोलनों का दौर रहता है तब तो नुक्कड़ नाटकों को लोग हाथोंहाथ लेते हैं लेकिन शांतिकाल आते ही ये मदारी का खेल बनकर रह जाते हैं। तब अभिनेताओं में करैक्टर में ज्यादा गहराई से उतरने की इच्छा, जीवन के गहरे सवालों से जूझने की रचनात्मक प्यास जोर मारने लगती है। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 142 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का छब्बीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
क्सल आंदोलन और रामकथा। दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं जान पड़ता। लेकिन कुछ संयोग ऐसा बना कि समय के एक मोड़ पर दोनों चीजें एक साथ जुड़ गईं। क्रांति के प्रति अपनी आस्था और राजनीति में गहरी दिलचस्पी के बावजूद मेरा बुनियादी मिजाज पढ़ने-लिखने वाला ही है। आरा में इस लिहाज से मेरा एक छोर सुधीर के साथ और दूसरा सुनील के साथ जुड़ता था। सुधीर यानी सुधीर मिश्रा, जो तब हिंदुस्तान के लोकल रिपोर्टर थे और सुनील यानी सुनील सरीन, जो युवानीति के डाइरेक्टर और अच्छी किताबें पढ़ने वाले नौजवान थे। सुधीर के जरिये मेरा जुड़ाव आरा के मीडिया सर्कल से बना रहता था। प्रेस क्लब में हर हफ्ते एकाध बार स्थानीय पत्रकारों के साथ बैठकी जम ही जाती थी जबकि सुनील के जरिए अक्सर कुछ न कुछ पढ़ने को मिल जाया करता था। प्रेस क्लब से नजदीकी का सबसे बड़ा फायदा यह था कि बाकी जगहों की तरह सीपीआई एमएल यहां कभी अलग-थलग नहीं पड़ने पाती थी। बरास्ते छात्र युवा संघर्ष वाहिनी बीजेपी और जनता दल तक पहुंचे कुछ ढंग के कार्यकर्ताओं और नेताओं से बातचीत का रास्ता भी इसी बहाने निकल आया था।
1992 में जब बीजेपी ने मंदिर वाला माहौल बनाना शुरू किया तो हम लोगों ने शहर के सांस्कृतिक माहौल में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप करने का फैसला किया। इस दिशा में कुछ काम पहले ही शुरू हो चुका था। मार्च 1992 में होली के हुड़दंग में ही हमारे कुछ साथी कुछ पोलिटिकल जोगीड़ों के साथ सड़कों पर निकले थे। मुख्यमंत्री लालू यादव के बड़े घपले तब तक सामने नहीं आए थे, लेकिन जोगीड़ों के लिए उनसे काफी मसाला तब भी मिल गया था। इस बरसात में हम लोगों ने आरा के सफाईकर्मियों का एक बड़ा आंदोलन संचालित किया था। उस आंदोलन की कुछ बहुत ही सुखद स्मृतियां हैं, जिन्हें तीन साल पहले मई दिवस के मौके पर अपने ब्लॉग पहलू पर डाली गई अपनी एक पोस्ट में मैं दर्ज कर चुका हूं। इस आंदोलन ने आरा शहर में हमें घर-घर की पार्टी बना दिया था। इसी माहौल में एक दिन युवानीति की बैठक में मुझे बुलाया गया। ऊपर से देखने पर उसमें कोई ठहराव नहीं था, लेकिन सभी जानते थे कि ठहराव है। हम लोगों ने इसकी वजहों पर विचार करना शुरू किया। संगठन के अतीत के बारे में बात हुई। कैसे बनी, कैसे बढ़ी।
मैंने साथियों के सामने एक सवाल रखा कि एक स्वतंत्र सांस्कृतिक संस्था के रूप में शुरू हुई युवानीति अब क्या एक राजनीतिक दल की प्रचार इकाई बनकर रह गई है। इस पर कोई असहमति तो थी नहीं, लेकिन इसके अलावा किसी को कुछ करने को सूझ भी नहीं रहा था। नया क्या किया जाए, इस बारे में सोचते हुए लगा कि युवानीति के नुक्कड़ नाटक अब कुछ ज्यादा ही पुराने पड़ गए हैं। जिन शक्तियों से हमारा मुकाबला है, वे सांस्कृतिक रूप से ठप नहीं बल्कि संस्कृति की अपने ढंग से व्याख्या करते हुए काफी सक्रिय, बल्कि हमलावर हो चली हैं। ठोस रूप से कहें तो जन संस्कृति की इमारत हमें फिलहाल हवा में नहीं, आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बरक्स खड़ी करनी है। इस बैठक का एक ठोस नतीजा ramleela यह निकला कि एक छोटी सी स्किट राम जी की चड्ढी तैयार हुई, जिसका मूल तत्व यह था कि राम जी का मंदिर, उनकी खड़ाऊं, उनका मुकुट, उनके कपड़े, हर चीज का राजनीतिक इस्तेमाल करते हुए लोगबाग अब उनकी चड्ढी उतारने की हद तक पहुंच गए हैं। यह स्किट कई जगह खेली गई। इसे खूब लोकप्रियता भी हासिल हुई, लेकिन नैनीताल के एक आयोजन में इसके खिलाफ कुछ लोगों ने हमला बोल दिया। मामला एकतरफा नहीं था। भगाने आए लोग आखिरकार कायदे से पीट-पाट कर भगा दिए गए। लेकिन आरा लौटकर मित्रों ने इस घटना के बारे में बताया तो इससे हमारे कुछ दिव्यचक्षु भी खुले।
युवानीति में ही नहीं, प्रोग्रेसिव मिजाज के सारी संगीत-नाटक इकाइयों में एक बहस निरंतर चलती रहती है कि उन्हें बीच-बीच में स्टेज पर खेले जाने वाले नाटक (प्रोसीनियम) भी करने चाहिए या अपनी पूरी ताकत नुक्कड़ नाटकों में ही लगानी चाहिए। जब आंदोलनों का दौर रहता है तब तो नुक्कड़ नाटकों को लोग हाथोंहाथ लेते हैं लेकिन शांतिकाल आते ही ये मदारी का खेल बनकर रह जाते हैं। तब अभिनेताओं में करैक्टर में ज्यादा गहराई से उतरने की इच्छा, जीवन के गहरे सवालों से जूझने की रचनात्मक प्यास जोर मारने लगती है। डाइरेक्टर के हाथ भी कुछ बड़ा काम करने को चुलबुलाने लगते हैं। इस तड़प की अनदेखी कभी-कभी टीम के बिखराव के रूप में भी जाहिर होती है। मैंने इलाहाबाद में ऐसा दस्ता के साथ होते देखा था, हालांकि उससे मेरा सीधे तौर पर कोई जुड़ाव नहीं था। युवानीति की पिछली बैठक में एक प्रोसीनियम करने की बात भी उठी थी, लेकिन इसके लिए किसी पुराने नाटक पर सहमति नहीं बन पाई थी। नैनीताल से युवानीति की वापसी के बाद की एक शाम सुनील के साथ बात करते हुए एक आइडिया उभरा कि राम कोई आरएसएस की बपौती थोड़े ही हैं। बारिश बीतने वाली है, क्यों न हम लोग खुद एक रामलीला की तैयारी करें।
मारे आधार के लोग भी रामलीला देखने जाते हैं, उन्हें हम होली में नए तरह का जोगीड़ा सुना सकते हैं तो दशहरे में एक नए तरह की रामलीला क्यों नहीं दिखा सकते। यह एक जोखिम भरा और विवादास्पद विचार था। पार्टी के भीतर स्थानीय और राज्य स्तर पर इसका प्रबल विरोध हुआ। लेकिन पार्टी सेक्रेटरी कुणाल जी से मैंने इस मामले में विस्तार से बात कर रखी थी और वे पार्टी बैठकों में रामलीला खेलने के पक्ष में डटे रहे। उनके सामने सवाल खड़ा किया गया कि यह तो आरएसएस की बांसुरी पर नाचने जैसा होगा। उन्होंने कहा, पहले देखा तो जाए कि ये लोग कर क्या रहे हैं- चंद्रभूषण खुद इसमें लगे हैं तो शक से शुरू करने की जरूरत क्या है। ऐसी बहसों से हमारे ऊपर दबाव बढ़ गया। रामलीला को लेकर हमारी मूल प्रेरणाएं दो थीं। एक, कुछ ऐसा जो मुख्यतः राम को लेकर खेली जा रही हमलावर राजनीति को चैलेंज करे और जहां तक संभव हो उनकी पारंपरिक छवि को भी बदले। और दो, कुछ ऐसा जो युवानीति की क्रिएटिव क्वेस्ट के अनुरूप हो। जिसमें सारे पात्र करैक्टर्स को कुछ नए तरीके से एक्सप्लोर कर सकें। इन दो सवालों के इर्दगिर्द पढ़ाई-लिखाई और बहसों का सिलसिला शुरू हो।

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Thursday, July 29, 2010

रब्बी का मुरब्बा

murabba1ज़ मीन की एक नाप के बतौर मुरब्बा शब्द का इस्तेमाल हिन्दी समेत पश्चिमोत्तर भारत की ज़बानों में होता है। यह अरबी का शब्द है। भूमि के चौरस टुकड़े को मुरब्बा कहते हैं। वह भूखण्ड जिसकी सभी भुजाएं एक समान हों। वैसे यह भूमि की एक माप भी है। करीब पच्चीस एकड़ रक़बा मुरब्बा कहलाता है। वैसे मुरब्बा में किसी अंक का उसी से गुणा करने से प्राप्त नतीजे का भाव भी है। इस अर्थ में मुरब्बा के मायने पच्चीस गुणा पच्चीस मीटर का भूखण्ड भी मुरब्बा है और पच्चीस गुणा पच्चीस एकड़ भूमि भी मुरब्बा है। कम से कम बेवरली ई क्लैरिटी का इराकी-अरेबिक कोश तो यही कहता है। मुरब्बा का रिश्ता अरबी धातु r-b-b से है। रब्ब वही धातु है जिससे परमशक्तिमान के अर्थ में हिब्रू, अरबी भाषाओं के रब, रब्बी जैसे शब्द बने हैं जिसमें सर्वशक्तिमान, कृपानिधान, भगवान का भाव है।
ब शब्द का प्रयोग समूचे उत्तर भारत की बोलियों में होता है पर पश्चिमोत्तर की भाषाओं में, खासतौर पर पंजाबी में यह आम शब्द है। सूफी कवियों की वाणी ने ही इसे भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया है। इश्क, प्यार, मुहब्बत के प्रसंगों में रब्ब, रब्बा या रब्बी जैसे शब्द हिन्दी फिल्मी गीतकारों के लिए भी अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया है। हर दूसरी तीसरी फिल्म के प्रेमगीत में इसका इस्तेमाल नजर आता है। रब शब्द मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का है। हिब्रू में रब्ब शब्द का रूप रव या रब है जबकि अरबी में यह रब्ब है। हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में इस शब्द का जन्म प्रोटो सेमिटिक धातु rbb से हुआ है।

... मुरब्बा जैसा खाद्य पदार्थ भारत को अरबों की देन है। इसी तरह अचार भी फारसी शब्द है। ये दोनों ही लम्बे समय तक चलनेवाले खास तरीकों से बने खाद्य पदार्थ हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा का जो भाव रब्ब में है, वही उससे बने रब या रब्बी में है। वही भूमि के चौरस टुकड़े और खाने के पदार्थ मुरब्बा में है ... murabba

रब अरबी में ईश्वर के 99 नामों में शुमार है। मूलतः रब्ब धातु में कुछ प्रमुख भाव समाहित हैं- 1.रखवाला, साथ ले जाने वाला, हर ज़रूरत का ख्याल रखनेवाला, इच्छा-पूर्ति करनेवाला। 2.संरक्षक, पालक, पिता, मार्गदर्शक। 3.सत्ताधीश, स्वामी, शक्तिमान, राजा। 4.नेता, प्रमुख, सर्वोच्च, धर्मगुरु, अन्नदाता, जिसके आगे सभी सर झुकाएं।
गौर करें तो पता चलता है कि रब्ब में मूलतः सुरक्षा का भाव निहित था। रब्ब का मूलार्थ घेरा, चहारदीवारी या घिरा हुआ स्थान है क्योंकि इसमें सुरक्षा प्राप्त होती है। अरबी में किला या गढ़ी के लिए रबात शब्द है। मोरक्को के एक शहर का नाम रबात भी है जो एक खाड़ी के मुहाने पर बसा है। रबात में परकोटे से घिरी बसाहट का भाव है। रब्ब में अरबी का मु उपसर्ग लगने से बनता है मुरब्बा जिसका अर्थ है संरक्षित, सुरक्षित। इसका प्रचलित अर्थ हुआ भूमि का चौरस टुकड़ा। दरअसल इसमें मूल भाव भूमि के घिरे हुए टुकड़े से ही था। रेगिस्तानी भूमि पर नदियों, झीलों जैसी प्राकृतिक विविधताएं बहुत कम होती हैं। वहां हर विभाजन चौकोर या समभुज ही होता है जबकि एशिया के शेष हिस्सों में नदियां, पहाड़ और झीलें सीमाओं का निर्धारण करती है। समूचे अरबी क्षेत्र के देश-प्रदेश के नक्शों के आकार से भी यह बात समझी जा सकती है। जाहिर है कि रब्ब में निहित सुरक्षित का भाव मुरब्बा में भूमि के चौरस खण्ड के रूप में व्यक्त हुआ। किले, गढ़ियां आमतौर पर चौकोर ही होते हैं।
ब्ब में निहित सुरक्षा के भाव की पुष्टि एक अन्य सेमिटिक शब्द मुरब्बा से होती है जो एक ज़ायकेदार मीठा व्यंजन है। आम या आंवले जैसे फलों को उबालकर शकर की गाढ़ी चाशनी में डालकर इसे तैयार किया जाता है। गाढ़ी चाशनी से इसका प्रसंस्करण हो जाता है और यह लम्बे समय तक सुरक्षित रहता है। मुरब्बा जैसा खाद्य पदार्थ भारत को अरबों की देन है। इसी तरह अचार भी फारसी शब्द है। ये दोनों ही लम्बे समय तक चलनेवाले खास तरीकों से बने खाद्य पदार्थ हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा का जो भाव रब्ब में है, वही उससे बने रब या रब्बी में है। वही भूमि के चौरस टुकड़े और खाने के पदार्थ मुरब्बा में है। हालांकि हिन्दी शब्दसागर मीठे मुरब्बे की वर्तनी मुरब्बह् और चौरस भूमि के अर्थ में मुरब्बअ बताता है, किन्तु मेरा मानना है कि यह मूलतः भाषा विकास के बाद के व्याकरणिक बदलाव हैं। मूलतः ये एक ही स्रोत से उपजे शब्द हैं। रब्ब से ही बनता है रब्बानी जिसका अर्थ है मालिक, रक्षा करनेवाला, ईश्वर आदि। मुरब्बी शब्द में वकील, संरक्षक, उस्ताद, गुरू का भाव है।

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Monday, July 26, 2010

लिंगम् आलिंगन और लंडूरा

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लिं ग हिन्दी का बहुप्रचलित शब्द है जिसका अर्थ भी पहचान, चिह्न, लक्षण, निशान, प्रतीक, बिल्ला आदि होता है। हिन्दी में लिंग शब्द का इस्तेमाल होता है। स्त्रीलिंग-पुल्लिंग के संदर्भ में गौर करें तो चिह्न या लक्षण अर्थ एकदम साफ हैं। लिंग शब्द में अंगों की छाया देखें तो इनका प्रतीक रूप स्पष्ट है। बहुधा लिंग को शिश्न का पर्याय समझ लिया जाता है जो गलत है। हिन्दू धर्मकोश के अनुसार अव्यक्त अथवा अमूर्त स्थूल प्रतीक ही यह लिंग है। दक्षिण भारत का एक प्रसिद्ध सम्प्रदाय है लिंगायत (वीरशैव) जो शैव मत के होते हैं। प्रकृति की आराधना, प्रकाश, रोग के लक्षण, साधन, प्रमाण आदि इसके गूढ़ार्थ हैं। अठारह महापुराणों में ग्यारहवां महापुराण लिंगपुराण है। यह शैव मत का पुराण है। इसका महत्व वैष्णवों के अग्नि और गरुड़ पुराण से कम नहीं है। प्रचलित अर्थों में लिंग का अभिप्राय स्त्री और पुरुष के जननांग है। गले मिलने के अर्थ में आलिंगन शब्द इसी मूल से बना है। ध्यान दें कि गले मिलने की क्रिया के पीछे भी हर्ष, विषाद जैसे कई प्रतीक और लक्षण छुपे हैं। परस्पर दो जनों के बीच इनके उद्घाटन की क्रिया ही आलिंगन है।
हिन्दू धर्मकोश के अनुसार लिंग मूलतः ज्योति का प्रतीक है न कि शिश्न का। लिंगायतो शैवों में लिंग पूजा इसी रूप में होती है। प्राचीनकाल की अधिकांश संस्कृतियों में लिंगपूजा का रुझान मिलता है। मिस्री, सामी, यूनानी, बेबिलोनियाई, असुरी आदि सभ्यताओं में लिंगपूजा के चिह्न मिले हैं। ऋग्वेद में भी प्राचीन लिंगपूजा के संकेत शिश्नदेवः के उल्लेख से मिलते हैं। विद्वानों का मानना है कि यह संकेत अनार्यों के धार्मिक अनुष्ठान का सूचक है। बाद में यही लिंगपूजा आर्य संस्कृति से भी जुड़ गई। जो भी हो, विभिन्न संस्कृतियों में इसकी मौजूदगी से यह सिद्ध होता है कि यह मूलतः प्रजननशक्ति की उपासना थी। बाद में इसके दार्शनिक निहितार्थ तलाशे गए। दक्षिण भारत के वीरशैव भी लिंगायत समुदाय से ही हैं। इस सम्प्रदाय का जन्म बारहवीं सदी के मध्य में कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में हुआ।
संस्कृत की लिङ्ग धातु से ही लिंगम् शब्द की व्युत्पत्ति भी हुई है जिसमें झूलने, हिलने, डोलने का भाव है। इसके अलावा shiv-ling-sachin-manawaria इसमें पहचान चिह्न, खूंटा, बिल्ला आदि भाव भी हैं। खूंटे के अर्थ में ही इसका एक अन्य अर्थ है हल की शक्ल का एक शहतीर। इसके अलावा बहुत वजनी चीज को लंगर कहते हैं। गौर करें लंगर चाहे पानी में डाला जाए या सतह पर गाड़ा जाए, उसका उद्धेश्य किसी अस्थिर रचना को मजबूती प्रदान करना, आधार देना ही होता है। किसी भी चीज की पहचान उसके आधार से ही बनती है। प्रतीक, पहचान, चिह्न आदि भी पहचान के द्योतक ही हैं। बंगला में लांगल का अर्थ भी हल ही होता है। गौर करें हल की उपयोग पर। हल एक नुकीली शहतीरनुमा रचना है जो कठोर भूमि को उथल-पुथल करती है, उसे जोतने योग्य, उर्वरा बनाती है। डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि लिंग का रिश्ता आस्ट्रिक परिवार के लंग से जोड़ा जाता है। लंग चाहे आस्ट्रिक परिवार का हो चाहे न हो, वह कश्मीर और बंगाल जैसे सुदूर प्रदेशो में प्राप्त है। लंग और लिंग का संबंध दिलचस्प है। हल का काम वृक्ष की डाली से लिया गया और यह हल प्रजनन क्रिया का प्रतीक बनकार लिंगवाचक हो गया। इसी पद्धति से कश्मीरी लंडू शब्द शाखा, बाहें या पैर के लिए प्रयुक्त होता है। उसी से उसके समरूप लिंगवाचक हिन्दी शब्द की उत्पत्ति मानी जा सकती है।
ह बना है संस्कृत की लङ्ग धातु से जिसमें झूलने, हिलने, डोलने का भाव है। इसके अलावा इसमें पहचान चिह्न, खूंटा, बिल्ला आदि भाव भी हैं। खूंटे के अर्थ में ही इसका एक अन्य अर्थ है हल की शक्ल का एक शहतीर। इसके अलावा बहुत वजनी चीज को भी लंगर कहते हैं। इससे बना है संस्कृत का लङ्घ जिसका अर्थ है उछलना, कूदना, दूर जाना, झपट्टा, आक्रमण करना, अतिक्रमण करना आदि। उल्लंघन इसी मूल से आ रहा है। बंदर के लिए संस्कृत में लांगुलिन् शब्द है। लँगूर इसका ही देशी रूप है। लांगुल का अर्थ पूंछ भी है। पूंछ का लटकने, डोलने का भाव स्वतः ही स्पष्ट है। वैसे लँगूर की एक परिभाषा लम्बी पूंछ वाला बंदर भी है। बुंदेलखंड का लांगुरिया भी इसी कड़ी में है। लंडूरा शब्द भी इसी मूल से आ रहा है जिसका अर्थ है आवारा, भटकैयां, भटकल, लापरवाह, गैरजिम्मेदार, बदचलन, बेशर्म, नालायक आदि। लंगूर में जहां लम्बी झब्बेदार पूंछ खास है, वहीं लंडूरा का एक अर्थ दुमकटा भी होता है। दुम या मूंछ शान की पर्याय होती हैं। जाहिर है दुमकटा यानी छुट्टा या आवारा। जिसकी कोई इज्जत न हो। जिसकी पहचान ही तय हो चुकी है।
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Saturday, July 24, 2010

सशस्त्र क्रान्तिः असाध्य आशावाद [बकलमखुद-142]

…लेकिन भारत जैसे सामंती दबदबे वाले देश में न सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि बुनियादी मुद्दों को लेकर चलने वाले किसी भी लंबे आंदोलन के लिए पूरी तरह हथियार छोड़ कर चलना भी एक असंभव कल्पना ही लगता है। देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसके पास समय-समय पर सक्रिय होने वाले हथियारबंद लोगों की जमात न हो, हालांकि इनमें से ज्यादातर अपने को गांधीवादी और अहिंसक ही कहती हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 141 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का छब्बीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
पने यहां सशस्त्र संघर्ष की छवि काफी रोमांटिक सी रही है। स्वभावतः जुझारू, संघर्षशील लोगों से ज्यादा इसका आकर्षण आम जीवन में लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाले सीधे-सादे लोगों में देखा जाता है। परंपरा से अहिंसक और निहत्थे भारतीय समाज में इसकी वजह खोजना कठिन नहीं है, हालांकि इसके चलते कभी-कभी कुछ अलग ही तरह के गुल खिले हुए दिखाई पड़ते हैं। इलाहाबाद में कुछ समय के लिए हमारे संगठन में सक्रिय हुए एक साथी सुरेंद्र मिश्र छात्र आंदोलन से अलग-थलग रहते हुए प्रायः अंडरग्राउंड सी मुद्रा बनाए रखते थे। उस समय मेरा संगठन से जुड़ाव बनना शुरू ही हुआ था। संगठन के सारे लोग और उनका किया सारा कुछ तब किसी दिव्य आभा से मंडित जान पड़ता था। उन्हीं दिनों ताराचंद हॉस्टल में किसी लड़के ने हमारे एक साथी अरुण कुमार को पीट दिया तो रात में संगठन की एक टीम उसकी मिजाजपुर्सी करने पहुंची। इस टीम में सुरेंद्र शामिल थे। सशस्त्र संघर्ष के प्रति उनके घोषित लगाव के चलते टीम के पास मौजूद अकेला कट्टा भी उन्हीं के पास था। धौंस-धमकी से बात नहीं बनी। बात लड़ाई-झगड़े तक पहुंची तो सुरेंद्र ने न सिर्फ कट्टा ताना बल्कि गोली भी चला दी। साथियों का कहना था कि इसके बाद उनकी हालत देखने लायक थी। जिस लड़के को गोली लगी, संयोगवश उसे प्राणघातक चोट नहीं पहुंची, लेकिन सुरेंद्र खुद इतने नर्वस हो गए कि चीखने-चिल्लाने लगे। घटना में शामिल लोगों ने बाद में बताया कि हॉस्टल से भागते हुए उन्हें साथ लेकर जाना भारी समस्या हो गया था।
म्युनिस्ट आंदोलन में इस तरह के रोमांटिक सशस्त्र संघर्ष के लिए भला क्या जगह हो सकती है, लेकिन भारत जैसे सामंती दबदबे वाले देश में न सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि बुनियादी मुद्दों को लेकर चलने वाले किसी भी लंबे आंदोलन के लिए पूरी तरह हथियार छोड़ कर चलना भी एक असंभव कल्पना ही लगता है। देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसके पास समय-समय पर सक्रिय होने वाले हथियारबंद लोगों की जमात न हो, हालांकि इनमें से ज्यादातर अपने को गांधीवादी और अहिंसक ही कहती हैं। आपको एकबारगी यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन एक बार कोशिश करके अपने इर्द-गिर्द व्याप्त किसी भी अन्याय, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कीजिए, अगले ही दिन आपको बुद्ध की तरह महाबोध हो जाएगा। आश्चर्यजनक रूप से पुलिस भी अपने यहां ताकतवर लोगों के गुंडा गिरोह की तरह काम करती है, हालांकि पुलिस के आने से पहले ही आप रिश्तेदारी में या पैसे लेकर काम करने वाले किसी गुंडे के हाथों पिट चुके होते हैं। इस मुश्किल से निपटने का एक रास्ता सीधे, भले, गरीब और कमजोर लोगों को जुझारू बनाने, उन्हें पारंपरिक हथियारों से लैस करने का होता है, जिस पर मैंने सचेत ढंग से आरा शहर में काम किया और इसमें कुछ कामयाबी भी हासिल की। लेकिन बात जब कम्युनिस्ट आंदोलन और सशस्त्र संघर्ष के आपसी रिश्ते की होती है तो सशस्त्रीकरण के इस मॉडल को सिर्फ बचाव की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
चीन की क्रांति से प्रेरणा लेते हुए अपने यहां सशस्त्र संघर्ष की तीन पांतों की कल्पना की जाती है। एक, जन मिलिशिया, यानी पारंपरिक हथियारों से लैस आम जनता जो वर्ग संघर्ष के दौरान जमींदारों और पूंजीपतियों के गुंडों से इन हथियारों के जरिए अपना बचाव करती है। दो, स्थानीय दस्ता, यानी परिष्कृत हथियारों से लैस योद्धाओं की एक छोटी इकाई जो जनता के बीच घुलमिल कर रहती है, जन मिलिशिया को प्रशिक्षित करती है और शासक वर्ग के अलावा जब-तब पुलिस से भी मुकाबले के लिए तैयार रहती है। तीन, चलायमान सेना, जो लड़ाई के उन्नत दौर में बड़े इलाकों में मार्च करती है, स्ट्रेटेजी बनाकर युद्ध लड़ती है और राष्ट्रीय सेना को परास्त कर देने के इरादे से काम करती है। रूस में ऐसी संरचनाएं क्रांति के बाद अस्तित्व में आई थीं, जबकि चीन में ये क्रांति से पहले भी करीब बीस साल तक वजूद में रहीं। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के आसपास हुए तेलंगाना और तेभागा के संघर्षों में सशस्त्र ढांचा जन मिलिशिया तक ही सीमित था। (तेलंगाना में कहीं-कहीं निजाम के रजाकारों से निपटने के लिए स्थानीय दस्ते भी बनाए गए थे।) लेकिन नक्सलबाड़ी के आंदोलन के लगभग शुरुआती दौर में ही फौज से लड़ने लायक चलायमान सेना के गठन की बात होने लगी थी। इसके तार चीन की सांस्कृतिक क्रांति में माओ त्से तुंग के नजदीकी समझे जाने वाले एक विवादास्पद करैक्टर लिन पियाओ की एक थीसिस से जुड़ते हैं, जिसके मुताबिक तीसरी दुनिया में क्रांति की स्थितियां हमेशा बनी रहती हैं। सत्तर के दशक में लिन पियाओ (संभवतः) एक प्रायोजित विमान दुर्घटना में इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी अजीब प्रस्थापना आज भी बारूदी सुरंग की शक्ल में जहां-तहां फटती रहती है।
बंगाल में नक्सलबाड़ी की पराजय के बाद नक्सल आंदोलन ने सशस्त्र संघर्ष का सबसे गहरा प्रयोग भोजपुर में ही किया। सत्तर के दशक में कुछ समय तक तो यहां हमला करो और डटे रहो का आत्मघाती सिद्धांत भी अमल में लाया गया था, जिसका नतीजा कई होनहार कार्यकर्ताओं और नेताओं की शहादत के रूप में देखने को मिला। सोलह कच्चे घरों को सुरंग से
इंटरनेट पर आवारगी करते हुए यह चीज़ हाथ लगी। बिहार और सशस्त्र संघर्ष के बारे में बकलम चंदूभाई हमें जानने को मिल रहा है। इस गीत का यहां कुछ संदर्भ जुड़ सकता है, यही सोच कर इसे लगा रहे हैं। बताना चंदूभाई को ही है। Mai Hoo Asli Mayowadi
जोड़कर पहले पुलिस, फिर बीएसएफ और फिर भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट के साथ 105 घंटे मुकाबला करने के किस्से भी यहां सुने-सुनाए जाते हैं। बहुआरा गांव में हुई इस लड़ाई की दिनमान में छपी हुए एक रिपोर्ट मैंने भी पढ़ी है। लेकिन मेरे भोजपुर पहुंचने तक ये सारी बातें किस्से-कहानियों में ही सिमट कर रह गई थीं। सेना और पुलिस से मुकाबला करना यहां करीब बीस वर्षों से पार्टी का अजेंडा नहीं रह गया था, क्योंकि क्रांतिकारी परिस्थितयां हमेशा मौजूद होने और अपनी मर्जी से जब चाहे तब क्रांति कर देने के विभ्रम से पार्टी अस्सी दशक की शुरुआत में ही मुक्त हो गई थी। (अपनी हथियारबंद कार्रवाइयों को लेकर इधर लगातार चर्चा में रह रही सीपीआई (माओवादी) की सोच आज भी वहीं है । हथियारों का इस्तेमाल वर्ग संघर्ष या जन संघर्ष को आगे बढ़ाने में करने के बजाय वह सेना और पुलिस पर हमला करते हुए चीन की तरह मुक्त क्षेत्र बनाने में कर रही है।)
शस्त्र संघर्ष को लेकर पार्टी की समझ बदलने की बात सुनने में जितनी आसान लगती है, व्यवहार में यह उतनी ही मुश्किल साबित हुई। नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारु मजूमदार ने कभी कहा था कि 1975 तक भारत अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक बेड़ियों से आजाद हो जाएगा। 1972 में चारु मजूमदार शहीद हो गए। पुलिस और मिलिट्री के दमन के सामने आंदोलन बिखर गया। काफी दिनों तक हालत यह थी कि लोगों को पता तक नहीं था कि कौन कहां है। इसके बावजूद 1975 की शुरुआत से ही जो भी नक्सलवादी जहां भी था, उसने यह सोचकर वहीं लड़ाई में अपना सबकुछ झोंक दिया कि किसी न किसी चमत्कार से सन 75 के अंत तक देश में क्रांति जरूर हो जाएगी। भोजपुर में सशस्त्र संघर्ष से जुड़े इस तरह के असाध्य आशावाद के कई अवशेष मेरे वहां रहते हुए भी जब-तब दिख जाते थे। चलायमान सेना की अवधारणा काफी पहले छोड़ दी गई थी। हथियारबंद दस्ते थे लेकिन पार्टी का जोर अब जुझारू जन आंदोलन खड़ा करने और इसके लिए बचाव के उपाय के रूप में जन मिलिशिया बनाने पर था। दस्तों में मौजूद योद्धाओं की मुख्य भूमिका स्थानीय संगठक और जन मिलिशिया के प्रशिक्षक की तय की गई थी, लेकिन उनकी तैयारी इस तरह की नहीं थी।
ग्रामीण गरीब जनता में इन योद्धाओं के प्रति गहरा लगाव और सम्मान मौजूद था, लेकिन रात बारह बजे राइफल लिए घूमने वाले व्यक्ति की अपनी छवि छोड़ना इनके लिए आसान नहीं था। कुल मिलाकर उनकी स्थिति दुविधापूर्ण थी। योद्धा बने रहने के लिए उनका उन्नत हथियारों में दक्ष होना, ड्रिल करना और हर रोज दस-पंद्रह किलोमीटर दौड़ना जरूरी था, जबकि संगठक बनने के लिए उनसे गहराई से पार्टी लाइन का अध्ययन करने, धीरज रखने, दो बात सुनकर गम खा जाने की अपेक्षा की जाती थी। हालात ऐसे थे कि दोनों में से कुछ भी उनसे हो नहीं पा रहा था और उनमें से ज्यादातर दिनोंदिन खराब योद्धा और खराब संगठक बनने की तरफ बढ़ रहे थे। मुझे नहीं पता कि इस स्थिति से उन्हें किसी बिंदु पर उबारा जा सका या नहीं। भोजपुर से आने वाली सूचनाएं इस संबंध में मुझे ज्यादा आशान्वित नहीं कर पाई हैं। मेरी तरफ से उनके हालात बदलने में कोई खास योगदान नहीं हो पाया। मेरा कार्यक्षेत्र शहर में होने के चलते उनके साथ मेरा सीधे कोई जुड़ाव नहीं था। एक-दो बार आरा मोफस्सिल क्षेत्र में उनकी जरूरत पड़ी तो कोऑर्डिनेशन का काम जैसे-तैसे हो गया। लेकिन योद्धाओं की कार्यशैली बदलने का काम बहुत बड़ा था और इसे वही अंजाम दे सकता था, जिनके पास दिन-रात उनके साथ रहने का तजुर्बा हो। दीनाजी यह काम कर सकते थे लेकिन पारिवारिक मजबूरियों के चलते उनका रास्ता बदल गया। उनकी जगह लेने वाले कुणाल जी कुछ अपनी पृष्ठभूमि और कुछ इच्छाशक्ति की कमी के चलते इस काम को बहुत आगे नहीं बढ़ा सके।

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Friday, July 23, 2010

गाता जाए बंजारा…

banjara-musician

यायावरी, डगर-डगर घूमना, आवारगी आदि भावों को प्रकट करने के लिए हिन्दी-उर्दू में बंजारा शब्द है। इसकी रिश्तेदारी भी पण् से है। प्राचीनकाल में व्यापार व्यवसाय के लिए पण् शब्द का चलन था। पण् का मतलब था। लेन-देन, क्रय-विक्रय, मोल लेना, सौदा करना, आदि। शर्त लगाना जैसे भाव भी इसमें शामिल थे। इसी से बना एक अन्य शब्द पणः जिसका मतलब हुआ पांसों दांव लगाकर या शर्त लगाकर जुआ खेलना। चूंकि व्यापार व्यवसाय में शर्त, संविदा अथवा वादा बहुत आम बात है इसलिए इस शब्द में ये तमाम अर्थ भी शामिल हो गए। पण् से ही पणः नाम की एक मुद्रा भी चली जो अस्सी कौड़ियों के मूल्य का सिक्का था। इसी वजह से धनदौलत या संपत्ति के अर्थ में भी यह शब्द चल पड़ा। मकान, मंडी, दुकान या पेठ जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हो गए। पण्य शब्द का एक अर्थ वस्तु, सौदा या शर्त के बदले दी जाने वाली वस्तु भी हुआ। इससे बना पण्य जिसका मतलब हुआ बिकाऊ या बेचने योग्य। व्यापार व्यवसाय के स्थान के लिए इससे ही बना एक अन्य शब्द पण्यशाला अर्थात् जहां व्यापार किया जाए। जाहिर है यह स्थान दुकान का पर्याय ही हुआ। कालांतर में पण्यशाला बनी पण्यसार। इसका स्वामी कहलाया पण्यसारिन्। हिन्दी में इसका रूप बना पंसारी या पंसार। पनवेल - मुंबई के उपनगर पनवेल के पीछे भी यही पण्य छुपा है। पण्य अर्थात् बिक्री योग्य और वेल् का अर्थ हुआ किनारा यानी बेचने योग्य किनारा। जाहिर सी बात है यहां बंदरगाह से मतलब है। पश्चिमीतट के एक कस्बे का किनारा अगर व्यापार के काबिल है तो उसे पण्यवेला नाम दिया जा सकता है। यही घिसते घिसते अब पनवेल हो गया है। क्रय-विक्रय के अर्थ में विपणन शब्द खूब प्रचलित है।  गौर करें इसमें झांक रहे पण् शब्द पर।
ण् से बना वाणिज्य अर्थात व्यापार। इस तरह व्यापार करनेवाले के अर्थ में वणिक के अलावा एक नया शब्द और बना वाणिज्यकारक। भाषाविदों के मुताबिक इस शब्द के बंजारा में ढलने का क्रम कुछ यूं रहा - वाणिज्यकारक > वाणिजारक > वाणिजारा > बणिजारा > बंजारा। प्राचीनकाल में इन वाणिज्यकारकों की भूमिका वणिको से भिन्न थी। वणिक श्रेष्ठिवर्ग में आते थे और वाणिज्यकारक मूलत फुटकर या खेरची कारोबारी थे। रिटेलर की तरह। वाणिज्यकारक भी घूम घूम कर लोगों को उनकी ज़रूरतों का सामान उपलब्ध कराते थे। स्वभाव की भटकन को व्यक्त करने के लिए बंजारापन जैसा शब्द हिन्दी को इसी घुमक्कड़ी वृत्ति ने दिया है। यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में फेरीवालों के रूप में प्रचलित है। सामाजिक परिवर्तनों के तहत धीरे धीरे वाणिज्यकारकों की हैसियत में बदलाव आया। क्रय-विक्रय से हटकर उन्होंने कुछ विशिष्ट कुटीर-कर्मों और कलाओं को अपनाया मगर शैली वही रही घुमक्कड़ी की। इस रूप में बंजारा शब्द को जातिसूचक दर्जा मिल गया। ये बंजारे घूम-घूम कर जादूगरी, नट-नटी के तमाशे(नट-बंजारा), antique-banjara जड़ी-बूटी, झाड-फूंक आदि के कामों लग गए। कहीं कहीं रोज़गार की उपलब्धता में कमी के चलते बंजारों का नैतिक पतन भी हुआ। कुल मिलाकर किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है। जिप्सी लोगों की हैसियत आज  यूरोप के बंजारा समाज की ही है। ये लोग भी सैकड़ों साल पहले भारत से पश्चिम की ओर कूच कर गए थे। बंजारा समाज में संगीत की परम्परा भी महत्वपूर्ण है। ये लोग पैदाइशी सौदागर, संगीतकार और शिल्पी होते हैं।
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि, पणम, फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है। प्रख्यात विद्वान डॉ सम्पूर्णानंद पणियों(फिनीशी/प्यूनिक) को पूर्वी भारत का एक जाति समूह बताते हैं जो बाद में पश्चिम के सागर तट से होता हुआ ईरान तक फैल गया। शशिशेखर और शैलजा देवगांवकर की पुस्तक द बंजारा में इस शब्द की कुछ और व्युत्पत्तियों पर भी चर्चा की गई है। बंजारा शब्द की जातीय पहचान को प्रमुख माना जाए तो इसकी व्युत्पत्ति वनचर से भी मानी जा सकती है। वनचर यानी वे लोग जो जंगलों में भटकते हैं उन्हें वनचर कहा जा सकता है। वनचर> बंजर> बंजार > बंजारा के क्रम में वनचर का रूपान्तर माना जा सकता है। इस व्युत्पत्ति में बंजारा समाज में प्रचलित वाणिज्य-व्यापार की परम्परा की व्याख्या खोजने पर भी नहीं मिलती।
सी तरह एक अन्य शब्द है बिरंजर। यह फारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है चावल का व्यवसाय करनेवाले। गौरतलब है कि फारसी में चावल को बिरंज कहते हैं। मूलतः यह इंडो-ईरानी मूल का शब्द है। संस्कृत में व्रीहि शब्द है जिसका अर्थ है चावल। अवेस्ता में यह ब्रिहि हो जाता है और फारसी में इसका रूप बिरंज होता है। उत्तम किस्म के चावल से बने एक विशिष्ट किस्म के पुलाव के लिए बिरयानी नाम के मूल में यही व्रीहि, बिरंज हैं। बंजारा समाज के लोग जहां गृहोपयोगी छोटी बड़ी अनेक वस्तुओं का व्यवसाय करते हैं वहीं बंजारा शब्द को सिर्फ चावल तक समेट देना, बंजारा की व्यापक अर्थवत्ता के साथ न्याय नही होगा। बंजारा की एक अन्य व्युत्पत्ति भाषाविद् ऊबड़-खाबड़, अनुपजाऊ भूमि के लिए प्रयुक्त बंजर शब्द से भी लगाते हैं। वह समूदाय जो बंजर भूमि पर बसा हो, बंजारा कहलाता है। यह व्युत्पत्ति भी मुख सुख आधारित लोकप्रिय व्युत्पत्ति जान पड़ती है। बंजर शब्द के जन्मसूत्र जॉन प्लैट्स की हिन्दुस्तानी-उर्दू-इंग्लिश डिक्शनरी के मुताबिक बन्ध्या+धरा =बन्ध्याधरा से बना होगा। बन्ध्याधरा> बंझरा > बंझार> बंजर> बंजारा के क्रम में इस रूपान्तर की कल्पना की जा सकती है किन्तु इसे सिर्फ दिलचस्प कल्पना ही मानना चाहिए। [संशोधित पुनर्पाठ]

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Thursday, July 22, 2010

डॉटर यानी दूध दुहनेवाली बिटिया…

Milking
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हि न्दी की लगभग सभी ज़बानों में बच्चों के लिए छोरा-छोरी का सम्बोधन भी बड़ा लोकप्रिय है। हिन्दी के मध्यकालीन साहित्य खासतौर पर ब्रज भाषा में छोरा शब्द का प्रयोग खूब हुआ है। छोरा शब्द प्रायः शैशवकाल में जी रहे बच्चे के लिए ही इस्तेमाल होता है। यूं शैशव से लेकर कैशोर्य पार हो जाने तक छोरा या छोरी शब्द का प्रयोग खूब होता है। यह बना है संस्कृत धातु शाव से जिसमें किसी भी प्राणी के शिशु का भाव है। आपटेकोश में इसका विन्यास कुछ यूं दिया है- शाव+र+कः। इस शावरकः का वर्णविपर्यय के जरिये प्राकृत रूप होता है छावड़ओ और फिर ब्रज भाषा और खड़ी बोली में इसका दाखिला छोरा के रूप में होता है। छोरा-छोरी के बीच आमतौर पर क शब्द का प्रयोग भी किया जाता है जैसे छोकरा-छोकरी। इसे मध्यस्वरागम के तहत भी समझा जा सकता है। मगर शावरकः पर विचार करें तो यह वर्णविपर्यय का उदाहरण भी है। जिन बोलियों में छोकरा शब्द का इस्तेमाल होता है वहां शावरकः से छाकड़ओ रूप बन कर छोकरा और छोरा जैसे दो रूप संभावित हैं। शावक आमतौर पर चौपाए के सद्यजात शिशु के लिए प्रयोग किया जाता है। हिन्दी का छौना शब्द भी शावक से ही बना है। गौर करें कि मृगशावक अर्थात हिरण के बच्चे के लिए ही हिन्दी मे छौना शब्द का प्रयोग होता है। बच्चों के लिए चुन्नू, चुन्नी, चुनिया, छुन्नी जैसे नामों के मूल में संभवतः शैशव और शावक से संबंध रखनेवाला यह छौना शब्द ही है। हिन्दी में आमतौर पर छोकरा-छोकरी शब्द भी प्रचलित हैं पर इसकी अर्थवत्ता में बदलाव आ जाता है। छोरा-छोरी जहां सामान्य बच्चों के लिए प्रयोग होता है वहीं छोकरा में दास या नौकर का भाव भी है।
हिन्दी में बेटी के लिए पुत्री शब्द ज्यादा प्रचलित हैं किन्तु किन्हीं बोलियों में धी, धिया जैसे शब्द भी इस्तेमाल होते हैं। धी, धिया आदि शब्द दुहिता से बने हैं। डॉ रामविलास शर्मा पश्चिमोत्तर क्षेत्रों खासतौर पर सुविस्तृत ईरान के संदर्भ में संस्कृत परिवार के पूर्ववैदिक स्वरूप की चर्चा करते हुए बताते हैं कि खोवार भाषा में झ़ऊ का अर्थ बच्चा या पुत्र है। लड़की के लिए झ़ूर शब्द है। वे लिखते हैं कि भाषाविद मोर्गेन्स्टीन ने कल्पना की है की झ़ूर का मूलरूप जुहता था। दुहिता के ग्रीक प्रतिरूप थुगातेर में आदिस्थानीय थ् मूलरूप के ध् की ओर संकेत करता है। धूता, धूतर जैसे रूपों से दुहिता बनना संभव है। धी (लड़की) के समान धू, धउ (लड़का) रूप प्रचलित थे और इनके साथ धूत या धूर जैसे रूप थे जिनसे खोवार झ़ूर, कलश का झूर्, ब्रज का छोरा-छोरी जैसे शब्द बने हैं। भ्राता का बहुचन खोवार में ब्रारगिनि है। रामविलास

... भारोपीय संदर्भों में मातृ-मादर-मदर, पितृ-पिदर-पिसर-फादर, भ्रातृ-बिरादर-ब्रदर की कड़ी में जैसे ही डॉटर शब्द के तुलनीय फारसी या संस्कृत की चर्चा होती थी तब उक्त पारिवारिक शब्दों के समान किसी अन्य शब्द की कल्पना इसलिए सामान्य व्यक्ति नहीं कर पाता क्योंकि दुहिता शब्द बोलचाल की हिन्दी में नहीं है और संस्कृत में पुत्री शब्द अधिक प्रचलित है। जैसे ही दुहिता-दुख्तर सामने आते हैं, डॉटर शब्द पहेली नहीं रह जाता ...OLYMPUS DIGITAL CAMERA          

शर्मा यहां दिलचस्प बात कहते है कि गिनि, गण का रूपान्तर है। जाहिर है यह ठीक वैसे ही है जैसे फारसी में बिरादर से बने बिरादरी में गणवाची  समूह का भाव उभरता  है। यही तमिल का गळ है। खोवार में पत्नी के लिए बोको शब्द है जो मराठी बाइको से तुलनीय है जिसका अर्थ भी पत्नी है। बाइको का बाई, अंग्रेजी वाइफ के बाई से तुलनीय है और बाई का नारीवाचक आधुनिक आर्य प्रतिरूप बाई है। मज़े की बात यह कि संस्कृत का भगिनी या बहन हिन्दी में बहिनी हो जाता है। बाई शब्द चाहे उत्तर भारत में हीन समझा जाता हो मगर मालवी में बाई बड़ी बहन को भी कहते हैं और सम्भ्रान्त स्त्री को भी।   बहिन, बहिना, बहीनी जैसे शब्द भगिनी के प्रतिरूप हैं। मराठी में भी बाई शब्द सम्मानसूचक है। मराठी में भाभी को वहिनी कहते हैं। यह भी भगिनी से ही बना है। भाई की पत्नी के साथ भी बहन जैसे रिश्ते की कल्पना मराठी समाज का विशिष्ट सांस्कृतिक आधार है।
दुहिता भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है। फारसी का दुख्तर, पश्तो का दोख्तर और अंग्रेजी का डॉटर शब्द इसी कड़ी का हिस्सा है। अवेस्ता में इसका रूप दुहितर होता है। यह समझा जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल के गण समाज में पशुओं को दूहने का काम बेटियां या पुत्रियों की जिम्मेदारी थी। दुहिता अर्थात जो दूहने का काम करे। फारसी में कहावत है दुख़्तर नेक अख़्तर यानी बेटी आंख का तारा होती है। फारसी में अख़्तर का अर्थ सितारा या नक्षत्र होता है। दुख्तर नेक अख़्तर में दुख़्तर यानी पुत्री के अच्छा सितारा या नक्षत्र होने की तुलना में आंख का तारा होने का भाव ही प्रमुख है। रामविलास जी जो राह दिखा रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांतों में बोली जाने वाली कलश या खोवार भाषाओं में वैदिक का में रूपांतर नज़र आ रहा है। यह रूपांतर अपवादस्वरूप है या सामान्य, यह भाषाविज्ञानियों के अध्ययन का विषय है। हालांकि पूर्व वैदिक धूर ध्वनि से खोवार का झूर और फिर छोरा से इसका साम्य तार्किक है। धू, धऊ और धी (पुत्री) के रूप में वैदिक परिवार की दुह् धातु से भी इसका साम्य तो बैठता है किन्तु दुहिता के पुत्री होने की तार्किक व्युत्पत्ति दुह् धातु की तुलना में इस धारणा से अधिक स्पष्ट होती है कि दुहने का काम पुत्रियां करती थीं। संस्कृत की दुह् धातु में निचोड़ने, किसी वस्तु से कोई अन्य दूसरी वस्तु निकालने का भाव है। दोहन या दोहना का प्रयोग हिन्दी में मुहावरे के तौर पर भी होता किसी को डरा कर अपना काम निकलवालने के अर्थ में है। भयादोहन शब्द का प्रयोग आम है। प्रायः दुनियाभर की भाषाओं पर प्राचीन पशुपालन संस्कृति का ही प्रभाव रहा है और पशुओं के साहचर्य के दैनंदिन अवसरों ने ही भाषाओं को समृद्ध किया है। पशुओं का दूध दुहनेवाली के रूप में बेटी की जो व्यंजना दुहिता में उभर रही है, वह अद्भुत है। हिन्दी में नाती के लिए जो दौहितृ शब्द है वह इसी दुहिता से आ रहा है। दुहिता का पुत्र अर्थात दौहितृ। संस्कृत में दुहितृ का अर्थ दामाद भी है।

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Sunday, July 18, 2010

गरीब की दुहाई, सामंत का आह्वान और हाय-हलो!!!

COMPLAINT

र भाषा में कुछ खास शब्द होते हैं जिनका जन्म तो सामान्य रूप में होता है मगर जीवन की विभिन्न  परिस्थितियों में उनकी उभिव्यक्ति में नाटकीयता का समावेश भी होता जाता है। हिन्दी के दुहाई शब्द का महत्व भी इन्ही संदर्भों में है। किस्सों-कहानियों में दुहाई शब्द खूब प्रचलित रहा है। सर्वहारा वर्ग का आर्तनाद ही दुहाई है। शोषित समाज की दुखों से त्राण पाने की कामना जब मुखरित होती है तो वह पहले शासक वर्ग के सामने दुहाई के रूप में फूटती है। मगर दुहाई का असर जब नहीं होता तब हाहाकार मचता है, उससे क्रान्तियां जन्म लेती हैं। भाषा के नज़रिए से दुहाई और हाहाकार में रिश्तेदारी भी है। दुहाई शब्द में आमतौर पर मुसीबत के वक्त की गई पुकार का भाव है। आत्मरक्षार्थ किसी समर्थ, बलवान या ईश्वर के सम्मुख उच्चस्वर में की गई प्रार्थना ही दुहाई है। आमतौर पर ऊंचा सुर अशिष्टता का सूचक होता है और क्रोध से बड़ी अशिष्टता और कुछ नहीं। स्वाभिमानी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि उसकी किसी भी भंगिमा से लाचारी प्रकट न हो जाए। किन्तु बेबसी जब हद से गुजरती है, तब कण्ठ से सिर्फ आर्तस्वर फूटते हैं, जिन्हें शिष्टाचार के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। दुनियावी मायनों में यही दुहाई है।

दुहाई का व्यापक अर्थ है जो धीरे धीरे संकुचित हो गया। मूलतः दुहाई में पुकारने का भाव है। वैसे यह दोहरी अर्थवत्ता वाला शब्द भी है। सामंती शब्दावली में जहां दुहाई मुनादी, घोषणा है वहीं आम आदमी के लिए दुहाई मदद की अभिव्यक्ति है। मध्यकाल में दुहाई का अर्थ घोषणा या मुनादी ही था। दुहाई फेरना मुहावरे से इसकी पुष्टि होती है जिसका अर्थ ही राज्यादेश की घोषणा करना होता है। घोषणा या मुनादी के दौरान एक ही बात को बार बार दोहराया जाता है। इसी तरह कष्ट से निस्तार पाने के लिए संकटग्रस्त व्यक्ति की प्रार्थना में भी दोहराव होता है। दुहाई शब्द की व्युत्पत्ति प्रोफेसर सुरेशकुमार वर्मा द्वि+आह्वान ( हिन्दी अर्थान्तर ) से मानते हैं अर्थात दो बार पुकारना। द्वि-आह्वान > द्विहावन > दुहाइन > दुहाई के क्रम में इस शब्द का विकास हुआ होगा, ऐसा लगता है। संस्कृत का आह्वान शब्द बना है ह्वै धातु से जिसमें पुकारने, नाम लेकर बुलाने, ललकारने, प्रतिस्पर्धा करने, चुनौती देने या गिड़गिड़ाने-प्रार्थना करने का भाव है। इस ह्वैमें सारा चमत्कार ध्वनि का है। हिन्दी शब्दसागर में दुहाई का अर्थ द्वि + हाहा दिया है। यूं व्युत्पत्ति के लिहाज से यह भी इसी कड़ी में आता है। दुहाई में खास बात दो बार आह्वान करने यानी पुकारने से है। दुहाई सरकार की इस वाक्य दो से अधिक बार प्रार्थना का भाव है। अदालतों में जब मुजरिमों को हाजिर करने की पुकार लगती है, उसे भी दुहाई फेरना कहा जाता है।
cryभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने एक-दूसरे का ध्यानाकर्षण करने के लिए जिन ध्वनियों का प्रयोग किया, दुनियाभर में उनमें आश्चर्यजनक समानता है। ज्यादातर कण्ठ्य ध्वनियां हैं जो सीधे गले से निकलती हैं। जिसके लिए जीभ, दांत अथवा तालु का कोई काम नहीं है जैसै अ-आ अथवा ह-हा-हो। एक अन्य दिलचस्प समानता यह भी है कि यह शब्दावली पूर्व में भी और पश्चिम में भी मल्लाहों द्वारा बनाई गई है। भारत के ज्यादातर मांझी या मल्लाह ओssssहैsया, हैय्या होsss जैसी ध्वनियों का प्रयोग करते हैं। सामान्यतौर पर ध्यानाकर्षण के लिए ऐ भाई, या ओ बाबू जैसे सम्बोधन ही इस्तेमाल होते हैं। अरबी, फारसी, उर्दू में शोर-गुल के लिए “हल्ला” शब्द प्रचलित है जिसका रिश्ता भी इन्हीं ध्वनियों से है। इसे ही “हो-हल्ला” या “हुल्लड़” कहते हैं। यूरोप में भी नाविकों के बीच ध्यानाकर्षण का प्रचलित ध्वनिसंकेत था ahoy यानी हॉय। इसके अलावा पुरानी जर्मन में भी hola / hala जैसे संकेत थे जो अंग्रेजी के hallo / hello में तब्दील हो गए। मूल रूप से इन ध्वनियों को किसी भाषा परिवार में नहीं बांटा जा सकता। ये आदिम ध्वनियां हैं और मनुष्य के कंठ में भाषा का संस्कार आने से पहले से पैठी हुई हैं और सहजता से उच्चारी जाती रही हैं। आप्टे के संस्कृत कोश में हंहो शब्द का उल्लेख है जिसका प्रयोग प्राचीनकाल में आवाज देने के लिए संबोधनात्मक अव्यय के रूप में होता था। वही आदिम ध्वनियां आज भी हाय और हैलो के रूप में समाज में धाक जमाए हुए हैं। भारत में नमस्कार-चमत्कार की तरह अभिवादन की औपचारिकता के लिए हाय-हलो मुहावरा भी प्रचलित हो गया है। पंजाबी में इसे हलो-शलो कह लिया जाता है।
प्टेकोश के मुताबिक ह्वैमें जब उपसर्ग लगता है तब आह्वान बनता है। आह्वान शब्द में अ-ह-व-न ये चार वर्ण हैं। जब इनमें विपर्यय होता है तो हिन्दी का देशज शब्द आवाहन बनता है जिसमें यज्ञ या धार्मिक क्रिया के जरिये किसी देवता को आमंत्रण दिया जाता है। यही आह्वान है। हिन्दी में इसका आहवान रूप भी अब चल पड़ा है। कष्ट की सामूहिक अवस्था से हाहाकार मचता है। यह हा शब्द की दो बार उपस्थिति पर गौर करें। हा शब्द में ही कष्ट निहित है। हाहा का उच्चार यानी हाहाकार। आप्टेकोश में हा शब्द का अर्थ है शोक, उदासी, खिन्न को प्रकट करनेवाला अव्यय। इसके अलावा इसमें आश्चर्य का भाव भी है। इस हा में निहित खिन्नता-उदासी का जो भाव है वह निश्वास से जुड़ता है। हा के अन्य कई अर्थ हैं जो इसे स्पष्ट करते हैं जैसे जाना, हिलना-डुलना, त्यागना, छोड़ना, कम होना, मुर्झाना, क्षीण होना आदि। हा मूलतः ध्वनिमूलक शब्द है। इससे बना है हाय जिसमें पीड़ा की अभिव्यक्ति होती है। हाय लगना एक मुहावरा भी है जिसमें अभिशाप का अभिप्राय है। गौर करें निश्वास पर। निश्वास यानी सांस छोड़ना जिससे या ध्वनि ही निकलती है। शब्द करने, ध्वनि करने की प्रक्रिया श्वास लेने अर्थात आश्वास की नहीं, बल्कि निश्वास की प्रक्रिया है। फेंफड़ो से छोड़ी गई वायु जब कण्ठ, तालु, जीभ और दांतो के बीच से, इन सब अवयवों की हरकतों में सम्मिलित होती हुई गुजरती है, तभी ध्वनियां जन्म लेती हैं जिससे शब्दो का निर्माण होता है। शब्द ही भाषा का आधार हैं। जाना, छोड़ना, कम होना जैसे अर्थ भी निश्वास में स्पष्ट हैं। फेफड़ो में एकत्र वायु कण्ठ मार्ग से जब निकलती है, तब उसकी मात्रा में कमी और गति उत्तरोत्तर क्षीण होती जाती है।
प्रसिद्ध भाषाविद, चिन्तक रामविलास शर्मा भारोपीय परिवार में ध्वनि में छुपे संकेतों का दिलचस्प रिश्ता चीनी भाषा परिवार से जोड़ते हैं। वे लिखते है कि चीनी शुओ का अर्थ है बोलना। संस्कृत में शब्द ( ध्वनि करना) क्रिया है। चीनी हुआ या ह्वा का अर्थ है, शब्द, भाषा। संस्कृत धातु ह्वै का अर्थ है पुकारना। श-ह का विनिमय भारत की तरह चीन में भी पाय जाता है। व्हा के लिए परिनिष्टित चीन में शिह-ती है, दक्खिनी चीनी मे हैई है। शुओ और हुआ का मूल शब्द एक ही जान पड़ता है, उसी शुओ से शब्द और ह्वै का संबंध है। स्पष्ट है कि सियार कि हुआँ हुआँ सिर्फ ध्वनि भर नहीं बल्कि शब्द की भूमिका है क्योंकि मनुष्य की प्रारम्भिक भाषा प्रकृति में व्याप्त ध्वनिसंकेतों के अध्ययन पर आधारित ही थी जिसमें पशुओं के ध्वनिसंकेत भी शामिल हैं।
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Saturday, July 17, 2010

सशस्त्र क्रांतिकारिता के सच [बकलमखुद-141]

…राजनीतिक नेतृत्व को कभी भी हथियारबंद ताकतों की हां में हां नहीं मिलानी चाहिए और हथियारों को पूरी सख्ती से राजनीति के नियंत्रण में रखना चाहिए, क्योंकि इनके इस्तेमाल से होने वाला नुकसान इनसे होने वाले तात्कालिक फायदे की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का पच्चीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
क्सर में हुई पार्टी जिला कमेटी की पहली ही मीटिंग में ही मेरी मुलाकात दो योद्धाओं से हुई थी। उनमें एक उस समय पार्टी की आर्म्ड यूनिटों की प्रभारी की भूमिका में थे, जबकि दूसरे एक बम विस्फोट में एक आंख और आधे चेहरे की त्वचा गंवा देने के बाद किसी तरह मौत के मुंह से निकल आए थे और एक ब्लॉक में मुख्य पार्टी संगठक का काम देख रहे थे। दूसरे वाले साथी के बारे में बात करने का मौका शायद अपने जेल प्रकरण पर चर्चा के दौरान आए। पहले वाले (जिनका असली नाम मुझे कभी पता नहीं चला और जो नाम चलन में था, उसे भी बदल कर मैं यहां विष्णु जी रख देता हूं) शुरू में मुझे मीटिंग के इंतजाम में शामिल किसी लोकल लड़के जैसे लगे। कुछ समय बाद मैंने गौर किया कि उनके ऊपरी जबड़े के किनारे वाले दो दांत गायब हैं और उनके हंसने में कोई गहरी बात है। खुल कर हंसते हुए भी उनकी आंखें थोड़ी उदास और वेधती हुई सी लगती थीं। मीटिंग के दौरान परिचय हुआ तो सोच में पड़ गया कि डेढ़ पसली के ये सज्जन क्या खाकर पुलिस और गुंडा गिरोहों से मुठभेड़ में उतरते होंगे। लेकिन समय बीतने के साथ इस तरह के भ्रम दूर होते चले गए।
माओ त्से तुंग ने जनयोद्धाओं के बारे में लिखा है कि उन्हें जनता के बीच पानी में मछली की तरह रहना चाहिए। उनके होने की पहली शर्त ही यही है कि वे बिल्कुल आम आदमी हों। हल्का-फुल्का, इकहरा शरीर, चाल-ढाल, बातचीत में कुछ भी ऐसा न हो जिससे आसानी से उनकी पहचानकी जा सके। जरूरत पड़ने पर कई-कई दिन बिना खाए, बिना सोए लगातार चीते की तरह चौकन्ना रह सके, चारो तरफ पड़े घेरे से भी हवा की तरह निकल जाए, ऐसा आदमी ही जनता का युद्ध लड़ सकता है। लड़ाई में उसे बेरहम होना चाहिए, लेकिन आम जीवन में उतना ही संवेदनशील भी होना चाहिए। ऐसे ही एनिग्मा मुझे विष्णु जी हमेशा नजर आए। दो-तीन बार हम आरा की बसों में साथ-साथ गए। संयोगवश एक बार किसी बात को लेकर कंडक्टर से थोड़ी झंझट हो गई। मुझे लगता था कि हम दो लोग हैं, कंडक्टर की गुंडई नहीं चलने देंगे। लेकिन बाद में पता चला कि वहां मैं अकेला ही हूं। विष्णु जी साथ होते हुए भी साथ नहीं थे। वे लगातार अपनी सीट पर ही बैठे रहे और पूरे झगड़े के दौरान एहसास तक नहीं होने दिया कि वे मेरे साथ हैं।
नसे पहले अपने आंदोलन से जुड़े और भी जनयोद्धाओं से मेरी मुलाकात थी। पटना में मुंशी जी नाम के जिन कमांडर के साथ लगातार चार रात मार्च करने का मौका मिला था, उनका शरीर गठीला और बाल घुंघराले थे। चेहरे से साहस और आक्रामकता टपकती थी। बाद में मुझे लगा कि किसी छापेमारी में उनके लिए आम लोगों के बीच घुल-मिल जाना काफी मुश्किल होता रहा होगा। पालीगंज में थोड़ी देर के लिए अनिल जी उर्फ कउसा से मुलाकात हुई थी, जो इसके अगले साल  ही पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में शहीद हो गए (असल में उन्हें राह चलते पकड़ा गया और फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया)। बिहार के गांवों में कउसा कंजी आंख वाले लोगों को कहते हैं और पुलिस में अनिल जी के नाम का खौफ उनके इस उपनाम की शक्ल में ही जाहिर होता था। उनका निशाना इतना पक्का था कि अंधेरी रात में फर्लांग भर दूरी से छान पर पड़े कद्दू में गोली मार सकते थे। लेकिन उनके लिए भी लोगों में घुल-मिल जाना आसान नहीं था। लंबा कद, खिलाड़ियों जैसी चुस्ती और हमेशा चुगली करती रहने वाली कंजी आंखें उन्हें कहीं भी पकड़वा सकती थीं।
हरहाल, विष्णु जी अब तक देखे गए सारे योद्धाओं से अलग थे। उनका युद्ध कौशल ही नहीं, पूरा व्यक्तित्व उन्हें आदर्श uresजनयोद्धा बनाता था। काफी समय बाद मुझे पता चला, वे रोहतास जिले में तंतवा (डलिया वगैरह बनाने वाली ) जाति के एक भूमिहीन किसान परिवार से आए हैं। उमर मुझसे करीब दस साल ज्यादा है। शादी हो गई है। पत्नी और एक बेटी कहीं सड़क किनारे मंड़ई डाल के रहती हैं। छोटे-मोटे सामान बनाकर और खेतों में मजदूरी करके गुजारा करती हैं लेकिन कुछ समय पहले उन्हें अपनी मंड़ई भी छोड़नी पड़ गई है। विष्णु जी का अतीत इस वर्तमान से भी कहीं ज्यादा भयानक था। उनके पिता के जीते जी ही गांव के राजपूत जमींदार ने उनकी मां को अपनी रखेल बना लिया था। एक साथी का कहना था कि विष्णु जी असल में जमींदार के ही लड़के हैं और उनके हाई स्कूल तक पढ़ लेने की व्यवस्था उनके कानूनी पिता के बजाय इस जैविक पिता ने ही की थी।
क दिन विष्णु जी स्कूल से घर लौटे तो देखा कि दरवाजा खुला है। भीतर चारपाई पर उनके जैविक पिता की गला कटी लाश पड़ी है और उसके खून की एक पतली धारा बहती हुई चौखट तक आ गई है। इस किस्से की अपनी पेचीदगियां हैं, जिनके निस्तार की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि विष्णु जी इस बारे में मैं कोई बात नहीं कर सकता था। जिन साथी ने यह कहानी सुनाई थी, उन्होंने बताया कि लाश देखते ही विष्णु जी शॉक में वापस मुड़े और भागते ही चले गए। बाद में उसी खौफ के किसी पल में उनकी मुलाकात पार्टी के किसी साथी से हुई और उन्हें दस्ते में शामिल कर लिया गया। निश्चित रूप से उनकी सोच में जाति उत्पीड़न का बहुत गहरा तत्व मौजूद था, जो कभी-कभी घोर सवर्ण विरोधी दुराग्रहों की शक्ल में भी सामने आता था। मसलन, आरा अस्पताल में एक घायल साथी का इलाज करने से मना कर देने वाले डॉक्टर का पक्ष लेकर खामखा गुंडई करने वाले दुसाध जाति के एक कंपाउंडर को पार्टी के कुछ साथियों ने उसके घर के पास ही घेर कर पीटा तो विष्णु जी ने कहा, ऐसा आप लोग किसी ठाकुर या भूमिहार गुंडे के साथ करते तो पता चल गया होता।
पार्टी के हथियारबंद दायरे के शीर्ष नेता की सोच में मौजूद जाति और वर्ग की इस दुविधा का हमारे आंदोलन को काफी नुकसान उठाना पड़ा। जगदीशपुर के इटाढ़ी गांव में जमीन को लेकर लड़ाई चल रही थी। यहां ज्यादातर जमीनें ठाकुर जाति के भूस्वामियों के पास थीं और साथ में उन्होंने भूमिहीनों को आवंटित ग्राम समाज वगैरह की जमीनों पर भी कब्जा कर रखा था। एक रात इसी पृष्ठभूमि के कुछ लोग जगदीशपुर में बीजेपी की एक चुनावी सभा में शामिल होकर ट्रैक्टर से लौट रहे थे। उसी समय विष्णु जी के नेतृत्व में उन पर हमला हुआ, जिसमें पांच लोग मारे गए। यह घटना मानवीय दृष्टि से तो गलत थी ही, आंदोलन के लिए भी किसी लिहाज से ठीक नहीं थी। बाद में इसे और बेलाउर गांव की इससे मिलती-जुलती एक घटना को आधार बनाकर गठित हुई रणवीर सेना की ठाकुर-भूमिहार गोलबंदी के चलते पार्टी के कई साल बर्बाद हुए। भोजपुर, पटना और जहानाबाद में हमारे जनाधार के सौ से ज्यादा लोग रणवीर सेना के हमलों में मारे गए और पार्टी के कई संभावनाशील नेताओं-कार्यकर्ताओं को अपनी जानें गंवानी पडीं।
टाढ़ी हमले के अगले दिन ही पार्टी की जिला स्टैंडिंग कमेटी में मैंने इसका विरोध किया लेकिन अगले दिन पर्चा निकाल कर पार्टी प्रवक्ता के रूप में जिम्मेदारी भी ली। इस घटना के पीछे जिला कमेटी का कोई फैसला नहीं था। न ही पार्टी सेक्रेटरी कुणाल जी से इसके बारे में कोई राय ली गई थी। फिर भी कुणाल जी ने इस पर कोई नाराजगी नहीं दिखाई और आलोचना या तारीफ के रूप में सिर्फ इतना कहा कि वर्ग संघर्ष में यह सब होता रहता है। मुझे तब भी लगता था और आज भी लगता है कि कुणाल जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। राजनीतिक नेतृत्व को कभी भी हथियारबंद ताकतों की हां में हां नहीं मिलानी चाहिए और हथियारों को पूरी सख्ती से राजनीति के नियंत्रण में रखना चाहिए, क्योंकि इनके इस्तेमाल से होने वाला नुकसान इनसे होने वाले तात्कालिक फायदे की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। बहरहाल, इटाढ़ी की घटना के तुरंत बाद आनंद मोहन और प्रभुनाथ सिंह ने इसे लेकर बिहार व्यापी ठाकुर गोलबंदी बनाने का प्रयास किया। आरा की एक आमसभा में उन्होंने मेरा नाम ले-लेकर मेरे खिलाफ आक्रामक भाषण दिए। मार डालूंगा-काट डालूंगा टाइप इन भाषणों के वक्त मैं सभा में ठीक इनके सामने ही खड़ा था और आरा के पत्रकारों को लग रहा था कि अभी कुछ न कुछ बवाल होकर रहेगा।

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Wednesday, July 14, 2010

कुँए का बच्चा यानी चहबच्चा!!

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र्वी हिन्दी में चहबच्चा शब्द चलता है। फारसी में चह/चाह का अर्थ है कूप या गढ़ा। संस्कृत में जिस तरह बालसूर्य या बालचंद्र जैसे पद विकसित हुए, लगता है फारसी में भी चहबच्चा यानी बालकूप विकसित हुआ होगा। जलकूप की गहराई से पानी उलीचने के बाद उसके सहज उपयोग के लिए अक्सर कुए की जगत से सटी एक नांद नुमा रचना बनाकर वहां पानी एकत्र किया जाता रहा है। इसी नांद से नहाने, धोने और सिंचाई आदि के लिए जल का निकास होता है। यूं रास्तों को इर्दगिर्द, मैदानों में बारिश के पानी से भरे गढ़ों के कई नाम हैं। चहबच्चा भी इनमें से एक है। अन्य क्षेत्रों में इन्हें डाब, डाबर, पोखरा, गड़हियां, डबरा आदि कहा जाता है।

हबच्चा का सबसे पहला पता मिलता है चौआ शब्द में। हिन्दी में चोआ या चौआ का अर्थ भी पानी से भरा गढ़ा, गढ़हियां अथवा डाब होता है। ध्यान रहे चोआ शब्द गड्ढे के अर्थ में पंजाबी ज़बान में भी बोला जाता है। पंजाब की सीमा किसी ज़माने में अफ़गानिस्तान तक थी। ध्यान रहे, चोआ में चाहे खड्ड या गढ़े का भाव है, मगर यह मूलतः जलस्रोत वाला खड्ड है अर्थात ऐसा गढ़ा जिसमें से पानी का रिसाव होता है। जल के रिसाव को बोलचाल की भाषा में चूना कहते हैं। चूना, चुआना, चोआना जैसी क्रियाओं में पानी टपकने का भाव है, रिसाव का भाव है। भूमि की खुदाई करने पर जिस गहराई पर जल का रिसाव होने लगे, बस वही चोआ है। चोआ यानी जहां पर पानी चू रहा है।

कूप या गढ़े के अर्थ में फारसी के चह शब्द के जन्मसूत्र इसी चूने की क्रिया में छिपे हैं। यह चूना, चुआना जैसी क्रियाएं संस्कृत की च्यु धातु से निकली हैं जिसमें रिसना, गिरना, टपकना जैसे भाव हैं। च्युत् शब्द इसी कड़ी मे आता है। पदच्युत जैसा समास भी इसी शब्द से बना है जिसका प्रयोग परिनिष्ठित हिन्दी में आम है। पदच्युत में अपने स्थान से हटने का भाव है। इसका प्रचलित अर्थ है बर्खास्तगी। किसी को उसके पद से हटा देना। याद रहे च्यु क्रिया में रिसाव का जो भाव है उसमें अपना स्थान छोड़ने की क्रिया स्पष्ट है। रिसन में अदृष्य होना भी है। हिम का रिसाव दरअसल हिम के अदृष्य होने की क्रिया है। च्युत में दूर करने का भाव भी है क्योंकि रिसाव में गति अंतर्निहित है। गति और दूरी की सापेक्षता प्रमाणित है।

स्पष्ट है कि भूमिगत जलस्त्रोत के लिए चोआ या चौआ शब्द के मूल में संस्कृत का च्यवन शब्द है। च्यवन से च्यावन और फिर चुआना, चौआना जैसे शब्द बने। इसमें से मध्यस्वर आ का लोप होने से बना चूना जिसका प्रयोग तरल पदार्थ के टपकने के अर्थ में होता है। जलस्रोत के अर्थ में तलैया, खाला, नाला, झिरन, सोता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं जिनमें बहाव और रिसाव स्पष्ट है। बरास्ता अवेस्ता, इसी च्यु की आमद फारसी में चह् के रूप में होती है। अर्थ पंजाबी, भोजपुरी वाले चोआ का ही रहा अर्थात सामान्य गढ़ा, कूप या डबरा। मगर भाव स्पष्ट है। चह उसी गढ़े को कहेंगे जिससे जल का रिसाव होता है अर्थ वह कूप जो पानी चुआता है।

ह से चहबच्चा बनना ही शब्दों की अर्थवत्ता बढ़ने का उदाहरण है। अब चाहे इस चहबच्चा की व्याख्या छोटे कूप, बालकूप अथवा कुईंया के रूप में करें या फिर कुँए की जगत के पास बनी ऐसी रचना से करें जिसमें बच्चे नहाते हों। बच्चों को नहलाने के लिए आमतौर पर छोटी नांद का प्रयोग होता है। कई घरो में स्थाई तौर पर ये बनी रहती हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि बरास्ता संस्कृत, बच्चा शब्द का विकास वत्स शब्द से हुआ है। वत्सरः; बच्छरअ; बच्छड़ा जैसा क्रम रहा है। यहां वत्स में चौपाए के शिशु का भाव भी है। प्राचीनकाल से ही कुँओ के समीप पशुओं के पीने के लिए पानी की नांद बनाई जाती रही है। संभव है इसे चहबच्चा कहा जाता रहा हो। अर्थात जहां बच्चा यानी पशुधन पानी पिए। होली के मौके पर ऐसे ही छोटे पोखरो, डबरों में बच्चों को कूदते फांदते, किलोल करते देखा जा सकता है। आखिर चहबच्चा और क्या है?



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Monday, July 12, 2010

ज़ख़्म भी बेशर्म होता है…

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ना सूर वह घाव है जो हमेशा रिसता रहता है। यह जख्म भी हो सकता है या फोड़ा फुंसी भी जिसमें गहराई तक एक नली सी बन जाती है और अक्सर मवाद बहता रहता है। इसे ठीक होने में बहुत वक्त लगता है। इसीलिए किसी असाध्य समस्या के संदर्भ में नासूर शब्द में मुहावरे की अर्थवत्ता भी आ गई है। संभवतः नासूर, अरबी के ही नसा से बना है जिसमें नाड़ी का भाव है। शरीर की रक्त वाहिकाओं के लिए संस्कृत- हिन्दी में स्नायु, नस, नाड़ी या शिरा शब्द हैं जिनमें से नस का प्रयोग आमतौर पर होता है। यूं अरबी में नस शब्द नहीं मिलता है जिसका प्रचलन हिन्दी में खूब है। अरबी-फारसी के नब्ज और रग जैसे लफ्ज भी इन्हीं अर्थों में इस्तेमाल किए जाते हैं। अंग्रेजी में देखें तो इनके लिए नर्व, नर्वस जैसे शब्द चलन में हैं। खास बात ये कि नस या स्नायु और nerve, nervous जैसे शब्द एक ही मूल से जन्में है।
इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के ही एक शब्द sneu से ही इनका उद्गम माना जाता है। इसी से बना है संस्कृत का स्नु शब्द और स्नु से ही निकले हैं स्नायु और नस। वर्ण विपर्यय सिंद्धांत अर्थात अक्षरों का क्रम बदलने से स्नायु हो गया नस। हालांकि नब्ज शब्द अरबी का है और ये भाषा इंडो-यूरोपीय परिवार की नहीं है मगर ऐसा लगता है कि यह नब्ज भी अरबी में इंडो-यूरोपीय मूल से ही पहुंचा है। मिसाल के तौर पर अरबी में साइटिका नर्व को नसा कहा जाता है। कोई ताज्जुब नहीं कि अरबी का नब्ज और नसा भी वहीं से आया हो। इसी स्नु का एक अर्थ है बह निकलना या रिसाव। नासूर में रिसाव भी स्पष्ट है और स्नू में भी रिसाव है। नसा शब्द से निश्चित ही नासूर की रिश्तेदारी है। मद्दाह के कोश में भी नसा का अर्थ साइटिका नाड़ी दिया है। इसी तरह नासूर का अर्थ नाड़ीव्रण दिया हुआ है अर्थात नाड़ी तक गहराई वाला घाव या फोड़ा।
पूर्वी बोली में नासूर का नसूर रूप भी है। नासूर के लक्षण पर गौर करें तो इसकी उग्रता, तीव्रता और लगातार बढ़ते जाने की वजह से यह असाध्य माना जाता रहा है। ध्यान रहे नासूर उसी जख्म को कहते हैं जो बिगड़ चुका हो अर्थात इलाज के क्रम में भी ठीक न हो रहा हो। इसी नसूर से उस व्यक्ति के लिए नसूरिया> नसूड़िया शब्द चल पड़ा होगा जिसकी उपस्थिति या संपर्क से काम बिगड़ जाता हो अर्थात अपशकुनी, अमंगली। बरास्ता फारसी इसकी आमद हिन्दुस्तानी में हुई। कोई ताज्जुब नहीं कि इस नासूर से नसुरिया> नसूड़िया के कुछ रूपांतर पश्चिमोत्तर क्षेत्रों की बोलियों में भी मिलें। num ज्ञानमंडल शब्दकोश में इसका रूप नसूड़िया दिया है। गौरतलब है कि हिन्दी शब्दसागर, ज्ञानमंडल, वृहत हिन्दीकोश जैसे अधिकांश शब्दकोशों में हिन्दी की पूर्वी शैली वाले उच्चारणों की भरमार है क्योंकि इनकी रचना पूर्वी क्षेत्रों में ही हुई और इनके संपादक मंडल में भी ज्यादातर लोग उधर के ही भाषा भाषी थे।
हरहाल, नसूड़िया का अर्थ यहां भी अमंगली, अपशकुनी ही दिया है। हिन्दी शब्दसागर में इसकी व्युत्पत्ति अरबी के नासूर से दी गई है। अपशकुनी या अमंगली के अर्थ में अगर नसूड़िया के संस्कृत मूल से उद्भूत होने का आग्रह न हो तो फिलहाल एकमात्र उपलब्ध व्युत्पत्ति पर मैं भरोसा करना चाहूंगा। शिष्टाचार भी यही है कि जब तक दूसरी तार्किक व्युत्पत्ति न मिले, पहली से काम चलाया जाए। हालांकि शोध की गुंजाईश लगातार बनी रहेगी। विदेशज शब्दों में देशी प्रत्यय लगाकर लगातार शब्द बनते रहे हैं। ज्यॉग्रॉफी को उर्दू पंजाबी में जुगराफ़िया बना लिया जाता है। अरबी-फारसी का मेल तो एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। नासूर> नसूर> नसूरिया > नसुड्ढा, निसळढा, निसल्डा जैसे रूपांतर संभव हैं। इसमें अमंगली के साथ ढीट, बेशर्म का भाव भी समाहित है। नासूर बेशर्म ही होता है। ब्लागर साथी प्रतीक पांडे बताते हैं कि औरैया-इटावा की तरफ़ यह शब्द "निसुड्ढ" के रूप में काफ़ी प्रचलित है। साथ ही "निसुड्ढपन" फैलाना और "निसुड्ढे" जैसे बाक़ी सारे इस्तेमाल अभी भी बहुत आम हैं।
सी तरह अपशकुनि, अमंगली के अर्थ में हिन्दी क्षेत्रों में एक शब्द और इस्तेमाल होता है सूम। मालवी, राजस्थानी में इसमें अड़ा / अड़ी प्रत्यय लगाकर सूम + अड़ा= सूमड़ा या सूम + अड़ी= सूमड़ी जैसे शब्द भी बना लिए जाते हैं। सूम, सूमड़ा, सूमड़ी मूलतः अरबी से बरास्ता फारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी आया हुआ शब्द है। यह बना है सेमिटिक धातु sh--m अर्थात शूम से जिसका अर्थ भी अनिष्टकारी, अमंगलकारी, कंजूस, मक्खीचूस, मनहूस, कृपण आदि। हिन्दी का सूम इसी शूम का रूपांतर है जिसमें मूलतः अमंगली या कृपण के साथ-साथ कंजूस का भाव प्रमु्खता से उभरता है।

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Friday, July 9, 2010

दण्डीस्वामी, देहयष्टि और लाठीचार्ज

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डं डे की महिमा सब जानते हैं। इससे बने मुहावरे डंडा परेड से सभी परिचित हैं। डंडा यानी बांस या लकड़ी का लंबा टुकड़ा, छड़ी या सोंटा। डण्डे का एक नाम सोंटा है तो दूसरा लाठी। यह लफ्ज बना है संस्कृत के दण्ड: से जिसकी उत्पत्ति दण्ड् धातु से हुई है। दण्ड् का मतलब है सज़ा देना। बाद में सजा देने वाले उपकरण यानी छड़ी के लिए ही दण्ड शब्द प्रचलित हो गया जिसने डंडे का रूप ले लिया। यह डंड या दंड शब्द सजा और जुर्माने के लिए भी प्रयुक्त होता है तथा भुजदंड भी एक प्रयोग है। प्रणाम के अर्थ में भी 'दंडवत' शब्द का प्रयोग होता है। गौरतलब है कि प्राचीनकाल से ही तिलक साफा-पगड़ी और दण्ड यानी छड़ी वगैरह समाज के प्रभावशाली लोगों का पसंदीदा प्रतीक चिह्न थे। राजा के हाथ में हमेशा दण्ड रहता था जो उसके न्याय करने और सजा देने के अधिकारी होने का प्रतीक था। आज भी जिलों व तहसीलों के प्रशासकों के लिए दंड़ाधिकारी शब्द चलता है। पौराणिक ग्रंथों में यम, शिव और विष्णु का यह भी एक नाम है। डंडे से बना डंड बैठक शब्द व्यायाम के अर्थ में प्रयुक्त होता है उसी तरह उत्साह, खुशी आदि के प्रदर्शन के लिए बांसों उछलना या बल्लियों उछलना जैसे मुहावरा भी आम है। इसी तरह मेहनत करने के संदर्भ में डंड पेलना भी मुहावरा है।
प्रणाम अथवा अभिवादन करने का एक तरीका है दण्डवत नमस्कार। यह भूमि के समानान्तर सरल रेखा में लेट कर किया जाता है। दण्डवत अथात डंडे के समान। जिस तरह डंडा भूमि पर पड़ा रहता है , आराध्य के सामने अपने शरीर की वैसी ही मुद्रा बनाकर नमन करने को ही दण्डवत कहा जाता है। इस मुद्रा का एक अन्य नाम साष्टांग नमस्कार भी है। गौरतलब है कि दण्डवत मुद्रा में शरीर के आठों अंग आराध्य अथवा गुरू के सम्मान में भूमि को स्पर्श करते हैं ये हैं-छाती, मस्तक, नेत्र,मन , वचन,पैर, जंघा और हाथ। इसी मुद्रा को साष्टांग प्रणिपात कहा जाता है जिसके तहत मन और वचन के tonkin_bamboo_polesअलावा सभी अंगों का स्पर्श भूमि से होता है। मन से आराध्य का स्मरण किया जाता है और मुंह नमस्कार या प्रणाम शब्द का उच्चार किया जाता है। दंड धारण करने वाले सन्यासी को दंडीस्वामी कहा जाता है। दंड धारण करने की परंपरा प्रायः दशनामी सन्यासियों में प्रचलित है। शंकराचार्य परंपरा के ध्वजवाहक मठाधीश भी दंडधारण करते है। प्राचीन धर्मशास्त्र मे दंड का महत्व इतना अधिक था कि मनुस्मृति में तो दंड को देवता के रूप में बताया गया है। एक श्लोक है- दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।। ( दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है।) राजनीतिशास्त्र का ही दूसरा नाम  दंडनीति भी है। पुराणों में उल्लेख है कि अराजकतापूर्ण काल मे ही देवताओं के आग्रह पर ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों वाला दंडनीति शास्त्र रच डाला था।
दंड और डंडे की तरह ही लाठी शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है लाठी का मतलब है बांस की लंबी लकड़ी जो चलने के लिए सहारे का काम करे या हथियार के रूप में काम आए। मुहावरा भी है कि बुढ़ापे की लाठी होना। गौर करें की दण्ड का निर्माण प्राचीनकाल से आज तक ज्यादातर बांस से ही किया जाता रहा है। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे मुहावरा भी खूब मशहूर है। यही लाठी शब्द बना है संस्कृत के यष्टिः या यष्टी से जिसका मतलब होता है झंडे का डंडा, सोटा, गदा, शाखा या टहनी आदि। इससे बने यष्टिका का प्राकृत रूप हुआ लट्ठिआ जो लाठी में बदल गया । लाठी के यष्टि रूप से बना एक शब्द हम खूब परिचित हैं वह है देहयष्टि वर्ण के में तब्दील होने का यह विरल उदाहरण है। कदकाठी के अर्थ में देहयष्टि शब्द प्रयोग में भी लाया जाता है। संस्कृत मूल से जन्मे लाठी शब्द से अंग्रेजी राज में एक नया शब्द जन्मा लाठीचार्ज। यह आज भी पुलिसिया जुल्म के तौर पर ही जब-तब सामने आता है। यष्टि बना है यज् धातु से जिसमें पूजा, आहुति, सुभाषित, सम्मान या आदर प्रकट करना जैसे भाव हैं। यष्ट यानी पूजा या हवन करानेवाला ब्राह्मण। गौरतलब है कि यज्ञ में पवित्र वनस्पतियों की सूखी टहनियां अग्नि को समर्पित की जाती हैं। संभव है हवि सामग्री के तौर पर यज् से यष्टि का निर्माण हुआ हो।
देसी बोलियों और फिल्मी गीतों संवादों में बम्बू का प्रयोग साबित करता हैं कि बांस का यह अंग्रेजी विकल्प भी हिन्दी का घरबारी बन चुका है। दरअसल कुछ लोग बैम्बू का रिश्ता वंश से ही जोड़ते हैं। यह शब्द अंग्रेजी में आया डच भाषा के bamboe से जहां इसकी आमद पुर्तगाली जबान के mambu से हुई। पुर्तगाली ज़बान में यह मलय या दक्षिण भारत की किसी बोली से शामिल हुआ होगा। वंश की मूल धातु पर गौर करें तो यह पहेली कुछ सुलझती नज़र आती है। वंश का धातु मूल है वम् जिसके मायने हैं बाहर निकालना, वमन करना, बाहर भेजना , उडेलना, उत्सर्जन करना आदि। इससे ही बना है वंश जिसके कुलवृद्धि के भावार्थ में उक्त तमाम अर्थों की व्याख्या सहज ही खोजी जा सकती है। इस वम् की मलय भाषा के मैम्बू से समानता काबिलेगौर है। इसी तरह सोंटा शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है जिसका अर्थ है मोटा डंडा। लाठी, डंडी, डंडा आदि पतले भी हो सकते हैं पर सोंटा वही दण्ड हो सकता है जिसकी मोटाई असामान्य हो। यह बना है शुण्ड से जिसका अर्थ है हाथी की सूण्ड। हिन्दी का सूंड शब्द इसी शुण्ड का रूपांतर है। शुण्ड> शुण्डअ> सुंडओ> सोंटा के क्रम में सोंटा का विकास हुआ होगा। सूंड के आकार की कल्पना करें तो लाठी के सोंटा रूप के लिए इससे बेहतर शब्द और क्या होता।

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