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Friday, July 30, 2010
नक्सल आंदोलन और रामकथा [बकलमखुद-]
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अजित वडनेरकर
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Thursday, July 29, 2010
रब्बी का मुरब्बा
... मुरब्बा जैसा खाद्य पदार्थ भारत को अरबों की देन है। इसी तरह अचार भी फारसी शब्द है। ये दोनों ही लम्बे समय तक चलनेवाले खास तरीकों से बने खाद्य पदार्थ हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा का जो भाव रब्ब में है, वही उससे बने रब या रब्बी में है। वही भूमि के चौरस टुकड़े और खाने के पदार्थ मुरब्बा में है ...
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अजित वडनेरकर
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Monday, July 26, 2010
लिंगम् आलिंगन और लंडूरा
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Saturday, July 24, 2010
सशस्त्र क्रान्तिः असाध्य आशावाद [बकलमखुद-142]
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अजित वडनेरकर
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Friday, July 23, 2010
गाता जाए बंजारा…
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अजित वडनेरकर
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Thursday, July 22, 2010
डॉटर यानी दूध दुहनेवाली बिटिया…
... भारोपीय संदर्भों में मातृ-मादर-मदर, पितृ-पिदर-पिसर-फादर, भ्रातृ-बिरादर-ब्रदर की कड़ी में जैसे ही डॉटर शब्द के तुलनीय फारसी या संस्कृत की चर्चा होती थी तब उक्त पारिवारिक शब्दों के समान किसी अन्य शब्द की कल्पना इसलिए सामान्य व्यक्ति नहीं कर पाता क्योंकि दुहिता शब्द बोलचाल की हिन्दी में नहीं है और संस्कृत में पुत्री शब्द अधिक प्रचलित है। जैसे ही दुहिता-दुख्तर सामने आते हैं, डॉटर शब्द पहेली नहीं रह जाता ...
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Sunday, July 18, 2010
गरीब की दुहाई, सामंत का आह्वान और हाय-हलो!!!
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अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
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अजित वडनेरकर
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Saturday, July 17, 2010
सशस्त्र क्रांतिकारिता के सच [बकलमखुद-141]
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Wednesday, July 14, 2010
कुँए का बच्चा यानी चहबच्चा!!
र्वी हिन्दी में चहबच्चा शब्द चलता है। फारसी में चह/चाह का अर्थ है कूप या गढ़ा। संस्कृत में जिस तरह बालसूर्य या बालचंद्र जैसे पद विकसित हुए, लगता है फारसी में भी चहबच्चा यानी बालकूप विकसित हुआ होगा। जलकूप की गहराई से पानी उलीचने के बाद उसके सहज उपयोग के लिए अक्सर कुए की जगत से सटी एक नांद नुमा रचना बनाकर वहां पानी एकत्र किया जाता रहा है। इसी नांद से नहाने, धोने और सिंचाई आदि के लिए जल का निकास होता है। यूं रास्तों को इर्दगिर्द, मैदानों में बारिश के पानी से भरे गढ़ों के कई नाम हैं। चहबच्चा भी इनमें से एक है। अन्य क्षेत्रों में इन्हें डाब, डाबर, पोखरा, गड़हियां, डबरा आदि कहा जाता है।
चहबच्चा का सबसे पहला पता मिलता है चौआ शब्द में। हिन्दी में चोआ या चौआ का अर्थ भी पानी से भरा गढ़ा, गढ़हियां अथवा डाब होता है। ध्यान रहे चोआ शब्द गड्ढे के अर्थ में पंजाबी ज़बान में भी बोला जाता है। पंजाब की सीमा किसी ज़माने में अफ़गानिस्तान तक थी। ध्यान रहे, चोआ में चाहे खड्ड या गढ़े का भाव है, मगर यह मूलतः जलस्रोत वाला खड्ड है अर्थात ऐसा गढ़ा जिसमें से पानी का रिसाव होता है। जल के रिसाव को बोलचाल की भाषा में चूना कहते हैं। चूना, चुआना, चोआना जैसी क्रियाओं में पानी टपकने का भाव है, रिसाव का भाव है। भूमि की खुदाई करने पर जिस गहराई पर जल का रिसाव होने लगे, बस वही चोआ है। चोआ यानी जहां पर पानी चू रहा है।
कूप या गढ़े के अर्थ में फारसी के चह शब्द के जन्मसूत्र इसी चूने की क्रिया में छिपे हैं। यह चूना, चुआना जैसी क्रियाएं संस्कृत की च्यु धातु से निकली हैं जिसमें रिसना, गिरना, टपकना जैसे भाव हैं। च्युत् शब्द इसी कड़ी मे आता है। पदच्युत जैसा समास भी इसी शब्द से बना है जिसका प्रयोग परिनिष्ठित हिन्दी में आम है। पदच्युत में अपने स्थान से हटने का भाव है। इसका प्रचलित अर्थ है बर्खास्तगी। किसी को उसके पद से हटा देना। याद रहे च्यु क्रिया में रिसाव का जो भाव है उसमें अपना स्थान छोड़ने की क्रिया स्पष्ट है। रिसन में अदृष्य होना भी है। हिम का रिसाव दरअसल हिम के अदृष्य होने की क्रिया है। च्युत में दूर करने का भाव भी है क्योंकि रिसाव में गति अंतर्निहित है। गति और दूरी की सापेक्षता प्रमाणित है।
स्पष्ट है कि भूमिगत जलस्त्रोत के लिए चोआ या चौआ शब्द के मूल में संस्कृत का च्यवन शब्द है। च्यवन से च्यावन और फिर चुआना, चौआना जैसे शब्द बने। इसमें से मध्यस्वर आ का लोप होने से बना चूना जिसका प्रयोग तरल पदार्थ के टपकने के अर्थ में होता है। जलस्रोत के अर्थ में तलैया, खाला, नाला, झिरन, सोता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं जिनमें बहाव और रिसाव स्पष्ट है। बरास्ता अवेस्ता, इसी च्यु की आमद फारसी में चह् के रूप में होती है। अर्थ पंजाबी, भोजपुरी वाले चोआ का ही रहा अर्थात सामान्य गढ़ा, कूप या डबरा। मगर भाव स्पष्ट है। चह उसी गढ़े को कहेंगे जिससे जल का रिसाव होता है अर्थ वह कूप जो पानी चुआता है।
चह से चहबच्चा बनना ही शब्दों की अर्थवत्ता बढ़ने का उदाहरण है। अब चाहे इस चहबच्चा की व्याख्या छोटे कूप, बालकूप अथवा कुईंया के रूप में करें या फिर कुँए की जगत के पास बनी ऐसी रचना से करें जिसमें बच्चे नहाते हों। बच्चों को नहलाने के लिए आमतौर पर छोटी नांद का प्रयोग होता है। कई घरो में स्थाई तौर पर ये बनी रहती हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि बरास्ता संस्कृत, बच्चा शब्द का विकास वत्स शब्द से हुआ है। वत्सरः; बच्छरअ; बच्छड़ा जैसा क्रम रहा है। यहां वत्स में चौपाए के शिशु का भाव भी है। प्राचीनकाल से ही कुँओ के समीप पशुओं के पीने के लिए पानी की नांद बनाई जाती रही है। संभव है इसे चहबच्चा कहा जाता रहा हो। अर्थात जहां बच्चा यानी पशुधन पानी पिए। होली के मौके पर ऐसे ही छोटे पोखरो, डबरों में बच्चों को कूदते फांदते, किलोल करते देखा जा सकता है। आखिर चहबच्चा और क्या है?
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अजित वडनेरकर
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Monday, July 12, 2010
ज़ख़्म भी बेशर्म होता है…
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अजित वडनेरकर
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Friday, July 9, 2010
दण्डीस्वामी, देहयष्टि और लाठीचार्ज
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अजित वडनेरकर
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