Tuesday, August 31, 2010

सिक्का-कहीं ढला, कहीं चला

जेम्स द्वितीय के ज़माने की ब्रिटिश गिन्नी




देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है


फुटकर मुद्रा या छुट्टे पैसों के लिए सिक्के से बेहतर हिन्दी उर्दू में कोई शब्द नहीं है। दोनों ही भाषाओं में मुहावरे के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है जिसका अर्थ हुआ धाक या प्रभाव पड़ना। मूल रूप से ये लफ्ज अरबी का है मगर हिन्दी में सिक्के के अर्थ में अग्रेजी से आया। हिन्दी में फकत ढाई अक्षर के इस शब्द के आगे पीछे कभी कई सारे अक्षर भी रहे हैं।


अरबी मे मुद्रा की ढलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के छापे या डाई को सिक्कः (सिक्काह) कहा जाता है जिसका मतलब होता है रूपया-पैसा, मुद्रा,मुहर आदि । इसके दीगर मायनों में छाप, रोब, तरीका-तर्ज़ आदि भाव भी शामिल हैं इसीलिए हिन्दी-उर्दू में सिक्का जमाना या सिक्का चलाना जैसे मुहावरे इन्ही अर्थों में इस्तेमाल होते रहे हैं।  पुराने ज़माने में भी असली और नकली मुद्रा का चलन था। मुग़लकाल में सिक्कए-कासिद यानी खोटा सिक्का और सिक्कए-राइज़ यानी असली सिक्का जैसे शब्द चलन में थे। अरबों ने जब भूमध्य सागरीय इलाके में अपना रौब जमाया और स्पेन को जीत लिया तो यह शब्द स्पेनिश भाषा में भी जेक्का के रूप में चला आया। जेक्का का ही एक अन्य रूप सेक्का भी यहां प्रचलित रहा है। मगर वहां इसका अर्थ हो गया टकसाल, जहां मुद्रा की ढलाई होती है। अब इस जेक्का यानी टकसाल में जब मुद्रा की ढलाई हुई तो उसे बजाय कोई और नाम मिलने के शोहरत मिली जेचिनो के नाम से । जेचिनो तेरहवीं सदी के आसपास सिक्विन शब्द के रूप में ब्रिटेन में स्वर्ण मुद्रा बनकर प्रकट हुआ।

पंद्रहवीं सदी के आसपास अंग्रेजों के ही साथ ये चिकिन या चिक बनकर एक और नए रूप में हिन्दुस्तान आ गया जिसकी हैसियत तब चार रूपए के बराबर थी।

किस्से कहानियों में अशरफी, मोहर जितना जिक्र ही गिन्नी का भी है। गिन्नी ब्रिटिश स्वर्णमुद्रा थी और इसका उच्चारण था गिनी। हिन्दुस्तान के सर्राफा व्यापार की शब्दावली में सोने के भावों के संदर्भ में गिन्नी का उल्लेख आए दिन होता है

यही चिक तब सिक्का कहलाया जब इसे मुगलों ने चांदी में ढालना शुरू किया। आज ब्रिटेन में सिक्विन नाम की स्वर्णमुद्रा तो नहीं चलती मगर सिक्विन शब्द बदले हुए अर्थ में डटा हुआ है। महिलाओं के वस्त्रों में टांके जाने वाले सलमे-सितारों जैसी चमकीली सजावटी सामग्री सिक्विन के दायरे में आती है। जाहिर सी बात है कि सजाने से किसी भी चीज़ की कीमत बढ़ जाती है। यह भाव स्वर्णमुद्रा की कीमत और उसकी चमक दोनों से जुड़ रहा है। देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।

क अन्य स्वर्णमुद्रा थी गिन्नी जिसका चलन मुग़लकाल और अंग्रेजीराज में था। दरअसल गिन्नी का सही उच्चारण है गिनी जो कि उर्दू-हिन्दी में बतौर गिन्नी कहीं ज्यादा प्रचलित है। मध्यकाल में अर्थात करीब 1560 के आसपास ब्रिटेन में गिनी  स्वर्णमुद्रा शुरू हुई। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित गिनी नाम के एक प्रदेश से व्यापार के उद्धेश्य से ब्रिटिश सरकार ने इसे शुरू किया था। गौरतलब है कि सत्रहवीं सदी में पश्चिमी अफ्रीका के इस क्षेत्र पर यूरोपीय देशों की निगाह पड़ी। अर्से तक यह प्रदेश पुर्तगाल और फ्रांस का उपनिवेश बना रहा। गिनी को अब एक स्वतंत्र देश का दर्जा प्राप्त है। गिनी का इस क्षेत्र की स्थानीय बोली में अर्थ होता है अश्वेत व्यक्ति। आस्ट्रेलिया के उत्तर में प्रशांत महासागर में एक द्वीप समूह है न्यूगिनी जिसके साथ लगा गिनी नाम भी अफ्रीकी गिनी की ही देने है। इस द्वीप का पुराना नाम था पापुआ। मलय भाषा परिवार के इस शब्द का अर्थ होता है घुंघराले बाल।  स्पेनियों ने इस द्वीप को ये नाम यहां के मूल निवासियों को इसी विशेषता के चलते दिया। दिलचस्प है कि अफ्रीकी गिनी का नाम भी उसके मूलनिवासियों के रंग के आधार पर पड़ा था। इस द्वीप का पश्चिमी हिस्सा इंडोनेशिया का हिस्सा है जबकि पूर्वी हिस्सा पापुआ न्यूगिनी कहलाता है और स्वतंत्र देश है।   
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Sunday, August 29, 2010

एक अहिंसक जीत…[बकलमखुद-]

…आरा के दिनों ने मुझे पीछे हटना सिखा दिया। राजनीतिक कौशल के रूप में इसका जो महत्व है सो है, लेकिन सर्वाइवल स्किल के रूप में भी इससे अच्छी और इससे बड़ी चीज कोई और नहीं हो सकती। पीछे हटने का मतलब है दोस्ती के लिए गुंजाइश बनाना, यानी बिना लड़े ही लड़ाई जीत लेना.... और लड़ाई अगर इसके बाद भी चलती रहे तो कहीं बेहतर समझ, कहीं ज्यादा ताकत के साथ हमला करने का मौका बना लेना …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 143 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का तीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
बरपुल के बारे में मेरी तरफ से कही गई कोई बात वहां चले एक अर्ध धार्मिक स्वरूप के आंदोलन का जिक्र किए बगैर पूरी नहीं होगी। बात 1993 के फरवरी-मार्च की है। एक दिन वहां के कुछ साथियों ने बताया कि शहर के दो माफिया मिलकर अबरपुल मस्जिद के लगभग बगल में दारू का ठेका खोलने जा रहे हैं। इसे लेकर इलाके में लोग बहुत नाराज हैं लेकिन माहौल को देखते हुए किसी की कुछ बोलने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही है। ध्यान रहे, इस समय तक 6 दिसंबर 1992 का अयोध्या कांड ही नहीं, जनवरी 1993 का मुंबई ब्लास्ट कांड भी संपन्न हो चुका था और देश में हर जगह बारूद की गंध भरी हुई थी। धीरे-धीरे यह बात भी सामने आई कि ठेका बनाने जा रहे दोनों माफिया में से एक राधाचरन साह हैं, जो हमारी पार्टी के एक बड़े नेता और आरा शहर विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव में उम्मीदवार रहे सुदामा प्रसाद के सगे बहनोई हैं। लोगों में शक था कि पता नहीं सीपीआई-एमएल राधाचरन साह के खिलाफ जाना पसंद करेगी या नहीं।
सी शाम मैं अबरपुल पहुंचा और नेताजी की चाय की दुकान पर बैठा ही था कि तीन-चार गाड़ियां वहां आकर रुकीं और दो-तीन सफेदपोश रिवाल्वरधारियों के अलावा आठ-दस मुस्टंडे राइफलधारी भी वहां नमूदार हुए। वे पुल के पास एक खाली जगह की ओर इशारा कर रहे थे, यानी भट्ठी यहीं लगने वाली थी। यह जगह डॉक्टर यासीन के क्लिनिक के ठीक सामने पड़ती थी और सबसे ज्यादा दहशत भी उन्हीं के यहां नजर आ रही थी। मैं बता चुका हूं कि डॉक्टर यासीन पहले हमारी पार्टी में ही थे और विधानसभा टिकट की उम्मीद रखते थे। लेकिन टिकट सुदामा प्रसाद को मिल जाने से नाराज होकर उन्होंने न सिर्फ पार्टी छोड़ दी थी बल्कि शहर के मुस्लिम मध्यवर्ग में पार्टी की जड़ें खोद कर रख दी थीं। सामान्य स्थिति में डॉक्टर यासीन से फटेहाल निजामुद्दीन नेताजी की दुकान पर आने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा दिखाते हुए, जैसे यूं ही टहलते हुए उधर निकल आए हों, वे आए और दुकान पर बैठ गए। मैंने नमस्कार किया, हाल-चाल पूछा तो बिल्कुल लहालोट हो गए।
मुझे लगा कि रिश्ते सुधारने का सही मौका यही है। राजनीति अगर इन्सान के व्यक्तित्व को किसी मूलभूत स्तर पर प्रभावित कर सकती है तो इसका असर मुझपर इसी अकेले सद्गुण के रूप में पड़ा है। मूल स्वभाव फ्रंटफुट पर खेलने वाला, झगड़ने और हमला करने का कोई मौका न चूकने वाला होने के बावजूद आरा के दिनों ने मुझे पीछे हटना सिखा दिया। राजनीतिक कौशल के रूप में इसका जो महत्व है सो है, लेकिन सर्वाइवल स्किल के रूप में भी इससे अच्छी और इससे बड़ी चीज कोई और नहीं हो सकती। पीछे हटने का मतलब है दोस्ती के लिए गुंजाइश बनाना, यानी बिना लड़े ही लड़ाई जीत लेना.... और लड़ाई अगर इसके बाद भी चलती रहे तो कहीं बेहतर समझ, कहीं ज्यादा ताकत के साथ हमला करने का मौका बना लेना। बहरहाल, उस दिन न सिर्फ मैं डॉ. यासीन के यहां जाकर बैठा, बल्कि पार्टी के सारे कार्यकर्ताओं को वहीं बुलाकर छोटी सी आम सभा की शक्ल में एक मीटिंग भी कर डाली। राधाचरन साह और उनके Abstract-Art-Leaf2आदमी इलाके से जा चुके थे लेकिन उनके कुछ कारकुन अभी इलाके में टहलते नजर आ रहे थे। उनके लिए यह पहला संदेश था।
गले दिन इलाके के लोगों को लेकर डीएम से मिलने का कार्यक्रम रखा गया। डीएम शशिशेखर ने कहा, आप तो मस्जिद के पास ठेका खुलने से ऐसे भड़क रहे हैं जैसे मुसलमान शराब ही नहीं पीते हों। जो लोग आपके साथ यहां आए हैं, आप कहें तो उन्हीं में से कुछ के बारे में पता करके घंटे भर में बता दूं कि उनका दिन भर का कोटा कितने का है। मैंने कहा, उनका वे जानें, मैं तो कानून की बात जानता हूं कि स्कूल और धार्मिक स्थलों से पचास मीटर से कम दूरी पर किसी शराब की दुकान के लिए लाइसेंस नहीं दिया जाना चाहिए, हालांकि आरा में कोई और कानून चलता हो तो उसके बारे में मैं नहीं जानता। डीएम ने कहा, ठेके की जगह बिल्कुल बगल में तो नहीं ही है, आपको एतराज हो तो नाप कर दूरी इक्यावन मीटर कर दी जाएगी। शशिशेखर जेएनयू के पढ़े थे, बात करना जानते थे, लेकिन उनके काम हमेशा शातिर डीएम वाले ही होते थे। हमें खबर मिली थी कि इस ठेके के लिए उन्हें तीन लाख रुपये की घूस दी जा चुकी है, हालांकि इसके कन्फर्मेशन करने का कोई जरिया नहीं था।
डीएम का नजरिया पता चल गया और बात टूट गई। इलाके में वापस पहुंचकर अगले दिन जिला प्रशासन का पुतला जलाने का फैसला लिया गया लेकिन उसके अगले दिन अबरपुल पहुंचने पर पता चला कि दिन भर पुलिस वाले वहां गश्त लगाते रहे लिहाजा किसी की हिम्मत पुतला जलाने की नहीं पड़ी। मुझे बहुत गुस्सा आया लेकिन मन ही मन इस पर अड़ा रहा कि पहल यहीं के लोगों को करनी होगी, खुद आगे बढ़कर कुछ नहीं करूंगा। मुझे उस रात शहर के पड़ोस के एक गांव सिंगही में मीटिंग करनी थी, जहां तांगा चलाने वाले अपने एक समर्थक के साथ गांव के कुछ दबंगों ने मारपीट कर दी थी। पहलकदमी का जिम्मा अनवर जी को दिया जा सकता था, लेकिन वह भी उस रात और अगले दिन मेरे साथ सिंगही में ही रहने वाले थे। मैंने कहा, पुलिस नहीं, फौज आ जाए तो भी कल शाम यहां पुतला जलेगा और इलाके में कोई भी घर से बाहर नहीं निकला तो भी सुफियान, मुख्तार और अमुक-अमुक पांच लोग पुतला बनाकर इसी चौराहे पर फूंक देंगे। अगली की अगली सुबह जब हम लोग सिंगही से अबरपुल लौटे तो पता चला कि पुतला निकलने के बाद पहले बहुत सारे  बच्चे फिर सैकड़ों की संख्या में सयाने लोग भी घरों से निकले और पुतला जलाने के अलावा एक पुलिस की गाड़ी को भी कूंच-कांच दिया।
स, यहीं मामले को ठंडा कर देना है, उग्र नहीं होने देना है। एक पर्चा निकाल कर विधिवत आंदोलन का कार्यक्रम घोषित किया गया। इसमें प्रभातफेरी और नुक्कड़ मीटिंगों के बाद ठेके वाली जगह पर धरने का और अंत Miaमें ठेका रद्द होने तक या फिर मरने तक अनशन का कार्यक्रम रखा गया। अगले दिन राधाचरन साह ने सुदामा जी के जरिए खबर भिजवाई कि बात करना चाहते हैं। मैंने कहा, मैं क्या बात करूंगा, साथ ही सुदामा जी से यह भी कहा कि यह मेरी नहीं, पार्टी की प्रतिष्ठा का सवाल है। सुधीर मिश्रा ने बताया कि इसी रात राधाचरन ने रमना मैदान में शहर के सारे शराब ठेकेदारों और कुछ बड़े अपराधियों की एक मीटिंग बुलाई और कुछ करने का फैसला किया। जवाब में अबरपुल में भी मीटिंग हुई। लोगों से मैंने कहा कि पार्टी सरकार से लड़ सकती है, छोटे-मोटे अपराधियों को पीट-पाट सकती है, लेकिन आरा शहर में हथियारबंद माफिया से लड़ने के लिए गांवों से अपने दस्ते नहीं बुला सकती। लोगों में थोड़ी खुसफुस दिखाई पड़ी, फिर किसी ने कहा कि हमारी मुश्किल सिर्फ इतने ही की है, इतना ही कीजिए, बाकी की चिंता छोड़ दीजिए। बाद में पता चला कि 6 दिसंबर के बाद आत्मरक्षा के लिए यहां काफी तैयारी पहले से है और राधाचरन के लोग बगैर सरकारी समर्थन के यहां चढ़ गए तो बच कर नहीं जाएंगे।
सके अगले दिन अनवर साहब ने ठेके की जगह पर एक ब्लैकबोर्ड रख दिया और बच्चों को एबीसीडी सिखाने लगे। बाकी लोग टेंट गाड़ कर धरने पर बैठ गए। आमरण अनशन की नौबत नहीं आई। थोड़े ही देर में डीवाईएसपी की गाड़ी आई। उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि यह सब टेंट वगैरह हटवा दीजिए, ठेका कैंसल कर दिया गया है। रौब मारने के लिए कुछ सिपाही डंडे वगैरह पटक रहे थे। मैंने कहा, कैंसल हो गया, अच्छी बात है, यहां भी आगे कुछ नहीं होगा, लेकिन आप के लोग यह सब माहौल बनाएंगे तो कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा। आरा शहर के कई आंदोलनों में हमें जीत हासिल हुई थी, लेकिन यह ऐसी जीत थी, जिसके सामने किसी और को खड़ा नहीं किया जा सकता। डॉक्टर यासीन की प्रतिक्रिया थी कि मुझे टिकट नहीं मिला, कोई बात नहीं लेकिन मैं चाहूंगा कि अगली बार आप यहां से या कहीं से भी चुनाव लड़ें और जहां से भी लड़ें, मैं वहां आपका प्रचार एजेंट बनूं। मैंने कहा, डॉक्टर साहब, आंदोलन हर किसी को बदल देता है और अब आपको भी इतना तो बदल ही जाना चाहिए कि व्यक्तियों को पार्टी से ज्यादा तरजीह न दें।

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Friday, August 27, 2010

मसख़रे की मसख़री सिर माथे

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मतौर पर हंसोड़ और परिहासप्रिय व्यक्ति को समाज में पसंद किया जाता है। ये लोग चूंकि सामान्यत: हर बात में हंसी-ठट्ठे का मौका तलाश लेते हैं इसलिए ऐसे लोगों को अक्सर विदूषक या मसखरा की उपाधि भी मिल जाती है। हालांकि ये दोनों ही शब्द कलाजगत से संबंधित हैं और नाटक आदि में ठिठोलीबाजी और अनोखी वेषभूषा, बातचीत, हावभाव,मुखमुद्रा आदि से परिहास उत्पन्न कर दर्शकों के उल्लास में वृद्धि करनेवाले कलाकार को ही मसखरा या विदूषक कहा जाता है। हिन्दी में मसखरा शब्द अरबी के मस्खर: से बरास्ता फारसी उर्दू होते हुए आया। में अरबी में भी मस्खर: शब्द का निर्माण मूल अरबी लफ्ज मस्ख से हुआ जिसका मतलब है एक किस्म की खराबी जिससे अच्छी भली सूरत का बिगड़ जाना या विकृत हो जाना। यह तो हुई मूल अर्थ की बात । मगर यदि इससे बने मसखरा शब्द की शख्सियत पर जाएं तो अजीबोगरीब अंदाज में रंगों से पुते चेहरे और निराले नैन नक्शों वाले विदूषक की याद आ जाती है। हिन्दी के मसखरा शब्द का अरबी रूप है मस्खरः जिसके मायने हैं हँसोड़, हँसी-ठट्ठे वाला, भांड, विदूषक या नक्काल वगैरह। जाहिर है लोगों को हंसाने के लिए मसखरा अपनी अच्छी-भली शक्ल को बिगाड़ लेता है। मस्ख का यही मतलब मसखरा शब्द को नया अर्थ देता है।
सी नए अर्थ के साथ अरब के सौदागरों के साथ यह शब्द स्पेन और इटली में मैस्खेरा बन कर पहुंचता है जहां इसका मतलब हो जाता है मुखौटा या नकाब। अरब से ही यह यूरोप की दीगर जबानों में भी शामिल हो गया और इटालियन में मैस्ख और लैटिन में मैस्का बना । फ्रैंच में मास्करैर कहलाया जहां इसका मतलब था चेहरे को काला रंगना। अंग्रेजी में stilt_guy इसका रूप हुआ मास्क यानी मुखौटा। मध्यकाल में मसखरा शब्द ने मेकअप और कास्मैटिक की दुनिया में प्रवेश पाया और इसका रूपांतर मस्कारा mascara में हो गया जिसके तहत मेकअप करते समय महिलाएं काले रंग के आईलाईनर से अपनी भौहों और पलकों को नुकीला और गहरा बनाती हैं। आवारगी, बेचारगी, दीवानगी की तर्ज पर मस्खरः में ‘अगी’ प्रत्यय लगने से अरब,फारसी में बनता है मस्खरगी यानी मसख़रापन या ठिठोलेबाजी। मगर इसके विपरीत इसमें ‘शुदा’ प्रत्यय लगने से बन जाता है विकृत, रूपांतरित आदि।
हालांकि सेमेटिक भाषा परिवार की होने के बावजूद अरबी ज़बान में मस्ख की मौजूदगी मूलभूत नहीं जान पड़ती। संस्कृत में एक धातु है मस् जिसका मतलब है रूप बदलना, पैमाइश करना। इसके अतिरिक्त इसमें ऊपर का या ऊपरी जैसे भाव भी हैं। याद रहे मस्तक शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा या अंग है। इसी ऊपरी अंग पर ही मुखौटा भी लगाया जाता है जो मसखरे की खास पहचान है। इससे बना है मसनम् जिसका मतलब है एक प्रकार की बूटी (चेहरे पर लेपन के लिए )। हिन्दी-संस्कृत के मस्तक या मस्तकः या मस्तम् ( सिर, खोपड़ी ) शब्द के मूल में भी यही मस् धातु है। गौर करें कि मस्ख से बने मास्क को मस्तक पर ही लगाया जाता है। मस्तिष्क यानी दिमाग़ का मस्तक से क्या रिश्ता है बताने की ज़रूरत नहीं, ज़ाहिर है इसके मूल में भी यही धातु है। माथा, मत्था जैसे देशज शब्द भी इसी की उपज हैं। मस् धातु में निहित रूप बदलने के अर्थ से ही खुलता है एक और शब्द का जन्मसूत्र।
संस्कृत में सियाही के लिए मसि शब्द प्रचलित है। इसका हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है। कबीर का मसि-कागद छुए बिना विशाल साहित्य रच देना सबको चमत्कृत करता है। यह मसि भी मस् की देन है। गौर करें मसिलेखन किसी भी सतह पर ही होता है। मसि अपने आप में एक रंग है और प्रकारांतर से लेपन ही। चेहरे को विविध रंगों से रंगना बहुरूपियों का शगल होता है। चेहरा बिगाड़ने के लिए सियाही भी पोती जाती है। जलपोत का सबसे ऊंचे सिरे को मस्तूल कहते हैं जिस पर ध्वज लहराता है और जो हवा बहने की दिशा भी बताता है। मस्तूल mastool अरबी का शब्द है। अंग्रेजी में इसे मास्ट कहते हैं। अखबारों के ऊपरी सिरे पर जिस पट्टी में अखबार का नाम लिखा होता है, उसे भी मास्ट हैड कहते हैं। सड़कों के किनारे बिजली के खम्भे अब हाईमास्ट high mastमें बदल गए हैं। मास्ट शब्द भी भारोपीय मूल का है और इसकी रिश्तेदारी मस् धातु में निहित ऊपरी शब्द से है। भाषा विज्ञानियों नें प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में एक धातु mazdos खोजी है जिसका अर्थ है ऊंचा डण्डा। एटिमऑनलाईन के मुताबिक पोस्ट जर्मनिक में इससे mastaz शब्द बनता है जिसका अंग्रेजी रूपांतर mast हुआ।  -संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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Tuesday, August 24, 2010

वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल

Radhika

प्रा यः सभी भाषाओं में शब्दसम्पदा के बढ़ने के कई कारण होते हैं जिनमें एक प्रमुख कारण अर्थविस्तार की प्रवृत्ति भी है। यह अर्थविस्तार इतना व्यापक होता है कि उस शब्द के मूलार्थ से नए अर्थ का दूर-पास का भी कोई रिश्ता नहीं जुड़ता है। प्रवीण भी ऐसा ही एक शब्द है। किसी कार्य को बहुत ही चतुराई और उत्तम प्रणाली से करने के लिए हिन्दी में आम प्रचलित शब्द है प्रवीण। किसी कार्य में दक्ष या निष्णात या सिद्धहस्त होने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। किसी वक्त प्रवीण का अर्थ होता था वह व्यक्ति जो वीणा बजाने में कुशल हो। वीणा प्राचीनतम् भारतीय वाद्य है। भारतीय देवी-देवताओं के हाथों में वीणा ही नजर आती है। वीणा बजाने में सिद्धहस्त कलाकार को प्रवीण कहा जाने लगा। स्पष्ट है कि वीणावादन का उस काल में कितना महत्वरहा होगा। कालान्तर में हर तरह के कार्य को कुशलता से करनेवाले के लिए प्रवीण शब्द प्रचलित हो गया और इसका मूलार्थ लोप हो गया। विडम्बना यह भी रही कि उत्तर भारतीय संगीत से भी वीणा की परम्परा धीरे धीरे कम होती चली गई, अलबत्ता दक्षिण भारत में उत्तर की बनिस्बत वीणा का चलन कहीं ज्यादा है।
पटे कोश में के अनुसार वीणा (वेति वृद्धिमात्रमपगच्छति- वी+न, नि. णत्वम्) का अर्थ सारंगी जैसा वाद्य, बीना, बताया गया है। इसके अलावा इसका एक अन्य अर्थ विद्युत भी है। संस्कृत की वी धातु में जाना, हिलना-डुलना, व्याप्त होना, पहुंचना जैसे भाव हैं। बिजली की तेज गति, चारों और व्याप्ति से भी वी में निहित अर्थ स्पष्ट है। विद्युत की व्युत्पत्ति भी वी+द्युति से बताई जाती है। वी अर्थात व्याप्ति और द्युति यानी चमक, कांति, प्रकाश आदि। प्रकाश की तीव्र कौंध ही विद्युत है। वी से बने हैं वेति, वेत या वीत जैसे शब्द जिनसे बने कुछ शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे चरैवेति यानी बढ़ते चलो। वीत भी गतिवाचक है जिसमें जाने का भाव है। चले जाना। इससे बना एक शब्द है वीतराग अर्थात सौम्य, शान्त, सादा, निरावेश। राग का अर्थ कामना, इच्छा, रंग, भावना होता है। वीतराग वह है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो। एक पौराणिक ऋषि का नाम भी वीतराग था। वीतरागी वह है जो संसार से निर्लिप्त रहता है। जाहिर है एक तन्त्रवाद्य होने के नाते वीणा की वी से व्युत्पत्ति में तीव्रता के साथ इसकी मधुर स्वर लहरियों की सब दूर व्याप्ति का भाव भी है। इन्हीं शब्दों के पूर्ववैदिक रूप वेण, वीण या वेणि रहे होंगे।
यूं वीणा में अंतर्निहित ध्वनि पर गौर करें तो वीणा का रिश्ता वाणी से भी हो सकता है। आपटे कोश के अनुसार वाणी शब्द बना है संस्कृत की वण् धातु से जिसका अर्थ है शब्द करना। वण् से बने वाणी में वचन, भाषण, वाक् शक्ति, बोलना, magadi2 ध्वनि आदि होता है। संस्कृत में वेण् या वेन् शब्द भी मिलते हैं जिनका अर्थ है जाना, हिलना-डुलना या बाजा बजाना। इसी क्रम में वेण् से बने वेणः का अर्थ होता है गायक जाति का एक पुरुष। बांसुरी को वेणु भी कहते हैं जो इसी मूल का है। वेणु मूलतः बांस को ही कहते हैं। बांसुरी शब्द को एक वाद्य की अर्थवत्ता इसीलिए मिली क्योंकि यह बांस से उत्पन्न है। वण् धातु से व्युत्पन्न बांस के अर्थ वाले वेणु शब्द की तार्किक विवेचना क्या हो सकती है? यही कि प्राचीनकाल से ही बांसों के जंगल से गुजरती हवा की तेज़ ध्वनि से मनुष्य परिचित था। यही बात उसने बांस के पोले तने से हवा गुज़ारने पर भी महसूस की। तात्पर्य यही है कि वेत, वेण जैसे शब्दों का मूल रिश्ता गति और प्रकारान्तर से ध्वनि से था।
खैरियत, मंगल और प्रसन्नता के अर्थ में भी कुशल शब्द का प्रयोग होता है। कुशल-क्षेम, कुशल-मंगल से यह साफ जाहिर है। यह बना है संस्कृत के कुशः से। हिन्दी में यह भी काफी आम है और इससे बने शब्द खूब प्रचलित हैं। संस्कृत के कुशः का मतलब होता है एक प्रकार की वनस्पति, तृण, पत्ती, घास जो पवित्र-मांगलिक कर्मों की आवश्यक सामग्री मानी जाती है। प्रायः सभी हिन्दू मांगलिक संस्कारों में इस दूब या कुशा का प्रयोग पुरोहितों द्वारा किया ही जाता है। प्राचीनकाल में गुरुकुलवासी बटुकों से मुनिजन कुश घास को एकत्र कराते थे जो विभिन्न कामों प्रयोग की जाती थी। छप्पर यज्ञ कर्म में इसका विशेष महत्व था। जो शिष्य सही तरीके से कुश को बीनता था वह कुशल कहलाता था। कालान्तर में किसी कार्य को दक्षतार्वक करने वाले के लिए यही कुशल शब्द रूढ हो गया।  इसी क्रम में आता है कुशाग्र।  हिन्दी के इस शब्द का मतलब होता है अत्यधिक बुद्धिमान, अक्लमंद। चतुर आदि। गौर करें कुशः के घास या दूब वाले अर्थ पर। यह घास अत्यंत पतली होती है जो अपने किनारों पर बेहद पैनी हो जाती है।  पचूंकि इसका आगे का हिस्सा नोकीला होता है इसलिए इस हिस्से को कुशाग्र कहा गया अर्थात कुश का अगला हिस्सा ( जो नोकीला है )। जाहिर सी बात है कि कालांतर में बुद्धिमान व्यक्ति की तीक्ष्णता आंकने के लिए कुशाग्र बुद्धि शब्द चल पड़ा। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जो लिखा वो एक प्रसिद्ध उक्ति बन गई- पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे अचरहिं ते नर न घनेरे।। 

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Friday, August 20, 2010

कामरेड, रमजान और रोजा[बकलमखुद-146]

…मैं नास्तिक हूं। मानता हूं कि यह दुनिया किसी और के नहीं, अपने ही चलाए चलती है। लेकिन हर आस्था, हर धर्म का सम्मान करता हूं और अगर कोई आपके धर्म के नाम पर आपको मारने आएगा तो आपसे पहले उसको मुझे मारना पड़ेगा। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 142 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का उनतीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
मजान शुरू हो चुका है। अब से अठारह साल पहले वाले रमजान के महीने में एक दिन मैं हाफिज भाई के साथ आरा की एक खानकाह में बैठकर कुरान शरीफ पढ़ने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए मैंने एक दिन का रोजा भी रखा था। रात में अबरपुल मोहल्ले में ही मास्टर साहब के यहां सोया था। सुबह फज्र की अजान सुनकर उठा और सहरी के टाइम में बाकी दोस्तों के साथ एक-एक बन खाकर चाय पी। इलाके में रमजान भर का रोजा रखने वाले लोग कम ही थे। मेहनत-मजूरी करने वालों का मोहल्ला था। उपवास रखकर मजूरी तो नहीं की जा सकती थी। अलबत्ता चढ़ता-उतरता रोजा लगभग सारे ही लोग रख लेते थे। हाफिज भाई को मेरी आस्था को लेकर कोई गलतफहमी नहीं थी। दो साल पहले अबरपुल की मस्जिद में हुई अपनी पहली ही मीटिंग में मैंने साफ कह दिया था कि मैं नास्तिक हूं। मानता हूं कि यह दुनिया किसी और के नहीं, अपने ही चलाए चलती है। लेकिन हर आस्था, हर धर्म का सम्मान करता हूं और अगर कोई आपके धर्म के नाम पर आपको मारने आएगा तो आपसे पहले उसको मुझे मारना पड़ेगा। इसमें आखिरी वाली बात मुझसे पहले हजार और लोगों ने भी कही होगी और मेरे बाद भी दसियों हजार लोग कहेंगे, लेकिन व्यवहार में इसे साबित करने वाले उनमें कुछ गिने-चुने ही होंगे।
मेरे एक नजदीकी मुस्लिम साथी एक दिन रौ में मेरे सामने ही कह गए थे (और कहकर अचकचा गए थे) कि अगर कोई कहता है अल्लाह नहीं है, या अल्लाह के अलावा कोई और चीज इस दुनिया को चला रही है, तो हुक्म है कि उसकी जुबान काट ली जाए। मैंने यह निषिद्ध बात मस्जिद में ऐन नमाज की जगह पर खड़े होकर सौ लोगों के बीच में कही थी, फिर भी मुझे यकीन था कि यहां मेरी जुबान काटने कोई नहीं आएगा। खानकाह में कुरान पढ़ने की कोशिश काफी अच्छी रही। किताब के हिंदी अनुवाद के कुल दो अध्याय मैं पहले दिन पढ़ पाया। हाफिज भाई ने इस दौरान आयतों की मूल ध्वनियों से मेरा परिचय कराया और पूछने पर एक-दो जगह व्याख्या भी की। समस्या एक ही थी कि शरीर की शुद्धता को लेकर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। चार घंटे के पाठ में दो बार मुझे पेशाब जाना पड़ा। हाफिज भाई का सख्त निर्देश था कि पेशाब बैठकर करें, उसका एक भी छींटा कपड़ों पर न पड़ने पाए। टोंटी वाला लोटा हर बार साथ लेकर जाना था और पेशाब के जो भी अवशेष शरीर में रह गए हों, उन्हें अच्छी तरह साफ करके ही कपड़ा ऊपर चढ़ाना था। ग्रंथ पढ़ने में यह चीज बहुत बड़ी बाधा थी और इतनी डॉमिनेंस स्वीकार करना मेरे स्वभाव में भी नहीं था, लिहाजा कुरान का पारायण पहले दिन से आगे नहीं बढ़ पाया।
बरपुल, मिल्की मोहल्ला, कसाबटोला, रौजा और बेगमपुर का एक हिस्सा मिलाकर आरा शहर का मुख्य मुस्लिम इलाका बनता था। शहर के एक तरफ घेरा सा बना रही गांगी नदी के पार सिंगही और उसके आसपास के गांव पुराने  ramadana मुस्लिम जमींदारों के थे, जिनकी गिरोहबाज किस्म की दबंगई का असर कभी-कभी शहर में भी दिखाई पड़ता था। यहां हमारा सामाजिक प्रभाव गरीब-मेहनतकश मुसलमानों तक सिमटा हुआ था और राजनीतिक प्रभाव ऊपरी लहर के मुताबिक चढ़ता-उतरता रहता था। यहां हमारे सबसे मजबूत लोग वे थे जो कभी बक्सा मजदूर या दर्जी रह चुके थे, लेकिन मिलिटैंट यूनियनिज्म के असर से उनकी रोजी-रोटी का पुराना जरिया खत्म हो गया था। परिवार चलाने के लिए अब उनमें से कोई अंडा बेचता था, कोई बीड़ी बनाता था तो किसी ने खोखा डालकर चाय की दुकान खोल ली थी। इलाके का उच्च वर्ग हमें संदेह से देखता था और मध्यवर्ग को चुनावी दौर को छोड़कर बाकी समयों में भी हमारे करीब रहने की कोई वजह समझ में नहीं आती थी। निचले वर्ग में भी कसाई बिरादरी हमसे जरा दूर ही रहती थी। इलाके के सबसे ज्यादा बदमाश उन्हीं के बीच से आते थे और चुनाव के वक्त वे किसी न किसी पार्टी से पैसा पकड़ लेते थे।
ता नहीं कौन सी केमिस्ट्री ऐसी बन गई थी कि अबरपुल के लोगों से शुरू में ही मेरी बहुत ज्यादा नजदीकी बन गई। शायद इसकी वजह शिब्ली कॉलेज की मेरी पढ़ाई से हासिल हुआ उर्दू के करीब का मेरा डिक्शन था। बातचीत में अनायास ही उर्दू शब्द आ जाने से मुस्लिम मध्यवर्ग में भी कुछ गति बन गई थी। घूमते-घामते शाम की चाय नेताजी की दुकान पर पीना इस नजदीकी को बढ़ाने में मददगार साबित हुआ। निजामुद्दीन उर्फ नेताजी हमारे बहुत पुराने साथी थे। पहले बक्सा बनाते थे। खूब रस लेकर बतियाने का शौक था। बेरोजगार हो गए तो पुल के पास जरा सी जगह घेरकर दुकान खोल ली। नेताजी नाम उन्हें युवानीति के एक नाटक में खच्चड़ नेता का रोल करने से मिला था। कुल नौ तो उनके बच्चे थे, जिनमें चार-पांच दुकान पर ही गिलास वगैरह धोने के काम में लगे रहते थे। उनकी दुकान के सामने ही अजरू भाई एक स्टोव रखकर उसपर करछुल में अंडा पोच पकाते थे और उसे पत्ते पर रखकर ग्राहक को बेचते थे । सौ रुपये की पूंजी और पचीस-तीस रुपये की रनिंग कैपिटल में परिवार चल जाता था। बड़ा लड़का शुरू में एक दर्जी की दुकान पर काम करता था, बाद में बदमाश हो गया। उनकी एक लड़की को ससुराल वालों ने जला डाला था और हमारे महिला संगठन ने उसकी लड़ाई काफी दूर तक लड़ी थी।
ड़क से थोड़ा हटकर जैनुल माट्साब का घर था। जैनुल माट्साब दरअसल असली वाले नहीं, कपड़ा सिलने वाले माट्साब थे। जनमत निकलना शुरू हुआ था तो आरा शहर में उसे बेचने की जिम्मेदारी उन्होंने ही ली थी। उसके कमीशन से घर का खर्च चलाने में उन्हें थोड़ी मदद मिल जाती थी। फिर जनमत साप्ताहिक रूप में निकलना बंद हो गया तो उनका आमदनी का एकमात्र जरिया भी चला गया। एक ईद से पहले हम लोगों ने सोचा कि जैनुल माट्साब के लिए कैसे क्या किया जाए। हुआ कि अबरपुल से दूर पड़ने वाले इलाकों में खाते-पीते मुस्लिम परिवारों से चलकर जकात वसूली जाए। उन्हें बताया जाए कि यह पैसा आपने किसी जरूरतमंद को देने या किसी अच्छे काम में खर्च करने के लिए ही जुटा रखा है। अपना जीवन ही लोगों की भलाई में लगाने वाले एक व्यक्ति की मदद करने से अच्छा इस्तेमाल इस पैसे का भला और क्या हो सकता है। इस क्रम में कुछ पैसा और कपड़े हम लोगों ने जुटाए और जैनुल माट्साब के यहां देने गए तो पता नहीं कैसे उन्हें इसका पता चल गया था। उन्होंने मदद लेने से मना कर दिया और नाराज भी हुए- जकात के पैसे से ईद मनाएं, अभी इतने गिरे दिन भी नहीं आए हैं। पार्टी को कुछ देना है दे, लेकिन ऐसा दानखाते वाला काम तो न करे।
हां हमारे सबसे मजबूत कैडर सुफियान थे। वे जुझारू आदमी थे। किसी भी लड़ाई-झगड़े में उनपर भरोसा किया जा सकता था। दर्जी का काम छूटने के बाद कुछ दिन उन्होंने छोटे-मोटे काम किए, फिर किराए पर एक जगह लेकर सैलून खोल लिया। उनके सैलून का फीता काटकर उद्घाटन मैंने ही किया था, फिर वहां सबसे पहली हजामत भी मेरी ही बनी थी। सुफियान के जरिए ही मुख्तार से संपर्क हुआ था। इलाके के वे एकमात्र पढ़े-लिखे नौजवान थे। बेरोजगार थे और 1991-92 के हर्षद मेहता वाले चढ़ाव में शेयर ब्रोकर का काम करके अपना गुजारा करते थे। शेयर तब मेरे लिए सिर्फ किताब या अखबार में पढ़ा हुआ एक शब्द था। आरा जैसे छोटे शहर में तब इतने शेयर खरीदने वाले रहे होंगे कि मुख्तार जैसे बिना किसी पूंजी वाले ब्रोकरों का भी गुजारा इस पेशे में हो जाता रहा होगा, यह बात मुझे कभी समझ में नहीं आई। बहरहाल, मुख्तार का घर मेरे लिए नाश्ते या दोपहर के खाने की सुविधाजनक जगह था और उनका पढ़ा-लिखा होना मेरे लिए मुस्लिम मध्यवर्ग में पैठ बनाने का एक रास्ता भी बना। यह काम कुछ वजहों से तब ज्यादा ही मुश्किल हो गया था।
1990 के विधानसभा चुनाव में इसी इलाके के डॉक्टर यासीन ने पार्टी से टिकट मांगा था लेकिन टिकट पार्टी के स्थानीय नेता सुदामा प्रसाद को मिला था। इससे उनकी नाराजगी संगठन विरोध तक गई थी। उन्होंने पूरे इलाके में प्रचार किया कि यह पार्टी सिर्फ मुसलमानों के समर्थन का फायदा उठाएगी, उन्हें कुछ देगी नहीं। इसके लिए उन्होंने सुदामा प्रसाद के बनिया बिरादरी से आने को भी इश्यू बना दिया। सांप्रदायिक तनावों में वहां मुस्लिम बनाम बनिया का टकराव ही ज्यादा बनता था। डॉक्टर साहब की भरपाई कैसे हो, इसका कोई रास्ता शुरू में समझ में नहीं आया। लेकिन बाद में उनका एक मध्यवर्गीय विकल्प मास्टर साहब के रूप में सामने आया। इलाके के बच्चों के लिए वे एक अंग्रेजी मीडियम का मिडल स्कूल चलाते थे। हमारे साथी अनवर आलम जब पटना से आरा आए तो मास्टर साहब के मकान में ramadan ही उन्होंने एक कमरा किराये पर ले लिया। धीरे-धीरे अनवर भाई के जरिए मास्टर साहब हमारे करीब आते गए। 1995 में अपनी शादी के बाद जब मैं इंदु को लिवाकर अबरपुल गया तो मास्टर साहब की पत्नी ने आह्लाद में आकर उनको जर्दे वाला पान खिला दिया। अबरपुल के बारे में इंदु की यादें वह पान खाने के बाद घंटों उल्टियां करते रहने से जुड़ी है।
लते-चलते सुफियान को एक बार फिर याद करना चाहता हूं। जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि मुसलमानों में धर्म ही सबकुछ है, जाति कुछ नहीं है, उनके लिए एक सूचना कि मेरी जानकारी में सिर्फ अबरपुल मोहल्ले में मुसलमानों की कुल 32 जातियां मौजूद थीं। बीड़ी बनाने वाले अपने एक साथी नन्हक जी की बेटी से हम लोगों ने सुफियान की शादी कराने की कोशिश की थी तो इलाके की दर्जी बिरादरी से आक्रोश के स्वर उभरने लगे- अब दर्जियों के दिन इतने खराब हो गए कि साईं-फकीर की लड़की ब्याह के घर में लाएंगे। इसके कुछ महीने बाद अबरपुल की मस्जिद में सुफियान का निकाह पढ़ाया गया- दोनों तरफ से कबूल है, कबूल है के जैसा कोई फिल्मी मामला नहीं था। दुल्हन घर में ही रही और उसकी तरफ से उसका इकरारनामा उसके बाप ने दिया। इसके अगले साल सुफियान कुछ दिनों तक मेरे साथ जेल में रहे। उनके साथ मेरा अंतिम और परोक्ष संवाद 1995 का है, जब जनमत में लिखे एक जेल संस्मरण पर उन्होंने चिट्ठी भेजकर अपना तीखा एतराज जताया था। मैंने लिखा था कि जेलर ने एक आंदोलन के दौरान सुफियान को घुटना मार दिया था, जिसे पढ़कर इलाके में शायद उनका कुछ मजाक बन गया था। उनका कहना था कि कोई घुटना-वुटना नहीं मारा था, मैंने खामखा अपनी बहादुरी जताने के लिए यह सब लिखा है। चार-पांच साल पहले सुफियान अबरपुल इलाके से म्युनिसपाल्टी कॉरपोरेटर का चुनाव लड़े और जीत गए, लेकिन अभी तीन साल पहले, जब मैं सहारा अखबार में था, एक दिन एसएमएस के जरिए खबर मिली कि उनके सैलून के सामने ही किसी गैंग के लोगों ने दिनदहाड़े ग्यारह गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी।

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Thursday, August 19, 2010

ऑनर किलिंग के बहाने महिमा गोत्र की…

8-3-07

जातिवादी सामाजिक व्यवस्था की खासियत ही यही रही कि इसमें हर समूह को एक खास पहचान मिली। हिन्दुओं में गोत्र होता है जो किसी समूह के प्रवर्तक अथवा प्रमुख व्यक्ति के नाम पर चलता है। सामान्य रूप से गोत्र का मतलब कुल अथवा वंश परंपरा से है। गोत्र को बहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात ऐसा समूह जिससे दूसरे परिवार का रक्त संबंध न हो अर्थात एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते पर  दूसरे गोत्र में विवाह कर सकते, जबकि जाति एक अन्तर्विवाही समूह है यानी एक जाति के लोग समूह से बाहर विवाह संबंध नहीं कर सकते। गोत्र मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशीय भी। ज़रूरी नहीं कि गोत्र किसी आदिपुरुष के नाम से चले। जनजातियों में विशिष्ट चिह्नों से भी गोत्र तय होते हैं जो वनस्पतियों से लेकर पशु-पक्षी तक हो सकते हैं। शेर, मगर, सूर्य, मछली, पीपल, बबूल आदि इसमें शामिल हैं। यह परम्परा आर्यों में भी रही है। हालांकि गोत्र प्रणाली काफी जटिल है पर उसे समझने के लिए ये मिसालें सहायक हो सकती हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोकायत में लिखते हैं कि कोई ब्राह्मण कश्यप गोत्र का है और यह नाम कछुए अथवा कच्छप से बना है। इसका अर्थ यह हुआ कि कश्यप गोत्र के सभी सदस्य एक ही मूल पूर्वज के वंशज हैं जो कश्यप था। इस गोत्र के ब्राह्मण के लिए दो बातें निषिद्ध हैं। एक तो उसे कभी कछुए का मांस नहीं खाना चाहिए और दूसरे उसे कश्यप गोत्र में विवाह नहीं करना चाहिए। आज समाज में विवाह के नाम पर आनर किलिंग का प्रचलन बढ़ रहा है उसके मूल में गोत्र संबंधी यही बहिर्विवाह संबंधी धारणा है।
ह जानना दिलचस्प होगा कि आज जिस गोत्र का संबंध जाति-वंश-कुल से जुड़ रहा है, सदियों पहले यह इस रूप में प्रचलित नहीं था। गोत्र तब था गोशाला या गायों का समूह अथवा गोवंश का बाड़ा। दरअसल संस्कृत में एक धातु है त्रै-जिसका अर्थ है पालना, रक्षा करना और बचाना आदि। गो शब्द में त्रै लगने से जो मूल अर्थ प्रकट होता है जहां गायों को शरण मिलती है, जाहिर है गोशाला मे। इस तरह गोत्र शब्द चलन में आया। गौरतलब है कि ज्यादातर और प्रचलित गोत्र ऋषि-मुनियों के नाम पर ही हैं जैसे भारद्वाज-गौतम आदि मगर ऐसा क्यों ? इसे यूं समझें कि प्राचीनकाल में ऋषिगण HittPlowविद्यार्थियों पढ़ाने के लिए गुरुकुल चलाते थे। इन गुरूकुलों में खान-पान से जुड़ी व्यवस्था के लिए बड़ी-बड़ी गोशालाएं होती थीं जिनकी देखभाल का काम भी विद्यार्थियों के जिम्मे होता था। ये गायें इन गुरुकुलों में दानस्वरूप आती थीं और बड़ी तादाद में पलती थीं। गुरुकुलों के इन गोत्रो में समाज के विभिन्न वर्ग भी दान-पुण्य के लिए पहुंचते थे। कालांतर में गुरूकुल के साथ साथ गोशालाओं को ख्याति मिलने लगी और ऋषिकुल के नाम पर उनके भी नाम चल पड़े। बाद में उस कुल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने भी अपनी पहचान इन गोशालाओं यानी गोत्रों से जोड़ ली जो सदियां बीत जाने पर आज भी बनी हुई है।
मूलतः गोत्र शब्द भी हमारी पशुपालन संस्कृति से उपजा है। सप्तसैंधव क्षेत्र के निवासी आर्यों का प्रिय पशुधन गौ था। इसी रूप में गोपालक समुदाय के लिए गोत्र शब्द उपजा होगा जो बाद में वंश के विशिष्ट गुणों की पहचान का आधार बना। सफाई देवता पुस्तक में ओमप्रकाश वाल्मीकि प्रख्यात विद्वान राहुल सांकृत्यायन के हवाले से लिखते हैं कि गोत्रकाल का ज्ञान हमारे पास बहुत ही कम है। विश्वामित्र, भरद्वाज आदि जितने भी गोत्र (ब्राह्मणी काल) प्रसिद्ध हैं, ये वस्तुतः गोत्रकाल या पित्रसत्ताकाल के भी नहीं हैं। ये सारे ऋषि 1500 ईसा पूर्व के काल में दासता और सामन्तवादी युग में हुए हैं। हो सकता है कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) की उपत्यका में रहते वक्त गोत्रसत्ता उनमें मौजूद रही हो। डीएन झा के मुताबिक जो लोग अपनी गायों के साथ एक ही गोष्ठ में रहते थे, उनका संबंध उसी गोत्र से हो जाता था। बाद में रक्तसंबंध का अभिप्राय भी इस शब्द से जुड़ गया। गोत्र का अभिप्राय ऐसे समूह से भी लगाया जाता है जो रक्तसंबंध से बाहर हो। कालांतर में विवाह संबंधों के संदर्भ में गोत्र का अर्थ बहिर्विवाही समूह हो गया। डॉ काणे के अनुसार गोत्र में कोई भी व्यक्ति अपने गुरू के साथ सम्पूर्ण परिवार को संबंधित करता है, ठीक वैसे ही जैसे सामान्य जीवन में हम खुद को अपने पिता से संबंधित करते हैं। हालांकि ऋग्वेदकाल में गोत्र का अर्थ सिर्फ गोशाला या गोपालक समूह ही था मगर उपनिषद काल तक गोत्र की पहचान विशिष्ट समूहों के रूप में हो चुकी थी।

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Saturday, August 14, 2010

बात ग़ुस्लखाने की…

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हि न्दी की कुछ बोलियों में पाखाना के लिए तारत शब्द का प्रयोग भी होता है। पूर्वांचल में जहां यह तारत है वहीं मालवी में कहीं कहीं इसका उच्चारण तारज भी सुनाई पड़ता है। ये शब्द दरअसल प्राकृत-संस्कृत से नहीं उपजे हैं बल्कि इस्लामी संस्कृति की देन है सो अलग अलग क्षेत्रों में उच्चारण भिन्नता है। यह शब्द बना है अरबी के तहारत से जिसमें शुद्धता का भाव है। मूल रूप से तहारत इस्लामी परम्परा का शब्द है और इसका इबादत से पूर्व की शुचिता प्रक्रिया से रिश्ता है। स्नान, अंगप्रक्षालन जैसी क्रियाएं इसमें निहित हैं। पाखाना शब्द जिस तरह से पाकखाना से बना है वहीं बात तारत में भी है।
ट्टी या शौचालय के अर्थ में हिन्दी में पाखाना शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे पैखाना, पखाना या पाखाना। यह फारसी के पाखानः या पाखानह से जन्मा शब्द है। पाखाना के साथ लगा “खाना” साफ बता रहा है कि यह स्थानवाची शब्द है। पाखाना में आए पा का अर्थ प्रायः पैर से लगाया जाता है। कुछ व्याख्याकार पाखाना का अर्थ वह स्थान बताते हैं जहां पाद प्रक्षालन अर्थात पैर धोए जाएं। इस अर्थ में पाखाना का अन्वय हुआ पा + खाना। पुराने ज़माने में बाहर से आने पर लोग घर के आंगन में एक नियत स्थान पर पैर धोकर ही कमरों में प्रवेश करते थे। शौचालय में निहित शुचिता यानी पवित्रता की व्यंजना के आधार पर अगर पाखाना शब्द का अन्वय अगर पाक+ खाना किया जाए तब इसका भावार्थ वहीं निकलता है जो शौचालय का स्थूल अर्थ है। पाक में क्रिया और विशेषण का बोध भी होता है। मुझे लगता है बतौर शौचालय इस शब्द की यह व्युत्पत्ति तार्किक है।
spiral-vip-latrine-1 तारत या तारज का मूल रूप है तहारतखाना अर्थात पवित्र होने का स्तान। मराठी में पाखाना के लिए शेतखाना या तारतखाना ही चलन में हैं। शौचालय शब्द भी चलता है मगर लोक परम्परा में इन्ही दो शब्दों की व्याप्ति है। दिलचस्प यह कि दोनों शब्द मुस्लिम दौर में प्रचलित हुए। पाकखाना की तरह ही तहारतखाना का अर्थ हुआ शुद्ध या पवित्र होने का स्थान। मुस्लिमों में वुज़ू के संदर्भ में तहारत, ग़ुस्ल आदी शब्दों का प्रयोग होता है। वुज़ू जहां नमाज़ से पूर्व शुद्धि की प्रक्रिया के लिए रूढ़ हो चुका है वहीं तहारत या ग़ुस्ल में दैहिक पवित्रता के विभिन्न क्रिया-आयाम अभिव्यक्त होते हैं। सामान्यतौर पर स्नान के अतिरिक्त शौच के उपरान्त तीन बार गुप्तांग को धोने का भाव भी तहारत में है। तहारतखाना शब्द के साथ जुड़े शौचालय की अर्थवत्ता चस्पा होने की वजह यही है। हिन्दी में भी स्नानगृह और शौचालय का भाव एक ही है पर नहाने के स्थान को कोई शौचालय नहीं कहता। इसी तरह ग़ुसलखाना शब्द का अर्थ स्नानगृह या बाथ रूम है। गुसलखाना बना है ग़ुस्ल ghusl शब्द से जिसमें पवित्रता और स्नान का भाव है। इसका अरबी मूल है ग़साला ghasala जिसकी मूल धातु है gh-s-l जिसका अर्थ है शुचितापूर्ण, पवित्र।   
मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के  उर्द-हिन्दी कोश के अनुसार तहारत का अर्थ है शुद्धता, पवित्रता, पाकीज़गी, स्नान और ग़ुस्ल आदि। मलविसर्जन के उपरांत पवित्र होने का भाव इसमें बाद में जुड़ा। अरबी में इसके लिए इस्तिंजा और फ़ारसी में आबदस्त शब्द पहले से हैं। आबदस्त इंडो ईरानी मूल का शब्द है जिसमें आब यानी पानी और दस्त यानी हाथ अर्थात हाथों के जरिये अंग प्रक्षालन की बात स्पष्ट है। अब आते हैं मराठी के शेतखाना शब्द पर। मराठी में शेत का अर्थ खेत होता है जो क्षेत्र से बना है। इस अर्थ में देखें तो शेतखाना का एक अर्थ खलिहान हो सकता है जहां खेत की उपज का भंडारण होता है। पेशवाओं के ज़माने में मराठी में फारसी का काफी असर आया। यहां शेत शब्द फारसी के सेहत शब्द का रूपांतर या देशज रूप है। सेहतखाना यानी पवित्र होने की जगह। फारसी का सेहत भी इंडो ईरानी मूल का शब्द है। मेरी नज़र में इसका रिश्ता संस्कृत के स्वस्थ से है। स ध्वनि यहां यथावत है। का लोप होकर मे निहित त+ह ध्वनियों का अन्वय होता है और फिर वर्ण विपर्यय के जरिये का स्थान लेता है और बनता है सेहत। गौरतलब है  कि पवित्र होने की सभी क्रियाओं ने अंग्रेजी के बाथरूम शब्द में ठौर पाया है जहां नहाने के अलावा भी “सब कुछ” किया जा सकता है।

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Tuesday, August 10, 2010

ज़ुबानदराज़, ड्रॉअर और दीर्घदर्शी

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हि न्दी में दीर्घ deergh का अर्थ होता है लंबा, दूर तक पहुंचनेवाला, ऊंचा, उन्नत आदि। अरबी फारसी का दराज़ शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है जिसके दो मायने हैं। एक दराज़ वह है जिसका अर्थ है मेज़ या टेबल में छिपा वह खाना जिसे खींच कर खोला जाता है और दूसरा दराज़ वह है जिसमें लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई जैसे आयामों के साथ विशालता का भाव है। आमतौर पर दराज से तात्पर्य लम्बाई से होता है जैसे ज़बानदराज़ यानी ज्यादा बोलनेवाला, दराज़दुम यानी लम्बी पूछवाला, उम्रदराज यानी वृद्ध या लम्बी उम्रवाला। इस दीर्घकाय का अर्थ हुआ लंबा व्यक्ति मगर दीर्घकाय शब्द का अभिप्राय आमतौर पर विशालकाय के अर्थ में ही लगाया जाता है। दरअसल जब किसी आकार के साथ दीर्घ शब्द का विशेषण की तरह प्रयोग होता है तब लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई के आयाम भी उसमें जड़ जाते हैं, इस तरह दीर्घाकार, दीर्घकाय जैसे शब्दों में बड़ा अथवा विशाल का भाव आ जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति को दूरदर्शी कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिए दीर्घदर्शी शब्द भी है यानी दूर तक देखनेवाला। लंबी आयु के लिए दीर्घजीवी शब्द प्रचलित है।
भाषाविज्ञानियों नें संस्कृत के दीर्घ शब्द की रिश्तेदारी प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु dlonghos में खोजी है। अंग्रेजी का लाँग long शब्द भी इससे ही बना है जिसका अर्थ भी लंबा या दीर्घ ही होता है। गौरतलब है कि संस्कृत दीर्घ शब्द ने ही बरास्ता अवेस्ता, ईरानी परिवार की भाषाओं में जाकर दराग, दिरंग होते हुए फारसी के दराज़ शब्द का रूप लिया। फारसी के दराज़ का अर्थ होता है लंबा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं मे र-ल और क-ग-घ जैसे वर्णों में आपस में तब्दीली होती है। फारसी का दराज़ शब्द उम्रदराज़ के रूप में हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ होता है लंबी आयु वाला अर्थात बूढ़ा, वृद्ध, बुजुर्ग। गौरतलब है कि फारसी के बुजुर्ग शब्द की भी संस्कृत-हिन्दी के वज्र से रिश्तेदारी है जिसका मतलब होता है महान, कठोर, वरिष्ठ आदि। बुजुर्ग में भी मूलतः आदरणीय, महान, प्रभुतासम्पन्न जैसे भाव ही हैं। मगर कालांतर में इसके साथ वरिष्ठता के विभिन्न भाव जुडते चले गए जिनका अर्थ विस्तार रसूख, प्रभाव में हुआ और बाद में आयु के उत्कर्ष के तौर पर ये सब बुजुर्ग में सिमट गए।
वाचालता अथवा अशिष्ट सम्भाषण के लिए ज़ुबानदराज़ी शब्द भी हिन्दी में इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है ज्यादा बोलना। जुंबानदराज़ी करना मुहावरा मूलतः

team-7-custom-closet-drawersjpg ...इंडो यूरोपीय मूल का ड्राअर्ज drawers शब्द भी भारोपीय मूल का है जिसका अर्थ है मेज़ में छुपा एक खाना जिसे आगे खींच कर खोला जाता है। ध्यान दें खींचना के भाव पर जिसमें लम्बा होने का भाव सुरक्षित है। ...

फ़ारसी से ही हिन्दी में आया है जिसका मूल रूप है ज़ुबानदराज़ करदन यानी बढ़-चढ़ कर बोलना। राज शब्द का एक अन्य अर्थ में भी हिन्दी में प्रयोग होता है जिसका मतलब होता है टेबल, मेज या आलमारी में बना हुआ काग़ज-पत्र या अन्य छोटी सामग्री रखने का खाना या खण्ड जिसे खींच कर बाहर निकाला जा सके। संभवतः इस दराज़ से इसका कोई रिश्ता नहीं है। मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के कोश के मुताबिक मूलतः यह अरबी के दरजः (दर्जः) से बना है। यह उर्दू में दर्जः हो गया और इसका हिन्दी उच्चारण दराज की तरह होने लगा। दर्जः का मतलब है वर्ग, खण्ड, ओहदा, श्रेणी आदि। गौरतलब है कि उत्तर भारत में आज भी कक्षा के लिए भी दर्जा शब्द का ही इस्तेमाल होता है। रेलवे की आरक्षण शब्दावली में श्रेणी शब्द चाहे लिखा जाता है, पर इस्तेमाल मे दर्जा शब्द ही आता है। दर्जा का मतलब इमारत की मंजिल या माला भी होता है। अवस्था के लिए भी दर्जा शब्द का प्रयोग होता है।
कुछ लोग अंग्रेजी के ड्राअर्ज को दराज़ शब्द का मूल मानते हैं। अग्रेजी के ड्राअर से दराज शब्द का बनना तार्किक तो लगता है, पर खण्ड या खाना के अर्थ में फारसी में दरजः शब्द पहले से मौजूद है। मैने कई संदर्भों को टटोलने के बाद ही मेज की दराज को भी इसी मूल का माना है। ये ठीक है कि आगे खींच कर बाहर निकालने के लिए अंग्रेजी के ड्राअर्ज शब्द से इसकी समानता कई लोगों को नजर आती है। पर मूलतः यह है तो खण्ड या आला ही। और मेज, आलमारी में भी इसकी कई मंजिलें यानी दरजे होते हैं। यह मान लेना कुछ मुश्किल लगता है कि यूरोपीयों के आने से पहले अरब, फारस या भारत के लोग टेबल या मेजनुमा किसी देशी व्यवस्था के बिना गुजारा करते थे। खास कर तब, जब प्रायः सभी सभ्यताओं-समाजों में काष्ठकला सर्वाधिक प्रारम्भिक कलाओं में रही है। जब मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के कोश में संदर्भ टटोला तो वहां अपनी धारणा को पुष्ट करता हुआ उदाहरण मिला। इसी तरह सीरियक अरबी में भी सीधे सीधे इसका अर्थ मेज की दराज दिया हुआ है। मैं भी यही मानता हूं कि यह अंग्रजी से नहीं बल्कि फारसी-अरबी मूल का ही शब्द है।
वैसे भी इंडो यूरोपीय मूल का ड्राअर्ज drawers शब्द भी भारोपीय मूल का है जिसका अर्थ है मेज़ में छुपा एक खाना जिसे आगे खींच कर खोला जाता है। ध्यान दें खींचना के भाव पर जिसमें लम्बा होने का भाव सुरक्षित है। ड्राअर्ज शब्द बना है ड्रॉ से जिसमें खींचने, बाहर निकालने का भाव है। ड्रॉ की मूल भारोपीय धातु *dhragh- मानी गई है जिसकी संस्कृत के दीर्घ deergh से तुलना गौरतलब है। ड्रॉ शब्द का विकास ओल्ड हाई जर्मन के tragen से हुआ है। इसकी रिश्तेदारी ड्रैग या ड्रैगन से भी है। सेमेटिक भाषा परिवार की अरबी की ही एक बोली है यमनी जिसमें दराजू शब्द है जिसमें विकसित होने का भाव है। मोशे पिमेन्ता की अ डिक्शनरी ऑफ पोस्ट अरेबिक यमनी  के मुताबिक आंखों में आश्चर्य का भाव भी इसमें है। गौरतलब है कि चकित होने पर आंखे बड़ी होती हैं। परिनिष्ठित हिन्दी में इसे विस्फारित नेत्र कहा जाता है और चालू भाषा में आंखे फटी की फटी रह जाना। विस्फारित और फटना दोनों ही शब्दों में विस्तार का भाव है। दीदे फाड़ना भी इसे ही कहते हैं। विस्तार में निहित लम्बाई के भाव को व्याख्या की जरूरत नहीं है। इसी तरह दराज़ा शब्द का अर्थ लपेटना, गोल गोल घुमाना भी है। चड़स या रहंट को भी दराजा कहते हैं जिसमें खींचने की क्रिया निहित है। -परिवर्धित पुनर्प्रस्तुति

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Sunday, August 8, 2010

चंदूभाई की दो कविताएं

संदर्भ पिछली कड़ी- (…न्हीं दिनों मैंने वाल्मीकि रामायण पढ़ना शुरू किया और उसके असर में न सिर्फ कोहली की रचनाएं बल्कि तुलसीदास भी मुझे बिल्कुल मरियल- दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रामा किलर- लगने लगे…)
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 143 वीchand कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की  अनकही का सत्ताईसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

हरिभजन को निकलने के बाद कपास ओटने लगना हमारा स्वभाव बन चुका है। पिछली टिप्पणी पर तुलसी को लेकर इतनी बातें हुईं कि मन खट्टा हो गया। मैं तो राम पर बात करना चाहता हूं। उनके जीवन में मौजूद ड्रामे पर। अभी नहीं, मगर कभी न कभी जरूर। लेकिन क्या किया जा सकता है। बात तुलसी पर ही होनी थी, हुई । मैं ऐसा ही हूं और जिस समय और समाज में हमें रहना है काम करना है, वह भी ऐसा ही है।  इस बार अपने किस्से में जो कुछ कहना था, उसे अगली बार ही कह पाऊंगा। रामलीला का पहला खंड खेले जाने के कुछ समय बाद लिखी गई दो कविताएं यहां लगा रहा हूं (दूसरी वाली पहले लिखी गई थी, पहले वाली बाद में)- दोनों 2001 में आए मेरे कविता संग्रह इतनी रात गए में प्रकाशित हैं। सिर्फ वहीं, और कहीं भी

रत्नावली


ओ..ह वो रात, वो रात female
वो रात अंधियारी झमाझम
वो बिजलियों बौछारों बाढ़ बारिश की रात 
वो रात रत्नावली को पल-पल याद है
मुंह में पल्लू दबा चौखट पर खड़ी
बेलौस हंसती है रत्नावली
रत्नावली....रत्नावली
इतना मत हंसो कि पलकें भींज-भींज जायं
हो सके, बताओ हमें
कहां से मिली उसे वो जिंदगी की लय
जो रुला-रुला जाती है इतनी सदियों बाद भी
वो बाज से हमलावर पंडितों में दुबका
वो रट्टू सुग्गे से बांचता श्लोक
ओह, मुझसे न पूछो उस सुग्गे की बात
जो जाने क्यों अहकता रहा
ऐसी गहरी नींद में भी पहली-पहली रात
मार खाकर आए भीगे पिल्ले सा जंगले से झांकता
अभी तक याद है तिलक त्रिपुंडधारी
हंसती है, हंसती है, चुप हो जाती है
मुझसे मत पूछो उस सुग्गे की बात
पूछना है, पूछो जाकर उन्हीं मान्यवरों से
जो भूखे पेट देते नहीं चार दाने चने
मगर बेभाव देते हैं चुटकियां उलाहने
जो हद में रह जाने पर सुग्गा बनाते हैं
जान मार देते हैं बेहद जाने पर
कौन कवि....महाकवि
मुझे तो है याद बस वो धुआं होता चेहरा
वो बेठौर बारिश में जाते हुए पांव
जैसे इस चौखट पार कोई चौखट नहीं
जैसे इस हद के पार कोई हद ही नहीं
जैसे नाखून गड़ाए वो बढ़ा चला जा रहा हो
जल थल औ नभ के भी पार और पार
मत पूछो आ....ह उस तीर की बात
जो निकला जुबान से तो
बेधता सिंहासनों को निकल गया सदियों के पार
टूटी कमान एक टूटी कमान
समय की सारंगी के अनमिल तारों पर
सिसकती चली जाती है
कौन लय....कैसी लय....कहां की लय।


आना पुरखो

मैंने तुमपर किए बारंबार प्रहार colorful
और आगे भी करता रहूंगा
पर कभी नहीं भूलूंगा मैं
कि आज मैं जहां हूं, कल तुम भी वहीं थे
कि इन हवाओं में घुली हैं तुम्हारी सांसें
और इस मिट्टी में तुम्हारी राख
इतनी अजनबियत से मुझे मत देखो
मेरे पुरखो-पुरखिनो
न्यौतता हूं तुम सभी को
मेरी शादी में जरूर आना
कितने पिंडदान हुए तुम्हारी मुक्ति के लिए
कितनी बार तुम्हारा नाम लेकर
मांगों में सिंदूर भरा गया
पर क्या तुम मुक्त हुए
कितनी बार हुआ पवित्र ग्रंथों का पारायण
कितनी बार जल और अर्घ्य दिए गए
पर क्या खत्म हुई तुम्हारी भूख-प्यास
जितनी बार तुम्हें दिखे अपने वंशज
क्षुद्रता, अपमान, यंत्रणा से गुजरते हुए
उलझे हुए हत्या और आत्महत्या के द्वंद्व में
क्या लगा तुम्हें कि मुक्त हुए
मेरी शादी में आना मेरे पितरो
इस नास्तिक वंशज की शादी में आना
जिसने न कभी अर्घ्य दिया न पिंडदान
जिसने कभी माना ही नहीं उस भुतखेल को
जो जिंदा रहने पर तिल-तिल मारता है
मर जाने पर मुक्ति के लिए
नाक रगड़वाता है पापियों के सामने
आना इस नास्तिक की शादी में
और सारे अपने अधूरे सपने
मेरी प्रेयसी की आंखों में आंज जाना
मुक्ति के लिए भटकते मेरे पुरखे-पुरखिनों
जिस दिन हमारी संतानें आंख खोलेंगी
लांछना-प्रवंचना, हत्या-आत्महत्या से मुक्त
एक नई दुनिया में
उसी दिन हमारे साथ तुम भी मुक्त होगे।

और अंत में
कुछ पाप हम स्वार्थ के लिए करते हैं और जब तक वश चलता है, करते चले जाते हैं। इनसे कोई मुक्ति नहीं है। इन्हें करते हुए अक्सर हम कानून की नजर से बच जाते हैं, या उसे खरीद लेते हैं। जो अंतरात्मा इनमें रुकावट पैदा कर सकती थी, उसे तो पहले ही मार चुके होते हैं। धीरे-धीरे दुनिया का कोलाहल पीछे छूटने लगता है। फिर कोई दिन ऐसा आता है जब अपने नर्क में अकेले जीने के सिवाय कोई रास्ता हमारे पास नहीं होता। कुछ पाप गैरजानकारी में या मजबूरी में हो जाते हैं। इनसे निवृत्ति के लिए प्रायश्चित और पश्चाताप के उपाय बताए गए हैं, हालांकि सफलता इस पर निर्भर करती है कि कितनी शिद्दत से हम इन उपायों पर अमल करते हैं। लेकिन कुछ पाप ऐसे भी होते हैं, जिन्हें हम सोचे-समझे ढंग से और नेक इरादे के साथ करते हैं। जैसे अपनी परंपरा खंडित करने का पाप। दिल थरथराता है, फिर भी भविष्य को साक्षी मान कर यह रास्ता अपनाते हैं। एक नई, उज्जवल पंरपरा खड़ी करके ही इस पाप से मुक्ति पाते हैं। -चंद्रभूषण

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Friday, August 6, 2010

छिनाल का जन्म

...छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है। ...
हि न्दी में कुलटा, दुश्चरित्रा, व्यभिचारिणी या वेश्या के लिए एक शब्द है छिनाल। आमतौर पर हिन्दी की सभी बोलियों में यह शब्द है और इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है और इसे गाली समझा जाता है। अलबत्ता पूरबी की कुछ शैलियों में इसके लिए छिनार शब्द भी है। छिनाल शब्द बना है संस्कृत के छिन्न से जिसका मतलब विभक्त , कटा हुआ, फाड़ा हुआ, खंडित , टूटा हुआ , नष्ट किया हुआ आदि है। गौर करें चरित्र के संदर्भ में इस शब्द के अर्थ पर । जिसका चरित्र खंडित हो, नष्ट हो चुका हो अर्थात चरित्रहीन हो तो उसे क्या कहेंगे ? जाहिर है बात कुछ यूं पैदा हुई होगी- छिन्न + नार> छिन्नार> छिनार> छिनाल। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-इंग्लिश-उर्दू कोश में इसका विकासक्रम कुछ यूं बताया है-छिन्ना + नारी > छिन्नाली> छिनाल। इसी तरह हिन्दी शब्दसागर में -छिन्ना+नारी से उसकी व्युत्पत्ति बताते हुए इसके प्राकृत रूप छिणणालिआ> छिणणाली > छिनारि के क्रम में इसका विकासक्रम छिनाल बताया गया है। परस्त्रीगामी और लम्पट के लिए हिन्दी में छिनाल का पुरुषवाची शब्द भी पनपा है छिनरा
छिन्न शब्द ने गिरे हुए चरित्र के विपरीत पुराणों में वर्णित देवी-देवताओं के किन्ही रूपों के लिए भी कुछ खास शब्द गढ़े हैं जैसे छिन्नमस्ता या छिन्नमस्तक। इनका मतलब साफ है- खंडित सिर वाली(या वाला)। छिन्नमस्तक शब्द गणपति के उस रूप के लिए हैं जिसमें उनके मस्तक कटा हुआ दिखाया जाता है। पुराणों में वर्णित वह कथा सबने सुनी होगी कि एक बार स्नान करते वक्त पार्वती ने गणेशजी को पहरे पर बिठाया। इस बीच शिवजी आए और उन्होंने अंदर जाना चाहा। गणेशजी के रोकने पर क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया। बाद मे शिवजी ने गणेशजी के सिर पर हाथी का सिर लगा दिया इस तरह गणेश बने गजानन। इसी तरह छिन्नमस्ता देवी तांत्रिकों में पूजी जाती हैं Picasso और दस महाविद्याओं में उनका स्थान है। इनका रूप भयंकर है और ये अपना कटा सिर हाथ में लेकर रक्तपान करती चित्रित की जाती हैं। हिन्दी में सिर्फ छिन्न शब्द बहुत कम इस्तेमाल होता है। साहित्यिक भाषा में फाड़ा हुआ, विभक्त आदि के अर्थ में विच्छिन्न शब्द प्रयोग होता है जो इसी से जन्मा है। छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है जिसमें किसी समूह को बांटने, विभक्त करने, खंडित करने या छितराने का भाव निहित है। छिन्न बना है छिद् धातु से जिसमें यही सारे अर्थ निहित है। इससे ही बना है छिद्र जिसका अर्थ दरार, सूराख़ होता है। छेदः भी इससे ही बना है जिससे बना छेद शब्द हिन्दी में प्रचलित है। संस्कृत में बढ़ई के लिए छेदिः शब्द है क्योंकि वह लकड़ी की काट-छांट करता है।सहज ही प्रश्न उठता है कि जिस समाज ने छिन्न शब्द से स्त्री के लिए छिनाल जैसा उपालम्भ-सम्बोधन बनाया वहीं छिनाल के लक्षणोंवाले पुरुष के लिए कौन सा शब्द है? हिन्दी की पूर्वी बोलियों में इसके लिए छिनरा, छिनारा है। हिन्दी के जानेमाने कवि बोधिसत्व ने छिनरा के बारे में जो लिखा है वह जस का तस यहां प्रस्तुत है-
जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्चा होती है। छिनाल के साथ जो छिनरई करते धरा जाता है सहज ही वह छिनरा होता है। वहाँ दोनों का कद बराबर है- छिनरा छिनरी से मिले हँस-हँस होय निहाल। किसी भी समाज में अकेली स्त्री छिनाल नहीं हो सकती। उसे सती से छिनाल बनाने में पहले एक अधम पुरुष की उसके ठीक बाद एक अधम समाज की आवश्यकता होती है। छिनाल शब्द की उत्पत्ति पहले हुई या छिनरा की यह एक अलग विवाद का विषय हो सकता है । साथ ही समाज में पहले छिनरा पैदा हुआ या छिनाल। क्योंकि बिना छिनरा के छिनाल का जन्म हो ही नहीं सकता। एक पक्का छिनरा ही किसी को छिनार बना सकता है। तत्सम छिनाल का पुलिंग शब्द भले ही न मिले लेकिन तद्भव छिनरी का पुलिंग शब्द छिनरा जरूर मिलता है...। छिनरा का शाब्दिक अर्थ है लंपट, चरित्रहीन और परस्त्रीगामी। वहीं छिनाल या छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा,पर पुरुषगामी। रोचक बात यह है कि लोक ने उस स्त्री में छिपे छिनाल को खोज लिया जिसके गालों में हँसने पर गड्ढे पड़ते हों- हँसत गाल गड़हा परै, कस न छिनरी होय।’
सम्पूर्ण संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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Tuesday, August 3, 2010

मै इधर जाऊं या उधर जाऊं!!!

dilemma
मतौर पर मीडिया में आसान हिन्दी के नाम पर हिन्दी की तत्सम शब्दावली से पीछा छुड़ाने की प्रक्रिया इन दिनों जोरों पर है। यातायात के स्थान पर अब ट्रैफिक शब्द के इस्तमाल का आग्रह ज़्यादा है। कठिनाई, दुविधा अथवा निर्णय न ले पाने की स्थिति के लिए हिन्दी में असमंजस एक बहुत लोकप्रिय शब्द के तौर पर डटा हुआ है। कठिन शब्द से तात्पर्य आमतौर पर ऐसे शब्द से होता है जो भाषा में कम इस्तेमाल होता हो और जिसका अर्थ जानने के लिए शब्दकोश की मदद लेनी पड़े। निश्चित ही असमंजस शब्द का शुमार इस समूह के शब्दों में नहीं है। मगर अब असमंजस को भी कठिन कहा जाने लगा है। दरअसल यह इसी वजह से होता है क्योंकि हमारे भीतर शब्दों की व्युत्पत्ति जानने की जिज्ञासा नहीं है। उद्गम को जानने के बाद ही किसी चीज़ की अर्थवत्ता के विभिन्न आयामों का खुलासा होता है। असमंजस के स्थान पर दुविधा शब्द भी चिरपरिचित है मगर यह जानकर ताज्जुब हुआ कि गूगल पर असमंजस शब्द की 109000 प्रविष्टियां है जबकि दुविधा शब्द की प्रविष्टियां उससे बीस हजार कम यानी 107000 निकलीं। मज़े की बात यह भी कि असमंजस की तुलना में दुविधा को आसान माननेवालों से जब दुविधा का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पूछा गया तब यह भी असमंजस जितना ही कठिन साबित हुआ।

खैर, बात करते हैं असमंजस के जन्मसूत्रों पर। असमंजस की व्युत्पत्ति अगर पूछी जाए तो यह अ + समञ्जस से निकलती है। संस्कृत में समञ्जस का अर्थ है सही, उचित, भली प्रकार से, सुसंगत, ठीक, न्यायोचित, तार्किक आदि। इसके  अलावा अभ्यस्त, यथार्थ, स्वस्थ आदि भी इसकी अर्थवत्ता में शामिल हैं। आप्टे कोश के मुताबिक असमञ्जस शब्द बना है सम्यक् अञ्ज औचित्यं यत्र यानी सब दूर से भली प्रकार से उद्घाटित या दृष्यमान। जाहिर है जो बोधगम्य है, उचित है, वही समञ्जस है। समञ्जस में उपसर्ग लगने से इसमे निहित भावों का विलोम होता है इस तरह संस्कृत के असमञ्जस शब्द का अर्थ है जो समझ न आए, अस्पष्ट, अनुपयुक्त, असंगत, बेतुका, निरर्थक आदि। समञ्जस में शामिल संस्कृत धातु अञ्ज को Sleeper'sDilemmaसमझने से असमंजस का अर्थ और स्पष्ट होता है। अञ्ज् धातु का अर्थ है प्रस्तुत करना, स्पष्ट करना, चमकना, प्रकाशित होना, चित्रण करना आदि। जाहिर है अञ्ज् में स उपसर्ग लगने से बना है समञ्जस। ध्यान रहे संस्कृत के स उपसर्ग में सहित या गुणवृद्धि का भाव है। अञ्ज् से ही बना है अञ्जन या अंजन जिसमें लीपने, पोतने, मिलाने, मलने, प्रकट करने का भाव है। आंखों में सुरमा लगाने को आंजना भी कहते हैं। सुरमा या काजल को संस्कृत में अञ्जन कहा जाता है। दोनों हथेलियों को मिलाकर बने कमलवत आकार को भारतीय संस्कृति में मांगलिक माना जाता है। इसे अञ्जलि कहते हैं। हिन्दी में इसे ही अंजुरी कहा जाता है। किसी पदार्थ को ग्रहण करने अथवा किसी को दान देने के लिए हथेलियों की यही मुद्रा मान्य है। जाहिर है वह वस्तु जिसे अंजुरी में रखा जाता है भली भांति नुमायां होती है, स्पष्ट होती है अतएव प्रस्तुत होती है इसीलिए यह मुद्रा अंजुरी है। सुसंगतता, संतुलन या तादात्म्य के अर्थ में सामंजस्य शब्द भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है जो इसी कड़ी से जुड़ा है। अंञ्ज् के स्पष्ट होते ही समञ्जस् के अर्थ खुलते हैं और फिर असमंजस के साथ कोई असमंजस नहीं रह जाता।
ब बात दुविधा की। दुविधा का अर्थ भी पसोपेश में पड़ना होता है। अनिर्णय की स्थिति को दुविधा कहते हैं। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए जब एकाधिक संभाव्य विकल्प मौजूद हो तो असमंजस की स्थिति बनती है, यही दुविधा है। दुविधा शब्द का दुबधा रूप भी लोकशैली में प्रचलित है। दुविधा बना है द्वि + विधा से। द्वि अर्थात दो और विधा यानी राह, रास्ता, रीति या विकल्प। संस्कृत का विधा शब्द बना है विध् धातु से जिसमें चुभोना, काटना, सम्मानित करना, पूजा करना, राज्य करना जैसे भाव हैं। विध् का ही एक रूप वेध भी है जिसमें छेद करना, प्रवेश करना, चुभोना का भाव है। बींधना या बेधना जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं। मोटे तौर पर विध् में राह, परिपाटी या रीति का भाव है। प्राचीन मानव ने पत्थरों पर उत्कीर्णन के जरिये ही खुद को विविध रूपों में अभिव्यक्त किया था। लकीरें खींचने, कुरेदने में पहले नुकीले पत्थर माध्यम बने, फिर तीरों के सिरे और फिर तराशने के महीन औजारों से यह काम हुआ। लकीर ही राह या रास्ते का पर्याय बनी। बाद में विकल्प, समाधान, रीति और तरीका के रूप में भी राह, रीति जैसे शब्द को नई अभिव्यक्त मिली। द्विविधा में किसी बात के दो समाधान या दो रूपों का ही भाव है। जाहिर है सत्य तो एक ही है। चुनाव अगर एक का करना है तब द्विविधा स्वाभाविक है। यही दुविधा है। प्रणाली, अनुष्ठान, रीति या तरीका के अर्थ में विधि का अर्थ भी यही है। विधि-विधान शब्द भी यहीं से आ रहा है। किसी बिध मिलना होय…में मिलने की राह तलाशने की जो उत्कंठा व्यंजित हो रही है उसका सूत्र इसी विध् से जुड़ता है। नियम, रीति, कानून के अर्थ मे विधान शब्द का मूल भी यही विध् है। आप्टे कोश इसका मूल वि+ धा बताता है किन्तु यह सिर्फ व्याकरिणक आधार है। दरअसल विधान के मूल में भी विध् धातु ही है। स्वाभाविक है कि नियम संहिता के अर्थ मे संविधान जैसा शब्द, जिसकी आत्मा में रीति-नीति बसती है, के जन्मसूत्र भी यहीं मिलते हैं।
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