Sunday, October 31, 2010

प्रभा खेतान और ‘पीली आंधी’

logo_thumb20[2]रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है सुप्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान के चर्चित उपन्यास पीली आंधी को। प्रभाजी की स्त्री उपेक्षिता कॉलेज के ज़माने में पढ़ी थी। उसके बाद उनकी किसी कृति से गुज़रना न हुआ। उनकी कई किताबें चर्चित हूईं। बरसों बाद अब जाकर उनके कथा साहित्य को पढ़ना शुरू कुया है जिसकी कड़ी में अभी अभी इस उपन्यास को हमने पूरा किया है। प्रभाजी के बारे में विस्तार से सफ़र के पाठकों को बताने के लिए जेब नेट को खंगाला तो ख्यात समालोचक अरुण माहेश्वरी के ब्लाग कलम पर पहुँचना हुआ। अरुणजी ने प्रभाजी निधन के बाद अपने ब्लॉग पर एक संस्मरण लिखा था, उसका ही एक अंश है यह पुस्तक चर्चा। पीली आंधी के बारे में इससे बेहतर परिचय और कुछ नहीं हो सकता था, जैसा अरुणजी ने लिखा, सो हम साभार वही अंश यहा दे रहे हैं। किताब राजकमल ने प्रकाशित की है। पुस्तकों के शौकीनों को हम इसे अपने संग्रह में शामिल करने की सलाह देंगे।...

पी
ली आंधी' में प्रभा जी ने सोमा के जिस चरित्र की रचना की थी, वह शायद उन्हींका अपना काम्य व्यक्तित्व रहा होगा जो अपने
dr.prabhakhaitanख्यात लेखिका प्रभा खेतान अपने वक्त से बहुत आगे थीं। लेखन के क्षेत्र के साथ वे  उद्योग जगत की भी जानी मानी हस्ती थीं। कोलकाता चैम्बर ऑफ कामर्स की वे एकमात्र महिला अध्यक्ष थीं। उनके बारे में विस्तार से पढ़ें यहाँ…और विकिपीडिया पर भी। 
मारवाड़ीपन की ग्रंथी को झटक कर अपने पैसे वाले नपूंसक मारवाड़ी पति को ठुकरा देती है और एक बंगाली प्रोफेसर के साथ घर बसाती है। यहां पीली आंधी के बारे में थोड़ा विस्तार से चर्चा करना उचित होगा, क्योंकि यही एक ऐसा उपन्यास है जिसे प्रभाजी के जीवन-काल की बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। यह उपन्यास दो हिस्सों में है। इसके प्रथम हिस्से का मुख्य चरित्र है माधोबाबू जिसने राजस्थान से आकर कोलकाता के निकट धनबाद-रानीगंज-झरिया के इलाके में अपनी कोयला खदानों का साम्राज्यफैलाया था और इसी उद्यम में वह खप गया था। मृत्यु के वक्त भी माधोबाबू आंख बंद किये यही सोच रहा था कि ''बीमार हूं, लोग कहते हैं थोड़े दिन के लिये बनारस हो आइये, मन बदल जायेगा। नहीं, मुझे यहां रानीगंज में ही अच्छा लगता है। यहां से पड़ा-पड़ा कोयला खान को देखता रहता हूं ...इतना पैसा इतनी ठाट-बाट।'
माधो बाबू की यह मानसिकता वैसी ही थी जिसे इतालवीं मार्क्सवादी विचारक ग्राम्शी ने फोर्डवाद की संज्ञा दी थी। फोर्डवाद उम्र की आखिरी घड़ी तक कर्मलीन मुनाफे और अपनी पूंजी के साम्राज्य-विस्तार की सीमाहीन लिप्सा को मूर्तिमान करने वाली प्राणीसत्ता का सिध्दांत है। माधो बाबू इसी के एक लघु भारतीय संस्करण थे। माधो बाबू तो कोलियरियों का साम्राज्य फैलाने में ही मर-खप गये, लेकिन अपने पीछे उन्होंने अन्य मानवीय गुण-दोष वाले जिंदा लोगों का एक पूरा परिवार छोड़ा था। 'पीली आंधी' उपन्यास का दूसरा भाग ऐसे ही बाकी के मानवीय चरित्रों को लेकर है।  माधो बाबू अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद राजस्थान में अपने गांव से अपने से काफी कम उम्र की एक लड़की पद्मावती को ब्याह लाये थे। उम्र में कम होने पर भी पद में बड़ी होने के नाते पद्मावती माधोबाबू और उनके छोटे भाई सांवर के परिवार में उनके जीवित काल में ही अपना केंद्रीय स्थान बना लेती है। माधोबाबू का एक विश्वस्त गुमाश्ता था पन्नालाल सुराणा, उनके पुराने सेठ की गद्दी के मुनीम म्हालीराम का इंजीनियर बेटा। माधो बाबू ने अपनी जायदाद की आधी पाती पद्मावती को दी थी और मरते वक्त सुराणा को कहा था कि वे पद्मावती के हितों का ध्यान रखेंगे। माधोबाबू के अपनी कोई संतान नहीं थी।
पन्यास के दूसरे हिस्से में माधोबाबू के भाई सांवर का भरापूरा परिवार है जो कोलकाता में बस गया है। पद्मावती इस परिवार की ताईजी के रूप में परिवार की केंद्रीय धुरी होती है। लेकिन इस ताईजी के व्यवहार में अजीबोगरीब विरोधाभास दिखाई देते हैं। ऊपर से तो वे एक टिपिकल संयुक्त वाणिज्यिक परिवार की तमाम नैतिकताओं के संरक्षण का केंद्र दिखाई देती है, लेकिन जब उनकी मृत्यु होती है तो वे अपनी सारी संपत्ति सांवर के छोटे बेटे की उस बहू सोमा के नाम लिख जाती है जो अपने नपूंसक पति से विद्रोह करके एक बंगाली प्रोफेसर के साथ रहने के लिये घर छोड़ देती है, और जिसे घर का दूसरा कोई भी कभी अपना नहीं पाता है। सोमा अपनी ताईजी की संपत्ति तो नहीं लेती लेकिन लाल कपड़े में बंधी ताईजी की उस पुस्तक को ले जाती है जिसे घर के सभी लोग गीता समझते थे। दरअसल वह किताब गीता नहीं बल्कि पन्नालाल सुराणा की निजी डायरी थी जिसमें उन्होंने पद्मावती के साथ अपने Piili aandhiअंतरंग संबंधों के बारे में लिखा था। उपन्यास के अंत में इसी डायरी की चर्चा से ताईजी के चरित्र की अपनी खासियत पर से पर्दा उठता है और यह भी जाहिर होता है कि क्यों संयुक्त परिवार की सामंती नैतिकताओं की प्रतीक बनी पद्मावती व्यक्ति सोमा के मर्म को समझने में समर्थ हुई थी।
'पीली आंधी' पर एक बार प्रभाजी के घर में बात हो रही थी और तब प्रभाजी ने बताया था कि उनके इस उपन्यास को उनके संपर्क के कई मारवाड़ी मित्रों ने मारवाड़ी समाज की निंदा कहा था। ताईजी अर्थात पद्मावती और सोमा का चरित्र ऐसे लोगों को नागवार गुजर रहा था। संभवत: प्रभाजी की इसी 'गलती' को दुरुस्त करने के लिये अलका सरावगी ने 'कलिकथा वाया बाईपास'' के जरिये उसी कथानक का नया पाठ तैयार किया। उस उपन्यास का केन्द्रीय चरित्र है किषोर बाबू, माधो बाबू का एक नैतिक प्रतिरूप। किशोर बाबू माधो बाबू की तरह धन कमाने की धुन में मरता नहीं है, अपनी नैतिकता का झंडा बुलंद करने के लिये मरते हुए भी बाई पास सर्जरी से जी उठता हैं। उपन्यास के अन्य सारे चरित्र किशोर बाबू की धुरी पर घूमते रहते हैं। किशोर बाबू तमाम 'श्रेष्ठताओं' का पुंज होता है और, इसीसे 'मारवाड़ी श्रेष्ठता' का एक पूरा आख्यान लिख दिया जाता है। जाहिर है 'जातीय श्रेष्ठता' के किसी आख्यान में पद्मावती, सोमा तो दूर की बात, किसी भी स्वतंत्र और स्वावलंबी नारी चरित्र के लिये कोई स्थान नहीं हो सकता था। और बिल्कुल वैसा ही हुआ भी। इस बारे में यही कहना चाहूंगा कि तमाम कलात्मक मुलम्मों के बावजूद नकल नकल ही रहती है। जीवन के किसी बृहद परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करने की आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टिै खुद में एक सृजनात्मक उपलब्धि है, इसे सिर्फ किसी नयी पैकेजिंग का मामला भर नहीं बनाया जा सकता है। प्रभाजी ने इस आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टिक‍ को अर्जित किया था। 'पीली आंधी' के पद्मावती और सोमा के 'विरासत' के प्रसंग ने प्रियम्वदा बिड़ला की वसीयत से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण के वक्त इस लेखक को अनायास ही उस उपन्यास की याद दिला दी थी और 'एक वसीयत दो उपन्यास' की तरह की टिप्पणी लिखी गयी थी। [अरुण माहेश्वरी के ब्लॉग क़लम से साभार]
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Wednesday, October 27, 2010

गच्चा देना, चूना लगाना!!

मेरा अनुमान है कि मूलतः ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही संस्कृत के खच् और फ़ारसी के गच् का विकास हुआ होगा। field
कि सी को ठग लेने या आर्थिक नुकसान पहुंचाने के अर्थ में हिन्दी में अक्सर चूना लगाना मुहावरे का इस्तेमाल होता है। चूना लगाना मुहावरे का शाब्दिक अर्थ है वही है जो सीधे सीधे समझ में आता है। यह चूना पान में लगाया जा रहा है या इमारत की तामीर में इस्तेमाल हो रहा है, कुछ साफ़ नहीं है। इसी तरह एक अन्य शब्द है गच्चा देना या गच्चा खाना। यह गच्चा कैसे लगता है या कैसे खाया जाता है यह भी स्पष्ट नहीं होता। इनका अर्थ जानने से पहले पहले एक अन्य शब्द की बात करते हैं जिसका रिश्ता गच्चा और चूना दोनों ही शब्दों से है। मराठी में छत के लिए आमफ़हम शब्द है गच्ची। महाराष्ट्र से सटते मध्यप्रदेश के एक बड़े इलाके की हिन्दी में भी गच्ची शब्द आमतौर पर समझा और बोला जाता है। संभव है कुछ अन्य हिन्दीभाषी क्षेत्रों मे भी इसका इस्तेमाल होता रहा हो। गौरतलब है कि मराठी पर फ़ारसी-शब्दों का प्रभाव हिन्दी से भी ज्यादा है यहाँ तक की मराठी व्याकरण पर भी इसका असर दिखता है। फ़र्क़ यही है कि हिन्दी में जहाँ उर्दू-फ़ारसी-अरबी के शब्द स्पष्ट पहचाने जाते हैं वहीं मराठी में व्यवहृत अरबी या फ़ारसी के शब्दों में अक्सर ख़ूबसूरत रूपांतर हो जाता है।
हिन्दी-मराठी के गच्ची शब्द को मूलतः इंडो-ईरानी भाषा वर्ग में रखना चाहिए। इस शब्द का मूल है फ़ारसी का गच शब्द जिसका रूढ़ अर्थ है चूना या प्लास्टर। एक अन्य शब्द है गची जिसका अर्थ है पक्का सफ़ेद फ़र्श या वह भूमि जहाँ से चूना निकाला जाता है। ध्यान रहे चूना एक महत्वपूर्ण भवन निर्माण सामग्री है और प्राचीनकाल से लेकर अब तक ईंट-पत्थरों को जोड़ने के काम आता रहा है। दीवारों पर पलस्तर करने के लिए बनाए जानेवाले मसाले का प्रमुख अवयव भी चूना ही है। अब यह काम सीमेंट से होता है जिसकी प्रमुख सामग्री भी चूना ही है। गची से ही मराठी-हिन्दी में गच्ची शब्द बनता है। पुरानी इमारतों में छत को मज़बूती प्रदान करने के लिए उस पर चूने की मोटी परत बिछाई जाती थी। चूने की छत से कमरे भी ठण्डे रहते थे। पक्के सफ़ेद फ़र्श का भाव छत में स्पष्ट हो रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि वृहत प्रामाणिक हिन्दीकोश, हिन्दी शब्दसागर और ज्ञान शब्दकोश समेत हिन्दी के ज्यादातर शब्दकोशों में गच्ची शब्द की प्रविष्टि नहीं है अलबत्ता चूना-सुरख़ी से बने पक्के फर्श के तौर पर गच शब्द की मौजूदगी वहाँ है।
बसे पहले देखते हैं कि गच में चूने की अर्थवत्ता कहाँ से आ रही है। दरअसल फ़ारसी के गच और संस्कृत की खच् धातु में रिश्तेदारी है। खच् में जकड़ना, बांधना, जड़ना, गडमड करना, मिलाना जैसे भाव हैं। रत्नज़ड़ित के अर्थ में ही रत्नखचित शब्द युग्म भी प्रचलित है जिसका अर्थ है जिसमें रत्न जड़ा हुआ है। खच का ही एक अन्य रूप है खज् जिसमें भी यही भाव हैं। फ़ारसी दरअसल पहलवी से निकली है जिसमें गच का पूर्व रूप खच् ही है। जॉन प्लैट्स के कोश के अनुसार ज़ेंद में इसका रूप है घच। स्पष्ट है कि ये सभी ध्वनियाँ वर्णक्रम की हैं और एक दूसरे में परिवर्तित हो रही हैं। भवन निर्माण सामग्री में चुनाई का मसाला बनाने के लिए चूने में विभिन्न पदार्थ मिलाए जाते हैं। कृ.पा. कुलकर्णी के अनुसार फ़ारसी के गच शब्द का अर्थ है ठूँस कर भरा गया चूना। गच का तुर्की रूप है गज और चीनी रूप है कच मतलब है चूना। पुराने ज़माने में ईरानी वास्तुकला में दीवारों पर पलस्तर करने की एक ख़ास तकनीक को गचकारी कहते थे। ईरान कल्चर हाऊस के फ़ारसी-हिन्दी कोश में गचकारी का अर्थ पलस्तर पर फुलकारी बताया गया है। पलस्तर करनेवाले को गचमाल, गचगीर या गचकर कहते हैं। कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी कोश फ़ारसी में गच्ची की प्रविष्टि दो तरह से दी हुई है। एक वह भूमि जिस पर चूने का पलस्तर किया गया है और दूसरी के मुताबिक वह जगह जो खाली न हो। जाहिर है दो ईंटों के बीच चुनाई के लिए रखे गए खाली स्थान में ठूँस ठूँस कर भरा गया मसाला उस स्थान को खाली कहाँ रहने देता है?
ID3BD00Zदीवार और फ़र्श की सतह को ठोस, हमवार और मज़ूबत बना देने वाला गच् यानी चूना का पुराने ज़माने में वही महत्व था जो आज के ज़माने में सीमेंट का है। सीमेंट से बने पक्के मकान आज भी महँगे होते हैं और देहातों में इसका इस्तेमाल कम ही होता है। इसी तरह पुराने ज़माने में चूने का इस्तेमाल धनिकों की कोठियों में होता था या राजाओं के महलों में। आमजन के घर तो पत्थर-मिट्टी से ही बनते थे। चूना हर कहीं उपलब्ध नहीं होता और उस दौर में तो उसकी ढुलाई करना ही बेहद खर्चीला काम था। चूने का प्रयोग यानी मकान की पुख़्तगी की गारंटी। ज्यादा चूना यानी ज्यादा पुख़्तगी। जाहिर है ज्यादा चूना ही ही मकान की लागत भी बढ़ाता होगा। इसी परिस्थिति में चूना लगाना मुहावरा जन्मा होगा। भ्रष्टाचार हर काल में रहा है। बाद के दौर में ठेकेदार द्वारा मकान में कम चूने का इस्तेमाल करने के बावजूद मज़बूती के क़सीदे पढ़ने के मामले बढ़े होंगे। यह आज भी होता है जब कि चूने की जगह सीमेंट इस्तेमाल होता है। इसी से कहावत चल पड़ी होगी-कितने का चूना लगाया? प्रसंगवश संस्कृत के चूर्ण से ही बना है चूना जिसका अर्थ है पिसा हुआ, महीन पदार्थ।  एफजे स्टैंगास के कोश में भी गच् का अर्थ भी चूने के पलस्तर वाली ज़मीन ही बताया गया है। गच शब्द का प्रयोग कई तरह से होता है। ठूँस ठूँस कर खाने, गले गले तक पेट भरने के लिए भी गच शब्द का प्रयोग होता है। गचागच यानी ऊपर तक भरा हुआ। कई जगह गच का प्रयोग ध्वनिअनुकरण की तरह भी होता है।
मेरा अनुमान है कि मूलतः ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही संस्कृत के खच् और फ़ारसी के गच् का विकास हुआ होगा। गीली सतह पर पैर या किसी ठोस वस्तु के गिरने से भी गच, खच या फच ध्वनि होती है। इससे ही बना है गचाका यानी गिरना। धोखा देने के अर्थ में गच्चा खाना मुहावरा इसी से आ रहा है। गच्चा खाना में जहाँ असावधानीवश नुकसान उठाने का भाव है, वहीं गच्चा देने में जानबूझकर नुक़सान पहुँचाने या धोखा देने का भाव है। मराठी में गच्चा शब्द की अर्थवत्ता थोड़ी और विस्तृत है। इसमें झटका या धक्का देने या खाने का भाव है। इसके अलावा इसका अर्थ खड्डा भी होता है। शरीर में चाकू या तलवार धँसने पर भी खच् या गच् ध्वनि होती है। कृ.पा. कुलकर्णी गच्चा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की गम् या इसके वैदिकी रूप गध् से बताते हैं- गध् > गज > गच के क्रम में इसका विकास हुआ होगा। कीचड़ या चिपचिपी सतह पर कुछ गिरने की वजह से उपजी खच् या गच् ध्वनि का विकास बाद में जड़ने, बांधने या जकड़ने जैसे भावों में हुआ। गौर करें कि दलदल या कीचड़ में कोई भी वस्तु जकड़ ली जाती है और सूखने पर वह वस्तु वहीं पैबस्त हो जाती है। गौर करें कि कीचड़ भी कीच से बना है जो इसी खच्, कच्, गच् वाली शब्द शृंखला का हिस्सा है। कीचड़ से ही मनुष्य को भवन निर्माण के लिए मसाला बनाने की युक्ति सूझी होगी और इसमें चूने का इस्तेमाल होने लगा होगा।
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Monday, October 25, 2010

एक कलश पाकिस्तान में

puja3पिछली कड़ियाँ-1.कलश और कैलाश की रिश्तेदारी 2.कलश, कलीसा और गिरजाघर

लश के में निहित ऊंचाई का भाव प्रकाश, चमक और कांति से भी जुड़ता है। वर्ण का जलतत्व से रिश्ता है और जल की मेघ अथवा पर्वत से रिश्तेदारी में प्रकारांतर से ऊंचाई ही प्रकट होती है। विभिन्न स्रोतों को टटोलने पर पता चलता है कि अलग अलग भाषा परिवारों से जुड़े कई प्राचीन समाजों मसलन सेमेटिक, द्रविड़ या भारोपीय परिवारों की भाषाओं में कल् धातु मौजूद रही जिसमें ऊंचाई, चमक, सौन्दर्य अथवा जलतत्व का भाव था। रामविलास शर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक भारत के भाषा परिवार के तीसरे खण्ड में दी गई शब्द सूची के अनुसार संस्कृत में कल् धातु का अर्थ पर्वत भी होता है जिसमें ऊंचाई का भाव निहित है। इससे बने कलिंग का मतलब हुआ पर्वतीय प्रदेश। तमिल में कल का अर्थ पत्थर होता है। लिथुआनी में भी कल्नस् का अर्थ पहाड़ है। गौरतलब है कि लिथुआनी का संस्कृत से साम्य है। लैटिन के कल्कुलुस् का अर्थ छोटा पत्थर होता है। कल्लिस यानी पथरीली राह और कल्लओ यानी संगदिल होना है। संस्कृत में कलिन्द यानी एक विशेष पर्वत होता है। ब्राहुई में ख़ल यानी पत्थर। जाहिर है इन सभी शब्दों में पहाड़ से रिश्तेदारी के तत्व मौजूद हैं और पहाड़ का सीधा संबंध ऊंचाई से है।
सी कल् धातु का रिश्ता जुड़ता है पश्चिमोत्तर पाकिस्तान स्थित हिन्दुकुश पर्वतमाला में बसे चित्राल इलाके के कलश क्षेत्र से जिसे यह नाम यहाँ रहनेवाली कलश जनजाति के कारण मिला है। कलश जनजाति को यह नाम क्यों मिला इसके पीछे दो धारणाएँ हैं। विभिन्न वेब सूत्रों में कलश नामकरण के पीछे इस जनजाति के लोगों द्वारा काले परिधान धारण करने को मुख्य वजह माना जाता है। इस जनजाति के जो भी चित्र मिलते हैं उन्हें देखने से यह तथ्य सत्यापित भी होता है। मगर इस बात की पुष्टि भाषाविज्ञान के जरिए नहीं होती। कलश भाषा इंडो यूरोपीय परिवार की इंडो ईरानी शाखा से संबद्ध है और इसे दरद परिवार की भाषा कहा जा सकता है। संस्कृत में काल का अर्थ काला भी होता है और समय भी। इसी तरह कल् धातु धातु से बने कलंक के मायने भी काला धब्बा होता है। मगर इससे कलश लोगों के श्यामवर्णी परिधान पहनने की गुत्थी नहीं सुलझती। ज्यादातर भौगोलिक-भाषायी संदर्भ कलश को इलाकाई और नस्ल के आधार पर प्रचलित शब्द मानते हैं। पाकिस्तान के जिस हिस्से को आज नूरीस्तान कहते हैं उसका ऊँचाई वाला हिस्सा ही कलश है।
गौर करें नूरीस्तान यानी नूर+स्तान (स्थान) के अर्थ पर जिसका अर्थ है रोशनी का स्थान। नूर का अर्थ चमक, कांति भी होता है। कलश में व्याप्त उच्चता, शिखर अथवा पराकाष्ठा के भाव पर गौर करें। पिछली कड़ी में कल् धातु के जलवाची भाव की व्याख्या हो चुकी है जिससे स्पष्ट है कि कलश में मेघालय, हिमालय जो जल के आगार हैं का भाव विद्ममान है। कलश के रूढ़ अर्थ
kalash... कलश मूलतः उत्तर पश्चिमी एशियाई पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हैं। कुर्दों से उनके नैन नक्श मिलते हैं। यूँ भी कश्मीर से लेकर कुर्द तक जितने भी पर्वतीय जन हैं, अगर उनमें मंगोल नक्श को अलग कर दिया जाए तो वे एक जैसे ही नज़र आते हैं। ...
घट में यही जल के भंडार का भाव समाया है। कलश क्षेत्र के पहाड़ों पर सदा बर्फ जमी रहती है जिसमें कलश जैसी चमक भी है। स्पष्ट है कि कलश का नूरीस्तान नाम दरअसल कलश का शाब्दिक अनुवाद है जिसमें ऊंचाई, जल और चमक का भाव निहित है। कलश चूँकि भारत-ईरानी परिवार की भाषा है माना जा सकता है कि अगर पूर्वी हिमालय क्षेत्र के एक हिस्से को कैलाश नाम मिल सकता है तब पश्चिमी हिमालय के एक क्षेत्र को स्थानीय बोली में कलश या कलाशा कहा जा सकता है। अलग अलग भाषायी क्षेत्रों के बावजूद यहां की मूल आंचलिक बोलियों में कल् शब्द और उसकी समान अर्थवत्ता कायम रही होगी। स्पष्ट है कि इलाके को लोगों द्वारा काले वस्त्र पहनने के कुछ अन्य सामाजिक सांस्कृतिक कारण होंगे। किसी क्षेत्र विशेष का नामकरण वहां के निवासियों के परिधानों के आधार पर होने की मिसाल याद नहीं आती अलबत्ता रंग, संस्कृति, जाति या भाषा के आधार पर ही ज्यादातार भौगोलिक नामकरण करने का चलन रहा है। कलश भी एक पहाड़ी क्षेत्र है। कल् में व्याप्त उच्चता का भाव है। कलिंग का अर्थ भी पहाड़ी क्षेत्र है और कैलाश पर्वत से भी उच्चता उजागर है।
लश समुदाय को ग्रीक मूल का भी माना जाता है। इन्हें सिकंदर के उन सैनिकों का वंशज समझा जाता है जो यहीं बस गए थे। कम से कम पाकिस्तान का पर्यटन विभाग तो जोरशोर से इसकी पुष्टि करता है और जबसे नृतत्वशास्त्रियों और समाजविज्ञानियों ने इस ओर गौर करना शुरु किया, ग्रीस में भी कई समूह यही बात जोर शोर से प्रचारित करने लगे हैं। ग्रीक भाषा मे एक शब्द तलाशा गया है कैलोस KALLOS जिसका अर्थ है खूबसूरती, सौन्दर्य। थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि कलश की व्युत्पत्ति इस जनजाति के लोगों के अप्रतिम सौन्दर्य की वजह से मिली है। प्रश्न उठता है कि ग्रीस भी पहाड़ी क्षेत्र है तब इस यहां के किसी पहाड़ी क्षेत्र को कलश, कलाशा तो छोड़िए कैलोस नाम तक क्यों नहीं मिला? जाहिर है, यह सिर्फ़ ध्वनिसाम्य का मामला है। कलश मूलतः उत्तर पश्चिमी एशियाई पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हैं। कुछ संदर्भों में कुर्दों से भी उनका  रिश्ता जोड़ा गया है। गौर तलब है कि कुर्द मूलतः वह पहाड़ी क्षेत्र है जो ईरान, इराक और तुर्की तक फैला है। कुर्द क्षेत्र की भाषाएं ईरानी परिवार की हैं। यूँ भी कश्मीर से लेकर कुर्द तक जितने भी पर्वतीय जन हैं, उनके नैन नक्श में समानता है। ध्यान रहे, यहां हम मंगोल जाति के लोगों की बात नहीं कर रहे हैं। कलश क्षेत्र के पुराने शासकों के तौर पर नेट पर राजावई और बुलासिंह जैसे नामों से भी यही साबित होता है कि यह क्षेत्र मूलतः वृहत्तर भारतीय क्षेत्र के निवासी हैं और इनकी भाषा का रिश्ता इंडो ईरानी परिवार से है। यह वही शाखा है जिसमें वैदिकी, अवेस्ता, संस्कृत, फ़ारसी, हिन्दी और उर्दू आती हैं।
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Sunday, October 24, 2010

आइए, कलामे रूमी से रूबरू हो लें…

logo_thumb20[2]रविवारी पुस्तक चर्चा को एक लम्बे अंतराल के बाद फिर शुरु किया जा रहा है। इस बीच शब्दों का सफ़र पर भी अंतराल रहा। चंदूभाई का बकलमखुद भी अभी अधर में है। बहरहाल इस बार हम लेकर आए हैं अभय तिवारी की हाल में प्रकाशित किताब कलामे रूमी जिसे हम लगातार टटोल रहे थे, पर लिखने का मौका अब जाकर आया है। किताब को हिन्द पॉकेटबुक्स ने प्रकाशित किया है। करीब 300 पेज की इस क़िताब की कीमत है 195 रुपए। पुस्तकों के शौकीनों को हम इसे अपने संग्रह में शामिल करने की सलाह देंगे।...

प्रे म और मानवतावाद के महान गायक रूमी पर एक महत्वपूर्ण क़िताब हाल ही में आई है जिसे लिखा है फिल्मकार, ब्लॉगर मित्र अभय तिवारी ने। तेरहवीं सदी में पैदा हुए रूमी का नाम इक्कीसवीं सदी की चमक-दमक भरी दुनिया में गैर अदबी तबीयतवालों में भी बतौर फ़ैशन इसलिए लिया जाता है ताकि उनकी चमक कुछ बढ़ जाए। रूमी की अदबी शख्सियत तो खैर कब की सरहदों से पार हो चुकी है। खुद अभय तिवारी किताब के बैक कवर पर लिखते हैं, “तुर्की से लेकर हिन्दुस्तान तक छाए रहने के बाद आज रूमी अमेरिका और यूरोप के मानस Kalame_Rumi cको सम्मोहित किए हुए हैं तो यूँ ही नहीं” रूमी को आसानी से समझने के ख्वाहिशमन्दों के लिए यह किताब बेहद ज़रूरी है और जो उन्हें नहीं जानते, उनके लिए यह क़िताब वह रास्ता है जिसके आख़िर में इश्क, इन्सानियत, इल्म और फ़लसफ़े का रूमी दरवाज़ा खुलता है और नज़र आते हैं सिजदे में झुके रूमी। अफ़गानिस्तान के बल्ख शहर में रूमी पैदा हुए और राजनीतिक उथलपुथल के चलते उनका परिवार तुर्की के कोन्या शहर में जा बसा। तुर्की में कभी रोमन साम्राज्य का सिक्का चलता था लिहाज़ा पश्चिमी दुनिया में यह इलाक़ा रूम कहलाता था। रूमी भी जब मशहूर हुए तो उपनाम के तौर पर यह रूमी उनकी शख्सियत के साथ चस्पा हो गया, यूँ वे अपने जन्म स्थान के नाम पर बल्ख़ी भी थे, पर उसे वे छोड़ आए थे।
देखा जाए तो प्रस्तुत पुस्तक जिसका नाम कलामे रूमी है, रूमी की कालजयी कृति मसनवी मानवी, जिसे बोलचाल में मसनवी कहते हैं, की चुनी हुई रचनाओं का सरलतम काव्यानुवाद है। मगर इस क़िताब की सबसे बड़ी ख़ूब मेरी निग़ाह में भूमिका है, जिससे गुज़रकर ही उस काव्यानुवाद का महत्व पता चलता है। मसनवी के हिन्दी काव्यानुवाद पर आज़माइश करने के लिए अभय ने पहले फ़ारसी सीखी। हालाँकि ऐसा करना उनके लिए कतई ज़रूरी नहीं था, क्योंकि अंग्रेजी के अनेक पद्यानुवाद और गद्यानुवाद मौजूद थे, जिनके जरिए वे रूमी को हिन्दी में उतार सकते थे। कविता या कहानी किसी भी शक्ल में। मगर उन्होंने फ़ारसी की ज़मीन पर उतर कर ही रूमी को पहचानने की कठिन कोशिश की। अभय की यह कोशिश रंग लाई है और ख़ासकर साहित्यिक अभिरुचि वाले उन हिन्दी भाषी पाठकों के लिए जो शायद ही अंग्रेजी में रूमी को पढ़ते, फ़ारसी सीखने की तो कौन कहे?
यूँ अभय अपने अनुवाद को कई मायनों में फ़ारसी से अंग्रेजी में हुए अनवाद से बेहतर मानते हैं, पर एहतियातन यह भी कहते हैं, “निश्चित ही मेरे इस अनुवाद को देखकर तिलमिलाने वाले लोग होंगे और वो मुझसे बेहतर अनुवाद करेंगे, ऐसी उम्मीद है।” अभय के अनुवाद की सबसे अच्छी बात हमें जो लगी वह यह कि यह सरल ही नहीं, सरलतम् है। कविताई के चक्कर में वे नहीं पड़े हैं। आमतौर पर शायरी की बात आते ही लोग रदीफ़ो-काफ़िया के फेर में पड़ जाते हैं। मगर जब खुद रूमी इस सिलसिले से दूर थे तो अभय क्या करते? अभय लिखते हैं कि रूमी की गज़लों में कोई बुनावट नहीं, कोई बनावट नहीं। फ़ारसी शायरी की काव्यगत बारीकियाँ हूबहू उतारने की कोशिश उन्होंने नहीं की, वर्ना इस क़िताब को आने में अभी कई साल लग जाते। एक मिसाल देखिए। रूमी का मूल फ़ारसी शेर है- बशनौ इन नै चूँ शिकायत मी कुनद। अज़ जुदाई हा हिकायत मी कुनद।। यानी- सुनो ये मुरली कैसी करती है शिकायत। हैं दूर जो पी से उनकी करती है हिक़ायत।। अभय ईमानदारी से कहते भी है कि रूमी के सम्पूर्ण अनुवाद का लक्ष्य उनकी कुव्वत से बाहर था।
रूमी को समझने के जितने पहलू हो सकते थे, यह क़िताब काफ़ी हद तक उन तक पहुँचाती है। बतौर मज़हब, कुरआन की नसीहतों के संदर्भ में सूफ़ी मत, उसकी अलग अलग शक्लों और उससे जुड़ी शख्सियतों से क़िताब बख़ूबी परिचित कराती है। जैसा कि होता है, महान लोगों के जीवन में घटी हर बात महान होती जाती है, उनके दीग़र मायने निकाले जाने लगते हैं। नसीहतों से शुरू होकर बात दिलचस्प क़िस्सों में
एक फिल्म देखने के नाम पर पांच सौ रुपए खर्च कर देने वाले मध्यमवर्ग के पास अगर पांच सौ रूपए भी ताज़िंदगी साथ निभानेवाली क़िताब के लिए नहीं निकलते तब खुद पर शर्म करने के अलावा और क्या किया जा सकता है। Kalame_Rumi c
ढल जाती है। इसका फ़ायदा यह होता है कि उस क़िरदार के आध्यात्मिक विचारों का प्रचार कुछ अतिरंजित शक्ल में ही सही, आमजन तक होता है। इस तरह वह व्यक्ति लोकपुरुष के रूप में भी स्थापित होता है। रूमी के क़िस्सों को पढ़ते हुए आपको लगातार ऑफेन्ती, खोजा नसरुद्दीन याद आते रहेंगे। क़िस्सागोई के इन दो महान क़िरदारों की कुछ कहानियों से रूमी के क़िस्सों का घालमेल हुआ है। साफ़ है कि यहाँ लोक तक पहुँचनेवाली नैतिक शिक्षा का महत्व है। कहीं वह रूमी के नाम से पहुँची, कहीं ऑफेंन्ती के तो कहीं नसरुद्दीन के नाम से। रूमी की शायरी भी कुछ इस अंदाज़ में सामने आती है कि जो समझ ले उसके लिए रूहानी, इश्किया और सूफ़ियाना अनुभव और चाहे तो कोई उसे क़िस्सा कहानी जान ले। ईश्वरीय ज्ञान की बात समझाते हुए कभी रूमी अचानक दो धोबियों को माध्यम बना लेते हैं- देखो उन दो धोबियों को साथ करते काम। बिलकुल हैं उलट एक दूसरे से नज़रे आम।। लगते हैं ये दोनों एक दूसरे के दुश्मन। मगर एक दिल है एक जाँ, उनमें एकपन।। या फिर-किसी शाह ने एक शेख़ से बोला कभी। मांगते हो क्या मुझसे, ले लो अभी।। हर सूफ़ी की तरह रूमी का ईश्वर ही उसका प्रेमी है। उनके एक शेर का अनुवाद अभय ने देखिए किस खूबसूरती से किया है- मैं दुनिया से लूँ न कुछ बस तुझे चुनूँ। सही मानते हो कि मैं ग़म को ही गुनूँ? दुखों में ही प्रेम का सुख पाया जाता है, यह बात हर दर्शन, हर मज़हब का मूल है। रूमी यही बात कुछ इस अंदाज़ में कहते हैं कि लोग मुरीद हो जाते हैं उनके।
भय हमारे मित्र हैं और कुछ ख़ास भी। यह जगह उनके लिए हमारी अनुभूतियाँ बताने के लिए नहीं हैं, पर इस क़िताब को पढ़कर उनके लिए यह कहने की इच्छा ज़रूर है- जियो प्यारे। किताब बहुत सस्ती है। हम कहेंगे कि किताबें अब सस्ती हो गई हैं। एक फिल्म देखने के नाम पर मल्टीप्लैक्स में जाकर हजार रुपए खर्च कर देने वाले मध्यमवर्ग के पास अगर पाँच सौ रूपए भी ताज़िंदगी साथ निभानेवाली क़िताब के लिए नहीं निकलते तब खुद पर शर्म करने के अलावा और क्या किया जा सकता है। वैसे कलामे रूमी का मूल्य सिर्फ 195 रुपए है। हिन्द पॉकेट बुक्स ने इसे बड़े करीने से छापा है। प्रूफ़ की ग़लती न के बराबर है। एक कमी का ज़िक़्र ज़रूर करना होगा। हर काव्यानुवाद से पहले अगर ग़ज़ल के सिर्फ़ पहले शेर का ही मूल फ़ारसी रूप देवनागरी में दे दिया जाता तो अभय का श्रम भी लगातार पाठकों की आँखों के आगे होता और क़िताब को चार चांद लग जाते। मुमकिन हो, तो प्रकाशक को अगले संस्करण में ऐसा कर लेना चाहिए। सफ़र के साथियों को क़िताब ख़रीदने की सलाह दूंगा।

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Saturday, October 23, 2010

कलश, कलीसा और गिरजाघर

churchपिछली कड़ी-कलश और कैलाश की रिश्तेदारी

हि न्दू विधि-विधानों में मांगलिक कार्य से पूर्व घट या कलश स्थापना kalash sthapana का बड़ा महत्व है। संस्कृत के क वर्ण में जल का भाव है। कलश का अर्थ हुआ जो जल से सुशोभित है। संस्कृत हिन्दी में कलस और कलश दोनों रूप प्रचलित हैं।  हिन्दू धर्मकोश में कालिकापुराण के हवाले से उल्लेख है कि जब देवों और असुरों के बीच अमृत मन्थन हो रहा था तब अमृत धारण करने के लिए विश्वकर्मा ने देवताओं अलग अलग कलाओं को एकत्र कर कलश का निर्माण किया था जिससे इसे यह नाम मिला। कलां कलां गृहित्वा च दानं विश्वकर्मण। निर्मितोSयं सरैर्यस्मात् कलशस्तेन उच्यते।। कलश को पृथ्वी का प्रतीक भी माना जाता है और मांगलिक कार्यों में कलश स्थापना के पीछे पृथ्वी की पूजा का ही भाव है। पृथ्वी जो आकाशीय जल को धारण करती है। बाद में कलश पूजा के साथ विभिन्न देवों के आह्वान का भाव भी जुड़ गया।
लश स्थापना दरअसल वरुण की पूजा है। कलश का महत्व इसी बात से आँका जात सकता है कि इसके मुख में विष्णु, ग्रीवा में शंकर, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगणों की स्थिति मानी गई है। कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्रळ समाश्रित:, मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:। यह भी कहा गया है कि सभी वेद, नक्षत्रगण, सभी दिक्पाल अर्थात दिग्गजों की व्याप्ति में कलश में होती है। कलश में उच्चता, पराकाष्ठा और शिखर का भाव भी है। यहां भी जलतत्व का संकेत ही है जो आकाश से बरसता है। जिसे बादल धारण करते हैं। पर्वतशिखर हिम से वेष्टित होते हैं जो उसका कलश है। जल ही पृथ्वी पर समृद्धि और जीवन का कारक है इसीलिए प्रायः सभी मंदिरों-देवालयों के शिखर पर कलश स्थापित होता है जो सुख, समृद्धि और मंगल का प्रतीक होता है।
गूगल के शब्दचर्चा समूह में पिछले दिनों अमेरिका प्रवासी पंजाबी के कोशकार बलजीत बासी ने एक चर्चा के दौरान संभावना जताई की ईसाई प्रार्थनास्थल के लिए उर्दू में प्रचलित कलीसा शब्द का कलश से रिश्ता हो सकता है। इस पर विचार करने से पहले जानते हैं कलीसा शब्द के बारे में जो उर्दू में फ़ारसी से आया है। मूलतः कलीसा को अरबी लफ़्ज़ माना जाता है। भाषाविज्ञानी इसे सेमिटिक भाषा परिवार का नहीं मानते और सामी परिवार की भाषाओं में इसकी आमद प्राचीन ग्रीक के इक्कलेसिया ekklesia से मानते हैं। ग्रीक में इक्लेसिया का प्रचलित अर्थ है चर्च, ईसाइयों का पूजास्थल। द न्यू इंटरनेशनल डिक्शनरी ऑफ न्यू टेस्टामेंट के लेखक कोलिन ब्राऊन के अनुसार अंग्रेजी का चर्च शब्द दरअसल ग्रीक इक्लेसिया का अनुवाद है और यह धार्मिक शब्द न होकर राजनीतिक शब्दावली से जुड़ता है। ग्रीक इक्लेसिया दो शब्दों से मिलकर बना है एक ek यानी बाहर और कलेओ यानी kaleo यानी पुकारना। भाव हुआ लोगों का आह्वान करना, उन्हें बुलाना। ये कलेओ उसी शब्द शृंखला का हिस्सा है जिससे हिन्दी का कलपना, कलकल, कोलाहल, अंग्रेजी का  कैलेंडर और पंजाबी का गल जैसे शब्द बने हैं।
ग्रीइक्लेसिया दरअसल एक सामूहिक पंचायत होती थी जिसमें लोगों को मिल बैठकर किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया जाता था। ईसा खुद अपनी कौम के प्रमुख थे और उनकी सभाओं के लिए, इक्लेसिया शब्द का प्रयोग हुआ है। बाद में बाइबल के न्यू टेस्टामेंट में इसका अनुवाद बतौर चर्च हुआ। ईसा के बाद यह शब्द पूजास्थल के रूप में रूढ़ होता चला गया। इसका अरबीकरण हुआ कुछ यूं हुआ- इक्लेसिया > कलीसिया > कलीसा। हालाँकि कई विद्वानों का यह भी कहना है कि शुद्ध अरबी में कलीसा जैसा कोई शब्द नहीं मिलता। अरबी में ईसाई आराधनास्थल के लिए जो लफ़्ज़ है वह कनीसः है जिसका मूल स्त्रोत आरमेइक ज़बान है न कि ग्रीक। इसकी पुष्टि मद्दाह साहब के उर्दूकोश से भी होती है जिसमें कलीसा के नाम से कोई प्रविष्टि दर्ज़ नहीं है अलबत्ता कनीसः या किनीस ज़रूर दिया हुआ है
manglik3... कलश में स्पष्ट चिंतन है, दर्शन है, अध्यात्म है और अलग अलग संदर्भों में इसकी अर्थवत्ता और गहरी होती जाती है, जबकि चर्च, गिरजा या कलीसा सिर्फ़ आराधना स्थलों के नाम भर हैं...
जिसका अर्थ ईसाई उपासनाघर बताया गया है। कनीसिया इसका बहुवचन होता है। ईजे ब्रिल्स के फर्स्ट इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम में भी कलीसा का उल्लेख न होकर कनीसः का ही ज़िक्र है।
भारत में ईसाई पूजास्थल के लिए गिरजा या गिरजाघर शब्द खूब प्रचलित है जिसकी आमद हिन्दी में बरास्ता पुर्तगाली हुई। गिरजा का मूल भी इक्लेसिया ही है। ग्रीक से इसका स्पैनिश रूप हुआ इग्लेजिया iglelsia जहाँ से पुर्तगाली में यह हुआ इगरेजा igreja. पुर्तगाली जब भारत आए तो इसका एक नया रूपांतर हुआ गिरजा। अंग्रेजी का चर्च इस मूल से नहीं निकला है। एटिमऑनलाईन के अनुसार यह प्राचीन भारोपीय मूल की धातु क्यू से निकला है। मूलतः ग्रीक में इसके लिए किरीयोस kyrios शब्द है जो राजा, श्रीमंत या प्रभावी व्यक्तियों के लिए प्रयोग होता है। इससे बना kyriakon doma अर्थात शाही महल या प्रासाद। विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में इसके मिलते जुलते रूपांतर हुए जिसमें जर्मन रूप था Kirche किर्चे और इसका ही अंग्रेजी रूपांतर है चर्च। जर्मन किर्चे इक्लेसिया की कड़ी में नहीं आता और न ही iglelsia का रूपांतर है, जैसा कि बलजीत बासी बता रहे हैं।
साई गिरजाघरों के शिखर या तो नुकीले होते हैं या फिर वहाँ क्रॉस लगा होता है। कलश लगाने जैसी कोई परिपाटी गोथिक स्थापत्य में नहीं मिलती। घट या कलश का जैसा महत्व भारतीय संस्कृति में है वैसा यूरोपीय संस्कृति में नहीं है। दूसरी सबसे खास बात कलश में जल और उच्चता के भावों का उद्घाटन होना। इक्लेसिया या कलीसा से कलश की उत्पत्ति तार्किक रूप से स्वीकार तभी की जा सकती है जब इक्लेसिया के मूल में भी उच्चता और जल जैसे निहितार्थ हों, पर वहां ऐसा नहीं है। इक्लेसिया स्थानवाची, समूहवाची शब्द है। इसका स्पष्ट अर्थ जनसमूह की गोष्ठी है। यही बात चर्च में भी है जिसका व्युत्पत्तिमूलक अर्थ श्रीमंत का आवास है। यहां भी स्थानवाचक भाव प्रमुख है। इसलिए कलीसा शब्द की कलश से तुलना सिर्फ ध्वनिसाम्य का मामला है बाकी अर्थगत और भावगत कोई भी रिश्ता दोनों शब्दों में नहीं है। कलश में स्पष्ट चिंतन है, दर्शन है, अध्यात्म है और अलग अलग संदर्भों में इसकी अर्थवत्ता और गहरी होती जाती है, जबकि चर्च, गिरजा या कलीसा सिर्फ़ आराधना स्थलों के नाम भर हैं। -जारी
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Thursday, October 21, 2010

साथियों में फ़र्क़ करना सीखो साथी!

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दु निया में ऐसा कौन है जिसे कभी किसी के साथ की इच्छा न हो, जिसे किसी साथी की तलाश न हो। साथी यानी सहयोगी, सहकारी, मित्र। ये अलग बात है कि ज्यादातर लोग हम साथ साथ हैं का नारा बुलंद तो करते हैं मगर साथ-साथ रहने के फ़र्ज़ और क़ायदे तोड़ते हैं। साथी या साथ-साथ जैसे शब्द हिन्दी उर्दू में समान रूप से प्रचलित हैं और बारहा इनका मुहावरेदार इस्तेमाल भी होता है। कुछ और लफ़्ज़ भी हैं जो इस कड़ी से जुड़ते हैं। साथी का अंत चाहे स्वर से होता हो पर यह है पुल्लिंग। साथी का स्त्रीवाची शब्द बना साथिन। इसी साथी के साथ जब लोकभाषाओं की महक पैबस्त हुई तो इया प्रत्यय लगने से साथिया बन गया। साथ शब्द का शुमार भी हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दों में होता है। सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार हम अलग अलग संदर्भों वाले वाक्यों में इसका प्रयोग करते हैं। मसला तो यह है कि इस साथ की लोकप्रियता के आगे इसी भाव वाला सहित शब्द न सिर्फ अकेला पड़ गया बल्कि इसमें उतनी उर्वरता भी नहीं रही कि हिन्दी में इसके विविध रूपांतर सामने आ सकें।
सार्थ की व्युत्पत्ति के बारे में विभिन्न विद्वानों के अलग अलग मत हैं। मराठी के महान भाषाविद, पुरातत्वविद् विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े (1785-1763 ) के डेढ़ सौ साल पुराने शोध के अनुसार साथ शब्द संस्कृत के स्वस्ति का रूपांतर है। यह व्युत्पत्ति उन्होंने मराठी के साथ शब्द के मद्देनज़र स्वस्ति > सत्थि > साथी... बताई थी जिसका हिन्दी रूप भी यही है और अर्थ भी। कृ.पा. कुलकर्णी अपने मराठी शब्द व्युत्पत्ति कोश में स्थापना को सही नहीं मानते। कोशकार का कहना है कि साथ शब्द संस्कृत के सार्थ से जन्मा है न कि स्वस्ति से। गौरतलब है कि संस्कृत स्वस्ति में मंगल, कल्याण, शुभता का भाव है। साहचर्य या साथ में भी शुभ-मंगल की कामना ही इच्छित है मगर स्वस्ति इसका पर्याय नहीं है। हिन्दी शब्दसागर साथ की व्युत्पत्ति संस्कृत के सहित या सह > सथ्थ से बताता है जिसमें मिलकर या संग रहने का भाव है। जॉन प्लैट्स और कृ.पा. कुलकर्णी के कोश साथ की व्युत्पत्ति संस्कृत के सार्थ से बताते हैं। सार्थ का मतलब है समूह, झुण्ड, रेवड़, जत्था, यूथ, ग्रुप, समाज, अनुचर, अनुगामी, मित्र, सहचर आदि। आपटे कोश के मुताबिक सार्थ बना है-सह अर्थेन् से यानी जो अर्थयुक्त हो, सार्थक हो, सौद्धेश्य हो।

camels... सार्थवाह का अर्थ हुआ, जो समूह को अपने साथ ले जाए वह है सार्थवाह अर्थात् दलपति, मीरे कारवाँ या व्यापारी दल का प्रमुख। बाद में सार्थवाह का प्रयोग भी सिर्फ व्यापारिक कारवाँ के तौर पर होने लगा। इन के साथ सशस्त्र सैनिक होते थे। लम्बी दूरी के सामान्य यात्री भी इन सार्थ की संगत चाहते थे ताकि उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त हो जाए। ...

इसका अर्थ मालदार पुरुष, दौलतमंद या धनवान भी होता है मगर ये सार्थ के परवर्ती विकास हैं। सार्थ शब्द प्राचीनकाल से समूहवाची रहा है और इसमें टोली अथवा यात्रियो के दल का भाव रहा। पुराने ज़माने में अधिकांश यात्राएं समूह में ही होती थी जिसका मुख्य कारण सुरक्षा ही था। दूरस्थ स्थानों की यात्रा के लिए बड़े बड़े दल चला करते थे चाहे सौदागरों के हों या तीर्थयात्रियों के। सार्थ में सौदागरों का कारवाँ या व्यापारी दल का भाव रहा है और सामान्य यात्री समूह का भी। व्यापार एक निरन्तर प्रक्रिया थी सो व्यापारियों के कारवाँ वर्षाकाल को छोड़कर सालभर गतिशील रहते थे जिन्हें सार्थ या सार्थवाह कहते थे।
न सार्थवाहों के स्वामी आज की मेट्रों सिटीज़ के बड़े कारपोरेट घरानों की तरह तत्कालीन महानगरियों-उज्जयिनी, पाटलीपुत्र, वैशाली, काशी और तक्षशिला के श्रेष्ठिजन होते थे। सुदूर पूर्व से पश्चिम में मिस्र तक इनका कारोबार फैला हुआ था। ईसा पूर्व मिस्र में भारतीय व्यापारियों की एक बस्ती होने का भी उल्लेख मिलता है। आप्टे कोश के मुताबिक सार्थवाह का अर्थ धार्मिक श्रद्धालुओं का जत्था अर्थात तीर्थयात्री भी है। सार्थवाह बना है संस्कृत के सार्थ+वाह से। सार्थ यानी समूह, जत्था आदि। वाह शब्द संस्कृत की वह् धातु से बना है जिसमें जाना, ले जाना जैसे भाव हैं। बहाव इससे ही बना है जिसमें गति और ले जाना स्पष्ट हो रहा है। वह् का वर्ण विपर्यय हवा हुआ जिसमें बहाव और गति है। ले जाने वाले कारक के तौर पर वाहन शब्द का निर्माण भी वह् मूल से ही है। कम्पनी, टुकड़ी या ब्रिगेड के लिए हिन्दी में वाहिनी शब्द भी इसी मूल का है। गौर करें कि इस अर्थ में वाहिनी स्वयं ही कारवां हैं। स्पष्ट है कि सार्थवाह का अर्थ हुआ, जो समूह को अपने साथ ले जाए वह है सार्थवाह अर्थात् दलपति, मीरे कारवाँ या व्यापारी दल का प्रमुख। बाद में सार्थवाह का प्रयोग भी सिर्फ व्यापारिक कारवाँ के तौर पर होने लगा। इन के साथ सशस्त्र सैनिक होते थे। लम्बी दूरी के सामान्य यात्री भी इन सार्थ की संगत चाहते थे ताकि उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त हो जाए।
प्राचीनकाल में ऐसे ही अच्छे समूह की संगत मिलना भाग्य की बात मानी जाती थी। निश्चित ही इस रूप में सार्थ शब्द से साथ की व्युत्पत्ति तार्किक लग रही है। प्राचीनकाल के वणिक का रूप उत्पादनकर्ता का न होकर थोक या खुदरा व्यापारी का ही अधिक था और इसके लिए उसे एक स्थान का माल दूसरे स्थान पर बेचने की जुगत में लगे रहना पड़ता था। सार्थवाह इस अर्थ में महत्वपूर्ण व्यवस्था थे। व्यापारी को अर्थ की प्राप्ति की दृष्टि से भी सार्थवाह सार्थक थे। साथ से जुड़े कुछ मुहावरे भी हिन्दी में प्रचिलित हैं जैसे साथ साथ जिसमें साहचर्य या संगत का भाव है। इसके अलावा साथ लगाना, साथ करना यानी किसी काम में शामिल करना। साथ छूटना यानी मेल मिलाप न होना अथवा अंतिम विदा, साथ देना अर्थात सहयोग देना, कंधे से कंधा मिलाकर काम करना। साथ लेना यानी साथ मिलाना। साथ साथ जीना यानी मिल बांट कर भोगना। साथ सोना यानी अनैतिक यौन संबंध रखना। साथ का खेला यानी बालसखा, आदि।

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Sunday, October 17, 2010

दुनिया तमाशा है या जादू का खिलौना!!!

गत या संसार के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक बोला जाने वाला शब्द है दुनिया। इसकी व्याप्ति न सिर्फ़ कई भारतीय भाषाओं में है बल्कि एशिया की प्रमुख ज़बानों में भी इन्ही संदर्भों में इस शब्द का इस्तेमाल होता है। यही नहीं यूरोप की कई भाषाओं में भी भिन्न अर्थ और उच्चारण के साथ यह शब्द मौजूद है। इसकी व्याप्ति न सिर्फ सेमिटिक परिवार की भाषाओं में है बल्कि भारोपीय परिवार के साथ तुर्किश अल्टाइक परिवार में भी दुनिया शब्द मौजूद है। दुनिया का इस्तेमाल हिन्दी में न सिर्फ आम बोलचाल में खूब होता है बल्कि अदबी ज़बान का भी यह बेहद क़रीबी और प्यारा लफ़्ज़ है। शायरों ने दुनिया शब्द का इस्तेमाल बड़ी खू़बसूरती से किया है। मशहूर शायर ग़ालिब कहते हैं-
बाज़ीचा ए अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे। 
होता है शबोरोज़ो तमाशा मेरे आगे।

इधर निदा फ़ाज़ली फर्माते हैं-
दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है। 
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

दुनिया को कई तरह की उपमाएं मिलती रहती हैं। किसी के लिए दुनिया एक तमाशा है तो किसी के लिए खुदाई तोहफ़ा। कोई इस मिट्टी का खिलौना कहता है, कोई जादू का तो कोई बच्चों का, मगर है यह खिलौना ही। मगर हक़ीक़त में तो कारोबारे दुनिया में हम सब खिलौने नज़र आते हैं। दुनिया अगर खेल-खिलौना है तो सबसे बड़े खिलाड़ी इसे बनानेवालें, इसके सिरजनहार खुद परमात्मा हैं।

दुनिया मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और हिन्दी में इसकी आमद अरबी से, बरास्ता फ़ारसी हुई है जहाँ इसका शुद्ध रूप दुन्या है। दुन्या शब्द के विभिन्न एशियाई भाषाओं में अलग अलग उच्चारण हैं जैसे ज्युइश में दुन्ये, इंडोनेशियाई में दुन्या, किरगिज़ में दुइनो, पर्शियन में दोन्या, स्वाहिली में दुनिया, तातारी में दून्या, उज्ब़ेकी में दुन्यो वगैरह वगैरह। अरबी में इसका असली रूप है दुन्या और यह बना है अरबी के दाल-नून-वाव (dal-nun-waw ) से जिसमें निकटता या निम्नता अर्थात नीचाई का भाव है। निम्नता का अर्थ ओछापन या छोटापन नहीं बल्कि ऊंचाई का विलोम है। इससे मिलकर बने दुन्या शब्द का अर्थ है जो है अर्थात क़रीब है। ज़ाहिर है हमारे आसपास का गोचर जगत ही दुनिया है। जो कुछ भी दृश्यमान है, जो कुछ भी चल-अचल और दृष्टिगत है, वह सब दुन्या में शामिल है। दुनिया का स्थूल अर्थ जगत, विश्व या संसार है और सूक्ष्म अर्थ है मनुष्य से जुड़ी हुई हर बात दुनिया में शामिल है। इन्सान ने दुनिया को कुछ इसी तरह समझा है कि हर चीज़ के केंद्र में वह है। तमाम जीव, नदी, पहाड़, पेड़-पौधे उसके लिए हैं। ये सब उसके इर्दगिर्द हैं और इन सबका समूह, ज़खीरा ही दुनिया है। इसमें अच्छी-बुरी हर चीज़ शामिल है। मौसम के रंग से लेकर इन्सानी रंजो-ग़म तक इसमें आते हैं तो सुख-समृद्धि और सकल मनोरथ भी दुनिया का हिस्सा हैं। फारसी के प्रत्ययों का मेल इस दुन्या शब्द से बड़ी खूबसूरती से हुआ है कि लगता नहीं कि यह शब्द फ़ारसी का नहीं है। ये तमाम लफ्ज़ हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे दुनियादार अर्थात जो संसारी मनुष्य, दुनियादारी यानी गृहस्थी, संसार का मोहपाश, सांसारिक बंधन, दुनियावी यानी सासारिक। मद्दाह साहब के कोश के मुताबिक शुद्ध अरबी में यह दुनयवी है मगर अरबी, फ़ारसी में दुनयावी प्रचलित है और हिन्दी में दुनियावी

ग्रीक भाषा के शब्द व्युत्पत्ति संदर्भों में भी दुनिया का उल्लेख दुन्या के रूप में बतौर तुर्किक शब्द दर्ज़ है। कुछ संदर्भों में सेमिटिक दुन्या को हैलेनिक, प्रकारांतर से ग्रीक मूल का माना गया है। तुर्की और ग्रीस पड़ोसी रहे हैं। तुर्किक भाषा मे भी संसार के अर्थ में दुन्या शब्द चलता है। इसका रिश्ता ग्रीक शब्द टौनिया ntounia से जोड़ा जाता है। यहां n यानी न की ध्वनि मौन है। इस तरह ग्रीक शब्द का उच्चारण हुआ टौनिया जिसमें घिरे हुए स्थान या पड़ोस का भाव है। हैलेनिक काल का एक शब्द है गी-टोनिया geitounia जिसका अर्थ है पड़ोस, मोहल्ला या टोला। यहां gei गी का अर्थ है जगत या संसार और Ktoina का मतलब है क्षेत्र, स्थान आदि। यानी भाव आबादी से है। इसकी रिश्तेदारी अंग्रेजी के टाऊन यानी छोटी बसाहट से है। बसाहट के अर्थ में टाउन में घिरी हुई जगह का ही भाव है। मगर यह बात गले नहीं उतरती कि दुन्या शब्द सेमिटिक परिवार को ग्रीक भाषा की देन है। सेमिटिक दुन्या का अर्थ सीधे सीधे संसार है। इसके अतिरिक्त इसमें आस-पास, नीचाई या निम्नता का जो भाव है, ग्रीक ntounia में सीधे सीधे पड़ोस का भाव है। अरबी में जिस दुन्या में आस-पास का भाव है जिसमें पेड़, पौधे और परिवेश तक आ जाते हैं वहीं इसके ग्रीक रूपांतर में यही "आस-पास" स्थूल रूप से "पड़ोस" का भाव ग्रहण करता है। जाहिर है यह परवर्ती विकास है। इसकी अगली कड़ी टाऊन शब्द के बसाहट वाले भाव में स्पष्ट हो जाती है। अंग्रेजी का डाऊन down शब्द भी इसी शृंखला से जुड़ा है। दुन्या में निहित नीचाई, निम्नता जैसे भावों पर गौर करें। अत्यंत प्राचीनकाल में मनुष्य पशुओं व अन्य जनजातीयों से बचने के लिए पर्वतीय प्रदेशों में रहता था। विकासक्रम में ऊंचाई पर किले, बुर्ज, दुर्ग, गढ़ आदि बने। बचाव की युक्तियां खोजने के बाद उसने नीचे के इलाकों अर्थात मैदानी इलाकों में रहना शुरू किया। दुन्या में समाए निम्न, नीचाई वाले भावों का विकसित रूप डाऊन और टाऊन जैसे शब्दों में खोजा जाना चाहिए।




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Friday, October 15, 2010

सफ़र के साथियों को बधाई- हम सब हुए हज़ार



जाने-माने ब्लॉगर और हमारे मित्र, भोपालवासी रवि रतलामीजी का एक ईमेल हमें कल प्राप्त हुआ, जिसे जस का तस यहाँ दे रहा हूं।
अजित जी,आपके नियमित सब्सक्राइबरों की संख्या 1 हजार से ऊपर पार करने पर आपको बधाई. मेरे विचार में आपका ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का ऐसा पहला ब्लॉग है.यह आलेख देखें -फ़ोर फ़िगर सब्सक्राइबरों की ओर छलांग लगाते हिंदी चिट्ठे आपका, रवि
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Wednesday, October 13, 2010

वैद्य करुणाशंकर उर्फ झंडु भट्टजी [झंडुबाम-2]

पिछली कड़ी-मुन्नी बदनाम हुई ...[झंडुबाम-1]


ब आते हैं झंडुबाम पर। मूर्ख, नाकारा, भोंदू के लिए झंडुबाम शब्द के मूल में दरअसल उपरोक्त चर्चित झंडू या झण्डू शब्द ही है। एक चर्चित उत्पाद किस तरह से अभिव्यक्ति का जरिया बनते हुए जनभाषा में स्थापित होता है, डालडा की तरह ही मगर कुछ भिन्न विकासक्रम वाला उदाहरण झंडुबाम का भी है। झंडु के कुछ रूपों पर चर्चा हो चुकी है इसलिए झंडुबाम वाले झंडु पर चर्चा हो इससे पहले बाम पर बात कर लेते हैं। अंग्रेजी में मलहम के लिए एक शब्द है बाम balm. वाल्टर स्कीट की डिक्शनरी के मुताबिक हिब्रू में इसका रूप है बासम basam है। वही अरबी में इसका रूप है बाशम basham बरास्ता हिब्रू ग्रीक में दाखिल हुआ जिसका अर्थ है सुगंधित लेप। ग्रीक में इसका रूप हुआ बॉलशमोन, लैटिन में यह हुआ बॉलशमुन। फ्रैंच में इसके हिज्जों में बदलाव आया और इसका रूप हुआ बॉम और फिर अंग्रेजी में यह बाम balm के रूप में सामने आया। मूल रूप से इसमें ऐसे रेज़िन या चिपचिपे पदार्थ का भाव है जिसका प्रयोग जैव पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने और शरीर को आरोग्य प्रदान करने में होता हो। शवों सुरक्षित रखने की क्रिया ऐम्बॉमिंग कहलाती है जिसके मूल में यही बाम शब्द है। गुलमेंहदी को अंग्रेजी में बॉलशम balsam कहते हैं। याद रहे प्राचीनकाल से ही सिर में लगाने की विविध ओषधियां और लेपन बनते रहे हैं। भारतीय चंदन इसमें प्रमुख रहा है। इसके अलावा कई तरह के सुगंधित तेल और वनौषधियों के अवलेह का प्रयोग भी लेपन के लिए होता था। ब्राह्मी बूटी या ब्राह्मी वटी भी ऐसी ही ओषधि थी। आयुर्वेद में ब्राह्मी बहुउद्धेश्यीय ओषधि है। यह मस्तिष्क के लिए शीतलकारक होती है। ब्राह्मी का अपभ्रंश रूप भी बाम ही बनेगा।


हरहाल, जहां तक झंडुबाम का सवाल है इसका रिश्ता गुजरात के जामनगर में रहनेवाले वैद्य झंडु भट्टजी सेहै। आज से क़रीब दो शताब्दी पहले अर्थात अठारहवीं सदी के पहले दशक में इनका जन्म हुआ था। वैद्यों के घराने में पैदा होकर इन्होंने भी वैद्यकी के जरिए समाजसेवा का काम शुरु किया। इनकी चिकित्सा को इतनी ख्याति मिली कि इन्हें जामनगर रियासत का राजवैद्य बनाया गया। झंडु भट्टजी के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। झंडुबाम की आधिकारिक साइट पर इनका पूरा नाम नहीं मिलता। इनका पूरा नाम था करुणाशंकर वैद्य। उपनाम भट्ट था। समाज में इनकी ख्याति वैद्य झंडु भट्टजी के रूप में थी। ओषधि अनुसंधान में इनकी खास रुचि थी। पीलिया रोग के उपचार में इन्होंने खास शोध किया। आयुर्वेद में उल्लेखित आरोग्यवर्धिनी ओषधि का प्रयोग इन्होंने पीलिया, मधुमेह से ग्रस्त कई रोगियो पर किया और इसे ख्याति दिलाई। 1864 में जामनगर महाराज की प्रेरणा और आर्थिक सहायता से जामनगर में भट्टजी ने रसशाला नाम से एक अनुसंधान व ओषधि निर्माणशाला खोली। झंडु भट्टजी के पोते जुगतराम वैद्य ने अपने पितामह की विरासत को व्यवस्थित व्यापारिक संस्थान में बदलने का बीड़ा उठाया। 1910 में उन्होनें झंडू फार्मेसी की स्थापना की। 1919 में कम्पनी बाकायदा मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड हुई और इसने शेयर भी जारी किए। झंडु नाम आयुर्वैदिक और देशी दवा कंपनी के रूप में बहुत शोहरत कमा चुका है। मगर जितनी शोहरत इसकी दवाओं की नहीं है उससे ज्यादा शोहरत इसके नाम से प्रचलित झंडुबाम मुहावरे को मिली है।

ब यूं देखा जाए तो किसी ज़माने में पेनजॉन भी सिरदर्द की एक प्रसिद्ध दवा थी। हमारे कॉलेज में जो लड़का सिरखाऊ किस्म का माना जाता था, उसे पेनजॉन कहा जाता था। कहने की ज़रूरत नहीं कि मूर्ख या बेवक़ूफ़ किस्म के लोगों को ही सिरखाऊ समझा जाता है। झंडुबाम मूलतः सिरदर्द की दवा है। जाहिर है अगर झंडुबाम का चलन इन विशेषणों के संदर्भ में शुरू हुआ है, तो यह व्युत्पत्ति भी तार्किक है मगर सवाल उठता है कि वैद्य झंडु भट्टजी को झंडु उपनाम क्यों मिला होगा जबकि इसकी अर्थवत्ता तो नकारात्मक है !!! हिन्दी के झंड करना में अन्य भावों समेत बेइज्ज़त करने का भाव भी समाहित है। यह भी बाल उतारने की क्रिया से ही जुड़ा है। पुराने ज़माने में आमतौर पर सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति का बहिष्कार किया जाता था तो उसका सिर मूंड दिया जाता था। यह क्रिया भी झंड करना ही हुई। बालों से वंचित व्यक्ति भी झंडू है, ठगा जा चुका भी झंडू है और मूर्ख बन चुका भी झंडू है। इसके अलावा स्वभावतः भोंदू, आलसी, निठल्ला, सुस्त, मूर्ख व्यक्ति भी इस विशेषण का हक़दार है। झंडू ही झंडूबाम है। अलबत्ता झंडु भट्टजी के नाम के साथ झंडु शब्द मुझे लगता है गेंदे के लिए प्रचलित झंडु से ही आया है। झंडु भट्टजी ने पीलिया और मधुमेह जैसे रोगों पर महत्वपूर्ण अनुसंधान किया था। रक्तशुद्धि के लिए झंडु के सफल ओषधीय प्रयोगों के चलते संभव है उनके नाम के साथ यह शब्द सम्मान स्वरूप जुड़ा हो। समाप्त

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Tuesday, October 12, 2010

मुन्नी बदनाम हुई ...[झंडुबाम-1]

मु न्नी बदनाम हुई गाने की वजह से आजकल झंडुबाम शब्द खूब चर्चा में है। झंडुबाम शब्द को चलताऊ हिन्दी में लगभग मुहावरे का दर्ज़ा मिल चुका है जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो किसी काम का न हो। इसकी अर्थवत्ता में मूर्ख या भोंदू का भाव भी है। झंडु या झंडू शब्द का स्वतंत्र रूप से भी हिन्दी में प्रयोग होता है जिसका अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो मूर्ख, सुस्त या भोंदू है। एक अन्य मुहावरेदार अभिव्यक्ति भी हिन्दी क्षेत्रों में प्रचलित है-झंड होना, झंड करना आदि। किसी को झंड कर देना या झंड हो जाना में बेवकूफ़ बनना, अवाक रह जाना, ठगा सा रह जाना जैसे भाव हैं। हालांकि इन तमाम शब्दों का झंडुबाम शब्द की व्युत्पत्ति से कुछ लेना देना नहीं है मगर इनकी रिश्तेदारी झंडुबाम की प्रचलित मुहावरेदार अर्थवत्ता से ज़रूर है और इसीलिए दबंग फिल्म के इस मस्त मस्त गीत में जब झंडुबाम को जगह मिली तो इस ब्रांडनेम के प्रवर्तकों का नाराज़ होना स्वाभाविक था। झंडुबाम के पीछे एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का नाम जुड़ा है और गीत में झंडुबाम को मुहावरेदार शब्द के तौर पर ही जगह दी गई है। इसके जरिए एक आयुर्वैदिक उत्पाद के नाम को हानि या लाभ पहुंचाने का कोई मक़सद गीतकार या फिल्म निर्माता का नहीं रहा होगा।

झंडू, झंड जैसे शब्द हिन्दी कोशों में मिलते तो हैं मगर इनके जो अर्थ दिए गए हैं वे इन शब्दों के लोकप्रचलित अर्थों से मेल नहीं खाते। अनुमान है कि संस्कृत के यूथं, प्राकृत के जुत्थं का परिवर्तित रूप है झुंड जिसका अर्थ है समूह, भीड़, जमाव, दल आदि। जॉन प्लैट्स की हिन्दुस्तानी इंग्लिश उर्दू डिक्शनरी में में झंडू का रूप झण्डू दिया है और इसकी व्युत्पत्ति जट् धातु से बताई गई है जिससे जटा जैसा शब्द भी बना है। गौरतलब है कि जटा भी समूहवाची शब्द है। इसका अर्थ है सिर पर बड़े बड़े बालों का गुच्छा, फुलों की पंखुड़ियाँ या गेंदे का फूल। हिन्दी शब्दसागर में झँडूला शब्द मिलता है जिसका अर्थ है वह बालक जिसके सिर पर जन्म काल के बाल अभी तक वर्तमान हों। जिसका अभी मुंडन संस्कार न हुआ हो। सिर के वे घने बाल जो गर्भ-काल से ही चले आ रहे हों और अभी तक मूँडे न गये हों। इसके अलावा इसका अर्थ घनी डालियों और पत्तियोंवाला वृक्ष। भी होता है। एक अन्य अर्थ है कोई भी समूह या झुंड। इसके अलावा झंडू शब्द का किन्हीं अन्य अर्थों में प्रयोग भी होता है जैसे मराठी-हिन्दी में झेंडू, झंडू का अर्थ गेंदे का फूल भी होता है। गेंदा को अंग्रेजी में मेरीगोल्ड कहते हैं। यह एक आयुर्वैदिक ओषधि भी है। गेंदा शब्द संस्कृत के कंदुक से बना है। कंदुक> कंदुअ > गंदऊ  गेंदआ  > गेंदा के विकासक्रम से हिन्दी को एक नए फूल का नाम मिला। कंदुक, कंद, गंड, खण्ड जैसे शब्द हैं जो एक ही शब्द शृंखला का हिस्सा हैं। खण्ड, खांड, गुंड, गंड, गुड़ या अग्रेजी का कैंडी आदि इसी कड़ी में आते हैं। कंदुक का अर्थ होता है छोटा गोल पिंड, कोई छोटी या गोल आकार की वस्तु। गोलाई लिए हुए और फूली हुईं पंखुड़ियों के वर्तुलाकार आकार की वजह से इसे कंदुक पुष्प या गेंदा कहा गया। इस फूल पर हजारों की संख्या में पंखुड़ियां होती हैं इसलिए इसे कुछ हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हजारी भी कहा जाता है। गेंदे की ही एक किस्म को गुलदाऊदी भी कहते हैं। अर्थात वह फूल जो बादशाह दाऊद को पसंद था। गेंदा के फूल का वैज्ञानिक नाम है टेगेटस इरेक्टा। गेंदा का मुख्य गुण है रक्तशोधन करना। ध्यान रहे, आधुनिक विज्ञान भी विभिन्न रोगों का मूल रक्त की अशुद्धि माना जाता है, आयुर्वेद में तो यह धारणा शुरु से रही है। ध्यान रहे हिन्दी में हजारीलाल या गेंदालाल जैसे व्यक्तिनाम भी प्रचलित हैं। गेंदा के मराठी रूप झेंडू और गुजराती के झंडु को भी इस रूप में देखा जाना चाहिए। ध्यान रहे अंग्रेजी में झंडु की वर्तनी zandu लिखी जाती है न कि jhandu. इसी तरह मराठी में ही गेंद को चेंडू कहा जाता है और कन्नड़ में भी चैंडू है। मराठी पर कन्नड़ का प्रभाव जगज़ाहिर है सो मराठी का चेंडू, कन्नड़ के चैंडू से ही आया होगा, यह तय है। गौरतलब है संस्कृत कंदुक की छाया का कन्नड़ चेंडू पर पड़ना फिर चेंडू का मराठी झेंडू या गुजराती का झंडु बनना आसानी से समझ में आता है।

 संस्कृत कंदुक की छाया का कन्नड़ चेंडू पर पड़ना और फिर चेंडू का मराठी झेंडू या गुजराती का झंडु बनना बहुत आसानी से समझ में आता है

सी तरह शब्दसागर में झंड शब्द भी मिलता है जिसका अर्थ दिया है छोटे बालकों के जन्म काल के सिर के बाल। बच्चों के मुंडन के पहले के बाल जो प्रायः कटवाए न जाने के कारण बड़े बड़े हो जाते हैं। सवाल उठता है कि ये तमाम संदर्भ उस झंड या झंड करना जैसे मुहावरे के आसपास भी नहीं पहुंचते जिसका अर्थ है मूर्ख बनना, ठगा जाना या खिन्न हो जाना। मुझे लगता है यहां सिर के बालों को साफ़ करने की क्रिया अथवा सिर से बाल उतारने या बालों से वंचित होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। झंड करना मुहावरे का जन्मसूत्र मिलता है सिर मूँड़ना जैसे मुहावरे में। समाज में बालों का बड़ा महत्व है। अत्यधिक बड़े बालों के अलग माएने होते हैं और कम बालों के अलग। एकदम सफ़ाचट खोपड़ी का मतलब अगर पांडित्य है तो इसका एक अर्थ मूढ़ता या घामड़पन भी है। आमतौर पर किसी वस्तु के छिनने या वंचित होने के संदर्भ में मूँड़ना शब्द का मुहावरेदार प्रयोग होता है। हिन्दी जगत की कई विडम्बनाओं में एक विडम्बना यह भी है कि यहां शब्दकोशों को अद्यतन नहीं किया जाता। शब्दों की बदलती अर्थवत्ता और उसके नए सामाजिक संदर्भों का उल्लेख कोशों में दर्ज़ करने की परम्परा नहीं है। झंड, झंडू या झंड करना के संदर्भ में भी यही बात सामने आ रही है। बीती सदी में झंड शब्द की अर्थवत्ता बदली, मगर कोशकारों ने उसे महसूस तो किया पर दर्ज़ नहीं किया। मूँड़ने की तर्ज पर ही झंड से झंड करना मुहावरा प्रचलित हुआ जिसमें वंचित होने के अर्थ में ठगे जाने, मूर्ख बनने का भाव विकसित हुआ। जो वंचित हुआ वह हुआ झंडू। गौर तलब है कि हिन्दी शब्दसागर कोश में एक मुहावरे का भी उल्लेख है–झंड उतारना अर्थात बच्चे का मुंडन संस्कार करना। मगर इसकी नकारात्मक अर्थवत्ता का उल्लेख नहीं है। ज़ाहिर है झंड करना जैसा भाव बाद में विकसित हुआ होगा जिसे कोशकारों ने दर्ज़ नहीं किया। यह मेरा अनुमान है। -जारी

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क्या बाज़ार ही भाषा को भ्रष्ट करता है? [बाज़ारवाद-3]

साहित्य रचना के लिए परिष्कृत भाषा ज़रूरी होती है मगर बोलचाल की भाषा या बाज़ार की भाषा में विचार व्यक्त नहीं हो सकता यह तथ्य सौ फीसद सच नहीं है क्योंकि लोक में प्रचलित सैकड़ों उक्तियों, कहावतों और मुहावरों में प्रचलित भाषा का ही प्रयोग हुआ है। इन्हें गढ़नेवाले समाज ने चलताऊ और बाजारू शब्दों का इस्तेमाल किया है जिसका उद्धेश्य आम आदमी तक गूढ़, शिक्षाप्रद संवाद को सुगम बनाना था। कबीर की सधुक्कड़ी भाषा को साहित्यिक या अत्यंत परिष्कृत नहीं कहा जाता। भाषाई संस्कार की जकड़न से मुक्त उनकी भाषा या बोली पर विद्वानों ने गहन चिन्तन किया है और पाया है कि आम लोगों की बोली में उन्होंने प्रचुर वैचारिक सम्पदा रच दी। हमारे संवाद में अधिकांश हिस्सा बाज़ार की भाषा का ही होता है।

निश्चित ही आज के मीडिया में जिस भाषाई संकट की सर्वाधिक चिन्ता जताई जा रही है वह दरअसल अभिव्यक्ति के विविध आयामों से वंचित होते जाने के भयावह भविष्य की ओर संकेत करता है। हिन्दी अख़बारों के पास इस वक्त शब्दों का भयंकर अकाल है। प्यून शब्द के प्रति आग्रह के चलते अब वे भ्रत्य शब्द को विदेशी समझने लगे हैं। भ्रत्य को अगर कठिन मान भी लिया जाए तो उसके आसान विकल्प चपरासी पर पूरा न्यूज़ रूम चर्चा में डूब जाता है कि जिस तरह से सफ़ाईकर्मी के लिए अगर भंगी शब्द का इस्तेमाल करने पर कोई बवाल खड़ा होता, वैसा ही भ्रत्य के स्थान पर अगर चपरासी शब्द का इस्तेमाल करने पर होता। लिहाज़ा वर्गभेद की खाई को पाटने के लिए अंग्रेजी का प्यून ही तारणहार बनकर हमारे पत्रकारों के दिमाग़ में कौंधता है।

चाय की छोटी दुकानों पर आधा कप चाय के लिए कट और खास चाय के लिए डीलक्स, सुपर जैसे शब्द प्रचलित हैं। ये अंग्रेजी के शब्द हैं। हिन्दी में इनका इस्तेमाल खूब होता है। ये दुकाने आमतौर पर सड़क की पटरी पर होती हैं। फुटपाथ के लिए पटरी शब्द बहुतप्रचलित नहीं है। सड़क किनारे की चाय की दुकान के लिए अगर मेरे दिमाग़ में फुटपाथी टीस्टाल शब्द कौंधता है तो क्या यह भाषा को भ्रष्ट करने की मिसाल है? चाय की दुकान को चाय की थड़ी भी कहा जाता है मगर टीस्टाल शब्द लोकमानस में खूब प्रचलित है। इसमें कोई दो राय नहीं कि समकालीन प्रचलित अन्य भाषाओं से शब्दों को उदारतापूर्वक लेने, नए शब्द गढ़ने और उनके विविधअर्थी प्रयोगों से ही कोई भाषा समृद्ध बन सकती है। मगर यह भी उचित नहीं कि हमारी अपनी सक्षम भाषा के विराट शब्दभंडार की उपेक्षा कर जबर्दस्ती सिर्फ एक भाषा अर्थात अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने पर ज़ोर दिया जाए।

रल और आसान भाषा लिखने की (कु)चेष्टा के चलते संचार माध्यमों में जो हिन्दी रची जा रही है, राष्ट्रभाषा और मातृभाषा जैसे विशेषणों के संदर्भों में लगता नहीं कि हम हिन्दी का सम्मान करते हैं। पिछले एक अर्से से लगातार संचार माध्यमों में हिन्दी का स्तर गिरा है। भाषाओं के संदर्भ में वर्तनी की गलती या अशुद्ध उच्चारण आमतौर पर किसी से भी हो सकता है मगर आसान भाषा की आड़ में बोलचाल के शब्दों से लगातार किनारा करते जाना भयावह है। मज़े की बात यह भी कि आसान भाषा का नारा लगानेवाले ये पत्रकार बंधु खुद अर्धशिक्षितों जैसी भाषा लिखते है, क्योंकि परिनिष्ठित भाषा लिखना इन्हें आता नही...और इसीलिए इन्होंने खुद ही तय कर लिया कि अच्छी हिन्दी दरअसल कठिन होती है। तब क्या किया जाए? सीधी सी बात है, जो बोलचाल की अंग्रेजी मिश्रित भाषा है, वही लिख दी जाए। हाल ये है कि एक बड़े हिन्दी दैनिक से अंग्रेजी के रेगुलर ने नियमित को, डेली वजेस ने दैनिक वेतनभोगी को, सैलरी ने तनख्वाह को और प्यून ने चपरासी या भ्रत्य को ख़ारिज़ कर दिया है।
-जारी
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Thursday, October 7, 2010

अरुणाचल में मिली दुर्लभ भाषा

कोरो बोलने वाला अरुणाचल का एक आदिवासी परिवार
(तस्वीर: एपी/क्रिस रेनियर)
शोधकर्ताओं ने भारत के सुदूर इलाक़े में एक ऐसी भाषा का पता लगाया है, जिसका वैज्ञानिकों को पता नहीं था। 
स भाषा को कोरो के नाम से जाना जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अपने भाषा समूह की दूसरी भाषाओं से एकदम अलग है लेकिन इस पर भी विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है। भाषाविदों के एक दल ने उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश में अपने अभियान के दौरान इस भाषा का पता लगाया। यह दल नेशनल जियोग्राफ़िक की विलुप्त हो रही देशज भाषाओं पर एक विशेष परियोजना 'एंड्योरिंग वॉइसेस' का हिस्सा है। 

दुर्लभ भाषा

शोधकर्ता तीन ऐसी भाषाओं की तलाश में थे जो सिर्फ़ एक छोटे से इलाक़े में बोली जाती है। उन्होंने जब इस तीसरी भाषा को सुना और रिकॉर्ड किया तो उन्हें पता चला कि यह भाषा तो उन्होंने कभी सुनी ही नहीं थी और यह कहीं दर्ज भी नहीं की गई थी। इस शोधदल के एक सदस्य डॉक्टर डेविड हैरिसन का कहना है, "हमें इस पर बहुत विचार नहीं करना पड़ा कि यह भाषा तो हर दृष्टि से एकदम अलग है। "
यदि हम इस इलाक़े का दौरा करने में दस साल की देरी कर देते तो संभव था कि हमें इस भाषा का प्रयोग करने वाला एक व्यक्ति भी नहीं मिलता
ग्रेगरी एंडरसन, नेशनल जियोग्राफ़िक
भाषाविदों ने इस भाषा के हज़ारों शब्द रिकॉर्ड किए और पाया कि यह भाषा उस इलाक़े में बोली जाने वाली दूसरी भाषाओं से एकदम भिन्न है। कोरो भाषा तिब्बतो-बर्मी परिवार की भाषा है, जिसमें कुल मिलाकर 150 भाषाएँ हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भाषा अपने परिवार या भाषा समूह की दूसरी भाषाओं से बिलकुल जुदा है। यह माना जाता है कि इस समय दुनिया की 6909 भाषाओं में से आधी पर समाप्त हो जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। कोरो भी उनमें से एक है।  उनका कहना है कि कोरो भाषा 800 से 1200 लोग बोलते हैं, लेकिन इसे कभी लिखा या दर्ज नहीं किया गया है। 
नेशनल जियोग्राफ़िक के ग्रेगरी एंडरसन का कहना है, "हम एक ऐसी भाषा की तलाश में थे जो या तो विलुप्त होने की कगार पर है या अत्यंत अल्पभाषी समूह में जीवित है। " उनका कहना है, "यदि हम इस इलाक़े का दौरा करने में दस साल की देरी कर देते तो संभव था कि हमें इस भाषा का प्रयोग करने वाला एक व्यक्ति भी नहीं मिलता। "यह टीम कोरो भाषा पर अपना शोध जारी रखने के लिए अगले महीने फिर से भारत का दौरा करने वाली है। 
शोध दल यह जानने की कोशिश करेगा कि यह भाषा आई कहाँ से और अब तक इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी थी।

इसे भी देखें-एक मातृभाषा की मौत
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Tuesday, October 5, 2010

कलश और कैलाश की रिश्तेदारी

ड़े के अर्थ में हिन्दी में कलश शब्द भी प्रचलित है। घरेलु उपयोग के लिए जल संग्रह की व्यवस्था के रूप में चाहे मटका, घड़ा, टंकी जितनी लोकप्रियता अब कलश की चाहे न रह गई हो मगर सांस्कृतिक, मांगलिक और धार्मिक अभिप्रायों को अभिव्यक्त करने के लिए कलश शब्द का प्रयोग वर्ष भर विभिन्न अवसरों पर होता है। मंगल कलश अपने आप में घट रूपी वह कोश है जिसमें हमारा अनदेखा उज्जवल भविष्य समाया है। बस, प्रतीक्षा है तो किसी शुभ घड़ी की। इसीलिए पर्वों-त्योहारों पर घर घर में मंगल कलशों की स्थापना की जाती है। यह मंगल कलश ही कुटुम्ब की सुख-समृद्धि का ख़ज़ाना है। यूं भी भारतीय संस्कारों में जन्म से लेकर मृत्यु तक कलश का महत्व है। प्रायः दार्शनिक अर्थों में घट का अर्थ शरीर से लगाया जाता है। कबीर के घट का अर्थ काया रूपी घट ही है जिसमें आत्मा रूपी जल की व्याप्ति से ही जीव की संज्ञा प्राप्त होती है। जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान । जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥ जल शब्द अपनेआप में जीवन का प्रतीक है। घट में जल अर्थात जीवन ऊर्जा से प्रेरित एक ऐसी व्यवस्था जो मांगलिक कर्मों के जरिए सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संसार का सृजन करती है। यह व्याख्या मनुष्य होने का उद्धेश्य स्पष्ट करती है।


ल का घड़े से रिश्ता महत्वपूर्ण है। कलश, घड़ा या मटके जैसी व्यवस्थाओं का जन्म ठोस वस्तुओं के संरक्षण के लिए नहीं बल्कि तरल पदार्थ के संरक्षण के लिए हुआ था। तरल का प्राचीनतम् मूलार्थ भी जल ही है सो घट यानी कलश का जन्म ही जल संग्रह के लिए हुआ जिसमें निहित उद्धेश्य प्यास बुझाना था। प्राचीन साहित्य में कलश की महत्ता बताई गई है। वैदिक ग्रंथों में भी विभिन्न कलशों का उल्लेख है। मंगल कलश शब्द की स्थापना ही इसलिए हुई क्योंकि कलश को अष्ट मांगलिक चिह्नों (पूर्णघट भद्रासन, स्वास्तिक, मीन-युग्म, शराव-सम्पुट, श्रीवत्स, रत्नपात्र, व त्रिरत्न) में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त है। जल जो कि जीवन का पर्याय है, जो स्वयं मांगलिक है, उसे धारण करनेवाले कलश को आखिर मंगलमय क्यों न कहा जाता? वैसे कलश शब्द के जन्मसूत्र भी जलतत्व से इसकी संबद्धता बताते हैं।

मुझे लगता है कलश की व्युत्पत्ति के पीछे मूलतः देवनागरी के वर्ण में निहित जल का भाव ही महत्वपूर्ण है। विभिन्न कोश भी इसे पुष्ट करते हैं जिनके मुताबिक संस्कृत में कलश के दो रूप हैं 1.कलशः 2.कलसः और ये दोनों ही रूप संस्कृत में मान्य है। वामन शिवराम आप्टे कोश के अनुसार कलश की व्युत्पत्ति “ केन जलेन् लश (स) ति” अर्थात जो जल से सुशोभित हो। संस्कृत में कलशी शब्द भी प्रचलित है, ज़ाहिर है हिन्दी के देशज शब्द कलसा और कलसी भी अपने पूर्व संस्कृत रूपों से ज्यादा भिन्न नहीं हैं। देवनागरी में जल के अतिरिक्त क वर्ण में उच्चता का भाव भी निहित है। कृ.पां कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में भी कलश का कळस रूप दिया गया है और इसके जन्मसूत्र कल् + शु गतौ में बताए गए हैं अर्थात जिसमें शिखर, अन्त अथवा पराकाष्ठा का भाव हो वही है कलश। हालांकि यह तय है कि कलश में निहित जल को धारण करनेवाला भाव ही इस पराकाष्ठा वाले अर्थ में भी सिद्ध होगा तभी जलाशय रूपी जलपात्र के अर्थ में कलश का अर्थ घड़ा या मटका रूढ़ हुआ।


में निहित उच्चता, पराकाष्ठा या अन्त के भाव की व्याख्या बहुत आसान है। प्राचीनकाल से ही मनुष्य के लिए ज्ञान का सर्वज्ञात स्रोत सिर्फ प्रकृति थी। न कोई ग्रंथ था और न कोई रहनुमा। जो कुछ सीखा, इन्सान ने खुद सीखा। आज भी इसीलिए मूल ध्वनियों से उपजे अर्थों के इर्दगिर्द ही अधिकांश शब्दों की अर्थछटाएं प्रकाशित नज़र आती हैं। समझा जा सकता है कि कलश में निहित ऊंचाई के अर्थ में जल के प्रमुख संग्राहक बादल हैं जो जल को सबसे पहले धारण करते हैं और उन्हें बूंदों की शक्ल में पृथ्वी पर बरसाते हैं। बादलों का आवास पहाड़ों पर माना जाता है इसीलिए पहाड़ को मेघालय भी कहा जाता है। हिम भी पानी का ही एक रूप है जाहिर है हिमालय भी जल का संग्राहक ही है। हिमालय पर्वत का एक हिस्सा कैलाश मानसरोवर कहलाता है। कैलाश और कलश शब्द में व्युत्पत्तिमूलक समानता है। संस्कृत में कैलाश का रूप कैलासः है जिसमें भी जल से सुशोभित होने का ही भाव है। अगली कड़ी-
कलश, कलीसा और गिरजाघर



इन्हें भी ज़रूर पढ़ें-1.[नामपुराण-4] एक घटिया सी शब्द-चर्चा…2.[नाम पुराण-5] सावधानी हटी, दुर्घटना घटी3.आरामशीन से चरस, रहंट, घट्टी तक





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