Saturday, January 15, 2011

अपना अपना नास्टैल्जिया [बकलमखुद-144]

…जनमत में बिताए गए अपने समय की कोई अलग पहचान मेरे दिमाग में नहीं बन पाई है। यह पढ़ने, लिखने, जानने, समझने और बहस करने का समय था। जब-तब इस दौर की बातें चमक कर याद आती हैं। कुल मिलाकर यह तनहाई की जिंदगी ही थी।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 144 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तिरतालीसवाँ पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand3_thumb_thumb_thumb4 का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
हरहाल, जेल से रिहा होने के बाद वही पांडे दारोगा एक दिन इतने अटपटे ढंग से मुझे मिला कि मैं उसे पहचान भी नहीं सका। किसी मामले में आरा जिला अस्पताल के पास मौजूद मुर्दाघर के इर्दगिर्द टहल रहा था, कि तभी पुलिसिया वर्दी में आए एक आदमी ने मुझे नमस्कार किया, मेरा हाथ खींचकर हाथ मिलाया और टपाटप चलता चला गया। मुझे समझ में नहीं आया कि यह कौन है। थोड़ी देर बाद हमारे साथी राजू ने बताया कि यह जो अभी आप से हाथ मिलाकर भागा है, वही पंडइया दरोगवा है। मैंने कहा, बढ़के देखो साला कहां तक पहुंचा है, लेकिन वह दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आया। फिर एक-दो दिन में ही पता चला कि उसने अपना ट्रांसफर किसी और जिले में करा लिया था।
रा से दिल्ली आने के ठीक पहले मुझे खुद को मिली जमानत का राज भी पता चल गया। अदालत में जब हमारे बाकी साथियों को जमानत मिली थी तब तो हमारी अर्जी खारिज हो गई थी, लेकिन दूसरी बार जज ने दारोगा से पूछ लिया कि आपने अभियुक्तों से जो बम बरामद किए हैं, क्या उनकी जांच बैलिस्टिक एक्सपर्ट से करा ली है। दारोगा के पास इसका कोई जवाब नहीं था, क्योंकि एक्सप्लोसिव के केस में ऐसे सवाल ही नहीं पूछे जाते। अदालत की तरफ से यह पूछा ही इसलिए गया क्योंकि संबंधित जज का बेटा हमारे छात्र संगठन आइसा का सदस्य या समर्थक था और उसे मेरे बारे में पूरी जानकारी थी। जब उसे पता चला कि मेरे केस की सुनवाई उसके पिता कर रहे हैं तो उसने उन्हें बताया कि वह तो पढ़ने-लिखने वाले आदमी हैं, पुलिस लालू यादव को खुश करने के लिए जबर्दस्ती उन्हें साल-दो साल जेल में बंद करके रखना चाहती है। यह बात हमारे छात्र नेता कयामुद्दीन ने हमें बताई थी, लेकिन अफसोस कि उस लड़के के बारे में मैं न तब तक कुछ जानता था और न बाद में जान पाया।
1984 से 1996 तक का, उम्र के लिहाज से कहूं तो 20वें साल से 32वें साल तक का मेरा राजनीतिक जीवन इसके बाद के कामकाजी जीवन से इतना अलग है कि इन दोनों को एक सीध में रखकर देखने पर मैं दोनों के साथ अन्याय कर जाऊंगा। निरंतरता जैसा कुछ पहले भी नहीं था, लेकिन 20 की उम्र में आप दिमागी रूप से बिल्कुल अलग ट्रैक पर जाने को तैयार Nostalgiaहोते हैं। बाद के वर्षों में यह सुविधा आपसे छिनती चली जाती है और आपको इसका पता भी नहीं चलता। समय गुजर जाने के बाद खुद को एक राजनीतिक व्यक्तित्व की तरह देखने पर आप जिन चीजों पर गर्व कर सकते हैं, उन्हें ही सुरिक्षत जिंदगी जी रहे एक नौकरीपेशा इन्सान की नजर से देखने पर आपको रोना आता है। एक ठीहे खड़े होकर देखने पर जो चीज वक्त की बर्बादी लगती है, वही दूसरी जगह खड़े होकर देखने पर जीवन का सबसे अच्छा इस्तेमाल नजर आने लगती है।
कुछ समय पहले अपने एक साथी को ब्लॉग की दुनिया में ही अपने राजनीतिक जीवन को सिरे से खारिज करते और उस समय को लेकर पश्चाताप करते देखकर मुझे दिली कोफ्त हुई थी। कहीं भूले-भटके वैसा कोई सिलसिला यहां भी न शुरू हो जाए, इस डर से इस किस्से को फिलहाल मैं यहीं खत्म कर देना चाहता हूं। बतौर कार्यकर्ता सबसे ज्यादा समय मेरा समकालीन जनमत में ही गया था। पहले तीन और फिर कुछ सालों के वक्फे के बाद दो, यानी कुल पांच साल। लेकिन आगे-पीछे फील्ड ऐक्टिविज्म के दौरों से घिरा होने के चलते जनमत में बिताए गए अपने समय की कोई अलग पहचान मेरे दिमाग में नहीं बन पाई है। यह पढ़ने, लिखने, जानने, समझने और बहस करने का समय था। जब-तब इस दौर की बातें चमक कर याद आती हैं। महेश्वर की हंसी, रामजी राय की कहावतें, इरफान की वनलाइनर टिप्पणियां- लेकिन कुल मिलाकर यह तनहाई की जिंदगी ही थी।
क बार आरा में रहते हुए अपने एक सीनियर साथी यमुना जी से मैंने कहा था कि जनमत में रहते हुए जिंदगी मुझे अक्षर जैसी दिखाई देती है। अमूर्त और नीरस, लेकिन शीशे की तरह साफ। मैं जीवन को उसके समूचे झाड़-झंखाड़ के साथ, उसकी जटिलता में जीना चाहता था- उसी के बीच गति और परिवर्तन की गुंजाइश बनाता हुआ। जनमत में यह नहीं था, लेकिन हकीकत में कम्यून की जिंदगी यही थी। बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि और रुझानों वाले पांच-छह लोगों का हर दुख-सुख साझा करते हुए एक साथ रहना। कभी विचारधारा के नाम पर तो कभी सिर्फ बोरियत खत्म करने के लिए एक-दूसरे को कोंचना, और इस दौरान कभी-कभी संवेदनहीनता की हद तक चले जाना। इसका अपना नोस्टैल्जिया है तो इसमें मौजूद तुच्छताओं की यादें भी अब तक- लगभग 15 साल गुजर जाने के बावजूद- काफी गहरी हैं। शायद इस समय को समझने के लिए मुझे किसी और ही जीवन दृष्टि की जरूरत पड़े।

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1 कमेंट्स:

जोशिम said...

नायाब - "...एक ठीहे खड़े होकर देखने पर जो चीज वक्त की बर्बादी लगती है, वही दूसरी जगह खड़े होकर देखने पर जीवन का सबसे अच्छा इस्तेमाल नजर आने लगती है" - अभी तो अपना भी यही ख़याल है गुरुदेव, और ये भी कि तीसरी, चौथी और पांचवी जगहें भी आ जाती हैं लेकिन आगे की सुध लेय में बीती ताहि बिसरती कहाँ है

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