Thursday, January 6, 2011

3/4 एक्सप्लोसिव का केस

पिछली कड़ी- अंधेरी ज़िदगी की दास्तान [बकलमखुद-142]

…मेरे बाकी साथियों पर पुलिस ने बलवा और आगजनी का केस लगाया था, जबकि मुझ पर और पता नहीं क्यों बेचारे धनंजय पर तीन बटे चार एक्सप्लोसिव का ऐडिशनल केस लगा दिया था। यह एक ऐसी धारा थी, जिसका इस्तेमाल उन दिनों राज्य सरकारें किसी को भी आतंकवादी बताकर उसपर टाडा थोपने में कर रही थीं।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 143 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तिरतालीसवाँ पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand3_thumb_thumb का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
जे ल मैं कोई पहली बार नहीं आया था। आंदोलन से जुड़े राजनीतिक जीवन में जेल आना-जाना लगा रहता है। लेकिन इस बार की दास्तान कुछ अलग थी। यह मेरे किसी सोचे-समझे काम का नतीजा नहीं, बिहार की राजनीति में आ रहे एक खतरनाक बदलाव और कुछ हद तक अपनी हठधर्मिता का परिणाम था। 1990 के विधानसभा चुनाव में पूरे राज्य से छह और भोजपुर जिले से आईपीएफ के दो विधायक चुने गए थे। इनमें हमारे एक विधायक श्रीभगवान सिंह के दलबदल करके लालू यादव के साथ चले जाने की सुनगुन हवा में थी। उन्हें इस बारे में सफाई देने के लिए बुलाया गया तो मेरे, कुणाल जी और मास्टर साहब के सामने उन्होंने कसम उठा ली कि मैं मर जाऊंगा, सड़ जाऊंगा, लेकिन पार्टी छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। लेकिन इसके एक-दो महीने बाद ही किसी सुहानी सुबह श्रीभगवान सिंह और नालंदा से हमारे विधायक कृष्णदेव यादव (जूनियर) लालू की पार्टी में चले गए।
मारे जनाधार में इसके खिलाफ गुस्सा था। भोजपुर में इस तरह की यह पहली घटना थी और लोग इसे गद्दारी की गतिविधि की तरह ले रहे थे। आरा शहर में हम लोग किसी और आंदोलन में जुटे हुए थे, कि एक दिन सबेरे करीब दस बजे पार्टी के राज्य नेतृत्व की ओर से हमें सूचना मिली कि शहर के ही एक स्कूल में श्रीभगवान सिंह अपनी कोइरी बिरादरी के कुछ ठेकेदार टाइप लोगों को बुलाकर पार्टी के खिलाफ एक बैठक करने जा रहे हैं। इसका विरोध होना चाहिए। आनन-फानन में कुछ लोगों को जुटाकर हम कतिरा स्कूल पहुंचे तो पता चला कि वहां श्रीभगवान के साथ कुछ बंदूकधारी भी हैं। कानोंकान इसकी गूंज अबरपुल पहुंची तो वहां से कुछ हमारे लोग भी देसी हथियारों के साथ वहां आ पहुंचे। माहौल गरम होना शुरू हुआ तो मेरे सामने दोहरे फंसाव जैसी स्थिति पैदा हो गई। विरोध उग्र होने का मतलब था इधर-उधर से कुछ लोगों का घायल होना या मारा जाना। इसमें पलड़ा हमारा भारी होता तो भी नुकसान हमें ही होना था क्योंकि हमारे ऊपर एक बिरादरी के सम्मेलन पर हमला करने का आरोप लगता। लेकिन सामना हो जाने के बाद चुपचाप पीछे हट जाने का मतलब और बुरा होता क्योंकि इसका संदेश यह जाता कि सीपीआई-एमएल ने लालू की रणनीति और उनकी सरकारी ताकत के सामने घुटने टेक दिए। बीच का रास्ता मुझे यही लगा कि वहीं खड़े-खड़े झटपट एक उग्र सभा कर दी जाए, ताकि अड़ान बनी रहे, लोगों का गुस्सा निकल जाए और खूनखराबे की आशंका भी खत्म हो जाए।
जे की बात यह कि ठीक इसी समय शहर महज दो किलोमीटर दूर पार्टी की तरफ से किसानों का एक जिला स्तरीय सम्मेलन चल रहा था, जिसमें जिला स्तर के ही नहीं, राज्य स्तर के नेता भी मौजूद थे। मैंने फटाफट वहां संदेश भिजवाया कि यहां हम कुछ देर अड़े रहेंगे, आप लोग जल्द से जल्द यहां पहुंचने का प्रयास करें ताकि हम दुम दबाकर नहीं, इज्जत के साथ सभा संपन्न करके वहां से हटें। लेकिन जलते जहाज पर कैसाब्लांका की तरह हम घंटों वहां डटे रहे और सम्मेलन से हमारा एक भी साथी घटनास्थल पर नहीं आया। शुरू में राइफल चमकाने के बाद श्रीभगवान सिंह और उनके लोग स्कूल में चले गए थे तो हमने गेट के सामने सभा शुरू कर दी थी। थोड़ी देर में वहां पुलिस जमा होने लगी, लेकिन हमने इसे bihar jailकोई तवज्जो नहीं दी। फिर एक बार कुछ दौड़-भाग सी मची और हमने देखा कि बीसियों सिपाहियों से लदी एक बड़ी वैन समेत पुलिस की कई गाड़ियां हमें चारो तरफ से घेर रही है। जैसा हमेशा हुआ करता था, ठंडे दिमाग से काम करने वाले पार्टी के भरोसेमंद लोगों ने मेरे चारो तरफ घेरा डाल दिया।
फिर पता चला कि पुलिस के इरादे कुछ और ही थे। मैंने सुफियान से हथियार वाले साथियों को वहां से निकल लेने का संदेश भिजवाया। फिर थोड़ी देर में मुझे लगने लगा कि खामखा हमारे साथी पिट जाएंगे, और घेरे के बाहर गए हथियारबंद लोगों में किसी का माथा घूम गया तो दो-चार पुलिस वाले भी गिरेंगे। मैजिस्ट्रेट की मौजूदगी में डीवाईएसपी ने तुरंत तितर-बितर हो जाने की घोषणा की तो मैंने कहा कि आप हमें अरेस्ट करके ले जाना चाहते हैं तो ले जाएं लेकिन हम यहां से कहीं नहीं हिलने वाले। इस डीवाईएसपी को हम लोगों ने अबरपुल से बैरंग लौटाया था, लिहाजा हमसे खार तो वह खाए ही हुए था। फिर मैं अपने से ही चलकर पुलिस की एक गाड़ी में बैठने लगा तो डीवाईएसपी के प्रति कुछ ज्यादा ही स्वामिभक्ति दिखाने की कोशिश में लगे स्थानीय दारोगा से मेरी कुछ हाथापाई भी हो गई। पुलिस की गाड़ियों में हम कुल बाइस कार्यकर्ता सवार थे। वे घंटों हमें पता नहीं कहां-कहां घुमाती रहीं और फिर अंत में चारो तरफ से घिरी हुई पुलिस लाइन में ले आईं। वहां मुझसे बिना जाने-बूझे एक कागज पर दस्तखत कर देने की एक ऐसी गलती हुई, जो किसी राजनीतिक कार्यकर्ता को कभी नहीं करनी चाहिए।
ही स्थानीय दारोगा, जिसका नाम कोई पांडे था, मेरे सामने एक कागज लेकर आया और कहा कि सर इस पर दस्तखत बना दीजिए। नारेबाजी के बीच मैंने पूछा, यह क्या है तो उसने उसको ऐसे ही एक फार्मलिटी बताया। उस मुड़े हुए रजिस्टर के दूसरी तरफ पुलिसिया जुबान में एक हलफिया बयान दर्ज था कि हम लोग श्रीभगवान सिंह को मारने के इरादे से वहां पहुंचे थे और पुलिस ने हमारे पास से कई सारे जिंदा बम बरामद किए। इस किस्से की जानकारी मुझे काफी बाद में हासिल हुई, लेकिन गलती जो होनी थी वह हो चुकी थी। मेरे बाकी साथियों पर पुलिस ने बलवा और आगजनी का केस लगाया था, जबकि मुझ पर और पता नहीं क्यों बेचारे धनंजय पर तीन बटे चार एक्सप्लोसिव का ऐडिशनल केस लगा दिया था। यह एक ऐसी धारा थी, जिसका इस्तेमाल उन दिनों राज्य सरकारें किसी को भी आतंकवादी बताकर उसपर टाडा थोपने में कर रही थीं। टाडा, यानी जमानत का कहीं कोई मौका ही नहीं। पलामू और औरंगाबाद जिलों में हमारे आंदोलन से जुड़े कई लोगों को इसका शिकार बनाया गया था और लालू यादव के लिए श्रीभगवान की स्ट्रैटजिक जरूरत को देखते हुए तीन बटे चार की बिना पर हमारे खिलाफ भी टाडा लगाए जाने की चर्चा जोरों पर थी।

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3 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आगे का इन्तज़ार

सुरेश शर्मा said...

एक खास दौर की बातें बहुत रोचक अंदाज में बता रहे हैं आप। पिछली कड़ियों में काफी गैप आ जाने से शायद आप साइड बार में लिंक अपडेट नहीं कर पाए हैं। मैं पिछले आलेख भी पढ़ना चाहता हूं।

ali said...

संस्मरण लगातार पढ़ रहा हूं ! बिना पढ़े दस्तखत की भूल भयंकर ही कही जायेगी !

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