Sunday, January 30, 2011

आधी रात का सच...गैस त्रासदी का दस्तावेज़

logo_thumb202_thumb6_thumb3रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है वरिष्ठ पत्रकार विजयमनोहर तिवारी की हाल में प्रकाशित पुस्तक-भोपाल गैस त्रासदी-आधी रात का सच को। हिन्दी में इस विषय पर लिखी गई अपने ढंग कीVMT_ यह अनूठी पुस्तक है।  इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 195 रु है और पृष्ठ संख्या 300 है ।
भो पाल गैस त्रासदी पर यूँ तो बीते पच्चीस बरसों में हज़ारों दस्तावेज़gas विभिन्न संगठनों ने जुटाए और उन्हें न्यायालय ने देखा-परखा। बहुत सामान्य सी, नितांत भारतीय परम्परा के तहत इस मामले में दर्ज़ आपराधिक मुकदमे का फैसला दुर्घटना या हादसे के ठीक पच्चीस साल छह महिने बाद आया। आधी रात का सच एक ऐसी क़िताब है जो हिन्दी में शायद अपनी क़िस्म का अनूठा और पहला दस्तावेज़ है जो भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े तमाम पहलुओं पर बेबाकी से नज़र डालता सा लगता है। त्रासदी के जिम्मेदार लोगों और सरकार के बीच के आपराधिक-षड्यंत्रों, प्रशासन और पुलिस की शर्मनाक लापरवाहियों, पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर सामाजिक संगठनों की बेशर्म खींचतान के बीच मीडिया के सकारात्मक रोल की पड़ताल है यह क़िताब, जिसका महत्व इस त्रासदी पर अब तक लिखी गई तमाम पुस्तकों से किसी मायने में कम इसलिए नहीं है, क्योंकि यही इसके लिखे जाने का सही वक़्त था। यह अलग बात है कि त्रासदी के वक़्त भोपाल में मौजूद तमाम जाने-माने पत्रकारों-सम्पादकों नें टीवी चैनलों, विदेशी अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को आधिकारिक रूप से इस त्रासदी के विभिन्व पहलुओं के बारे में बताया। कभी साक्षात्कारों के जरिए तो कभी खुद की कलम से, मगर सिलसिलेवार कथानक वाली कोई पुस्तक हिन्दी के पत्रकारों ने नहीं लिखी। जो अगर लिखी जाती तो आधी रात का सच जैसी क़िताब अपने मुकाम पर बहुत पहले पहुँच चुकी होती।
फ़ैसला आने के दो हफ़्तों का यह कवरेज इस हादसे से जुड़ी तमाम साजिशों और जानबूझकर की गई लापरवाहियों और अनदेखियों का एक सिलसिलेवार दस्तावेज़ है। यह दस्तावेज़ पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी अभ्यास-पुस्तिका है जो उन्हें उस पत्रकारिता के माएने समझा पाने में कामयाब होगी, जिसे कई बाबूसिफ़त gasमानसिकता के नवागत पत्रकारों ने सिर्फ़ नौकरी का ज़रिया समझ लिया है। इस किताब में विजय बताते हैं कि सौद्देश्य पत्रकारिता से जुड़े संस्थान का न्यूज़ रूम विशिष्ट अवसरों पर किस तरह काम करता है। विजय की लेखकीय प्रतिभा ने यह साबित किया है कि वे एक सिद्धहस्त लेखक हैं और कवितेतर साहित्य की तमाम विधाओं पर उनकी प्रतिभा की सफल आजमाइश के अवसर निकट भविष्य में हमें मिलेंगे। लेखक के रूप में विजय के भीतर का सजग पत्रकार हमेशा हस्तक्षेप करता चलता है फिर चाहे वे साध्वी की सत्ता कथा जैसा उपन्यास लिख रहे हों या हरसूद के विस्थापितों की पीड़ा का लेखाजोखा पेश कर रहे हों।
ताज़ा किताब आधी रात का सच में भी विजय मूलतः एक पत्रकार के रूप में सामने आते हैं। विजय न तो गैस पीड़ित हैं और न ही गैस रिसाव और उसके बाद के दौर के वे कभी चश्मदीद रहे हैं। इसके बावजूद इस भीषणतम औद्योगिक त्रासदी की चौथाई सदी बीतने के बाद जब उन्हें इस त्रासदी के भुक्तभोगियों से रूबरू होने का मौका मिला, उनके भीतर का पत्रकार कसमसा उठा। भोपाल गैस त्रासदी पर यूँ तो कई किताबें बीते ढाई दशक में सामने आई हैं, पर यह विडम्बना ही है कि भोपाल के किसी हिन्दी पत्रकार ने इसे दस्तावेजी रूप देने की कोशिश नहीं की, मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए किसी और फॉर्मेट में लिखने की तो बात ही अलग है। इसीलिए विजय ने गैस त्रासदी का विलम्बित फैसला आने पर दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूज़ रूम की टीम का एक हिस्सा रहते हुए इस त्रासदी को जिस तरह समझा, उसे किताब की शक्ल में पेश किया है।
क रचनाधर्मी, चाहे वह किसी भी क्षेत्र या विधा से संबंधित हो, किसी घटना विशेष पर भावग्रहण के स्तर पर उसकी संवेदनाएं सामान्यजन से कहीं अधिक सघन और संप्रेषण के स्तर पर कहीं अधिक तरल होती हैं। संवेदनशील रचनाधर्मी के मनोमस्तिष्क में हमेशा एक टाईममशीन रहती है जिसके जरिए वह घटना से जुड़े पहलुओं को परखने के लिए कालातीत यात्रा करता है और फिर उसकी कलम इस निराली यायावरी को किसी भी रूप में अभिव्यक्त करती है। विजय ने भी पच्चीस सालों कें घटनाक्रम को टाइममशीन में बैठकर एकबारगी देखा, समझा और फिर एक पत्रकार की डायरी की शक्ल में बेबाकी से सबके सामने ला रखा है। किताब लिखते हुए जो अनुभूति विजय को हुई उसे विजय खुद बयान करते हैं-
"सत्ता के शिखरों पर चलनेवाली धोखेबाजी, सौदेबाजी, साजिशो और बईमानी की अंतहीन कहानी का यह एक नमूना भर है। इसमें एक हाईप्रोफाइल सनसनीखेज धारावाहिक का पूरा पक्का मसाल है। गैस त्रासदी आज़ाद भारत का अकेला ऐसा मामला है, जिसने लोकतंत्र के तीनो स्तंभों को सरे बाज़ार नंगा किया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कई अहम ओहदेदार एक ही हमाम के निर्लज्ज नंगों की क़तार में खड़े साफ़ नज़र आए।"
gasविजय इस किताब को दो सप्ताह की डायरी कहते हैं। सच है। डायरी में सचाई पैबस्त होती है और इस किताब की हर इबारत सच्ची है। मगर फ़ारमेट के स्तर पर यह किताब डायरी से अलहदा एक ऐसी विधा है जिसका नामकरण करने के लिए समालोचकों को शायद माथापच्ची करनी पड़े, मगर रचनाकर्म से जुड़े लोगों के लिए अभिव्यक्ति का एक रास्ता और खुल गया है। तीनसौ पृष्ठ की इस किताब को प्रकाशित किया है भोपाल के ही बेन्तेन बुक्स ने जो प्रकाशन की दुनिया में एकदम नया नाम है। बेन्तेन के प्रवर्तक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की साज-सज्जा और सुरुचि के साथ पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरे हैं। इनके पास अत्याधुनिक मुद्रण तकनीक, उच्चस्तरीय डिज़ाइनिंग भी है और ये जानी-मानी पुस्तक वितरण व्यवस्था से जुड़े हैं। संस्थान से भविष्य में इसी तरह के सुरुचिपूर्ण प्रकाशनों की उम्मीद की जानी चाहिए।
विशेष-रविवारी पुस्तक चर्चा स्तम्भ आज से बंद किया जा रहा है। अन्यान्य व्यस्तताओं के चलते हम इसे नियमित नहीं रख पा रहे है। उधर नई पुस्तकों से गुज़रना लगातार जारी है पर उनकी समीक्षा लिखने का वक़्त निकालना दुश्वार हो रहा है। जल्द ही इसकी जगह सिर्फ़ पुस्तक चर्चा स्तम्भ फिर शुरु होगा जिसमें एकाधिक पुस्तकों के बारे में बात होगी।
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Wednesday, January 26, 2011

अलमस्त, बेपरवाह...बोले तो बिन्दास...

bindaas

माजवाद के शलाकापुरुष डॉ राममनोहर लोहिया ने भारत की विलक्षण संस्कृति के संदर्भ में एक बार कहा था कि तीन चीज़ों के पक्ष में हिन्दुस्तान में हमेशा बहुमत दिखता है- एक -गाँधी, दो-हिन्दी, तीन-मुंबइया फिल्में। क़रीब पांच दशक पहले कही इस बात में मुझे ज्यादा बदलाव की गुंजाईश आज भी नज़र नहीं आती। यहाँ संदर्भ सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुंबइया फिल्मों का रिश्ता दरअसल हिन्दी से ही है और इस तरह उनकी दो बातों में प्रकारान्तर से हिन्दी का महत्व ही उजागर हो रहा है। मुंबइया फिल्में चाहे मुख्यधारा की हिन्दी में बनती हों, मगर उनके ज़रिए भी हिन्दी को मुंबइया शैली की हिन्दी से परिचित होने का मौका मिला है और आज मुख्यधारा की बोलचालवाली हिन्दी में कई मुंबइया शब्द प्रचलित हैं। ऐसा ही एक शब्द है बिन्दास। अलमस्त, बेपरवाह, बेधड़क, लाफ़िक्र जैसी अर्थवत्ता वाला यह वाक्य दशकों पहले भी युवपीढ़ी का प्रिय था और आज भी है। अपुन तो बिन्दास हैं का मतलब ही यह है कि बोलनेवाला बंदा नए ज़माने का युवा है। युवा होने का अर्थ ही है बेफ़िक्र, लापरवाह और निडर। मज़े की बात ये कि कुछ विशेषण सिर्फ़ युवाओं के लिए होते हैं मगर बिन्दास युवा के लिए भी उतना ही मौजूं है जितना युवती के लिए। अल्ट्रा मॉड अभिनेत्रियों पर युवावर्ग जान छिड़कता है, मगर संभव है उनमें बिन्दास शायद एकाध ही निकले।
बिन्दास एक रहस्यमय शब्द चाहे न हो, मगर इसमें एक ऐसा क़िरदार पिन्हां है, जिसके जैसा होना हर युवा चाहता है। किसी ज़माने में बिन्दास शब्द को टपोरी शब्द माना जाता था, मगर अब इसका प्रयोग ठसके के साथ हर वर्ग में होता है। बिन्दास बना है मराठी के बिन उपसर्ग में धास्त लगने से। बिन + धास्त = बिनधास्त> बिन्दास के क्रम में इसका उद्भव हुआ। मराठी के बिन का वही अर्थ है जो हिन्दी में बिन, बिना का होता है। बिन में रहित, सिवाय, बगैर का भाव है। संस्कृत के विना से यह बना है। यह बना है वि+ना दिलचस्प है कि संस्कृत के ना में भी नहीं, नकार का भाव है और इससे आगे लगे वि उपसर्ग में भी विलोम या रहित का भाव है। संस्कृत-हिन्दी के बीच का परिवर्तन में होता है सो विना को बिना होना ही था। मराठी में भी यही रूप प्रचलित हुआ। मराठी के धास्त का अर्थ है प्रलय, अनिष्ट की कल्पना करना, भय, विनाश जैसे भाव इसमें हैं। यह बना है संस्कृत के ध्वस / ध्वस का अपभ्रंश रूप है जिसमें नष्ट होने, चूर चूर होने, नीचे गिरने, बर्बाद होने जैसे भाव हैं। इस अर्थ में संस्कारी मराठी ने जो शब्द बनाया, वह था धास्त में निर् उपसर्ग लगाकर निर्धास्तनिर् में भी नकार का भाव है इस तरह निर्धास्त का अर्थ हुआ निश्चिन्त, बेफ़िक्र, निडर, निर्भय, बेपरवाह। बिनधास्त, निरधास्त ये शब्द निर्भय, बेफिक्र, मस्त रहने के लिए होते हैं। निर्धास्त जहां निश्चिन्तता के अर्थ में रूढ़ है वहीं बिनधास्त ने अपनी अर्थवत्ता का और विस्तार किया साथ ही कुछ रूपान्तर भी। इसकी भावाभिव्यक्ति बिन्दास में हुई मस्तमौला,  अलमस्त, बेपरवाह के रूप में।

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Tuesday, January 25, 2011

तारीखों का चक्कर-मिती, बदी, सुदी

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क्सर शादी-ब्याह की पत्रियों और ज्योतिषीय पत्रकों-पंचांगों में तिथियों का उल्लेख जहाँ भी होता है वहाँ मिति-सुदी-बदी जैसे शब्द ज़रूर आते हैं मसलन मिति फागुन बदी पांच या मिति कातिक सुदी चौथ वगैरह वगैरह। सबसे पहले बात मिति की। हिन्दी में इसे मिती लिखने का चलन है। मिति में मूलभाव तिथि या या तारीख़ का है। जिस तरह से आजकल तिथि का उल्लेख करते वक्त दिनांक का उल्लेख सबसे पहले होता है उसी तरह पुरानी पद्धति में अथवा यूँ कहें कि महाजनी पद्धति में देशी महिनों के नामों के साथ तारीख का उल्लेख करते हुए दिनांक की जगह मिति का प्रयोग होता था जैसे मिति कातिक चौथ सुदी अर्थात कार्तिक मास का चौथा दिन।
प्टेकोश के मुताबिक मिति का मूलरूप संस्कृत का मितिः है जो मि से बना है जिसमें मापना, प्रत्यक्ष ज्ञान करना या स्थापित करना जैसे भाव हैं। इससे मित या मिति जैसे शब्द बने हैं जिनमें मापा हुआ, नपा-तुला, सीमाबद्ध, मर्यादित, जाँचा-भाला जैसे भाव हैं। तिथि में ये सभी भाव स्पष्ट हैं। तिथि वह गणना है जो काल विशेष को निर्दिष्ट करती है। इसकी सीमा तय है। यह एक मर्यादा में बंधी है अर्थात निश्चित पहरों के बाद तिथि बदलती है। इसीलिए मिति का एक अन्य भाव है साक्षात प्रमाण या साक्ष्य। ज्योतिषीय निष्कर्षों के सत्यापन का काम बिना तिथि गणना के असंभव है। हिन्दी शब्दसागर के अनुसार मिती में परिमाण, सीमा, कालावधि का भाव है। दिया हुआ वक्त या मोहलत भी मिति है। मिति पूजना मुहावरे का एक अर्थ है आयु के दिन पूरे होना।
हाजनी पद्धति में मिति का खास महत्व है क्योंकि ब्याज की गणना मे मितियों का बड़ा महत्व है। मितिकाटा एक प्रणाली है जिसके तहत अगर समयपूर्व हुंडी की रकम चुकता कर दी जाए तो शेष दिनों का ब्याज काटने की क्रिया को मितिकाटा कहते हैं। मूलतः मितिकाटा शब्द मिति काटना से बना है जिसका अर्थ है ब्याज काटना। मिती चढ़ाना यानी 200px-Hindu_calendar_1871-72तारीख़ लिखना या ब्याज की गणना करना, मिती पूजना या मिती उगना का अर्थ है हुंडी की अवधि पूरी होना, भुगतान का दिन आना। अब आते हैं बदी और सुदी पर।
बदी और सुदी मूलतः बदि और सुदि हैं। आमतौर पर माना जाता है कि बड़े शब्दों या पदों के संक्षिप्तिकरण की परिपाटी हिन्दी में अंग्रेजी से आई है जैसे भारतीय जीवन बीमा निगम के लिए भाजीबीनि, भारतीय जनता पार्टी के लिए भाजपा आदि। गौरतलब है कि बदि और सुदि दोनों शब्द हिन्दी के प्राचीनतम संक्षिप्तरूप हैं जो मूल पदों के लगातार प्रयुक्त होने से पंडितों ने खुद ही बनाए। यह अंग्रेजों के आने से सैकड़ों वर्ष पहले ही हो चुका था।
दुनियाभर की काल गणना प्रणालियाँ चान्द्रमास पर आधारित हैं जिसमें चन्द्रकलाओं अर्थात उसके घटने और बढ़ने की गतियों को ध्यान में रखा जाता है। भारत में इसे शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष कहते हैं। शुक्ल पक्ष वह अवधि है जब चांद बढ़ता है और पूर्णता प्राप्त करता है। घटते हुए दिन अर्थात अमावस्या की ओर बढ़ते दिन कृष्णपक्ष कहलाते हैं। भारतीय समाज शुरु से ही तिथि-वार और शकुनविचार का महत्व रहा है। ऐसे में बारह महिनों के दौरान तिथियों का लेखा जोखा रखनेवाले पंडितों ज्योतिषियों के लिए हर बार माह के उजियारे दिनों (पक्ष, पाख) अथवा अंधियारे पाख  का उल्लेख करना आवश्यक होता था। इस तरह उजियारे पाख को हर बार शुक्ल दिवस लिखना ज़हमत का काम लगा सो उन्होंने उसे शुदि लिखना शुरू कर दिया। हिन्दी की पूर्वी शैलियों में अक्सर के में बदलने की प्रवृत्ति रही है सो शुदि पहले सुदि हुआ फिर भाषा में स्वर के दीर्घीकरण की वृत्ति के चलते यह सुदी बन गया। यही बात कृष्णपक्ष के संदर्भ में हुई। संस्कृत में बहुल का एक अर्थ होता है काला। कृष्ण पक्ष के लिए ज्योतिषीय भाषा में बहुल दिवस या बहुल कृष्णदिवस पद प्रसिद्ध रहा है जिसका संक्षेप हुआ बदि जो बाद में दीर्घीकरण के चलते बदी हो गया। सुदी बदी के प्रयोग सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखित ज्योतिषीय ग्रन्थों में भी मिलते हैं।
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Sunday, January 23, 2011

भुस भरना और फिर पालना...

संबंधित आलेख-1.पलंगतोड़ के बहाने पालकी का सफर2.पाटील का दुपट्टा3.बस्ती थी, बाज़ार हो गई [आश्रय-7]straw 
शुओं के चारे को आमतौर पर भूसा कहा जाता है। भुस यानी सूखी हुई घास-पात, अनाज का सूखा छिलका, चोकर चोई, खोई भुस आदि। भूसा को फूसा भी कहा जाता है। पलंग या पालना जैसे शब्द इसी पुआल के संबंधी हैं। हों भी क्यों ना, किसी ज़माने में तो गद्दों में पुआल या भूसा ही भरा जाता था। भूसा शब्द बना है हिन्दी की भुस् धातु से जिसमें छिलका, फालतू, फेंका हुआ, प्रक्षिप्त जैसे भाव हैं। भुस् के मूल में भी संस्कृत की भुष् या बुस् धातु हैं। जॉन प्लैट्स के अनुसार यह बुष् है और हिन्दी शब्दसागर, वृहत् हिन्दी कोश या अलायड चैम्बर्स ट्रान्सलिट्रेटेड हिन्दी अंग्रेजी कोश के मुताबिक इसका मूल बुस् है। बुस् में घास-पात, तृण, तिनका, खर-पतवार अथवा कूड़ा-कर्कट आदि जैसे भाव निहित हैं। वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में बुस् धातु का अर्थ छोड़ना, उगलना, उडेलना भी इसका अर्थ बताया गया है। स्पष्ट है कि बुस् क्रिया के जरिये उस चीज़ की ओर संकेत है जो त्याज्य है, अनुपयोगी है और जिसे बाईप्रॉडक्ट ( उपोत्पाद ) या उपजात श्रेणी में रखा जा सकता है।

बुषम् या बुसम् का अर्थ है बूर, भूसी, कूड़ा-गंदगी, गायका सूखा गोबर आदि। आप्टेकोश में बुषम् का एक अन्य अर्थ धन-दौलत भी बताय है। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में संस्कृत के बुसिका से इसकी रिश्तेदारी बताई गई है। बुस् से पाली में भुस, प्राकृत में बुसिआ, बांग्ला में बुशी, गुजराती में भुसो, भुस, पंजाबी में भुस, हिन्दी में कहीं कहीं भूस भूसा में अनुस्वार लगाकर भूंस, भूंसा भी लिखा जाता है और फूस शब्द भी प्रचलित है जैसे घास-फूस या फूस का छप्पर आदि। सिन्धी में का बदलाव मे होता है इस तरह भूस का बूह या बुहा जैसे रूपान्तर सामने आते हैं। भुस या भूसा से हिन्दी के कुछ प्रचलित मुहावरे भी जन्मे हैं जैसे खाल में भुस भरना यानी एक तरह से जान से मारने की धमकी। लाक्षणिक अर्थ किसी काम का न रहने देना। भुस की दीवार यानी अविश्वसनीय या काल्पनिक बात। भुस फटकारना यानी व्यर्थ श्रम करना। भुस में आग लगाकर तमाशा देखना अर्थात व्यर्थ का टंटा खड़ा करने के बाद तमाशाई की मुद्रा में आ जाना। जिस स्थान पर भूसे का भण्डारण होता है उसे भूसा या भुसौरा कहते हैं ।
न्हीं अर्थों में पुआल शब्द का प्रयोग भी हिन्दी में खूब होता है। भूसा और पुआल मूलतः एक ही हैं। पुआल का एक रूप पयाल भी है जो पूर्वी बोलियों में ज्यादा प्रचलित है। घास के तिनकों का गठ्ठर या समूह को मालवी राजस्थानी में पूला कहते हैं जो इसी पुआल का रिश्तेदार। पुआल मूलतः किसी भी अनाज जैसे जौ, गैहूँ या मक्का के बचे हुए वे डण्ठल हैं जिनसे दाने अलग कर लिए गए हैं। पयाल या पुआल बना है संस्कृत के पलालः से जिसका अर्थ है पुआल या अनाज की भूसी। पलालः बना है संस्कृत की पल् धातु से जिसमें विस्तार का भाव है। मराठी में रोटी के लिए पोळी शब्द है जो बना है
strawhut"पल्ली मूलतः आबादी, बसाहट का सूचक है। पट्ट या पत्त से बने पट्टण या पत्तन की तरह ही इसका विकास हुआ है। पत्त यानी पत्ता अर्थात पत्तों से बना छप्पर ही मूलतः पट्टण या पत्तन का आदिरूप है। छप्पर ही प्राचीन आश्रय था."
इसी पल् धातु से जिसमें विस्तार, फैलाव, संरक्षण का भाव निहित है इस तरह पोळी का अर्थ हुआ जिसे फैलाया गया हो। बेलने के प्रक्रिया से रोटी विस्तार ही पाती है। पत्ते को संस्कृत में पल्लव कहा जाता है जो इसी धातु से बना है। पत्ते के आकार में पल् धातु का अर्थ स्पष्ट हो रहा है अर्थात वृक्ष के अन्य उपांगों की तुलना में पत्ता चौड़ा, सुविस्तारित और चपटा होता है। हरी सब्जियों को भाजी-पाला कहा जाता है । प्रसिद्ध शाक 'पालक' को भी इसी क्रम में देखें ।  हिन्दी का पेलना, पलाना जैसे शब्द जिनमें विस्तार और फैलाव का भाव निहित है इसी श्रंखला में आते हैं।
राठी मे पुआल से पुवाळणें जैसी क्रिया भी बनती है। हिन्दी में इसका रूप बनेगा पुआलना जिसका अर्थ है पुचकारना, शांत करना। भाषा की अर्थवत्ता किस तरह बदलती है, यह उसका उदाहरण है। पुआल अपने आप में अनाज के डण्ठल को कहते हैं जो पशुओं का चारा है। जीवधारियों की आदिम शंका है भूख का निवारण होना अन्यथा वह उधम मचाता है। मनुष्य हो या पशु, अगर उसे खाना दे दिया जाए तो वह शांत हो जाता है। इस अर्थ में पुवाळणे जैसी क्रिया में भोजन देकर पुचकारने, शांत करने का भाव विलक्षण है। पल् से ही बना है भागने, फ़रार होने या किसी काम को छोड़ने के संदर्भ में पलायन जैसा शब्द। गौर करें पलायन में निहित भागने के भाव पर। पलायन दरअसल एक बिन्दु से दूर जाना ही है। दूर जाना ही विस्तार है। एक स्थानवाची शब्द है जो विभिन्न बस्तियों के पीछे प्रत्यय की तरह लगा नज़र आता है जैसे पल्ली।  यह पल्ली मूलतः आबादी, बसाहट का सूचक है। पट्ट या पत्त से बने पट्टण या पत्तन की तरह ही इसका विकास हुआ है। पत्त यानी पत्ता अर्थात पत्तों से बना छप्पर ही मूलतः पट्टण या पत्तन का आदिरूप है। छप्पर ही प्राचीन आश्रय था, बाद में  इन्हीं आश्रयों के इर्दगिर्द बसाहटें हुईं। पट्टण, पत्तन या पल्ली नामधारी आबादियाँ बड़े व्यावसायिक केंद्र हुईं। पल्ली मे्ं भी पल् से जुड़े विस्तार का भाव है। पल् से पल्लव और फिर पत्तों का छाजन यानी झोपड़ी। फूस की छोपड़ी या छाजन को इस पल्ली में पहचानें तो अपने आप त्रिचनापल्ली, तिरुचिरापल्ली, गंगापल्ली या पाली जैसे नामों का अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है।
लना, पालना जैसे शब्दों में भी यही पल् धातु है। पालन-पोषण जैसे शब्द में पल में निहित विस्तार का भाव साफ़ है। किसी बच्चे की परवरिश उसके विकास से जुड़ी है। यही पालन है। पालना यानी बड़ा करना अर्थात विकसित करना या विस्तार देना। पालनकर्ता को पालक कहा जाता है । झूले को पलना कहते हैं। शिशु का शुरुआती जीवन पलने में ही बीतता है अर्थात उसका पालन पलने में होता है इसलिए शिशु की शैया को पलना कहते हैं। वैसे पलना का अर्थ ऐसी शैया है जिसे पलाया, फैलाया अर्थात झुलाया जा सके। पलंग, पालकी जैसे कुछ अन्य शब्द हैं जो इसी पल् धातु से जुड़े हैं। ढाक के पेड़ को पलाश भी कहते हैं। इस वृक्ष के पत्ते खूब चौड़े होते हैं। पलाश भी इसी मूल से जन्मा है। काल की ईकाई क्षण के लिए एक अन्य लोकप्रिय शब्द है पल जो इसी कतार में खड़ा है। समय लगातार परिवर्तनशील है और विस्तार पाता रहता है। काल की सबसे छोटी ईकाई होने के नाते सर्वप्रथम पल को ही विस्तार मिलता है। इसलिए क्षण को पल भी कहा जाता है।
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Friday, January 21, 2011

मजनूँ की औलाद और दीवाना

पिछली कड़ी-जिन्न का जनाज़ा और जीनियस MadLibs
जि न्न शब्द में निहित अदृष्य आत्मा की अर्थसत्ता जब बढ़ी तो इसके साथ चमत्कार भी जुड़े। जिन्न से आविष्ट व्यक्ति में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उससे अजीबोग़रीब हरकतें कराता है, जिसके मद्देनज़र बाद में इस धातु में अर्थविस्तार हुआ और इसका एक अर्थ उन्माद भी हुआ। सेमिटिक मूल की धातु j-n-n या g-n-h की अर्थवत्ता व्यापक है। हज़रत इनायत ख़ान के मुताबिक जुनून शब्द भी इसी मूल से उपजा है जिसमें हठ के साथ उन्माद भी शामिल है। हिन्दी में जुनून शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। इसका संक्षिप्त रूप जुनूँ है जिसमें उन्माद, पागलपन, बौराना जैसे भाव है। सनकी व्यक्ति को जुनूनी भी कहा जाता है।
जुनून की चरमसीमा विक्षिप्त हो जाना है। जुनूँ में ही उपसर्ग लगने से बना है मज्नूँ जिसका प्रचलित रूप मजनूँ है। किन्तु इस धातु में निहित आवरण अथवा अदृष्य जैसे भावों पर गौर करें तो जुनूँ का अर्थ ज्यादा आसानी से समझ आता है। दरअसल मजनूँ वह है जिसकी समझदारी या तो नुमाँया नहीं होती या जिसका लोप है। मजनूँ का प्रचलित अर्थ प्रेमोन्मादी होता है। हर पागल आशिक को मजनूँ की उपाधि मिल जाती है। मजनूँ दरअसल इतिहास प्रसिद्ध आशिक है जिसकी प्रेमिका लैला थी। लैला से बेइंतेहा इश्क करते हुए उसने जुनूँ की हदें पार करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी इसीलिए उसे मजनँ कहा गया वर्ना उसका भी एक ख़ूबसूरत नाम हुआ करता था-क़ैस इब्न मुलव्वह। सातवीं सदी के अरब साहित्य के इस प्रसिद्ध प्रेमाख्यान की नायिका लैला का पूरा नाम था-लैला बिन महदी इब्न साद। यूँ उसे लैला अल आमीरिया के नाम से भी जाना जाता था। मज्नूँ का मूलार्थ अरबी में पागल या उन्मादी ही है। मजनूं शब्द में मुहावरे की अर्थवत्ता है। मजनूं की औलाद उसे कहा जाता है जिसके सिर पर इश्क का भूत सवार हो।
दीवाना diwana शब्द मूलतः फ़ारसी से हिन्दी में आया है जहाँ इसका मूल रूप दीवानः है। दीवाना का अर्थ है उन्मादग्रस्त, पागल, विचलित। दीवाना का अर्थ हिन्दी में मूलतः प्रेमोन्मादी व्यक्ति के रूप में लगाया जाता है। यहाँ दीवाना वही है जिसमें मजनूं की सिफ़त है। किन्तु फ़ारसी में दीवाना या दीवानगी में किसी काम के प्रति पागलपन भरी निष्ठा रखनेवाला, जुनून रखने का भाव निहित है। दीवाना वह भी है जो विषयासक्त है और जिसमें अतिन्द्रीय शक्ति हो और वह भी जो भ्रान्त, सनकी, उत्तेजित, उद्भ्रान्त, पागल या उन्मत्त या विक्षिप्त हो। इससे दीवानापन या दीवानगी जैसे लफ़्ज़ भी बने है। दीवाना शब्द बना है ज़ेन्दावेस्ता के देवो / देवा / देव से जिसका अर्थ है शैतानी शक्तियों का स्वामी अथवा इन्द्र। गौरतलब है कि इस देवो का रिश्ता भारोपीय भाषा परिवार के उसी द्यू / द्युओस से है जिसका अर्थ संरक्षक या ईश होता है। इसके मूल में भारतीय तथा ईरानी आर्यों की वैचारिक मतभिन्नता सामने आती है।
रथ्रुस्त्र का काल क़रीब ईसापूर्व दस सदी का माना जाता है। हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास पुस्तक में उदयनारायण तिवारी लिखते हैं कि जरथुस्त्र के पूर्व के ईरानीय-आर्य, भारतीय-आर्यों की भाँति ही यज्ञपरायण तथा देवोपासक थे।
लैला से बेइंतेहा इश्क करते हुए उसने जुनूँ की हदें पार करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी इसीलिए उसे मजनँ कहा गया वर्ना उसका भी एक ख़ूबसूरत नाम हुआ करता था-क़ैस इब्न मुलव्वह
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अवेस्ता में आज भी उस प्राचीन-धर्म के चिह्न उपलब्ध हैं। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि ज़रथ्रुस्त्रीय-धर्म ग्रहण करने के पश्चात् भारतीय तथा ईरानीय आर्यों में पारस्परिक विद्वेष हो गया। इसके प्रमाण देव तथा असुर शब्द हैं। किसी समय भारतीय एवं ईरानी आर्यों वंशज एक ही स्थान पर रहते होंगे। कालान्तर में आर्थिक एवं धार्मिक कारणों से दोनों में झगड़ा हुआ तथा परिणामतः ये दो शाखाओ में विभक्त हो गए। एक शाखा ईरान में जाकर बस गई तथा दूसरी आगे बढ़ती हुई भारतवर्ष में आकर पंजाब में बस गई। इस विभेद का प्रभाव इनके विचारों पर भी पड़ा। पहले दोनों ही देव शब्द से तात्पर्य देवता से लेते थे परन्तु मतभेद के कारण अब ईरानियों के लिए देव का अपकर्ष हो गया और भारतीय आर्यों के लिए असुर का। ईरानियों ने असुर को देवता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। ईरानीयों में देव का अर्थ है अपदेवता अथवा राक्षस। इस प्रकार आर्यों के प्राचीन देवता नासत्य एवं इन्द्र आदि ईरानियों के लिए अपदेवता बन गए हैं। अवेस्ता में देव शब्द का अर्थ यही है। ठीक इसी प्रकार संस्कृत में असुर शब्द के अर्थ में विपर्यय हो गया है। ऋग्वेद के प्राचीनमंत्रों में असुर शब्द वरुण आदि देवताओं के विशेषण के रूप में व्यवहृत हुआ है। अवेस्ता में भी ईश्वर को अहुरमज़्दा-असुरमेधा अथवा महद्ज्ञानस्वरूप कहा गया है, किन्तु आगे चलकर वैदिक साहित्य में ही असुर शब्द देव विरोधी अथवा राक्षास वाची हो गया। इस प्रकार इन दो शब्दों में ईरानीय तथा भारतीय आर्यों के धार्मिक कलह का इतिहास सन्निविष्ट है।
जॉन प्लैट्स के अनुसार ज़ेद के दिव, देव, देउआ (dev div) से ही पह्लवी में dee बना। इसमें ज़ेंद का अन या अना प्रत्यय लगने से फ़ारसी का दीवाना शब्द बना। दो आर्य समूहों में वैचारिक भिन्नता के चलते ही देवासुर जैसे शब्दों की अर्थवत्ताएँ बदली। जेंदावेस्ता में देव शब्द का अर्थ शैतानी शक्ति समझा गया है और इन्द्र को सचमुच शैतान माना गया है। गौरतलब है कि देव शब्द का विस्तार कई भाषाओं में हुआ है जैसे बलूची, कुर्दिश और आर्मीनियाई में  यह द्यु है। इसी तरह देवता के लिए इंडो-यूरोपीय धातु है deiwos. इससे विभिन्न भाषाओं में सर्वशक्तिमान, शक्तिशाली के अर्थ में कई शब्द बने हैं जैसे जर्मनिक भाषाओं में टिवाज़, तो लटिन परिवार की भाषाओं में डियस, इंडो-ईरानी परिवार में देव या दैवा और बाल्टिक परिवार में दैवस् जैसे शब्द बने हैं। ग्रीक ज्यूस या जीयस, रोमन जुपिटर और वैदिक द्यौसपितर जैसे शब्द भी इसी कड़ी से जुड़े हैं। दिन के लिए दिवस शब्द के मूल में भी यही धातु काम कर रही है। दिव् मे सर्वशक्तिमानता के साथ साथ प्रकाश, प्रभा, आभा जैसे आदभाव भी हैं जिनके जरिए सर्वप्रथम मनुष्य को सूर्य के पिण्ड में प्रकाश और ताप की अलौकिक अनुभूति हुई थी। देव के साथ अलौकिकता का भाव तो शुरू से रहा है। दीवाना शब्द से कुछ मुहावरे भी जुड़े हैं जैसे दीवानगी की हद से गुज़र जाना यानी उन्माद का अत्यधिक बढ़ जाना, दीवाना होना यानी किसी बात के प्रति अत्यधिक झुकाव होना वगैरह।
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लाहोल बिला कूबत इल्ला बिल्ला...

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स्लाम के तहत ईश्वर के प्रति अपने भाव अभिव्यक्त करने के अनेक वाक्यांश हिन्दी में भी प्रचलित हैं जिनका प्रयोग हिन्दी में भी खूब होता है। एक भाषा का शब्द या मुहावरा जब दूसरी भाषा में दाखिल होता है तो उसकी अभिव्यक्ति में कुछ न कुछ फ़र्क़ ज़रूर आता है। लाहौल विला कुव्वत ऐसा ही एक वाक्यांश है जो हिन्दी में भी नाटकीय भावाभिव्यक्ति की शैली में खूब इस्तेमाल होता है। फिल्मों में, किताबों में और नाटकों में इस उक्ति का प्रयोग खूब किया जाता रहा है। ख़ासतौर पर मुस्लिम क़िरदारों के मुँह से या ऐसे हिन्दू पात्रों की ज़बानी जो उर्दू या ठेठ हिन्दुस्तानी ज़बान बोलते हैं जिस पर उर्दू-फ़ारसी का गाढ़ा रंग चढ़ा है। लाहौल विला कुव्वत को अलग अलग ढंग से हिन्दी में इस्तेमाल किया जाता है जैसे लाहोल बिला कूवत, लाहौल बिला कूवत, लाहौल बिला कूबत और लाहौल विला कुव्वत। असल में यह उक्ति या वाक्यांश अधूरा है। अरबी में इसका पूरा रूप है- ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह। हिन्दी का ठेठ देसीपन इसमें भी घालमेल करता चलता है और इसका रूपांतर लाहोल बिला कूवत इल्ला बिल्ला हो जाता है।
रअसल यह इश्वर की प्रशंसा में कही गई उक्ति है जिसका उल्लेख कुर्आन के हदीस hadith में है। गौरतलब है कि शरीयत के चार प्रमुख स्रोतों में कुरान kuraan हदीस hadith , इज्मा ijma और कियास qiyas आते हैं। शरीयत में कुरान और हदीस को ही सर्वोपरि माना गया है। कुरान तो पैगंबर के वचनों का संग्रह है और उसे खुदाई माना जाता है जबकि हदीस में उनके हवाले से कही गई बातें लिखी हैं। विद्वानों का मानना है कि इसमें समय समय पर मिलावट होती रही है। बहरहाल हदीस में पैग़म्बर साहब के हवाले से इस शानदार उक्ति का कई बार उल्लेख होता है जो उन्होंने ईश्वर की प्रशंसा में कही है। मूलतः आज जिस रूप में लाहौल विला कुव्वत का उल्लेख होता है उसका इस्तेमाल उन हालात में होता है मानो कोई काम बिगड़ जाए, अच्छी भली बात बिगड़ जाए, किसी की शान के ख़िलाफ़ हिमाक़त हो जाए, बेशर्मी की हदें टूट जाएं वगैरह वग़ैरह। मिसाल के तौर पर लज़ीज़ पुलाव खाते हुए दाँतों के बीच कंकर आने पर इस उक्ति का इस्तेमाल मुमकिन है। मूलतः यह इसका सही इस्तेमाल नहीं है पर आज की भाषा में यही प्रचलित मायने है।
बसे पहले जानते हैं लाहौल विला कुव्वत अर्थात ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह के सही मायने। मोटे तौर पर इसका भाव यही है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। शब्दशः इसका अर्थ हुआ ईश्वर के सिवाए दुनिया में दूसरी कोई शक्तिमान और सामर्थ्यवान नहीं है। यहाँ कुव्वता शब्द का इस्तेमाल हुआ है जो कूवत के तौर पर रोज़मर्रा की हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दो में शामिल है। कुव्वता बना है मूलरूप से अरबी के क़ाविया से जिसका अर्थ है कठोर, मज़बूत। इसका धातुरूप है q-w-y जिसका अर्थ है शक्ति देना, मज़बूती देना। इसी मूल से जन्मा है तकावी या तकाबी शब्द जो भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक आम शब्द है। तकावी का मोटा मोटा अर्थ है अकाल, ग़रीबी जैसे कारणों से उबरने के लिए किसान को राज्य की ओर से मिलनेवाली मदद। भाव है उसे सामर्थ्यवान बनाना। बाद के दौर में la ilaतकावी एक कर्ज़ भी हो गई। एक राज्य में ऋण की व्यवस्था भी उसे आदर्श होने का दर्जा देती है। यह व्यवस्था भी बहुत प्राचीन है। राजा की तरह वणिकों ने भी तकावी शुरू कर दी और यह किसान के शोषण का औज़ार हो गया। बहरहाल बात कुव्वत की हो रही थी। क़ुव्वत का बहुवचन है क़ावा। स्पष्ट है कि कुव्वत यानी हिन्दी के कूवत / कूबत में सामर्थ्य का भाव विद्यमान है। हौल शब्द की विस्तृत व्याख्या किसी अन्य कड़ी में की जाएगी फ़िलहाल इतना ही कि हिन्दी के हवाला शब्द की रिश्तेदारी इससे ही है जिसमें अदला-बदली, परिवर्तन जैसे भाव हैं। कुल मिलाकर अभिप्राय यही है कि ईश्वर की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न तो कोई चीज़ अपने आप सामर्थ्यवान हो सकती है और न ही उसका रूप बदल सकता है। इस सृष्टि में कोई भी हेर-फेर, परिवर्तन सिर्फ़ और सिर्फ़ खुदा की मर्ज़ी से ही हो सकता है।
ल्पना करें कि किसी का कोई काम बिगड़ जाता है, कुछ अनहोनी हो जाती है, जिसे होना कुछ था और हो कुछ जाता है ऐसे प्रसंगों में आमतौर पर हिन्दी की भावाभिव्यक्ति कुछ यूँ होती है- होई वही जो राम रचि राखा। ईश्वर जो करता है, अच्छा करता है। प्रभु की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। स्पष्ट है कि लाहौल विला कुव्वत का इस्तेमाल मूल रूप से इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनज़र होना चाहिए। मगर भाषा लगातार विकसित होती चलती है। इस्लामी शासन के दौर और शेरो-शायरी वाले सामंती समाज की यह देन रही कि नवाबों से नवाज़े गए तमाम लोग फ़ारसीदाँ बनने की होड़ में शामिल हो गए, ठीक वैसे ही जैसी होड़ बाद में अंग्रेजों के चप्पू-चापलूसों में लगी थी। अपने फ़ारसी बोलनेवाले आक़ाओं के अंदाज़ फ़ारसी की मिसालें और मुहावरे इस्तेमाल करने का शग़ल उन्हें तो रुतबा दिला गया, साथ ही हिन्दी को भी ठेठे भारतीय अंदाज़ वाली एक उक्ति मिल गई, जिसका इस्तेमाल अपने मूल से हटकर भावाभिव्यक्तियों के लिए सहायक बना। इसका फ़ायदा हिन्दीभाषियों ने ही नहीं, खाँटी उर्दूदाँ लोग भी आज तक उठा रह हैं।
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Thursday, January 20, 2011

सम्पादक, एडिटर और मुदीरे-आला

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हि न्दी में सम्पादक शब्द से सभी परिचित हैं। किसी अख़बार, पत्र-पत्रिका की सामग्री का चुनाव करनेवाले व्यक्ति को सम्पादक कहते हैं। और ज्यादा स्पष्ट करें तो वह व्यक्ति जो किसी पत्र-पत्रिका, पुस्तक या ग्रंथ की सामग्री का चयन करे, विषयवार उसे व्यवस्थित रूप दे, उसकी भाषा से लेकर सज्जा तक हर काम का संयोजन-नियोजन जिसके जिम्मे हो और इसके बाद उसे वह प्रकाशन योग्य बनाए, वही सम्पादक है। सम्पादक शब्द बना है संस्कृत पद में सम् उपसर्ग लगने से के [ सम् + पद् + णिच् + ण्वुल ] । बृहत हिन्दी शब्दकोश में सम्पादक का जो अर्थ दिया है उसके मुताबिक किसी भी काम को पूरा करनेवाला, पूर्ण करनेवाला, तैयार करनेवाला सम्पादक कहलाता है। किसी समाचार पत्र-पत्रिका, ग्रंथ की सामग्री को प्रकाशन योग्य बनानेवाला या उसका सम्पादन करनेवाला सम्पादक होता है। संस्कृत में पद का अर्थ है पंक्ति, लकीर, कतार, कविता की पंक्ति, हासिल करना, पाना, पास जाना, पहुंचना, पालन करना आदि। संस्कृत का सम् उपसर्ग बहुत व्यापक अर्थवत्ता रखता है पर मोटे तौर पर इसमें समान करना, साथ-साथ, एक जैसा, बराबर आदि। सम् में पद् मिलकर बनता है सम्पादक। सम्पादन वह क्रिया है जो सम्पादक करता है। मूलतः लिखित सामग्री को ठीक करने के काम के संदर्भ में देखें तो सम्पादक का अर्थ स्पष्ट होता है। पद अर्थात किसी लिखित पंक्ति को वर्तनी, व्याकरण की दृष्टि से ठीक करना अर्थात सभी पदों को सम् यानी ठीक करना। सम् पदन् की यह क्रिया ही सम्पादन कहलाती है।
खबारों-पत्रिकाओं में सम्पादक का पद महत्वपूर्ण होता है। सम्पादक वह है जो मुद्रित सामग्री के प्रकाशन से जुड़े सभी पक्षों की गुणवत्ता के लिए उत्तरदायी होता है। सम्पादक शब्द बना है सम्पादः से जिसका रिश्ता भी इसी पद से है। सम + पदन् के योग से बने इस शब्द में किसी कार्य के उचित ढंग से करने अर्थात निष्पादन का भाव है जो इसी मूल का शब्द है। सम्पादन अर्थात एडिटिंग के संदर्भ मे देखें तो लिखी हुई इबारतों को सुधारना ही सम्पादन है अर्थात पदों को समान करना, उन्हें सही करना। संस्कृत में सम्पादनम् का अर्थ है सही करना, साफ करना, तैयार करना, पूरा करना आदि। एडिटिंग के संदर्भ में मूल भाव पदों अर्थात लिखित सामग्री में सुधार करना ही है। बोल-व्यवहार में सम्पादन शब्द की अर्थवत्ता ज्यादा व्यापक है। “वह अपने काम का सम्पादन ठीक से नहीं कर पाया” जैसा वाक्य किसी सम्पादक के लिए नहीं कहा गया है बल्कि जिम्मेदारी ठीक से न निभा पाने के सन्दर्भ में कहा गया बेहद सामान्य वाक्य है। आप्टे कोश के मुताबिक सम्पादन का अर्थ है निष्पादन, कार्यान्वयन, पूरा करना, उपार्जन करना, प्राप्त करना, स्वच्छ करना, साफ़ करना आदि। इन सभी अर्थों में पद को सम करने की बात स्पष्ट हो रही है। सम्पादक के साथ उप, सहायक, कार्यकारी, प्रबंध या प्रधान जैसे शब्दों के जुड़ने के साथ सम्पादक शब्द का रुतबा भी बढ़ता जाता है।
अंग्रेजी में सम्पादक को एडिटर कहते हैं और यह शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो लिखित सामग्री को प्रकाशन योग्य बनाए। एडिटर भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार यह लैटिन मुहावरे e ditus से बना है जिसका मतलब है आगे बढ़ाना। मूलतः इसमें भाव प्रस्तुत करने या समुचित रूप से तैयार करने से है। यहाँ डिटस का रिश्ता तिथि के लिए अंग्रेजी शब्द डेट date से है। डिटस बना है डेटस datus से जिसका अर्थ है प्रदत्त, दिया हुआ आदि। इसकी मूल भारोपीय धातु है do- जिसकी समानार्थक संस्कृत धातु दा है जिसमे देने का भाव है। भारत में उर्दू पत्र-पत्रिकाएं भी निकलती हैं। उर्दू में सम्पादक को मुदीर कहते हैं। यह सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है। फ़ारसी में इसका रूप मोदीर, तुर्की में मुदुर और अज़रबैजानी में मूदिर हो जाता है। यह बना है सेमिटिक धातु dwr से जिसमें भ्रमण, घुमाना, चक्कर देना, इर्द-गिर्द जैसे अर्थ निहित हैं। इसकी अर्थवत्ता में किसी तथ्य पर सम्यक विचार करना, चिन्तन-मनन करना जैसे भाव शामिल हैं। इस तरह मुदीर का अर्थ हुआ संचालक, निर्देशक, नियंत्रक आदि। सम्पादक जैसी व्यवस्था बीती कुछ सदियों की देन है जिसके लिए यह शब्द चुना गया तब से मुदीर शब्द सम्पादक के लिए रूढ़ हो गया है। प्रधान सम्पादक को मुदीरे-आला कहा जाता है। महिला सम्पादक या सम्पादिका के लिए मुदीरः या मुदीरा शब्द प्रचलित है।

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Monday, January 17, 2011

टैक्सी की तकनीक, टैक्स की दक्षता

पिछली कड़ियाँ--1.हाथों की कुशलता यानी दक्षता 2.दक्षिणापथ की प्रदक्षिणा

ज का दौर तकनीक का है और कामयाबी के लिए मनुष्य को तकनीकी रूप से दक्ष होना बेहद ज़रूरी है। इस वाक्य में आए तकनीक और दक्ष शब्दों का न सिर्फ जन्म एक ही मूल से हुआ है बल्कि अर्थ में भी काफी समानता है। सबसे पहले बात तकनीक की। दरअसल यह शब्द अंग्रेजी के टेक्नीक से लिया गया है और tax-dayपिछले पाँच छह दशकों से हिन्दी में खूब प्रयोग किया जा रहा है। इसका अर्थ है सूझ बूझ, चातुर्य, शिल्प, कौशल, यांत्रिक हुनर अथवा कारीगरी।  तकनीक शब्द का मुख्य आधार यह अंग्रेजी शब्द ग्रीक मूल का है और तेख्ने से बना है। टेक्निकल, टेक्नो, टैक्नोक्रेट, टेक्नोलाजी जैसे कई शब्द भी इसी मूल आधार से जन्मे हैं। दरअसल संस्कृत की धातु दक्ष से ही ग्रीक तेख्ने, संस्कृत हिन्दी के ही दक्ष और तक्ष जैसे शब्द बने। संस्कत हिन्दी में जहाँ दक्ष का अर्थ किसी काम में निपुण. योग्य, चतुर और कुशल होता है, वहीं तक्ष का अर्थ किसी चीज़ को बनाना, निर्माण करना और रचना है। इसके अलावा छीलना, काटना, तोड़ना व तराशना जैसे अर्थ भी इसमें समाहित हैं। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक बढ़ई का काम कुछ गणसमाजों में बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा, इसलिए इस शब्द का प्रयोग कारीगर विशेष के लिए होने लगा। ग्रीक भाषा में उसका सम्बन्ध सामान्य कौशल से है। तैख़्ने अर्थात कौसल और तैख़्नितेस यानी कलाकार, कारीगर। यह शब्द फ्रैंच से होता हुआ अंग्रेजी में टेक्नीक बना। हिन्दी में इसने तकनीक, तकनीकी जैसे रूप ग्रहण किए। टैक्नीशियन यानी दस्तकार, शिल्पी। अब इस शब्द का प्रयोग इंजीनियर या मशीनी काम जाननेवाले के संदर्भ में होता है।
गौरतलब है कि तक्ष के छीलना, चीरना, काटना, छेनी से तराशना, गढ़ना, बनाना जैसे अर्थ काष्ठकला के संदर्भ में हैं इसीलिए संस्कृत में बढ़ई को तक्षन् या तक्षक भी कहा जाता है। तक्षक यानी किसी भी कार्य का सूत्रधार, देवताओं का वास्तुकार। इसीलिए देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा का नाम तक्षक भी है। तक्षक एक प्रतिष्ठित नाग का नाम भी है जो नागलोक अर्थात पाताल में रहता है। वृहत्तर भारत के पश्चिमोत्तर स्थित प्रसिद्ध शिक्षाकेंद्र तक्षशिला को याद करें। इसका इतिहास पुराणों तक जाता है। कहते हैं कि भरत, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा, अपने पुत्र तक्ष के लिए यह नगर बसाया था। तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी और करीब डेढ़ हजार वर्ष पहले तक वहाँ आबादी थी। तक्षशिला के अवशेष आज के रावलपिण्डी के इर्दगिर्द बिखरे हुए हैं। चाणक्य यहीं पढ़ाते थे और चंद्रगुप्त यहीं पढ़े थे।
खास बात यह कि लकड़ी के काटे और तराशे जा चुके सुडौल टुकड़े के लिए फ़ारसी में तख़्तः शब्द बना है जिसे हिन्दी में तखता या तखती कहते हैं। मद्दाह साहब के उर्दू हिन्दी कोश के अनुसार इसका अर्थ है लकड़ी का लम्बा,चौड़ा और थोड़ा मोटा टुकड़ा, जहाज़ के फ़र्श का हर टुकड़ा जो लकड़ी का हो, काग़ज़ की शीट, लकड़ी का वह पटरा जिस पर मुरदा नहलाया जाता है। यह मूल रूप से तक्ष ही है। बाद में लकड़ी से बनी चौकी, पलंग और बादशाह के आसन के अर्थ में फारसी उर्दू में तख़्त शब्द चल पड़ा। बड़ा, ज्येष्ठ के अर्थ में भी तख्त का प्रयोग होता है। अब तो तख़्त का अर्थ ही हुकुमत हो गया है। तख्त से जुड़े कई पद हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे तख़्तनशीं या तख़्तेशाही यानी बादशाह के बैठने का राजसिंहासन। यही भाव तख्ते-ताऊस में साफ़ नुमांया हो रहा है जिसे शाहजहाँ ने बनवाया था। इसी कड़ी में आता हैं तख़्तोताज जिसका अर्थ है शासनसूत्र, राज्यभार, हुकुमत का इंतजाम या तख़्तेसुलेमानी जैसे शब्द। जाहिर है दक्ष-तक्ष से तख़्त तक इस शब्द के रूप बदले मगर अर्थ में ज्यादा बदलाव नहीं आया।

car_clipart_taxi... टैक्सी taxi किसी ज़माने में टैक्सीमीटर कार हुआ करती थी अर्थात ऐसी सवारी गाड़ी जिसमें बैठने के बाद मनचाहे गंतव्य का भाड़ा अपने आप मीटर के ज़रिये पता चल जाए। इसकी शुरुआत जर्मनी में 1890 के आसपास मानी जाती है।...

गौरतलब है कि तक्ष, दक्ष से जुड़े सभी शब्दों में काम करना प्रमुख है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है हाथों का प्रयोग। दक्ष में दाहिने हाथ का भाव निहित है। ज़ाहिर है बाँए की तुलना में दायाँ अधिक कुशल होता है सो कुशल के अर्थ में दक्ष शब्द रूढ़ हो गया। दक्ष का अगला रूप तक्ष हुआ जिसमें कुशल कारीगर, कलाकार की अर्थवत्ता निहित है। यह परिवर्तन भारोपीय भाषा परिवार के नक्शे पर पूर्व से पश्चिम तक सभी भाषाओं में हुआ। संस्कृत में हाथ के लिए हस्त शब्द है। बरास्ता अवेस्ता, इसका फ़ारसी रूप होता है दस्त। दस्ताना इसी कड़ी में आता है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार पूर्ववैदिक किसी मूल मूल भाषा में इन दोनों का रूप था धस्त। अवेस्ता में धस्त से का लोप होकर दस्त शेष रहा और संस्कृत में का लोप होकर हस्तः बचा। इसमें मूल धातु दस् है। इससे ही दक्ष जैसी क्रिया भी जन्मी। उनके अनुसार अंग्रेजी की टेक take क्रिया का रिश्ता भी इससे ही है। टेक take  यानी लेना। लेने का काम हाथों से ही होता है। क्ष से बनी दक्षिणा का एक लक्षण कर का भी है। इसी तरह टेक क्रिया से ही टैक्स tax यानी कर जुड़ा है। जिसे लिया जाए वही है कर। हिन्दी का कर भी इसी लिए टैक्स है क्योंकि इसका जन्म भी संस्कृत धातु कृ से हुआ है जिसमें करने का भाव शामिल है। जाहिर है लेना भी एक क्रिया ही है और देना भी। कर चुकाने के लिए कार्य करना पड़ता है जो हाथों से ही होता है। हाथ के लिए कर शब्द भी इसी मूल से निकला है।
यूँ अंग्रेजी के टैक्स का रिश्ता डगलस हार्पर की एटिमऑनलाईन के अनुसार टैक्स का रिश्ता भारोपीय धातु tag- से है जिसमें छूने या हाथों में थामने, संभालने का अर्थ निहित है। गौर करें यहाँ भी हाथ या करने की क्रिया प्रभावी हो रही है। वैसे यह कोश अंग्रेजी की टेक क्रिया की व्युत्पत्ति को अज्ञात भी बताता है। जो भी हो, डॉ शर्मा इस दिशा में ठोस संकते तो करते ही हैं। दुनियाभर में सवारी गाड़ी के रूप में मशहूर टैक्सी का रिश्ता भी इसी शृंखला से जुड़ा है। टैक्सी taxi किसी ज़माने में टैक्सीमीटर कार हुआ करती थी अर्थात ऐसी सवारी गाड़ी जिसमें बैठने के बाद मनचाहे गंतव्य का भाड़ा अपने आप मीटर के ज़रिये पता चल जाए। इसकी शुरुआत जर्मनी में 1890 के आसपास मानी जाती है। अंग्रेजी का टैक्स बना है लैटिन के टैक्सेयर taxare से जिसमें छूने, पकड़ने, थामने का भाव है। मूल रूप से इसका अर्थ था कर लगाना या कर लेना।  बात चाहे टैक्सी चलाने की हो या टैक्स वसूलने की, हर काम में दक्षता ज़रूरी है। टैक्स वसूलने में जहाँ खासी समझ की ज़रूरत होती है वहीं टैक्स चुकाना भी समझदारी का ही काम है।

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Saturday, January 15, 2011

अपना अपना नास्टैल्जिया [बकलमखुद-144]

…जनमत में बिताए गए अपने समय की कोई अलग पहचान मेरे दिमाग में नहीं बन पाई है। यह पढ़ने, लिखने, जानने, समझने और बहस करने का समय था। जब-तब इस दौर की बातें चमक कर याद आती हैं। कुल मिलाकर यह तनहाई की जिंदगी ही थी।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 144 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तिरतालीसवाँ पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand3_thumb_thumb_thumb4 का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
हरहाल, जेल से रिहा होने के बाद वही पांडे दारोगा एक दिन इतने अटपटे ढंग से मुझे मिला कि मैं उसे पहचान भी नहीं सका। किसी मामले में आरा जिला अस्पताल के पास मौजूद मुर्दाघर के इर्दगिर्द टहल रहा था, कि तभी पुलिसिया वर्दी में आए एक आदमी ने मुझे नमस्कार किया, मेरा हाथ खींचकर हाथ मिलाया और टपाटप चलता चला गया। मुझे समझ में नहीं आया कि यह कौन है। थोड़ी देर बाद हमारे साथी राजू ने बताया कि यह जो अभी आप से हाथ मिलाकर भागा है, वही पंडइया दरोगवा है। मैंने कहा, बढ़के देखो साला कहां तक पहुंचा है, लेकिन वह दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आया। फिर एक-दो दिन में ही पता चला कि उसने अपना ट्रांसफर किसी और जिले में करा लिया था।
रा से दिल्ली आने के ठीक पहले मुझे खुद को मिली जमानत का राज भी पता चल गया। अदालत में जब हमारे बाकी साथियों को जमानत मिली थी तब तो हमारी अर्जी खारिज हो गई थी, लेकिन दूसरी बार जज ने दारोगा से पूछ लिया कि आपने अभियुक्तों से जो बम बरामद किए हैं, क्या उनकी जांच बैलिस्टिक एक्सपर्ट से करा ली है। दारोगा के पास इसका कोई जवाब नहीं था, क्योंकि एक्सप्लोसिव के केस में ऐसे सवाल ही नहीं पूछे जाते। अदालत की तरफ से यह पूछा ही इसलिए गया क्योंकि संबंधित जज का बेटा हमारे छात्र संगठन आइसा का सदस्य या समर्थक था और उसे मेरे बारे में पूरी जानकारी थी। जब उसे पता चला कि मेरे केस की सुनवाई उसके पिता कर रहे हैं तो उसने उन्हें बताया कि वह तो पढ़ने-लिखने वाले आदमी हैं, पुलिस लालू यादव को खुश करने के लिए जबर्दस्ती उन्हें साल-दो साल जेल में बंद करके रखना चाहती है। यह बात हमारे छात्र नेता कयामुद्दीन ने हमें बताई थी, लेकिन अफसोस कि उस लड़के के बारे में मैं न तब तक कुछ जानता था और न बाद में जान पाया।
1984 से 1996 तक का, उम्र के लिहाज से कहूं तो 20वें साल से 32वें साल तक का मेरा राजनीतिक जीवन इसके बाद के कामकाजी जीवन से इतना अलग है कि इन दोनों को एक सीध में रखकर देखने पर मैं दोनों के साथ अन्याय कर जाऊंगा। निरंतरता जैसा कुछ पहले भी नहीं था, लेकिन 20 की उम्र में आप दिमागी रूप से बिल्कुल अलग ट्रैक पर जाने को तैयार Nostalgiaहोते हैं। बाद के वर्षों में यह सुविधा आपसे छिनती चली जाती है और आपको इसका पता भी नहीं चलता। समय गुजर जाने के बाद खुद को एक राजनीतिक व्यक्तित्व की तरह देखने पर आप जिन चीजों पर गर्व कर सकते हैं, उन्हें ही सुरिक्षत जिंदगी जी रहे एक नौकरीपेशा इन्सान की नजर से देखने पर आपको रोना आता है। एक ठीहे खड़े होकर देखने पर जो चीज वक्त की बर्बादी लगती है, वही दूसरी जगह खड़े होकर देखने पर जीवन का सबसे अच्छा इस्तेमाल नजर आने लगती है।
कुछ समय पहले अपने एक साथी को ब्लॉग की दुनिया में ही अपने राजनीतिक जीवन को सिरे से खारिज करते और उस समय को लेकर पश्चाताप करते देखकर मुझे दिली कोफ्त हुई थी। कहीं भूले-भटके वैसा कोई सिलसिला यहां भी न शुरू हो जाए, इस डर से इस किस्से को फिलहाल मैं यहीं खत्म कर देना चाहता हूं। बतौर कार्यकर्ता सबसे ज्यादा समय मेरा समकालीन जनमत में ही गया था। पहले तीन और फिर कुछ सालों के वक्फे के बाद दो, यानी कुल पांच साल। लेकिन आगे-पीछे फील्ड ऐक्टिविज्म के दौरों से घिरा होने के चलते जनमत में बिताए गए अपने समय की कोई अलग पहचान मेरे दिमाग में नहीं बन पाई है। यह पढ़ने, लिखने, जानने, समझने और बहस करने का समय था। जब-तब इस दौर की बातें चमक कर याद आती हैं। महेश्वर की हंसी, रामजी राय की कहावतें, इरफान की वनलाइनर टिप्पणियां- लेकिन कुल मिलाकर यह तनहाई की जिंदगी ही थी।
क बार आरा में रहते हुए अपने एक सीनियर साथी यमुना जी से मैंने कहा था कि जनमत में रहते हुए जिंदगी मुझे अक्षर जैसी दिखाई देती है। अमूर्त और नीरस, लेकिन शीशे की तरह साफ। मैं जीवन को उसके समूचे झाड़-झंखाड़ के साथ, उसकी जटिलता में जीना चाहता था- उसी के बीच गति और परिवर्तन की गुंजाइश बनाता हुआ। जनमत में यह नहीं था, लेकिन हकीकत में कम्यून की जिंदगी यही थी। बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि और रुझानों वाले पांच-छह लोगों का हर दुख-सुख साझा करते हुए एक साथ रहना। कभी विचारधारा के नाम पर तो कभी सिर्फ बोरियत खत्म करने के लिए एक-दूसरे को कोंचना, और इस दौरान कभी-कभी संवेदनहीनता की हद तक चले जाना। इसका अपना नोस्टैल्जिया है तो इसमें मौजूद तुच्छताओं की यादें भी अब तक- लगभग 15 साल गुजर जाने के बावजूद- काफी गहरी हैं। शायद इस समय को समझने के लिए मुझे किसी और ही जीवन दृष्टि की जरूरत पड़े।

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Friday, January 14, 2011

फ़रमान सुनें या प्रमाण मानें

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हि न्दी में सैकड़ों बरसों से अरबी-फ़ारसी मूल के हजारों शब्दों की आमदरफ़्त होती रही है। रोजमर्रा की बोलचाल में इनमें से कितने ही लफ़्ज़ विविध भावों की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक हो चुके हैं। अरबी भाषा भारोपीय भाषा परिवार से जुदा है और सेमिटिक भाषा परिवार की है जबकि फ़ारसी इंडो-ईरानी परिवार की भाषा है जिसमें द्रविड़ भाषाओं को छोड़कर अधिकांश भारतीय भाषाएं शामिल हैं। सामान्यतौर पर किसी से कुछ कहने का आग्रह करने के लिए फ़रमाना शब्द की मुहावरेदार और आदरयुक्त अभिव्यक्ति लोगों को पसंद आती है। कहिए के बजाय फ़रमाइये का शिष्टाचार सभी को अच्छा लगता है। फ़रमाना शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आए उन सैकड़ों शब्दों में शुमार है जो हिन्दी की ज़रूरत बन चुके हैं। फ़रमाना का एक रूप फ़र्माना भी है। मराठी में यही रूप चलता है। फ़रमाना बना है फ़ारसी के फ़र्माँ (फ़रमान) से जिसका अर्थ है राजाज्ञा, हुक़ुम, आज्ञापत्र, शासक का आदेश आदि। फ़रमान में निहित भावों पर गौर करें तो पता चलता है कि फ़रमाना शब्द में महज़ कहिए की अर्थवत्ता नहीं है बल्कि इसका मूल अर्थ भी ‘आदेश करिए’ ही है। बाद में शिष्टाचार की शब्दावली के तहत इसमें ‘कहिए’ की अर्थवत्ता भी समा गई। इसमें मूल भाव ‘जो हुक़्म मेरे आक़ा’ वाला ही है।

फ़रमान शब्द बहुत पुराना है और इसकी रिश्तेदारी संस्कृत के प्रमाणम् से है। संस्कृत में एक धातु है मा जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना करना आदि भाव हैं। इससे ही बना है माप शब्द। किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः उपमा शब्द का प्रयोग किया जाता हैं। यह इसी कड़ी का शब्द है। इसी तरह प्रति उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला प्रतिमा शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है। दिलचस्प बात यह कि फारसी का पैमाँ, पैमाना या पैमाइश शब्द भी इसी मूल से जन्मा है। गौरतलब है कि संस्कृत 'प्रति' उपसर्ग के मुकाबले में ज़ेन्द उपसर्ग है 'पैति' । पैति+मा = पैमाँ और यह बराबर है हमारे प्रतिमान के । इस तरह प्रतिमान के समतुल्य है फ़ारसी का पैमाँ या पैमान मा में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रमा, आप्टे कोश में जिसका अर्थ है दिया है प्रतिबोध, प्रत्यक्षज्ञान, यथार्थ जानकारी आदि। किसी वस्तु का आकार, लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई आदि की जानकारी ही प्रत्यक्षज्ञान कहलाती है। प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् ।  प्र+मा के साथ जब ल्युट् प्रत्यय लगता है तो बनता है प्रमाणम् जिसमें लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, आकार, विस्तार जैसे भाव शामिल हैं। इसका अगला भाव विस्तार है साक्ष्य, सबूत, शहादत आदि। प्रमाण शब्द इसी कड़ी का है। प्रमाणम् का एक अन्य है अधिकारी, आदेशकर्ता, निर्णयकर्ता आदि। सभी आयामों के साथ प्रत्यक्ष ज्ञान में सत्य और यथार्थ का भाव है। अपने मूल रूप में आदेश या आज्ञा यथार्थ की स्वीकारोक्ति या हकीक़त को मंजूर करना है सो प्रमाण का एक अन्य अर्थ आज्ञा भी हुआ, मगर प्रमाणपत्र का प्रचलित अर्थ सर्टिफ़िकेट अर्थात वह दस्तावेज़ जिससे कोई बात सिद्ध होती हो, कोई तथ्य सत्यापित होता हो।
भाषा विज्ञानियों ने इसी प्रमाण से फ़रमान का विकास माना है। इंडो-ईरानी परिवार की एक अन्य सदस्य भाषा है जेंद-अवेस्ता जिससे संस्कृत का बहनापा है। संस्कृत का प्रमाणम् जेंद में फ्रमान के रूप में उभरा जिसमें आदेश, विधान,
documents"फ़ारसी के फ़रमान की रिश्तेदारी चिट्ठी, आज्ञापत्र की अर्थवत्ता रखनेवाले परवाना शब्द से भी है जो हिन्दी-मराठी में खूब प्रचलित है"
नियम या अनुज्ञा जैसे भाव हैं। इसका पह्लवी और पारसी रूप हुआ फ़्रमाना जो फ़ारसी में आकर फ़र्माँ (फ़रमान) हो गया। गौर करें है जेंद का फ्रा = प्र और संस्कृत के मा = मान पर। ये एक ही हैं। पह्लवी में प्रधानमंत्री के लिए वूजुर्ग फ्रामादार (wuzurg framādār) शब्द मिलता है। संस्कृत में भी प्रमाणपुरुष उस व्यक्ति को कहते हैं जो सर्वमान्य हो,  जिसे पंच मानने को सब तैयार हों, जो सत्यवादी हो और विश्वसनीय हो। ज़ाहिर है ऐसा व्यक्ति ही न्याय कर सकता है।  फ़ारसी के फ़रमान की रिश्तेदारी चिट्ठी, आज्ञापत्र की अर्थवत्ता रखनेवाले परवाना शब्द से भी है जो हिन्दी-मराठी में खूब प्रचलित है। इजाज़त के अर्थ में परवानगी शब्द भी जाना-पहचाना है। फ़ारसी में फ़रमान-बर-दार शब्द भी चलता है मगर प्रचलित है फ़र्माँबरदार अर्थात आज्ञाकारी, ताबेदार, चाकर आदि। फ़र्मांबरदारी यानी आज्ञापालन करना, स्वामीभक्ति आदि। फ़र्माँगुजार या फ़र्मांरवाँ का अर्थ है शासक, हाकिम या बादशाह। फ़र्मांगुज़ारी में रहना यानी किसी की चाकरी या शासन में रहना। किसी किस्म की माँग या तलबी के संदर्भ में भी फ़र्माईश या फ़रमाईश शब्द हिन्दीवालों की ज़बान पर चढ़ा रहता है। यह भी इसी मूल से निकला है। फरमाईशी यानी जिसकी फ़रमाईश की गई हो। जॉर्जियाई में भी इस मूल से बना है पारमानी जिसका अर्थ है आज्ञापत्र, परमिट या लाईसेंस। आर्मीनियाई में फ्र से का लोप हो गया और बचा रह गया ह्र, इससे बना ह्रामन जिसमें आदेश का भाव है।
मा में निहित पैमाईश के भावों पर कुछ और गौर करें। अंग्रेजी में मेट्रिक्स का अर्थ होता है मापना। यह बना है भारोपीय धातु मे me से जिसके लिए संस्कृत मे मा धातु है। इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं। अंग्रेजी के मेट्रिक्स का रिश्ता अंतरिक्ष की परिमाप और उसके विस्तार से भी जुड़ता है। यानी बात खगोलपिंडों तक पहुंचती है। भारतीय परम्परा में मा धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है। मा धातु में चमक, प्रकाश का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से। प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ तो उसने इनमें दिलचस्पी लेनी शुरू की। स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए मा शब्द रहा होगा। मा के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी परिमाप भी शामिल है। यूं चंद् धातु में भी चमक का भाव है और इससे ही चन्द्रमा शब्द बना है किन्तु चन्द् शब्द को विद्वानों ने बाद का विकास माना है। गौर करे कि फारसी का माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में मा ही झांक रहा है जो चमक और माप दोनों से संबंधित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चान्द से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है। और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है। अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही मा है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का मून moon है। रिश्तेदारी साफ है। माप-जोख सबसे पहले अगर हमने सीखी तो धरती और चांद से ही।
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Wednesday, January 12, 2011

दक्षिणापथ की प्रदक्षिणा

4306402370_e862354ab5पिछली कड़ी-हाथों की कुशलता यानी दक्षता

क्ष में भी चतुर, योग्य, कुशल, निपुण या सक्षम का भाव है। दक्ष एक पौराणिक चरित्र भी हैं जिन्हें दक्ष प्रजापति भी कहा जाता है। ये ब्रह्मा के दस पुत्रों में एक थे। इनका जन्म ब्रह्मा के दाहिने अंगुठे से हुआ था। दक्ष को मानवसमाज के पितृपरक कुलों का प्रधान माना जाता है। इसकी पुत्री सती थी जिसका विवाह शिव से हुआ था। इसका एक रूप दाहिना या दायाँ भी है। स्पष्ट है कि दायाँ हाथ ही सर्वाधिक कुशल और कार्यक्षम होता है। दक्ष से दाहिना बनने का क्रम कुछ यूँ रहा- दक्षिण > दक्खिन > दहिन > दाहिना जैसे रूप सामने आए। बाद में दाहिना > दाह्याँ > दायाँ जैसे रूप भी बने। दक्षिण का देशी रूप दखिन बनता है। सिंधी में इसे डखिणु कहते हैं और कानड़ी में इसका रूप टेंकण बनता है। दक्षिण के दक्कन-दख्खन और अंग्रेजी के डेक्कन जैसे रूपान्तर भी हिन्दी में प्रचलित हैं। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में संस्कृत दक्ष के समतुल्य dek धातु तलाशी गई है जिसमें सामर्थ्य और क्षमता का भाव है मगर मूल भाव है दायाँ हाथ। इसका एक रूप अवेस्ता में दह्स बना है जिसमें दायाँ का भाव है, ग्रीक में यह डेज़ है तो लात्वियाई में डेक्स dex, लिथुआनानी में यह डेस्जीन deszine स्लाव में यह डेस्नू desneu है और गोथिक में taihswa है। कुशलता, प्रवीणता या निपुणता के अर्थ में अंग्रेजी का डेक्स्टेरिटी शब्द भी इसी मूल से जन्मा है।
पटेकोश के मुताबिक दक्ष में इसमें ईमानदार, खरा, निष्कपट और शिष्ट शालीन जैसे भाव भी हैं। दक्ष से बने दक्षिण में भी चतुर, योग्य, कुशल, निपुण या सक्षम का भाव है। दक्षिण से ही बना है दक्षिणा जिसमें दक्षिण दिशा का भाव है। दक्षिणा का प्रचलित अर्थ है ब्राह्मणों को दी गई भेंट उपहार आदि है। इसमें दान, शुल्क, पारिश्रमिक आदि भी समाहित हैं। आज के दौर में रिश्वत को भी दक्षिणा कहा जाता है। भारत के दक्षिणी प्रदेशों को दक्षिणापथ कहा जाता है। प्रजापति दक्ष की पुत्री का नाम भी दक्षिणा है और दान की बछिया को भी दक्षिणा कहते हैं। अच्छी दुधारू गाय भी दक्षिणा है और दक्षिण दिशा भी दक्षिणा है। दक्षिण में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रदक्षिण जिसमें दक्षिण की ओर रखा हुआ या दाईं ओर घूमनेवाला, सम्मानित और शृद्धालु का भाव है। दक्षिणम् में जाना, बाईं और से दाईं ओर गमन करने का भाप प्रदक्षिण में निहित है। आपटे कोश के अनुसार दक्ष से ही दाक्षायणी भी बना है। इसका अर्थ है 27 नक्षत्रों के मण्डल का कोई एक नक्षत्र। दाक्षायणी पार्वती का भी एक नाम है। 27 नक्षत दक्ष की पुत्रियों के प्रतीक हैं। रेवती नक्षत्र को भी दाक्षायणी कहते हैं। दाक्षिणात्य का अर्थ है दक्षिण दिशा या दक्षिण देश का।
मतौर पर प्रदक्षिणा का अर्थ होता है किसी मंदिर या प्रतिमा के चारों और घूमना या परिक्रमा करना। मूलतः यह शब्द बना है संस्कृत के दक्षिण शब्द से जिसका अर्थ होता है योग्य, कुशल, निपुण, दायां या दक्षिणी। इसमें प्र उपसर्ग लगने से बना प्रदक्षिणा जिसका मतलब हुआ दाहिनी ओर स्थित या दाईं ओर घूमना। दिलचस्प बात यह कि प्रदक्षिणा की धार्मिक-- दार्शनिक व्याख्या ज़रूर हिन्दूधर्म शास्त्र में मिलती है मगर प्रदक्षिणा की परिपाटी कमोबेश हर धर्म में है। बौद्ध स्तूपों, चैत्यालयों, पगोडाओं में प्रदक्षिणापथ होते हैं। जैन मंदिरों में भी ये होते हैं। हज के दौरान काबा के पत्थर के चारों ओर संभवत दुनिया का सबसे बड़ा हूजूम जो परिक्रमा कर रहा होता है उसे क्या कहेंगे ? इस्लामी चिन्तन के दायरे में Tawaaf तवाफ का महत्व है जिसका रिश्ता सेमिटिक धातु ताफा से है। तवाफ़ यानी प्रदक्षिणा, परिक्रमा। इसमें किसी HAJJ-19_Kaaba_1532277iबिन्दु से शुरू कर फिर उसी स्थान पर लौटने का भाव है। यह क्रिया बारम्बार दोहराई जाती है। इसके पीछे चेतना को एकाग्र कर ज्ञान प्राप्ति की सोच है। दरअसल प्रदक्षिणा चिन्तन का स्थूल रूप है और आत्ममंथन सूक्ष्म रूप। प्रदक्षिणा के जरिये एकाग्र होने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और आत्ममंथन से ज्ञान रूपी सार प्राप्त होता है। तेज हवा जब भी चलती है, वह भंवर बनाती है। जल या वायु के तेज प्रवाह में ऐसा होता है। चक्रवाती हवा के इस चरित्र को देखते हुए विद्वान तूफान शब्द का रिश्ता सेमिटिक धातु ताफा tafa से जोड़ते हैं जिसमें घूमने, मुड़ने, चक्कर लगाने का भाव है। टाईफ़ून के संदर्भ में भी इसे देखा जा सकता है।
भारत में प्रदक्षिणा की परिपाटी वैदिककाल से चली आ रही है । आर्यों में यज्ञ की परम्परा थी । यज्ञोपरांत दक्षिणास्वरूप दुधारू गायों को दान करने की परम्परा थी। ऐसा माना जाता है कि ये गाएं यज्ञस्थल पर वेदी के दक्षिण से उत्तर की ओर लाई जाती थीं इस तरह करीब करीब वेदी की परिक्रमा हो जाती थी जिसके लिए प्रदक्षिणा शब्द प्रचलित हो गया। यह भी माना जाता है कि प्राचीन भारतीयों ने सूर्य के निरंतर उदित और अस्त होने के क्रम के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अग्निवेदी की परिक्रमा शुरू की होगी । डॉ राजबली पांडेय हिन्दू धर्मकोश में शतपथ ब्राह्मण का हवाला देते हुए एक प्रदक्षिणा मंत्र का उल्लेख करते हैं जिसमें कहा गया है– ‘सूर्य के समान यह हमारा पवित्र कार्य पूर्ण हो। ’ मूलतः भाव यही था कि जिस तरह सूर्यनारायण पूर्व में उदित होकर अपने नित्यक्रम पर चल पड़ते हैं और दक्षिणमार्ग से होते हुए पश्चिम दिशा में निर्विघ्न अस्ताचलगामी होते हैं उसी तरह मांगलिक विधान के तौर पर आसानी से धार्मिक कार्यों के संपादन हेतु प्रदक्षिणाकर्म का विधान रचा गया। प्रदक्षिणा बाद में हिन्दू समाज में धार्मिक क्रिया बन गई। धर्मग्रन्थों में इसे षोड्षोपचार पूजन की अनिवार्य विधि माना गया है। यज्ञ-हवन आदि के अलावा प्रतिमाओं के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए भी बाईं ओर से दाईं ओर (इसे दक्षिण से उत्तर भी कह सकते परिक्रमा शुरु हो गई। बाद में तो मंदिरों में इस क्रिया के लिए विशेष तौर पर प्रदक्षिणापथ बनने लगे। अगली कड़ी-टैक्सी की तकनीक, टैक्स की दक्षता में समाप्त.
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Monday, January 10, 2011

‘चिरंजीव’ की ‘चिता’ से रिश्तेदारी

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मारे यहाँ अपने से छोटों को आशीर्वचन के रूप में विजयी भव, यशस्वी भव, चिरंजीव भव कहने की परिपाटी रही है जिसमें जीतने, प्रसिद्ध होने और दीर्घजीवी होने का भाव छुपा है। इससे ज्यादा और क्या आशीर्वचन हो सकते हैं? चिरंजीव एक नाम भी है। मराठी समेत दक्षिण भारतीय भाषाओं में पुत्र संतान का नाम लोग चिरंजीव या चिरंजीवी रखते हैं। संस्कृत में इसका शुद्ध रूप है चिरञ्जीव जिसका अर्थ भी लम्बी उम्र या दीर्घायु वाला ही होता है। यह बना है चिरम्+जीव में संस्कृत का अच् प्रत्यय लगने से। संस्कृत की चिर धातु में दीर्घ, दीर्घकाल तक रहनेवाला, दीर्घकाल से चला आ रहा, पुरातन, चिरन्तन जैसे भाव निहित हैं। चिर बना है चि धातु से। चि मे समूहवाचक भाव हैं। मूलतः इसका मतलब होता है चुनना, बीनना, इकट्ठा करना आदि। जाहिर है चुनी, बीनी और एकत्रित वस्तुएँ कहीं तो रखी जाएँगी, सो इन क्रियाओं का परिणाम है ढेर लगाना, अंबार लगाना आदि। स्थूल रूप में इन सभी के आकार पर ध्यान दें। इकाई की तुलना में समूह बड़ा होता है, इसीलिए अंबार या ढेर निश्चित ही दीर्घ होता है। लंबाई, चौडाई और ऊँचाई में। इसे दीर्घ कह सकते हैं। इसके बाद ही चि में फलने-फूलने, बढ़ने और समृद्ध होने का भाव उपजता है। समृद्धि और विकास किसी भी रूप में हो सकता है जिसमें भौतिक वस्तुओं की मात्रा से लेकर काल और आयु तक आ जाती है। चिरंजीव का भाववाचक अर्थ पुत्र भी होता है और मराठी में पुत्र को चिरंजीव कहने की परम्परा है जिसमें संतान के दीर्घजीवी होने के गर्हित अर्थ साथ ही अपनी वंश परम्परा को लम्बे समय तक कायम रखनेवाले से परिचित कराने का भाव है। पुत्र का परिचय कराते वक्त यही कहा जाता है- ये हमारे चिरंजीव हैं। भाव होता है मेरे वंश को आगे ले जानेवाले। आमतौर पर चिरंजीव में आशीर्वाद छुपा है अर्थात चिरकाल तक जीवित रहो! स्वाभाविक रूप में अपने अंश के रूप में पुरुषवादी समाज में पुत्र के चिरजीवी होने की कामना रही और इसीलिए संज्ञा-नाम के रूप में चिरंजीव का अर्थ पुत्र भी हुआ।
म्बी उम्रवाले व्युक्ति को हिन्दी में दीर्घायु या दीर्घजीवी कहते हैं। दीर्घकाय, दीर्घजीवी या दीर्घायु जैसे शब्दों में दीर्घ प्रमुख है। हिन्दी में दीर्घ deergh का अर्थ होता है लंबा, दूर तक पहुंचनेवाला, ऊंचा, उन्नत आदि। इस तरह देखें तो दीर्घकाय का अर्थ हुआ लंबा व्यक्ति मगर दीर्घकाय शब्द का अभिप्राय आमतौर पर विशालकाय के अर्थ में ही लगाया जाता है। दरअसल जब किसी आकार के साथ दीर्घ शब्द का विशेषण की तरह प्रयोग होता है तब लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई के आयाम भी उसमें जड़ जाते हैं, इस तरह दीर्घाकार, दीर्घकाय जैसे शब्दों में बड़ा अथवा विशाल का भाव आ जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति को दूरदर्शी कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिए दीर्घदर्शी शब्द भी है यानी दूर तक देखनेवाला। लंबी आयु के लिए दीर्घजीवी शब्द प्रचलित है। संस्कारी हिन्दी में बालकनी या गैलरी के लिए दीर्घा शब्द प्रचलित है। वैसे इसके लिए गवाक्ष, बारजा या बालाख़ाना जैसे शब्द आमतौर पर ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। दीर्घा इसी कड़ी से जुड़ा शब्द है जिसका मूल अर्थ है ऊंचाई की ओर जाता लम्बा रास्ता। दर्शकदीर्घा या कलादीर्घा जैसे शब्दों से समझा जा सकता है कि दीर्घ में निहित ऊंचाई का भाव कहाँ से आ रहा है। संस्कृत में दीर्घा लम्बी-बड़ी झील को और दीर्घिका छोटे तालाब को कहते हैं।
भाषाविज्ञानियों नें संस्कृत के दीर्घ शब्द की रिश्तेदारी प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु dlonghos में खोजी है। अंग्रेजी का लाँग long शब्द भी इससे ही बना है जिसका अर्थ भी लंबा या दीर्घ ही होता है। गौरतलब है कि संस्कृत दीर्घ शब्द ने ही बरास्ता अवेस्ता, ईरानी परिवार की भाषाओं में जाकर दराग, दिरंग होते हुए फारसी के दराज़ शब्द का रूप लिया।
dah... चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है...
फारसी के दराज़ का अर्थ होता है लंबा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं मे र-ल और क-ग-घ जैसे वर्णों में आपस में तब्दीली होती है। फारसी का दराज़ शब्द उम्रदराज़ के रूप में हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ होता है लंबी आयु वाला अर्थात बूढ़ा, वृद्ध, बुजुर्ग।
प्रारम्भ में ही अन्त भी छुपा है। जो जन्मा है, उसे जाना भी होगा। चिरंजीव के जन्मसूत्र जिस चि धातु में छुपे हैं उसी से जन्मा है हिन्दी का चिता शब्द भी जिसका रिश्ता जन्म की समाप्ति से जुड़ता है। चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है अर्थात् चिन्ता का शीघ्र समाधान न मिले तो शरीर को चिता मिल सकती है। यहां सिर्फ चिंता और चिता का मेल सिर्फ कहावत के स्तर पर नहीं है बल्कि ये दोनों शब्द सचमुच संबंधी भी हैं। चिता अर्थात दाह संस्कार के लिए चुनकर रखी रखी गई लकड़ियों का ढेर। चिता बना है चित शब्द से जिसके मूल में चि धातु है और उसमें निहित सारे भाव चित में हैं अर्थात बीना हुआ, संग्रह किया हुआ, जमा किया हुआ, अंबार लगाया हुआ और जमाया हुआ आदि।
चित से ही बना है चित्यम् जिसका मतलब होता है दाह संस्कार करने का स्थान। गौर करें की बौद्ध और जैन देवालयों को चैत्य, चैत्यालय भी कहा जाता है। यह चैत्य भी इससे ही बना है। बौद्ध महास्थविरों के अवशेष इन चैत्यों में रखे जाने की परंपरा रही है। बाद में इन्हीं के इर्द-गिर्द विहार भी बनते चले गए। चैत्य मूल रूप से समाधि या स्मारक ही रहे हैं मगर बाद में देवालय के अर्थ में पहचाने जाने लगे। चि में निहित चुनने की क्रिया पर अगर गौर करें तो पाएंगे की चुनना, बीनना, संग्रह करना, जमाना आदि सभी क्रियाएं देखने से जुड़ी हुई हैं। बिना देखे-भाले किसी भी किस्म का चुनाव संभव नहीं। अर्थात चुनने से ही ज्ञानबोध होता है और बिना ज्ञानबोध के चुनाव असंभव है-दोनों में अंतर्संबंध गहरा है, सो चि से ही बना चित्त् जिसमें जानना, समझना, चौकस होना, ज्ञानबोध आदि अर्थ समाहित हैं। हिन्दी का चित्त भी यही सारे अर्थ प्रकट करता है जिसमें देखना, विचार करना, मनन करना भी शामिल है। आमतौर पर चिन्ता का मतलब फिक्र, ध्यान, परवाह आदि माना जाता है। यह बना है चिन्त् से जिसके व्यापक अर्थ हैं और इसी परिवार का शब्द है जिसमें सोच-विचार, चिन्तन मनन आदि बातें शामिल है।
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