Thursday, January 26, 2012

दीवानेख़ास और आमख़ास

dewan-e-khasपिछली कड़ी-आम आदमी, बाज़ारू आदमी-1

हि न्दी का आमफ़हम शब्द 'ख़ास' इतना ख़ास है कि इसे बोले बिना किसी चीज़ की विशिष्टता को अभिव्यक्त कर पाना मश्किल सा लगता है । हिन्दी उर्दू में प्रचलित 'ख़ास' शब्द का मूल रूप है ‘खास्सः’ जिसका अर्थ है गुण, चरित्र, वैशिष्ट्य। खास की अर्थवत्ता में निजता भी शामिल है। इससे बना ‘ख़ास्सीयत’ शब्द भी है जिसका हिन्दी रूप ‘खासियत’ खूब प्रचलित है। हिन्दी ने ‘ख़ास्सः’ से जहाँ ख़ास, खास रूपान्तर हुए वहीं ‘खासा’ शब्द भी इससे ही निकला है । आम बोलचाल में परिमाणात्मक अर्थों में हम किसी चीज़, बात, व्यक्ति आदि के आकार-प्रकार, मात्रा और गुणधर्मिता के बारे में इसका प्रयोग करते हैं। इसमें मुहावरेदार अर्थवत्ता है। ‘खासा बड़ा’, ‘खासा छोटा’, ‘खासा अच्छा’ जैसे प्रयोग रोज़मर्रा की बोलीभाषा में हम बोलते-सुनते हैं। इसका स्त्रीवाची रूप ‘खासी’ है । जयपुर में राजाओं के ज़माने का एक विश्रामगृह है जिसका नाम ‘खासाकोठी’ है । इस खासा में भी विशिष्ट अतिथि वाला ही भाव है । एक और शब्द है ‘मख्सूस’ । शायरी या नेताओं के नकली भाषणों में यह सुनने को मिलता है । इसका अर्थ भी विशिष्ट या प्रमुख होता है । इसी अर्थ में ‘ख़ुसूसी’ भी है जिसका अर्थ है निजता । ‘ख़ुसूस’ और ‘ख़ुसूसीयत’ शब्द भी इसी कतार में हैं, जिनके मायने विशेषता, प्रामुख्य, दोस्ती आदि है। ‘ख़ुसूसन’ में भी वैशिष्ट्य का ही भाव है । खास में निहित वैशिष्ट्य या निजता पर गौर करें तब ‘दीवानेआम’ और ‘दीवानेखास’ का अर्थ स्पष्ट होता है ।
दीवानेआम या दरबारेआम जहाँ सार्वजनिक सभा है वहीं ‘दीवानेख़ास’ या ‘दरबारेख़ास’ में विशिष्ट सभा या निजी सभा का ही भाव है। ‘खास’ की कड़ी में ही ‘ख़ासगी’ शब्द भी आता है । ‘ख़ासगी’ में भी विशिष्टता, निजता का भाव है। ग्वालियर में मराठों के ज़माने का ‘खासगी बाज़ार’ । मराठी में यह ‘खाज़गी’ होता है अर्थात प्राइवेट । ‘खाजगी कम्पनी’, ‘खाजगी कॉलेज’ आदि । मद्दाह के कोश के मुताबिक ‘खासगी’ राजा की उस बान्दी को भी कहते हैं जो उसके साथ हमबिस्तर होती है । यूँ हर अच्छी, सुंदर चीज़ इसके दायरे में है... और शायद इसमें ही ‘ख़ासगी बाज़ार’ का महत्व छुपा है । ख़ास का बहुवचन है ‘खवास’ । इस अर्थ में हिन्दी में ‘खवास’ शब्द का प्रयोग शायद ही कभी हुआ हो। ‘खवास’ को देसी ज़बान मे ‘खबास’ कहा जाता रहा है। अरबी में ख़वास का अर्थ होता है खास लोग, विशिष्ट जन, मगर मगर हिन्दी पट्टी में यह सब सामन्ती व्यवस्था की भेंट चढ़ गया। राजपुताना, पूर्वी उत्तर प्रदेश की तमाम रियासतों में खवास, चाकरों का एक वर्ग था जो जूठन उठाने से लेकर मन भर अनाज के बदले खेत में बेगार तक करता था। इस वर्ग का जातिनाम ही खवास पड़ गया । इस वर्ग के प्रभावशाली लोग किसी ज़माने में राजा के टहलुए, चमचे-चम्पू होते थे। वे रनिवास के अफ़सर भी होते थे। मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में इसका एक अर्थ बताया है-वह दासी जो बादशाह के पास एकान्त में आती जाती हो। निहितार्थ स्पष्ट है। हिन्दी में इसे ‘खवासिन’ कहा जाता था। मद्दाह के कोश में ही ‘खवासी’ शब्द भी है जिसका आशय मुसाहिबत, खिदमतगारी या राजसेवा है। मगर सामन्तों ने खवास को बेगार का मजूर बना दिया। प्रेमचन्द, आचार्य चतुरसेन और रेणु समेत अनेक हिन्दी लेखकों ने खवास शब्द में छिपे वर्गभेद और उनके दर्द को उभारा है।
ब आते हैं पुरानी हिन्दी के ‘आमख़ास’ और मराठी के ‘हमख़ास’ शब्दों पर। ‘हमख़ास’ का अर्थ कुछ लोगों की निग़ाह में “निश्चित, पक्का, Certain” है, जबकि ‘हमख़ास’ के ये मायने दूसरे क्रम पर हैं। मराठी में इस पद का मूलार्थ यह नहीं है बल्कि “सार्वजनिक, प्रसिद्ध, सब पर उजागर” है । ‘निश्चित’, ‘पक्का’ जैसे अर्थ इसके बाद आते हैं। ये आशय भी इसमें निहित हैं। मेरे पास मराठी-इंग्लिश, मराठी-सिन्धी, मराठी-फ़ारसी, मराठी-हिन्दी के कई कोश हैं और ये सभी प्रामाणिक और मानक माने जाते हैं। उनमें से छह कोशों को अब तक मैं देख चुका हूँ, सभी में ‘हमखास’ का सम्बन्ध ‘आमखास’ से बताया है। यह सामासिक पद है और ‘आम् + खास’ से बना है।
यूँ तो हिन्दी की तरह ही मराठी में भी कोशरचना का काम औपनिवेशिक दौर में अंग्रेज विद्वानों-मिशनरियों ने किया। इस अर्थ में मोल्सवर्थ का शब्दकोश महत्वपूर्ण है जो डेढ़ सौ साल पहले प्रकाशित हुआ था। इस कोश में तत्कालीन मराठी में प्रचलित फ़ारसी शब्दों को भी स्थान दिया गया । मराठी में फ़ारसी शब्दों का प्रयोग इतना अधिक था कि 1925 में प्रसिद्ध मराठी कवि, चिन्तक और आलोचक माधव ज्युलियन ( मा.त्रि. पटवर्धन ) ने फार्शी-मराठी कोश निकाला। इस कोश का आज भी खास दर्ज़ा है। ज्युलियन के कोश में हमखास की व्युत्पत्ति ‘आम्-खास’ बताई गई है और इसका अर्थ “सर्वसामान्य, प्रसिद्धपणे, निश्चयपूर्वक” दिखाया गया है। उधर मोल्सवर्थ हमखास के साथ ‘हमखास्त’ का उल्लेख भी करते हैं और इसका अर्थ- Publicly and privately; before, for, or with all persons high and low, great and small बताते हैं. वे इसका वाक्य में प्रयोग भी बताते है- “हमखास रुपए दिल्हे आणि तो नाहीं म्हणतो” अर्थात “हमखास रुपए दिए, मगर वो इन्कार करता है।“ यहाँ ‘हमख़ास’ का अर्थ “सबके सामने” या “सार्वजनिक रूप से” है। महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंडल द्वारा प्रकाशित प्रोफ़ेसर लक्ष्मण हर्दवाणी के सिन्धी-मराठी कोश में हमखास की प्रविष्टि के आगे लिखा है-1.सभिनी जे सामुहूँ (सभी के सामने, सार्वजनिक) 2. ज़रूरू (निश्चयपूर्वक). स्पष्ट है कि हमख़ास (आमख़ास) का मुख्य भाव “सब पर उजागर” ही है।
मोल्सवर्थ जिस ‘खास्त’ का उल्लेख करते हैं, उसका कोई स्पष्टिकरण इस कोश में देखने को नहीं मिलता । यूँ भी मोल्सवर्थ ने उन्नीसवीं सदी की मराठी में प्रचलित बोलचाल की भाषा के मद्देनज़र यह कोश बनाया था जिसका उद्धेश्य शब्दार्थ-विचार ही था न कि व्युत्पत्ति बताना । उसके बाद बने माधव ज्युलियन के कोश में ‘हमख़ास्’ की प्रविष्टि के साथ ‘खास्त’ का कोई उल्लेख नहीं है। समझा जा सकता है कि मोल्सवर्थ ने ‘हमखास’ का हमखास्त उच्चारण भी मराठीभाषियों से सुना होगा । यह ठीक वैसा ही होगा जैसा फ़ारसी के ज़मींदोज़ शब्द के साथ हुआ । ग्रामीण समाज ने बराबर करने, मटियामेट करने के अर्थ में फ़ारसी के ‘ज़मींदोज़’ को ‘ज़मीनदोस्त’ सुना। यही रूप सर्वस्वीकार्य हुआ और इसे कोशों में दर्ज़ किया गया ।
ब सवाल है कि ‘आमख़ास’ शब्द हिन्दी में है या नहीं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह हिन्दी में नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं कि है, मगर अल्पप्रचलित है। मेरा मानना है कि ‘आमख़ास’ शब्द किसी ज़माने में हिन्दुस्तानी बोली में बहुत आम शब्द था, मगर हिन्दी पर राष्ट्रवादी असर चढ़ने से भी पहले से जिन शब्दों का असर शायद ख़त्म होने लगा था,  उनमें इसका भी शुमार रहा। हिन्दी, गुजराती, मराठी और फ़ारसी के प्रतिष्ठित कोशों में ‘आमख़ास’ का हिन्दी भाषा के शब्द के रूप में इन्द्राज से क्या साबित होता है ? यही कि यह शब्द कभी हिन्दी में था। मेरी स्मृतियों में मालवी बोलने वाली एक बुजुर्ग महिला है जो ‘वाजबी’ और ‘अम्खास’ शब्द अक्सर बोलती थी। ‘वाजबी’ का ‘वाजिब’ अर्थ तो बाद में समझ में आया पर ‘अम्खास’ तब तक भी नहीं समझ सका था। कुछ साल पहले जब ‘हमख़ास’ से परिचित हुआ तो वह ‘अम्खास’ भी याद आया। पुरानी हिन्दी में ‘आमख़ास’ शब्द की उपस्थिति के निशान विभिन्न सन्दर्भों में बिखरे हुए हैं। गुजरात विद्यापीठ द्वारा प्रकाशित हिन्दी-गुजराती कोश में ‘आमखास’ शब्द की प्रविष्टि के आगे लिखा है-1.राजानी खास बेठक 2.दीवाने आम। इसी तरह हिन्दी शब्दसागर में ‘आमख़ास’ की प्रविष्टि के आगे लिखा है – “महलों के भीतर का वह भाग जहाँ राजा या बादशाह बैठते हैं ।“ मराठी और फ़ारसी के प्रसिद्ध विद्वान डॉ यू.म.पठाण ने महाराष्ट्र राज्य साहित्य मंडल से प्रकाशित अपनी ‘फार्सी-मराठी अनुबंध’ पुस्तक में ‘आमख़ास’ शब्द को फ़ारसी शब्दों की सूची में रखा है ।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ में हिन्दी भाषा के विकास पर श्री रामधारी सिंह दिनकर अकबर के दरबारी कवि गंगाधर उर्फ गंग कवि (1538-1625 ई.) के खड़ी बोली में लिखित “चंद छंद बरनन की महिमा” नामक एक पुस्तक के गद्यांश का उल्लेख करते हैं- सिद्धि श्री 108 श्री श्री पातसाहिजी श्री दलपतिजी अकबरसाहजी आमखास में तखत ऊपर विराजमान हो रहे। और आमखास भरने लगा है जिसमें तमाम उमराव आय आय कुर्निश बजाय जुहार करके अपनी अपनी बैठक पर बैठ जाया करें अपनी अपनी मिसल से। जिनकी बैठक नहीं सो रेसम के रस्से में रेसम की लूमें पकड़ के खड़े ताजीम में रहे। इतना सुन के पातसाहिजी, श्री अकबरसाहजी आद सेर सोना नरहरदास चारन को दिया। इनके डेढ़ सेर सोना हो गया। रास बंचना पूरन भया। ‘आमखास’ बरखास हुआ।“
‘आमख़ास’ में निहित दीवानेआम के अर्थ पर अगर गौर करें तो यह खुला दरबार है। वह स्थान जहाँ की बातें सार्वजनिक हैं। ‘आमख़ास’ की इसी अर्थवत्ता का विस्तार ‘हमखास’ में होता है अर्थात जो सब पर उजागर है, वह तथ्य या बात । ज़ाहिर है कि ‘हमख़ास’ में निश्चयात्मक या पक्का होने का भाव मराठी में अलग से विकसित हुआ, पर लक्षण के आधार पर ही। ‘आमख़ास’ का स्थानवाची अर्थ मराठी के ‘हमख़ास’ में विशिष्ट लक्षण बनता है। अलग अलग भाषाओं में एक ही शब्द के बर्ताव और अर्थवत्ता में फ़र्क़ नज़र आता है। मराठी में ‘शिक्षा’ का अर्थ अध्ययन-अध्यापन, पढ़ना-पढ़ाना नहीं होकर सज़ा देना है। यह वही बात है जो अरबी से हिन्दी में आए ‘सबक’ में है । सबक का मूलार्थ पाठ या शिक्षा है । “अच्छा सबक सिखाया” में सज़ा मिलने वाला वही भाव है जो मराठी के “छान शिक्षा मिळाली” में है । हिन्दी-उर्दू के ‘राजीनामा’ में सुलहनामा, संधिपत्र, समझौतापत्र का आशय है जबकि मराठी और सम्भवतः गुजराती के राजीनामा में इस्तीफ़ा या त्यागपत्र का भाव है । निश्चित ही हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी में ‘हमखास’ कोई शब्द नहीं है और उस पर यह चर्चा भी नहीं है। मराठी ‘हमखास’ की आमद, फ़ारसी के ‘आमख़ास’ से हुई है और ‘हमख़ास’ की जो भी अर्थछटाएँ हैं, वे ‘आमखास’ की सामासिकता के विस्तार से ही उभर रही हैं। -समाप्त

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10 कमेंट्स:

रेखा श्रीवास्तव said...

ham shabdon ke kitane bhram pale rahate hain sune sunaye shabdon ka prayog usake mool rop tak nahin pahunch pate hain. isa lekh ko padh kar laga ki ham kitne galat shabd prayog kar rahe hote hain.

प्रवीण पाण्डेय said...

आजकल तो सब ही खास-ए-आम हो गये हैं...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संत जनों! जो भी अक्सर इस पोस्ट का पाठ करेगा वह इंसान खास समझा जाएगा।

Shanti Garg said...

कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

शब्दों का यह सफर अत्यन्त रोचक व उपयोगी है ।

विष्णु बैरागी said...

बाप रे। बोलचाल में आम बना हुआ खास, इतना खास है।

बलजीत बासी said...

अजीत जी,
मैंने आम और खास से ताअलुक दोनों लेख पढ़े हैं. इसमें कोई शक नहीं कि
दोनों लेख आपके गहन अध्यन के सूचक हैं. आप शब्द की खोज में कितना दूर
निकल जाते हैं, इस बात का पता इन लेखों से लगता है. इस लिए मेरी वधाई
कबूल करो.
हमखास शब्द के अर्थ और व्युत्पति प्रति शंकाएं मिट गई हैं. फिर भी मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि *पानी और *मां के संकल्प के दरम्यान आपने
जो संबंध जोड़ा है वह लेख का मुझे कमज़ोर हिस्सा लगा. शायद मुझे समझ नहीं
आया. मैं अभी कोई विरोध ज़ाहिर नहीं कर रहा. मैं आप से अनुरोध करता हूँ कि
इसको और स्पष्ट करें ता कि बात आगे हो सके

अजित वडनेरकर said...

@बलजीत बासी
बड़े भाई,
सफ़र की तारीफ़ में आपके दो बोल भी मेरे लिए बेशकीमती होते हैं।
आपने जिस ओर ध्यान दिलाया है, उसे फिर पढ़ता हूँ।
सम्भव हुआ तो संशोधन कर दूंगा।
सादर, साभार

Mansoor Ali said...

हर ख़ासो, आम के लिए 'शब्दों का सफर' है,
मोती निकाले सीपी से, [अ]नोखा ये हुनर है,

'बगुले' की तरह बैठे, 'शिकारी'* भी कईं याँ, [*बासी साहब से माअज़रत चाहूँगा]
है राह पुरखतर भी, ये पुरखार डगर है,

'अपने' भी कई 'शब्द' 'पराये' निकल आये ,
'परदेस' घूम लौटे, बड़ी उसकी क़दर है.

'मुर्गी' को घर की, 'दाल' समझते रहे है हम,
समझे थे जिसे 'दाल' वह 'मुर्गी-मय-बटर' है ! [chicken with butter]

'रजवाड़े' और न 'खासगी', इस दौरे नो में अब,
बिस्तर बिना भी 'बांदी' की अब होती बसर है!

'दीवाने' अब तो 'आम' है, हरसूं , गली-गली,
'दीवाने ख़ास' ही पे लगी, जिनकी नज़र है !

http://aatm-manthan.com

सदा said...

बेहतरीन प्रस्‍तुति
कल 01/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, कैसे कह दूं उसी शख्‍़स से नफ़रत है मुझे !

धन्यवाद!

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