Monday, January 30, 2012

सजने-सँवरने की बातें (गहना-1)

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हनों के प्रति लगाव मनुष्य की का सहज स्वभाव है और सजना-सँवरना नैसर्गिक प्रवृत्ति । प्रकृति के विविध रंगरूपों नें ही मनुष्य के भीतर भी शृंगार की भावना जन्मी । शुरुआत में मनुष्य ने फूल पत्तियों से खुद को सजाया । बाद के दौर में धातु के वर्तुलाकार आभूषणों की खोज हुई । बौद्धिक विकास के साथ यह धारणा भी बनी कि त्वचा और स्नायुओं पर इन गहनों से दबाव पड़ता है जिससे मन को शान्ति मिलती है । ज़ाहिर है गहने रोगमुक्ति का ज़रिया भी बने । फलित ज्योतिष का विकास हुआ तो गहनों का महत्व और बढ़ गया । रोगमुक्ति से बढ़ कर भाग्योदय के संकेत भी धातुओं, नगीनों के साथ जुड़ गए । इस दौर में गहने सिर्फ इन्ही पदार्थों से बनने लगे थे । गहना के लिए हिन्दी में दागिना, आभरण, भूषण, विभूषण, आभूषण, अलंकार, ज़ेवर, अवतंस, ज्वैलरी आदि शब्द प्रचलित हैं । 
भूषण के लिए हिन्दी में गहना शब्द भी खूब प्रचलित है । गहनों को स्त्री और पुरुष दोनों ही धारण करते हैं पर स्त्रियों में हर वस्तु के संग्रह की वृत्ति होती है क्योंकि उसे गृहस्थी चलानी होती है । गहनों के प्रति एक स्वाभाविक आग्रह भी उनमें होता है । गहनों की सबसे बड़ी ग्राहक भी स्त्रियाँ ही होती हैं । गौर संग्रह, ग्रह, आग्रह जैसे शब्दों पर । ये सभी एक ही मूल से निकले हैं । हिन्दी के ज्यादातर शब्दकोशों में गहना शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ग्रहण से मानी गई है जिसका अर्थ है पकड़ना, फाँसना, लेना, पहनना, धारण करना आदि। ग्रहण बना है संस्कृत के ग्रहः शब्द से जिसके मूल में है ग्रह् धातु जिसमें पकड़ना, थामना, लपकना, प्राप्त करना आदि भाव समाए हैं। संस्कृत धातु ग्रह् से बने हैं ये सभी शब्द । ध्यान रहे शरीर को सज्जित करने की वस्तुएँ ही आभूषण हैं । ग्रहण में मूल भाव इन्हें पहनने से निकल रहा है । गहना वह है जिसे रूप-सज्जा के लिए शरीर पर ग्रहण किया जाए । 
गौरतलब है कि इन तमाम अर्थों के लिए मूलतः वेदों की भाषा अर्थात वैदिकी या छांदस् (संस्कृत नहीं) में ग्रह् नहीं बल्कि ग्रभ् शब्द है । भाषाविज्ञानियों ने अंग्रेजी के ग्रास्प (grasp) या ग्रैब (grab) जैसे शब्दों के लिए भी इसी ग्रभ् को आधार माना है। बस, उन्होंने किया यह कि प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार से एक काल्पनिक धातु ghrebh खोज निकाली है जो इसी ग्रभ् पर आधारित है और जिसमें पकड़ना, छीनना, झपटना, लपकना आदि भाव छुपे हैं। इसी से मिलते जुलते शब्द कई अन्य भाषाओं में भी हैं जैसे ग्रीक में baros यानी भारी या गोथिक में kaurus यानी वज़नी या अंग्रेजी का ग्रिप आदि। लपकने, हड़पने या अधिकार जमाने के भावों का अर्थ विस्तार ही गुरु या गुरुत्व जैसे शब्दों में है। सूर्य-ग्रहण या चंद्र-ग्रहण जैसे शब्दों के अर्थ एक ग्रह् की छाया में दूसरे ग्रह के अदृष्य होने में समझे जा सकते हैं ।
मोनियर विलियम्स के कोश में गहना शब्द की व्यत्पत्ति गहन से बताई गई है । संस्कृत के गहन का अर्थ है गहरा, सघन, सान्द्र जो गह् धातु से निकला है। हिन्दी का गहरा, गहराई जैसे शब्द इसी कड़ी में आते हैं । गुफा, कन्दरा या जंगल के अर्थ वाला गह्वर शब्द भी इसी मूल से निकला है । सज्जा के उपकरण के तौर पर गहना शब्द की व्युत्पत्ति इन अर्थों से मेल नहीं खाती बल्कि इन अर्थों के बीच अचानक ornament वाला अर्थ बेमेल नज़र आता है। शब्दसागर में भी इसी का अनुकरण मिलता है । दिलचस्प यह कि मोनियर विलयम्स को आधार मान कर बनाए गए वाशि आप्टे के कोष से गहन शब्द के भीतर से गहना वाली प्रविष्टि हटा ली गई है । स्पष्ट है गहन से आभूषण वाले गहना का कोई रिश्ता नहीं है । रॉल्फ़ लिली टर्नर और जॉन प्लैट्स भी ग्रहण से ही गहना की व्युत्पत्ति को सही मानते हैं । -जारी
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Thursday, January 26, 2012

दीवानेख़ास और आमख़ास

dewan-e-khasपिछली कड़ी-आम आदमी, बाज़ारू आदमी-1

हि न्दी का आमफ़हम शब्द 'ख़ास' इतना ख़ास है कि इसे बोले बिना किसी चीज़ की विशिष्टता को अभिव्यक्त कर पाना मश्किल सा लगता है । हिन्दी उर्दू में प्रचलित 'ख़ास' शब्द का मूल रूप है ‘खास्सः’ जिसका अर्थ है गुण, चरित्र, वैशिष्ट्य। खास की अर्थवत्ता में निजता भी शामिल है। इससे बना ‘ख़ास्सीयत’ शब्द भी है जिसका हिन्दी रूप ‘खासियत’ खूब प्रचलित है। हिन्दी ने ‘ख़ास्सः’ से जहाँ ख़ास, खास रूपान्तर हुए वहीं ‘खासा’ शब्द भी इससे ही निकला है । आम बोलचाल में परिमाणात्मक अर्थों में हम किसी चीज़, बात, व्यक्ति आदि के आकार-प्रकार, मात्रा और गुणधर्मिता के बारे में इसका प्रयोग करते हैं। इसमें मुहावरेदार अर्थवत्ता है। ‘खासा बड़ा’, ‘खासा छोटा’, ‘खासा अच्छा’ जैसे प्रयोग रोज़मर्रा की बोलीभाषा में हम बोलते-सुनते हैं। इसका स्त्रीवाची रूप ‘खासी’ है । जयपुर में राजाओं के ज़माने का एक विश्रामगृह है जिसका नाम ‘खासाकोठी’ है । इस खासा में भी विशिष्ट अतिथि वाला ही भाव है । एक और शब्द है ‘मख्सूस’ । शायरी या नेताओं के नकली भाषणों में यह सुनने को मिलता है । इसका अर्थ भी विशिष्ट या प्रमुख होता है । इसी अर्थ में ‘ख़ुसूसी’ भी है जिसका अर्थ है निजता । ‘ख़ुसूस’ और ‘ख़ुसूसीयत’ शब्द भी इसी कतार में हैं, जिनके मायने विशेषता, प्रामुख्य, दोस्ती आदि है। ‘ख़ुसूसन’ में भी वैशिष्ट्य का ही भाव है । खास में निहित वैशिष्ट्य या निजता पर गौर करें तब ‘दीवानेआम’ और ‘दीवानेखास’ का अर्थ स्पष्ट होता है ।
दीवानेआम या दरबारेआम जहाँ सार्वजनिक सभा है वहीं ‘दीवानेख़ास’ या ‘दरबारेख़ास’ में विशिष्ट सभा या निजी सभा का ही भाव है। ‘खास’ की कड़ी में ही ‘ख़ासगी’ शब्द भी आता है । ‘ख़ासगी’ में भी विशिष्टता, निजता का भाव है। ग्वालियर में मराठों के ज़माने का ‘खासगी बाज़ार’ । मराठी में यह ‘खाज़गी’ होता है अर्थात प्राइवेट । ‘खाजगी कम्पनी’, ‘खाजगी कॉलेज’ आदि । मद्दाह के कोश के मुताबिक ‘खासगी’ राजा की उस बान्दी को भी कहते हैं जो उसके साथ हमबिस्तर होती है । यूँ हर अच्छी, सुंदर चीज़ इसके दायरे में है... और शायद इसमें ही ‘ख़ासगी बाज़ार’ का महत्व छुपा है । ख़ास का बहुवचन है ‘खवास’ । इस अर्थ में हिन्दी में ‘खवास’ शब्द का प्रयोग शायद ही कभी हुआ हो। ‘खवास’ को देसी ज़बान मे ‘खबास’ कहा जाता रहा है। अरबी में ख़वास का अर्थ होता है खास लोग, विशिष्ट जन, मगर मगर हिन्दी पट्टी में यह सब सामन्ती व्यवस्था की भेंट चढ़ गया। राजपुताना, पूर्वी उत्तर प्रदेश की तमाम रियासतों में खवास, चाकरों का एक वर्ग था जो जूठन उठाने से लेकर मन भर अनाज के बदले खेत में बेगार तक करता था। इस वर्ग का जातिनाम ही खवास पड़ गया । इस वर्ग के प्रभावशाली लोग किसी ज़माने में राजा के टहलुए, चमचे-चम्पू होते थे। वे रनिवास के अफ़सर भी होते थे। मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में इसका एक अर्थ बताया है-वह दासी जो बादशाह के पास एकान्त में आती जाती हो। निहितार्थ स्पष्ट है। हिन्दी में इसे ‘खवासिन’ कहा जाता था। मद्दाह के कोश में ही ‘खवासी’ शब्द भी है जिसका आशय मुसाहिबत, खिदमतगारी या राजसेवा है। मगर सामन्तों ने खवास को बेगार का मजूर बना दिया। प्रेमचन्द, आचार्य चतुरसेन और रेणु समेत अनेक हिन्दी लेखकों ने खवास शब्द में छिपे वर्गभेद और उनके दर्द को उभारा है।
ब आते हैं पुरानी हिन्दी के ‘आमख़ास’ और मराठी के ‘हमख़ास’ शब्दों पर। ‘हमख़ास’ का अर्थ कुछ लोगों की निग़ाह में “निश्चित, पक्का, Certain” है, जबकि ‘हमख़ास’ के ये मायने दूसरे क्रम पर हैं। मराठी में इस पद का मूलार्थ यह नहीं है बल्कि “सार्वजनिक, प्रसिद्ध, सब पर उजागर” है । ‘निश्चित’, ‘पक्का’ जैसे अर्थ इसके बाद आते हैं। ये आशय भी इसमें निहित हैं। मेरे पास मराठी-इंग्लिश, मराठी-सिन्धी, मराठी-फ़ारसी, मराठी-हिन्दी के कई कोश हैं और ये सभी प्रामाणिक और मानक माने जाते हैं। उनमें से छह कोशों को अब तक मैं देख चुका हूँ, सभी में ‘हमखास’ का सम्बन्ध ‘आमखास’ से बताया है। यह सामासिक पद है और ‘आम् + खास’ से बना है।
यूँ तो हिन्दी की तरह ही मराठी में भी कोशरचना का काम औपनिवेशिक दौर में अंग्रेज विद्वानों-मिशनरियों ने किया। इस अर्थ में मोल्सवर्थ का शब्दकोश महत्वपूर्ण है जो डेढ़ सौ साल पहले प्रकाशित हुआ था। इस कोश में तत्कालीन मराठी में प्रचलित फ़ारसी शब्दों को भी स्थान दिया गया । मराठी में फ़ारसी शब्दों का प्रयोग इतना अधिक था कि 1925 में प्रसिद्ध मराठी कवि, चिन्तक और आलोचक माधव ज्युलियन ( मा.त्रि. पटवर्धन ) ने फार्शी-मराठी कोश निकाला। इस कोश का आज भी खास दर्ज़ा है। ज्युलियन के कोश में हमखास की व्युत्पत्ति ‘आम्-खास’ बताई गई है और इसका अर्थ “सर्वसामान्य, प्रसिद्धपणे, निश्चयपूर्वक” दिखाया गया है। उधर मोल्सवर्थ हमखास के साथ ‘हमखास्त’ का उल्लेख भी करते हैं और इसका अर्थ- Publicly and privately; before, for, or with all persons high and low, great and small बताते हैं. वे इसका वाक्य में प्रयोग भी बताते है- “हमखास रुपए दिल्हे आणि तो नाहीं म्हणतो” अर्थात “हमखास रुपए दिए, मगर वो इन्कार करता है।“ यहाँ ‘हमख़ास’ का अर्थ “सबके सामने” या “सार्वजनिक रूप से” है। महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंडल द्वारा प्रकाशित प्रोफ़ेसर लक्ष्मण हर्दवाणी के सिन्धी-मराठी कोश में हमखास की प्रविष्टि के आगे लिखा है-1.सभिनी जे सामुहूँ (सभी के सामने, सार्वजनिक) 2. ज़रूरू (निश्चयपूर्वक). स्पष्ट है कि हमख़ास (आमख़ास) का मुख्य भाव “सब पर उजागर” ही है।
मोल्सवर्थ जिस ‘खास्त’ का उल्लेख करते हैं, उसका कोई स्पष्टिकरण इस कोश में देखने को नहीं मिलता । यूँ भी मोल्सवर्थ ने उन्नीसवीं सदी की मराठी में प्रचलित बोलचाल की भाषा के मद्देनज़र यह कोश बनाया था जिसका उद्धेश्य शब्दार्थ-विचार ही था न कि व्युत्पत्ति बताना । उसके बाद बने माधव ज्युलियन के कोश में ‘हमख़ास्’ की प्रविष्टि के साथ ‘खास्त’ का कोई उल्लेख नहीं है। समझा जा सकता है कि मोल्सवर्थ ने ‘हमखास’ का हमखास्त उच्चारण भी मराठीभाषियों से सुना होगा । यह ठीक वैसा ही होगा जैसा फ़ारसी के ज़मींदोज़ शब्द के साथ हुआ । ग्रामीण समाज ने बराबर करने, मटियामेट करने के अर्थ में फ़ारसी के ‘ज़मींदोज़’ को ‘ज़मीनदोस्त’ सुना। यही रूप सर्वस्वीकार्य हुआ और इसे कोशों में दर्ज़ किया गया ।
ब सवाल है कि ‘आमख़ास’ शब्द हिन्दी में है या नहीं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह हिन्दी में नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं कि है, मगर अल्पप्रचलित है। मेरा मानना है कि ‘आमख़ास’ शब्द किसी ज़माने में हिन्दुस्तानी बोली में बहुत आम शब्द था, मगर हिन्दी पर राष्ट्रवादी असर चढ़ने से भी पहले से जिन शब्दों का असर शायद ख़त्म होने लगा था,  उनमें इसका भी शुमार रहा। हिन्दी, गुजराती, मराठी और फ़ारसी के प्रतिष्ठित कोशों में ‘आमख़ास’ का हिन्दी भाषा के शब्द के रूप में इन्द्राज से क्या साबित होता है ? यही कि यह शब्द कभी हिन्दी में था। मेरी स्मृतियों में मालवी बोलने वाली एक बुजुर्ग महिला है जो ‘वाजबी’ और ‘अम्खास’ शब्द अक्सर बोलती थी। ‘वाजबी’ का ‘वाजिब’ अर्थ तो बाद में समझ में आया पर ‘अम्खास’ तब तक भी नहीं समझ सका था। कुछ साल पहले जब ‘हमख़ास’ से परिचित हुआ तो वह ‘अम्खास’ भी याद आया। पुरानी हिन्दी में ‘आमख़ास’ शब्द की उपस्थिति के निशान विभिन्न सन्दर्भों में बिखरे हुए हैं। गुजरात विद्यापीठ द्वारा प्रकाशित हिन्दी-गुजराती कोश में ‘आमखास’ शब्द की प्रविष्टि के आगे लिखा है-1.राजानी खास बेठक 2.दीवाने आम। इसी तरह हिन्दी शब्दसागर में ‘आमख़ास’ की प्रविष्टि के आगे लिखा है – “महलों के भीतर का वह भाग जहाँ राजा या बादशाह बैठते हैं ।“ मराठी और फ़ारसी के प्रसिद्ध विद्वान डॉ यू.म.पठाण ने महाराष्ट्र राज्य साहित्य मंडल से प्रकाशित अपनी ‘फार्सी-मराठी अनुबंध’ पुस्तक में ‘आमख़ास’ शब्द को फ़ारसी शब्दों की सूची में रखा है ।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ में हिन्दी भाषा के विकास पर श्री रामधारी सिंह दिनकर अकबर के दरबारी कवि गंगाधर उर्फ गंग कवि (1538-1625 ई.) के खड़ी बोली में लिखित “चंद छंद बरनन की महिमा” नामक एक पुस्तक के गद्यांश का उल्लेख करते हैं- सिद्धि श्री 108 श्री श्री पातसाहिजी श्री दलपतिजी अकबरसाहजी आमखास में तखत ऊपर विराजमान हो रहे। और आमखास भरने लगा है जिसमें तमाम उमराव आय आय कुर्निश बजाय जुहार करके अपनी अपनी बैठक पर बैठ जाया करें अपनी अपनी मिसल से। जिनकी बैठक नहीं सो रेसम के रस्से में रेसम की लूमें पकड़ के खड़े ताजीम में रहे। इतना सुन के पातसाहिजी, श्री अकबरसाहजी आद सेर सोना नरहरदास चारन को दिया। इनके डेढ़ सेर सोना हो गया। रास बंचना पूरन भया। ‘आमखास’ बरखास हुआ।“
‘आमख़ास’ में निहित दीवानेआम के अर्थ पर अगर गौर करें तो यह खुला दरबार है। वह स्थान जहाँ की बातें सार्वजनिक हैं। ‘आमख़ास’ की इसी अर्थवत्ता का विस्तार ‘हमखास’ में होता है अर्थात जो सब पर उजागर है, वह तथ्य या बात । ज़ाहिर है कि ‘हमख़ास’ में निश्चयात्मक या पक्का होने का भाव मराठी में अलग से विकसित हुआ, पर लक्षण के आधार पर ही। ‘आमख़ास’ का स्थानवाची अर्थ मराठी के ‘हमख़ास’ में विशिष्ट लक्षण बनता है। अलग अलग भाषाओं में एक ही शब्द के बर्ताव और अर्थवत्ता में फ़र्क़ नज़र आता है। मराठी में ‘शिक्षा’ का अर्थ अध्ययन-अध्यापन, पढ़ना-पढ़ाना नहीं होकर सज़ा देना है। यह वही बात है जो अरबी से हिन्दी में आए ‘सबक’ में है । सबक का मूलार्थ पाठ या शिक्षा है । “अच्छा सबक सिखाया” में सज़ा मिलने वाला वही भाव है जो मराठी के “छान शिक्षा मिळाली” में है । हिन्दी-उर्दू के ‘राजीनामा’ में सुलहनामा, संधिपत्र, समझौतापत्र का आशय है जबकि मराठी और सम्भवतः गुजराती के राजीनामा में इस्तीफ़ा या त्यागपत्र का भाव है । निश्चित ही हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी में ‘हमखास’ कोई शब्द नहीं है और उस पर यह चर्चा भी नहीं है। मराठी ‘हमखास’ की आमद, फ़ारसी के ‘आमख़ास’ से हुई है और ‘हमख़ास’ की जो भी अर्थछटाएँ हैं, वे ‘आमखास’ की सामासिकता के विस्तार से ही उभर रही हैं। -समाप्त

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Wednesday, January 25, 2012

आम आदमी, बाज़ारू आदमी-1

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र्वसाधारण, सर्वसामान्यजन आदि के अर्थ में हिन्दी का ख़ासोआम पद बहुत प्रचलित रहा है । ख़ासोआम शब्द सेमिटिक मूल का है और अरबी के दो शब्दों ख़ास + आम् से मिल कर बना है । गौरतलब है कि हिन्दी में ये दोनों शब्द भी इतने आमफ़हम है कि दिन भर में न जाने कितनी दफ़ा हम इनका प्रयोग करते हैं । इसकी तुलना में इन दोनों के मेल से बने समास “ख़ासोआम” का प्रयोग अपेक्षाकृत कम होता है । ख़ासोआम शब्द का प्रयोग “खासो-आम” और “आमो-खास” की तरह भी होता है । सर्वसाधारण के अर्थ में ही “आमख़ास” शब्द भी है। हिन्दी में अब यह अल्पप्रचलित है, क़रीब एक सदी पहले तक उर्दू, फ़ारसी, हिन्दुस्तानी में इसका चलन था । हिन्दी गद्य के शुरुआती दौर में आमख़ास शब्द नज़र आता है । राजकाज की फ़ारसी में यह पद इतना रचाबसा था कि धुर पंजाब से लेकर सुदूर महाराष्ट्र तक मुस्लिम साम्राज्य के ज़रिये यह टर्म किंचित अन्तर के साथ अलग-अलग समान रूप से प्रचलित रही । धीरे धीरे पश्चिमी क्षेत्रों की बोलियों तक इसका दायरा सिमट गया । “आमख़ास” शब्द पंजाबी में खूब इस्तेमाल होता है । हिन्दी की कई बोलियों में यह अब भी ज़िन्दा है । मराठी का हमख़ास दरअसल “आमख़ास” का ही रूपान्तर है। नेट पर भी मुझे सर्वसाधारण, सब पर उजागर के भाव के साथ “आमख़ास” के कुछ प्रयोग नज़र आए और अपने निजी सन्दर्भ कोशों में भी इनका हवाला मिला। आज की नागरी हिन्दी में तो “आमख़ास” का प्रयोग विरल ही है।
बसे पहले अरबी के “आम” की बात । ज्यादातर लोग इस आम को सिर्फ़ “आम” यानी साधारण तक सीमित मानते हैं, दरअसल वह सेमिटिक भाषा परिवार का इतना महत्वपूर्ण शब्द है कि इस “आम” की अर्थवत्ता के एक छोर पर माँ है, दूसरे पर अवाम है तो तीसरे पर मुल्क । यही नहीं, इस शब्द से आर्य भाषा परिवार और सामी भाषा परिवार की रिश्तेदारी पता चलती है । “आम्” शब्द का मूल ढाई हज़ार साल ईसा पूर्व प्राचीन सुमेरियाई अक्कद भाषा का अम्मु ammu शब्द है यह समूहवाची शब्द है जिसमें सुरक्षा और संरक्षण का भाव भी है । “अम्मु” का अर्थ है राष्ट्र या अवाम । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं जैसे अक्कद में “उम्मु” ummu, अरबी में “उम्म”, हिब्रू में “एम”, सीरियाई में “एमा” आदि ।
वैश्विक स्तर सभी भाषाओं में माँ, ममत्व और जननि भाव वाले शब्दों का जन्म एक जैसे नर्सरी शब्दों से हुआ है, यह गौरतलब है । मेरी नज़र में शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि । शिशु के मुँह से जब “मम्-मम्” जैसी ध्वनियाँ निकलती है तो हम इसे भूख लगने का संकेत मानते हैं । इस ध्वनि संकेत की महिमा देखिये कि समूचे जीवजगत में स्तनपायियों के लिए अंग्रेजी में “मैमल” शब्द प्रयोग किया जाता है जो बना है लेटिन कि “मैम्मा” से जिसका मतलब ही है स्तन अथवा पोषणग्रंथि। जो स्तनपान कराए, पालन करे वह माँ । इसलिए अंग्रेजी में माँ के लिए मॉम, मम्मा, मम्मी जैसे शब्द है । ध्यान रहे कि प्रकृति में, पृथ्वी में मातृभाव है क्योंकि ये हमें संरक्षण देते हैं, हमारा पालन-पोषण करते हैं। अक्कद भाषा के “अम्मु” और “उम्मु” दरअसल पालन-पोषण वाले भावों को ही व्यक्त कर रहे हैं। राष्ट्र के रूप में “अम्मु” समूहवाची है, अवाम यानी जनता तो अपने आप में समूह ही है। कोई भी समूह मूलतः आश्रयदाता ही है। मनुष्य तो क्या, पशु भी सबसे पहले समूह में ही आश्रय तलाशते हैं, फिर किसी छत की खोज करते हैं। राष्ट्र के आगे तो सभी शरणागत हैं इसलिए सभी प्राचीन संस्कृतियों में राष्ट्र, मातृभूमि, जन्मभूमि को माँ का दर्ज़ा दिया गया है। पुरुषवाची होने के बावजूद भारतदेश को हम भारतमाता कहते हैं। राष्ट्र में संरक्षण के साथ साथ जननिभाव भी है । राष्ट्र ही हमारी पहचान है ।
प्रकृति के जननिभाव पर गौर करें। पानी भी हमें पोषण देता है। हम जल पर पलते हैं। पानी के “पा” में ही पालने का भाव है। वैदिकी में, संस्कृत में “अप्” का अर्थ पानी है। “अप्” से बरास्ता अवेस्ता, फ़ारसी का “आब” बना है जिसका अर्थ भी पानी है। गौरतलब है कि अधिकांश संस्कृतियाँ जलस्रोतों के किनारे ही पनपी हैं, सो “आब” से ही “आबादी” बना। “आबादी” यानी समूह की रचना, संस्कृति का निर्माण, राष्ट्र का जन्म । इसी कड़ी में फ़ारसी का” अब्र”, संस्कृत का “अभ्र” और मराठी का “आभाळ” आते हैं। सभी का अर्थ है बादल, मेघ। कहने की ज़रूरत नहीं कि इन नामों के पीछे पानी छुपा है। जल के लिए संस्कृत में एक शब्द है “अम्बु” । इसका जन्म हुआ है “अम्ब्” नामक धातु से । ध्यान रहे कि आर्यभाषाओं में एक वर्णक्रम की ध्वनियाँ एक

indian_flag... “अम्मु” का अर्थ है राष्ट्र या अवाम । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं ...क्त तमाम सन्दर्भों से गुज़रते हुए अरबी के “आम्” शब्द में सार्वत्रिक, सर्वसाधारण, सामान्य की अर्थवत्ता स्थापित हुई।

दूसरे से बदलती हैं। “प” वर्णक्रम की ध्वनियाँ यहाँ आपस में बदल रही हैं। “अम्बु” के दो ही अर्थ हैं। एक तो शब्द करना (अम्, मम्, हुम् ) दूसरा है जाना। इस जाना में “अम्बु” अर्थात जल का प्रवाही भाव भी छुपा है। अम्ब् से ही बने हैं “अम्बा”, “अम्बिका”, “अम्बालिका” जैसे शब्द जिसमें माता, दुर्गा, भवानी, देवी जैसे अर्थ समाये हैं। समझा जा सकता है कि जल और अम्बु में क्या रिश्ता है, पानी का, प्राण का, जन्मदायी जननि का। अरबी में भी जल के लिए “मा”, “माउ”, “माइ” जैसे शब्द हैं।
वैदिकी और संस्कृत के “अम्बु”, “अप्” और अक्कद भाषा के “अम्मु”, “उम्मु” में अन्तर्सम्बन्ध के ये संकेत बहुत साफ़  हैं। इससे मिलते जुलते शब्दों का जलवाची, जननिवाची भाव साबित करता है कि इन शब्दों का विकास भौगोलिक भिन्नता के बावजूद एक जैसा रहा है। “अम्मु” में निहित राष्ट्र, नेशन, आबादी के आशय की तुलना प्राचीन भारतीय “जन” से कर के देखें। जन समूहवाची भी है और व्यक्तिवाची भी। यही बात संस्कृत के लोक में भी है। समस्त दृष्यजगत लोक में समाहित है, जो सार्वत्रिक है, वह “लोक” है। इसी “लोक” से समूहवाची लोग शब्द भी बना है जिसका आशय मनुष्यों से है। इसी नज़रिए से प्राचीन अक्कद के “अम्मु” से विकसित अरबी के “अम्म / आम्” को देखना चाहिए जिसका अर्थ है सार्वत्रिक, सार्वलौकिक, सर्वव्यापक आदि। इसमें ही सर्वसाधारण या सर्वसामान्य जैसे भावों की स्थापना हुई है। “लोक” में निहित दृष्यजगत का भी यही भाव है अर्थात वह जो सब पर उजागर है। अरबी के “आम” में निहित साधारण, सामान्य सर्वसाधारण का अर्थ भी सब पर उजागर है। अरबी का “अम्मा amma” शब्द इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें घेराव, आवरण, शरण, आच्छादन, संरक्षण जैसे भाव हैं ।
क्त तमाम सन्दर्भों से गुज़रते हुए अरबी के “आम्” शब्द में सार्वत्रिक, सर्वसाधारण, सामान्य की अर्थवत्ता स्थापित हुई। इसी कड़ी में हिन्दी में बहुप्रयुक्त अमूमन शब्द का भी ज़िक्र करना चाहिए। “अमूमन” अरबी के आम शब्द का ही बहुवचन है। सामान्यतः, साधारणतः जैसे आशय को व्यक्त करने के लिए हिन्दी में इसका खूब इस्तेमाल होता है। अरबी का “उम्मः” या “उम्मा” शब्द भी अपरिचित नहीं है जिसका अर्थ है धार्मिक समुदाय । हिब्रू में इसका अर्थ राष्ट्र ही होता है । प्राचीन उग्रेटिक भाषा में इसका अर्थ परिवार था । आमखास के मराठी में “हमखास” बनने के सन्दर्भ में ध्यान रहे है कि फ़ारसी के “आमरास्तः” को मराठी में हमरस्ता कहा जाता है। विधायक के लिए मराठी ने इसी आम से आमदार शब्द बनाया । कालान्तर में “आम” शब्द में निहित सर्वसाधारण का अरबी में भी इतना साधारणीकरण हुआ कि इससे बने “आमी” शब्द का अर्थ आम आदमी और प्रकारान्तर से नीच, लोफ़र और बाज़ारू आदमी हो गया । खाँचों में बँटे समाज में अन्ततः यह होता है ही। जो सर्वसुलभ है, साधारण है, अन्ततः उसे स्तरहीन समझ लिया जाना तो तय है।
अगली कड़ी “दीवानेख़ास और आमख़ास” में समाप्त

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Saturday, January 21, 2012

रैली, रेवड़ और रेड़ मारना

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रै ली, रेला और रेवड़ में क्या फ़र्क़ है ? मूलतः ये सभी शब्द समुच्चयवाची हैं। पतनशील राजनीति के इस दौर में मनुष्य और जानवर में ज्यादा अन्तर नहीं रह गया है । चुनावी दौर की राजनीतिक सभाओं-सम्मेलनों में श्रोताओं की भीड़ जुटाने के लिए सभी राजनीतिक दल गाँव देहात के सीधे-सादे लोगों के सामने तरह-तरह के प्रलोभन देकर (चारा डाल कर) , उन्हें हाँक कर अपने आयोजनों की सफलता का डंका पीटते हैं । राजनीतिक सभाओं के लिए आजकल रैली शब्द बहुत आम हो गया है । रैली स्त्रीवाची संज्ञा है। जब रैली से भी बड़े समूह या जमाव का आयोजन होता है तो उसे रेला कहा जाता है । आजकल मीडिया-सनसनी के दौर में हर चीज़ के आगे “महा” शब्द लगाने का चलन बढ़ा है । रेला से भी बड़े जनसमूह के लिए महारेला शब्द चल पड़ा है । ये तीनों शब्द भारोपीय भाषा परिवार के हैं और रेला और रेवड़ में तो क़रीबी रिश्तेदारी भी है। रैली शब्द में मूलतः कतारबद्ध, अनुशासित लोगों का भाव है वहीं रेला में भी समूह का भाव है मगर इसमें अनुशासन का अभाव है । रेला में धक्कम-धक्का, भीड़-भड़क्का वाला भाव है। रैली या रेला जहाँ मनुष्यों के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है वहीं रेवड़ समूहवाची होते हुए भी सिर्फ़ मवेशियों के जत्थे के लिए प्रयुक्त होता है । रेवड़ का मूलार्थ है मवेशियों की लम्बी कतार ।
बसे पहले रैली की बात । रैली शब्द आज चाहे हिन्दी का जाना-पहचाना और बहुप्रयुक्त शब्द है मगर यह अंग्रेजी से हिन्दी में आया है । रैली का अर्थ है किसी खास उद्धेश्य के लिए मनुष्यों का एक स्थान पर इकट्ठा होना या एक जगह से दूसरी जगह जाना । अमेरिकन हेरिटेज डिक्शनरी के मुताबिक अंग्रेजी का रैली शब्द प्राचीन फ्रैंच के रैलियर आ रहा है जो दो शब्दों re- + alier से मिल कर बना है। अंग्रेजी का re- प्रसिद्ध उपसर्ग है जिसमें फिर से, दोबारा जैसे भाव है । रैलियर के दूसरे पद alier में एकत्र होने का भाव है। प्रसिद्ध जर्मन भाषाविज्ञानी जूलियस पकोर्नी के मुताबिक प्रोटो भारोपीय भाषा परिवार के leig- शब्द से एलियर बना है जिसमें संगठित करना, समूह बनाना, जकड़ना, बान्धना जैसे भाव हैं। अंग्रेजी के कई शब्द इस धातु से बने है जिनमें से कुछ हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे ऐली / ऐलाई / ऐलाइज़ यानी मित्र, संगी, साथी, मित्रपक्ष, मित्र राष्ट्र, सहयोगी आदि। मिश्रधातु को अंग्रेजी में ऐलॉय कहते हैं, जो इसी मूल से आ रहा है । मिलाने, संगठित होने और प्रकारान्तर से समूवाची संज्ञा का

crowdरेड़ मारना- हिन्दी का एक आम मुहावरा है रेड़ मारना । रेड़ मारना का सामान्य अर्थ है किसी व्यवस्था या वस्तु को बिगाड़ देना, उसका बिगड़ जाना। किसी चीज़ को सही ढंग से प्रयोग नहीं करना। किसी व्यवस्था में अनावश्यक छेड़छाड़ करते हुए उसके मूल स्वरूप को बिगाड़ देना जैसी बातें रेड़ मारना, रेड़ करना या रेड़ पीटना जैसे मुहावरों में व्यक्त होती है। रेल के रेड़ रूप के सन्दर्भ में इसमें निहित धकियाने का भाव रेड़ मारना मुहावरे में गौरतलब है। भाव यही है कि किसी चीज़ के मूल स्वभाव के विपरीत उसके साथ की जाने वाली जोर-जबर्दस्ती या छेड़छाड़ ही रेड़ मारना है। भीड़ के मूल चरित्र यानी अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था की नुमाइंदगी करने वाला रेड़ शब्द उसी रेल शब्द से निकला है जिससे भीड़ के अर्थ में रेला शब्द जन्मा है।

भाव यहाँ साफ़ नज़र आ रहा है। संघ, महासंघ, सभा, संघठन, दल, पार्टी, टीम, समूह आदि के अर्थ में लीग league शब्द हिन्दी में खूब जाना-पहचाना है और लगभग हिन्दी-उर्दू का ही जान पडता है । हिन्दी में लीग शब्द मुस्लिम लीग के सन्दर्भ में या खेल की टीमों के सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। लीग में भी मूलतः एक दूसरे के साथ आना, बराबरी से ले जाना, साथ बैठना जैसे भाव हैं। इसके अलावा रिलीज़न जैसा शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। धार्मिक, सामाजिक या नैतिक आधार पर बाध्य करने के लिए अंग्रेजी में ओब्लाइज़ शब्द है। हिन्दी इसका प्रयोग अहसान जताने के अर्थ में खूब होता है। यह भी इसी मूल का है ।
ब बात हिन्दी के रेला, महारेला की । हिन्दी के विभिन्न शब्दकोशों में रेला देशज शब्द समूहवाची है। रेला का सम्बन्ध रेल से है जिसके सामासिक रूपों रेल-पेल, रेलमपेल, रेल-ठेल से हिन्दी समाज बखूबी वाकिफ़ है। हिन्दी के रेल शब्द में बहाव या प्रवाह का आशय निहित है। रेल-पेल या रेलमपेल जैसे शब्दों में ऐसे जन-जमाव या भीड़-भड़क्के का भाव है जहाँ लोग एक दूसरे को ठेल रहे हों। रेला शब्द में भी प्रवाह, धारा या बहाव का भाव है। पानी का रेला यानी प्रचण्ड आवेग के साथ गतिमान जलराशि। लोगों का रेला यानी आगे बढ़ता जन समूह। रेला शब्द की व्युत्पत्ति राल्फ़ लिली टर्नर संस्कृत के रय से मानते हैं जिसका अर्थ है तेज बहाव, तेज गति, द्रुतगामी, शीघ्रता आदि। रय बना है से। देवनागरी का अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। इसी तरह के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है। की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी , उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है।
में निहित आगे बढ़ने का भाव ही फ़ारसी के रौ शब्द में भी झलक रहा है। फ़ारसी का रौ धुन, लगन, गति, प्रवाह या धारा का सूचक है। अपनी ही रौ में लगे रहना जैसे वाक्य से इसका आशय स्पष्ट है। सिन्धी में इसका रूप रौ / राऊ है तो हिन्दी में यह रौ ही है। मैथिली में यह रेड़ है जिसका अर्थ है धक्का देना। गुजराती में रेड़वु है जिसका अर्थ है बाढ़, तेज धार आदि। सिन्धी में एक रूप रेलो है तो नेपाली में यह रेलणु है। इसी कड़ी में आता है रेवड़ शब्द जिसका अर्थ है मवेशियों का समूह। इसमें पशुओं का कतारबद्ध आगे गति करने का भाव है। जॉन प्लैट के हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश के मुताबिक यह संस्कृत की रेव् धातु से आ रहा है। यह भी से सम्बन्धित है। रेव् में कतार, गति, जाने का भाव है साथ ही इसमें छलांग लगाने, उछलने कूदने के अर्थ भी निहित हैं। रेवड़ के परिप्रेक्ष्य में ये सभी अर्थछटाएँ तार्किक हैं। रेला और रेवड़ में धकेलने का का भाव भी है। रेले में लोग एक दूसरे को धकेलते हैं और रेवड़ में पशु धक्कामुक्की करते हुए आगे बढ़ते हैं। आज की चुनावी राजनीति भी विभिन्न दलों का महारेला या महारेवड़ हैं जहाँ लोकतन्त्र के नाम पर एक दूसरे को धकियाते हुए सब आगे बढ़ रहे हैं।

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Friday, January 20, 2012

ग़नी और माले-ग़नीमत

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बो ली भाषा में हम अक्सर ऐसे शब्दों का किन्हीं विशिष्ट अर्थों में इस्तेमाल कर रहे होते हैं जिनके साथ वह अर्थ मूलतः जुड़ा नहीं होता। अरबी भाषा से बरास्ता फ़ारसी होते हुए हिन्दी में आए ऐसे सैकड़ों शब्द हैं जो बोल-व्यवहार में हिन्दी के अपने से लगते हैं। आम बोलचाल का ऐसा ही एक शब्द है ग़नीमत जिसका इस्तेमाल करने के लिए किसी को उसका अर्थ या वाक्यों में प्रयोग सीखने की ज़रूरत महसूस नहीं होती। “ये तो ग़नीमत है, जो...,” “ग़नीमत थी कि...,” “ग़नीमत समझिए कि...,” जैसे अल्फ़ाज़ आए दिन हम बोलते-सुनते हैं। इन वाक्यों से ज़ाहिर हो रहा है कि शुक्र, कृपा, मेहरबानी, सन्तोष, भलाई जैसे भावों को व्यक्त करने के लिए यहाँ ग़नीमत शब्द का प्रयोग हुआ है। उक्त वाक्यों में ग़नीमत का प्रयोग इस तरह हुआ है मानों किसी चीज़ की प्राप्ति हुई है। प्राप्ति की यह अनुभूति मानसिक भी हो सकती है और भौतिक भी।ग़नीमत थी, कि दुर्घटना के वक्त मैं वहाँ नहीं था” यह वाक्य बोलने वाला व्यक्ति सुख और सन्तोष प्राप्त करते हुए ही अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। इसी तरह ग़नीमत थी कि मेरी जेब में कुछ रुपए निकल आए” इस वाक्य में भी प्राप्ति की बात उभर रही है। सेमिटिक मूल के ग़नीमत शब्द में भी मूल रूप से प्राप्ति का भाव नहीं है बल्कि प्रकारान्तर से वह आ रहा है, मगर अरबी समाज में विकासक्रम के दौरान इसमें जो भाव रूढ़ हुआ वह था लूट का माल या मुफ़्त का माल।
नीमत के मूल में अरबी का घनम शब्द है जो बना है सेमिटिक धातु घ-न-म से, जिसमें हस्तगत करने, अवाप्त करने, कब्ज़ा करने जैसे भाव हैं । ज़ाहिर है ये सभी बातें प्राप्त करने, कुछ पाने से जुड़ी हैं, मगर सीधे सीधे इन्हें प्राप्ति से नहीं जोड़ा जा सकता। लूट के ज़रिए कुछ पाना और मेहनत कर के कुछ पाना, दोनों में फ़र्क है। सामान्य अर्थों में प्राप्ति शब्द में अनैतिक कर्म के ज़रिये प्राप्ति का भाव नहीं है। इसके बावजूद लूट की रकम, पड़ा हुआ माल, लावारिस वस्तु को हस्तगत करना भी प्राप्ति में ही आता है। इस तरह ग़नीमत शब्द में प्रकारान्तर से प्राप्ति का भाव जुड़ा हुआ है। कालान्तर में इस प्राप्ति में अस्तित्व रक्षा के संसाधन, सामग्री या लाभ की वस्तु का भाव भी जुड़ गया।दुनिया भर की भाषाओं की आदिम शब्दावली पशुपालन और कृषि संस्कृति से जन्मी है। उस दौर में सामाजिक व्यवहार उतने व्यापक और पेचीदा नहीं थे। पशु के पालन-पोषण, भ्रमण, खेती, खरीद-बिक्री जैसी क्रियाएँ और युद्ध, लूट, चोरी जैसी घटनाएँ सामान्य थीं जिनसे जुड़े शब्द ही प्रारम्भिक शब्दावली का हिस्सा बने।
रबी का घनम भी मूलतः पशुपालन संस्कृति से जन्मा शब्द है। हिन्दी-उर्दू में जिसे हम ग़नीमत की तरह इस्तेमाल करते हैं, मूल रूप से वह घ़नीमत है और अरबी के घनम से बना है। इसमें मूलतः समूह में रहने वाले चौपायों का भाव है। मोटे तौर पर भेड़, बकरी और ऊँट इसमें आते हैं जो रेगिस्तानी बद्दुओं के प्राचीन सहचर रहे हैं और प्राचीन अरबी समाज के सामाजिक-आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार थे। पशुओं के रेवड़ के सन्दर्भ में समूहवाची घनम शब्द की व्याप्ति सेमिटिक भाषाओं में हुई। घनम में सम्पत्ति का भाव भी शामिल हुआ क्योंकि प्राचीन समाज में मनुष्य ने लाभकारी पशुओं को काबू कर उन्हें पालतू बनाया इस तरह से पशुधन की अवधारणा विकसित हुई। अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता

... जिसके हाथ माल लगा वह पहले तो घनीम अर्थात विजेता कहलाया। पराजितों की निगाह में वह लुटेरा, डाकू, दस्यु था। आगे घनीम का एक और रूपान्तर हुआ जिसमें शक्तिशाली, समृद्ध, मालदार, ताक़तवर, दौलतमंद जैसे वज़नदार अर्थों की स्थापना के साथ अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी में ग़नी जैसा रौबदाब वाला शब्द भी अस्त्तित्व में आ गया। 

साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों
द्दुओं की संघर्षशील जीवन शैली से घनम शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और इससे नए नए शब्द बने जैसे इघ्तानम जिसमें क़रीब-क़रीब माले-मुफ्त का आशय है। ऐसी सम्पत्ति को अर्जित करने का भाव  है जिसमें अधिक श्रम खर्च न हुआ हो। मिसाल के तौर पर इधर-उधर भटकते पशुओं को कब्जे में लेकर अपनी सम्पत्ति बनाना बहुत मेहनत का काम नहीं था। वैसे भी दुधारू पशुओं को हर धर्म में खुदाई तोहफ़ा माना गया है। उन्हें हस्तगत करना पाप नहीं है। इस्लाम में भी यही मान्यता है। घनीम ( ग़नीम ) शब्द का अर्थ मूलतः (पशुओं पर ) कब्ज़ा करने वाला है, बाद में इसमें विजेता, लुटेरा, डाकू, शुत्रु, दुश्मन जैसी अर्थवत्ता कायम हुई। प्राचीन समाजों में पशुधन की चोरी बड़ी घटना होती थी। वेदों में पशु चोरी प्रकरणों का उल्लेख है। पशु चोरों को कहीं दस्यु तो कहीं पणि कहा गया है। बाद के दौर में घनीमाह शब्द विकसित हुआ जो ग़नीमत का पूर्वरूप था। घनीमाह में लूट के माल की अर्थवत्ता स्थापित हुई। माले-ग़नीमत का अर्थ होता है लूट का माल, मुफ़्त में मिला माल, खुदा की नेमत, अचानक मिला लाभ, सौभाग्य चिह्न वगैरह वगैरह।
गौरतलब है कि प्राचीन अरब का युद्धप्रिय कबाइली समाज में अलग अलग समूह अस्तित्व के लिए निरन्तर संघर्षरत रहते थे और पराजित समूह तितर-बितर होकर जब अपना साज़ो-सामान छोड़ कर भागता था तब उस सामग्री पर बिना श्रम किए आसानी से विजेता समूह का कब्ज़ा हो जाता था। यह घनीमा या माले-ग़नीमत था। प्रसंगवश मराठी में भी शत्रु, वैरी, विरोधी के अर्थ में ग़नीम शब्द है। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में इसका जन्मसूत्र अरबी के घनीम से ही जोड़ा गया है। मज़े की बात यह कि मुगलों ने मराठों के लिए शत्रु, लुटेरों के अर्थ में ग़नीम शब्द का इस्तेमाल किया। गनीम का मराठी में एक रूप गलीम भी मिलता है। आमने-सामने की लड़ाई की बजाय शत्रु को फँसाकर मारने की युद्धशैली को गनिमाई या गनीमी कहा गया। स्पष्ट है कि शिवाजी की छापामार शैली के लिए यह इस्तेमाल हुआ। मुगलों की सेना के आगे मराठों की सैन्य शक्ति काफ़ी कम थी और इसीलिए मराठों ने छापामार शैली अख्तियार की थी। 
कुल मिलाकर धार्मिक व्याख्या के अनुसार दुधारू पशु ( घनम ) ईश्वर की देन हैं। घनम पर कब्ज़ा करने की क्रिया से घनीमा (ग़नीमा)बना जिसमें पशुओं को पालतू बना कर अपनी सम्पत्ति का दर्ज़ा देने वाली संस्कृति विकसित हुई। बाद के दौर में संग्राम के दौरान छोड़े गए असबाब को ग़नीमत समझा जाने लगा। इस्लाम में घनीमा को लेकर नैतिक व्यवस्थाएँ कायम हुईं जो निश्चित ही विजेता समूह के पक्ष में ही थीं। इस्लामी विस्तारवाद के दौर में बहुत कुछ बदलाव हुआ और लूट के माल में गुलामों के साथ साथ औरतों को भी माले-ग़नीमत समझा जाने लगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि ग़नीमत में शुरू से ही माल की अर्थवत्ता स्थापित थी। ज़ाहिर है कि जिसके हाथ माल लगा वह पहले तो घनीम अर्थात विजेता कहलाया। पराजितों की निगाह में वह लुटेरा, डाकू, दस्यु था। आगे घनीम का एक और रूपान्तर हुआ जिसमें शक्तिशाली, समृद्ध, मालदार, ताक़तवर, दौलतमंद जैसे वज़नदार अर्थों की स्थापना के साथ अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी में ग़नी जैसा रौबदाब वाला शब्द भी अस्त्तित्व में आ गया।

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Tuesday, January 17, 2012

महारत और महारथ

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लग-अलग मूल से जन्में एक से शब्दों का भाषा में बर्ताव होता है। हिन्दी में महारत और महारथ दो ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग आम हिन्दीभाषी बतौर कुशलता, प्रवीणता, दक्षता या निपुणता के पर्याय की तरह से करता है। महारत और महारथ अपनी प्रकृति और व्युत्पत्ति के आधार पर दो नितान्त अलग अलग शब्द हैं मगर ध्वनिसाम्य के चलते भ्रमवश इनकी एक दूसरे से अर्थसाम्यता अनजाने में स्थापित होती चली गई। महारत फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आया तो महारथ संस्कृत मूल का शब्द है । महारत-महारथ के पर्यायी प्रयोगों के मामले में नामीगिरामी लेखक-पत्रकारों की कलम भी बेपरवाह रही है । कुछ लोगों नें अनजाने में इन शब्दों का प्रयोग किया तो कुछ लोगों ने शुद्धतावादी आग्रह के चलते महारत को विदेशज मानते हुए बड़ी आसानी से इसका ध्वन्यार्थ महारथ में तलाश लिया ।
बसे पहले ‘महारत’ की बात। मूल रूप से ‘महारत’ हिन्दी में बजरिया फ़ारसी आया और यह फ़ारसी का ही शब्द भी है, मगर इसके जन्मसूत्र सेमिटिक भाषाओं में छिपे हैं । ‘महारतट बना है सेमिटिक धातु म-ह-र से। हिब्रू, इजिप्शियन अरेबिक, आम्हारिक, अरबी, फ़ारसी, उर्दू आदि भाषाओं में इस धातु से बने कई शब्दों की व्याप्ति है । अरबी में इससे बनता है माहर जिसमें निष्णात, चतुर, ज्ञानी, विलक्षण, निपुण, प्रवीण, बुद्धिमान जैसे भाव हैं । हिब्रू और फ़ारसी में इसका ‘माहिरट रूप प्रचलित हुआ जिसमें तेज़, चतुर और कुशल का भाव है। हुनरमन्द होना भी माहिर होने की निशानी है । सीरियाई में इसका माहेर रूप है तो आम्हारिक में तेमारे जिसका अर्थ है सीखना। मूलतः म-ह-र धातु में सीखने, जानने का भाव ही प्रमुख है। माहर से बने माहिर की व्याप्ति जब फ़ारसी में हुई तो वहाँ अत् प्रत्यय लग कर इससे महारत शब्द बनाया गया जिसमें प्रावीण्य, कौशल, हुनर, गुणसम्पन्नता, दक्षता जैसे भाव उजागर होते हैं । माहिर संज्ञा है और व्यक्तिनाम भी होता है । हिब्रू में जहाँ इस धातु मूल में तेजी, चपलता का भाव है वहीं इथियोपिया में इसका अर्थ सीखना, सिखाना है । हिन्दी में ‘महारत’ से महारती शब्द भी बनता है जो मूलतः माहिर का हिन्दीकरण ही है । महारती का अर्थ हुआ कुशलता से काम करनेवाला । सम्भवतः इसे महारथी की तर्ज़ पर बनाया गया है। माहिर का भी यह अर्थ होता है।
हिन्दी का ‘महारथ’ शब्द तत्सम शब्दावली का हिस्सा है। महा + रथ से मिल कर यह बना है जिसका अर्थ हुआ बड़ी गाड़ी या रथ अथवा बड़ा योद्धा या नायक। गौर करें कि अरबी स्रोत से बने ‘महारतट शब्द की जो अर्थवत्ता है, संस्कृत के ‘महारथ’ में वैसा कोई भाव नहीं है। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक महारथ संज्ञा का अर्थ है बहुत भारी योद्धा जो अकेला दस हजार योद्धाऔं से लड़ सके । बहुत बड़ा रथ । विशाल रथ । आकांक्षा । मनोरथ । स्पष्ट है कि कुशल, चतुर, निष्णात जैसे भावों का यहाँ योद्धा के अर्थ में ही सन्दर्भ जुड़ता है। प्रवीण, निपुण जैसे स्वतंत्र अर्थ इस शब्द में नहीं हैं। महाभारत के शिशुपाल वध प्रसंग में महारथ  की परिभाषा बताई गई है जिसके मुताबिक “एको दशसहस्राणि योधयद्यस्तु धन्विनां शस्त्रशास्त्र प्रवीणश्च विज्ञेयः स महारथः” अर्थात महारथ वह है जो शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण होता है। जो योद्धा दस हजार योद्धा धनुर्धारियों के साथ अकेला युद्ध करने में सक्षम, समर्थ हो, उसे ‘महारथ’ कहते हैं।
हारथ शब्द में क्षत्रियत्व के साथ ब्राह्मणत्व का समावेश भी है। योद्धा सिर्फ़ वही नहीं है जो शस्त्रास्त्रों के साथ युद्धभूमि में शौर्यप्रदर्शन करे। योद्धाओं में महारथ वह है जो नीति, कर्त्तव्य, सिद्धान्त आदि के शास्त्रीय पक्ष से भी अवगत हो तथा युद्धभूमि में इन शिक्षाओं का नीतिगत और व्यवहारगत परीक्षण करते हुए शूरवीरता दिखाए। सामान्यतः योद्धा सिर्फ़ शस्त्री होता है और विद्वान सिर्फ़ शास्त्री। मगर महाभारत के पंच पाण्ड इन तमाम अर्थों में शस्त्र और शास्त्रनिपुण थे। अर्थात वे महारथ हैं। उनके मुख में चारों वेद और पीठ पर शर सहित धनुष है। यह क्षत्रियत्व और ब्राह्मणत्व का संगम है। शत्रु जब सामने हो तो उसे शास्त्र के ज़रिये अर्थात वाक्चातुरी से पराजित किया जा सकता है। अगर इसमें विलम्ब हो रहा हो तो शरसंधान से उसे पराजित किया जा सकता है। दरअसल महाभारत का जो केन्द्रीय भाव है उसके मूल में महारथ का चरित्र ही है।
हाभारत में युद्ध के समय कौरवों और पाण्डवों के पक्ष में लड़ने वाले महारथियों का हवाला है। कौरव पक्ष के सात महारथी-द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य और जयद्रथ । इसके अलावा किन्हीं संदर्भों में कौरव पक्ष के बारह महारथियों का उल्लेख मिलता है जिनमें दुर्योधन, भीष्म,  भूरिश्रवा, विकर्ण, और दुशासन के भी नाम शामिल हैं । पाण्डवों के तेरह महारथी- अर्जुन, सात्यिकी, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच, शिखण्डी, अभिमन्यु, भीम, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर, विराट, उत्तर और द्रुपद । इसके अलावा कुछ अन्य संदर्भों में पाण्डव पक्ष के अठारह महारथियों का उल्लेख है जिसमें भीम,  धृष्टकेतु, काशिराजस पुरुजित, कुंतिभोज, शैव्य युधामन्यु, उत्तमौजा, प्रतिविन्ध्य, श्रुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतवर्मा जैसे वीरों के नाम भी शामिल हैं । महाभारत के परम नायक अर्जुन नहीं, कृष्ण हैं। उन्होंने युद्ध में शस्रास्त्र ग्रहण नहीं करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए उनका नाम यहाँ नहीं है, अन्यथा उनसे बड़ा महारथ / महारथी कौन हुआ है?

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Monday, January 9, 2012

येड़ा… बेंडा…एड्डु…इड्डु

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मुम्बइया ज़बान से हिन्दी में चल पड़े चुनींदा शब्दों में धीरे धीरे ‘येड़ा’ शब्द की व्याप्ति भी होती जा रही है। गौरतलब है कि मुम्बइया ज़बान से आम भारतीय का परिचय बॉलीवुड फिल्मों के जरिये ही हुआ है। कई लोग मुम्बइया को दक्खनी हिन्दी से जोड़ते हैं, लेकिन दोनों में पर्याप्त फ़र्क़ है। मुम्बइया ज़बान के ज्यादातर वे शब्द ही बरास्ता बॉलीवुड फिल्म, हिन्दी में आते हैं, जिन्हें इन फिल्मों में अण्डरवर्ल्ड के लोग बोलते हैं। हिन्दी में दरअसल जो येड़ा सुनाई पड़ता है, वह मराठी में येडा है। गौरतलब है कि मराठी वर्णमाला भी देवनागरी की ही है, पर इसमें कुछ चिह्नों और वर्तनी में अन्तर है। मराठी में ‘ड’ के नीचे बिन्दी लगाकर ‘ड़’ नहीं बनाते, अलबत्ता चलन के आधार पर ‘ड़’ का उच्चार ज़रूर होता है। ठीक वैसे ही, जैसे हिन्दी मे नुक़ता नहीं लगाते, मगर अभ्यस्त लोग “जरूर” को भी “ज़रूर” ही पढ़ते-बोलते हैं।
येड़ा शब्द यूँ तो समूचे महाराष्ट्र की मराठी में व्याप्त है, मगर ‘येड़ा’ शब्द बोली भाषा का है। ‘येड़ा’ का शुद्ध रूप है वेडा जो बना है वेड क्रिया से जिसका अर्थ है मूर्खता, बेवकूफ़ी, आड़ा-बाँका, विचित्र, टेढ़ा-तिरछा, बावला आदि। संस्कृत के वैधेय से जिसके दो अर्थ हैं। पहला है- विधिसंगत अर्थात नियमानुकूल दूसरा है मूढ़, निर्बुद्धि, बुद्धू, मूर्ख आदि। वैधेय बना है विधि से जिसका अर्थ रीति, नियम, कानून, प्रकार, तरीका, कर्ता, ईश्वर, बुद्धि, बिंधना, नियति, भाग्य, साधन आदि होता है। कृपा कुलकर्णी के कोश के मुताबिक ‘वैधेय’ से वेडा बनने का क्रम कुछ यूँ रहा है- वैधेय > वेढेअ > वेड्ढ> वेढ > वेड इस तरह वैधेय से ‘वेड’ क्रिया बनी जिसमें मूल भाव विचित्र रंगढंग वाला था जिसमें आगे चल कर मूर्खता भाव रूढ़ हो गया। वेड का ही संज्ञा रूप वेडा हुआ जिसका अर्थ हुआ मूर्ख। देशी बोलियों में इसका उच्चारण येड़ा होता है। वेड़ा के साथ वाकड़ा का समास “वेड़ा-वाकड़” बनता है। उसी अर्थ में वैसे हिन्दी का “आड़ा-बाँका” होता है।
वेडा की तुलना मालवी, बुन्देली के ‘बेंडा’ शब्द से करें। साथ ही हिन्दी में प्रचलित ‘ऐंडा-बेंडा’ जैसे शब्दों पर भी विचार करें। मालवी में ऐँडा-बेंडा का प्रयोग विचित्र, अजीब, मूर्खतापूर्ण जैसे अर्थों में होता है। बेंडा का अर्थ होता है मूर्ख, पागल। जॉन प्लैट्स के कोश में ‘बेंडा’ की व्युत्पत्ति व्यत्यस्तः से बताई गई है जो मुझे बहुत दुरूह नज़र आ रही है। मराठी वेड़ा की तुलना मालवी ‘बेंडा’ से कर के देखें। मुझे इसमें साम्य नज़र आ रहा है। हिन्दी की बोलियों में प्रचलित बेंडा शब्द के मूल में भी वैधेय है, ऐसा मुझे लगता है। वैधेय की व्याप्ति कन्नड़ के ‘एड्डु’, ‘इड्डु’ में भी हुई है जिसका अर्थ मूर्खता या बेवकूफ़ी है।

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Friday, January 6, 2012

सब बराबर हैं…

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हि न्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों एक शब्द है ‘बराबर’ जिसे दिनभर में न जाने कितनी बार हम इस्तेमाल करते हैं। असमानता और भेदभाव से भरे समाज में हमारा तमाम वक्त या तो दूसरों की बराबरी करने में बीतता है या किसी को अपने बराबर न आ ने देने में जाता है। समतावादी समाज की चाहे लाख दुहाई दी जाए, पर गैरबराबरी ही समाज का असली चेहरा है। बराबर शब्द में जबर्दस्त मुहावरेदार अर्थवत्ता है। बराबर का प्रचलित अर्थ है समतुल्य, समान, एक साथ, एक जैसा आदि। इसमें लगातार का भाव भी है। “वह बराबर बोलता जा रहा था” इस वाक्य में समतुल्यता की बजाय सातत्य का भाव ज्यादा है। इसके साथ ही इसका मुहावरेदार प्रयोग भी होता है जिसमें चौपट करना, नष्ट करना, निपटा देना, मुकाबला करना, होड़ करना, स्पर्धा करना, अनिर्णित रहना, पड़ोस का, साथ का, बाजू में, समकक्ष रखना, लगातार आदि। गणित में equal के = चिह्न को ‘बराबर’ ही कहा जाता है।
राबर में जो समानता का भाव है उसके मूल में सचमुच सामाजिक समानता का भाव है। सभी लोगों के ‘बराबर’ होने का सन्देश इसमें छुपा है। मिलजुल कर काम करने के सम्बन्ध में अक्सर कंधे से कंधा मिलाने की बात कही जाती है। पारस्परिक सौहार्द के लिए, भाईचारा बढ़ाने के लिए दिल से दिल जोड़ने की बात कही जाती है। लेकिन इन सूक्ष्म निहितार्थों तक पहुँचने के लिए स्थूल रूप से गले मिलने की बात कही जाती है उसके मूल में भाईचारा ही है। गले मिलने की क्रिया ही दरअसल सीने से लगने की क्रिया भी है। इसे कलेजे से लगना या कलेजे से लगाना भी कहते हैं। देखते हैं ‘बराबर’ शब्द कहाँ से आया, कैसे बना। ‘बराबर’ इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है और हिन्दी में फ़ारसी से आया है। ऐसा लगता है मुस्लिम शासन के शुरुआती दौर में ही यह शब्द बोलीभाषा में समा गया था। कबीर ने इसका प्रयोग किया है-“सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदै में सांच है, ताके हिरदै हरि आप ॥” बराबरी में दिल को दिल से जोड़ने के बहाने समानता का सन्देश महत्वपूर्ण है
राबर सामासिक पद है। इसके मूल में फ़ारसी का बर शब्द है जिसका अर्थ है वक्ष, सीना, छाती, हृदय, अन्तःस्थल वगैरह। संस्कृत में ‘उरः’, ‘उरस्’ शब्दों का आशय भी यही है। स्त्रियों की छाती, विशेषकर स्तनों के लिए ‘उरोज’ या ‘उरसिज’ शब्दों का रिश्ता भी इसी ‘उर’ से है। वात्सल्य भाव व्यक्त करने के लिए ‘उर’ का प्रयोग गोद की तरह भी होता है। इस उर का ज़ेन्द रूप है ‘वर’, जिसका फ़ारसी रूपान्तर ‘बर’ होता है। उरः > वर > बर । जॉन प्लैट्स को कोश के मुताबिक  ‘बराबर’ बना है ‘बर-आ-बर’ से जिसमें सीने से सीने को मिलाने की बात है।

Equal... बराबरी में दिल को दिल से जोड़ने के बहाने समानता का सन्देश महत्वपूर्ण है...

‘बर-आ-बर’ का प्रचलित रूप बराबर हुआ। भाव समानता का है। इस तरह ‘बराबर’ शब्द की अर्थवत्ता व्यापक होती चली गई और इसमें वे सब भाव आ गए जिनका उल्लेख ऊपर किय गया है। फ़ारसी में मुहावरा है “बराबर करदन” जिसमें एक जैसा, सपाट करने का आशय है। इसका हिन्दी रूप हुआ “बराबर करना”। जिन चीज़ों को यथावत रहना था, उन्हें एक दूसरे के साथ गड्डमड्ड करने से मूल स्वरूप पर बुरा असर पड़ता है। इसे व्यक्त करने के लिए भी “सब बराबर कर दिया” का प्रयोग होता है।
राबर से मिलता जुलता एक अन्य शब्द भी हिन्दी में बारबार प्रयोग होता है। यह जो “बारबार” समास है यह खालिस हिन्दी का शब्द है और “बराबर” की बराबरी कर सकता है। ‘बारबार’ शब्द में जिस दोहराव का भाव है, आवृत्ति का भाव है वह संस्कृत के ‘वृ’ से आ रहा है। ‘वृ’ से बने ‘वर्’ में मूलतः काल का भाव है। साफ है कि प्राचीन काल से ही काल या अवधि की बड़ी इकाइयों की गणना मनुष्य ने ऋतु परिवर्तन और सूर्य-चंद्र के उगने और अस्त होने के क्रम की आवृत्ति यानी दोहराव को ध्यान में रखते हुए की। प्रकृति में दोहराव का क्रम महत्वपूर्ण है। चाहे वह वर्ष हो, माह हो या दिन। सप्ताह के दिनों के पीछे लगे ‘वार’ शब्द से यह स्पष्ट है। संस्कृत ‘वारः’ से बना है हिन्दी का वार जो इसी ‘वृ’ से आ रहा है जिसका अर्थ है सप्ताह का एक दिन, समूह, आवृत्ति, घेरा, बड़ी संख्या आदि। वृ धातु में निहित ‘आवृत्ति’ का भाव चौबीस घंटों में सूर्य को घूमने की गति में समझ सकते हैं जिससे एक दिन बनता है। तीस दिनों में एक माह और बारह मासिक-चक्रों से एक वर्ष तय होता है। यही आवृत्ति ‘ऋतु’ कहलाती है।
वृ धातु में संस्कृत का ‘ऋ’ भी छुपा है। वार का ही फारसी रूप ‘बारः’होता है जिसमें दोहराव, दफा, मर्तबा जैसे भाव है। संस्कृत के अनुस्वार की प्रवृत्ति ही अवेस्ता और फारसी में भी है। अक्सर के अर्थ में भी जिस ‘बारहा’ का प्रयोग हम हिन्दी उर्दू में देखते हैं वह यही ‘बारः’ है। बार-बार के अर्थ में हिन्दी में बहुधा शब्द है। संस्कृत में इसके लिए ‘वारंवारम’ शब्द है जिससे हिन्दी का ‘बारम्बार’ शब्द बना है। मराठी में इसका ‘बालंबाल’ रूप प्रचलित है।

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Tuesday, January 3, 2012

बजरिया में बाजारू बातें

सन्दर्भः नीलाम, विपणन, पण्य, क्रय-विक्रय, गल्ला, हाट, दुकान, पट्टण, पोर्ट, पंसारी  bazar
ह स्थापित तथ्य है कि वैश्विक स्तर पर विभिन्न भाषाओं में अन्तर्सम्बन्ध की बड़ी वजह मानव समूहों का आप्रवासन रहा है। इन समूहों में भी व्यापारियों-कारोबारियों के जत्थे खास थे। इनकी वजह से जिन्सी कारोबार के साथ-साथ अनजाने में शब्दों की सौदागरी भी होने लगी। यानी बाज़ार की वजह से भाषाएँ समृद्ध हुईं। खुद बाज़ार शब्द इसकी मिसाल है। यूरोप, पश्चिमएशिया, मध्यएशिया से लेकर सुदूर पूर्व तक बाज़ार की व्याप्ति है। भारतीय उपमहाद्वीप के धुर उत्तर में श्रीनगर से श्रीलंका तक बाज़ार बसता है। इंडो-ईरानी मूल से निकले कुछ शब्दों नें दुनियाभर की भाषाओं में जबर्दस्त जगह बनाई है, जिनमें बाज़ार शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। बाज़ार की व्याप्ति का यह आलम है कि चौदहवीं सदी के यूरोपीय व्यापारी फ्रान्सिस्को बाल्दुच्ची पेगोलोती (1310-1347) के दस्तावेज़ों में बाज़ार- Bazarra शब्द का उल्लेख मिलता है। गौरतलब है कि इटली के जिनोआ में इसका अर्थ उस दौर में भी मार्केट-प्लेस ही था। प्रसिद्ध नाविक कोलम्बस भी जिनोआ का ही रहनेवाला था। पन्द्रहवीं सदी में अगर यह शब्द कबीरवानी में दर्ज़ हो रहा था-कबिरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर । ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ।। उसी वक्त सुदूर यूरोप में इटली के घुमक्कड़ नक्शानवीस गियोवानी रेम्युज़ियो अपने यात्रावृत्त में इस शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे। सुदूर पूर्व की थाई भाषा में इसका पासार रूप प्रचलित है। ज़ाहिर है इससे भी सदियों पहले से यह शब्द दुनियाभर में प्रचलित हो गया होगा।
ज भारतीय भाषाओं में खास कर हिन्दी में बाज़ार का आसान विकल्प मिलना नामुमकिन है। हम दरअसल बाज़ार में ही रहते हैं। हमारे इर्दगिर्द बाज़ार है। उसकी वजह भी है। मनुष्य जहाँ गया, वहाँ आवास के बाद जो दूसरी व्यवस्था उसने बनाई, वह बाज़ार ही थी। दुनियाभर में ऐसी बस्तियाँ मिल जाएँगी जिनके नामों के साथ व्यापारिक गतिविधि जुड़ी रही है। मण्डी, पत्तन, पल्ली, पट्टणम्, पाटण, बन्दर जैसे शब्द दरअसल जिन शहरों के नामों से जुड़े हैं, उनकी पहचान कारोबारी ठिकाने के तौर पर ही रही है जैसे भवानीमण्डी, मछलीपत्तन, त्रिचनापल्ली, बोरीबन्दर, विशाखापट्टणम् आदि। इसी कड़ी में बाज़ार शब्द भी है। क़ासिमबाज़ार, मीनाबाज़ार, पटनाबाज़ार, आगराबाज़ार वगैरह। बाजार वाली बस्तियाँ इलाके के लिए बजरिया शब्द भी प्रचलित है। अक्सर ये बस्तियाँ यातायात स्थानकों के आसपास बनती थीं।
बाज़ार की अर्थवत्ता का इतना विस्तार हुआ कि शोरशराबे वाले जमघट को भी बाज़ार की संज्ञा दी जाने लगी। इससे ही बाज़ारू शब्द बना जिससे गुणवत्ता में गिरावट का आशय लगाया जाने लगा। अशिष्ट, अशालीन व्यवहार को बाज़ारू हरकत कहा जाता है।बाज़ारू बातें, बाज़ारू चीज़, बाज़ारू आदमी, बाज़ारू लोग, बाज़ारू औरत जैसे प्रयोग आए दिन हम सुनते हैं। बाज़ार शब्द में हलचल है, गतिशीलता है। बाज़ार में ज़िदगी की रौनक है। मगर यह रौनक, यह हलचल ज़िंदगी में ख़लल भी डालती है। इसीलिए लोगों के जमघट से उत्पन्न अव्यवस्था के सन्दर्भ में अक्सर सुना जाता है-“क्या बाज़ार लगा रखा है ?” मछली बाज़ार में सर्वाधिक अस्तव्यस्तता, गंदगी होती है इसीलिए यह पद भी प्रसिद्ध है। दक्षिण का एक प्रसिद्ध बन्दरगाह है मछलीपट्टणम्, ज़ाहिर है यह पत्तन बाजार ही है। ग़ालिब लिखते हैं-फिर खुला है दरे-अदलते-नाज़, गर्म बाज़ारे-फौजदारी है । बाज़ार मूलतः घूमने-फिरने की जगह ही होते हैं, फिर चाहे यह घूमना, खरीदी का बहाना ही क्यों न हो। अक्सर हम बाज़ार कुछ खरीदने नहीं, महज़ घूमने टहलने जाते हैं और लुट कर आते हैं। विचरण करते हुए, भटकते हुए खरीदारी करने की जगह ही है बाज़ार। दुनियाभर की भाषाओं में बाज़ार शब्द फ़ारसी से गया है। अवेस्ता में एक शब्द है चर या चार जिसका अर्थ है गति करना,
baazaarअक्सर हम बाज़ार कुछ खरीदने नहीं, महज़ घूमने टहलने जाते हैं और लुट कर आते हैं। विचरण करते हुए, भटकते हुए खरीदारी करने की जगह ही है बाज़ार। दुनियाभर की भाषाओं में बाज़ार शब्द फ़ारसी से गया है।
घूमना, जाना अथवा घास, चारा। याद रहे संस्कृत में चर् धातु से बने चर, चारा जैसे शब्द हैं जिनमें घूमने, फिरने, चलने के अलावा घास का भाव भी है। दर असल घूमते फिरते जिसे खाया जाए, अर्थात चर क्रिया करते हुए जो खाया जाए, वही चारा है। जिससे चलने की क्रिया पूरी हो वे चरण हैं। अवेस्ता के चर में भी चलने और चरने का यही भाव है। चर् का ही अगला रूप चल् होता है। र का रूपान्तर ल में होना इंडो-इरानी भाषाओं का स्वभाव है ।
पुरानी फ़ारसी अर्थात पहलवी में एक शब्द है वचार जिसमें मिलने-जुलने की जगह का भाव है। वचार दरअसल अवेस्ता के विचार ( विचार-संस्कृत, हिन्दी वाला नहीं ) का रूपान्तर है। ऐसा स्थान जहाँ घूमते फिरते लोग मिलें। विचरण का भाव ही विचार में है। मध्यकालीन फ़ारसी में इसका वज़ार रूप मिलता है। आर्मीनियाई में यह वचार ही है, सोग्दियन में बाज़ारगान शब्द होता है जिसका अर्थ है दुकानदार। आर्मीनियाई में इसका रूप वाछारकान है। बाज़ार की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मत यह है कि पूर्वी ईरानी में वज़ार का पूर्व रूप बहा-चार था जिसका अर्थ था वह जगह जहाँ कीमतें होती हैं अर्थात बाज़ार । बहा में मूल्य या कीमत का भाव है और चार में चलने की जगह यानी स्थान। फ़ारसी के बहा का एक रूप रूसी का बेहो है जिसका अर्थ है दहेज, दुल्हन के लिए दिया जाने वाला मूल्य।
भाषा विज्ञानी इस बेहो, बहा का विकास अवेस्ता के वस्न vasna में देखते हैं। गौरतलब है कि संस्कृत में वस्न का अर्थ होता है धन, दौलत, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, मूल्य, दाम, कीमत आदि । यह भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और वस्न का ग्रीक रूप वोस्नोस होता है। इन्साइक्लोपीडिया इरानिका में बहोयश्न और वहा-वज़ना vaha-vazana भी बाज़ार या हाट के लिए प्रयुक्त होते थे। सवाल उठता है कि इसके पहले चरण में जो बहा क्रिया है उसे संस्कृत की वह् क्रिया से जोड़ा जा सकता है या नहीं जिसमें जाना, चुकाना, भुगतान करना, बहना, चलना,टहलना, बंद करना जैसी वैविध्यपूर्ण अर्थवत्ता है। क्योंकि दूसरा पद वज़ना तो निश्चित ही अवेस्ता में जो वस्न् रूप है जिसमें मूल्य, कीमत आदि का भाव है और इसका फारसी में में  तब्दील होकर का लोप हुोना मुमकिन है।  वह् क्रिया में भी भुगतान का भाव है। बहा-चारना ( vaha-carana) पद भी मिलता है जिसमें बहा का अर्थ मूल्य ही बताया गया है। जो भी हो, चर, चार जैसे शब्दों का बहा-चार में स्थानवाची अर्थ ही निकलता है। इस तरह पहलवी के बहा-चार से आधुनिक फ़ारसी का बाज़ार bazaar / bazaar रूप हाथ लगता जिसकी घुसपैठ दुनियाभर की भाषाओं में है।
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Sunday, January 1, 2012

दुकाँ से दुकान तक

platfarmसम्बन्धित शब्द- नीलाम, विपणन, पण्य, क्रय-विक्रय, गल्ला, हाट,

रो ज़मर्रा की भाषा में ऐसे कितने ही शब्द हैं जिनका आसान पर्याय मिलना मुश्किल है। हिन्दी का दुकान ऐसा ही शब्द है जिसका विकल्प ढूंढना मुश्किल है। उपभोक्ता सेवा केन्द्र और विपणन केन्द्र के साथ दुकान लगता है जैसे नाई की दुकान, किराने की दुकान, पान की दुकान, किताब की दुकान, गल्ले की दुकान, राशन की दुकान, परचून की दुकान, थोक की दुकान, फुटकर की दुकान वगैरह। संस्कृत मूल के हट्टः से रूपान्तरित हट्टी एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ दुकान होता है, मगर यह हिन्दी में प्रचलित नहीं है। इसी तरह पेठ, पीठा जैसे शब्द भी हैं जिनका दुकान कम बाज़ार के अर्थ में ज़्यादा प्रयोग होता है। पेठ मराठी का शब्द है और पीठा पश्चिमी हिन्दी क्षेत्रों में बोला जाता है। हट्टी पंजाबी का शब्द है। संस्कृत में हट्टः शब्द बाज़ार, मेला, मंडी के अर्थ में ही है। दुकाँ की व्याप्ति कई भाषाओं में हुई है जैसे बुल्गारी में यह द्जुकाँ है तो अज़रबैजानी में दूकाँ, अल्बानी में इसे दिकाँ कहते हैं और फ़ारसी में दोकाँ / दोकान। स्वाहिली में इसका रूप दुका है, सीरियक में यह दुचान है, ताजिक में दुकोन तो तुर्की में दूक्काँ, उज़्बेकी में यह दोकोन और स्पेनी में यह एडोक्विन है। दुकान के साथ दार शब्द लगने से फ़ारसी ने विक्रेता के अर्थ वाला दुकानदार शब्द बनाया। यह हिन्दी का आम शब्द है। दुकानदारी यानी बेचने का काम। आज शब्द की अर्थवत्ता बढ़ गई है। दुकानदारी करना यानी वैध, अवैध तरीके से कमाई करना, अपनी तरक्की के रास्ते अपनाना, मार्केटिंग करना आदि।
मोटे तौर पर दुकान दरअसल सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी ज़बान से बरास्ता फ़ारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ है, मगर इसके आदिसूत्र ग्रीको-रोमन शब्दावली से जुड़ते हैं। अरबी में दुकान का रूप दुक्काँ है। सेमिटिक धातु d-k-k से इसका रिश्ता है। जिसमें समतल करने का भाव है। इससे दुक्का dukka, दक्क dakk जैसे शब्द बनते हैं जिनमें कुचलने, तोड़ने, एक समान करने, हमवार करने, समतल करने, बराबर करने का भाव है। अरबी का दुक्काँ, दरअसल इसी दक्का से बना है। दुक्काँ में थोड़ा अर्थ विस्तार होता है और इसमें चबूतरा, बेन्च, तख़्त, चिकनी सतह या समतल उठे हुए चौबारे का भाव उभरता है। यह एक ऐसा स्थान जिसे प्रयत्नपूर्वक किसी कार्य के लिए तैयार किया गया हो। सेमिटिक अर्थों में यह पूजा की वेदी भी हो सकती है, सम्भाषण स्थल भी हो सकता है। इसे दीक्षा-मंच या वाक्-पीठ कहा जा सकता है। ल सईद एम बदावी और एमए अब्देल हलीम की कुरानिक डिक्शनरी के अनुसार सेमिटिक धातु दक्न ( d-k-n ) से दुकाँ शब्द बनता है मगर यह दुक्का dukka, दक्क dakk का परवर्ती विकास है। इराकी अरबी में इसका रूप दुखाँ है और इसका मूल है दख्न (d-kh-n) जिसमें मंच, धर्मासन, वेदिका, मचान, बेन्च, तख़्त, प्लेटफार्म, चबूतरे का आशय है। हालाँकि अब यह माना जाने लगा है कि यहुदियों की प्राचीन बोली यिडिश में एक क्रिया है दुख्नेन dukhnen जिसमें खड़े रह कर सम्बोधित करने का भाव है। यिडिश के साथ ही हिब्रू में भी दुख्नेन है जिसका तात्पर्य ऐसे मंच से है जहाँ से अधिष्ठाता, गुरू या नेता लोगों के सम्मुख होता है, कुछ कहता है। हिब्रू ज़बान में दुखाँ dukhan का रूपान्तर दुखाँ होता है जिसमें दुकाँ वाला प्राचीन अभिप्राय ही निहित है। इसी तरह सीरियाई / इराकी अरबी (आरमेइक) में भी दुखाँ शब्द इन्हीं अर्थों में है।
ध्यान रहे, हिब्रू के दुखाँ और अरबी के दुकाँ शब्दों में शामिल दीक्षा-मंच या वाक्-पीठ के आशय का अर्थविस्तार दुकान में हुआ। हालाँकि मूल सेमिटिक भाव तो पत्थर की शिला या चबूतरा ही था। कुछ सन्दर्भों में इसे पत्थर का आसन बताया गया है। एक दिलचस्प बात और। सीरियक अरबी यानी आरमेइक ज़बान में एक मुहावरा है दुख़-दुख्नेन (dukh dukhnaen) जिसका अर्थ है नायक-सेनानायक। इसे लैटिन पद दुख़-दुचेम ( dux ducem) का रूपान्तर माना जाता है जिसका अर्थ है नायकों का नायक। ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि हिब्रू या आरमेइक दुखाँ या दुख्नेन के मूल में लैटिन का यही मुहावरा है। इसके समर्थन में अंग्रेजी के ड्यूक duke और इतालवी के duce शब्दों का हवाला दिया जाता है जिनका अर्थ शासक, राजा या राजकुमार होता है। मगर यह बात गले नहीं उतरती, अलबत्ता इन शब्दों में रिश्तेदारी सम्भव है। सेमिटिक भाषाओं के सन्दर्भ में हिब्रू ज्यादा प्राचीन है या अरबी, यह बहस पुरानी है। लिपि के नज़रिए से देखें तो पुरातात्विक साक्ष्य हैं हिब्रू की पुरातनता के पक्ष में हैं, मगर शब्द भण्डार और व्याकरण के नज़रिए से देखा जाए तो हिब्रू कि विकासावस्था के प्राथमिक चिह्न अरबी में ही नज़र आते हैं। सो अरबी ज्यादा पुरानी है। इस तरह अरबी लैटिन से भी पुरानी भाषा है। लैटिन का ईसापूर्व पहली-दूसरी सदी का इतिहास मिलता है जबकि हिब्रू का लिखित इतिहास आठ से दस सदी पुराना है जबकि सेमिटिक भाषाओं में अरबी के वाचिक स्वरूप वाले साक्ष्य इससे भी पुराने हैं। अरबी के लिखित साक्ष्य भी सातवीं आठवीं सदी से मिलते हैं।
स्पष्ट है कि सेमिटिक धातु d-k-k में निहित आसन, वाक्-पीठ या प्रस्तर-शिला का भाव आगे चल कर d-k-n धातु से बने दुक्काँ में पीठा, दुकान, क्रय-विक्रय केन्द्र, कार्यालय आदि में व्यक्त हुआ। हिब्रू ज़बान में दुखाँ dukhan शब्द का अर्थ है हाट-बाज़ार में खरीदी-बिक्री करने की जगह, बेंच, स्टॉल या ऊँचा चबूतरा। पुरानी अरबी में दुक्काँ में प्रस्तर शिला का भाव था। अरबी के दुक्काँ शब्द में अर्थविस्तार हुआ और इसमें शॉप का आशय भी आ गया। अपने सेमिटिक रूप में दुकान में एक सीमा तक धार्मिक आशय भी था, मगर इसकी वजह भी सामुदायिक ही थी। सेमिटिक अर्थों में दुक्काँ में एक ऊँचे चबूतरे का भाव रूढ़ है जहाँ खड़े होकर पंथप्रमुख या धर्मगुरु लोगों को प्रवचन, आशीर्वचन देता है। यूँ भी नेतृत्व के साथ सबसे आगे, सबसे ऊँचे और सबसे पहले जैसे आशय भी जुड़े हुए हैं। दूर तक देखने के लिए भी ऊँचाई पर खड़ा होना पड़ता है, समूह के समक्ष बोलने के लिए भी ऊँचाई ज़रूरी है। नेतृत्व से जुड़े पदों के साथ अक्सर उच्चताबोध जुड़ा ही रहता है। हिब्रू के दुखाँ शब्द से आशय है यहूदियों के उपासनागृह सिनेगॉग के अहाते में स्थित उस मंच से है जहाँ से रब्बी सम्बोधित करता है।
कोई आश्चर्य नहीं कि बरास्ता अरबी, हिब्रू, दुखाँ, दुकाँ में निहित इन तमाम भावों का विस्तार आरमेइक के दुख़-दुख्नेन (dukh dukhnaen) मुहावरे में नायक-सेनानायक के रूप में व्यक्त हुआ। वह व्यक्ति जो ऊँचाई से सम्बोधित करे, निर्देशित करे। बाद में इसकी अभिव्यक्ति लैटिन के दुख़-दुचेम ( dux ducem) में हुई। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सेमिटिक अर्थों में दुकाँ या दुखाँ में शिला, प्लेटफार्म और वाक-पीठ का भाव है और लैटिन में इस शृंखला का इससे मिलता-जुलता और इस के किसी शब्द का सन्दर्भ नहीं मिलता। यह सम्भव नहीं कि दुख़-डुचेन के ड्यूक ( ऊँचे आसन वाला) की अर्थवत्ता सेमिटिक भाषाओं में सिमट कर आसन भर रह गई। दुकाँ के दुकान वाले सन्दर्भों पर लौटते हैं। गौरतलब है कि दुकानदार चाहे आज के ज़माने का हो या पुराने ज़माने का, अपना माल बेचने के लिए ऊँचे चबूतरे पर खड़े रह कर बोली लगाना ही उसका काम था। नीलामी भी खरीद-बिक्री की महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी। “ए मेडिटरेनियन सोसाइटी” में एसडी गोइटी d-k-k धातु से बने दिक्का का उल्लेख करते हुए इसे पुश्त लगा हुआ तख़्त या सेटीनुमा रचना बताते हैं। यह तख्त जैसा बॉक्स होता है जिसमें सामान रखने के तीन खण्ड भी होते हैं। इसमें ऐसे सन्दूक का भाव है जिसका प्रयोग आसन की तरह भी होता है। गोइटी दुकाँ में का अर्थ कार्यस्थल, वर्कशॉप, ऑफिस, स्टोर आदि बताते हैं। दुकाँ के सबसे प्रारम्भिक स्वरूप पर अगर ध्यान दें तो गोइटी द्वारा बताए आशयों से मेल खाता है। आज भी सब्ज़ी मण्डी में ऐसे चबूतरे या बॉक्सनुमा आसन वाली व्यवस्था होती है। लकड़ी या धातु से बनी इस संरचना में दुकानदार अपना सामान रखता है और बॉक्स के ऊपर वह बिक्री की सामग्री रखता है। भारतीय सन्दर्भों में सेठों की पीढ़ी का उल्लेख होता है। बड़े सेठ की दुकान गद्दी कहलाती थी जो दरअसल पुश्तवाली सेटी ही होती थी। सेठजी इस पर बैठ कर कारोबार करते थे। बाद में गद्दी आज के कार्पोरेट अर्थों में सेठजी के कारोबार की पीठ बन गई। दुकान भी उस गद्दी का एक हिस्सा थी। आढ़त को भी इसी अर्थ में देख सकते हैं।

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