Monday, February 27, 2012

सफ़र के दूसरे पड़ाव का विमोचन

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फ़र के सभी साथियों को बहुत बहुत बधाइयाँ । आप सबकी सहभागिता और शुभकामनाओ से शब्दों का सफ़र के दूसरे पड़ाव यानी दूसरा खण्ड छप कर तैयार है और आज दिल्ली के इंडिया इंटरनैशनल सेंटर में हिन्दी के ख्यात साहित्यकारों और अन्य गणमान्य लोगों की मौजूदगी में इसका विमोचन होना है । शब्दों का सफर शुरू से  शब्दव्युत्पत्ति-विवेचना को अकादमिक बोझिलता से बचाते हुए आमफ़हम हिन्दी भाषी तक पहुँचाने की अपनी ईमानदार पहल और विषय आधारित प्रस्तुतियों के लिए जाना जाता रहा है ।
skswbfब्दों का सफ़र का न सिर्फ़ स्वागत हुआ बल्कि शब्द व्युत्पत्ति और विवेचना की पद्धति को लोगों ने भरपूर सराहा । खुशी की बात है कि भाषाविज्ञान पढ़ाने वाले या पढ़ा चुके वरिष्ठ हिन्दी प्राध्यापकों ने भी शब्दों का सफ़र को प्रोत्साहित किया । साथियों के आग्रह पर वर्ष 2011 में शब्दों का सफ़र का पहला पड़ाव हिन्दी के सबसे पड़े प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ । इसी वर्ष सफ़र के दूसरे पड़ाव की पाण्डुलिपि को राजकमल प्रकाशन का प्रतिष्ठित कृति-पाण्डुलिपि सम्मान भी प्राप्त हुआ । किसी भी कृति के लिए प्रकाशन-वर्ष के भीतर पहली आवृत्ति का समाप्त हो जाना उसकी कामयाबी का पैमाना होता है । प्रकाशन के सात माह के भीतर सफ़र की सभी प्रतियों को पाठकों ने हाथों हाथ अपने संग्रह में सहेज लिया । दूसरी आवृत्ति भी अगस्त 2011 के अन्त तक बाज़ार में आ गई । ...और अब 2012 की 28 फ़रवरी को सफ़र का दूसरा पड़ाव ( पहली आवृत्ति ) बस आपके हाथों में पहुँचने ही वाला है ।
 पाण्डुलिपि में भरपूर सावधानियाँ बरतने के बावजूद इसमें कमियाँ रह गई होंगी । विता, कहानी या उपन्यास की तुलना में सन्दर्भ-रचना के हर चरण में मुश्किल आती है, इस तथ्य के मद्देनज़र आप उदारतापूर्वक इस रचना- प्रयास का हमेशा की तरह स्वागत करेंगे, यह अपेक्षा है । सुधार लगातार चलती रहने वाली प्रक्रिया है । आप सबके उत्साहवर्धन से सफ़र लगातार आगे बढ़ रहा है ।
[दाएँ-विश्व पुस्तक मेला में “शब्दों का सफर”]

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Saturday, February 25, 2012

काफ़ी नहीं किफ़ायती होना

वश्यकता के मुताबिक उपलब्धता के भाव को अभिव्यक्त करने के लिए हिन्दी में ‘यथेष्ट’ और ‘पर्याप्त’ शब्दों का प्रयोग होता है । ‘यथेष्ट’ की तुलना में पर्याप्त का प्रयोग ज्यादा है मगर इन दोनों की तुलना में हिन्दी में ‘काफ़ी’ शब्द का इस्तेमाल आम है । ‘काफ़ी’ सर्वाधिक बोले जाने वाले शब्दों में शामिल है । इन तीनों ही शब्दों में मात्रा या परिमाण का बोध होता है । काफ़ी लोग, पर्याप्त धन या यथेष्ट अनुभव जैसे पदों से यह ज़ाहिर भी होता है । ‘काफ़ी’ सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है मगर बोलचाल में यूँ रचाबसा है जैसे हिन्दी मूल का ही हो । फ़ारसी के रास्ते ‘काफ़ी’ शब्द हिन्दी में दाखिल हुआ । मूलतः यह अरबी भाषा का शब्द है । ‘किफ़ायत’ भी इसी शब्द-शृंखला का हिस्सा है । ‘किफ़ायत’ का मूलार्थ है पर्याप्त, यथेष्ट मगर इसकी अर्थवत्ता में आमतौर पर बचत, मितव्ययिता या कमखर्च का भाव देखा जाता है ।
रबी में ‘काफ़ी’ के मायने हैं पर्याप्त, यथेष्ट, समुचित, यथोचित, योग्य आदि । यूँ ‘काफ़ी’ का प्रयोग अधिक, बहुत या ज़्यादा की तरह भी होता है जो कि ग़लत है । ‘काफ़ी’ में निहित यथेष्ट या ज़रूरत के मुताबिक वाला भाव ही पकड़ना चाहिए । ‘काफ़ी’ बना है अरबी के ‘काफ़’ से जिसमें यही सारे भाव हैं । काफ़ की मूल धातु है k-f-y जिसमें पर्याप्तता के भाव के साथ साथ रोज़गार, खुराक, बचत करना, सुरक्षा जैसे भावों का समावेश है । गौर करें कि आवश्कतानुरूप उपलब्धता में ही सुखमय जीवन है । साईँ इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय ।। स्पष्ट है कि पर्याप्तता में ही बचत का भी आधार है । यथेष्टता में बचत है । परिवार की क्षुधाशान्ति के बाद भी एक व्यक्ति के पेट लायक भोजन बचता ही है । ज़रूरत के मुताबिक पदार्थ होने पर ही कुछ बचाया जा सकता है । सो ‘काफी है’ वाक्य में यह बात निहित है कि कुछ न कुछ बच ही जाएगा । k-f-y में यही भाव है । इससे बने ‘काफ़ी’ शब्द में प्रकारान्तर से सन्तोष का भाव महत्वपूर्ण है । ‘काफ़ी’ शब्द का इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे- “इतना काफी है”, “काफ़ी-कुछ ठीक हो गया” , “काफ़ी से ज्यादा है”, “काफ़ी से कम है”, “काफ़ी ज्यादा है” इत्यादि । फ़ारसी का ‘ना’ उपसर्ग लगा कर ‘नाकाफ़ी’ शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है अपर्याप्त ।
किफ़ायत शब्द अरबी के ‘किफ़ायाह’ से बना है जिसके मूल में भी सेमिटिक धातु k-f-y है । किफ़ायत को हिन्दी में बचत के अर्थ में ही लिया जाता है पर इसके मूलभाव को पकड़ें तो इसमें भी पर्याप्तता और प्रचुरता ही खास है । अधिक अंश को ही बचत कहा जाता है सो ‘किफ़ायत’ से बने किफ़ायती में मूल्य से कम अर्थात सस्तेपन का भाव है । किफ़ायती का अर्थ मितव्ययी भी होता है । कमखर्च वाला सामान भी ‘किफ़ायती’ कहलाता है । किफ़ायतशार उस व्यक्ति को कहते हैं जो गुणा-भाग लगा कर खर्च करता है, हिसाबी-किताबी है । किफ़ायतशारी का मतलब है बचत करना, कम खर्च करना या मितव्ययिता दिखाना । किफ़ायती व्यक्ति भी हो सकता है और वस्तु भी । ऐसी वस्तु जो कम मूल्य पर खरीदी जाए, किफ़ायती दाम वाली कहलाएगी । कम खर्च पर संचालित होने वाली व्यवस्था या वस्तुएँ भी किफ़ायती कहलाती हैं जैसे बिजली बचाने वाला उपकरण भी किफ़ायती कहलाएगा ।
काफ़ी के अर्थ में ‘पर्याप्त’ शब्द का प्रयोग भी खूब होता है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘पर्याप्त’ के प्रचलित मायने हैं- पूरा, काफी, यथेष्ट मगर इसमें प्राप्त, मिला हुआ जैसे अर्थ भी निहित हैं । इसके साथ ही जिसमें शक्ति हो, शक्तिसंपन्न, जिसमें सामर्थ्य हो जैसे भाव भी हैं । ‘पर्याप्त’ बना है परि (पर्य) + आप्त से जिससे इसका अर्थ निकलता है जो पूरी या अच्छी तरह से प्राप्त हो । ‘परि’ उपसर्ग में समग्रता का भाव है और ‘आप्त’ का अर्थ है पाना, मिलना, प्रदत्त आदि । बाद में ‘काफी’ या ‘यथेष्ट’ के अर्थ में ऐसी मात्रा या परिमाण जिससे ज़रूरत पूरी हो रही हो, के आशय में पर्याप्त शब्द हिन्दी में रूढ़ हो गया । अब इसी रूप में में हिन्दी में इसका प्रयोग होता है । पर्याप्त में आवश्यकता और उसकी पूर्ति का भाव ही प्रमुख है अर्थात आवश्यकता के अनुरूप प्राप्ति ही पर्याप्तता है ।
र्याप्त के अर्थ में ‘यथेष्ट’ शब्द परिनिष्ठित हिन्दी में प्रयोग होता है । बोली-भाषा में इसका प्रयोग कम है मगर लेखन में यह नज़र आता है । ‘यथेष्ट’ बना है ‘यथा + इष्ट’ से । अर्थात इच्छा के अनुरूप । ‘यथा’ यानी जितना और ‘इष्ट’ यानी जिसकी कामना की जाए । इस तरह यथेष्ट में इच्छापूर्ति की बात उभर रही है । ‘यथेष्ट’ का प्रयोग देखिए- “नौकरी मिलने के बाद उसने यथेष्ट साधन जुटा लिए ।” पर यथेष्ट के साथ भी अधिकता या प्रचुरता वाली अर्थवत्ता जुड़ी हुई है जैसे- “उनके पास यथेष्ट संसाधन थे फिर भी कई काम अधूरे रह गए ।” यहाँ मनमाफिक साधनों के साथ प्रचुर साधनों की बात भी उभर रही है ।

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Monday, February 20, 2012

किसी कंपेश को जानते हैं आप ? [कम-3]

पिछली कड़ियाँ-Balance1.‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1] 2.पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…[कम-2]

पने कभी कंपेश पढ़ा या सुना है? ‘लंकेश’, ‘सुकेश’, ‘मुकेश’, ‘काकेश’, ‘लोकेश’, राकेश जैसे संज्ञा-नाम हमारे आस-पास रोज देखने सुनने को मिलते हैं, मगर ‘कंपेश’ शायद कभी नहीं सुना होगा । वैसे ‘कंपेश’ इन शब्दों की तरह संज्ञा न होकर, सामासिक शब्द है । मराठी ने फ़ारसी के ‘कमोबेश’ का ऐसे देशी संस्कार में ढाला कि यह ‘कंपेश’ हो गया । देशी संस्कार मिलने के बाद शब्दों का इतना रूपान्तर हो जाता है कि उनकी शिनाख्त मुश्किल होती है कि इनका मूल क्या था । ‘लालटेन’ ( लैन्टर्न ), ‘लपटन’ ( लैफ्टीनेंट ), पलटन ( प्लाटून ) या ‘गिरमिट’  (एग्रीमेन्ट) जैसे शब्दों से यह अंदाज़ नहीं लगता कि ये मूल रूप से अंग्रेजी के हैं । ऐसे शब्दों के लिखित रूप स्थिर होने के बाद परिनिष्ठित भाषा में भी जगह पा लेते हैं । मगर बोलियों में एक ही शब्द के कई रूप प्रचलित रहते हैं और जब उसी रूप में इन्हें लिखा जाता है जैसे- कंपेश, कम्बेश, कमबेश, कंबेस आदि तो दिलचस्प मामला बनता है । इन्हें पढ़ कर यह अंदाज़ लगाना कठिन है कि ये फ़ारसी के ‘कमोबेश’ शब्द के बहुरूप हैं । ‘कमोबेश’ हिन्दी में खूब प्रचलित है जो कमज्यादा, न्यूनाधिक या थोड़ा-बहुत के अर्थ में प्रयुक्त होता है। मालवी-राजस्थानी में इसके थोड़ा-घणा या थोड़ो-घणों रूप प्रचलित हैं। मराठी में यह ‘उणे-अधिक’ या ‘अधिक-उणे’ है जिस पर विस्तार से पिछली कड़ी में चर्चा हो चुकी है ।
कमोबेश के बेश का आधार
फ़ारसी का ‘कमोबेश’ शब्द मूलतः सामासिक पद है और फ़ारसी के ‘कम’ और ‘बेश’ शब्दों से मिल कर बना है। ‘कम’ की व्युत्पत्ति अवेस्ता के ‘कम्ना’ से हुई है । मूलतः ‘कम्ना’ का ‘कम्’ उसी पूर्ववैदिक भाषा से जन्मा है जिससे इच्छा, चाह, अभिलाषा के अर्थ वाला वैदिक भाषा का कम् जन्मा । ‘कम्’ से ही ‘कामना’ शब्द बनता है, ‘काम’ यानी इच्छा है । ‘कम्’ में अवेस्ता का ‘उन’ प्रत्यय लगने से ‘कम्ना’ बनता है । यह ‘उन’ भी पूर्ववैदिक रूप है और वैदिकी में इसका ‘ऊण’ रूप देखने को मिलता है जिसका अर्थ है अल्प, थोड़ा, न्यून आदि । इस तरह ‘कम्ना’ में इच्छा से ‘कम’ का भाव स्थिर होता है और बाद में फ़ारसी के ‘कम’ शब्द में सिर्फ़ ‘कमी’ का भाव रूढ़ हो जाता है । यह तो हुई ‘कमोबेश’ के ‘कम’ के बारे में संक्षिप्त सी बात क्योंकि विस्तार से चर्चा पहली कड़ी में हो चुकी है । सवाल है कि कमोबेश के ‘बेश’ का आधार क्या है ?
बेहतर हुआ ‘बेश’
बेश फ़ारसी मूल का शब्द है और हिन्दी समेत भारत की अनेक बोली-भाषाओं में प्रचलित है । कमोबेश के विभिन्न रूपान्तरों की ऊपर चर्चा हो ही चुकी है । अधिक, ज्यादा के अर्थ में ‘बेशी’, ‘बेसी’, ‘बेश’, ‘बेस’ जैसे शब्द हिन्दी वाक्यों में प्रचलित हैं । ‘बेश’ का मूलाधार भी ‘कम्ना’ की तरह ही अदृष्य है । बेश के दो आधार नज़र आते हैं । पहला है वशिष्ट > बहिश्त > की अगली कड़ी बेश के रूपान्तर का । बहिश्त का अर्थ अवेस्ता में श्रेष्ठ होता है । दूसरा आधार । ‘बेश’ दरअसल फ़ारसी का ‘बेह’ है जिससे हम ‘बेहतर’, ‘बेहतरीन’ जैसे शब्दों के ज़रिए खूब परिचित हैं । ‘बेह’ का मतलब होता है बढ़िया, भला, अच्छा आदि। ‘बेह’ की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘भद्र’ bhadra से मानी जाती है जिसका मतलब, शालीन, भला, मंगलकारी आदि होता है। फारसी में इसका रूप ‘बेह’ हुआ। अंग्रेजी में गुड good के सुपरलेटिव ग्रेड( second ) वाला ‘बेटर’ better अक्सर हिन्दी-फारसी के ‘बेहतर’ का ध्वन्यात्मक और अर्थात्मक प्रतिरूप लगता है । इसी तरह ‘बेस्ट’ best को भी फारसी ‘बेहस्त’ beh ast पर आधारित माना जाता है। अंग्रेज विद्वानों का मानना है कि ये अंग्रेजी पर फारसी, प्रकारांतर से इंडो-ईरानी प्रभाव की वजह से ही है ।
‘बेश’ में है अधिकाई
यूँ बैटर-बेस्ट को प्राचीन जर्मन लोकशैली ट्यूटानिक का असर माना जाता है जिसमें इन शब्दों के क्रमशः बेट bat (better) और battist (best) रूप मिलते हैं। इस ‘बेहस्त’ का ही रूपान्तर ‘बेश’ हुआ है जिसमें ‘बेह’ की अर्थवत्ता सुरक्षित बनी रही है । फैलन के उर्दू-इंग्लिश कोश के मुताबिक ‘बेश’ में बेहतर का भाव है । उत्तम का भाव है । ‘बेश’ में आधिक्य, अधिकाई, वृद्धि, ज़ोर जैसे भाव भी हैं । ‘बेशी ज़मीन’ यानी ज्यादा भूमि (सरप्लस लैंड), ‘बेशी माल’ यानी ज़रूरत से ज्यादा सम्पदा, बेशी जुर्माना यानी गैरकानूनी सज़ा आदि शब्दों में बेशी की पहचान आसानी से हो रही है । अत्यधिक मूल्यवान वस्तु के लिए आए दिन हम ‘बेशकीमती’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं । इस समास का पहला हिस्सा ‘बेश’ है जिसमें आधिक्य का भाव बेशकीमती के अत्यधिक मूल्यवान अर्थ में स्पष्ट हो रहा है । सो, स्पष्ट है कि कमोबेश का बेश भी आखिर इंडो-ईरानी परिवार का और संस्कृत-हिन्दी का नज़दीकी रिश्तेदार निकला । ‘कमोबेश’ शब्द थोड़े-बहुत फ़र्क़ के साथ प्रायः देश की सभी आर्य भाषाओं में प्रचलित है ।
कम-ज्यादा भी डटा है
मोबेश की तरह ही ‘कम-ज्यादा’ पद भी हिन्दी में खूब वापरा जाता है । मराठी-मालवी में यह ‘कम-जास्त’ हो जाता है । ‘कम’ शब्द जहाँ भारत-ईरानी भाषा परिवार की फ़ारसी ज़बान से आया है वहीं ‘ज्यादा’ शब्द सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी ज़बान से हिन्दी में दाखिल हुआ है जिसमें अधिकता, आधिक्य का भाव है । ज्यादा सेमिटिक धातु z-y-d से बना है जिसमें वृद्धि का भाव है । इसका सही रूप है ‘ज़ियादह्’ दरअसल अपने सेमिटिक रूप में तो यह ‘ज़िआदा’ ( ज़ादा ) है मगर फ़ारसी में पहले से ही ‘ज़ादा’ मौजूद है जिसकी वजह से अरबी के ‘ज़ादा’ का फ़ारसीकरण ‘ज़ियादह्’ हुआ । अरबी में ज़ियादत का हिन्दी में जियाज़त और फिर ज़ियासत होते हुए जास्ती यह रूप स्थिर हुआ । बोलचाल की भाषा में जास्ती भी अधिकता, आधिक्य के अर्थ में बोला जाता है । वैसे जास्ती नक्को, जास्ती खाने का, जास्ती पढ़ने का जैसे वाक्य-प्रयोगों वाला जास्ती मुम्बइया असर है । वैसे जास्ती शब्द हिन्दी की विभिन्न बोलियों में स्वतंत्र रूप में है । ज़ियादह् से बना ‘ज्यादा’ हिन्दी में ज्यादा चलता है । जबर्दस्ती के अर्थ में ज़्यादती शब्द भी खूब प्रचलित है । कम – ज्यादा की तरह थोड़-ज्यादा भी चलता है । ‘ज़िआदा’ का एक रूप ‘ज़ाइद’ भी होता है जिसका अर्थ है अधिक, बहुत अधिक, प्रचूर ।
न्यूनता में ‘ऊनता’ 
मोबेश में जो ‘कम’ है वह अवेस्ता के ‘कम्ना’ से बना है, इस पर पिछली कड़ी में विस्तार से कहा जा चुका है । ‘कम्ना’ में ‘उन्’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है और यह ‘कम् + उन्’ से बना है । ‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ या ‘कमी’ का भाव दरअसल ‘कम्’ से नहीं बल्कि ‘उन्’ प्रत्यय से आ रहा है । कोश में इसकी तुलना अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण, अतिरिक्त, कुछ, अपर्याप्त या न्यून की अर्थवत्ता वाले संस्कृत विशेषण ‘ऊन’ से की गई है । गौरतलब है कि वैदिकी और अवेस्ता लगभग जुड़वाँ प्रकृति की भाषाएँ हैं। फिर भी विद्वान वैदिक भाषा को अवेस्ता से कुछ प्राचीन ठहराते हैं । ज़ाहिर है गाथाअवेस्ता का ‘उन’ और वैदिक भाषा का ‘ऊन’ एक ही है । कम के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जो ‘न्यून’ शब्द है उसकी अर्थवत्ता और व्युत्पत्ति भी इसी ‘ऊन’ से सिद्ध होती है। ‘न्यून’ बना है नि + ऊन ‘अच्’ प्रत्यय लगने से । इस तरह फ़ारसी के ‘कम’ और संस्कृत के ‘न्यून’ के बीच समीकरण भी बनता है और व्युत्पत्तिक रिश्ता भी ।
फ़र्क़ ‘उन्नीस-बीस’ का
संस्कृत में ‘ऊन’ का प्रयोग प्रत्यय की तरह भी होता है जिसका अर्थ है अभाव, अधूरा कम, अपर्याप्त, अपूर्ण आदि । इस ‘ऊन’ का एक रूप मराठी का उणे है जिसका अर्थ भी कम होता है । ‘कम-ज्यादा’ या ‘कमोबेश’ की तर्ज़ पर मराठी में ‘उणे-अधिक’ पद प्रचलित है । संख्यावाचक कमी दर्शाने के लिए भी ऊन का प्रयोग भी संस्कृत में खूब होता है और हिन्दी संख्याओं में भी यह नज़र आता है जैसे उन्नीस, उन्तीस, उनचालीस, उनपचास, उनसाठ, उन्हत्तर आदि । यह जो उन है इसमें निहित कमी के भाव पर विचार करें तो उपरोक्त संख्याओं का अभिप्राय एक कम बीस, एक कम तीस, एक कम चालीस यहाँ अचानक स्पष्ट हो जाता है । संस्कृत में यह क्रिया और भी स्पष्टता से नज़र आती है । एक + ऊन = एकोन अर्थात एक कम , विंशति = बीस । एकोनविंशति > उनविंशति ( पाली ) एकूनवीस > एकूनवीसती ( प्राकृत) ऊणवीसई > ऊनवीसा > उनवीसई ( अपभ्रंश ) एगूणवीस > एगूणीस > उणवीस > उन्नीस । मराठी में उन्नीस के स्थान पर एकोणीस का चलन है और इसमें भी ‘एकोन’ यानी एक + ऊन ( एक कम ) को साफ़ पहचाना जा सकता है । किन्ही दो चीज़ों में न्यूनाधिक फ़र्क़ बताने के लिए उन्नीस-बीस का अन्तर जैसा मुहावरा बोला जाता है । गौर करें, यहाँ भी एक-कम का ही महत्व अर्थात ऊन की ही महत्ता पता चल रही है । 

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Sunday, February 19, 2012

महावत की महिमा

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ब्द ही ब्रह्म है और शब्द की सत्ता हमेशा कायम रहती है। यह बात बिलकुल सही है किन्तु शब्दों की दुनिया में भी सत्ता परिवर्तन होता है। कल तक किसी खास अर्थवत्ता को वहन करने वाले शब्द के आज प्रचलित न हो पाने के कई कारण हो सकते हैं। इसमें सबसे खास है सामाजिक परिवर्तन। निरन्तर परिवर्तनशील समाज में लोक-व्यवहार से लेकर तकनीकी प्रगति जैसे कारण प्रमुख होते हैं। तकनीक बदलने के साथ ही उससे जुड़े शब्द भी अपनी अर्थवत्ता या तो खो देते हैं अथवा नई तकनीक के सन्दर्भ में पुराने शब्द की अर्थवत्ता बदल जाती है। प्राचीन काल में मनुष्य पशुओं की पीठ पर सवारी करता था या उन पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले वाहनों के ज़रिये यात्रा करता था। ऐसे में इन वाहन चालकों या पशुओं को निर्देशित करने वाले लोगों के लिए अलग अलग नाम होते थे जैसे रथ को चलाने वाला सारथी कहलाता था। बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी चलाने वाले को गाड़ीवान, कोचवान कहते थे। रथ चाहे चलन से बाहर हो गए, मगर सारथी शब्द ने अपनी अर्थवत्ता बदल ली और अब सारथी का अर्थ साथी, पथप्रदर्शक जैसे भावों को व्यक्त करने के लिए होने लगाया है। ड्राइवर या चालक के रूप में सारथी शब्द अब दुर्लभ है। हाथी को नियन्त्रित करने वाले को संस्कृत हिन्दी में महावत कहते हैं। किसी ज़माने में हाथी को काबू में करने का काम बेहद महत्वपूर्ण था और इसके लिए कई शब्द थे जैसे-आंकुशिक, करीपति, गजचालक, फ़ीलवान, महामात्र, गजपाल, अधिरोह आदि । अब हाथियों का प्रयोग सीमित हो जाने से ये तमाम शब्द भी बोल-व्यवहार से लापता हो गए हैं इसके बावजूद महावत शब्द हिन्दी में बना हुआ है ।
प्राचीनकाल में राजा-महाराजाओं के लिए हाथी की सवारी सबसे आलीशान होती थी। जंगल का राजा चाहे शेर हो पर वहां भी हाथी की स्वतंत्र-स्वायत्त सत्ता रही है। हाथी को हाँकने वाला, नियन्त्रित करने वाला सक्षम व्यक्ति अधिकारी का दर्ज़ा रखता था । उसे महामात्र कहते थे । किन्हीं सन्दर्भों में महामात्र को महामात्य के समकक्ष भी बताया गया है । मौर्यकाल में अमात्य मन्त्री स्तर का अधिकारी होता था । महामात्य प्रधानमन्त्री को कहते थे । मोनियर विलियम्स के कोश में महामात्र को अत्यन्त उच्च पदस्थ अधिकारी,जो प्रधानमन्त्री भी हो सकता है, बताया गया है। प्रधानमन्त्री की पत्नी को महामात्री कहा जाता था । हाथियों का व्यवस्थापक, प्रबन्धक और संरक्षक भी महामात्र कहलाता था । इसमें उन्हें हाँकने वाले सक्षम व्यक्ति का भाव भी निहित है । सामासिक पद है और महा + मात्र से मिल कर बना है । महामात्र में सर्वोच्चता का भाव है । महा अर्थात भव्य, विशाल, बड़ा, प्रधान या उच्च । मात्र शब्द परिमाणवाची है अर्थात पद, आकार, साइज का इससे बोध होता है । लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई, ऊँचाई, गहराई जैसे आयामों के परिमाप का आशय इससे प्रकट होता है । मात्र में बेजोड़, अतुलनीय, सिर्फ या बहुतों में विशिष्ट जैसा भाव भी है । मात्रा का अर्थ कोई वस्तु, तत्व या भौतिक पदार्थ भी है । कुल मिला कर संज्ञा के अर्थ में जब मात्रा से पूर्व महा उपसर्ग लगता है तो उसमें निहित सर्वोच्चता का आशय एकदम स्पष्ट है । महामात्र यानी शासन की ओर से नियुक्त सर्वोच्च अधिकारी । पुराने ज़माने में बाद में प्रशासनिक सुविधा के लिए विभिन्न विभागों के सर्वोच्च अधिकारी को महामात्र कहा जाने लगा ।
गौरतलब है कि अशोक कालीन प्रशासनिक व्यवस्था सम्बन्धी शिलालेखों में महामात्र शब्द का प्रयोग हुआ है । मूलतः महामात्र शासनाधिकारी का पद था । राजस्व, सीमांकन, धर्मशास्त्र, रनिवास आदि के प्रबन्ध-कर्म से जुड़े उच्चाधिकारियों को महामात्र कहा जाता था । पुराने ज़माने में शासन के पास हाथियों की समूची वाहिनी होती थी । सैन्यकर्म के अतिरिक्त इनसे कई तरह के काम लिए जाते थे । हाथीखाना, फीलखाना जैसे शब्दों से जाहिर है कि हाथियों को सम्भालने वाला विभाग भी अत्यंत महत्व का था । इस विभाग के प्रमुख को भी महामात्र का दर्जा मिला हुआ था । महामात्र न सिर्फ हाथियों की व्यवस्था देखता था बल्कि हाथियों पर नियन्त्रण करने में भी वह निष्णात होता था । महामात्र से महावत बनने का क्रम कुछ यूँ रहा होगा- महामात्र > महामात्त > महावत्त > महावत । संस्कृत की पृष्ठभूमि वाले कुछ अन्य शब्द भी हैं जिनका आशय महावत से है जैसे अधिरोह । हालाँकि अधिरोह शब्द में सिर्फ हाथी की सवारी जैसी कोई बात नहीं है मगर इसका अर्थ हाथी-सवार होता है । रोह यानी चढ़ना, आसीन होना । इससे में अधि उपसर्ग लगने से अधिरोह बना है । अंकुशी या अंकुसी भी ऐसा ही एक शब्द है । हाथी पर नियन्त्रण रखने के लिए उसके सिर में चुभोने वाले काँटे को अंकुश कहते हैं , अंकुशी यानी जिसके पास अंकुश हो । अंकुश के आशय से महावत के लिए एक अन्य देशी शब्द बना है गड़दार अर्थात जो गड़ाने का काम करता है, यानी महावत । आप्टेकोश में महावत के अर्थ में हास्तिकः शब्द भी मिलता है । अमरकोश में हास्तिकम् का अर्थ है हाथियों का समूह । इसी तरह महावत के लिए नागवारिकः भी शब्द भी है । हाथियों के समूह के नेता को भी यह नाम दिया जाता है । यही नहीं, किसी भी समाज का प्रमुख व्यक्ति भी नागवारिक कहला सकता है । हाथी को हाँकने वाले के लिए हस्तिचारिन शब्द सबसे सही है ।
हिन्दी में महावत के लिए फ़ीलवान और हाथीवान शब्द भी है । हाथी को फ़ारसी में फ़ीला कहा जाता है और इसमें वान प्रत्यय लगा कर फ़ीलवान संज्ञा बनी । यूँ फ़ीला शब्द भारत-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसका रिश्ता संस्कृत से है । राजस्थानी में फ़ीलवान का रूप पीलवाण हो जाता है । फीला शब्द का रिश्ता संस्कृत की पील् धातु से है, जिसमें एक साथ सूक्ष्मता और समष्टि दोनो का भाव है। इसका अर्थ होता है अणु या समूह। सृष्टि अणुओं का ही समूह है। चींटी सूक्ष्मतम थलचर जीव है। चींटे के लिए संस्कृत में पिपिलकः, पिलुकः जैसे शब्द हैं। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में भी चींटी को पिपिलिका ही कहा जाता है। जो लोग पुराने अंदाज़ वाले शतरंज के शौकीन हैं वे इसके मोहरों का नाम भी जानते होंगे। इसमें हाथी को फीलः या फीला कहा जाता है। यह फारसी का शब्द है और अवेस्ता के पिलुः से बना है। संस्कृत में भी यह इसी रूप में है। इसमें अणु, कीट, हाथी, ताड़ का तना, फूल, ताड़ के वृक्षों का झुण्ड आदि अर्थ भी समाये हैं। गौर करें इन सभी अर्थों में सूक्ष्मता और समूहवाची भाव हैं। फाईलेरिया एक भीषण रोग होता है जिसमें पाँव बहुत सूज कर खम्भे जैसे कठोर हो जाते हैं। इस रोग का प्रचलित नाम है फीलपाँव जिसे हाथीपांव या शिलापद भी कहते हैं। यह फीलपाँव शब्द इसी मूल से आ रहा है। महावत को फारसी, उर्दू या हिन्दी में फीलवान भी कहते हैं।

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Thursday, February 16, 2012

अग्निगर्भा है दामोदर

संबंधित कड़िया-[1.]दम मारो दम और नाक में दम-1 [2] …दम ले ले घड़ी भर-2i-3fd-7da-9-1

कृ ष्ण के ‘दामोदर’ नाम से सभी परिचित हैं । पौराणिक कथाओं में उन्हें ऊखल या पेड़ से बान्धने की वजह से उनका नाम ‘दामोदर’ पड़ा। ‘दाम’ यानी रस्सी, रज्जु । पूर्वांचल की प्रसिद्ध ‘दामोदर नदी’ या ‘दामोदर घाटी’ वाले ‘दामोदर’ शब्द के साथ यह व्युत्पत्ति नहीं जुड़ती। कुछ सन्दर्भ इसे ‘दामुदा’ बताते हैं। झारखण्ड में मान्यता है कि इसका अर्थ पवित्र जल है। नदियों को पवित्र मानना सनातन भारतीय आस्था रही । संस्कृत में ‘दामन्’ का अर्थ रस्सी, रज्जु होता है । ‘दामुदा’ का इस रूप में कोई अर्थ नहीं निकलता । ‘दामुदा’ को ‘दामोदर’ का रूपान्तर मानें तो इस ‘दामोदर’ का अर्थ ‘दाम’ से बंधे ‘उदर’ से हट कर निकलना चाहिए । एक मराठी सन्दर्भ से पता चलता है कि ‘दाम’ सन्थाल भाषा का शब्द है । सन्थाली भाषा अत्यन्त प्राचीन है और मुंडा परिवार की है । यहाँ भूगर्भ में कोयले के भण्डार हैं । ‘दाम’ का अर्थ सन्थाली में कोयला होता है । संस्कृत की ज़मीन पर इससे ‘दामोदर’ शब्द बना जिसका अर्थ है कोयलांचल से निकली नदी । ध्यान रहे, छोटा नागपुर के एक क्षेत्र को ‘दामुदा’ कहते हैं । कोयले की बहुतायत को देखते हुए ‘दामुदा’ का अर्थ निकलता है कोयला प्रदान करने वाली भूमि । दमुआ भी एक जगह का नाम है ।
किन्ही सन्दर्भों में प्रमाण मिले हैं जिनमें ‘दामोदर’ का अर्थ अग्निगर्भा की तरह बताया गया है । अर्थात जिसके गर्भ में कोयला है । ‘उदर’ तो स्पष्ट है। दाम में अग्नि या कोयले का ही भाव निकल रहा है । मुझे असम, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड और बंगाल के किन्हीं क्षेत्रों के लिए अलग अलग ‘दामुदा’, ‘दमोदा’ शब्द मिले है जिनका अर्थ कोयलांचल है । झारखण्ड के ‘दमुलिया’ क्षेत्र में ही कोयले की शुरुआती भण्डार खोजे गए थे । बंगाल के मिशनरी ए.कैम्पबेल ने 1899 में संथाली कोश बनाया था, मगर इसमें ‘दामोदर’ शब्द की प्रविष्टि नहीं हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है। इसके साथ समस्या यह है कि दरअसल यह बंगाल के पुरुलिया क्षेत्र में बोली जाने वाली शहरी सन्थाली का प्रातिनिधिक कोश है। इसमें अपर दामोदर वैली क्षेत्र की संथाली बोली को लिया गया है। झारखण्ड की सन्थाली इसमें नहीं है। बंगाल में मुस्लिम राज होने के की वजह से फ़ारसी शब्दों के हजारों रूपान्तर इसमें हैं जिन्हें सन्थाली कहा गया है। इसमें ‘दाम’ शब्द है, मगर वह ‘द्रम्म’ से निकला हिन्दी, उर्दू, फारसी वाला ‘दाम’ है जिसका अर्थ मूल्य है। हाँ, ‘दमा’ शब्द का प्रयोग श्वास के अर्थ में भी इसमें मिलता है । आमतौर पर माना जाता है कि श्वास, शक्ति, दबाव, धक्का के अर्थ में दम शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया । पर सन्थाली में इस शब्द की मौजूदगी से प्रतीत होता है कि संस्कृत ‘धम्’ का स्वतंत्र विकास ‘दम’ के रूप में मुण्डा परिवार की कतिपय बोलियों में हुआ होगा या फिर इंडो-ईरानी मूल का ‘दम’ शब्द ही मुण्डा परिवार में दाखिल हुआ होगा । क्योंकि कुछ विद्वान सुदूर पश्चिमोत्तर प्रान्तों तक मुण्डा भाषाओं का विस्तार देखते हैं ।
ताज्जुब यह कि जो संथाल समुदाय ‘दामोदर’ को पवित्र नदी मानता है अथवा अन्य स्रोत इसमें अग्नि, कोयला जैसे भाव देखते हैं मगर कैम्पबेल के कोश में ‘दामोदर’, ‘दामुदा’, ‘दामोदा’ जैसे शब्द ही गायब हैं। जबकि ‘दम्’ ध्वनि वाले शब्द झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में खूब हैं और इससे मिलते जुलते नामों वाली जो बस्तियाँ हैं उनके साथ कोलियरी, खदान का रिश्ता विभिन्न सन्दर्भों से साबित होता है। यह ज़रूरी नहीं कि ‘दाम’ शब्द सन्थाली में निकल आए। सम्भव है यह आर्यभाषा परिवार का भी हो। खास बात यह कि कैम्पबेल के कोश में फ़ारसी के संथाली रूपान्तर मिलते हैं मगर ‘दामोदर’ जैसे शब्द का कोई रूपान्तर नहीं मिलना आश्चर्य है। इससे ऐसा लगता है कि इसमें ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों की संथाली के शब्द चुने गए हैं। ठेठ या शास्त्रीय संथाली इसमें नहीं है। यह तो तय है कि ‘दामोदर’ का वह अर्थ संस्कृत-हिन्दी कोशों से नहीं निकलता जिससे उसके नदीवाची स्रोत की पुष्टि होती हो । हाँ, ‘दाम+उदर’ की बहुचर्चित व्युत्पत्ति ज़रूर मिलती है मगर वह ‘दामोदर नदी’ से मेल नहीं खाती । हमारी आदि भारोपीय भाषाओं का सम्बन्ध लगातार जनजातीय भाषाओँ से भी बना हुआ था। बस, इस दिशा में बहुत कम काम हुआ है। शब्दों की शिनाख्त तो यूँ भी मुश्किल है, क्योंकि जनजातीय साहित्य का विधिवत अध्ययन नही हुआ।
भारतीय आर्यभाषाओं की भारतीय भूभाग में पसरी जनजातीय भाषाओं से घनिष्ठता की बात कई स्तरों पर साबित हो चुकी है । आर्य-द्रविड़ भाषाओं में रिश्तेदारी को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाता है । हमारी मौजूदा संस्कृति में खेती-किसानी और बागवानी की शब्दावली के मूल में जनजातीय शब्दसम्पदा ही है । भाषाविदों का मानना है कि वैदिक काल में पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में मुण्डा परिवार की कुछ बोलियाँ प्रचलित रही होंगी । विद्वानों का कहना है कि समूची वैदिक शब्दावली में चार फीसद ऐसे शब्द भी हैं जिनका प्रसार यूरोपीय आर्यभाषाओं में नहीं मिलता । इससे सिद्ध होता है कि वैदिक शब्दावली, तत्कालीन जनजातीय शब्द सम्पदा से भी समृद्ध हुई होगी ।
मुमकिन है संस्कृत की ‘धम्’ धातु के दम रूप का विकास मुण्डा परिवार की भाषाओं में भी हुआ हो और ईरानी बोलियों में भी हुआ हो । धम् का दम रूप भारतीय बोलियों में बहुत लोकप्रिय है और प्रायः आर्यभाषाओं से लेकर द्रविड़ और जनजातीय बोलियों में भी यह नज़र आता है । ‘दम’ का अर्थ है श्वास, प्राणवायु, ज़ोर, धक्का, धौंकना, दबाना, क्षण, कालांश, भाप, दबाव, शक्ति, जोश, वाष्प, खींचना, कश, सेंकना, विश्राम, वाष्पित वगैरह वगैरह । ध्यान रहे ये तमाम अर्थ हिन्दी के किसी एक शब्द में अभिव्यक्त नहीं होते । फ़ारसी ‘दम’ का मूल है अवेस्ता का ‘दम’ शब्द है । इसका संस्कृत प्रतिरूप है ‘धम्’ जिसमें धौंकने, फूँकने, धकेलने, निश्वास और फूँक कर आग सुलगाने का आशय है । इंडो-ईरानी परिवार की ज्यादातर भाषाओं में जैसे खोतानी, पार्थियन, फ़ारसी, सोग्दियन और पहलवी में इसका ‘दम’ रूपान्तर ही प्रचलित है । संस्कृत,ज़ेद व यूरोपीय भाषाओं का तुलनात्मक करने वाले जर्मन भाषाविद प्रो.एफ बॉप ने अठारहवीं सदी में भारोपीय धातु ‘ध्म’ की कल्पना की थी जिसमें फूँकने, दबाने का भाव है । पकोर्नी इसके लिए dhem धातु बताते हैं । उनके मुताबिक इसमें धौंकने के साथ साथ धूल-धुँआ उड़ने जैसा भाव भी है ।दक्षिण-पूर्वी ईरानी ज़बान पारची में इसका रूप धमन होता है जिसका अर्थ है हवा, वायु। हिन्दी में धम्मन चमड़े से बनी उस झोली ( भाथी ) को कहते हैं जिसे दबाने से भट्टी में हवा पहुँचती है। संस्कृत ‘धम’ में निहित फूँकने, धकेलने की क्रिया से श्वास लेने के आशय का शब्द चाहे हिन्दी में नहीं बना हो, पर इसके फ़ारसी रूपान्तर दम में यही सारे भाव होते हुए श्वास लेने का भाव भी प्रकट होता है। हृदय का काम लगातार फूलना-सिकुड़ना है जिसके ज़रिए नसों में दबाव के साथ खून दौड़ता है । ‘धम्’ में निहित फूँकने, धकेलने की क्रिया का अर्थविस्तार ताक़त, शक्ति के अर्थ में फ़ारसी के ‘दम’ में नज़र आता है। ‘दम लगाना’ यानी ज़ोर लगाना है।
“द लोअर दामोदर रिवर, इंडिया’ पुस्तक में कुमकुम भट्टाचार्य ने ‘दामोदर’ का अर्थ अग्निगर्भा (full of fire) बताया है । औपनिवेशक दौर में जब ब्रिटिश खोजी ‘दामोदर घाटी’ में कोयला खोज रहे थे तब भी इस घाटी के सम्बन्ध में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए थे जिससे पता चलता था कि यहाँ कि भूमि से ताप उत्सर्जित होता है, यहाँ तप्त कोयला दबा हुआ है । दामोदर नदी में यही भाव है – धधकते कोयलांचल की नदी । अंग्रेजों के दस्तावेज़ों में कोयलांचल के कुछ शब्दों पर गौर करें-‘बराकर’ यानी मुख्य कोयला खान, ‘काली पहाड़ी’ यानी कोयले का पहाड़, ‘अंगारपथरा’ यानी तप्तप्रस्तर (पत्थर का कोयला ), ‘दामोदर’ यानी अग्निगर्भा नदी । इन सभी नामों से यही ज़ाहिर होता है कि दामोदर घाटी क्षेत्र, प्राचीन काल से ही कोयलांचल के रूप में अपनी पहचान रखता था । ‘दामोदर’ का मूल नाम ‘दमोदर’ रहा होगा । यह ‘दम’ वही है जो वैदिकी के ‘धम्’ से आर्येतर भाषाओं में भी गया । ‘दमोदर’ का रूपान्तर बाद में ‘दामोदर’ की तर्ज़ पर हुआ । ‘दम’ के ‘दाम’, ‘दामू’, ‘दामु’, ‘दमोदा’, ‘दमुआ’ जैसे रूप भी सामने आए । ‘दम’ में निहित धधक, दबाव, तप्तता, आवेग पर गौर करें । झरिया की जलती खदानों के बारे में हम सब जानते हैं । प्राचीन काल में भी इस क्षेत्र से भूगर्भीय गैसे निकलती रही होंगी । ‘दम’ शब्द में गैसीय उत्सर्जन स्पष्ट है । ‘दामोदर’ का नदी नाम घाटी के नाम पर पड़ा होगा । पहले यह समूचा क्षेत्र ‘दमोदर’ या ‘दामोदर’ कहलाता होगा । ‘दामुदा’ या ‘दमोदा’ नामों में छुपे कोयलांचल अर्थ से यह स्पष्ट है । बाद में नदी को भी दामोदर ( दमोदर ) संज्ञा मिली ।

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Monday, February 13, 2012

अलाव की साँझी सत्ता…

bonfire

मारे आस-पास कई ऐसे शब्द बोली-व्यवहार में बने हुए हैं जिनसे ग्रामीण संस्कृति की सौंधी सौंधी गंध रची-बसी है । अलाव भी ऐसा ही एक शब्द है । सर्दियों में गाँवों को अलाव का सहारा होता है । घरों में , चौपाल पर , रास्तों पर कहीं भी अलाव जलते जाते हैं । अलाव जलाने के लिए ज्यादा जतन करने की ज़रूरत नहीं होती । घास-फूस, पत्ते, कूड़ा कुछ भी इकट्ठा कर जला लो, अलाव बन जाता है । अलाव की आँच काफी प्रतीकात्मक भी होती है । हल्की सी चिन्गारी पूरे गाँव को फूँक देती है और यही चिन्गारी जब दिलों में, आँखों में जलती है तब क्रान्ति की ज्वाला भड़कती है । अलाव की आग सबको बराबर तपिश देती है और इसके चारों और बैठे लोगों में साझे की गरमाहट होती है । ये गरमाहट रिश्तों को पक्का करती है । अलाव पर रोटियाँ भी पकती हैं और अदहन भी चढ़ता है । अलाव सांझा चूल्हा है और अलाव साझी सत्ता है ।
ग्नि को कहीं लाल रंग का प्रतीक माना गया है, तो कहीं पीले का और कहीं श्वेत । ये सभी आभाएँ अग्नि की अलग अलग स्थितियाँ हैं । सबसे पहले एक जैसे अर्थों वाली शब्द सम्पदा के ज़रिए देखते हैं अलाव की आँच और उसके रंगों को । संस्कृत में हर का अर्थ पीला भी होता है और अग्नि भी । हरि यानी हरा या पीला, हरि यानी भूरा या लाल, हरि यानी सूर्य । हल्दी को संस्कृत में हरिद्रा कहते हैं । हिरण्य यानी सोना, होली यानी अग्नि, अनल यानी अग्नि । तमिल में भी अनल् , अग्नि ही है । हर् का रूपान्तर अर् होता है और अरुण यानी रक्ताभ प्रभात में यह अर् हमें नजर आता है । बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश के ज़रिये डॉ रामविलास शर्मा द्वारा बनाई सूची के अनुसार अर्क यानी सूर्य, चमक, अग्नि और ताम्बा है । अर्च् में चमक है । अर् का एक और रूपान्तर अल् हो जाता है । सस्कृत में अल का अर्थ है पीत-खनिज । अलात यानी अग्नि । अलाव यानी अग्निपुंज । उल्का यानी मशाल, अंगार । आर्मीनियाई का अले, लिथुआऩी का अलनिस और अंग्रेजी का यलो भी पीला, पीताभ के अर्थ में प्रचलित हैं और इसी मूल से उनकी रिश्तेदारी है ।
लाव शब्द इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसकी व्याप्ति समूचे भारत से लेकर उत्तर पूर्व के तुर्कमेनिस्तान से लेकर एशिया-यूरोप के सन्धिबिन्दु तुर्की तक की भाषाओं में है । यही नहीं, उत्तरी ईरान की कुर्द पहाड़ियों में रहने वाले एक कबीले का नाम ही अलेवी है । समझा जाता है कि इसके मूल में तुर्की का अलेव शब्द है जिसका अर्थ है अग्नि । तुर्की अलेव और हिन्दी के अलाव की तुलना गौरतलब है । हिन्दी में अलाव का अलाओ रूप भी अल्पप्रचलित है । शब्दों का सफर में यह बात अनेक शब्दों के सन्दर्भ में सामने आती रही है कि हमारी प्रारम्मिक शब्दावली पर प्राकृतिक शक्तियों का जबर्दस्त प्रभाव पड़ा । मनुष्य प्रकृति के निकट सम्पर्क में रहता था । आँधी, पानी, बरसात, बिजली जैसी प्रकृति की स्तब्धकारी शक्तियों के आगे वह सिर धुनता रहता था । यह शक्तियाँ मनुष्य के प्रारम्भिक देव-समूह में शामिल हुईं और प्रकारान्तर से आज तक इनका ही वर्चस्व है । इन तमाम शक्तियों में भी मनुष्य ने अग्नि को सर्वोच्च माना । सूर्यपिण्ड और चन्द्रपिण्ड के चक्र-परिभ्रमण को देखते हुए उसने खगोलिकी सम्बन्धी प्रारम्मिक धारणाएँ बनाईं । प्रायः दुनियाभर की विविध भाषाओं में प्रकाश, वर्ण और ऊष्मा से जुड़ी शब्दावली में आश्चचर्यजनक समानता देखने को मिलती है । अलाव में न सिर्फ अग्नि प्रमुख है बल्कि उसमें मण्डल भी है साथ ही पीताभ ज्योति भी है ।
व्युत्पत्ति के नज़रिए से देखें तो संस्कृत के अलात से अलाव का जन्म हुआ है । हिन्दी के विभिन्न कोशों में अलावा की व्युत्पत्ति यही मिलती है । वाशि आप्टे को संस्कृत हिन्दी कोश में भी अलातम् का अर्थ अंगार बताया गया है । हिन्दी में अलात शब्द का स्तंत्र प्रयोग तो नहीं मिलता मगर बौद्ध शब्दावली में अलातचक्र शब्द का प्रयोग मिलता है । आमतौर पर जादूगर और कलाबाज अग्निदण्ड को इस कौशल से चक्राकार घुमाते हुए एक अग्निवलय बनाता है और उसके ज़रिये ऐसा तिलस्म निर्माण करते है कि दर्शक बंधा सा रह जाता है । जब तक वलय की परिधि में आग जलती रहती है, कला का प्रभाव बना रहता है । दीवाली पर बच्चे फुलझड़ी को गोल गोल घुमाते हुए अग्नि के एक आभासी वलय का निर्माण करते हैं । जैसे ही हाथ का घूमना रुकता है, वलय का प्रभाव भी खत्म हो जाता है । यही है अलातचक्र जिसका प्रयोग बौद्ध धर्शन में माया-विनाश के प्रतिपादन के लिए होता है । दरअसल को गोल घुमाने से बना अलातचक्र एक भ्रम ही होता है, न कि सचमुच का अग्निवलय । मगर यहाँ गौर करें कि अलातचक्र चाहे मायावी होता हो, मगर अलात से बने अलाव के चारों घेरा डाल कर बैठे लोग माया नहीं हैं ।
फ़ैलन के कोश के मुताबिक अलात शब्द का ज़ेंद रूप भी अलाव ही है अर्थात आज से चार हज़ार साल पहले ही अलात का अलाव रूप सामने आ चुका था । गौरतलब है कि अग्निपूजक जरथ्रुस्तवादियों का प्राचीन भारतीयों से गहरा रिश्ता था । प्राचीन ईरान और भारतीय आर्यों के अग्निविधान मूलतः एक ही थे । पारसियों का धार्मिक साहित्य जेंदावेस्ता कहलाता है । जेंद में अग्नि के लिए अलाव का प्रयोग हुआ है । जेंद अलाव से ही फ़ारसी में भी अलाव शब्द आया जहाँ से इसने तुर्की भाषा में अपनी हाज़िरी दर्ज़ कराई । तुर्की में इसके कई रूप हुए जैसे अलैव, अलेव, अलीव, अलेफ़ या अलीफ़ । इन सभी शब्दों का अर्थ है मशाल, अग्निज्योत । दिलचस्प यह भी कि तुर्की में अलेव न सिर्फ़ अग्नि है बल्कि इसका अर्थ लाल घर भी होता है । यहाँ अग्निशिखा की लालिमा को याद कर लें । आग की लाल लपट की ही तरह तुर्की में सूर्य के लिए उली, उलू जैसे शब्द भी हैं जिनमें कांति, चमक का भाव है । कुल मिला कर अलाव अत्यंत प्राचीन शब्द है और प्राचीन अग्निपूजक संस्कृति से उद्भूत है । पूर्ववैदिक युग में जलाई गई अलाव की आँच सदियों बाद भी सभ्यताओं को गर्मजोश रखे हुए है ।

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Saturday, February 11, 2012

पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…[कम-2]

पिछली कड़ी-‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1]

हिन्दी की ज़मीन पर मेरे विचार से दो ‘कमीन’ विराजमान हैं । बोलचाल की भाषा में फ़ारसी के कमीन का चलन बढ़ा और जनमानस में सदियों से प्रचलित(पाली/हिन्दी) का ‘कम्मीं’ भी ‘कमीन’ बन गया

श्रम विभाजन और वर्ग विभाजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । कार्मिक विभाजन हुआ ही इसलिए था क्योंकि जो पहले से श्रेष्ठ थे वे बेहतर स्थिति में रहें । श्रम से जुड़ी व्यवस्था में मनुष्य ने ‘कर्म’ शब्द के साथ भी भेदभाव बरता । कर्म से जुड़ी सामान्य सामाजिक-पहचान सदियों बाद जातीय पहचान बन गई और फिर उस शब्द को हीन अर्थों में देखा जाने लगा । रोज़मर्रा से जुड़े तमाम कार्यों को सम्पादित करने वाले श्रमिक समाज पर नज़र डालिए, एक नहीं, हज़ारों ऐसे शब्द मिल जाएँगे । दुनियाभर के समाजों में मनुष्य सदियों से जातीय हीनता का दंश सहता रहा है । प्रायः सभी भाषाओं में नस्ली भेदभाव के शब्द मिलते हैं । भारतीय भाषाओं में भी ये हैं । वैदिक साहित्य से ही ये साक्ष्य मिलने लगते हैं । बहरहाल, ‘कमीन’ शब्द के सन्दर्भ में हमेशा ग़लतफ़हमी रही है । हिन्दी में ‘कमीन’ शब्द भी प्रचलित है और ‘कमीना’ भी । दोनो को एक ही समझा जाता है । देखा जाए तो दोनो में बहुत ज्यादा अन्तर भी नहीं है । अपने मूल रूप में ये दोनों ही अपशब्द नहीं थे, मगर आज दोनों की ही अर्थावनति हो चुकी है और इनका प्रयोग अभद्र बोल-व्यवहार समझा जाता है ।

फ़ारसी का कमीना

‘कम’ शब्द की तरह ही ‘कमीन’ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में भी हिन्दी कोश ज्यादा जानकारी नहीं देते हैं । अलबत्ता यह स्पष्ट है कि हिन्दी में आज गाली की तरह मशहूर ‘कमीना’ शब्द फ़ारसी मूल के ‘कमीनः’ (कमीनह्) से बना है । संस्कृत-फारसी का विसर्ग हिन्दी में स्वर हो जात है । सवाल यह है कि ‘कमीन’ शब्द कहाँ से आया है ? मोटे तौर पर तो ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक ही जान पड़ते हैं मगर ‘कमीना’ जहाँ सौ फ़ीसद फ़ारसी शब्द है, वहीं ‘कमीन’ शब्द का रिश्ता एकाध जगह फ़ारसी से और कुछ जगह हिन्दी से बताया गया है । हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी के कई कोशों में तो ‘कमीन’ शब्द दर्ज़ तक नहीं हुआ है । शायद इसीलिए कि ‘कमीन’ को ‘कमीना’ का पर्याय मान लिया गया । मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश ‘कमीन’ शब्द है ही नहीं और फ़ैलन के कोश में ‘कमीन’ शब्द को तो हिन्दी का बताया गया है मगर उसकी व्युत्पत्ति फ़ारसी ‘कमीनः’ से बताई गई है । ‘कमीन’ का अर्थ फ़ैलन नीच जात बताते हैं और ‘कमीना’ का अर्थ टहलुआ, चाकर, सेवक, नौकर, दास आदि । फैलन ‘कार-कमीन’ और ‘कमीन-कंडु’ शब्दों का उल्लेख भी करते हैं ।

कम्मी से कमीन

‘कमीन’ शब्द प्राचीन भारतीय समाज की जजमानी प्रथा के सन्दर्भ में सामने आता है और इसीलिए मेरे विचार में हिन्दी के ‘कमीन’ और ‘कमीना’ दो अलग अलग शब्द है, दोनों की अलग अलग अर्थवत्ता है और दोनों के जन्मसन्दर्भ भी पृथक है । ‘कमीना’ बना है फ़ारसी के ‘कमीनः’ से जिसके मूल में ‘थोड़ा’, ‘कुछ’, ‘न्यून’ के अर्थवाला फ़ारसी का ‘कम’ शब्द है । इसका रिश्ता पुरानी फ़ारसी और अवेस्ता के ‘कम्ना’ शब्द से है । दूसरी ओर ‘कमीन’ शब्द के मूल में संस्कृत का ‘कर्म’ शब्द है । पाली, अपभ्रंश में ‘कर्म’ का ‘कम्म’ रूप होता है । हिन्दी के विभिन्न रूपों में ‘कार्य’ के अर्थ में प्रचलित ‘काम’ शब्द इसी ‘कम्म’ का अगला रूप है । जिस तरह हिन्दी का ‘काम’ शब्द पाली , अपभ्रंश के ‘कम्म’ का रूपान्तर है उसी तरह पाली के ‘कम्मी’, ‘कम्मिक’ ( पाली हिन्दी कोश, भदन्त आनन्द कौसल्यायन ) का रूपान्तर है हिन्दी का ‘कमीन’ शब्द जिसका आशय है कार्मिक, कर्मी, करने वाला , मज़दूर, श्रमिक आदि । प्रचलित तौर पर वे जातियाँ जो सेवाएँ लेती हैं उन्हें ‘जजमान’ कहते हैं और वे जातियाँ जो सेवाएँ प्रदान करती हैं, उन्हें ‘कमीन’ कहते हैं । सो काम करने वाले ‘कम्मी’ कहलाए । अब यहाँ ‘कमीन’ नीच व्यक्ति नहीं है बल्कि इसका अर्थ है ‘कार्मिक – कर्मकार’ । शोषण का दायरा जब व्यापक हुआ तब निम्नवर्गीय सेवाओं और गौण कृषिकर्म करने वाले तबकों को ‘कम्मी’ कहा जाने लगा । बाद के दौर में तो ब्राह्मणों के सेवाकर्म को छोड़ कर शेष सभी सेवाएँ गौण कर्म समझी जाने लगीं मसलन, खेत-मजूरी, हस्तशिल्प, कुम्हारी, लुहारी जैसे काम, घास छीलना, बाँस छीलना जैसे काम करने वाले समुदाय ‘कमीन’ जाति कहलाने लगे ।

कम्मकर से कमेरा

न्हीं अर्थों में पाली में ‘कम्मकर’, ‘कम्मकार’ जैसे शब्द भी हैं जिनसे हिन्दी का ‘कमेरा’ शब्द बना है । ‘कमेरा’ यानी मज़दूरी करने वाला । ‘कम्मी’ यानी कमाने वाला । चाकर, सहायक, छोटे-मोटे काम करने वाला ही ‘कमेरा’ है । फैलन के कोश में जो ‘कार-कमीन’ है वह दरअसल ‘कारकम्मी’ ही है । इसी तरह हिन्दी – उर्दू कोशों में ‘कमीनकंडु’ शब्द मिलता है जिसका अर्थ पुराने ज़माने में तीर तैयार करना था । गौरतलब है संस्कृत में ‘काण्ड’ शब्द बाँस की गाँठ को कहते हैं । बाँस छील कर तीर बनाने वाला ‘काण्डपाल’ कहलाता है । इससे ही बना है ‘कण्डु’ या ‘कडु’ शब्द । जाहिर यह कर्म से जुड़ा नाम है इसलिए इसके साथ जुड़े ‘कमीन’ शब्द का पूर्वरूप ‘कम्मी’ ही तार्किक है । इसी तरह मुहावरेदार भाषा में ‘कम्मीं-कमीन’ शब्दयुग्म का प्रयोग भी होता है । यहाँ ‘कम्मीं’ और ‘कमीन’ दोनों का अर्थ अलग अलग है । यहाँ ‘कम्मीं’ का आशय छोटी जात या ओछा काम करने वाले से है जबकि कमीन में फ़ारसी वाले ‘कमीना’ ( नीच, धूर्त, क्षुद्र, लफंगा, बदमाश ) का आशय निकलता है । ख्यात लेखक यशपाल ने मेरी तेरी उसकी बात उपन्यास में कमीन का अर्थ “ बेगार, कठिन परिश्रम और अप्रिय काम करने वाले ” बताया है । कम्मी और कम्मा के अवशेष हमें आज भी अपने आसपास मिलते हैं । कमीना में कमीन की तलाश करने वाले ज़रा पहचानें निकम्मा और निकम्मी जैसे शब्दों को । जिसके पास काम नहीं है वह निकम्मा, जो व्यस्था काम न करे वह निकम्मी । ये बेहद प्रचलित शब्द हैं ।  मूल भाव है कर्म का । लोगों को काम करना चाहिए । कम्मी यानी कामगार । बाद में यह हीनकर्म के अर्थ में रूढ़ हो गया ।

कम्मी यानी प्रजा 

‘कमीन’ और ‘कमीना’ शब्द भाव सादृष्य और अर्थ सादृष्य के चलते आपस में कुछ इस तरह घुलमिल गए कि ये एक मूल से जन्मे जुड़वाँ शब्द नज़र आने लगे । ध्यान देने की बात है कि यजमानी प्रथा से जुड़े ‘कम्मी’ शब्द में कामगार के भाव के साथ प्रजा का भाव भी है । अब यह कहने की ज़रूरत नहीं कि संरक्षण और शोषण भी एक चीज़ के दो आयाम हैं । किसी के संरक्षण में जाते ही शोषण का आरम्भ होता है । मगर मूलतः शोषण की शुरुआत पुचकारने से होती है । अतः यह नहीं माना जा सकता कि अपने शुरुआती दौर में ही यजमानी प्रथा का ‘कमीन’ शब्द सचमुच गाली का दर्ज़ा रखता था । समूची प्रजा, रियाया के लिए गाली समान शब्द का प्रचलन भला किसी भी काल की सत्ता-व्यवस्था में क्योंकर सम्भव होगा ? निश्चित ही फ़ारसी ने जब हिन्दुस्तान की धरती पर पैर रखा तब ‘कमीनः’ का ‘कमीना’ रूप भी विकसित हुआ । इसमे निहित कमतरता के दास्यभाव की अवनति हुई । बाद में ओछापन, नीचता, तुच्छता जैसे भावों का स्पष्ट विकास हुआ । शब्दों अर्थावनति के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं । बोलचाल की भाषा में फ़ारसी के कमीन का चलन बढ़ा और जनमानस में सदियों से प्रचलित पाली का ‘कम्मीं’ भी ‘कमीन’ बन गया । इस तरह हिन्दी की ज़मीन पर मेरे विचार से दो ‘कमीन’ विराजमान हैं । एक फ़ारसी से आया हुआ और दूसरा फ़ारसी के प्रभाव में बना हुआ ।

शायर कमीना, आशिक कमीना

ही बात फ़ारसी के ‘कमीनः’ की तो न्यून, हीन, छोटा, क्षुद्र, ओछा आदि के अर्थ वाला कम ही इसके मूल में है । ‘कमीनः’ शब्द अपने मूल रूप में यह शब्द गाली या अपशब्द नहीं था, मगर बाद में हो गया । ‘कमीन’ का आशय था अपने पालक की तुलना में हीन, क्षीण, दीन आदि । साधक प्रायः खुद को ईश्वर की तुलना में दीन, हीन, कमजोर ही मानता है । मध्यकालीन सधुक्कड़ी भाषा के कवियों नें प्रायः इसी अर्थ में खुद को ‘कमीन’ कहा है । शायरी भी मूलतः सूफ़ीयाना काव्य परम्परा से ही जन्मी है । शायरों ने खुद को हक़ीर माना । इश्को-आशिकी की उनकी रचनाएँ दरअसल आध्यात्मिक अनुभूतियाँ ही हैं जिनमें माशूक का प्रयोग ब्रह्म के रूप में हुआ है । शायरों ने भी इसीलिए खुद को हक़ीर, गुलाम, फ़क़ीर और ‘कमीन’ तक कहा है, सो इसी भावना से । शायर भी कमीना, आशिक भी कमीना । इसका अर्थ लफंगा, बदमाश तो कतई नहीं, बल्कि विनम्रतावश खुद को कमतर मानने का भाव ही है यहा है । पर मेरा मानना है कि जातिवाचक कमीन शब्द का व्युत्पत्तिक आधार चाहे फ़ारसी के कमीन से न जुड़ता हो मगर जातिवाची संज्ञा के तौर पर ‘कमीन’ शब्द का प्रयोग मुस्लिम दौर में ही बढ़ा है । ‘कमीन’ में निहित ओछेपन के भाव का विस्तार ही हीन जाति के अर्थ में हुआ । बाद में इसमें नीच, अधम, धूर्त जैसे भाव समा गए और इस तरह ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक हो गए । अगली कड़ी- किसी कंपेश को जानते हैं आप ?

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Monday, February 6, 2012

‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1]

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हि न्दी के बहुप्रचलित शब्दों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा नज़र आता है ‘अल्प’, ‘न्यून’, ‘थोड़ा’, ‘छोटा’, ‘कुछ’ के सन्दर्भ में इस्तेमाल होने वाला ‘कम’ शब्द । इसकी तुलना में ‘न्यून’ या ‘अल्प’ का प्रयोग विरल है । ‘कम’ के अर्थ में ‘कमती’ शब्द भी चलता है। ‘कम’ शब्द बरास्ता अवेस्ता होते हुए फ़ारसी में आया और फिर हिन्दी में इसने आसन जमा लिया। ‘कम’ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में बहुत ‘कम’ जानकारी उपलब्ध है, बल्कि कहना चाहिए कि हिन्दी-उर्दू में प्रचलित ‘कम’, कमती शब्दों के फ़ारसी मूल के मद्देनज़र इनकी व्युत्पत्ति जानने के प्रयास सम्भवतः नहीं हुए हैं । भाषा सम्बन्धी पुस्तकों, कोशों आदि में इसका सन्दर्भ नहीं मिलता । विभिन्न सन्दर्भ सिर्फ़ इतना ही बताते हैं कि यह फ़ारसी मूल का शब्द है । दिलचस्प यह भी है कि ‘कम’ में निहित ‘कमी’ वाला जो भाव है वह हिन्दी में ‘कम’ के समानार्थी ‘न्यून’ शब्द से इसे जोड़ता है । व्युत्पत्तिक नज़रिये से । कहाँ ‘न्यून’ और कहाँ ‘कम’ । न एक स्वर समान और न ही किसी व्यंजन का मिलान फिर भी व्युत्पत्तिक साम्य की बात अजीब लगती है । यही तो है शब्दों का सफ़र ।
‘कम’ नहीं, ‘कुछ’ का भाव
‘कम’ की व्युत्पत्ति के बारे में जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है वह अवेस्ता में लिखित पारसियों के प्रसिद्ध धार्मिक काव्य “गाथा” के उन्हीं अंशों के जरिये मिलती है, जिनकी विवेचना फ़ारसी के विद्वानों और ईरान-विशेषज्ञों ने की है । स्टूअर्ट ई मैन की “एन इंडो-यूरोपियन कम्पैरटिव डिक्शनरी” में दर्ज़ फारसी ‘कम’ की मूल धातु ‘kamma, quomn’ का उल्लेख डॉ अली नूराई द्वारा बनाए गए इंडो-यूरोपीय भाषाओं के रूटचार्ट में हुआ है जिसके मुताबिक अवेस्ता के ‘कम्ना’, ‘कम्नो’ जैसे शब्द इसी मूल से आए हैं जिनका अर्थ ‘कुछ’, few, ‘न्यून’, ‘थोड़ा’, ‘छोटा’ है । इन्हीं से फ़ारसी के ‘कम’, ‘कमी’, ‘कमीन’ जैसे शब्द बने हैं । वैसे पुरानी फ़ारसी के वक्त से ही ‘कम’ शब्द का प्रयोग उपसर्ग, प्रत्यय की तरह होता रहा है । फ़ारसी में भी ‘कम’ का यही रूप विद्यमान है । मूलतः यह विशेषण है । फ़ारसी शब्द ‘कम’ का विकास अवेस्ता के ‘कम्ना’ से हुआ है, इस बारे में ज़्यादातर विद्वान एकमत हैं । अवेस्तन-गाथा में इस शब्द का उल्लेख है जिसमें इसका उल्लेख बतौर ‘कम्नानर’ हुआ है जिसका अर्थ है- कुछ लोग । यहाँ ‘कम्नानर’ का विग्रह किया जाए तो ‘कम्ना’ और ‘नर’ निकल कर आते हैं । ‘नर’ यानी आदमी और ‘कम्ना’ में ‘कुछ’ अर्थात few का आशय स्पष्ट है । ‘कम्ना’ से यह साफ़ नहीं होता कि यह आया कहाँ से । जॉन प्लैट्स के अनुसार भी फ़ारसी का ‘कम’, ज़ेंद ( अवेस्ता ) के ‘कम्ना’ से आया है । भाषाविद् ब्रूस लिंकन, “डेथ वार एन्ड सेक्रिफाइसः स्टडीज़ इ आइडिऑलॉजी एन्ड प्रैक्टिस” पुस्तक में लिखते हैं कि पुरानी फ़ारसी में ‘कम्ना’- शब्द का अक्सर प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है “योद्धाओं की कमी” । इसकी व्याख्या किन्हीं सन्दर्भों में “कुछ लोग” भी मिलती है । गौरतलब है कि ‘कम्नानर’ शब्द भी इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । मोनियर विलियम्स के कोश में ‘काम’ की प्रविष्टि के अन्तर्गत भारतीय पौराणिक सन्दर्भों के मुताबिक विभिन्न अर्थछटाएँ दर्ज़ है। इनमें अवेस्तन पद ‘काम्नानर’ के अर्थ से मेल खाते वैदिक शब्द ‘काम’ का एक अर्थ महत्वपूर्ण है – “कुछ पुरुष या कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद )।
वैदिकी से रिश्तेदारी
भाषाविद् स्टूअर्ट ई मैन लिखते हैं कि ‘कम्ना’ का प्रयोग कहीं उपसर्ग तो कहीं प्रत्यय की तरह हुआ है । उपसर्ग की तरह ‘कम्ना’ शब्द का एक अन्य उदाहरण है ‘कम्नाफ्स्व’ शब्द जिसका अर्थ है “पशुधन की कमी” । गाथा में एक पुरोहित अपना दारिद्र्य प्रदर्शित करते हुए मवेशियों की कमी का दुखड़ा रोते हुए ‘कम्नाफ्स्व’ शब्द का प्रयोग करता है। गौरतलब है कि वैदिक समाज की तरह प्राचीन ईरान में भी पुरोहितों को जीवनयापन के लिए पशु दक्षिणा ही दी जाती थी। यह जो ‘–फ्स्व’ है यह दरअसल वैदिक भाषा के ‘पशु’ का का रूपान्तर है जिसका आदिस्त्रोत वैदिक शब्दावली का ‘पाश’ है । पाश, यानी बन्धन या रस्सी । पशुओं को पाश से फाँसा जाता था इसीलिए वे ‘पशु’ कहलाए । ‘कम्नाफ्स्व’ का अर्थ हुआ सीमित पशुधन । इसी तरह अल्पाहार के लिए भी प्राचीन फ़ारसी में ‘कम्नाख्वार्या’ शब्द का प्रयोग हुआ है । अवेस्ता और पुरानी फ़ारसी में ‘कम्ना’ शब्द का प्रयोग कुछ के सन्दर्भ में होता था मगर बाद में फ़ारसी में ‘कम्ना’ का रूपान्तर ‘कम’ हुआ और उसका प्रयोग ‘न्यून’, ‘थोड़ा’ के लिए होने लगा। “द अवेस्तन हिम टू मिथ्रा” में इल्या गिलक्रिस्ट और कार्ल फ्रेड्रिक गेल्डनर अवेस्ता के ‘कम्ना’ का रिश्ता संस्कृत के ‘कम्ब’ से जोड़ते हैं । लगता है यह ‘कम्ना’ का ही कोई व्याकरणिक रूप होगा क्योंकि इस शब्द की कोई विवेचना संस्कृत कोश में नहीं मिलती जिससे इसे अवेस्ता के ‘कम’ से जोड़ा जा सके । मगर नूराई के चार्ट में भी sqombh-no- धातु का हवाला मिलता है, इसका अर्थ ‘छोटा’, ‘लघु’ या ‘न्यून’ बताया गया है । इसका उल्लेख फारसी ‘कम’ की मूल धातु kamma, quomn के क्रम में ही हुआ है ।
बात कुछ और है
ह तो साफ़ है कि अवेस्ता और प्राचीन फ़ारसी के ‘कम्ना’ में कुछ, थोड़ा का भाव था जो बाद में ‘कम’, ‘न्यून’ के अर्थ में प्रचलित हुआ । अवेस्ता प्राचीन वैदिक भाषा की सहोदरा थी, यह रिश्तेदारी निर्विवाद है । इस नाते संस्कृत के ‘काम’ में निहित “कुछ पुरुष” या “कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद ) जैसा आशय इस बात का प्रमाण है कि गाथाअवेस्ता के ‘कम्ना’ से उद्भूत ‘कम’ शब्द का रिश्ता वैदिक शब्दावली वाले ‘कम’, ‘काम’ जैसे शब्दों से भी हो सकता है । सवाल उठता है कि ‘कम’ में मूलतः इच्छा, आकांक्षा, अभीष्ठ का भाव है, तब उसमें न्यूनता या कमी जैसी अर्थवत्ता कैसे विकसित हुई होगी ? इसका उत्तर मिलता है अवेस्ता (गाथाअवेस्ता) के प्राचीन कोश “फ़रहंग ई ओइम एवक” से । इस कोश में गाथाअवेस्ता के एक प्रत्यय ‘ऊनम्’ की प्रविष्टि है जिसे ‘कम्ना’ के ज़रिए समझाया गया है । इसका एक और रूप अवेस्ता में ‘उन्’ मिलता है जिसका अर्थ है अपूर्ण, अधूरा, रिक्त आदि । ‘कम्ना’ में ‘उन्’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है और यह ‘कम् + उन्’ से बना है । ‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ या ‘कमी’ का भाव दरअसल ‘कम्’ से नहीं बल्कि ‘उन्’ प्रत्यय से आ रहा है । कोश में इसकी तुलना अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण, अतिरिक्त, कुछ, अपर्याप्त या न्यून की अर्थवत्ता वाले संस्कृत विशेषण ‘ऊन’ से की गई है । गौरतलब है कि वैदिकी और अवेस्ता लगभग जुड़वाँ प्रकृति की भाषाएँ हैं। फिर भी विद्वान वैदिक भाषा को अवेस्ता से कुछ प्राचीन ठहराते हैं । ज़ाहिर है गाथाअवेस्ता का ‘उन’ और वैदिक भाषा का ‘ऊन’ एक ही है । मोनियर विलियम्स भी अपने कोश में ‘ऊन’ के निम्न अर्थ बताते हैं- wanting , deficient , defective , short of the right quantity , less than the right number , not sufficient. यही नहीं, इस प्रविष्टि के आगे वे “कम्पेयर टू ज़ेन्द ऊन” भी लिखते हैं ।
कम के पेट में ऊन
‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ जैसे भावों का रहस्य खुलने के बाद ‘कम्’ शब्द का तिलिस्म भी टूटता है और इसका रिश्ता वैदिक भाषा की ‘कम्’ धातु से जुड़ता है जिसमें इच्छा, अभिलाषा, कामना, वांछा, लालसा और वासना जैसे भाव निहित हैं । मोनियर विलियम्स के कोश में दर्ज़ काम की प्रविष्टि के अन्तर्गत अवेस्तन पद ‘कम्नानर’ ( कुछ लोग या योद्धाओं की कमी ) के अर्थ से मेल खाते– “कुछ पुरुष” या “कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद ) पर अगर ध्यान दें तो ‘कम्ना’ शब्द की वैदिकी या संस्कृत के ‘कम्’ से रिश्तेदारी स्पष्ट हो जाती है और उसका तिलिस्म खुल जाता है । ‘कम् + उन्’ से बने ‘कम्ना’ का मूलार्थ है निकलता है “इच्छा से अल्प” । “ज़रूरत से कम ( कुछ )” आदि । ऊपर दिए सन्दर्भों ‘कम्नानर’, ‘कम्नाफ्स्व’, ‘कम्नाख्वार्या’ में यही भाव हैं । अगर हम वैदिक भाषा के ‘कम्’, ‘काम’, ‘कामना’ जैसे शब्दों में ‘कम्ना’ का अर्थ खोजेंगे तो निराशा ही हाथ लगती है मगर ‘कम्ना’ से जुड़े ‘ऊनम्’ प्रत्यय का अस्तित्व जैसे ही स्पष्ट होता है, ‘कम्’ की व्युत्पत्ति का सूत्र भी नज़र आने लगता है ।
कम-न्यून, भाई-भाई
स सन्दर्भ में यह जान लेना ज़रूरी है कि वैदिक प्रत्यय ‘ऊन’ का अस्तित्व निश्चित ही भारतीय बोलियों में कहीं न कहीं होगा, मगर ‘कम’ के अर्थ में यह मराठी में स्पष्ट रूप से मौजूद है । जिस तरह ‘कमोबेश’ शब्द का इस्तेमाल हिन्दी में ‘कम-ज्यादा’, ‘थोड़ा-बहुत’ का आशय प्रकट करने के लिए आम है वैसे ही मराठी में, आज भी और फ़ारसी प्रभाव बढ़ने से पहले भी उन पर आधारित ‘उणे’ शब्द प्रचलित था। कमोबेश के अर्थ में ‘उणे-अधिक’ या ‘अधिक-उणे’ जैसे मुहावरे हैं। कमी के लिए मराठी में ‘उणीव’ शब्द है जो गाथाअवेस्ता के ‘ऊनम्’ और संस्कृत के ‘ऊन’ का ही रूपान्तर है और प्रकारान्तर से ‘कम’ में निहित कमी वाले भाव का जन्मदाता भी यही ‘ऊन’ है । कम के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जो ‘न्यून’ शब्द है उसकी अर्थवत्ता और व्युत्पत्ति भी इसी ‘ऊन’ से सिद्ध होती है। ‘न्यून’ बना है नि + ऊन ‘अच्’ प्रत्यय लगने से । इस तरह फ़ारसी के ‘कम’ और संस्कृत के ‘न्यून’ के बीच समीकरण भी बनता है और व्युत्पत्तिक रिश्ता भी ।

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Sunday, February 5, 2012

झप्पी, झपकी और ऊँघ

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पि छले कुछ बरसों में हिन्दी में झप्पी शब्द चल पड़ा है । मुन्नाभाई फिल्म के माध्यम से इसका प्रसार हुआ हुआ है । झप्पी यानी स्नेहालिंगन । प्यार-दुलार के साथ बाँहों में भर लेना । गले लगाना, आगोश में लेना, सीने से लगाना, चिपटाना जैसे भाव इसमें निहित हैं । मूलतः झप्पी पंजाबी से हिन्दी में आया शब्द है जिसका उर्दू-पंजाबी रूप है जफ्फी । वैसे भी हिन्दी में पंजाबी मूल के जिन शब्दों की रच-बस हुई है उसकी वजह पंजाबी का अनुदित साहित्य नहीं है बल्कि बॉलीवुड की फिल्में रही हैं । फ़िल्मी दुनिया में में पंजाब का वर्चस्व सब पर उजागर है । गीत, संगीत, कहानी, निर्देशन, संवाद और अभिनय आदि तमाम क्षेत्रों को पंजाब की प्रतिभाओं ने खूब समृद्ध किया है । पंजाबी निर्देशकों का अपनी संस्कृति से प्रेम हिन्दी फिल्मों में झलकता रहा है और उसी वजह से फिल्मी गीतों और संवादों पर पंजाबी असर के चलते हिन्दी में भी पंजाबी शब्द चले आए । मुन्नाभाई फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा भी पंजाबी हैं तो जादू की झप्पी को भी हिन्दी वालों में शोहरत मिलनी ही थी। हालाँकि इस झप्पी के पीछे मुन्नाभाई तो साफ़ दिखता है मगर पंजाब को लोग नहीं देख पाते ।
प्पी के मूल में दरअसल झप क्रिया है जिसमें तेज़ी, शीघ्रता, जल्दी का भाव है । झप के मूल में है संस्कृत का झम्प शब्द जिसका अर्थ है कूदना, उछलना । इसमें फुर्ती, त्वरता का भाव भी है । गौरतलब है कि उछलना या कूदना जैसी क्रियाएँ शीघ्रता से ही सम्पन्न होती हैं । देवनागर वर्णमाला के व्यंजन से ध्वनिअनुकरण के आधार पर अनेक शब्दों का निर्माण हुआ है । में संघर्षी ध्वनि के साथ गति का बोध होता है । हवा और पानी का तेज गति से मिला-जुला निनाद झर-झर ध्वनि है । पहाड़ से गिरते पानी के सोते को झरना कहते हैं । ऊपर से नीचे गिरती धारा में नैसर्गिक त्वरा, आवेग होता है । झटपट, झपाटा शब्दों को हम रोज़ सुनते हैं जिनमें गति और शीघ्रता है । झपट्टा, झपटना जैसे शब्दों में आक्रमण, चढ़ाई, धावा बोलने का आशय तो स्पष्ट है ही, सामान्य बोलचाल में किसी वस्तु को शीघ्रता से हस्तगत करने या तेज़ी से किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को ताबे में लेने के लिए भी इन शब्दों का प्रयोग होता है । झाप, झापना या झापट /झापड़ शब्द भी आम हैं । झाप में शीघ्रता से काबू करने का आशय है । डाँटने, बोलती बन्द करने, चुप कराने के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है । लेकिन मूल भाव स्पष्ट है-तत्काल प्रतिक्रिया । झप्पी में भी झपाटे की क्रिया है । भावावेश में किसी को गले लगा लेना । खींच कर गले लगाना ही मूलतः झप्पी है, मगर अब जो ये जादू की झप्पी है, इसमें बड़ी शाइस्तगी, नफ़ासत और संयम भी है । और तो और, इसे पाने के लिए तो कतार में भी खड़े होना पड़ता है ।
Drowsiness
तेज़ रफ़्तारी या तत्क्षता प्रकट करने के लिए पलक झपकना मुहावरे का प्रयोग होता है अर्थात पलक झपकने की क्रिया जितना वक्त और गति । हद से ज्यादा थकान की अवस्था में या फिर जब मस्तिष्क किसी सोच-विचार की स्थिति में नहीं रहता, अचानक थोड़े समय के लिए नींद के आगोश में चले जाने की स्थिति झपकी कहलाती है । यह झपकी भी इसी मूल से आ रही है । अचानक नींद में गाफ़िल होना और अचानक जागृत अवस्था में आना, यही झपकी है । झपकी वाले आशय से मिलता जुलता एक और शब्द हिन्दी में प्रचलित है-ऊँघना । हालाँकि ऊँघना और झपकी एक दूसरे के पर्याय नहीं है मगर शब्दकोशों में झपकी का अर्थ ऊँघना भी मिलता है । ऊँघना शब्द को लेकर कोशकार एकमत नहीं हैं । जॉन प्लैट्स ऊँघना की व्युत्पत्ति अधो+गमन मानते हैं । ऊँघना क्रिया पर गौर करें । थकान के मारे जब बैठी हुई अवस्था में ही पलकें बोझिल हो जाती हैं तब सिर धीरे धीरे सीने पर आकर टिक जाती है । प्लैट्स इस क्रिया को अधो+गमन कहते हैं । अधोगमन से औंघ और फिर ऊँघ यह क्रम उनके कोश में मिलता है । अधोगमन में सिर के नीचे आने का भाव बहुत ज्यादा स्पष्ट नही है बल्कि यह सामान्य अर्थों में नीचे की ओर गति है । इसकी तुलना में हिन्दी शब्दसागर में ऊँघ की व्युत्पत्ति संस्कृत के अवाङ् से बताते हैं । अमरकोश में यह शब्द मिलता है जिसका अर्थ है- अधोमुख । यह अर्थ ऊँघ के आशय को स्पष्ट करता है । इसका प्राकृत रूप अघई है । मुझे लगता है कि अ-ई मिलकर बनते हैं और ङ् की नासिक्य ध्वनि को मिलती है । इस तरह हमारे हाथ ऊँघ लगता है । यह व्युत्पत्ति कही अधिक तार्किक लगती है ।

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Saturday, February 4, 2012

कृपया हमें वापरें…व्यापार करें…

business

विदेशी ही नहीं, क्षेत्रीय बोलियों के शब्दों की आवाजाही भी हिन्दी में होती रहती है । मध्यप्रदेश और उससे सटते राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों की हिन्दी में इस्तेमाल करने, प्रयोग करने के अर्थ में वापरना क्रिया का प्रचलन है । सभी हिन्दीभाषी चाहे इसका प्रयोग न करते हों, पर समूचा हिन्दी क्षेत्र इस शब्द से परिचित है। इसके विविध रूप चलन में हैं जैसे वापर, वापरना, वापरें, वापरिए आदि । हिन्दी के शब्दकोशों में इसका शुमार नहीं है क्योंकि यह गैर-हिन्दी शब्द है और बरास्ता मराठी, यह हिन्दी में दाखिल हुआ है । हिन्दी का वापरना दरअसल मराठी क्रिया वापरणे का प्रतिरूप है । मराठी में वापर और वापरणे का अर्थ है उपयोग, इस्तेमाल । इसमे व्यवस्था-प्रबन्ध करने जैसे भाव भी हैं अर्थात किसी वस्तु या व्यक्ति को ( अपने लाभ के लिए ) उसकी समूची क्षमता और उपयोगिता के साथ काम में लेना । पूंजीवादी व्यवस्था में उपयोग शब्द की यह व्यापक व्याख्या है । व्यापार एक विशिष्ट व्यवस्था है जिसमें मूलतः वस्तुओं की ख़रीद-फ़रोख़्त या मानव श्रम से संचालित सेवाओं के बदले लाभार्जन किया जाता है । इस व्यापार में वस्तु से लेकर व्यक्ति तक का इस्तेमाल होता है । गौर करें, आज के उपभोक्तावादी समाज में सुबह से शाम तक बाज़ार की विनम्र ताकतें हमसे कुछ न कुछ वापरने का आग्रह ही तो करती हैं । वैसे भी आवश्यकता, आविष्कार की जननि है और इस आवश्यकता की अगली कड़ी ही इस्तेमाल है । वापरना शब्द के मूल में यही व्यापार है।
राठी की वापरणे क्रिया से वापरना शब्द बना है । इसके मूल में है वापर शब्द जिसका मूलार्थ है काम, धन्धा, उपयोग । संस्कृत के व्यापार शब्द का रूपान्तर है वापर से जिसके मूल में है संस्कृत की पृ धातु । मोटे तौर पर देखें तो पृ धातु के साथ व्या उपसर्ग लगने से बनता है व्यापार शब्द । व्या संस्कृत हिन्दी का बहुप्रचलित उपसर्ग है और इससे कई शब्द बने हैं मसलन व्याकरण या व्यामोह । हिन्दी में व्यापार शब्द का खूब प्रयोग होता है और इस शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है । हिन्दी-मराठी के सभी कोशों में व्यापार की व्युत्पत्ति वि+आ+पृ बताई गई है । इसका विग्रह करने पर वि-आ-प-रि हाथ लगते हैं । से का लोप होकर सिर्फ व्यंजन बचता है । में स्वर जुड़ता है । वि-आ संयुक्त होकर व्या बनते हैं और इस तरह व्यापार शब्द बनता है । आप्टे कोश के मुताबिक व्यापार का अर्थ है नियोजन, संलग्नता, धन्धा या व्यवसाय । ये सभी क्रियाएँ मूलतः कर्म से जुड़ी हैं । उद्यमशीलता, उद्योग, प्रयत्न जैसी बातें व्यापार को अर्थविस्तार देती हैं और इनसे ही व्यापार के वर्तमान मायने स्थिर हुए हैं । लोगों को काम पर लगाने, उनका उपयोग कर लेने, किसी भी चीज़ को बेच लेने, किसी भी तरह से लाभ कमा लेने की उद्यमशीलता जिस व्यक्ति में हो , वह व्यापारी कहलाता है ।
व्यापार में मूल में जो पृ धातु है उसके मूल में सक्रियता का भाव है । किसी को काम पर लगाना या काम सौंपना, काम नियत करना, निर्देश देना आदि बातें भी इसके दायरे में आती हैं । पृ में गति का भाव है सो इसका अर्थ आगे ले जाना, उन्नति करना, प्रगति करना भी है । आगे बढ़ने के भाव का ही विस्तार होता है संस्कृत हिन्दी के पार शब्द के रूप में । पार यानी किसी विशाल क्षेत्र का दूसरा छोर । यह क्षेत्र ज़मीन का विस्तार, जंगल का विस्तार, जल का विस्तार, पर्वत का विस्तार भी हो सकता है और समस्या, मानसिक स्थिति और विचार का विस्तार भी । कुल मिला कर इस विस्तार के दूसरे छोर की बात ही पार का आशय है । वैसे पार का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ नदी का दूसरा किनारा ही होता है । पार शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दों में है । इसका मुहावरेदार प्रयोग होता है जैसे पार पाना यानी किसी बात का हल हो जाना, उसे सुलझा लेना, उससे हो कर गुज़रने लायक स्थिति बनना । अन्त तक पहुँच जाना आदि ।
र-पार को देखिए जिसमें मोटे तौर पर तो इस छोर से उस छोर तक का भाव है, मगर इससे किसी ठोस वस्तु को भेदते हुए निकल जाने की भावाभिव्यक्ति भी होती है । आर-पार में पारदर्शिता का भाव भी है यानी सिर्फ़ भौतिक नहीं, आध्यात्मिक, मानसिक भी । वह एकदम आर-पार है का अर्थ ही है कि वह मनुष्य साफ़ दिल है । पारावार शब्द भी इसी पार से निकला है जिसमें ओर-छोर की बात है अर्थात दोनो सिरों की बात । नदी का यह तट और वह तट । वार बना है वारः है जिसका जन्म उसी वृ धातु से हुआ है जिसमें आवृत्ति का भाव है और जिससे सप्ताह का एक दिन ( सोमवार, मंगलवार आदि ), आवरण, वृत्त, वर्तन जैसे शब्द बने हैं । ज़ाहिर है वारः का अर्थ भी आवृत्ति पर आधारित है अर्थात नदी का दूसरा किनारा । अब यह सापेक्ष है कि इस किनारे पर हैं तो सामने पार है और जहाँ खड़े हैं वह वार है । बारम्बार के मूल में भी यही वार है । सो, पारावार और वारापार दोनों शब्दों का अर्थ है इस पार से उस पार तक । खुशी का पारावार न था यानी असीम प्रसन्नता का भाव....इस पार से उस पार तक ।
वापर, व्यापार और पारावार तक के इस सफ़र में क्रियाशीलता का महत्व है चाहे वापरने के अर्थ में उसका इस्तेमाल करने, उपयोग में लेने की क्रिया हो या व्यापार के आशय वाली आर्थिक गतिविधि हो अथवा पार जाने से सम्बन्धित साहसपूर्ण यात्रा या अभियान हो । इस दुनिया का आज जो भी स्वरूप है विकास की इन्ही तीन प्रकृतियों से गुज़र कर ही निर्मित हुआ है । व्यापार यानी संसाधनों का उपयोग करना, गतिशील होना, व्यापार यानी दूर तक, आखिरी छोर तक अपनी इच्छाशक्ति को पहुँचने देना और व्यापार यानी उस छोर तक पहुँच कर फिर इस छोर पर विजित मुद्रा में लौटने की जिजीविषा दिखाना । आखिर यह व्यापार शब्द इतना बुरा भी नहीं है !

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