Friday, March 30, 2012

ठठेरा और उड़नतश्तरी

thatheraसम्बन्धित आलेख-1.हाथों की कुशलता यानी दक्षता.2.दक्षिणापथ की प्रदक्षिणा.3.टैक्सी की तकनीक, टैक्स की दक्षता.4.बेपेंदी का लोटा और लोटा-परेड.5. भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना.6.बालटी किसकी ? हिन्दी या पुर्तगाली की .7.नांद, गगरी और बटलोई.8 मर्तबान यानी अचार और मिट्टी.9.पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…

ड़नतश्तरी इनसान की बेहद दिलचस्प कल्पना है । ख्याली दुनिया में पैदा होकर असली दुनिया में देखी जाती है । एक ऐसी गोल, चपटी, पोली मगर विशाल उड़ने वाली वस्तु जिसमें दूसरी दुनिया के लोग बैठ कर आते हैं । जिसे लेकर ईश्वर की ही तरह दुनिया दो ख़ेमों में बँटी नज़र आती है । या तो उड़नतश्तरी होती है , या फिर नहीं होती । जिसे देखने का दावा भी बिरलों ने ही किया है ।  साइंसदाँ इसे यूएफ़ओ कहते हैं , यानी अनआइडेंटीफ़ाईग फ्लाइंग ऑब्जेक्ट अर्थात उड़ने वाली अनजान सी चीज़ । हिन्दी में इसके लिए बेहद ख़ूबसूरत सा शब्द उड़नतश्तरी बनाया गया । हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि यह आलेख उड़नतश्तरी पर नहीं है । यह सिर्फ़ तश्तरी जिसमें हम खाना खाते हैं और ठठेरा, जो इसे बनाता है , पर है । अलबत्ता खाना पसंद न आने पर हम इस तश्तरी को हवा में उछाल देते हैं तब शायद यह उड़नतश्तरी कहला सकती है, मगर व्यंग्य लेखकों के लिए ही । तश्तरी फ़ारसी मूल का शब्द है और थाली के अर्थ में हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है । तश्तरी का रिश्ता ठठेरे से है यह कहने में कुछ नया नहीं है क्योंकि बर्तन बनाने वाले को ठठेरा कहते हैं । तश्तरी एक बर्तन है । दरअसल ठठेरा और तश्तरी एक ही मूल से जन्में शब्द हैं ।
प्राचीन भारत की कर्मप्रधान व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई कर्मकार की थी अर्थात ऐसे कुशल श्रमिक जो दैनन्दिन उपयोग का विभिन्न सामान बनाने में सिद्धहस्त थे । यह हुनर दस्तकारी कहलाता था और इन श्रमिकों को दस्तकार कहते थे । बाद में कर्मकार या दस्तकारों की जातियाँ उभर आईं । गहनों का काम करने वाले, मूलतः स्वर्णाभूषण बनाने वाले स्वर्णकार ( स्वर्णकार > सोनार > सुनार ) मिट्टी का सामान या मूलतः मटका यानी कुम्भ बनाने वाले कुम्भकार (कुम्भकार > कुम्भार > कुम्हार ) लौहकर्म करने वाले लुहार ( लौहकार > लौहार > लुहार), कांस्यकर्म करने वाले कसेरे ( काँस्यकार > कंसार > कसेरा) कहलाए । पुराने ज़माने में बर्तन काँसे के बनते थे । कसेरों के लिए ही ठठेरा शब्द भी प्रचलित हुआ । आमतौर पर समझा जाता है कि ठठेरा शब्द ध्वनिअनुकरण से उपजा शब्द है क्योंकि धातु के बर्तन बनाने के लिए उसे ठोकना-पीटना पड़ता है । ठक-ठक, ठन-ठन ध्वनि से इसका रिश्ता जोड़ते हुए ठठेरा में ध्वनिअनुकरण की प्रवृत्ति नज़र आना सहज है । मगर ऐसा नहीं है । ठठेरा का रिश्ता दस्तकारी से है । सबसे पहले जानते हैं ठठेरा में छुपे हस्तकौशल को ।
संस्कृत में हाथ के लिए हस्त शब्द है। बरास्ता अवेस्ता, इसका फ़ारसी रूप होता है दस्त । डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार पूर्ववैदिक किसी मूल मूल भाषा में इन दोनों का रूप था धस्त । अवेस्ता में धस्त से का लोप होकर दस्त शेष रहा और संस्कृत में ‘द’ का लोप होकर हस्तः बचा । धस् में शामिल दस् से संस्कृत की दक्ष् धातु सामने आई। इससे बने दक्ष का अर्थ है कुशल, चतुर, सक्षम या योग्य । इसमें उपयुक्तता या खबरदारी और चुस्ती का भाव भी है । इससे जो बात उभरती है वह है जो हाथों से काम करने में कुशल हो, वह दक्ष । दक्ष की व्याप्ति भारोपीय भाषा परिवार में भी है । भाषा विज्ञानियों नें इंडो-यूरोपीय परिवार में दक्ष् से संबंधित - dek धातु तलाश की है जिसका अर्थ भी शिक्षा, ज्ञान से जुड़ता है । डॉक्टर शब्द इसी कड़ी का है ।
क्ष का अगला रूप तक्ष बनता है । तक्ष का ही एक अन्य रूप त्वक्ष भी होता है । संस्कृत में बढ़ई को तक्षन् या तक्षक भी कहा जाता है । तक्षक यानी किसी भी कार्य का सूत्रधार, देवताओं का वास्तुकार । तक्ष् की व्याप्ति पूर्व वैदिक भाषाओं में भी थी और इसीलिए यह अवेस्ता में भी था । संस्कृत में क्ष का रूपान्तर में होता है । ग्रीक में तैख़्ने इसी मूल से आया है जिससे अंग्रेजी के टेकनीक, टैक्नीशियन जैसे शब्द बने । तक्ष / त्वक्ष का तख़्त में बदलाव सहज है । खास बात यह कि लकड़ी के काटे और तराशे जा चुके सुडौल टुकड़े के लिए फ़ारसी में तख़्तः शब्द बना है जिसे हिन्दी में तखता या तखती कहते हैं । बाद में लकड़ी से बनी चौकी, पलंग और बादशाह के आसन के अर्थ में फारसी उर्दू में तख़्त शब्द चल पड़ा । गौरतलब है कि दक्ष, तक्ष से जुड़े सभी शब्दों में काम करना प्रमुख है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है हाथों का प्रयोग । दक्ष में दाहिने हाथ का भाव निहित है। दिशा के लिए दक्षिण शब्द इसी मूल का है । ज़ाहिर है बाँए की तुलना में दायाँ हाथ अधिक कुशल होता है सो कुशल के अर्थ में दक्ष शब्द रूढ़ हो गया । दक्ष का अगला रूप तक्ष हुआ जिसमें कुशल कारीगर, कलाकार की अर्थवत्ता निहित है ।
जिस तरह वैदिक तक्ष से बरास्ता अवेस्ता तख्त बनता है उसी तरह वैदिक तक्ष का एक रूप तष्ट भी बनता है । संस्कृत में तष्ट में वही सारी क्रियाएँ समाहित हैं जो दस्तकारी के पारम्परिक कर्म हैं अर्थात छाँटना, विशेष प्रकार की आकृति प्रदान करना बनाना, कुल्हाडी से काटना, काट कर बनाना, काटना , गढ़ना, चीरना, ठीक करना, तैयार करना, रूप देना, ढालना आदि । जॉन प्लैट्स के मुताबिक इस तष्ट का ही जेन्दावेस्ता में तस्त रूप हुआ और फिर पहलवी में इसने तश्त रूप अख्तियार किया जिसमें परात, थाली, कटोरा, बॉऊल, चषक, प्याला, कप, सॉसर जैसे भाव थे । तश्त से ही फ़ारसी में तश्तरी शब्द तैयार हुआ जिसका अर्थ था चौड़े मुँह वाला कोई बर्तन, परात या थाली जिसमें रोटियाँ रखी जा सकें, आटा गूँथा जा सके और खाना खाया जा सके । तश्त का ही एक रूप तसला हुआ । तश्त का तस्स, का लोप और उसमें ला प्रत्यय लगने से तसला बना । बड़ी थाली, थाल या परात को भी तसला कहते हैं । “हिन्दी भाषा की संरचना” पुस्तक में डॉ भोलानाथ तिवारी तिवारी लिखते हैं कि तष्ट का जेंद रूप तस्त हुआ उसी तरह इसका प्राकृत रूप टट्ठ या ठट्ठ बनता है । गौरतलब है कि थाली के लिए मराठी में ताट, ताटली, अवधी, भोजपुरी में टाठी शब्द इसी तष्ट-त्वष्ट के प्राकृत रूप टट्ठ के रूपान्तर हैं । समझा जा सकता है कि आकार देना, तराशना, सजाना, गढ़ना, तैयार करना जैसे अर्थों में हिन्दी का ठठेरा भी इसी टट्ठ / ठट्ठ से विकसित हुआ है न कि ध्वनि अनुकरण की प्रक्रिया से क्योंकि ठक-ठक, ठन-ठन जैसी ध्वनियाँ और भी कई नियमित क्रियाओं का संकेत हो सकती हैं । ठठेरा वह जो ताट, ताटली या टाठी बनाए । बर्तन बनाए ।  धस् -दक्ष -तक्ष -त्वक्ष - तष्ट -त्वष्ट - टट्ठ - ठट्ठ जैसे रूपों से साबित होता है कि इस शब्द का रिश्ता दस्तकारी से से है और ठठेरा मूलतः दस्तकार है ।
कुछ कोशों में ठठेरा का सम्बन्ध स्थ धातु से बताया गया है, जो ठीक नहीं है अलबत्ता हिन्दी के थाली शब्द की व्युत्पत्ति ज़रूर स्थ से हुई है । स्थ से संस्कृत का स्थालिका बनता है । प्राचीनकाल में यह रोजमर्रा के इस्तेमाल का बर्तन होता था जो मिट्टी की बटलोई या तवे के आकार का होता था जिसमें अन्न पकाया जाता था या रखा जाता था । आज हम स्टील, पीतल, कांच या चीनीमिट्टी की जिन प्लेटों में खाना खाते हैं उसे हिन्दी में थाली कहते हैं, वह इसी स्थालिका की वारिस है । बड़ी थाली के लिए थाल शब्द प्रचलित है। दिलचस्प यह कि सम्पदा का रिश्ता थैली से ही नहीं थाली से भी है। अन्न वैसे भी समृद्धि अर्थात लक्ष्मी का प्रतीक है । प्राचीनकाल से ही थाली को भारत में सर्विंग - ट्रे का दर्जा मिला हुआ है । प्राचीन काल में राजाओं श्रीमंतों के यहाँ थाली या थालों में आभूषण प्रस्तुत किए जाते थे । इनाम-इकराम के लिए मुग़लों के ज़माने में भी थालियाँ चलती थीं । आज भी शादी ब्याह में नेग और पूजा की सामग्री थाली में ही सजाई जाती है। थाली का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि यह मेहमाननवाजी का ऐसा पर्याय बनी कि एक थाली में खाना जैसा मुहावरा अटूट लगाव का प्रतीक बना वहीं विश्वासघात के प्रतीक के तौर पर “जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना” जैसा मुहावरा भी बरसों से उलाहना के तौर पर जनमानस में पैठा हुआ है ।

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Thursday, March 29, 2012

हजम, हाजमा और हैजा

र्मियों की सामान्य बीमारी हैजा है । इसे कालरा भी कहा जाता है जो बैक्टीरिया जनित रोग है । Cholera
भू ख मिटाना मनुष्य की आदिम चिन्ता रही है । उसका आहार चाहे आग पर पका हो या न पका हो, मगर पेट की आग मिटाने के लिए, उदरपूर्ति यानी पेट भरना ज़रूरी है । गौर करें कि पेट भरना भी मुहावरा है । इसमें कलेवा, ब्यालू, जेवनार, ब्रेकफ़ास्ट, लंच, डिनर, सपर, ठण्डा, मीठा, छप्पनभोग, रूखा, सूखा, तर, शाकाहार, मांसाहार, सादा, तामसिक, कच्चा, पक्का, लवणीय, अलवणीय, शुद्ध, अशुद्ध जैसा कोई भेद नहीं है । ‘पेट भरना’ यानी पेट की आग को शान्त करने के लिए उसमें कुछ न कुछ डालना ज़रूरी है । यानी भूख मिटाने के लिए कुछ भी खा लेना मनुष्य का आदिम स्वभाव रहा है । भोजन के सम्बन्ध में उपरोक्त भेद तो सभ्यता के विकास के साथ साथ सामने आए मगर उदरपूर्ति के विभिन्न आयामों से हमारे समाज-व्यवहार के सन्दर्भ में कई कहावतें और मुहावरे सामने आए हैं । उदरपूर्ति के लिए पेट में कुछ भी भर लेना अलग बात है और उसका पचना अलग बात है । कई लोगों में ऐसी कूवत होती है कि जो चाहें हजम कर जाएँ । ‘पचाना’ या ‘हजम होना’ जैसे मुहावरे इसी कड़ी में आते हैं जिनमें किसी अन्य व्यक्ति का माल हड़पना का जैसा भाव है जैसे उसने सारा माल पचा लिया या सब कुछ हजम कर लिया
हिन्दी में पचाने के सन्दर्भ में हजम शब्द का प्रयोग बेहद आम है । मूलतः यह अरबी भाषा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में फ़ारसी के ज़रिए आया है । इसका शुद्ध अरबी रूप हस्ज़्म है और यह हिन्दी में हज़्म के रूप में नज़र आता है । हजम करना का अर्थ जहाँ खाई हुई चीज़ का बहुत अच्छी तरह पाचन हो जाना है वहीं उसमें किसी की वस्तु हड़पना, अमानत में ख़यानत करना, ग़बन करना जैसे भाव भी हैं । हजम की कड़ी में ही आता है हाजमा जिसका अर्थ है पाचनशक्ति या पाचनक्रिया । हाजमा खराब होना का सीधा अर्थ है, पेट में गड़बड़ी होना यानी पाचन ठीक से न होना , मगर किसी तथ्य या बात को गोपनीय न रख पाने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है जैसे- “उसे कुछ मत बताना, उसका हाज़मा ख़राब है ।” इसका अर्थ हुआ उसके पेट में बात नहीं पचती । पेट में बात न पचना भी प्रसिद्ध मुहावरा है ।
र्मियों में होने वाली एक सामान्य बीमारी हैजा है । चिकित्सा भाषा में इसे कालरा कहा जाता है । यह एक बैक्टीरिया जनित रोग है । आयुर्वेद के अनुसार सर्दियों के मौसम में पाचन क्षमता बेहतर रहती है जबकि गर्मियों में यह कम हो जाती है । इसीलिए गर्मी के मौसम में पेट सम्बन्धी रोग बढ़ने लगते हैं । हैजा अरबी शब्द है और हैज़ह धातु से बना है जिसका अर्थ है अपच । आन्ड्रास रज़्की के अरबी कोश के मुताबिक इसका शुद्ध अरबी रूप हैस्ज़्जा है । इसका हिन्दीकरण बतौर हैजा हुआ । यह भी हस्ज़्म और हस्ज्ज में सिर्फ़ ज़ और का अन्तर है । इन दोनों शब्दों में निकट सम्बन्ध है और इनका व्युत्पत्तिक आधार भी समान है । हिन्दी शब्दसागर में हैजा की प्रविष्टि में उल्टी, दस्त की बीमारी के साथ इसका अर्थ युद्ध अथवा जंग भी बताया गया है । हालाँकि मद्दाह का हिन्दी-उर्दू कोश और रज़्की के अरबी कोश देखने के बाद शब्दसागर की प्रविष्टि त्रुटिपूर्ण लगती है । मद्धाह और रज़्की दोनों के कोश में युद्ध अथवा जंग के संदर्भ में हजा अथवा हजामा जैसे शब्द हैं । हजा और हजामा की  हैजा और हजम से ध्वन्यात्मक समानता ज़रूर है पर इनमें व्युत्पत्तिक रिश्तेदारी नहीं है ।
स सन्दर्भ में हाजत को भी याद कर लिया जाए । उर्दू में हाजत आना या हाजत जाना का अर्थ दीर्घशंका या टॉयलेट जाने के अर्थ में प्रयुक्त होता है । शुद्ध रूप में यह हाजत रफ़ा करना है । हाजत भी अरबी भाषा का शब्द है जो सेमिटिक धातु हाजा से बना है जिसमें आवश्यकता, ज़रूरत, प्रार्थना जैसे भाव हैं । हिन्दी में जिस तरह शंका निवारण पद बनाया गया उसी तरह अरबी में हाज़त रफ़ा करना पद है । दोनों में समान भाव है । यूँ हाज़त शब्द का प्रयोग ‘हाज़तमन्द’ यानी इच्छुक, अभिलाषी, ‘हाजतरवाँ’ यानी इच्छापूर्ति करनेवाला, ‘हाजत में रखना’ का एक अर्थ हिरासत या हवालात मे रहना भी होता है ।

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Monday, March 26, 2012

हाईफ़ाई लोग, हाईफ़ाई बातें

Inspector

वि भिन्न समाजों की संस्कृति, तौरतरीकों और आदतों का प्रभाव भी भाषा पर पड़ता है जिससे शब्दों की अर्थवत्ता बदलती चलती है। कई बार यह बदलाव हास्यास्पद होता है मगर भाषा तो समृद्ध होती ही है। चमक-दमक भरी ज़िंदगी अथवा बढ़िया, अच्छा, बेहतरीन, सुन्दर जैसे भावों को अभिव्यक्त करने के लिए बोली-भाषा में ‘झकास’, ‘चकाचक’, ‘झकाझक’ जैसे शब्द प्रचलित हैं । आजकल हाईफ़ाई शब्द इनकी तुलना में ज्यादा चलन में है । हाईफ़ाई के साथ ख़ास बात यह कि इसमें शानदार, उच्च गुणवत्ता के साथ-साथ आधुनिकतम तकनीकी खूबियों का भाव भी समाहित है । इसका इस्तेमाल आम बोलचाल में इतना ज्यादा होने लगा है कि यह शब्द अपने मूल अर्थ से बहुत दूर निकल आया है
हाईफ़ाई शब्द दरअसल हाई फिडेलिटी का संक्षिप्त रूप है । high से hi और fidelity से fi लेकर हाईफ़ाई बना । फिडेलिटी शब्द में सच्चा, खरा, विश्वसनीय जैसे भाव हैं । एक तन्त्र के रूप हाई फिडेलिटी में उच्च गुणवत्ता का भाव स्थिर हुआ । फिडेलिटी शब्द के मूल में लैटिन का fidelis शब्द है जिसमें भरोसेमंद, विश्वसनीय जैसे भाव हैं । भाषा विज्ञानी इसके मूल में भारोपीय धातु *bheidh- देखते हैं जिससे भरोसा, विश्वास के अर्थ वाला अंग्रेजी का फैथ / फेथ शब्द भी बना है । इसी मूल का है एफिडेविट यानी शपथपत्र जो किसी को भरोसा दिलाने वाला दस्तावेज ही है । शपथ इसीलिए ली जात है ताकि विश्वास अर्जित किया जा सके । फेथ या एफ़िडेविट जैसे शब्द हिन्दी में भी खूब चलते हैं ।
मूल रूप से हाईफ़ाई भौतिक विज्ञान का शब्द है और म्युज़िक सिस्टम की उच्चस्तरीय गुणवत्ता के सन्दर्भ में यह शब्द आज से क़रीब पैंसठ बरस पहले सामने आया । सत्तर के दशक में हाईफ़ाई टैग वाले म्यूज़िक सिस्टम भारतीय बाज़ार में भी दिखने लगे थे और तभी इस शब्द की घुसपैठ भी हिन्दी समेत भारतीय भाषाओं में होने लगी । हिन्दी में अस्सी के दशक में हाईफ़ाई शब्द ने मुहावरे का रूप ले लिया । हुआ यह कि हाईफ़ाई म्युज़िक सिस्टम जैसी टर्म से सबसे पहले म्युज़िक शब्द का लोप हुआ । जो बचा, वह था हाईफ़ाई सिस्टम और इसका इस्तेमाल आधुनिक जीवन शैली की उन तमाम तकीनीकों-सुविधाओं के सन्दर्भ में होने लगा जिससे विलासिता, आधुनिकता और ऐश्वर्यपूर्ण जीवशैली की अभिव्यक्ति होती है । उससे भी आगे जाकर हाईफ़ाई की अर्थवत्ता और व्यापक हुई और वस्तुओ से लेकर व्यक्ति तक, बातचीत से लेकर विचार तक, शिक्षा से लेकर राजनीति तक और मुल्क से लेकर शहर तक के लिए हाईफ़ाई शब्द का प्रयोग होने लगा । हाईफ़ाई की तरह ही वाईफ़ाई शब्द भी है जो वायरलैस फिडेलिटी का संक्षिप्त रूप है । इस शब्द का इस्तेमाल अन्य रूपों में होने की सम्भावना इसलिए नहीं है क्योंकि वाईफ़ाई तकनीक अपने आप में हाईफ़ाई यानी अत्याधुनिक है इसलिए हाईफ़ाई का हिन्दी में बोलबाला बना रहेगा ।
सा ही एक शब्द है बाथरूम । भारतीय परम्परा में आमतौर पर स्नानागार और शौचालय अलग अलग होते हैं। शौचालय चाहे निर्मल और शुद्ध होने का स्थान हो पर उसमें स्नानगृह का भाव नहीं है। ज्यादातर भारतीय अटैच्ड लैटबाथ पसंद नहीं करते। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में यह प्रवृत्ति अधिक है। यह दिलचस्प है कि भारतीय स्त्री-पुरुष लघुशंका के लिए स्नानागार का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी तर्ज पर स्नानागार के लिए हिन्दी में बाथरूम इतना प्रचलित हो चुका है कि कोई दूसरा शब्द नहीं सूझता। देश के मध्यवर्ग में लघुशंका के अर्थ में बाथरूम शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। खासतौर पर महिलाएँ इस शब्द का प्रयोग अधिक करती हैं। दीर्घशंका की तरह अब बाथरूम भी ‘आती’ है और बाथरूम ‘किया’ भी जाता है अर्थात बाथरूम पदार्थ भी है।

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Friday, March 23, 2012

गुमशुदा और च्यवनप्राश

memory-loss[2]
गु मना, खोना, लापता होना जैसी सामान्य घटनाएँ हमारे इर्द-गिर्द रोज़ होती हैं । ज़िन्दगी की जद्दोजहद में हम इस क़दर व्यस्त रहते हैं कि कई लोग हमें गुमशुदा समझने लगते हैं और कई चीज़ें हम गुमा बैठते हैं । इन्सानी फ़ितरत भी अजीब होती है । दरअसल चीज़ें कहीं गुमती नहीं, हम ही उन्हें कहीं रख कर भूल जाया करते हैं और फिर उन्हें तलाशते हुए यह कहते पाए जाते हैं कि पता नहीं, कहाँ चली गईँ ! । बेजान वस्तुएँ भी कहीं चलती हैं जो कहीँ जा सकें ! दरअसल वे हमारी याददाश्त से चली जाती हैं और हम उन्हें गुम समझते हैं । यक़ीनन वे वहीं होती हैं जहाँ हमने उन्हें रखा होता है । फिर कभी अचानक हम कह उठते हैं “मिल गई, मिल गई” । दिलचस्प ये कि मिलना तो गुमी हुई याददाश्त का है, पर इज़हारे-खुशी चीज़ को फिर पाने की होती है । अक्सर ऐसे लोगों को भुलक्कड़ कहा जाता है और उन्हें च्यवनप्राश खाने की सलाह दी जाती है । ये तमाम बातें सिर्फ़ बेजान चीज़ों के बारे में सही हैं वर्ना मासूम बच्चा सचमुच कहीं चला जाता है । उसे गुमशुदा कहते हैं । कोई जानबूझकर हमारी ज़िंदगी से दूर चला जाता है, वह हमारे लिए लापता होता है । विडम्बना यह भी है कि कुछ चीज़ों को सचमुच हम खुद से दूर कर देते हैं, ग़ायब कर देते हैं, लापता हो जाने देते हैं और दुनिया पर ज़ाहिर करते हैं कि दरअसल वे गुमशुदा हैं ।

गुमशुदा का मतलब है जो हमसे दूर चला गया हो । जिसका कुछ पता न हो । गुमशुदा शब्द हिन्दी में बरास्ता फ़ारसी आया है और इंडो-ईरानी मूल का है । यह बना है गुम में शुदा [गुम+शुदा] परसर्ग लगने से । फ़ारसी के शुदा परसर्ग से कई शब्द बने हैं जो हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे शादीशुदा, तलाक़शुदा या गुमशुदा । ‘शुदा’ का अर्थ है, हो जाना या हो चुकना  । मूलतः इसमें होने का भाव है । गुमशुदा का अर्थ हुआ ‘गुम’ [गायब] ‘शुदा’ [हो जाना] अर्थात जो गायब हो चुका हो । फ़ारसी का ‘शुदा’ प्रत्यय अवेस्ता के ‘शुता’ का रूपान्तर है । ‘शुदा’ का सम्बन्ध वैदिक च्युत् से है जिसमें गति करना, हलचल होना, हिलाना-डुलाना, नीचे आना,  हटाना, जाना जैसे भाव हैं । च्युत बना है च्यु धातु से जिसमें   नीचे आना, गिरना, टपकना, झरना, पतन, हटाना जैसे भाव हैं । च्युत शब्द का प्रयोग हिन्दी में भी परसर्ग की तरह होता है । इससे बने कुछ शब्दों पर गौर करें- पदच्युत, धर्मच्युत, समाजच्युत, जातिच्युत  आदि । इन सभी में अपने मूल स्थान से हटने, हिलने-डुलने या पतन का भाव है । च्युत का अवेस्तन रूप शुता हुआ जो फ़ारसी में शुदा बना ।
च्युत से एक संज्ञानाम बनता है अच्युत [+च्युत] जिसका अर्थ है अडिग, स्थिर , अटल, अविनाशी, अमर आदि । ये सभी मायने परम शक्तिशाली से जुड़ते हैं । पुराणों में विष्णु और कृष्ण को भी अच्युत कहा गया है । अग्नि के लिए भी ‘अच्युत’ संज्ञा का हवाला मिलता है । च्युत शब्द सम्बन्ध संस्कृत की च्यु क्रिया से है जिसमें गिरने, टपकने, बहने, मंद होने, टपकने, क्षीण होना, चले जाने जैसे भाव हैं । किसी जलाशय के रिसाव को बोली भाषा में कहते हैं कि पानी ‘चू’ रहा है । पानी ‘चूना’, ‘चुअन’ या ‘चुआना’ जैसे क्रियारूप भी बनते है । यह जो ‘चू’ है वह ‘च्यु’ से ही आ रहा है । अवेस्ता में च्यु का रूप शु होता है । च्युत का शुदा के में बदलता स्पष्ट दिख रहा है । गुमशुदा की च्यवनप्राश से भी रिश्तेदारी है । जी हाँ, वही च्यवनप्राश जो अक्षय यौवन के लिए प्राचीनकाल से हमारे ऋषि-मुनि करते रहे हैं । अक्षय यौवन अर्थात वृद्धावस्था को दूर रखना । बुढ़ापे के प्रमुख लक्षणों में स्मरणशक्ति क्षीण होना भी है । च्यवनप्राश से स्मरणशक्ति भी तेज़ होती है । च्यवन शब्द की व्युत्पत्ति भी च्यु धातु से हुई है जिससे च्युत और शुदा बने हैं । हालाँकि च्यवन शब्द में स्मरण या याददाश्त की अर्थवत्ता नहीं है ।
च्यवनप्राश नाम की स्मृतिवर्धक दवा का नाम तो च्यवन ऋषि के नाम पर प्रचलित हुआ जिन्हें पुनः यौवन प्रदान करने के लिए अश्वनीकुमारों नें एक विशेष औषधि बनाई थी । बाद में औषधि च्यवनऋषि के नाम से ही प्रसिद्ध हुई । च्यु धातु में निहित च्यवन शब्द का अर्थ भी बहना, टपकना, क्षीण होना जैसे भाव हैं । च्यवन के पिता ऋषि भृगु और माता पुलोमा थी । कहानी है कि च्यवन जब अपनी माँ के गर्भ में थे तब किसी राक्षस ने ऋषिपत्नी पर कुदृष्टि डाली । भ्रूण रूप में च्यवन ऋषि ने अपने तेज से राक्षस को भस्म कर दिया । चूँकि ये अपनी माता के गर्भ से गिर पड़े थे इसलिए इन्हें च्यवन नाम मिला । च्यवन में भी वही भाव हैं जो च्यु में हैं अर्थात गिरना, झरना या टपकना । प्रतीकार्थ यह भी है कि बढ़ती उम्र में क्षीण होती काया, स्मरण शक्ति को जो प्राश ( खुराक) रोक दे, वह च्यवनप्राश है ।
गायब, लापता के अर्थ वाले गुम शब्द में जो खास बात है वह है किसी चीज़ का खो जाना,  उसका अता-पता न मिलना । मूल बात यह कि अता-पता इसलिए नहीं मिलता क्योंकि उस वस्तु के अस्तित्व की स्थिति या तो हमारी स्मृति से निकल जाती है या फिर सचमुच वह वस्तु कही और रख दी जाती है । कोई बात दिमाग़ से निकल गई या कोई वस्तु जगह से हट गई दोनो ही अवस्थाओं में स्थान परिवर्तन है, गति है । संस्कृत में जाने, चलने, गति करने, कहीं निकल जाने के के भाव गम् धातु में अभिव्यक्त होते हैं । गमन एक क्रिया है जिसका अर्थ है जाना । यह हिन्दी में भी प्रचलित है । किसी चीज़ के लापता हो जाने या गायब हो जाने के लिए फ़ारसी का गुम शब्द इसी गमन वाले गम् से सम्बन्धित है । अवेस्ता और पहल्वी में भी गम् का यही रूप सुरक्षित रहता है मगर फ़ारसी में इसका कायान्तरण गुम के रूप में हो जाता है और अर्थवत्ता में भी खो जाने, गायब हो जाने गुम हो जाने का भाव आ जाता है ।
गुम शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है । फ़ारसी का मुहावरा है अक़्ल गुमशुदन जिसका हिन्दी रूप है अक़्ल गुम होनागुमसुम शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता पर गौर करें । उदासी के भाव के साथ चुप बैठे व्यक्ति को “गुमसुम” कहा जाता है । चुप्पा तबीयत के आदमी को बोलीभाषा में गुम्मा कहा जाता है जैसे- “वो गुम्मा है, कुछ नहीं बताएगा ।” किसी को ग़लत सीख देने, रास्ते से भटकाने के सन्दर्भ में “गुमराह करना” भी हिन्दी में खूब प्रचलित है । गुमराह करने में सही रास्ता न दिखाने यानी उस रास्ते तक न पहुंचने देने या ज़रिये को गायब करने का भाव है जिससे किसी का मक़सद पूरा होता हो । अन्यमनस्कता या बेख़याली की स्थिति में अक्सर सुनने को मिलता है- “कहाँ गुम हो ?”
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Thursday, March 22, 2012

खाली हाथ खलासी

पिछली कड़ी-खुलासे का खुलासा

coupleहिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में ‘खाली’ का शुमार भी है जिसमें रिक्तता, शून्यता, रीतापन जैसे भाव हैं । जिसमें कुछ न हो, शून्य हो उस स्थान को खाली कहते हैं । ‘खाली’ शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता की वजह से इसमें अकेला, केवल, सिर्फ जैसे अर्थ भी विकसित हुए जैसे “वहाँ खाली एक आदमी था…” । यहाँ सिर्फ़ और अकेले का भाव साफ़ है । “खाली बैठना” हिन्दी का प्रसिद्ध मुहावरा है जिसका अर्थ है हाथ में कोई काम न होना । अलग अलग सन्दर्भों में बेकारी या निकम्मेपन का अभिप्राय इससे सिद्ध होता है । “खाली हाथ” जैसा सर्वमान्य मुहावरा भी इसी कड़ी में आता है । किसी प्रयोजन के लिए पास में मुद्रा, वस्तु या उपहार न होने की स्थिति में खाली हाथ मुहावरे का प्रयोग किया जाता है, जैसे-“बुलावा तो आया है पर ‘खाली हाथ’ जाना उचित नहीं समझता ।” मुम्बइया हिन्दी के प्रभाव में “खाली-पीली” जैसा मुहावरा भी युवा पीढ़ी ने अपना लिया है जिसमें व्यर्थ या फिज़ूल की बात करने का भाव है ।
खाली का रिश्ता सेमिटिक धातु kh-l-w से है जिसमें शून्यता, रिक्तता, अकेलापन, एकान्त, निर्जन, उजाड़, अलग-थलग जैसे भाव हैं । उर्दू-फ़ारसी शायरी में एकान्त के अर्थ में प्रयुक्त ‘खल्वत’ शब्द भी इसी मूल का है । ग़ालिब साहब लिखते हैं – “देखा असद को जल्वतो-खल्वत में बारहा । दीवाना गर नहीं तो हुशियार भी नहीं ।।” खल्वत यानी अकेले में, जल्वत यानी सबके बीच । इस्लामी दौर में खल्वतखाना, ख़ल्वतक़दा या खल्वतगाह भी होते थे जहाँ वो एकान्त चर्चा करते थे । ‘मजलिसे-खल्वत’ जैसी एक व्यवस्था भी थी । सम्भवतः यह कैबिनेट जैसी विशिष्ट सलाहकारों की समिति होती थी । मराठी में ‘खल्वत’ का रूप ‘खलबत’ हो जाता है जिसका अर्थ है एकान्त वार्ता । फ़ारसी का ‘खलेवतखाना’ मराठी में ‘खलबतखाना’ है । ‘खल्वत’ का ‘खिल्वत’ रूप भी मिलता है । ‘खाली’ में सिर्फ़ या अकेले का भाव भी है जैसे- “खाली एक आदमी आया” । एकाकी, एकान्तप्रिय व्यक्ति को इसीलिए ‘ख़लवतपसंद’ या ‘खलवतदोस्त’ कहा जाता है । चलताऊ तौर पर एकाकी व्यक्ति को ‘खल्वती’ भी कहा जाता है ।
रबी ज़बान में एक शब्द है ‘ख़ला’ जिसके मायने होते हैं अंतरिक्ष, आसमान, रिक्त स्थान, शून्य आदि। इसके अलावा एकाकीपन, एकान्त आदि भाव भी इसमें समाहित है। ‘खला’ रिश्तेदारी ‘खालीपन’ से है । ‘ख़ला’ में व्याप्त आसमान और अंतरिक्ष के भाव का विस्तार भी शामिल है अर्थात यह संसार या सभी कुछ जड़-जंगम दृष्टिगोचर इसमें आ जाते हैं। गौर करें ‘ख़ला’ मे निहित अंतरिक्ष वाले अर्थ पर । मूलतः यही अर्थ व्यापक है। अंतरिक्ष क्या है ? अंग्रेजी में इसे स्पेस कहते हैं यानी खाली जगह । ‘ख़ला’ से ही जुड़ा है अरबी, फारसी और उर्दू का ख़ाली शब्द जिसका अर्थ होता है रिक्त स्थान । अंतरिक्ष भी रिक्त स्थान ही है। दार्शनिक अर्थों में इसे शून्य भी कहा जाता है। अरबी शबद खला का एक रूप ‘खुलू’ भी है जिसका मतलब भी खाली होना, रिक्त होना है।
‘ख़ाली’, ‘खला’ की कड़ी में ही आता ‘खलास’ अर्थात रिक्त करना, मुक्त करना, छुटकारा, रिहाई वगैरह । हिन्दी में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मंडियों में एक शब्द अक्सर सुनाई पड़ता है वहा है ‘खलासी’ या ‘खल्लासी’ । आमतौर पर ये कामगारों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है जिसका मतलब होता है सामान उतारने वाला श्रमिक । खलासी पूरे भारत में प्रचलित शब्द है। ‘खलासी’ शब्द से जुड़े की शब्द आज हिन्दी–उर्दू में प्रचलित हैं जिनके दार्शनिक अर्थ और व्याख्याएं भी हैं। सफ़र के साथी लंदन निवासी राजेश प्रियदर्शी बताते हैं कि अरबी में सामान्य बातचीत के दौरान ‘खलास’ का प्रयोग अच्छा, ठीक, ओके की तरह होता है । हर वाक्य के अंत में लोग आईसी, ओके, राइट, फाइन की तरह ‘खलास’ का प्रयोग कहते हैं, कुछ इस तरह की ये बात तो साफ़ हो गई अब अगली बात ।
ब्दों का सफ़र में कुछ अर्सा पहले “अच्छा” शब्द पर लिखी पोस्ट का ध्यान कर लें । यहाँ ‘खलास’ के प्रयोग में भाव ग्रहण की वही प्रक्रिया है जो हिन्दी के ‘अच्छा’ में है । अच्छा का मूल ‘अच्छ’ है । ‘अच्छ’ में जो ‘छ’ है वह ‘छत’ अर्थात ‘छाया’ का प्रतीक है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अच्छ है। इसमें अ+‘च्छ’ है वह ‘छद्’ से आ रहा है। इस तरह ‘अच्छ’ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है । इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। इसी तरह सफर की एक अन्य साथी दुबई निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि ने हमें बताया कि खजूर की एक किस्म को भी खलास कहते हैं । ईरान में किसी प्रियजन के न होने पर भी खाली शब्द का इस्तेमाल होता है- “जा ए शोमा खाली "... “आपकी जगह खाली है” यानि उस व्यक्ति की कमी महसूस की जा रही है ।
प्राचीनकाल से ही अरब लोग सौदागरी में माहिर थे और सामुद्रिक व्यापार में खूब बढ़े-चढ़े थे । देश-विदेश के माल से लदे उनके जहाज़ बंदरगाहों पर आ टिकते और मज़दूरों का ख़ास तबका इन्हें ‘ख़ाली’ करने के काम में जुटता । जहाज़ को खाली करानेवाले ही ‘खलासी’ कहलाए। भारत में खलासी सामान्य मज़दूर भी कहलाता है और ट्रक को अनलोड कराने वाला श्रमिक भी । गोदी ( बंदरगाह ) पर काम करनेवाला श्रमिक भी खलासी कहलाता है और रेलवे के एक निम्न वर्ग में इसी पदनाम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती भी होती है । अब रिक्त कराने या खाली कराने के अर्थ मे तो खलास का अर्थ स्पष्ट हुआ मगर मुंबइया ज़बान में किसी को मारने , कत्ल करने जैसे अर्थ में भी खल्लास जैसा शब्द चलता है। गौर करें खलास में शामिल मुक्ति या छुटकारा दिलाने जैसे भाव पर । खल्लास यहां आकर कत्ल का अर्थ लेता है। ‘खलासी’ या ‘खलासी करना’ का अर्थ भी खाली करना है ।

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Monday, March 19, 2012

खुलासे का खुलासा

Squeeze

प्या ज के छिलके की तरह ही शब्दों पर भी न जाने कितनी परतें चढ़ी रहती हैं । हर परत पर उस शब्द के चरित्र को बताने वाला एक डीएनए कोड दर्ज़ रहता है । सारी परतें उतारे बिना उस शब्द की अर्थवत्ता की थाह मिलना नामुमकिन है । इसी तरह प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव का ब्योरा भी मन की अनेक परतों में दर्ज़ होता है । वक्त और जगह के साथ ही जिस तरह किसी व्यक्ति के बर्ताव में फ़र्क़ नज़र आने लगता है उसी तरह शब्दों के साथ भी होता है । ऐसा इसलिए होता है कि स्थान बदलने के साथ धीरे धीरे उस शब्द की विभिन्न अर्थछटाएँ प्रकट होती हैं यही बात इन्सानों के साथ भी होती है । तुर्कमेनिस्तान के नामालूम से सूबे फ़रग़ाना का एक नाकामयाब क़बाइली सरदार घोड़े पर ऐंड़ लगाते हुए निकल पड़ता है और हिन्दुकुश पर्वत पार करने के बाद एक के बाद एक कामयाबियाँ उसे मिलती जाती हैं और वह हिन्दुस्तान का बादशाह बन जाता है । लोग उसे बाबर के नाम से जानते हैं । दूरदराज़ से चल कर आए शब्दों के साथ भी यही होता है । अपनी मूल अर्थवत्ता से हट कर किसी शब्द के मायने दूसरी भाषा में जाने के बाद अक़्सर बदल जाते हैं । शब्दों का सफ़र में आज करते हैं ऐसे ही एक शब्द का खुलासा ।
रोजमर्रा की हिन्दी में खूब बोले जाने वाले शब्दों में खुलासा  khulasa शब्द का शुमार है । ‘खुलासा’ की आमद भी हिन्दी में फ़ारसी से हुई है मगर मूलतः यह अरबी ज़बान का शब्द है और इसका जन्म सेमिटिक धातु kh-l-s से हुआ है । ख-ल-स में शुद्ध, परिष्कृत, चमकदार, सार, खरा, सच्चा असली जैसे भाव हैं । इसी धातु से बना है ‘ख़ालिस’ khalis जिसका प्रयोग भी हिन्दी में खूब होता है । जिसमें किसी भी दूसरी चीज़ का मेल न हो, जो अपने शुद्धतम रूप में सम्मुख हो, एकदम खरी, शुद्ध या मिलावट रहित उस चीज़ के लिए ख़ालिस का प्रयोग किया जाता है । निर्मलता, निष्कपटता, मुक्त ( मिलावट से ), शुद्ध जैसे अर्थों में ख़ालिस का प्रयोग कई जगह होता है । अरबी मूल से आया सम्पत्ति अथवा धन के अर्थ वाला माल शब्द भारतीय भाषाओं में प्रचलित है । इस माल के असली होने के सन्दर्भ में खरा माल या खालिस माल जैसे शब्दों में खालिस शब्द को समझा जा सकता है ।
विद्वानों का मानना है कि सिख धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द खालसा khalsa  भी इसी मूल से निकला है । फैलन का कोश स्पष्ट करता है कि ‘खालसा’ का शुद्ध अरबी रूप ‘खालिसह्’ है मगर बोलीभाषा में इसका प्रचलित रूप ‘खालसा’ ही है । तीनसौ साल पहले गुरु गोविन्दसिंह ने खालसा पन्थ की स्थापना की थी । ‘खालिस’ में निहित तमाम अर्थ कुल मिला कर सत्य के ही अलग अलग नाम हैं । अल सईद एम बदावी  और एमए अब्देल हलीम अपनी कुरानिक डिक्शनरी में सेमिटिक धातु kh-l-s में उक्त सभी भावों के अलावा मित्रता, किसी के साथ चलना, किसी से जुड़ना जैसे भावों का खुलासा भी करते हैं । इसी तरह यह कोश खालिस में भी सत्य, शुद्ध, खरा के अलावा ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव बताता है । इसमें आत्मज्ञान की प्राप्ति या अपनी तलाश में दुनिया से खुद को दूर करने जैसा भाव भी है । सत्य एक है । वही सार्वकालिक परम ब्रह्म है । इसे अलग अलग धर्मों में अलग अलग नामों से जाना जाता है । खालसा पंथ में यह अकाल पुरुख akaal purukh है ।
मुग़लों के ज़माने की भूराजस्व शब्दावली में ख़ालसा शब्द ज़मीन बंदोबस्त के तहत भी प्रयोग होता था । कृषियोग्य सरकारी भूमि ‘खालसा ज़मीन’ कहलाती थीं । उत्तर से दक्षिण भारत तक,

.headlines.. आजकल मीडिया रहस्योद्घाटन के रूप में भी खुलासा शब्द का प्रयोग करता है … “स्टाम्प घोटाले में बड़ा खुलासा” यानी किसी खास तथ्य का सामने आना । मगर आजकल ऐसे शीर्षक पढ़ कर यही लगता है कि खुलासा शब्द सनसनी का पर्याय बन गया है...

जहाँ भी मुग़लों का शासन था, यह शब्द प्रचलित हुआ । मराठी में खालसा या खालिसा शब्द आज भी चलन में है । यह अरबी के ख़ालिसह् से बना है जिसका अर्थ है जिसमें कोई मिलावट न हो, जो सिर्फ़ एक की मिल्कीयत हो अर्थात यहाँ अभिप्राय शासन की ज़मीनों से है । खालसा ज़मीन वह भी है जिसे कोई न जोत रहा हो, जिसका स्वामी कोई न हो और वह भी जिसे राजस्व न चुकाने की वजह से जब्त कर लिया गया हो । इस कार्रवाई को खालसा करना कहते थे । जाहिर है राजस्व न चुकाने वाली भूमि राज्य की हुई और इस पर दूसरे का कब्ज़ा माना जाएगा । उसे खाली कराने की क्रिया खालसा कहलाई । ‘खाली कराना’ या खलास करना जैसे शब्दों के सन्दर्भ में इसे समझा जा सकता है । खालसा ज़मीन उस भूमि को भी कहते है जो बेहद उपजाऊ हो । आखिर भूमि का असली गुण तो उर्वरा होना ही है । जो ज़मीन ख़ालिस है , वही तो ख़ालसा कहलाएगी । ख़ालिस का एक रूप निखालिस भी मिलता है । शब्द सागर के अनुसार यह अरबी के ख़ालिस में हिन्दी का नि उपसर्ग लगाकर निखालिस बना लिया गया है ।
सेमिटिक धातु kh-l-s से बने विभिन्न शब्दों और अर्थ छटाओं को जानने के बाद अब आते हैं ‘ख़ुलासा’ पर । इसका शुद्ध अरबी रूप खुलासाह् है । मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के मुताबिक ‘खुलासा’ का अर्थ है सार, संक्षेप, निचोड़, परिणाम, नतीजा, सारांश, तल्ख़ीस (बहुवचन-खुलासा, सारतत्व) आदि । इसी तरह जॉन शेक्सपियर के कोश में इसके मायने हासिल, नतीजा, उत्तम, सार, सत्व, इत्र, अनुमान, सर्वश्रेष्ठ भाग, विशाल, बड़ा आदि बताए गए हैं । गौरतलब है कि आज की हिन्दी में खुलासा शब्द का इस्तेमाल मीडिया में किसी सूचना के सन्दर्भ में ज्यादा होता है । खुलासा का प्रयोग करते हुए हमारे दिमाग़ में किसी बात को विस्तार  से जानने का आशय होता है । “ज़रा खुलासा करो” में बात को खोल कर बताने का आग्रह है । शब्दकोशों में दिए गए ‘खोलना’ शब्द का अर्थ अधिकांश लोग विवरण या विस्तार से लगाते हैं जो दरअसल ग़लत है । पूरा विवरण तो कहानी या क़िस्सा कहलाएगा, जो कि खुलासा का आशय नहीं है । अंग्रेजी के substance, out-come, onclusion, abstract जैसे शब्दों से ‘खुलासा’ का भाव स्पष्ट होता है ।
ख़-ल-स में निहित सार, सत्व, सत्य, निचोड़ जैसे आशयों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि किसी सूचना या बात के मूल में निहित मूल तथ्य से आशय है । किसी हत्याकाण्ड का ‘खुलासा’ अनेक सम्भावित कारणों में से अवैध सम्बन्ध हो सकता है । ‘खुलासा’ में ढीला करना, शिथिल करना जैसे भाव हैं । जब किसी फल से रस या सार निकाला जाता है अथवा किसी चीज़ को निचोड़ा जाता है तो उसे ढीला करना पड़ता है । फल का गूदा खाने के लिए उसे खोलना पड़ता है । फल का पकना दरअसल शिथिल होने की प्रक्रिया है । उसके बाद ही उसमें से मीठा रस निकलता है । यही सार है और इसमें जो भाव है उसे ही खुलासा कहते हैं । किसी नतीजे तक पहुँचने के लिए उस सूचना या खबर का पकना ज़रूरी है । उसके बाद ही परिणाम हासिल होगा । यह जो हासिल है, यही है खुलासा । “उन्होंने इस बात का खुलासा किया” में आशय ‘स्पष्टता’ का है न कि ‘विवरण’ है । ज़ाहिर है भीतर की चीज़ को बाहर लाने के लिए उसे खोलना पड़ेगा, तभी वह साफ़ साफ़ नज़र आएगी । आजकल मीडिया रहस्योद्घाटन के रूप में भी ‘खुलासा’ शब्द का प्रयोग करता है । “स्टाम्प घोटाले में बड़ा खुलासा” यानी किसी खास तथ्य का सामने आना । मगर ऐसे शीर्षक पढ़ कर यही लगता है कि खुलासा शब्द अब सनसनी का पर्याय बन गया है ।

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Saturday, March 17, 2012

लाव-लश्कर का क़ायदा

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सम्बन्धित आलेख-1.वैजयन्तीमाला , झंडाबरदार और जयसियाराम !2.रुआबदार अफसर था कभी जमादार...3.सेना से फौजदारी तक…4.लाजमी है मुलाजिमों का लवाजमा 5.क्या हैं गुड़ी पड़वा और नवसंवत्सर 6.मिस्री पेपर और बाइबल 7.लंबरदार से अलमबरदार तक 8.सैनिक सन्यासियों का स्वरूप 9.लाम पर जाना, लामबन्द होना 10.शहर का सपना और शहर में खेत रहना
भा री साज़ो-सामान के साथ कहीं आने-जाने के सन्दर्भ में लाव-लश्कर शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है । मूलतः यह फ़ौजी शब्दावली का हिस्सा है और लवाजमा की तरह ही इसका भी प्रयोग होता है । पुराने ज़माने में हर मुल्क में फ़ौजी क़वायद जारी रहती थी । एक इलाके से दूसरे इलाके में लश्करों का आना-जाना चलता रहता था । भारी तादाद में साज़ो-सामान, असबाब के साथ सेनाएँ एक जगह से दूसरी जगह कूच करती, बीच बीच में पड़ाव डालतीं । इस भारी लवाजमे के एक मुकाम से दूसरे मुकाम तक पहुँचने की खबरें खास तौर पर बहुत पहले से पहुँचाई जाती थीं ताकि फौजी-पड़ाव के लिए बंदोबस्त किया जा सके । लाव – लश्कर के साथ निकले फौजी जमावड़े का अर्थ ही यह था कि जंग का मक़सद है । गौरतलब है कि लश्कर का अर्थ होता है फौज । इसकी व्युत्पत्ति पर विस्तार से आगे चर्चा की जाएगी । सामान्य बोलचाल में भी लाव-लश्कर शब्द का प्रयोग होता है जिसका अर्थ है पूरी तैयारी अर्थात साजोसामान के साथ कहीं जाना या पहुँचना ।  हाथी, घोड़ा, पालकी । जय कन्हैयालाल की ।।
बसे पहले बात करते हैं लाव-लश्कर पद के पहले हिस्से यानी लाव की । किसी भी फौज के लिए ध्वज का सर्वाधिक महत्व है । यह ध्वज उस राष्ट्र की सम्प्रभुता का प्रतीक होता है जिसकी और से वह फौज लड़ रही होती है । दिलचस्प बात यह है कि पुराने ज़माने में किराए की सेनाएँ भी ली जाती थीं । कई छोटी रियासतें सिर्फ़ भाड़े पर अपनी फौज दिया करती थीं और बदले में मोटी रकम या जागीर वसूलती थीं । ध्वज इसीलिए ज़रूरी होता था ताकि फौजी जमावड़े को उस राज्य की पहचान मिल सके जिसकी ओर से वह जंग के मैदान में है । लाव-लाश्कर दरअसल बोली भाषा से बना शब्द है । लाव का मूल रूप अरबी का लिवा शब्द है जिसका अर्थ होता है ध्वज, झण्डा या पताका । लिवा बना है सेमिटिक धातु l-w-y अर्थात ‘लाम-वाव-या’ से । इसमें बांधना, लपेटना, घुमाना, एँठना, मरोड़ना, जोड़ना, सटाना, कसना जैसे भाव हैं । अरबी के अलम शब्द से ही अलमबरदार शब्द बना है जिसका अर्थ है ध्वजवाहक । संस्कृत के जयन्तकः से बना है झण्डा । इस झण्डा में फ़ारसी का बरदार लगाने से बनता है झण्डाबरदार
किसी ध्वज को जब दण्ड से बांधा जाता है तब यही सारी क्रियाएँ उसमें होती हैं । पताका यानी कपड़े का टुकड़ा, तभी ध्वज कहलाता है जब उसे दण्ड से बान्धा जाता है । दण्ड से बान्धना इसलिए ज़रूरी होता है ताकि दण्ड की ऊँचाई पर लगी यह जयन्तिका अर्थात विजय-लहरी सबको दिख सके । युद्ध के मोर्चे पर हटने के बाद इस पताका को या तो ध्वज-दण्ड के इर्दगिर्द गोल लपेट दिया जाता है या फिर पताका और दण्ड को अलग अलग कर, पताका को सावधानी से तह कर अलग रख दिया जाता है । कुल मिला कर बान्धना, सटाना, जोड़ना महत्वपूर्ण है । इससे जो समग्र भाव उभरता है वह साहचर्य का है । साथ होने का है । किसी से कुछ ‘जोड़ना’ या ‘सटाना’ किन्हीं दो चीज़ों को ‘साथ-साथ’ करना ही है । ‘बन्धन’ ज़रूरी है । यह बन्धन जब स्वभाव बन जाता है तब ‘साथ’ भी सहज हो जाता है । फौज दरअसल साथ-साथ चल रहे लोगों का समुच्चय ही है । अरबी में जमात का अर्थ भी सेना होता है । ज-म धातु में जुड़ाव, समुच्चय का भाव है । इससे बने जम, जमा, जमाव जैसे शब्दों में समूह, जत्था जैसे भाव स्पष्ट हैं । जमाव में जहाँ अड़चन का भाव है यह भी स्पष्ट है कि यह अड़चन दरअसल समूह की वजह से है । बहुत सारी राशि का समूह ही जमाजथा है । इससे ही जमाअत बनता है जिसका अर्थ है कतार या पंक्ति । बहुत सारी इकाइयाँ साथ-साथ होने से ही कतार बनती है । जमाअत ही हिन्दी में जमात है । जमातदार यानी फौजदार । बाद में यह जमादार बन गया ।
हरहाल, बहुत सारे लोगों के समूह को भी फौज ही कहा जाता है । अक्सर बोलचाल में कहा जाता है कि “यह फौजफाटा लेकर कहाँ जा रहे हो ?” फौजफाटा शब्द हिन्दी के अलावा मराठी में भी बोला जाता है ।  वैसे अरबी में फौज का अर्थ है सुगन्ध या तेज़ी से चारों ओर फैलना । ध्यान रहे आक्रमण करतेindiaflag1 समय सैन्य दल तेज़ी से सब तरफ फैलते हैं और फिर धावा बोलते हैं । साथ-साथ चलने की यही बात अरबी लिवा के मूल में है । लिवा का लाव, लेओ, लाओ, लिवाज़ा जैसे रूप भी हैं । इसका रूढ़ार्थ चाहे पताका है मगर इसकी विभिन्न अर्थछटाओं में सबसे महत्वपूर्ण भाव साहचर्य का ही है । रूसी भाषविद् लियोनिद् कोगन के मुताबिक l-w-y धातु का अर्थ है सहचर अथवा साथी । एलायड चैम्बर्स ट्रान्सिट्रेटेड कोश के मुताबिक लाव का अर्थ है साथ चलनेवालों का समूह । बहुत सारे लोगों का जत्था । कुल मिलाकर लश्कर का अर्थ फौज है और लाव का अर्थ है बहुत सारे लोगों का समूह, साथ चलने वाले लोग । स्पष्ट है कि लाव-लश्कर समानार्थी शब्दयुग्म है । किसी बात को प्रभावी ढंग से उजागर करने के लिए ऐसे समास बनते हैं जैसे नपातुला, खराखरा वगैरह ।
लश्कर यानी क्या ?
स देश की सांझी संस्कृति की सबसे रंगीन पहचान उर्दू का एक नाम लश्करी भी है। विभिन्न जातियों में लश्करी उपनाम पाए जाते हैं। ग्वालियर का एक उपनगर लश्कर lashkar मशहूर है। पर इन सबको पीछे धकेल कर दहशत का लश्कर हावी हो गया है । लश्कर अरबी - फारसी के जरिये हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। शब्दकोशों के अनुसार लश्कर का अर्थ होता है सेना, वाहिनी या फौज। फारसी - अरबी में इसका अभिप्राय फौजी जमाव जमावड़े से ही है। उर्दू में आकर लश्कर का अर्थ हुआ फौजी पड़ाव। खास बात यह कि  छावनी या पड़ाव के तौर लश्कर अधूरा शब्द है, इसका शुद्ध रूप है लश्करगाह अर्थात जहां सेना के डेरे लगते हों। ग्वालियर के लश्कर उपनगर का नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि वहां फौजी पड़ाव था। लश्कर यानी फौज के कार्मिकों को लश्करी कहा जाता था। लश्करी यानी सैन्यकर्मी। जरूरी नहीं कि लश्करी फौजी, सैनिक या लड़ाका ही हो। वह फौज का कोई भी कार्मिक हो सकता था। तोपची से लेकर रसद व्यवस्था देखनेवाला व्यक्ति लश्करी हो सकता था। लश्करी lashkari का एक अन्य अर्थ होता है सैना संबधी। मराठी में फौजी शासन अथवा मार्शल लॉ के लिए लश्करी कायदा शब्द खूब प्रचलित है। लश्कर अरबी शब्द अल-अस्कर al askar का बिगड़ा हुआ रूप है। अरबी में अस्कर का मतलब होता है रक्षक, लडाका अथवा इनका समूह। बाद में सिपाहियों के संगठित जमावड़े के तौर पर अस्करी को सेना या फौज का अर्थ भी मिल गया। अल-अस्कर जब फारस में दाखिल हुआ तो इसकी विभिन्न ज़बानों में अलग अलग उच्चारणों से होते हुए लश्कर में बदल गया।
रअसल अस्कर शब्द मूलतः अरबी का भी नहीं है बल्कि हिब्रू शब्द सिखर से बना है । बाइबल में वर्णित गोस्पेल के मुताबिक समारिया क्षेत्र में सिखर sychar नाम का एक कस्बा था। सिखर का ही अपभ्रंश रूप इस्ख़र ischar प्रसिद्ध हुआ। हिब्रू अरबी के बीच की कड़ी है आरमेइक जिसमें इस्खर का उल्लेख बस्ती, आबादी या घिरे हुए स्थान के तौर पर हुआ जिसने अरबी में अस्कर बन कर समूह, संगठन या फौज के रूप में स्वतंत्र अर्थवत्ता पा ली । यह भी दिलचस्प है कि सिर्फ बस्ती या गाँव की अर्थवत्ता वाले इस्खर से जन्मे लश्कर ने पहले तो फौज का रूप लिया और बाद में इस फौज ने जब पड़ाव डाला तो वही लश्कर एक बार फिर बस्ती बन गया । ग्वालियर के पास सिन्धिया की फौज ने जहाँ पड़ाव डाला था वह बस्ती आज देश के नक्शे पर लश्कर नाम का शहर है । मध्यभारत के प्रसिद्ध शहर ग्वालियर की पहचान ही लश्कर-ग्वालियर है । कहाँ बाइबल में वर्णित सुदूर पश्चिम एशिया के समारिया का सिखर क़स्बा और कहाँ सिखर से जन्मे अस्कर [ सिखर > इस्खर > अस्कर > अल अस्कर > लश्कर ] के लश्कर रूपान्तर को सचमुच सुदूर पूर्व में बतौर आबादी, फौजी पड़ाव, एक शहर की पहचान मिली ।

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Thursday, March 15, 2012

लाजमी है मुलाजिमों का लवाजमा

personageसम्बन्धित आलेख-1.घर-गिरस्ती की रस्सियाँ 2.दिल चीज़ क्या है…नाचीज़ क्या है 3.ज़बान को लगाम या मुंह पर ताला!!! 3.साथियों में फ़र्क़ करना सीखो साथी! 5.कारवां में वैन और सराय की तलाश 6.टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी 7.‘अहदी’ यानी आलसी की ओहदेदारी 8. मुसद्दी की तलाश… 9. अरदली की कतार में खड़े लोग 10. सब ठाठ धरा रह जाएगा

र व्यक्ति के मन में ठाठ-बाट की कल्पना अलग-अलग होती है । सूफ़ियाना अंदाज़ में सोचें तो किसी के लिए मुफ़लिसी में ठाठ हैं तो किसी के लिए इन्तेहाई रईसी ठाठ है । मगर दुनियावी सोच के हिसाब वाले ठाठ-बाट में रईसी का दख़ल लाज़मी है । किसी के लिए बंगला ठाठ की निशानी है तो किसी के लिए बंगले के साथ गाड़ी । किसी के लिए खूबसूरत कपड़ों की नुमाइश ही ठाठ-बाट है तो किसी के पास फ़िज़ूलखर्ची के ठाठ-बाट हैं । हमारा मानना है कि नोकर-चाकर के बिना हर ठाठ-बाट फीका है । कोर्निश बजाते चाकरों के ज़माने गए मगर आज भी अगर हर क़दम पर आदाब आदाब कहने वाले मुलाजिम मिलते जाएँ तो तबीयत बाग़बाग़ हो जाती है । नौकर, चाकर, अर्दली, मुसाहब, अहलकार, खादिम, सेवक, मुलाजिम ये सब सेवक वर्ग के अलग अलग नाम हैं जिनके बिना ठाठ-बाट की कल्पना करना बेमानी है । ठाठ-बाट का मतलब सिर्फ़ रईसी नहीं है । असली ठाठ तो रसूख का होता है । रसूख़दारों के साथ मुलाज़िमों का लवाजमा ही उनके ठाठ की नुमाइश करता है और यह लाज़मी भी है । लवाजमा का प्रयोग आमतौर पर किसी मुहिम, यात्रा या किसी अन्य प्रयोजन से की जाने वाली तैयारी के सन्दर्भ में होता है । लवाजमा में समूहवाची व्यंजना है । पुराने ज़माने के काफ़िलों और कारवाँ के साथ तो लवाजमा चलता ही था ।
लाज़मी, मुलाज़िम और लवाज़मा ये तीनों ही शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित हैं । अत्यावश्यक या अनिवार्य के अर्थ में हिन्दी में लाजमी शब्द का भी इस्तेमाल होता है । मूलतः यह सेमिटिक धातु ल-ज़-म से बना है जिसमें बान्धना, जुड़ना, सटना, लगना, चिपकना, बाध्यता, सेवा-टहल, साथ होना, वफ़ादार होना, कर्तव्यनिष्ठा, अनिवार्यता, आवश्यक, ज़रूरी, अवश्यंभावी अथवा अटल जैसे भाव हैं । ल-ज़-म से अरबी में लाज़िम शब्द बना जिसमें यही सारे भाव हैं । ध्यान रहे कोई चीज़ बन्धनकारी तभी होती है जब वह आवश्यक या अनिवार्य है । किसी के साथ तभी हुआ जाता है जब वैसा करना आवश्यक होता है । किन्हीं दो इकाइयों का आपस में जुड़ना या सटना किसी अनिवार्यता के चलते ही होता है । हर व्यक्ति से नैतिक रूप से कुछ न कुछ काम करने की अपेक्षा समाज रखता है । ये काम उस व्यक्ति से जुड़े हुए हैं और इसीलिए इन्हें फ़र्ज़ या कर्तव्य कहा जाता है । फ़र्ज़ निभाना आवश्यक होता है जिसके लिए अरबी में लाज़िम शब्द है ।
ज़ादी से पहले तक उर्दू-फ़ारसी मिश्रित हिन्दी, जिसे हिन्दुस्तानी कहा जाता था, बोली जाती थी उसमें लाज़िम शब्द का इस्तेमाल खूब होता था । शायरी में भी आवश्यक, फ़र्ज़, कर्तव्य आदि के सन्दर्भ में लाज़िम शब्द का इस्तेमाल होता रहा है मसलन फ़ैज़ की वो नज़्म याद करें – “ लाज़िम है कि हम भी देखेंगे ” । तत्सम शब्दावली अक्सर बोली-भाषा में वर्णविपर्यय या स्वरविपर्यय के ज़रिए बदलती है । यहाँ भी वही हो रहा है । अरबी के तत्सम शब्द लाज़िम में स्वरविपर्यय हुआ और ज़ के साथा जुड़ा ह्रस्व स्वर के साथ चस्पा हो गया इस तरह लाज़िम का रूपान्तर लाजमी हो गया । हिन्दी में नुक़ता लगाने का रिवाज़ नहीं है सो स्वरविपर्यय के साथ ही नुक़ता भी गायब हो गया । यह उसी तरह हुआ जैसे अरबी का वाजिब, बोली भाषा में वाजबी हो गया । ‘लाजमी’ यानी अनिवार्य । किसी काम की अनिवार्यता के सन्दर्भ में ‘लाजमी’ शब्द का हिन्दी में खूब प्रयोग होता है मसलन- “उनकी नाराज़गी लाज़मी है” या फिर “ उन्हें लाज़मी तौर पर सियासत करनी थी ” जैसे वाक्यों से इसे समझा जा सकता है । ‘लाजमी’ के स्थान पर ‘लाज़िमी’ शब्द का प्रयोग भी होता है ।
सेमिटिक धातु l-z-m ( ल-ज़-म) से बने ‘लाज़िम’ से कुछ अन्य शब्द भी बने हैं जैसे मुलाजिम या ‘लवाजमा’ । अरबी का प्रसिद्ध उपसर्ग है ‘मु’ जिसका अर्थ होता है “वह जो” । गौर करें लाज़िम में निहित बाध्यता, सेवा-टहल, साथ होना, वफ़ादार होना, कर्तव्यनिष्ठा जैसे भावों पर । ‘मु’ उपसर्ग लगने पर कर्ता का भाव उभरता है अर्थात ये सब काम करने वाला यानी चाकर, कर्मचारी, अर्दली, सेवक आदि । लाज़िम के साथ जब मु उपसर्ग लगता है तो बनता है मुलाज़िम जिसमें यही सारे भाव हैं । किसी की नौकरी करना, चाकरी करने को ही मुलाज़मत कहा जाता है । मुलाज़िम के लिए कर्तव्यनिष्ठ होना ज़रूरी है । ‘लाज़िम’ में अनिवार्यता का जो भाव है, मुलाज़िम की मुलाज़मत की यह सबसे पहली शर्त है । अनिवार्यता यानी बाध्यता यानी गुलामी । जिस काम के बदले भोजन के अलावा कुछ न मिले वह गुलामी, दासता और जिस काम के बदले कुछ उजरत यानी पारिश्रमिक, मेहनताना मिले वह नौकरी । सो नौकर और गुलाम का यह फ़र्क़ भी मुलाज़िम में नहीं है । मुलाज़िम के साथ बतौर सेवक, चाकर , नौकर , ख़िदमतगार चाहे कर्तव्यनिष्ठा और सेवा की अनिवार्यता जुड़ी हो मगर उसके साथ उजरत की अनिवार्यता स्पष्ट नहीं है ।
ब बात ‘लवाजमा’ की । हिन्दी में लवाजमा लवाजमा शब्द में ठाठ-बाट का भाव पैबस्त है । आमतौर पर हिन्दी में इसका आशय दल-बल, साज़ो-सामान से लैस होकर लोगों के सामने आने से लगाया जाता है । ‘लवाजमा’ सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी से होते हुए फ़ारसी के ज़रिये यह हिन्दी में दाखिल हुआ है । हिन्दी का लवाजमा अपने मूल अरबी रूप में लवाज़िमा है जिसकी पैदाइश भी सेमिटिक धातु l-z-m ( ल-ज़-म) से हुई है जिसमें मूलतः ज़रूरी या आवश्यक जैसे वही भाव हैं जिनकी चर्चा ऊपर हो चुकी है । आज जिस रूप में हम लवाजमा शब्द का प्रयोग करते हैं उसमें नौकर-चाकर, फौज - फाटा सहित खूब सारा माल – असबाब भी शामिल है । गौर करें माल असबाब के अर्थ में लवाजमा में समूची गृहस्थी या पूरा दफ्तर शामिल नहीं है बल्कि सिर्फ़ वही जो बेहद ज़रूरी होता है । जैसे पुराने ज़माने के स्वयंपाकी लोग कहीं भी यात्रा पर जाते थे तो रसोई का सामान उनके साथ चलता था । यह सामान दरअसल समूची रसोई नहीं है , पर सफ़र में अपना भोजन बनाने का सुभीता हो जाने पुरता असबाब ही काफी है । यही ‘लवाजमा’ है । अब समर्थ व्यक्ति इस रसोई के साथ महाराज भी रखेगा । एक चाकर भी रख लेगा । यह भी ‘लवाजमा’ में शामिल है ।
मूल अरबी ‘लवाज़िमा’ में भी अंगरक्षक, नौकर चाकर और रोज़मर्रा की वो तमाम चीज़ें शामिल है जिनके बिना काम न चल सके । अब बात यह है कि आवश्यकता का अन्त नहीं । इच्छाएँ भी अनन्त हैं । तो ज़रूरी या अनिवार्य जैसे शब्द भी अलग अलग व्यक्तियों के सन्दर्भ में सापेक्ष होते हैं । किसी के लिए दिन में चार बार का भोजन ज़रूरी है तो कोई एक वक्त की रोटी को ही खुदाई नेमत समझता है । किसी के रोज़ छप्पन भोग का थाल चाहिए और किसी के लिए सूखा टिक्कड़ ही मोहनभोग समान है । किसी को फर्श पर नींद आती है किसी को चारपाई ज़रूरी है । सो लवाज़िमा के ज़रूरी वाला दायरा लोगों के स्तर के हिसाब से छोटा-बड़ा होता रहता है । मराठी में लवाजिमा शब्द प्रचलित है जिसमें नौकर - चाकर, साज़ो - सामान, परिजन समेत ठाठ-बाट शामिल है । कुल मिलाकर यही सारी बातें लवाजमा में शामिल हैं । ठाठ-बाट भी ऐसे ही नहीं आ जाता । रसूख़दारों के साथ रहना ही अपने आप में मेहनताना है । इसे पुराने ज़माने के लोग जानते थे इसीलिए चमचे, टहलुए चापलूस के भेस में भी वे अपना पारिश्रमिक वसूल कर लेने की कला में माहिर थे । आज के दौर में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ, नारी उत्पीड़न विरोधी मंच, उपभोक्ता मंच, पारिवारिक कल्याण प्रकोष्ठ, गली-मोहल्ला सुधार मंच, स्वदेशी अपनाओ मंच आदि विभिन्न प्रकल्पों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव, सचिव समेत सवा सत्ताईस पदाधिकारियों और सैकड़ों सदस्यों की फ़ौज ही रसूख़दारों की मुलाज़मत में इसीलिए होती है ताकि ठाठ-बाट बना रहे ।

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Wednesday, March 14, 2012

बर्रूकाट भोपाली और बर्रूक़लम

reed1सम्बन्धित आलेख-1.सरपत के बहाने शब्द संधान…2.सरपत की धार पर अभय तिवारी 3.हरियाली और घसियारा…4.कैसे कैसे वंशज! बांस, बांसुरी और बंबू 5.कानून का डंडा या डंडे का कानून 6.कनस्तर और पीपे में समाती थी गृहस्थी

बाँ स का एक नाम “बर्रू” भी है । हालाँकि इस अर्थ में इसका इस्तेमाल कम होता है अलबत्ता “बर्रूकाट भोपाली” ( barru kat bhopali ) और “बर्रूक़लम” के साथ इसका इस्तेमाल लोगों ने ज़रूर सुना होगा । बचपन में बर्रूक़लम ( सरकंडे की क़लम ) से सुलेखन का अभ्यास करने वाले छात्रों की आखिरी पौध साठ के दशक की पैदाइश थी । सत्तर के दशक तक यह परिपाटी खत्म हो गई । हमें भी याद हैं वे दिन । कभी लिखा तो नहीं, मगर बड़े बहन-भाइयों की कलम हाथ में लेकर उसे दवात में डुबोना और कोरे काग़ज़ पर बेमतलब सी आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने में मज़ा आता था । यही नहीं, इस कलम की नर्म-नाज़ुक नोक को टोपाज़ ब्लेड से छीलकर नुकीला बनाना भी दिलचस्प शग़ल होता था । कई बार ऐसा भी हुआ कि इस चक्कर में छह इंच की क़लम दिन भर में दो इंच की रह गई !!! ख़ैर, बात बर्रूकलम की हो रही थी । हिन्दी की विभिन्न बोलियों में बाँस के लिए बर्रू शब्द भी मिलता है, ये अलग बात है कि सामान्य बोलचाल में बाँस के अर्थ में इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है । जहाँ तक “बर्रूकाट भोपाली” का सवाल है, भोपाल के लोग तो इससे परिचित हैं ही, भोपाली तहज़ीब और मिज़ाज के जानकार इस शब्द से परिचित हैं, मगर बर्रू शब्द की बाँस से रिश्तेदारी शब्दों के इस सफ़र में जानने की कोशिश करते हैं ।
“बर्रूकाट भोपाली” या “बर्रूक़लम” के “बर्रू” को अगर समझ लिया जाए तो इन दोनों शब्दयुग्मों का अर्थ स्पष्ट हो जाएगा । हिन्दी कोशों में बर्रू शब्द की प्रविष्टि नहीं मिलती अलबत्ता बर, बोरू, बारू, बरु, बरो जैसे शब्द ज़रूर पकड़ में आते हैं जिसका अर्थ है घास की एक किस्म । ध्यान रहे कि पृथ्वी की आदिम फ़सलों में घास ही ऐसी फ़सल है जिसकी विविध किस्मों का आज भी उपयोग होता है और हमारे लोकाचार, अनुष्ठानों में इसका सर्वाधिक महत्व है । दूब से लेकर सरकण्डा, गेहूँ, गन्ना और बाँस सब घास की ही किस्में हैं । रॉल्फ़ लिली टर्नर के कोश में “बरू” प्रविष्टि मिलती है जिसका अर्थ घास या बाँस की एक किस्म बताया गया है । प्राकृत में इसके बरुआ रूप का उल्लेख है । सिन्धी-पंजाबी में यह बरू या बारू है । हिन्दी में यह बरू या बरो बताया गया है किन्तु हाड़ौती, मालवा और मध्यप्रदेश में यह बर्रू के नाम से जाना जाता है । पूजा से लेकर आवास और आहार तक में इसी घास का उपयोग सर्वविदित है । संस्कृत के विभिन्न कोशों में बर्ह्, बर्हिस् जैसे शब्द हैं जिनका अर्थ है एक किस्म की घास अथवा पूजा-अनुष्ठान के निमित्त काम आने वाली पवित्र घास है । गौरतलब है कि यज्ञ वेदिका के नीचे दूब बिछाई जाती है । यज्ञकर्ता का आसन भी इसी घास से बनाया जाता है और हवन सामग्री का प्रमुख अंश भी घास ही होती है ।
र्ह् में छाजन, छत, आवरण का भाव भी है । गौर करें छत और छाजन बनाने में घास की अहम भूमिका होती है । लकड़ी के शहतीरों या चारदीवारी पर डाली जाने वाली बाँस की बल्लियाँ भी घास की ही एक किस्म है और उन बल्लियों पर फिर घास के पूले बिछाकर छाजन तैयार किया जाता है । बर्ह् का एक निहितार्थ मोनियर विलियम्स ने छादन ( आच्छादन ) भी बताया है, जो यहाँ स्पष्ट हो रहा है । समझा जा सकता है कि इसी बर्ह् से ह का लोप होकर बर्र और फिर बर्रू जैसे रूपान्तर सामने आए होंगे । मराठी में बर्रू के लिए बरू, बोरू जैसे शब्द हैं । कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी कोश में इसका अर्थ तृण ( घास या तिनका) अथवा घास की एक किस्म बताया गया है । इसकी व्युत्पत्ति अज्ञात खाते में डाली गई है । कुलकर्णी ने इतना भर संकेत दिया है कि प्राकृत बरुआ का उल्लेख करती एक उक्ति उन्होंने व्युत्पत्ति संकेत के रूप में अपनी प्रविष्टि में डाली है “बरुअ इक्षुसदृशतृणम” अर्थात बरू गन्ने जैसी संरचना वाली घास की कोई किस्म है । यहाँ बाँस से आशय स्पष्ट हो रहा है । इसी प्रविष्टि में बुरुड शब्द भी है जिसका अर्थ है बाँस की डलिया इत्यादि बनाने वाली जाति ।
जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश में भी बर्र शब्द नहीं मिलता मगर उनकी प्रविष्टि में बरू की व्युत्पत्ति आश्चर्यजनक रूप से उलूक से बताई गई है । प्लैट्स के कोश में इसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मिलता । मोनियर विलियम्स के कोश में उलूक का अर्थ घास की एक किस्म बताया गया है, मगर बर्र, बरू, बरो, बर, बारू जैसे रूपान्तर उलूक से किस तरह हुए होंगे यह समझना कठिन है । इस नतीजे तक पहुँचने के लिए तुक्केबाजी का सहारा लेने से कहीं बेहतर है बर्ह् से बर्र की व्युत्पत्ति । प्लैट्स के कोश में अलबत्ता बरू के लक्षण इसे बर्रू ही सिद्ध करते हैं जैसे उन्होंने इसे लम्बी-ऊँची जंगली घास बताया है । लिखने के काम आने वाले सरकण्डे की किस्म के रूप में भी उनके कोश में ‘बरू’ की शिनाख्त मिलती है । मराठी में भी ‘बरू’ और ‘बोरू’ का अर्थ सरकण्डे की लेखनी ही है । छत्तीसगढ़ी में बरुहा शब्द है । पौधे के रूप में यह भरुहा और कलम के रूप में प्रयुक्‍त होने पर इसे भर्रू कहा जाता है। भर्रू और बर्रू एक ही है । कलम लगाना चाहे वनस्पति विज्ञान की टर्म हो मगर यह जो कलम है वह बर्रूकलम वाले कलम से जुदा नहीं है । क़लम वही है जिसे चीरा लगाया जाए । क़लम नाम ही इसलिए पड़ा क्योंकि बाँस या सरकंडे का सिर क़लम कर के ही उसे नोकदार बनाया जाता है । बरुहा का अगर अन्वय करें तो हमारे सामने ब-र-ह वर्णों में छुपी ध्वनियाँ बरुहा में स्पष्ट रूप से उजागर दिखती हैं । बर्ह् से बर्रू के जन्म का यह महत्वपूर्ण प्रमाण है ।
र्रू के इतिवृत्त के बाद बर्रूकाट भोपाली की कहानी बहुत थोड़ी सी रह जाती है । जैसा कि ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि भोपाल का नाम चाहे राजा भोज से जुड़ा हो मगर शहर के तौर पर इसका विकास और विस्तार अफ़ग़ान सरदार दोस्त मोहम्मद खान ( dost mohammad khan ) की देन माना जाता है । दोस्त मोहम्मद खान शुरुआती दौर में मुग़ल फौज के अधीन मालवा प्रान्त में तैनाती पर रहा मगर बाद में औरंगज़ेब की मौत के बाद उसकी महत्वाकांक्षा बढ़ी और वह मुग़लों के खिलाफ़ स्थानीय राजपूत सरदारों की मदद के बहाने अपनी शक्ति बढ़ाने लगा । 1712 के आसपास इसी के तहत उसने भोपाल के पास जगदीशपुर के राजपूत सरदार को धोखे से मार कर उसकी रियासत पर कब्ज़ा जमा लिया और फिर बेरसिया  ( berasia )होते हुए भोपाल में जम गया जो पहले रानी कमलापति ( rani kamlapati )की छोटी सी जागीर हुआ करता था ।
भोपाल और उसके आसपास उस ज़माने में बाँस के घने जंगल थे । उसके पास जिन फौजियों की टुकड़ी थी वे दोस्त मोहम्मद के साथ यायावरी करते हुए अपने अस्थाई डेरे बनाने में माहिर हो गए थे । बाँस का जंगल उनके लिए वरदान था । देखते ही देखते भोपाल में इन पठानों ने अपने लिए बाँस-बल्लियों से अस्थायी डेरे बना लिए और इस तरह भोपाल के विस्तार की नींव डल गई । ये शुरुआती पठान ही बर्रूकाट भोपाली कहे गए । बर्रूकाट यानी बाँस काटने वाले । बाद में बर्रूकाट का रूपान्तर बर्रूकट हो गया । जहाँ तक भोपाली की बात है तो यह भोपाल से ही बना है और भोपाल की व्युत्पत्ति राजा भोज के नाम पर भोज + पाल से मानी जाती है। दरअसल करीब दस सदी पहले राजा भोज द्वारा बनाए गए विशाल तालाब की पाल इस जगह बांधी गई थी, इसी वजह से इसे भोजपाल कहा जाता था। बाद में यहाँ बस्ती हुई । पहले यह क्षेत्र गौंड राजाओं के अधीन था। रानी कमलापति छोटी सी गोंड रियासत की शासक थी । पहले दोस्त मोहम्मद रानी की मदद के लिए भोपाल आया और फिर यहाँ का शासक बन बैठा ।

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Sunday, March 11, 2012

कोयला यानी जलता अंगारा या बुझा हुआ ?

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ब्दों की जन्मगाथा भी अनोखी होती है और अक्सर इतने विचित्र तथ्य सामने आते हैं कि भरोसा करना मुश्किल होता है । अब कोयला और कोयल को ही लीजिए । एक सी ध्वनियाँ होते हुए भी दोनों की तुलना करने की बात मन में नहीं आती । काले रंग की समानता को अगर छोड़ दिया जाए तो कोयला और कोयल में तुलना का कोई आधार नहीं बचता । कहाँ कोयल यानी जीवजगत का प्राणी और कहाँ कोयला स्थूलजगत का पदार्थ । कोयल एक ऐसा पक्षी है जिसकी आवाज़ बेहद मीठी होती है जबकि कोयला एक निर्जीव पदार्थ है । मगर शब्दकोशों पर भरोसा करें तो ‘कोयला’ और ‘कोयल’ दोनों ही सहोदर नज़र आते हैं । चाहे मोनियर विलियम्स हों या वाशि आप्टे, दोनों ही कोशों में कोकिलः से इनकी व्युत्पत्ति बताई गई है । सामान्य तौर पर देखा जाए तो कोकिलः से कोयल का जन्म मानने में कोई उलझन नहीं होती । संस्कृत के कोक, कूक जैसे शब्द ध्वनिवाची हैं । कोकिलः से कोकिला यानी कूकनेवाली चिड़िया । कोकिलः के मूल में वर्ण है जिसमें ध्वनि करने का भाव है । संस्कृत में कु धातु का जन्म ध्वनि अनुकरण से हुआ है। तक ध्वनिसाम्य का सवाल है, कोयल, कौआ, कुक्कुट यानी मुर्गा और कुत्ता में की रिश्तेदारी है । दरअसल विकासक्रम में मनुष्य का जिन नैसर्गिक ध्वनियों से परिचय हुआ वे सब से संबंद्ध थीं। पहाड़ों से गिरते पानी की , पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि में कलकल निनाद उसने सुना। स्वाभाविक था कि इन स्वरों में उसे क ध्वनि सुनाई पड़ी इसीलिए देवनागरी के वर्ण में ही ध्वनि शब्द निहित है। सवाल है कि कोयला तो ध्वनि करता नहीं, फिर कोकिलः में निहित कु ध्वनि से इसकी रिश्तेदारी क्या हो सकती है ?
बात दरअसल यह है कि कोयल वाले कोकिलः और कोयले वाले कोकिलः में ध्वनिसाम्य तो है मगर इनमें व्युत्पत्तिक रिश्तेदारी नहीं है । शब्दकोश इस पेच का खुलासा नहीं करते । कोयल वाले कोकिलः में कुक् क्रिया में इलच् प्रत्यय लगता है । जबकि कोयला वाले कोकिलः का एक रूप है कुकीलः जो बना है कौ + कीलः से । कीलः शब्द का अर्थ है खूँटा, शहतीर, नुकीली लकड़ी, भाला, कोहनी जैसे भाव हैं, वहीं इसका अर्थ ज्वाला, मशाल भी है । कोकिलः का अर्थ भी जलती हुई लकड़ी है । गौलतलब है कि विकासक्रम के दौरान मनुष्य ने तरह तरह के हथियारों की आज़माइश की थी । पत्थरों के हथियाओं से लेकर लकड़ी के हथियारों तक का उसने बेहद सूझ-बूझ से इस्तेमाल किया था । आग से वह बेहद प्राचीनकाल से परिचित था । लकड़े के शहतीरों कों भाले की तरह फेंकना भी उसने सीख लिया था । कोयला पर विचार करते हुए दरअसल कोकिलः या कुकीलः में निहित कील शब्द पर ध्यान देना चाहिए । कीलः अर्थात नोकदार लकड़ी, जो आदिकाल से मानव का हथियार रही है ।
मरकोश सहित मोनियर विलियम्स और आप्टे आदि के कोशो में मुझे कीलः में अग्निदण्ड का भाव भी नज़र आया । मेरे विचार में कील का मूलार्थ तो नोकदार लकड़ी ही है, मगर मनुष्य ने जब जंगलों में लगी आग देखी तब जलती हुई शलाकाओं का प्रयोग हथियार के रूप में करने की तरकीब भी उसके दिमाग़ में आई । इसीलिए कीलः के तमाम अर्थों के साथ जलती हुई लकड़ी का भाव भी आता है । यह मूलतः हथियार था। । यूँ देखा जाए तो कीलः में हथियार की नहीं बल्कि उपकरण की अर्थवत्ता है । हथियार भी उपकरण ही होता है । कीलः का एक अर्थ चाबी भी होता है जिसे किल्ली कहते हैं । किल्ली शब्द बना है संस्कृत के कील् से जिसमें नत्थी करना, बांधना, जोड़ना जैसे भाव है। इससे बना है कीलकः जिसका अर्थ खूंटी, खम्भा आदि होता है। कीलिका शब्द में पतला सरिया, पेंच, शलाका अथवा चाबी का भाव है। हिन्दी के कील, कीला, जैसे शब्द इससे ही बने हैं। कीलित शब्द में बांधना, जकड़ना, स्थिर करना, जड़ना जैसे भाव हैं जो ताले के उद्धेश्य से जुड़ते हैं। कीलिका से ही बना है किल्ली शब्द।
फिलहाल इतना तो स्पष्ट है कि कोयल वाला कोकिलः अलग है और कोयला वाला कोकिलः अलग है । अलबत्ता दोनों शब्द चूँकि एक ही वर्तनीआधारित शब्द से बने हैं इसलिए दोनों का विकासक्रम भी लगभग समान ही रहा जैसे - कोकिलः > कोइलअ > कोएल > कोयल या कोकिलः > कोइलअ > कोइला > कोयला इत्यादि । कीलः का एक अर्थ पर्वत भी है । गौर करें पर्वत ही प्राचीन मनुष्य की शरणगाह थे । पहाड़ों के जंगलों से मनुष्य के मतलब की सभी वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती थीं । पर्वत की दुर्गमता के चलते ही पहाड़ को दुर्गम और फिर दुर्ग नाम मिला । बाद में पहाड़ी आश्रय भी दुर्ग कहलाने लगे । पहाड़ों की ऊँचाई से निचले इलाकों में जलते शहतीरों को फेंकने की तरकीब काफी कारगर थी । कीलाः में निहित कल ध्वनि पर गौर करें तो कुछ और बातें पता चलती हैं । में निहित ऊँचाई का भाव प्रकाश, चमक और कांति से भी जुड़ता है।

Burning-Charcoal-002... कीलः से बने कोकिलः में मूलतः हथियार का भाव था । कालान्तर में जलती हुई लकड़ी समेत लकड़ी के अवशेष यानी कोयले को भी कुकीलः या कोकिलः कहा जाता रहा । बाद में सभ्यता बदली, संस्कार बदले । मनुष्य सभ्य हुआ और अग्निदण्ड जैसे हथियारों का प्रयोग अतीत की बात हो गई तब तक कोकिलः में निहित अग्निदण्ड या जलती लकड़ी के अवशेष यानी बुझे अंगारे वाला भाव भी गायब हो चुका था...

वर्ण का जलतत्व से रिश्ता है और जल की मेघ अथवा पर्वत से रिश्तेदारी में प्रकारांतर से ऊँचाई ही प्रकट होती है। विभिन्न स्रोतों को टटोलने पर पता चलता है कि अलग अलग भाषा परिवारों से जुड़े कई प्राचीन समाजों मसलन सेमेटिक, द्रविड़ या भारोपीय परिवारों की भाषाओं में कल् धातु मौजूद रही जिसमें ऊँचाई, चमक, सौन्दर्य अथवा जलतत्व का भाव था। बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश के आधार पर डॉ रामविलास शर्मा संस्कृत की कल् धातु के प्रतिरूप विभिन्न भाषाओं में देखते हैं ।  कल् धातु का अर्थ पर्वत भी होता है जिसमें ऊँचाई का भाव निहित है। इससे बने कलिंग का मतलब हुआ पर्वतीय प्रदेश। तमिल में कल का अर्थ पत्थर होता है। लिथुआनी में भी कल्नस् का अर्थ पहाड़ है। गौरतलब है कि लिथुआनी का संस्कृत से साम्य है। लैटिन के कल्कुलुस् का अर्थ छोटा पत्थर होता है। कल्लिस यानी पथरीली राह और कल्लओ यानी संगदिल होना है। संस्कृत में कलिन्द यानी एक विशेष पर्वत होता है। ब्राहुई में ख़ल यानी पत्थर। जाहिर है इन सभी शब्दों में पहाड़ से रिश्तेदारी के तत्व मौजूद हैं और पहाड़ का सीधा सम्बन्ध ऊँचाई से है।
मिल में कल का अर्थ पत्थर होता है और संस्कृत में यह नुकीला तीर भी है । भाव हथियार का है । यह संयोग यूँ ही नहीं है । और एक मिसाल देखिए । रूसी में संस्कृत में कुल्या नहर है तो लिथुआनी में झरना है । गौरतलब है कि नहर और झरनों की रिश्तेतारी ऊँचाई से है । झरने पहाड़ों से ही फूटते हैं और नहरों में उच्च जलाशयों में संग्रहीत पानी बहता है । रूसी भाषा में कोल नुकीले डण्डे को कहते हैं और रामचरित मानस में तुलसीदास ने कोल का प्रयोग सूअर जैसे एक जन्तु के लिए किया है । डॉ रामविलास शर्मा कहते हैं कि यह महज़ संयोग नहीं है कि प्राचीन काल में सुअर को लकड़ी के पैने डण्डे से बींधकर मारने की परम्परा के कारण सूअर और पैने डण्डे के लिए एक ही शब्द प्रचलित हुआ हो । गौर करें कि कोयला शब्द के साथ मुख्यतः काले रंग के बुझे हुए कोयले की अर्थवत्ता जुड़ी है न कि तप्त अंगारे की । अंगार के सन्दर्भ में हमेशा जलता हुआ कोयला ही कहा जाता है । सामान्य तौर पर बुझे हुए कोयले को कोयला ही कहा जाता है । एक उत्पाद या उपभोक्ता वस्तु होने के नाते कोयले का संग्रहण कभी तप्त या ज्वलनशील अवस्था में नहीं होता । हमेशा बुझे कोयले का भण्डारण ही होता है ।
बात यह है कि कीलः से बने कोकिलः में मूलतः हथियार का भाव था इसीलिए मोनियर विलियम्स और आप्टे इसका अर्थ जलती हुई लकड़ी बताते हैं । कालान्तर में जलती हुई लकड़ी समेत लकड़ी के अवशेष यानी कोयले को भी कुकीलः या कोकिलः कहा जाता रहा । बाद में सभ्यता बदली, संस्कार बदले । मनुष्य सभ्य हुआ और अग्निदण्ड जैसे हथियारों का प्रयोग अतीत की बात हो गई तब तक कोकिलः में निहित अग्निदण्ड या जलती लकड़ी के अवशेष यानी बुझे अंगारे वाला भाव भी गायब हो चुका था और कोकिलः अब कोइलअ होते हुए कोयला बन चुका था ।

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Friday, March 9, 2012

बनिया-बक्काल यानी प्रोविज़न स्टोर वाला

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मतौर पर किसी शब्द की पहचान इसलिए उभर नहीं पाती क्योंकि वह किसी शब्दयुग्म का हिस्सा होता है । बक्काल ऐसा ही एक शब्द है जिसका स्वतंत्र प्रयोग शायद ही हिन्दी में होता हो । किसी के सामने बोलने पर वह भी इसकी शिनाख़्त शायद ही कर पाए । मगर बनिया-बक्काल के रूप में इसे सब जानते हैं । भारतीय समाज में व्यवसायगत पहचान ही सदियों बाद जातीय पहचान बन कर उभरी । इस प्रक्रिया में कई ऐसे शब्द बने हैं जिनका जन्म सामान्य बोलचाल में हुआ मगर कालान्तर में उन्हें जातीय पहचान के हीन दृष्टिकोण से देखा जाने लगा । भारत के व्यापारी समुदाय मे बनिया वर्ग भी शामिल है । बनिया शब्द की अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा हुआ और यह शब्द ऐसे लोगों के लिए भी प्रयोग होने लगा जो जोड-गुणा-भाग के साथ जीवन जीते हैं । बेहद कंजूस, कृपण व्यक्ति को भी बनिया कहा जाने लगा और चतुर, व्यवसाय बुद्धिवाला व्यक्ति भी बनिया हो गया । इस शब्द के मेल से कई विशेषण भी बने जिनका मुहावरेदार प्रयोग हम आए दिन करते हैं मसलन बनिया-बुद्धि, बनिया-मानिसिकता, बनिया-मेन्टैलिटी , बनियाटाइप, बनियापन जैसे प्रयोगों ने हमारी अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है । ऐसा ही एक शब्दयुग्म है बनिया-बक्काल । यह भी सच है कि इन प्रयोगों की बदौलत ही बनिया की जातीय पहचान रखने वाले लोगों में असन्तोष भी है और वे इस शब्द से खुद की शिनाख्त नही कराना चाहते । एक सदी से भी पहले ब्रिटिशकाल में बनिया-बक्काल विशेषण के स्थान पर वैश्य शब्द का प्रयोग करने की माँग की थी ।
बसे पहले बक्काल की बात । बक्काल हिन्दी का अपना नहीं है बल्कि सेमिटिक शब्दावली का हिस्सा है और फ़ारसी और उर्दू पर सवार होकर यह हिन्दी के कारवाँ में दाखिल हुआ है । सेमिटिक परिवार की अरबी के ज़रिये यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि यूरोपीय भाषाओं में भी शामिल हुआ । बक्काल के बारे में हिन्दी के कोश  कामचलाऊ जानकारी ही देते हैं सिर्फ़ इतना ही कि यह बनिया शब्द का पर्याय है और रोज़मर्रा की चीज़ें बेचनेवाला छोटा दुकानदार, किरानी आदि का भाव इसमें है । सेमिटिक मूल के बिकाला का अरबी भाषा में अर्थ होता है ताज़ा बने सामान की दुकान जैसे दूध, मक्खन, पनीर, घी, सब्ज़ी आदि । इससे ही बना है बक्क़ाल जिसका अर्थ है दूध, पनीर, सब्ज़ी आदि बेचने वाला । हिन्दी में सब्ज़ी, डेरी प्रॉडक्ट या ताज़ा वस्तुओं की दुकान के लिए कोई शब्द नहीं मिलता । अंग्रेजी का फ्रेश-मार्ट शब्द शहरों में चल पड़ा है । सब्ज़ी बेचनेवाले को सब्ज़ीवाला ही कहते हैं, मगर वह दूध, दही या पनीर नहीं रखता । बतौर सब्ज़ीवाला, अरविन्दकुमार के सहज समान्तर कोश में बक्काल भी एक पर्याय है । हिन्दी का कुँजड़ा शब्द सिर्फ़ देहात में बोला समझा जाता है । कुँजड़ा सब्ज़ी बेचनेवाले को कहते हैं । यह जातीय विशेषण भी है । कुँजड़ावर्ग में मुस्लिम ज्यादा हैं । सब्ज़ीवाला एक सामान्य सम्बोधन है और सब्ज़ीफ़रोश अप्रचलित शब्द है । माली शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसका आशय बाग़वानी करनेवाले उस समुदाय से है जो मुख्यतः बाग़ीचे की देखभाल करता है, फूल उगाता है और सब्ज़ी भी उगाता है । इसके बावजूद इन विक्रेताओं के यहाँ हम दूध, दही, पनीर मिलने की कल्पना नहीं कर सकते । इसीलिए ताज़ा बने सामान के विक्रेता के लिए बक्काल शब्द की अर्थवत्ता काफ़ी व्यापक है और एशिया से लेकर पूर्वी यूरोप तक अब बक्क़ाल के मायने किराने की दुकान या किरानी होता है ।
बिक़ाला में मूलतः हरी-ताज़ा वस्तुओं की दुकान का भाव है । इसे सब्ज़ी की दुकान भी कहा जा सकता है । इसी कड़ी में आता है बक़्ल जिसका अर्थ है जड़ी-बूटी । इसका एक रूप है बक़ाला यानी बीज । बक्काल को कही छोटा बाज़ार कहा जाता है तो कहीँ छोटी दुकान । बक्क़ाल दरअसल पुराने ज़माने का सुपर मार्केट था जहाँ एक ही स्थान पर बहुत सी चीज़ें मिल जाती थीं । आज भी छोटे छोटे गाँवों में किराने की एक ही दुकान होती है जहाँ प्याज-लहसुन से लेकर दूध-दही, आटा-दाल से लेकर नमक-मिर्च तक सारी वस्तुएँ मिलती हैं । अरब के रेगिस्तान में दूरदराज़ के सैलानी ऐसी ही दुकानों से सौदा-सुलफ़ लिया करते थे । बिक़ाल का जन्म ब-क़-ल धातु से माना जाता है जिसमें अंकुरण, वृद्धि, खिलना, बढ़ना, फूलना जैसे भाव हैं । ज़ाहिर है ये सभी भाव ताज़गी में भी हैं । अंकुरित बीज, ताज़ा दूध, नमक, मिर्च, आटा-दाल जैसी चीज़ें ही प्राचीन क़बाइली समाज की प्रमुख ज़रूरत थी । यह सब बिक़ाला में मिल जाता था । बिक़ाला यानी किराना या जनरल स्टोर और बक्क़ाल यानी किरानी, पंसारी या बनिया ।
बक्काल शब्द अरबी से तुर्की में गया जहाँ किराने की दुकान के भाव को और विस्तार मिला और तुर्की भाषा में इसकी व्याख्या हुआ बाक़-आल । बाक ( bak )यानी देखना और आल ( aal ) यानी चुनना अर्थात ऐसी जगह जहाँ रोजमर्रा का सामान मिलता है । इस व्याख्या से पुराने ज़माने के किसी छोटे-मोटे सुपरमार्केट की कल्पना दिमाग़ में आती है । हॉब्सन-जॉब्सन कोश से पता चलता है कि उन्नीसवीं सदी के भारत में सेकंड हैंड वस्तुओं के व्यापारी या कबाड़ी के लिए भी बक्क़ाल शब्द प्रचलित था । व्यु्त्पत्ति के सेमिटिक आधार को मज़बूत करने की एक वजह और है । बक़्ल की तर्ज़ पर अरबी में ब-क-ल धातु से बना है बक्र जिसका अर्थ है शुरुआत, दिन की शुरुआत, ताज़ा, पवित्र, शुद्ध या प्राकृतिक वगैरह । ताज़गी का भाव यहाँ भी उभर रहा है ।  बक्ल और बक्र में और का अन्तर है । और ध्वनियों में रूपान्तर की वृत्ति होती है । ज़ाहिर सी बात है कि बक्र और या बक्ल, दोनों में बात ताज़गी की है । सुबह सो कर उठने के साथ, दिन की शुरुआत दूध-ब्रेड से होती है । सबसे पहले इन्हीं पदार्थों की दुकानें खुलती हैं । दिन चढ़ने के साथ साथ ये दुकानें जनरल स्टोर में तब्दील हो हो जाती हैं और दूध, दही, सब्ज़ी की बिक्री कम होती जाती है । सो बक्काल में मूलतः सब्ज़ी-दूध की दुकान का भाव था जो बाद में किराने की दुकान में तब्दील हो गया । आज के किराने के दुकान को प्रोविज़न स्टोर कहते हैं  जहाँ बक्काल की प्राचान अवधारणा के तहत दूध, दही, पनीर, सब्ज़ी से लेकर खाने-पीने की पैक बन्द सामग्री और किराने का दूसरा सामान भी मिलता है ।
ब बनिया की बात । उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणि जैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ । पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है। पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का 'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, और पणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था। पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है । आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है । हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है । वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है । इससे ही बना है “वाणिज्य” और “वणिक” जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है । पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा- वणिक > बणिक > बनिअ > बनिया
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि , पणम , फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है।

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