Monday, May 28, 2012

कमाल तकियाकलाम का

speechपिछली कड़ी- तकिये की ताकत
ब आते हैं तकियाक़लाम पर । तकियाक़लाम एक ऐसा अनावश्यक शब्दयुग्म या पद होता है जिसे बोलने की आदत कई लोगों में होती है । इसका असर शुरुआत में नाटकीय किन्तु अक्सर चिढ़ पैदा करने वाला होता है, मगर बोलने वाले को इसका अहसास नहीं होता । मिसाल के तौर पर – “जो है सो”, “क्या बात है,” “माने की”, “आप जानो कि,” “क्या कहते हो, “आप तो जानते हो”, “नई यार”,“अब क्या बताएँ” आदि आदि । तकियाकलाम के आदी क़िरदार अक्सर समाज में मज़ाक का पात्र बनते हैं । अंग्रेजी में इसे कैचफ़्रेज़  catchphrase कहते हैं । तकियाक़लाम बना है फ़ारसी के तक्या और अरबी के क़लाम से मिल कर । इसका सही रूप भी तक्याकलाम ही होता है । तकियाकलाम के लिए उर्दू में सखुनतकिया शब्द भी है जो किसी ज़माने में हिन्दुस्तानी में भी प्रयुक्त होता था, अब कि हिन्दी में इसका चलन नहीं है । चाहे जो हो, ये “कलाम” का “तकिया” भी कमाल का होता है । देखते हैं इसकी जन्मपत्री ।

तकिया

किया की आमद हिन्दी में फ़ारसी से हुई है और इसका सही रूप है तक्या takya जो हिन्दी में दीर्घीकरण के चलते तकिया हो गया । तकिया शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया । तकिया शब्द में मुलायमियत, गद्देदार या नरमाई का लक्षण महत्वपूर्ण नहीं है । तकिया की रिश्तेदारी हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी भाषाओं में मौजूद कई अन्य शब्दों से भी जुडती है जैसे ताक़ यानी आला, आलम्ब, म्याल अथवा मेहराब । शक्ति के अर्थ में ताक़त भी इसी कड़ी में है । मुतक्का यानी आलम्ब या सहारा भी इसी क़तार में खड़ा नज़र आता है । तकिया ( फ़ारसी तक्या ) के मूल में भी ताक शब्द ही नज़र आता है जिसमें मेहराब, म्याल, आलम्ब, आधार का भाव है जिस पर छत टिकती है । अरबी में यह ताक़ है और फ़ारसी से ही गया है । इस पर पिछले आलेख में विस्तार से चर्चा हो चुकी है । स्पष्ट है कि सिर के नीचे इस्तेमाल होने वाले जिस तकिया से हम सबसे ज्यादा परिचित हैं उसमें मूल भाव सिर को सहारा देने का है । प्रकारान्तर से इसमें आराम का भाव भी जुड़ जाता है ।
क़लाम
रबी का क़लाम शब्द भी हिन्दी में खूब बोला-समझा जाता है जिसमें मूलतः कही गई बात का आशय है जैसे वचन, कथन, उक्ति, वक्तव्य आदि । कलाम बना है सेमिटिक धात k-l-m से जिसमें कहने का भाव है । कलाम का अर्थ हिन्दी में आम तौर पर काव्यगत उक्ति या छंदबद्ध उक्ति से लगाया जाता है । किसी शायर की रचना से उठाई गई बात कलाम कही जाती है । जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक कलाम में तर्क, बहस, दलील, विवेचना, विवाद जैसे भाव भी हैं,
मुम्बइया फिल्मों में तो हास्य पैदा करने के लिए ऐसे क़िरदार घड़े जाने की रिवायत आज तक चली आ रही है और साधारण सी फिल्में भी फूहड़ तकियाक़लाम बोलने वाले क़िरदारों की वजह से सुपरहिट हो गईं
इसका मूलार्थ है मुसलमान बनना । इस्लाम के प्रति धर्मनिष्ठ होना । इस्लाम की दीक्षा लेना । मगर हिन्दी में इसका प्रयोग किसी के प्रति खास अनुराग या निष्ठा दिखाने के आशय से भी होता है जैसे- “शर्माजी आजकल वर्माजी के नाम का कलमा पढ़ रहे हैं ।” मगर हिन्दी में इस आशय के प्रयोग कलाम के संदर्भ में कम देखने को मिलते हैं । कलाम की कतार में ही कलीम जिससे हिन्दी वाले व्यक्तिनाम के तौर पर परिचित हैं जैसे कलीमुल्ला, कलीमुद्दीनकलीम का अर्थ होता है कहने वाला, वक्ता । इसी तरह कलमा शब्द भी है जिसका आशय वचन, उक्ति से ही है मगर इसका रूढ़ अर्थ है । अरबी में कलमा नहीं बल्कि कलीमा है । कलीमा से आशय मुख्यतः इस्लाम धर्म के प्रसिद्ध बोधवाक्य “ ला इलाहा इलिल्लाह” जिसमें “ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, दूसरा कोई नहीं” जैसी बात कही गई है । हिन्दी में कलमा पढ़ना या कलमा पढ़ाना  प्रसिद्ध मुहावरे हैं भी है ।
तकियाकलाम
किया और कलाम दोनों पदों की अर्थवत्ता जानने के बाद तकियाकलाम पद का आशय साफ़ हो जाता है । ऐसा वाक्य या शब्द जिसका सहारा लिए बिना कोई (व्यक्ति) खुद को अभिव्यक्त ही न कर सके । यह शब्द या वाक्य निरर्थक होता है, मगर कहने वाला इसे बोलने का इतना आदी हो चुका होता है कि प्रत्येक संवाद के दौरान वह एक ख़ास क़लाम यानी शब्द या वाक्यांश का तकिया यानी सहारा लेता है । इसीलिए उस विशिष्ट शब्द या वाक्यांश को तकियाकलाम नाम मिल गया । मुम्बइया फिल्मों में तो हास्य पैदा करने के लिए ऐसे क़िरदार घड़े जाने की रिवायत आज तक चली आ रही है और साधारण सी फिल्में भी फूहड़ तकियाक़लाम बोलने वाले क़िरदारों की वजह से सुपरहिट हो गईं । -समाप्त
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Sunday, May 27, 2012

तकिये की ताक़त

pillowsसम्बन्धित कड़िया-1.बलाए-ताक नहीं, बालाए-ताक सही 2.ठठेरा और उड़नतश्तरी
मारे लिए भाषा संवाद का जरिया होती है, अर्थ जानने का नहीं । संवादों के जरिए समूचे मनोगत को अभिव्यक्ति मिलती है न कि शब्दार्थ को । शब्द विशिष्ट अर्थ को प्रकट करते हैं । वाक्यांश में उनके संदर्भ बहुधा भिन्न होते हैं । अक्सर ऐसा भी होता है कि अपनी मूल भाषा में व्यापक अर्थवत्ता वाले शब्द किसी दूसरी भाषा में पहुँचकर किसी एक ही अर्थ को ध्वनित करने लगते हैं अर्थात रूढ़ हो जाते हैं । इसीलिए हम किन्हीं शब्दों का सही-सही अर्थ न जानने के बावजूद उन्हें वाक्यों में प्रयोग करते हैं । ऐसा ही एक शब्द है तकिया । सिरहाने के लिए उपयोग में आने वाला छोटे गद्दी के लिए बेहद आम शब्द है तकिया । संस्कृत में इसके लिए उपधान या उच्छीर्षक शब्द हैं । उद् यानी उठान, ऊपर आदि । शीर्ष(क) यानी सिर, उच्च । मोनियर विलियम्स उच्छीर्षक प्रविष्टि में इसका अर्थ " that which raises the head " , a pillow अर्थात “वह जो सिर को ऊपर उठाए यानी तकिया” बताते हैं । गौरतलब है कि मराठी में तकिया के लिए उशी शब्द है और इसका जन्म उच्छीर्षक से हुआ है । वैसे बोलचाल में तकिया के लिए सिरहाना शब्द भी चलता है ।

किया की आमद हिन्दी में फ़ारसी से हुई है और इसका सही रूप है तक्या takya जो हिन्दी में दीर्घीकरण के चलते तकिया हो गया । तकिया शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया, इसके अलावा शब्दकोशों इसके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं देते हैं । तकिया के उपयोग पर गौर करें तो पाएँगे कि यह मूलतः सिर को सहारा देता है । सोते समय या टिक कर बैठते समय सिर को पीछे जाने से रोकने का आधार बनता है तकिया । यूँ भी कह सकते हैं कि तकिया सिर को ऊपर उठाता है । इस तरह स्पष्ट है कि तकिया शब्द में मुलायमियत, गद्देदार या नरमाई का लक्षण महत्वपूर्ण नहीं है । सभ्यता के शुरुआती दौर में मानव पत्थर का तकिया इस्तेमाल करता था, ऐसे प्रमाण पुरातात्विक स्थलों पर मिले हैं । चूँकि विश्राम अवस्था में गद्देदार वस्तुएँ ही काया को सुख पहुँचाती हैं, इसलिए कालांतर में चमड़े की थैलियों में घास-फूस भर कर तकिए बनाए जाते थे । उसके बाद कपड़े की खोल में रुई रुई वाले तकिये आम हो गए । तकिया की रिश्तेदारी हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी भाषाओं में मौजूद कई अन्य शब्दों से भी जुडती है जैसे ताक़ यानी आला, आलम्ब, म्याल अथवा मेहराब । शक्ति के अर्थ में ताक़त भी इसी कड़ी में है । मुतक्का यानी आलम्ब या सहारा भी इसी क़तार में खड़ा नज़र आता है ।

मेरे विचार में तकिया के मूल में इंडो-ईरानी भाषा परिवार की तक्ष् क्रिया है । सबसे पहले फ़ारसी तक्या या हिन्दी तकिया का अर्थ-विस्तार देखते हैं । हिन्दी शब्दसागर में पिलो, कुशन के अर्थ से इतर तकिया की कुछ अन्य अर्थछटाएँ भी दी गई हैं जैसे पत्थर की वह पटिया जो छज्जे को रोक या सहारे के लिए लगाई जाती है । इसे हम मेहराब के उदाहरण से समझ सकते हैं । तकिया यानी वह स्थान जहाँ विश्राम या आराम किया जाए । ध्यान रहे, किसी भी इमारत की छत को धनुषाकार मेहराब ही थामती है । पत्थरों में उत्कीर्ण मेहराब की रचना के लिए अरबी में ताक़ शब्द के प्रयोग से ऐसा लगता है कि ताक़ शब्द का रिश्ता वैदिक शब्दावली के तक्ष से है जिसमें उत्कीर्ण करने, काटने, तराश कर आकार देने जैसे भाव हैं । सम्भव है तक्ष से ही फ़ारसी का ताक बना हो और मेहराब के अर्थ में अरबी ने भी इसे आज़माया हो । हिन्दी में आमतौर पर ताक tak शब्द का प्रयोग होता है जो अरबी का शब्द है
ll …तकिया यानी आश्रय, आरामगाह, सुकूँ की जगह, ठहराव…तकिया वह जो सहारा दे, अवलम्ब बने…किसी भी जगह को सिर ढकने लायक बनाने वाली रचना यही मेहराब होती है जिसे ताक़ कहते हैं…. ताक़ की ताक़त पर ही छत टिकती है…ताक़ से ही तकिया यानी आश्रय बनता हैll
मगर इसका मूल फ़ारसी है । अरबी के ताक़ taq का अर्थ है मेहराब । वो घुमावदार कमानीनुमा आधार जिस पर किसी भी भवन की छत टिकी रहती है । वह अर्धचन्द्राकार रचना जो छत को ताक़त प्रदान करती है, उसे थामे रखती है । ताक़ में यही भाव है । हिन्दी में आने के बाद ताक़ शब्द में आला अर्थात दीवार में सामान रखने के लिए बनाया जाने वाला खाली स्थान, आला आदि और उसे भी कमानीदार, मेहराबदार आकार में बनाया जाता था । खास भात यही कि किसी भी जगह को सिर ढकने लायक बनाने वाली रचना यही मेहराब होती है जिसे ताक़ कहते हैं । ताक़ की ताक़त पर ही छत टिकती है । ताक़ से ही तकिया यानी आश्रय बनता है ।

ध्यान रहे, अरबी में एक शब्द है मुतक्का या मुत्तका जिसका अर्थ है सहारा, टेक लगाना, अवलम्ब, रोक, खम्भा, पिलर आदि । मुतक्का के मूल में अरबी का तक़ा शब्द है जिसमें सामर्थ्य, शक्ति, ऊर्जा, क्षमता का भाव है । अरबी का ताक़त शब्द इसी मूल का है और ताक़ से उसकी रिश्तेदारी है । ध्यान रहे, ताक़ चाहे, फ़ारसी मूल का हो, मगर शक्ति, ताक़त के अर्थ वाला तक़ा भी निश्चित तौर पर इससे ही बना है और इस तरह इस तरह अरबी का ताक़ जो फ़ारसी से ही गया है और फ़ारसी का तक्या दरअसल एक ही हैं । दोनों का अर्थ समान है और ध्वनि साम्य भी है । तक्या यानि तकिया में आश्रय का अर्थ भी है और विश्राम लेने के स्थान का बोध भी इससे होता है । आनंदकुमार के प्रसिद्ध उपन्यास “बेगम का तकिया” में यही तकिया है । कब्रिस्तान की जगह भी तकिया कहलाती है और कब्रिस्तान में किसी फ़क़ीर के आश्रयस्थल को भी तकिया कहा जाता है । स्पष्ट है कि सिर के नीचे इस्तेमाल होने वाले जिस तकिया से हम सबसे ज्यादा परिचित हैं उसमें मूल भाव सहारे का है , आराम का है । क्रब्रिस्तान अपने आप में आश्रय है जिस्म छोड़ चुकी रूहों का इसलिए उसे तकिया कहते हैं । कब्रिस्तान में जिस फ़क़ीर ने डेरा डाला वह उसकी आरामगाह है, शरणस्थली है, सहारा है इसीलिए फ़कीर, दरवेश को तकियादार या तकियानशीं भी कहते हैं । तकिया शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है- जैसे तकिया करना यानी सहारा करना । साक़िब लखनवी का मशहूर शेर देखिए- “बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे । जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे ।।” भोपाल में बड़ी झील के बीच तकिया टापू बेहद खूबसूरत जगह है । यहाँ एक बाका तकियाशाह की मज़ार है । –जारी

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Thursday, May 24, 2012

सुभीता और सहूलियत

smile

बो लचाल की हिन्दी का एक आम शब्द है सहूलियत जिसका प्रयोग सुभीता, सुविधा, आसानी के अर्थ में होता है । सहूलियत का मूल तो अरबी भाषा है मगर हिन्दी में यह फ़ारसी से आया है । दरअसल इसका शुद्ध अरबी रूप सहूलत है । मराठी में सुविधा या आसानी के लिए सवलत शब्द प्रचलित है । इस सवलत में अरबी सहूलत के अवशेष देखे जा सकते हैं । सहूलत जब फ़ारसी में पहुँचा तो इसका रूप सोहुलत हुआ । इस रूप के अवशेष भी मराठी के सोहलत में नज़र आते हैं । सहूलत का एक और रूप भी मराठी में है व्यंजन का रूपान्तर सहजता से स्वर में हो जाता है । अरबी सहूलत से जिस तरह मराठी में सवलत बन रहा है उसी तरह लोकबोली में तत्सम शब्दावली के सुविधा का रूपान्तर सुभीता होता है । मालवी, राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी आदि बोलियों में सुभीता का सुविधा से प्रयोग होता है ।
सेमिटिक धातु s-h-l में सम, समतल, समान, चिकना, सपाट जैसे भाव हैं । ध्यान रहे, किन्हीं बातों या वस्तुओं को दुरूह, कठिन, मुश्किल, पेचीदा, जटिल बनाने वाला जो प्रमुख कारण है वह है “सम” का अभाव । ऊबड़-खाबड़, गड्ढों भरी सड़क पर चलना दुरूह होता है । जटिल, उलझी हुई बातें हमेशा पेचीदा ही समझी जाती हैं । खुरदुरापन हमेशा ही दुर्गुण है चाहे वह पेड़ की छाल हो या रूखी त्वचा । कोई सतह सम अर्थात एक समान हो, किसी रस्सी में गाँठ न लगी हो, समुद्र में तूफान अर्थात लहरें न हों, किसी बात में उलझाव न हो तो कल्पना करें कि सब कुछ कितना सुखद होगा ? तो मूलतः जीवन में जो कुछ भी उलझाव, अटकाव है उससे मुक्ति पाने और एक समान, चिकना, सपाट बनाने का आशय है सेमिटिक धातु स-ह-ल में ताकि सब कुछ सरलता, सहजता से हो जाए । स-ह-ल से बने सह्ल का हिन्दी रूप सहल है जिसका अर्थ सरल, सहज, सुगम होता है । सहूलत या सहूलियत का प्रयोग मूलतः सुविधा के अर्थ में होता है मगर इसकी अर्थवत्ता व्यापक है और सुगमता, आसानी, क़ायदा, नियम, अनुशासन, आराम, विश्राम, स्पष्ट, सरल, निर्बाध, निर्विघ्न, सपाट, सहज, शान्त जैसे भाव इसमें है ।
गौर करें कि असमानता, धक्का-मुक्की, हिचकोले, खड्डे, ऊबड़-खाबड़पन, उद्विग्नता, क्रोध, विषाद, अस्थिरता आदि बातें ही जीवन को अशान्त, असुविधापूर्ण बनाती हैं । इनके न होने की कामना ही हर कोई करता है । सहूलियत की ज़िंदगी में साधनों से आशय नहीं बल्कि बाधाओँ, रुकावटों से मुक्त जीवन से है । हमारे पास कार हो या न हो, सड़क की अगर मरम्मत हो जाए तो दोनों ही स्थितियों में यह सुविधा की बात होगी । यहाँ साधन महत्वपूर्ण नहीं है । “मुझे सहूलियत चाहिए” और “मुझे सहूलियत से रहते आना चाहिए” दोनों बातों में फ़र्क़ है । पहले वाक्य में किन्हीं सुविधाओं की इच्छा जताई गई है जबकि दूसरे वाक्य में नियम, क़ायदा, सहजता, शान्ति जैसे अनुशासनों का पालन करते हुए सहज-सरल जीने का ढंग विकसित करने का आशय है ।
सुविधा के मूल में है संस्कृत का विधा शब्द, जो बना है विध् धातु से । ध्यान रहे आसान, सरल और समान बनाने के लिए हमेशा ही चीज़ों के गुँथे हुए रूप को खोलना पड़ता है , विभाजित करना पड़ता है, तोड़ना पड़ता है । ऊबड़-खाबड़ रास्ते के पत्थरों को तोड़ कर एक समान किया जाता है । गठान को दो हिस्सों में खोला जाता है । विध् में चुभोना, काटना, बाँटना, विभाजित करना जैसे भाव खास हैं । इसके अलावा सम्मानित करना, पूजा करना, राज्य करना जैसे भाव भी हैं । विध् का ही एक रूप वेध भी है जिसमें छेद करना, प्रवेश करना, चुभोना का आशय है । वेध में शोध भी है । लक्ष्यवेध, शब्दवेध जैसे शब्दों को इन आशयों के जरिए परखें । जाहिर है किसी दिशा में गहराई तक जाकर कोई तथ्य निकाल कर लाना ही शोध है । बींधना या बेधना जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं । रास्ता बनाने के लिए भी पहाड़ में सुराख करना पड़ता है, तोड़ना पड़ता है ।
मोटे तौर पर विध् में राह, परिपाटी का भाव है और विधा में भी यही आशय है । बाद में विकल्प, माध्यम, रूप, समाधान और तरीका के रूप में भी राह, रीति जैसे शब्द को नई अभिव्यक्त मिली । सुविधा का अर्थ भी स्पष्ट है । वह तरीका, प्रणाली या रास्ता जो उचित, सुचिन्तित, सुगम है । सुविधा उस रीति या राह को कहते हैं जिस पर चलना सुगम, सरल, सहज हो । आर्य भाषाओं में का रूपान्त होता है और फिर का बदलाव में होता है । गौर करें वैजयंती शब्द पर । लोकबोली में यह बैजंती होता हुआ भैजंती तक बनता है । यह मुखसुख के  परिवर्तन हैं । सुविधा से सुभीता का क्रम भी कुछ यूँ रहा- सुविधा > सुबधा > सुभीता । सुभीता में भी तरीका, प्रणाली, सहूलियत, सुयोग, चैन, सुख, आसानी का आशय हैं ।

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Tuesday, May 22, 2012

अमन की बातें, चैन की बंसी

peaceपिछली कड़ी- सकीना और शान्ति

सु ख-शान्ति के अर्थ में हिन्दी में अमन-चैन समानार्थी शब्दयुग्म का भी इस्तेमाल होता है । गौरतलब है कि अमन-चैन का पहला पद सेमिटिक मूल का है और दूसरा आर्यभाषा परिवार का । “चैन” शब्द में सुख, आनंद, आराम, सुकून जैसे भाव हैं । इसका एक अभिप्राय “शान्ति” भी है मगर शान्ति की तरह चैन शब्द में निर्वाण या मृत्यु जैसा भाव नहीं है । इसी तरह शान्ति में निहित खामोशी, स्तब्धता, मौन या निशब्दता का भाव भी चैन में नहीं है । चैन शब्द का प्रयोग कई तरह से होता है । अमन-चैन की तरह ही चैन का निर्वाह शान्ति-चैन और चैन-शान्ति अथवा चैन-सुख या सुख-चैन के क्रम से भी होता है । कभी-कभी तो तीनों अर्थात अमन-चैन-शान्ति का साथ हो जाता है और सुख पीछे छूट जाता है । चैन में मूलतः आराम, बेफिक्री के साथ सुख और आनंद का भाव है । “चैन की नींद सोना”, “चैन की बंसी बजाना”, “चैन की साँस लेना”, “चैन मिलना”, “चैन से कटना” जैसे मुहावरों ये आशय स्पष्ट भी हो रहे हैं । चैन में भौतिक सुख की अपेक्षा मानसिक सुख की अनुभूति का तत्व ज्यादा है । चैन शब्द भी व्यक्तिवाचक संज्ञा के तौर पर लोकप्रिय है जैसे चैनसुख, चैनरूप, चैनसिंह, चैनाराम वगैरह वगैरह।
चैन शब्द की व्युत्पत्ति पर भाषाविद् एकमत नहीं हैं । जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी, इंग्लिश, उर्दू कोश के मुताबिक चैन का जन्म “शान्ति” की कोख से ही हुआ है । उधर कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश और श्यामसुंदर दास सम्पादित हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक चैन शब्द का रिश्ता संस्कृत के “शयन” से है । तार्किक नज़रिए से देखा जाए तो भी और व्युत्पत्तिमूलक ध्वनिसाम्य के नज़रिए से मेरे मत मे भी “शयन” में ही “चैन” के जन्मसूत्र मिलते हैं । संस्कृत की “शी” धातु में निंद्रा, विश्राम, शांति का भाव है। वामन शिवराम आप्टे के मुताबिक “शी” से ही बना है “शयन” जिसमें लेटने का भाव है । गौर करें लेटने की क्रिया थकान से मुक्ति पाने के लिए होती है इसीलिए “शी” का एक अर्थ विश्राम भी है । विश्राम से शान्ति मिलती है क्योंकि विश्राम में भी स्थैर्य, निवृत्ति, आराम का भाव है । यही भाव शान्ति में भी हैं । ध्यान रहे मोनियर विलियम्स और वाशि आप्टे के कोशों में शी का एक अन्य अर्थ शान्ति भी दिया हुआ है । ज़ाहिर सी बात है शयन में भी विश्राम के लिए लेटने का भाव ही है जिसका आशय निंद्रा के अर्थ में रूढ़ हुआ । शयन से चैन बनने की क्रिया में का में बदलना सामान्य बात है । इसी तरह यहाँ व्यंजन, स्वर में बदल रहा है ठीक वैसे ही जैसे नयन में वर्ण स्वर में बदलता है । में स्थिर अ स्वर का से मेल होता है और नयन से नैन बन जाता है । इसी तरह बयन ( तत्सम वचन का रूपान्तर ) बैन हो जाता है । इसी तर्ज़ पर शयन से चैन बन रहा है । शान्ति में भी आराम, विश्राम, स्थिरता, मौन, चुप्पी जैसे भाव हैं मगर शान्ति में जिस तरह स्वर और व्यंजन संश्लिष्ट रूप में हैं, उससे चैन का निर्माण दुरूह लगता है ।
जिस तरह शान्ति और सकीना  व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के स्त्रीवाची रूप हैं उसी तरह चैन और अमन व्यक्तिवाची संज्ञाओं के पुरुषवाची रूप हैं । हिन्दी में अमन एक खूबसूरत नाम है । पंजाब में अमनपाल भीप्रचलित नाम है । अमन का अर्थ है सुरक्षा, शान्ति, चैन, निश्चिन्तता, इत्मीनान आदि । अमन मूल रूप में अम्न है जो सेमिटिक धातु a-m-n से बना है । अम्न में सलामती, चंगाई, महफ़ूज़ियत, निश्चिन्तता, बेफ़िक़्री और सुरक्षा का भाव है । यही सारे भाव अम्न में भी हैं । इसका एक समानार्थी रूप अमान भी है । उर्दू-हिन्दी में शान्ति-सुरक्षा या चैन-शान्ति की द्विरुक्ति की तरह अम्नो-अमान पदबंध भी प्रयुक्त होता है जैसे- “मुल्क में अम्नो-अमान कायम रहे ।” अम्न से अरबी में कई शब्द बने हैं जिनमें से अधिकांश बरास्ता फ़ारसी ज़बान, हिन्दी में भी चले आए हैं । ऐसा ही एक शब्द है अमानत । अमन में जिस सुरक्षा की बात हो रही है, अमानत का रिश्ता भी सुरक्षा से है । अमानत यानी धरोहर अथवा थाती । लम्बे समय से चली आ रही कोई वस्तु, स्थापत्य-वास्तु, रिवायत, परम्परा, बोली, भाषा, साहित्य, वचन अथवा निधि ही अमानत या धरोहर कहलाती है । उक्त बातों में लम्बे समय से सुरक्षित बने रहना खास है । अमानत वह जो सुरक्षित है या जिसे सुरक्षित रखा जाना है । महाजनी सभ्यता में गिरवी रखी गई वस्तु भी कहलाती है जिसके बदले कोई राशि सूद पर ली जाती है । थोड़े समय के लिए किसी के पास रखा गया कोई सामान या सम्पत्ति भी अमानत है । यूँ देखें तो अमानत के दायरे में वह हर बात आ जाती है जिसे हमेशा महफ़ूज़ रहना है । अमानत में ख़यानत हिन्दी के लोकप्रिय मुहावरों में एक है जिसका अर्थ है किसी के भरोसे को आघात पहुँचाना । सीधा अर्थ है किसी की धरोहर को ठिकाने लगा देना । ये तमाम शब्द संज्ञानाम भी हैं जैसे अमानत अली, अमानुल्ला आदि ।
म्न की कतार में ही खड़े हैं कुछ और शब्द । व्यक्तिनाम के तौर पर अमीन शब्द भी अपरिचित नहीं हैं । मुस्लिम समाज में अमीन प्रथम नाम होता है । रेडियो सीलोन के ज़रिये मशहूर हुए उद्घोषक अमीन सयानी को याद करें । यूँ देखें तो अमीन शब्द का रिश्ता हिन्दुओं से भी है । अमीन यानी सच्चा व्यक्ति । जिस पर भरोसा किया जा सके । महाराष्ट्र में अमीन एक उपनाम भी होता है । एक केंद्रीय मन्त्री भी इस नाम वाले हुए हैं- नरहरि अमीन । मुस्लिम दौर में अमीन एक सरकारी ओहदा होता था जिस पर ब्राह्मण या कायस्थों की तैनाती होती थी । अमीन आमतौर पर राजस्व-प्रशासन से जुड़ा व्यक्ति होता था जिसके पास अमानती काग़ज़ात होते थे । वह अफ़सर ज़मीनों के बंदोबस्त देखता था । भूमि की नपाई, बँटवारा तथा अन्य अमल बजाने वाले कामों को अंजाम देने वाला ख़ास अफ़सर होता था अमीन जिसके नाम का अर्थ भी विश्वासपात्र, भरोसामंद है । जॉन प्लैट्स के कोश में अमीन ऐ हिसाब जैसे एक ओहदे का ज़िक़्र है जिसका अर्थ उन्होंने लेखा-परीक्षक बताया है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक अदालत के निर्देश पर तफ़्तीश करने वाला कारिंदा भी अमीन कहलाता था मोल्सवर्थ के मराठी इंग्लिश कोश में अमीन को मध्यस्थ, पंच या सरपंच बताते हुए उसकी तुलना ब्रिटिश काल के के मुन्सिफ़ से की गई है । स्पष्ट है कि अमीन दीवानी न्यायकर्ता का पद था । न्यायाधीश या सरकारी अफ़सर में सरकार और जनता का विश्वास अर्जित करने का गुण होना चाहिए । मध्यस्थ या पंच वही व्यक्ति हो सकता है जिस पर दोनो पक्ष भरोसा करें । अमीन का स्त्रीवाची अमीना हुआ ।
सी कड़ी में आता है ईमान जो हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय और इस्तेमालशुदा शब्दों में शामिल है । बोली-भाषा में ईमान शब्द की रच-बस इतनी ज्यादा है कि इसका हिन्दी पर्याय एकदम से सूझता नहीं है । ईमान का कर्ता रूप ईमानदार है । ईमान का अर्थ होता है भरोसा, विश्वास, आस्था, सदाचार, सदवृत्ति आदि । ईमानदार यानी जिस पर भरोसा किया जा सके । ईमान शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता है । “ईमान जाना”, “ईमान डोलना”, “ईमान की कहना” आदि वाक्यों में ईमान की मुहावरेदार अर्थवत्ता सिद्ध होती है । ईमान के साथ ही रहित अर्थ वाला फ़ारसी उपसर्ग बे लगाने से बेईमान शब्द बनता है । हिन्दी की लोकप्रिय शब्दावली में जिसका रुतबा भी खासा ऊँचा है । ईमानदार और बेईमान ये दोनों शब्द ऐसे हैं जिनके हिन्दी पर्याय तलाशने की कभी ज़रूरत महसूस होती है । भरोसा, विश्वास जैसे भावों को अभिव्यक्त करने वाला एक अन्य शब्द है मुमिन जिसका फ़ारसी रूप मोमिन होता है और हिन्दी में भी यही रूप प्रचलित है । आमतौर पर मुसलमान को मोमिन भी कहा जाता है । सेमिटिक धातु स-ल-म से कई शब्द बने हैं । इस्लाम शब्द के पीछे भी यही धातु s-l-m है जिसका मतलब अखण्डता और शांति है । इस्लाम दरअसल अरबी शब्द अस्लम से बना है जिसका मतलब है बहुत सहिष्णु, बहुत सुरक्षित, बहुत निश्चिन्त । ज़ाहिर है ये सब गुण जिसमें होंगे वह अपने पंथ के प्रति अडिग होगा ही । सो इस्लाम पर आस्था रखनेवाल, उस पर अडिग रहने वाला मुस्लिमुन हुआ जिससे मुसलमान शब्द बना है । कुछ यही बात अम्न से बने मोमिन में भी है और इसीलिए इस्लाम मानने वालों को मोमिन भी कहा जाता है अर्थात जो विश्वासु है, भरोसेमंद है, आस्तिक है ।

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Wednesday, May 16, 2012

सकीना और शान्ति

peace-of-mind

कि न्ही शब्दों के अन्य भाषाओं में पर्याय तलाशने का काम तो रोज़मर्रा में हम करते ही हैं क्योंकि आज के महानगरीय जीवन में हमारे इर्दगिर्द बहुभाषी परिवेश है । मगर व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के अन्य भाषाओं में प्रतिरूप तलाशने की दिलचस्प मग़ज़मारी लोग कम करते हैं । हमें यह चस्का अर्से से है । शब्दों का सफ़र में ऐसे प्रतिरूपों पर कभी-कभार चर्चा हुई है मगर व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के संदर्भ में कम बात हुई है । इस बार कुछ ऐसा ही शग़ल करने का मन है । हम बात करेंगे सक़ीना और शान्ति की । दोनों में बहनापा है । भाषा परिवार की दृष्टि से सक़ीना सेमिटिक परिवार से हिन्दी में आई है तो शान्ति का रिश्ता आर्यभाषा परिवार की वैदिक शब्दावली से जुड़ता है ।
मुस्लिम समाज में रखे जाने वाले ज्यादातर नाम अरबी मूल से आते हैं । अरबी की कई व्यक्तिवाचक संज्ञाओं से बरास्ता उर्दू हम परिचित होते हैं । हमारे आसपास के मुस्लिम परिवेश में हम स्त्री-पुरुषों के नामों से हम परिचित होते हैं जैसे अलीम, सलीम, कलीम...मगर इनका अर्थ जानने का प्रयास बहुत कम होता है । ऐसा ही एक शब्द है सकीना । दरअसल यह व्यक्तिवाचक संज्ञा है । सकीना नाम मुस्लिम परिवारों में कन्या के लिए रखा जाने वाला बड़ा आम नाम है । सकीना का अर्थ होता है शान्ति । मंटो की प्रसिद्ध कहानी खोल दो का प्रमुख किरदार दंगाइयों की ज्यादती का शिकार सकीना sakina नाम की लड़की है । सकीना का रिश्ता सुकून से है । अरबी भाषा से बरास्ता फ़ारसी होते हुए हिन्दी मे समाए आमफ़हम शब्दों में सुकून भी है । इसका शुद्ध रूप सुकूँ sukun है । सुकून यानी शान्ति, तसल्ली, चैन, आराम आदि । कहा जाता है कि शान्ति तभी मिलती है जब चित्त में स्थिरता हो । स्थैर्य और धैर्य दोनो ही ज़रूरी हैं । प्रोटो सेमिटिक भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण धातु है स-क-न ( s-k-n ) जिसमें निवास करने, रहने का भाव है । कुल मिला कर रहने, वास करने में स्थिरता का भाव प्रमुख है । मनुष्य ज़िंदगी में सुख, चैन, शान्ति की ही चाह रखता है । सुख भौतिक या आध्यात्मिक होते हैं मगर शान्ति सिर्फ़ मानसिक ही होती है । यही बात सुकून में भी है । सुखून की अनुभूति शरीर को नहीं, दिलो-दिमाग़ को होती है । मन जब तक भटकता रहेगा, अशान्ति रहेगी । मन जैसे ही स्थिर होगा, चैन आएगा, आराम आएगा । यही सुकून है जिसमें स्थिरता का भाव है ।
सेमिटिक स-क-न धातु से ही बना है तस्कीन या तस्कीं शब्द जिसका अर्थ है ढाढ़स, धैर्य, आश्वासन, दिलासा आदि । तस्कीन का प्रयोग शायरी में तो खूब होता ही है, रसीली हिन्दी लिखने बोलने वाले भी तस्कीन का प्रयोग करते हैं मसलन- “किसी के आने से दिल को तस्कीन तो मिलती ही है ।” इसी कड़ी में आता है साकिन शब्द जिसका अर्थ शाब्दिक अर्थ है जो स्थिर हो । इसका आशय किसी जगह विशेष पर निवास करने वाले से है । आज भी गाँव देहात में राजस्व दस्तावेज़ों में पुराने ज़माने की फ़ारसी का प्रयोग देखने को मिलता है जैसे रामबख्श वल्द मौलाबख्श साकिन नूरपुर ।
हिन्दी की एक आम स्त्रीवाची संज्ञा है शान्ति । चार-पाँच दशक पहले हर मोहल्ले पड़ोस के घरों की लाड़लियाँ-दुलारियाँ शान्ति के नाम से जानी जाती थीं । ऐसे शान्ति-सदन अब बिरले ही नज़र आते हैं । शान्ति यानी स्थिरता, चैन, आराम । मौन, चुप्पी, खामोशी । स्तब्धता, निर्वाण, मृत्यु । ये अलग-अलग अर्थ-संदर्भ हैं जिनके लिए शान्ति का प्रयोग होता है । शान्ति हिन्दी का तत्सम शब्द है । शान्ति के मूल में शान्त शब्द है और शान्त के मूल में है संस्कृत की शम् धातु जिसमें शान्त, चुप्प, मौन, स्थैर्य, जीत, अन्त, मूकता, आराम, निवृत्ति जैसे भाव अभिप्राय हैं । यही सारे आशय शान्त शब्द में भी हैं । सौम्य, मौन, नीरव, विरक्त और वैराग्य जैसे भाव भी शान्त से प्रकट होते हैं । प्रायः हल, निराकरण, समाधान आदि के प्रयोजन से शमन शब्द शब्द का प्रयोग होता है । आग बुझाने के संदर्भ में अग्नि-शमन या जानने के संदर्भ में जिज्ञासा-शमन, शंका-शमन जैसे शब्दयुग्मों पर ध्यान दें । शम् में निहित अन्त अथवा जीत का भाव यहाँ प्रमुख है । शमन यानी अन्त करना, विजय प्राप्त करना अर्थात निराकरण करना ।
शांतनु भी इसी मूल से उपजी व्यक्तिवाची संज्ञा है । महाभारत के कालजयी चरित्र भीष्म पितामह इन्हीं के पुत्र थे । शम् धातु से जन्मे शान्ति या शान्ता जैसे नामों को आजकल के माँ-बाप दकियानूसी समझते हैं वहीं इसी मूल से जन्मे शम्पा (विद्युत, तड़ित), शमित, शमिता ( शान्त, संतुष्ट ) और शांतनु जैसे नाम आधुनिक समझे जाते हैं । हालाँकि इन सबका मूलाधार वैदिक शब्दावली ही है । यूँ तो सभी धर्मों का संदेश सदाचार और शान्ति होता है मगर जैन धर्म के साथ शान्ति का नाता कुछ ऐसा है कि इस समुदाय में व्यक्तिनाम के तौर पर शान्ति शब्द का सर्वाधिक प्रयोग देखने को मिलता है । पुरुषों के नाम के साथ कुमार शब्द जोड़ा जाता है । जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर का नाम शान्तिनाथ है ।

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Friday, May 11, 2012

हुस्नो-एहसान की बातें

flower

फ़ा रसी के रास्ते हिन्दी में दाखिल हुए शब्दों में हुस्न का शुमार भी ऐसे शब्दों में होता है जिसका प्रयोग सुंदरता, रमणीक, खूबसूरत अथवा दर्शनीय जैसे भावों को व्यक्त करने में होता है । शेरो-शायरी की वजह से भी यह शब्द हिन्दी वालों की ज़बान पर चढ़ा हुआ है । हुस्न शब्द अरबी ज़बान से निकला है और इसके मूल में अरबी की हसूना क्रिया है जिसके मूल में भलाई, अच्छाई का भाव है । यह सेमिटिक धातु ह-स-न (h-s-n) से बना है जिसका अर्थ है सुंदर, सुंदर होना, परिष्कार, सँवारना, प्रशंसा करना आदि । हिन्दी में हुस्न शब्द का व्यापक इस्तेमाल न होते हुए इसे सिर्फ़ शारीरिक सौन्दर्य के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है । हाँ, उर्दू शायरी में हुस्न को सौन्दर्य अथवा खूबसूरती के व्यापक अर्थों में प्रयोग किया जाता है । प्राकृतिक सौन्दर्य के संदर्भ में हिन्दी में बिरले ही हुस्न का इस्तेमाल होता हो ।
हुस्न का प्रयोग महज़ रूप-आकार के सौन्दर्य को अभिव्यक्त करने तक सीमित नहीं है बल्कि अरबी में इसके दायरा व्यापक है । अल सईद एम. बदावी की अरेबिक-इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ़ क़ुरानिक यूसेज़ के मुताबिक हुस्न में दयालुता, परोपकार, पुण्य, उदारता, करुणा, सुखदायी, आनंददायी और दान जैसे आशय भी समाहित हैं । दरअसल ये सारे गुण मिलकर ही मनुष्य को मानवीयता का आधार देते हैं । इन्सानियत का हुस्न दरअसल इन गुणों से ही उभरता है । सो हुस्न में भौतिक सौन्दर्य प्रमुख नहीं है बल्कि उन बातों का उभार है जिनसे किसी रूपाकार में विशेष आकर्षण पैदा होता है । यह खूबी ही हुस्न है । कहा जा सकता है कि सौन्दर्य वह है जो मन को सुहाए यानी सुहावनापन ही खूबसूरती का प्रमुख आशय है न कि किसी रूपाकार के भौतिक आयामों का शास्त्रीय मापदण्डों पर आकलन । इससे सम्बन्धित हुस्तोआशिकी या हुस्नोजमाल जैसे सामासिक पद भी हिन्दी में चलते हैं । 
सन  एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है । इसका इस्तेमाल द्वितीय पद की तरह भी होता है जैसे अलीहसन । हसन hasan सामान्य तौर पर पुरुषवाची संज्ञा है जिसका अर्थ सुंदर, मोहक, खूबसूरत (व्यक्ति) है । इसी तरह हसीन शब्द भी इसी मूल से जन्मा है जिसका अर्थ भी सुंदर, खूबसूरत, मनमोहक होता है । इसका स्त्रीवाची हसीना है । आमतौर पर सुंदरी, लावण्यमयी युवती को हसीना की संज्ञा दी जाती है । पैगम्बर मोहम्मद के नवासे अली के बेटों के नाम हसन और हुसैन थे । हसन बड़े थे और हुसैन छोटे । हुसैन का आशय भी सुंदर ही है । एक अन्य व्यक्तिवाचक संज्ञा है मुहसिन । हिन्दी में यह मोहसिन के रूप में प्रचलित है । मोहसिन का अर्थ होता है दयालु, कृपालु, मददगार, रहमदिल, मेहरबान या उपकारी । इसका स्त्रीवाची मोहसिना होता है जैसे मोहसिना क़िदवई । इसी कतार में खड़ा है तहसीन । यह भी व्यक्तिवाचक संज्ञा है जिसका अर्थ है प्रशंसा, तारीफ़, क़द्र, आशीर्वाद आदि ।
मुस्लिम समाज में एहसान व्यक्तिवाचक संज्ञा के तौर पर भी इस्तेमाल होता है जैसे एहसान मलिक, एहसान ज़ाफ़री । पकार के आशय वाला अहसान ahsan शब्द  हिन्दी में खूब प्रचलित है । अरबी में इसका एहसान ehsan रूप है और हिन्दी में भी यही रूप ज्यादा प्रचलित है । हिन्दी शब्दकोशों में अहसान शब्द को हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल माना गया है । एहसान भी सेमिटिक धातु ह-स-न (h-s-n) से बना है । गौरतलब है कि उपकार, भलाई नेकी के अर्थ वाला अरबी का यह शब्द हिन्दी में अपनी मुहावरेदार अर्थवत्ता की वजह से इतना लोकप्रिय है कि आम बोलचाल में यह उपकार से भी ज्यादा सुनाई पड़ता है । एहसान मानना यानी कृतज्ञ होना, एहसान जताना भलाई का रौब जमाना या एहसान करना यानी उपकार करना, एहसान के क़ाबिल, एहसान का बदला जैसे मुहावरे हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं । एहसान में मूलतः भलाई करन या अच्छाई करने जैसा भाव है । कृतज्ञ के अर्थ में एहसानमंद और कृतघ्न के अर्थ में एहसानफ़रामोश शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं ।

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Monday, May 7, 2012

रग-रग की खबर

leaf

क्त वाहिनी के लिए हिन्दी में रग शब्द भी खूब प्रचलित है, अलबत्ता नस का चलन ज्यादा है । नस को नाड़ी भी कहते हैं और नलिका भी । रग भारत-ईरानी परिवार का शब्द है और फ़ारसी के ज़रिए हिन्दी में आया है जिसका सही रूप रग़ है । रग़ की व्युत्पत्ति के बारे में निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता । रक्त की पहचान उसका लाल रंग है और उसका काम है नसों में बहना क्योंकि वह तरल है और तरलता में नमी होती ही है ।  सो नमी और बहाव के गुणों को अगर पकड़ा जाए तो रग़ शब्द के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में नज़र आते हैं । वैदिक और जेंदावेस्ता साहित्य से यह स्ष्ट हो चुका है कि इंडो-ईरानी और भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनि में बुनियादी तौर पर गति, प्रवाह का भाव रहै है और ऐसे शब्दों की एक लम्बी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है जिनमें न सिर्फ राह, रास्ता, दिशा, आवेग, वेग, भ्रमण, चक्र, गति, भ्रमण जैसे आशय छुपे हैं बल्कि इनसे नमी, रिसन जैसे अर्थों का द्योतन भी होता है । रक्तवाहिनी मूलतः एक मार्ग भी है और और साधन भी जिसमें हृदय द्वारा तेज रफ़्तार से खून बहाया जाता है । गौरतलब है कि नल, नड, नद जैसे प्रवाही अर्थवत्ता वाले शब्द के पूर्वरूप से ही एक विशेष नली जैसे तने वाली वनस्पति का नाम नलिनी पड़ा । इसी तरह नदी के लिए भी नलिनी नाम प्रचलित हुआ ।
जॉन प्लैट्स रग़ के मूल में संस्कृत का रक्त शब्द देखते हैं । ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में रग़ की तुलना प्राकृत के रग्गो से की गई है जो रक्त का परिवर्तित रूप है । ध्वनि के आधार पर शब्दों के रूपान्तर की भी निश्चित प्रक्रिया होती है । इस हिसाब से देखें तो रक्त का एक रूप रत्त बनेगा और दूसरा रूप रग्ग या रग्गो हो सकता है । खास बात यह है कि रक्त साध्य है जबकि रग़ साधन का नाम है । रक्त की विशिष्ट पहचान उसका लाल होना है जबकि रक्तवाहिनी में गति प्रमुख है । इसलिए रक्त के रग्ग रूपान्तर से यह मान लेना कि इससे ही फ़ारसी का रग़ बना होगा, दूर की कौड़ी है । रक्त से बने रग्ग का अर्थ भी खून ही होता है । फ़ारसी का रग़ निश्चित ही रक्त से नहीं है । गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनियों से बने कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनमें जलवाची भाव हैं अर्थात जिनकी अर्थवत्ता में गति व प्रवाह के साथ साथ नमी, आर्द्रता और गीलेपन का आशय निहित है । इसे यूँ समझें कि किसी स्रोत से रिसाव में मुख्यतः गति से भी पहले गीलेपन का अहसास होता है, फिर वह रिसाव धारा का रूप लेता है ।
ख्यात जर्मन भाषा विज्ञानी जूलियस पकोर्नी ने भारोपीय भाषाओं में धारा, बहाव, प्रवाह, गति, वेग, नमी, आर्द्रता को अभिव्यक्त करने वाले विभिन्न शब्दों के कुछ पूर्वरूप तलाशे हैं जिससे इनके बीच न सिर्फ़ सजातीय साम्य है बल्कि इनका व्युत्पत्तिक आधार भी एक है । res, ros, eres ऐसे ही पूर्वरूप हैं जिनसे ताल्लुक रखने वाले अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जैसे दौड़ने के लिए रेस, आवेग के लिए आइर , संस्कृत का रसा अर्थात रस, पानी या नदी आदि । इन सबमें ऋ – री नज़र आता है । प्रोटो इंडोयूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु *reie- इसी कड़ी में आती है । इसमें भी ऋ की महिमा देखें । में मूलतः गति का भाव है। जाना, पाना, घूमना, भ्रमण करना, परिधि पर चक्कर लगाना आदि । प्राचीन संस्कृत धातु ऋत् और ऋष् में निहित गतिसूचक भावों का विस्तार अभूतपूर्व रहा है । संस्कृत धातु से बना है ऋत् जिसमें उचित राह जाने और उचित फल पाने का भाव तो है ही साथ ही चक्र, वृत्त जैसे भाव भी निहित हैं । हिन्दी के रेल शब्द में बहाव या प्रवाह का आशय निहित है । रेला शब्द की व्युत्पत्ति राल्फ़ लिली टर्नर संस्कृत के रय से मानते हैं जिसका अर्थ है तेज बहाव, तेज गति, द्रुतगामी, शीघ्रता आदि । रय बना है से जिसमें गति, प्रवाह का भाव है । इसी तरह र के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है ।
प्राचीन धारा, प्रवाह या नदियों के नामों में भी प्रवाहवाची र, री या ऋ के दर्शन होते हैं । एटिमऑनलाइन के मुताबिक जर्मनी की की प्रसिद्ध नदी है राईन Rhine जिसके पीछे भारोपीय धातु *reie- ही है जिसका अर्थ है गति और प्रवाह । लैटिन में राइवस शब्द का अर्थ धारा होता है । वैदिकी की सहोदरा ईरान की अवेस्ता भाषा में नदीवाची एक शब्द है ranha जिसका अभिप्राय प्रवाही धारा है और इतिहासकारों के मुताबिक यह रूस की विशालतम नदी वोल्गा का प्राचीन नाम है । मोनियर विलियम्स के कोश में संस्कृत में रिण्व् या रिण्वति का अर्थ जाना है । वैसे तो रेणुका शब्द का अर्थ भी नदी होता है और अवेस्ता के रंहा ranha से इसका ध्वनिसाम्य भी है किन्तु भाषाविज्ञानी रंहा का साम्य वैदिकी के रसा से बैठाते हैं जिसका अर्थ रस, नमी, रिसन, नदी, धारा आदि है । भाषा विज्ञानियों के मुताबिक वोल्गा नदी का नामकरण प्रोटो-स्लाव शब्द वोल्गा से हुआ है जिसमें नमी का आशय है । उक्रेनी में भी वोल्गा का यही अर्थ है । रूसी भाषा के व्लागा का अर्थ होता है नम इसी तरह चेक भाषा में व्लेह का अर्थ है गीलापन । दरअसल ये सारे शब्द जन्मे हैं प्राचीन शकस्थान यानी सिथिया क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भाषा के रा शब्द से जिसका अर्थ था वोल्गा नदी । मूलतः यह रा शब्द रिसन या नमी का प्रतीक ही था । इसकी तुलना अवेस्तन रंहा या संस्कृत के रसा से करनी चाहिए ।
ज के ताजिकिस्तान क्षेत्र का प्राचीन नाम सोग्दियाना था । सोग्दियन भाषा में रअक का अर्थ होता है वाहिका, नालिका आदि । र(अ)क यानी रक की तुलना फ़ारसी के रग़ से करनी चाहिए । दरअसल सोग्दियन र(अ)क ही फ़ारसी के रग़ का पूर्वरूप है । प्राचीन शक भाषा के मूल रिसन, नमी वाले भाव का स्लाव जनों नें अपनी भाषा में अनुवाद वोल्गा किया और इस तरह नदी का नाम वोल्गा बना । दरअसल मूल रंहा , राईन जैसे शब्द नदीवाची हैं और इनका अनुवाद वोल्गा हुआ । डॉ अली नूराई के कोश के मुताबिक भी अवेस्ता के रण्हा शब्द का अर्थ मूलतः एक कल्पित पौराणिक नदी है जिसे जरदुश्ती समाज मानता था । रंहा का ही रूपान्तर पहलवी में रघ, रग़ हुआ और फिर फ़ारसी में यह रग़ बना ।
गौर करें कि किसी स्रोत से जब रिसाव होता है तो उसकी अनुभूति नमी की होती है । सतत रिसाव प्रवाह बनता है । इस प्रवाही धारा तेज गति से सतह को काटते हुए अपने लिए मार्ग बनाती है जिसे नद, नदी, नाड़ी या नाली कहते हैं । शरीर में रक्त ले जाने वाली वाहिनियाँ ऐसी ही नाड़ियाँ या नालियाँ हैं । किसी विशाल भूभाग को सिंचित करने, पोषित करने और उसे हरा भरा रखने में भी नदियों की विशिष्ट भूमिका होती है । इन्हें हम किसी भूभाग की नाड़ियाँ कह सकते हैं । हमारे शरीर की नसें या रगें भी वही काम करती हैं । रग शब्द की व्युत्पत्ति रक्त से न होकर भारोपीय भाषा परिवार के ऋ-री ध्वनि से जन्मे जलवाची शब्द समूह से ज्यादा तार्किक लगती है । नस से जुड़े जितने भी मुहावरे हैं, वे सभी रग में समा गए हैं जैसे रग फड़कना यानी आवेग का संचार होना, रग दबना यानी किसी के वश में या प्रभाव में आना, रग चढ़ना यानी क्रोध आना, रग रग पहचानना यानी मूल चरित्र का भेद खुल जाना अथवा रग-पट्ठे पढ़ना यानी किसी चीज़ को बारीके से समझ लेना आदि ।

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