Friday, August 24, 2012

सपड़-सपड़ सूप

soup

चु स्की के लिए हिन्दी में सिप शब्द बेहद आसानी से समझा जाता है । सिप करने, चुसकने की लज़्ज़त जब ज्यादा ही बढ़ जाती है तब बात सपड़-सपड़ तक पहुँच जाती है जिसे अच्छा नहीं समझा जाता है । कहने की ज़रूरत नहीं की सिप करना, चुसकना और सपड़-सपड़ करने का रिश्ता किसी सूप जैसे पतले, तरल, शोरबेदार पदार्थ का स्वाद लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है । सिप से सपड़ का सफर शिष्टता से अशिष्टता की ओर जाता है । सिप और सपड़-सपड़ तरल पदार्थ को सीधे बरास्ता होठ, जीभ के ज़रिये उदरस्थ करने की क्रिया है। सिप के ज़रिये ज़ायक़ा सिर्फ़ पीने वाले को महसूस होता है वहीं सपड़-सपड़ का चटखारा औरों को भी बेचैन कर देता है । गौरतलब है कि सूप शब्द आमतौर पर अंग्रेजी का समझा जाता है । हकीक़त यह है कि पाश्चात्य आहार-शिष्टाचार का प्रमुख हिस्सा सूप मूलतः भारतीय है । सूप, सिप, सपर, सपड़, सापड़ जैसे तमाम शब्द आपस में रिश्तेदार हैं । यही नहीं, इस शब्द शृंखला के शब्द विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में भी हैं जिनमें चुसकने, सुड़कने, सिप करने का भाव है ।
चुस्की के लिए सिप शब्द याद आता है । सूप शब्द भारोपीय मूल का है और इसका मूल भी संस्कृत का सूप शब्द ही माना जाता है । जिसे सिप किया जाए, वह सूप। इसी कड़ी में सपर भी है । द्रविड़ में सामान्य भोजन सापड़ है और इंग्लिश में सिर्फ़ रात का भोजन सपर है। ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य गौरतलब है । यह सामान्य बात है विभिन्न भाषिक केन्द्रों पर अनुकरणात्मक ध्वनियों से बने शब्दों का विकास एक सा रहा है। अंग्रेजी में रात के भोजन को सपर इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें हल्का-फुल्का, तरल भोजन होता है। कई लोग रात में सिर्फ़ सूप ही लेते हैं । सपर का मूल सूप है । आप्टे और मो.विलियम्स के कोश में सूप का अर्थ रस, शोरबा, झोल, तरी जैसा पदार्थ ही कहा गया है । अंग्रेजी में यह तरल भोजन है । आप्टे कोश में सू+पा के ज़रिए इसे तरल पेय कहा गया है । यानी पीने की क्रिया से जोड़ा गया है । पकोर्नी इसकी मूल भारोपीय धातु सू seue बताते हैं जिसमें पीने की बात है । संस्कृत का सोम भी सू से ही व्युत्पन्न है । इसका अवेस्ता रूप होम है जिसमें पीने का आशय है । आदि-जर्मन रूप सप्प है । ज़ाहिर है प्राकृत, अपभ्रंश के ज़रिए हिन्दी का सपड़ रूप अलग से विकसित हुआ होगा और द्रविड़ सापड़ रूप अलग ।
वाशि आप्टे और मोनियर विलियम्स के कोश में सूप शब्द का अर्थ सॉस, तरी, शोरबा या झोलदार पदार्थ बताया गया है । हिन्दी शब्दसागर में इसे मूल रूप से संस्कृत शब्द बताते हुए इसके कई अर्थ दिए हैं जैसे मूँग, मसूर, अरहर आदि की पकी हुई दाल । दाल का जूस । रसा । रसे की तरकारी जैसे व्यंजन । संस्कृत में सूपक, सूपकर्ता या सूपकार जैसे शब्द हैं जिनका आशय भोजन बनाने वाला, रसोइया है । एटिमऑनलाईन के मुताबिक चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी में सिप शब्द दाखिल हुआ । संभवतः इसकी आमद चालू जर्मन के सिप्पेन से हुई जिसका अर्थ था सिप करना । पुरानी अंग्रेजी में इसका रूप सुपेन हुआ जिसमें एकबारगी मुँह में कुछ डालने का भाव था । रॉल्फ़ लिली टर्नर के मुताबिक महाभारत में आहार के तरल रूप में ही सूप शब्द का उल्लेख हुआ है । हिन्दी शब्दसम्पदा में एक अन्य सूप भी है । बाँस से बनाए गए अनाज फटकने के चौड़े पात्र के रूप में इसकी अर्थवत्ता से सभी परिचित हैं । आम भारतीय रसोई के ज़रूरी उपकरणों में इसका भी शुमार है । अनाज फटकने का मक़सद मूलतः दानों और छिलकों को अलग करना है । भक्तियुगीन कवियों ने सूप शब्द का दार्शनिक अर्थों में प्रयोग किया है । कबीर की “सार सार सब गहि लहै, थोथा देहि उड़ाय ” जैसी इस कालजयी सूक्ति में सूप की ओर ही इशारा है ।
चूसना, चुसकना बहुत आम शब्द हैं और दिनभर में हमें कई बार इसके भाषायी और व्यावहारिक क्रियारूप देखने को मिलते हैं। यही बात चखना शब्द के बारे में भी सही बैठती है। ये लफ्ज भारतीय ईरानी मूल के शब्द समूह का हिस्सा हैं और संस्कृत के अलावा फारसी, हिन्दी और उर्दू के साथ ज्यादातर भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं। चूसना, चुसकना, चुसकी शब्द बने हैं संस्कृत की चुष् या चूष् धातु से जिसका क्रम कुछ यूँ रहा- चूष् > चूषणीयं > चूषणअं > चूसना। इस धातु का अर्थ है पीना, चूसना । चुष् से ही बना है चोष्यम् जिसके मायने भी चूसना ही होते हैं । मूलत: चूसने की क्रिया में रस प्रमुख है । अर्थात जिस चीज को चूसा जाता वह रसदार होती है । जाहिर है होठ और जीभ के सहयोग से उस वस्तु का सार ग्रहण करना ही चूसना हुआ । चुस्की, चुसकी, चस्का या चसका जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं । गौरतलब है कि किसी चीज का मजा लेने, उसे बार-बार करने की तीव्र इच्छा अथवा लत को भी चस्का ही कहते हैं । एकबारगी होठों के जरिये मुँह में ली जा चुकी मात्रा चुसकी / चुस्की कहलाती है । बर्फ के गोले और चूसने वाली गोली के लिए आमतौर पर चुस्की शब्द प्रचलित है। बच्चों के मुंह में डाली जाने वाली शहद से भरी रबर की पोटली भी चुसनी कहलाती है। इसके अलावा चुसवाना, चुसाई, चुसाना जैसे शब्द रूप भी इससे बने हैं ।
सी कतार में खड़ा है चषक जिसका मतलब होता है प्याला, कप, मदिरा-पात्र, सुरा-पात्र अथवा गिलास । एक खास किस्म की शराब के तौर पर भी चषक का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा मधु अथवा शहद के लिए भी चषक शब्द है। इसी शब्द समूह का हिस्सा है चष् जिसका मतलब होता है खाना । हिन्दी में प्रचलित चखना इससे ही बना है जिसका अभिप्राय है स्वाद लेना । अब इस अर्थ और क्रिया पर गौर करें तो इस लफ्ज के कुछ अन्य मायने भी साफ होते हैं और कुछ मुहावरे नजर आने लगते हैं जैसे कंजूस मक्खीचूस अथवा खून चूसना वगैरह । किसी का शोषण करना, उसे खोखला कर देना, जमा-पूंजी निचोड़ लेना जैसी बातें भी चूसने के अर्थ में आ जाती हैं । यही चुष् फारसी में भी अलग अलग रूपों में मौजूद है मसलन चोशीद: या चोशीदा अर्थात चूसा हुआ । इससे ही बना है चोशीदगी यानी चूसने का भाव और चोशीदनी यानी चूसने के योग्य ।

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Wednesday, August 22, 2012

‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]

landscape1पिछली कड़ी-सरमायादारों की माया [माया-1] से आगे  

जॉ न प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता संस्कृत के ‘मातृका’ से जोड़ते हैं पर यह बात तार्किक नहीं लगती । अमरकोश के मुताबिक ‘माया’ शब्द के मूल में वैदिक धातु ‘मा’ है जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना, अधीन, माप, सम्पन्न, समाप्त, प्रसन्नता, खुशी, आनंद, कटि-प्रदेश, उलझाना, बांधना, ज्ञान, प्रकाश, जादू, तन्त्र, कालगणना आदि भाव हैं । इससे ही बना है ‘माप’ शब्द । किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः ‘उपमा’ शब्द का प्रयोग किया जाता हैं । यह इसी कड़ी का शब्द है । इसी तरह ‘प्रति’ उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला ‘प्रतिमा’ शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है । दिलचस्प बात यह कि फारसी का ‘पैमाँ’, ‘पैमाना’ या ‘पैमाइश’ शब्द भी इसी मूल से जन्मा है । संस्कृत उपसर्ग ‘प्रति’ का समतुल्य फ़ारसी का ‘पैति’ है । प्रति+मान से ‘प्रतिमान’ बनता है उसी तरह ‘पैति+मा’ से ‘पैमाँ’ (पैमान, पैमाना) बनता है । जो हिन्दी में प्रतिमान है वही फ़ारसी में पैमाना है । आयाम का कुछ अप्रचलित पर्याय ‘विमा’ भी इसी ‘मा’ से जन्मा है ।
लैटिन के ‘मेट्रिक्स’ matrix में भी अंतरिक्ष की परिमाप, विस्तार और मातृ सम्बन्धी भाव है । संस्कृत ‘मातृ’ और ‘मेट्रिक्स’ में रिश्तेदारी है । इसका रिश्ता भारोपीय धातु मे ‘me’ से जुड़ता है जिसके लिए संस्कृत मे ‘मा’ धातु है । मेट्रिक्स में स्त्री योनि, उर्वरता, गर्भ जैसे भाव हैं । यहाँ माँ के अर्थ में जननिभाव प्रमुख है और निरन्तर उर्वरता पर गौर करना चाहिए । वैदिक मा में इसके अलावा भी माता, उर्वरता, पृथ्वी, काल, मांगल्य, स्वामित्व, माया, जल जैसे आशय हैं । गौर करें ‘अम्मा’ के मूल में ‘अम्बा’ और प्रकारान्तर से ‘अम्बु’ यानी जल ही है । जल समृद्धि का प्रतीक है । प्रकृति के जलतत्व से ही जीवन सिरजा है । जल में ही जीवन है । इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं । यानी बात खगोलपिंडों तक पहुँचती है ।
भारतीय परम्परा में ‘मा’ धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है । ‘मा’ धातु में चमक, प्रकाश, माप का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से । प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ । स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए ‘मा’ शब्द रहा होगा । ‘मा’ के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी ‘परिमाप’ भी शामिल है । गौर करे कि फारसी के माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में ‘मा’ ही झाँक रहा है जो चमक और माप दोनों से सम्बन्धित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चांद से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है । अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही ‘मा’ है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का ‘मून’ moon है ।
गौरतलब है कि सम्पत्ति का सबसे आदिम पैमाना भू-सम्पदा और पशु-सम्पदा ही रहे हैं । दौलत या सरमाया के अर्थ में बाकी चीजें तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ शामिल होती चली गईँ । मुद्रा के आविष्कार के बाद सम्पत्ति में गणना की क्रिया भी शामिल हुई । प्राचीन काल में तो ज़मीन ही सम्पदा थी जिसका माप लिया जाता था, पैमाइश होती थी । बसाहट, खेती और अन्ततः आवास के लिए भूमि की नापजोख ज़रूरी थी ।  तो फ़ारसी के ‘सरमाया’ में जो ‘मायः’ है और संस्कृत-हिन्दी में जो ‘माया’ है उसका अभिप्राय धन-दौलत, सम्पदा से ही है । उसी अर्थ में ‘सरमाया’ शब्द का विकास ‘मायः’ से हुआ है । इन दोनो ही ‘माया’ के मूल में वैदिक ‘मा’ है । मनुष्य के पास प्रकृति को समझने लायक बुद्धि का विकास होने तक और उसके बाद भी प्रकृति उसके लिए अजूबा ही रही है । मनुष्य के ज्ञान का विकास प्रकृति को समझते हुए ही हुआ है । दुनिया को समझना ही ज्ञानी होना है । इसीलिए दुनियादारी शब्द में व्यावहारिक बुद्धि का संकेत है । दुनिया का ही व्यापक स्वरूप प्रकृति है ।
'मा' में मूलतः प्रकृति का ही भाव है । संस्कृत में ‘प्रमा’ का अर्थ होता है समझना, जानना, सच्चा ज्ञान, सही धारणा आदि । ‘प्रमा’ का एक अन्य अर्थ मातामही भी होता है । किसी चीज़ की पैमाइश करना, मापना आदि क्रियाएँ जानने-समझने का ही आयाम हैं । सो प्रकृति अपने आप में सम्पदा है । प्रकृति का निरीक्षण, माप-जोख की अभिव्यक्ति मा से होती है । मा की महिमा अपरम्पार है और इसकी अर्थवत्ता की वैविध्यपूर्ण विमाएँ ( आयाम ) ही इसे माया साबित करती है । ‘मा’ में निहित वैविध्यपूर्ण भावों से अर्थमाया की सृष्टि होती है । साफ़ है कि फ़ारसी का ‘मायः’ संस्कृत माया का समतुल्य ही है अलबत्ता मातृका, माया और ‘मायः’ तीनों के मूल में वैदिक ‘मा’ धातु ही है । [समाप्त]

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Tuesday, August 21, 2012

सरमायादारों की माया [माया-1]

अगली कड़ी-‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]wealth

ला लित्यपूर्ण और प्रभावी भाषा प्रयोग करते हुए अक्सर कुछ लोग धन-दौलत के अर्थ में 'सरमाया' शब्द का इस्तेमाल करते हैं । दुनिया का मूल चरित्र हमेशा पूंजीवादी समाज रहा है । पैसे के दम पर क्या नहीं हो सकता । दौलतमंद सर्वशक्तिमान होता है । इसीलिए ‘सरमाया’ शब्द की अर्थवत्ता में असर की अर्थवत्ता भी शामिल है । ‘सरमाया’ यानी पूंजी, दौलत, धन, कैपिटल इसलिए सरमायादार का अर्थ हुआ पूंजीपति, मालदार, धनी, दौलतमंद आदि । सियासत और ‘सरमाया’ का चोली-दामन का साथ है । ‘मायः’ से बने सरमाया, सरमायादार, सरमायादाराना, सरमायादारी जैसे शब्द लिखत-पढ़त की भाषा में प्रचलित हैं । इसके अलावा ‘मायादार’ जैसा शब्द भी है जिसका अर्थ भी धनी, मालदार ही है ।
हिन्दी में ‘सरमाया’ शब्द फ़ारसी से आया है । ‘सरमाया’ को अरबी का समझा जाता है पर यह भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और फ़ारसी के सर + ‘मायः’ से मिल कर बना है । गौरतलब है कि फ़ारसी का विकास बरास्ता अवेस्ता (वैदिक संस्कृत की मौसेरी बहन), पहलवी हुआ है । संस्कृत की तरह ही अवेस्ता में भी विसर्ग लगता रहा है और वहीं से यह फ़ारसी में भी चला आया । फ़ारसी के ‘मायः’ का उच्चारण माय’ह होना चाहिए मगर विसर्ग का उच्चार अक्सर स्वर की तरह होता है इस तरह फ़ारसी का ‘मायः’ भी माया उच्चारा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में ये दोनों ही रूप दिए हुए हैं । ‘सरमाया’ में जो ‘सर’ है वह सरदार, सरपरस्त, सरज़मीं, सरकार वाला सर ही है जिसका इस्तेमाल उपसर्ग की तरह होता है । सर का प्रयोग प्रमुख, खास, सर्वोच्च आदि की तरह होता है । यह जो फ़ारसी का ‘सर’ है उसका रिश्ता वैदिक संस्कृत के ‘शिरस्’ से है जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु का उच्चतम हिस्सा, कपाल, खोपड़ी, मस्तक, चोटी, शिखर, शुरुआत, पीक, बुर्ज़, पराकाष्ठा, चरम आदि ।
संस्कृत में ‘शीर्ष’ का मूल भी यही है । इससे ही हिन्दी का ‘सिर’ बना है । शिरस् के समतुल्य जेंद में ‘शर’ शब्द बना जिसका पहलवी रूप ‘सर’ हुआ । फ़ारसी में यह ‘सर’ चला आया । अलबत्ता जॉन प्लैट्स की “अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दुस्तानी एंड इंग्लिश” के मुताबिक फ़ारसी का सर संस्कृत के ‘सिरस्’ से आ रहा है । ध्यान रहे, ‘सिर’ यानी मस्तक के अर्थ में संस्कृत के किसी कोश में ‘सिरस्’ की प्रविष्टि नहीं मिलती । प्लैट्स के ऑनलाईन कोश में सम्भवतः वर्तनी की चूक है । जहाँ तक ‘माया’ का सवाल है, जान प्लैट्स इसके जन्मसूत्र संस्कृत के ‘मातृका’ में देखते हैं । ‘माया’ की व्युत्पत्ति का ठोस संकेत ‘मातृका’ से नहीं मिलता । ध्यान रहे मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में ‘मातृका’ का अर्थ सिर्फ माँ सम्बन्धी, धात्री, माँ, जन्मदात्री अथवा पालनकर्त्री है । जबकि प्लैट्स धन-दौलत के संदर्भ में इसके अर्थ मूल, व्युत्पन्न, स्रोत दिए गए हैं साथ ही दौलत, पूंजी, नगद, भंडार, कोश, निधि जैसे अर्थ भी दिए गए हैं । समझा जा सकता है कि प्लैट्स शायद यह कहना चाहते हैं कि ‘मातृ’ शब्द में उद्गम या स्रोत का भाव है । ज़ाहिर है स्रोत अपने आप में एक कोश या भण्डार होता है । यह तर्कप्रणाली गले नहीं उतरती और खींच-तान कर मातृका का रिश्ता धन-दौलत से जोड़ने वाली कवायद जान पड़ती है ।
गौरतलब है कि संस्कृत का ‘मातृका’ स्त्रीवाची है जबकि फ़ारसी का ‘मायः’ पुरुषवाची है । उधर हिन्दी-संस्कृत में ‘माया’ की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है और इसमें न सिर्फ़ धन-दौलत का भाव है बल्कि भ्रम, छलावा, धोखा, अतीन्द्रिय शक्ति, कला, जादूविद्या, भूत-प्रेत सम्बन्धी अथवा टोना जैसे अभिप्राय भी इसमें हैं । संस्कृत में ‘माया’ का एक अर्थ दुर्गा भी है मगर यह इसमें जन्मदात्री का आशय न होकर पराशक्तियों की स्वामिनी देवी का भाव है । इसी तरह ‘माया’ का दूसरा अर्थ लक्ष्मी है जो धन-वैभव की देवी हैं । इसी भाव का विस्तार माया के धन, दौलत, रोकड़ा, रुपया-पैसा, वैभव, सम्पत्ति, निधि, माल-मत्ता आदि में होता है । धन की महिमा अपरंपार है । इसके ज़रिये सुखोपभोग का कल्पनातीत संसार रचा जा सकता है । यहाँ ‘माया’ का अर्थ अवास्तविक लीला, कल्पनालोक या छलावा सार्थक होता है क्योंकि धन के रहने पर इन सबका भी लोप हो जाता है । इसीलिए कबीर ने धन-सम्पदा के अर्थ में ही “माया महा ठगिनी हम जानि” जैसी प्रसिद्ध उक्ति कही है ।
मायाजीवी शब्द भी धन-दौलत में रुचि रखने वाले का अर्थबोध कराता है जबकि मायावी का अर्थ जालसाज़, कपटी, छली, धोखेबाज, जादूगर आदि है । यह बात समझनी मुश्किल है कि प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता धन-दौलत के अर्थ में संस्कृत के मातृक से क्यों जोड़ रहे हैं जबकि संस्कृत के ही ‘माया’ शब्द में धन-दौलत, पूंजी, सम्पदा के साथ माप-जोख, देवीदुर्गा, शक्ति जैसे भाव है । अगली कड़ी में समाप्त

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Monday, August 13, 2012

षड्यन्त्र का पर्दाफ़ाश

SKULL
हि न्दी की तत्सम शब्दावली के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में ‘षड्यन्त्र’ का शुमार होता है । षड्यन्त्र के साथ सबसे खास बात यह है कि अपनी मूल प्रकृति में यह शब्द तत्सम शब्दावली का होते हुए भी इसका इन्द्राज संस्कृत के किसी कोश में नहीं मिलता । षड्यन्त्र यानी साजिश, भेद, अहितकर्म, फँसाना, अनिष्ट साधन, साँठगाँठ, कपट, भीतरी चालबाजी, दुरभिसन्धि, कुचाल, जाल बिछाना, दाँवपेच या कांस्पिरेसी इत्यादि । सभ्यता के विकास के साथ-साथ समाज में पेचीदापन बढ़ता रहा है । हर चीज़ में राजनीति का दखल नज़र आता है । राजनीति के साथ ही षड्यन्त्रों का चक्र शुरू हो जाता है । जिस तरह वक्त के साथ राजनीति का अर्थ भी बदलता चला गया उसी तरह सदियों पहले षड्यन्त्र का जो अभिप्राय था, आज उससे भिन्न है । आज तो राजनीति और षड्यन्त्र एक दूसरे के पर्याय हो गए हैं । बल्कि यूँ कहें कि राजनीति शब्द धीरे-धीरे बोलचाल की हिन्दी से षड्यन्त्र को बेदखल कर देगा । “ज्यादा राजनीति मत करो”, “मेरे साथ राजनीति हो गई”, “वो बहुत पॉल्टिक्स करता है” जैसे वाक्यों का प्रयोग अक्सर षड्यन्त्र को व्यक्त करने में भी होता है ।

ड्यन्त्र हिन्दी शब्दसम्पदा की षट्वर्गीय शब्दावली का हिस्सा है जैसे षट्कर्म, षट्कार, षट्कोण आदि । षड्यन्त्र मूलतः ‘षट्’ + ‘यन्त्र’ से बना है । ‘षट्’ का अर्थ तो स्पष्ट है अर्थात छह । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक संस्कृत के ‘षट्’ से ही षट् > षष् > छ (प्राकृत) और छह (अपभ्रंश) के क्रम में हिन्दी के ‘छह’ का विकास हुआ है । संस्कृत में ‘ट’ का ‘य’ के साथ मेल होने पर अक्सर ‘ट’ ध्वनि , ‘ड’ में बदल जाती है । जैसे ‘जाट्य’ का ‘जाड्य’ ( जो जड़ है ) रूप भी प्रचलित है । संस्कृत के यन्त्र शब्द की बहुआयामी अर्थवत्ता है । ऐसा उपकरण जिससे उठाने, धकेलने, ठेलने, खोदने, काटने जैसी विविध क्रियाएँ सम्पन्न हो सकें । मूलतः यन्त्र में बल, शक्ति, साधन के भाव के साथ किन्ही वस्तुओं, क्रियाओं अथवा लोगों को काबू में करने के उपकरण, प्रणाली या विधि का आशय निहित है । काबू पाने, वश में करने जैसे भावों की अभिव्यक्ति होती है ‘नियन्त्रण’ शब्द से । इसमें छुपे यन्त्र को हम आसानी से पहचान सकते हैं । ‘यन्त्रण’ में रहित के भाव वाला ‘निः’ उपसर्ग लगाने से बनता है ‘नियन्त्रण’ जिसमें स्वयंचालित या किसी अन्य व्यवस्था के अधीन काम करने वाली वस्तु या व्यक्ति को अपने अधीन करने का आशय है ।
गौरतलब है कि प्रणाली या सिस्टम के अर्थ में मराठी का ‘यन्त्रणा’ शब्द ‘यन्त्रण’ से ही आ रहा है जबकि हिन्दी के ‘यन्त्रणा’ का प्रयोग कष्ट, संत्रास, दुख, पीड़ा, व्यथा को अभिव्यक्त करने में होता है न कि किसी व्यवस्था या प्रणाली के अर्थ में । ‘यन्त्र’ में ‘अन’ प्रत्यय लगने से बहुआयामी अर्थवत्ता वाला ‘यन्त्रण’ शब्द बना जिसमें प्रणाली, विधि या व्यवस्था के साथ-साथ पीड़ा, वेदना या व्यथा का भाव भी है । आशय ऐसी चीज़ से है जो एक खास तरीके से संचालित हो रही है । प्रश्न है यन्त्र से बने यन्त्रणा में संत्रास, पीडा या वेदना के भाव की क्या व्याख्या है । दरअसल यन्त्र में दबाव, काबू, जकड़न, कसना, बांधना जैसे भाव हैं । मशीन वाली यान्त्रिकता के तहत ये सभी भाव एक व्यवस्था से जुड़ते हैं या यूँ कहें कि यन्त्र किन्हीं कलपुर्जों, उपकरणों का समुच्चय है जो आपसे में गुँथे हैं, बन्धे हैं, कसे हैं, जकड़े हैं । किन्तु जब इन्हीं भावों के साथ यन्त्रणा शब्द बनता है तो उसका अर्थ जहाँ मराठी में जहाँ मशीनी व्यवस्था से लिया जाता है वहीं हिन्दी में यह सचमुच यातना से जुड़ता है । कोई भी बन्धन, कसाव, जकड़न या दबाव संत्रास, पीड़ा या कष्ट का कारण बनते हैं ।
न्त्र में भौतिक उपकरण के अलावा तान्त्रिक वस्तु या चिह्न का भाव भी है जैसे गंडा, ताबीज या यौगिक रेखाचित्र । कल्पित अतीन्द्रिय शक्तियों की आराधना के लिए तन्त्र-योग आदि शास्त्रों में कई तरह के प्रतीकों का प्रयोग होता है । ऐसा माना जाता है कि इनमें निहित शक्तियों के ज़रिये दूर स्थित शत्रुओं या विपरीत ताक़तों पर काबू पाया जा सकता है । बौद्धधर्म का अवसानकाल भारत में तन्त्र-मन्त्र और योगिक शक्तियों के अभूतपूर्व उभार का था । ‘षड्यन्त्र’ दरअसल मध्यकाल के इसी परिवेश से उपजा शब्द है । पूरवी बोली में षड्यन्त्र को ‘खड्यन्त्र’ भी कहते हैं । ‘ष’ का रूपान्तर ‘ख’ में होता है । ‘षड्यन्त्र’ अर्थात छह तरह की विधिया, प्रणाली या तरीके जिनके ज़रिये शत्रु को वश में किया जा सके । सीधी से बात है, यौगिक तन्त्र-मन्त्र का विस्तार ही जादू-टोना में हुआ । अलग-अलग पंथों के मान्त्रिकों के अपने अपने नुस्खे, मन्त्र और यन्त्र थे । हर कोई इनके ज़रिये बस षड्यन्त्रों में लगा रहता था । आज षड्यन्त्र को जिस अर्थ में प्रयोग किया जाता है उसमें बदले हुए परिवेश में कुचाल, दुरभिसन्धि या कांस्पिरेसी जैसे भाव हैं जबकि पुराने ज़माने में शत्रु पर विजय पाने के टोटके जैसा भाव इसमें था ।
ड्यन्त्र के तहत जिन छह विधियों का हवाला दिया जाता है वे हैं- 1.जारण 2. मारण 3. उच्चाटन 4. मोहन 5. स्तंभन और 6. विध्वंसन । ‘जारण’ का अर्थ जलाना या भस्म करना है । यह संस्कृत के ‘ज्वल्’ से निकला है । टोटका के रूप में हम झाड़-फूँक से परिचित हैं । यह जो फूँक है दरअसल इसमें अनिष्टकारी शक्तियों को भस्म करने का आशय है । ‘मारण’ यन्त्र का आशय एकदम स्पष्ट है । शत्रु का अस्तित्व समाप्त करने, उसे मार डालने के लिए जो जादू-टोना होता है वह ‘मारण’ कहलाता है । ‘उच्चाटन’ का अर्थ है स्थायी भाव मिटाना । वर्तमान परिस्थिति को भंग कर देना । उखाड़ना, हटाना आदि । विरक्ति, उदासीनता या अनमनेपन के लिए आम तौर पर हम जिस उचाट, दिल उचटने की बात करते हैं उसके मूल में संस्कृत का ‘उच्चट’ शब्द है जो ‘उद्’ और ‘चट्’ के मेल से बना है । उद्-चट् की संधि उच्चट होती है । ‘उद’ यानी ऊपर ‘चट्’ यानी छिटकना, अलग होना, पृथक होना आदि । ‘उच्चाटन’ भी इसी उच्चट से बना है जिसका अर्थ हुआ उखाड़ फेंकना, जड़ से मिटाना, निर्मूल करना आदि ।
ब ‘जारण’, ‘मारण’, ‘उच्चाटन’ जैसे यन्त्रों से काम नहीं बनता तो ‘मोहिनी विद्या’ काम आती है । ‘मोहन’ का अर्थ है मुग्ध होना । इसके मूल में ‘मुह्’ धातु है जिसका अर्थ है सुध बुध खोना, किसी के प्रभाव में खुद को भुला देना । अक्सर नादान लोग ऐसा करते हैं और इसीलिए ऐसे लोग ‘मूढ़’ कहलाते हैं । मूढ़ भी ‘मुह्’ से ही निकला है और ‘मूर्ख’ भी । ‘मोहन यन्त्र’ का मक़सद शत्रु पर ‘मोहिनी शक्ति’ का प्रयोग कर उसे मूर्छित करना है । श्रीकृष्ण की छवि में ‘मोहिनी’ थी इसलिए गोपिकाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं इसलिए उन्हें ‘मोहन’ नाम मिला । पाँचवी विधि है ‘स्तम्भन’ जिसका अर्थ है जड़ या निश्चेष्ट करना । यह ‘स्तम्भ’ से बना है । जिस तरह से काठ का खम्भा कठोर, जड़ होता है उसी तरह किसी सक्रिय चीज़ को स्तम्भन के द्वारा निष्क्रिय बनाया जाता था । षड्यन्त्र की छठी और आखिरी प्रणाली है ‘विध्वंसन’ अर्थात पूरी तरह से नाश करना ।
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Saturday, August 11, 2012

तिलस्मी दुनिया

talism
मत्कारी, जादुई, रहस्यम और अबूझ किस्म की बात, घटना या वस्तु के संदर्भ में तिलस्म हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है । यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी साहित्य की शुरुआती रचनाओं का आधार भी यही शब्द यानी तिलस्म था । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जो महानुभाव हिन्दी गद्य में आज़माईश कर रहे थे, उसके कथानकों का सफल फार्मूला तिलस्मी दुनिया का ही था । राजा-रानी की पारम्परिक प्रेम-कथा अब गौण थी और राजा-रानी के किस्से अब राजनीति के प्रपंच का हिस्सा बनते थे जिन्हें तिलस्मी दुनिया के तहखानों, ऐयारों के कारनामों और जासूसी दाव-पेचों से गुज़रते हुए दिलचस्प अंदाज़ में परोसा जाता था । इस विधा के सिद्धहस्त लेखक बाबू देवकीनंदन खत्री थे । जासूसी और तिलस्मी लेखन करने वाले वे पहले ही लेखक हैं जिनकी रचनाओं को साहित्य का दर्जा मिला । उनकी लिखी चन्द्रकान्ता संतति आज भी खूब बिकती है । बहरहाल, तिलस्म शब्द से प्रायः हर हिन्दी प्रेमी का परिचय खत्री जी के उपन्यासों के ज़रिये होता है ।

तिलस्म शब्द की आमद हिन्दी में फ़ारसी के ज़रिये हुई है । तिलस्म शब्द के दायरे में मायालोक, इंद्रजाल, जादू, चमत्कार, अद्भुत कार्य-व्यापार, क़रामाती बातें आती हैं । यह तावीज भी हो सकता है, गंडा भी हो सकता है या अभिमंत्रित पत्थर भी । इसका इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे समूचा स्थान यानी तिलस्मी तहखाना, कोई मार्ग जैसे तिलस्मी रास्ता, कोई वस्तु जैसे तिलस्मी हार आदि । ई. जे. ब्रिल्स के फर्स्ट इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम के मुताबिक इसके तिलसम, तिलस्म, तिलसिम, तालिस्म और तिलिस्म जैसे रूप भी अरबी में प्रचलित हैं । हिन्दी में तिलस्माती, तिलस्मानी, तिलस्मात, तिलस्मी जैसे रूप प्रचलित हैं । प्राचीनकाल से ही प्रायः हर संस्कृति में परस्पर विरोधी पक्ष एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए ओझाओं और नजूमियों के ज़रिये एक दूसरे के खिलाफ तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि शक्तियों का प्रयोग करते रहे हैं जिनका मक़सद विरोधी का सर्वनाश ही था ।
गौरतलब है कि ताबीज के अर्थ वाला अंग्रेजी का टेलिस्मन अरबी के तिलस्म से प्रभावित है जबकि खुद अरबी में तिलस्म शब्द के पीछे बाइजेंटीनी-ग्रीक का तेलेस्मा ( telesma ) है । तुर्की की वर्तमान राजधानी इस्ताम्बुल का प्राचीन नाम कुस्तुन्तुनिया Kostantiniyye था जिसे ग्रीक भाषा में कांस्टेंटिनोपल कहते थे । किसी ज़माने में प्राचीन ग्रीक साम्राज्य का विस्तार वर्तमान इस्ताम्बुल तक था । भूमध्यसागर की धुर पूर्वी सीमा अरब क्षेत्रों को छूती है । ग्रीस और अरब के बीच व्यापारिक संबंध भी रहा है इसलिए अरब और ग्रीस में भाषायी अन्तर्सम्बन्ध भी गहरा है । इस क्षेत्र को तब बाइजेंटाइन कहते थे और यहाँ बोली जाने वाली भाषा बाइजेंटीनी-ग्रीक कहलाती थी जिसका खासा असर तुर्की और अरबी भाषाओं पर पड़ा है । ग्रीक भाषा के टेलिन telein शब्द से तेलेस्मा बना जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, समापन, पूर्णाहुति जैसे भाव थे । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि टैलेन के मूल में टेलोस शब्द है जिसमें जिसका अर्थ है खात्मा, सर्वनाश, परिणति, निजात, अन्त, अंजाम या मृत्यु आदि । यह जो टेलोस है, इसका रिश्ता ग्रीक भाषा की प्रसिद्ध धातु टेली tele- से है जिसमें दूर, सिरा, अन्तराल जैसे आशय हैं और इससे टेलीविज़न, टेलीफोन, टेलीपैथी, टेलीकास्ट जैसे बोलचाल के कई आमफ़हम शब्द बने हैं । कई भाषाओं में इसके रूपान्तर प्रचलित हैं जैसे ग्रीक में टेलेस्मा, हिन्दी में तिलस्म, स्वाहिली में तलासिमु, हिब्रू में तिलस्म आदि ।
तिलस्म यानी कोई जादुई चिह्न या रहस्यमय व्यवस्था मूलतः किसी अलौकिक शक्ति के असर को बताती है । तिलस्म का सृजन जो भी करता है, यह उसके हित में असरदार होता है । इसमें सौभाग्य चिह्न का भाव है । मंत्र शक्ति, जादुई करामात, गंडा, ताबीज़ आदि का प्रयोग किसी मुश्किल हालात से निजात पाने अथवा मनोवांछित फल पाने के लिए किया जाता है । मूल भाव है मनचाहा हो जाना, जो सामान्य प्रयासों से होना सम्भव नहीं है । तिलिस्म शब्द का हिब्रू रूप तालिस्म होता है । “द डिक्शनरी दैट रिवील द हिब्रू सोर्स ऑफ इंग्लिश’ में इसाक ई. मोज़ेस तालिस्म की दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते हैं जो ग्रीक टेलोस पर आधारित ही हैं । मोजेज के अनुसार हिब्रू तालिस्म, अरबी तिलस्म से ही आया है । वे बाइजेंटीनी-ग्रीक के तैलिस्मा telesma को टेलिन और स्लैम मिलन का नतीजा मानते हैं । अंग्रेजी के slam में मूलतः पटाक्षेप या चरम परिणति का ही भाव है । खेल स्पर्धाओं में ग्रैंडस्लैम के रूप में इसे देखा जा सकता है । हालाँकि भाषाविद् स्लैम की व्युत्पत्ति पर स्थिर नहीं हैं और इसे उत्तरी यूरोप के प्राचीन नॉर्स परिवार का शब्द मानते हैं ।
अंग्रेजी के स्लैम से सेमिटिक धातु सलम का रिश्ता तार्किक भी लगता है और भाषायी अन्तर्सम्बन्ध यहाँ भी नज़र आता है । सेमिटिक भाषा परिवार की धातु स – ल - म ( अरबी लिपि में सीन –लाम- मीम ) जिसमें समर्पण, स्वीकार जैसे भावों के साथ अन्ततः शान्ति का आशय प्रकट होता है । नमस्कार या सेल्यूट के अर्थ वाले प्रसिद्ध अभिवादन “अस्सलाम अलैकुम” और “वालैकुम अस्सलाम” में यही सलम है जिसका एक रूप सलाम हुआ । कुशल, मंगल का प्रतीक यह अभिवादन मूलतः शान्ति कामना ही है । हिब्रू में इसका रूप शॉलोम shalom होता है । मोज़ेस के अनुसार बाइबल में शॉलाम शब्द का आशय भी पूर्णत, परमत्व और शान्ति ही है । अपने अभीष्ट की कामना में प्राचीनकाल से ही मनुष्य किन्ही अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है जिनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो वह सामान्य पुरोहितो से हट कर ओझा, बैगा, तान्त्रिक, मान्त्रिक आदि से सम्पन्न कराता है । कुल मिला कर किसी मायावी शक्तियों से इष्टफल प्राप्ति का प्रयास ही तिलस्म है ।  इसका हासिल भी चित्त की शान्ति ही होता है । मगर इसमें अहंभाव की तुष्टि भी होती है ।
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Wednesday, August 8, 2012

जासूस की जासूसी

Spy

न्सान शुरू से बेहद फ़ितनासिफ़त रहा है । उसे सब कुछ जानना है । एक ओर धरती के पेट में क्या है, यह जानने और फिर उसे निकालने में वह दिन-रात एक किए रहता है, दूसरी तरफ़ चांद-सितारों के पार क्या है इसके लिए बेचैन रहता है । जो कुछ छुपा हुआ है, जो कुछ अदृष्ट है वह सब उसे देखना है, जानना है । जानने की यह चाह ही जासूस की राह बनती है । सामान्य जिज्ञासा रखने से समझदारी के दरवाज़े खुलते हैं और किन्हीं निजी दायरों के भेद जानने कोशिश से जासूसी की कहानी बनती है । इन दायरों की सीमा किसी देश की सरकार और राजनीतिक दल से लेकर घरानों, परिवारों और एक व्यक्ति विशेष तक भी सीमित हो सकती है । दुनिया के सबसे पुराना पेशा देहव्यापार कहा जाता है । हमारा मानना है कि जासूसी को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए ।
किसी के भेद लेना, टोह लेना, गुप्तचरी कराना जैसी क्रियाओं के लिए हिन्दी में जासूसी सबसे ज्यादा लोकप्रिय शब्द है । हिन्दी में जासूस शब्द की आमद फ़ारसी के ज़रिये हुई है मगर यह सामी मूल का शब्द है । अल सईद एम बदावी, अरबी-इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ़ कुरानिक यूज़ेज के मुताबिक इसका अर्थ हाथों से परीक्षण करना, जाँच करना, झाँकना, ढूँढना, तलाशना, टोह लेना, भेद लेना, छान-बीन करना जैसी बातें हैं । यह ध्यान देने योग्य है कि ये सभी बातें किसी की निजता के दायरे में करने का आशय इस धातु में निहित है । आज आज जिस अर्थ में जासूस शब्द का प्रयोग होता है निश्चित ही उसका विकास राजनीति के इतिहास के साथ-साथ हुआ । जासूस शब्द अरबी की जीम-सीन-सीन धातु से बना है । बदावी ने इसके लिए j-s-s का प्रयोग किया है जबकि अन्द्रास रज्की इसके लिए g-s-s का प्रयोग करते हैं । हालाँकि दोनों ही स्थानों पर वर्ण का ही संकेत है ।
रबी मूल के जासूस की व्याप्ति कई सेमिटिक और भारोपीय भाषाओं में है जैसे तुर्की में जासुस, अज़रबेजानी में जासूस, स्वाहिली में जासिसी, उज़्बेकी में जोसस है । इसी कड़ी में अरबी का जस्सा शब्द भी है जिसका हिब्रू रूप गिशेश है जिसका अर्थ है परीक्षण करना । मूलतः जासूस शब्द का अर्थ भी छूना, टटोलना, महसूस करना, परीक्षण करना, जाँचना है । मराठी में जासूस को जासूद कहते हैं जिसका मूलार्थ संदेशवाहक, हरकारा या दूत है । जासूस के अर्थ में चोरजासूद शब्द है जो दरअसल गुप्तचर या भेदिया होता है । संदेशवाहकों की जोड़ी जासूदजोड़ी कहलाती है । मराठी में जासूस के लिए हेर, बातमीदार या निरोप्या शब्द भी हैं जबकि संस्कृत-हिन्दुस्तानी में एक लम्बी कतार नज़र आती है जैसे- अपसर्प, हरकारा, अवलोकक, अवसर्प, गुप्तचर, गुरगा, सूचक, गोइंदा, मुखबिर, दूत, चर, चरक, भेदिया, कासिद, जबाँगीर, चारपाल, जरीद, टोहिया, थांगी, पनिहा, प्रणिधि, वनमगुप्त, प्रवृतिज्ञ, वार्तायन, वार्ताहर, प्रतिष्क, संदेशवाहक आदि ।
जासूस के अलावा हिन्दी में भेदिया शब्द भी है जो बना है संस्कृत धातु भिद् से जिसमें दरार, बाँटना, फाड़ना, विभाजित करने जैसे भाव हैं । दीवार के लिए भित्ति शब्द इसी मूल से आ रहा है । कोई भी दीवार दरअसल किसी स्थान को दो हिस्सों में बाँटती है। एक समूचे मकान की दीवारें विभिन्न प्रकोष्ठों का निर्माण करती हैं । भेद, भेदन, भेदना जैसे शब्द भी भिद् से तैयार हुए हैं। रहस्य के अर्थ में जो भेद है उसमें दरअसल आन्तरिक हिस्से में स्थित किसी महत्वपूर्ण बात का संकते है जो उजागर नहीं है । ज़ाहिर है इस बात को रहस्य की तरह माना गया, इसलिए भेद का एक अर्थ गुप्त या रहस्य की बात भी है । भेद को उजागर करने के लिए उस स्थान पर भेदने की क्रिया ज़रूरी है, तभी वह गुप्त बात सामने आएगी । भेदिया शब्द भी इसी धातु से तैयार हुआ है जिसका अर्थ है जासूस, भेदने वाला । कई बार प्रकार, अन्तर, फर्क आदि के अर्थ में भी भेद शब्द का प्रयोग होता है । बात वही विभाजन की है । किसी चीज़ के जितने विभाजन होंगे, उसे ही भेद कहेंगे जैसे नायिका-भेद यानी नायिकाओं के प्रकार । फूट डालने के अर्थ मे भेद डालना मुहावरा भी प्रचलित है । “दीवारों के भी कान होते” हैं जैसी कहावत में दीवारों के पीछे छुपने वाले और वहाँ बसने वाले भेदों का ही तो संकेत मिलता है अर्थात दीवारे भी जासूसी करती हैं ।
संस्कृत का गुप्तचर शब्द हिन्दी की तत्सम शब्दावली में भी जासूस के अर्थ में मौजूद है । यह बना है गुप् धातु से जिसमें रक्षा करना, बचाना, आत्मरक्षा जैसे भाव तो हैं ही, साथ ही इसमें छुपना, छुपाना जैसे भाव भी हैं । गौर करें कि आत्मरक्षा की खातिर खुद को बचाना या छुपाना ही पड़ता है । मल्लयुद्ध के दाव-पेच दरअसल क्या हैं ? दरअसल अपने अंगों को आघात से बचाने की रक्षाविधि ही दाव-पेच है । रक्षा के लिए चाहे युद्ध आवश्यक हो किन्तु वहां भी शत्रु के वार से खुद को बचाते हुए ही मौका देख कर उसे परास्त करने के पैंतरे आज़माने पड़ते हैं। यूँ बोलचाल में गुप्त शब्द का अर्थ होता है छुपाया हुआ, अदृश्य । गोपन, गोपनीय, गुपुत जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। प्राचीनकाल में गुप्ता एक नायिका होती थी जो निशा-अभिसार की बात को छुपा लेने में पटु होती थी । इसे रखैल या पति की सहेली की संज्ञा भी दी जा सकती है। गुप्ता की ही तरह गुप्त से गुप्ती भी बना है जो एक छोटा तेज धार वाला हथियार होता है। इसका यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि इसे वस्त्र-परिधान में आसानी से छुपाया जा सकता है ।
गुप्त और चर दोनों से मिलकर बना है गुप्तचर जिसका का शाब्दिक अर्थ हुआ छुप-छुप कर चलने वाला । गुप्तचर में जो मूल भाव है वह है खुद की पहचान को छुपाना न कि चोरी-छिपे चलना । खुद को छुपाने से बड़ी बात है खुद की पहचान को गुप्त रखते हुए लोगों के बीच रहना, उठना-बैठना । ये सब बातें “चर” में निहित हैं । राजनय और कूटनीति के क्षेत्र में गुप्तचरी का महत्व सर्वाधिक होता है जहाँ एक अध्यापक, एक चिकित्सक, एक सिपाही, एक सब्ज़ीवाला, नाई, गृहिणी गर्ज़ यह कि कोई भी जासूस हो सकता है । यही है गुप्तचर का असली अर्थ ।
इसे भी देखें- जासूस की जासूसी

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Sunday, August 5, 2012

सेवा का फल नमकीन

SEV

हि न्दी में दो तरह के सेव प्रचलित हैं । पहले क्रम पर है बेसन से बने नमकीन कुरकुरे सेव और दूसरा है मीठा-रसीला सेवफल जिसे सेव या सेब भी कहते हैं । खाने-पीने की तैयारशुदा सामग्री में सर्वाधिक लोकप्रिय अगर कोई वस्तु है तो वह है नमकीन सेव । प्रायः हर गली, हर दुकान और हर घर में यह मिल जाएगा । सुबह के नाश्ते में चाय के साथ और कुछ न हो तो सेव चलेगा । मालवी आदमी को तो सुबह शाम खाने के साथ भी सेव चाहिए । भारतीय खान-पान संस्कृति दुनिया भर में निराली है । सेव के साथ सिवँइयाँ अथवा सेवँई जैसे खाद्य पदार्थ भी रसोई की अहम् चीज़ें हैं । सेवँई या सिवँइयाँ मैदे से बनती हैं । शकर और दूध के साथ उबाल कर बनई गई सेवँई की खीर बेहद लज़ीज़ मीठा पकवान है । ध्यान रहे, सेव, सेवँई या सिवँईं जैसे नामों में मीठे या नमकीन होने की महिमा नहीं है बल्कि उनका धागे या सूत्रनुमा आकार ही ख़ास है ।
दिलचस्प बात यह भी है कि दोनो तरह के सेव का सम्बन्ध बोल-चाल की भाषा में बेहद प्रचलित सेवा, सेवक, सेविका जैसे शब्दों से भी हैं जिनमें सेवा करने का मूल भाव है और इनकी व्युत्पत्ति भी संस्कृत की सेव् धातु से हुई है । संस्कृत की सेव् धातु में मूलतः करना, रहना, बारम्बार जैसे भाव हैं । मोनियर विलियम्स, रॉल्फ़ लिली टर्नर और वाशि आप्टे के कोशों के मुताबिक सेव् में सानिध्य, टहल, बहुधा, उपस्थिति, आज्ञाकारिता, पालना, बढ़ाना, विकसित करना, उत्तरदायित्व, समर्पण, खिदमत, देखभाल अथवा सहायता जैसे भाव हैं । इससे बने सेवा का मूलार्थ है देखभाल करना, सहकारी होना, समर्पित कर्म, टहल में रहना आदि । सेवक में उक्त सभी क्रियाओं में लगे रहने वाले व्यक्ति का भाव है । यूँ सेवक का अर्थ नौकर-चाकर, परिचर, सहकर्मी, अनुगामी, भक्त, अनुचर, आज्ञाकारी, भ्रत्य, वेतनभोगी आदि होता है । सेवक का स्त्रीवाची सेविका होता है । सेवा सम्बन्धी शब्दावली में अनेक शब्द हैं जैसे सेवा-पंजिका, सेवा-पुस्तिका, सेवाकर्मी, सेवानिवृत्त, सेवावधि, सेवामुक्त, समाजसेवा, समाजसेवी आदि । इसी कड़ी में सेवाशुल्क जैसा शब्द भी खड़ा है जिसका मूलार्थ है किसी काम के बदले किया जाने वाला भुगतान मगर अब सेवाशुल्क का अर्थ रिश्वत के अर्थ में ज्यादा होने लगा है ।
प्रश्न उठता है इस सेवाभावी सेव् से आहार शृंखला के सेव से सम्बन्ध की व्याख्या क्या हो सकती है ? सेव के आकार और उसे बनाने की प्राचीन विधि पर गौर करें । पुराने ज़माने में बेसन के आटे को गूँथ कर उसकी छोटी लोई को चकले पर रख कर हथेलियों से बारीक-बारीक बेला जाता था । बेलना शब्द का रिश्ता संस्कृत की बल् या वल् धातु से है जिसमें घुमाना, फेरना, चक्कर देना जैसे भाव हैं । लोई को घुमाने वाले उपकरण को भी बेलन इसीलिए कहते हैं क्योंकि इससे बेलने की क्रिया सम्पन्न होती है । जिससे बेला जाए, वह बेलन । गौर करें कि पत्थर या लकड़ी के जिस गोल आसन पर रख कर रोटी बेलते हैं उसे चकला कहते हैं । यह चकला शब्द चक्र से आ रहा है जिसमें गोल, घुमाव, राऊंड या सर्कल का भाव है । बेलने के आसन को चकला नाम इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह गोल होता है बल्कि इसलिए मिला क्योंकि उस पर रख कर रोटी को चक्राकार बनाया जाता है । बेलने की क्रिया से कोई वस्तु चक्राकार, तश्तरीनुमा बनती है । तश्तरीनुमा आकार में बेलने के लिए आधार का समतल, ठोस होना ज़रूरी है न कि उसका गोल होना । अक्सर सभी चकले गोल नहीं होते । रोटी बनाने के लिए चकला और बेलन की ज़रूरत होती है, सेव या सेवँईं बनाने के लिए बेलन के स्थान पर चपटी सतह जैसे हथेली, होनी ज़रूरी है ।
राठी में सेवँई के लिए शिवई शब्द है जिसका मूल वही है जो हिन्दी सेवँई का है । मेरा मानना है कि नरम पिण्ड को चपटी सतह पर गोल गोल फिरा कर उसके सूत्र बनाने की तरकीब बाद में ईज़ाद हुई होगी, पहले ऐसा अंगूठे और उंगलियों की मदद से किया जाता रहा होगा । हाथ या उंगलियों लगे किसी चिपचिपे पदार्थ से छुटकारा पाने के लिए हाथों को आपस में मसलने या अंगूठे को उंगलियों पर रगड़ने की तरकीब की जानकारी मनुष्य को आदिमकाल में ही हो गई थी । इस तरह चिपचिपे पदार्थ पर दबाव पड़ने से उसके वलयाकार सूत्र बन कर हाथ से अलग हो जाते हैं । सेवँई के जन्मसूत्र का कुछ पता इसके मराठी पर्यायों से चलता है । मराठी में सेवँई को शेवई कहते हैं इसकी व्युत्पत्ति भी वही है जो हिन्दी में है । मराठी में शेवई के दो प्रकार हैं- हातशेवई और पाटशेवई । जैसा की नाम से ही स्पष्ट है, हातशेवई लोई को हथेली से रगड़ कर बनाए गए सूत्र को कहते हैं । इसका एक नाम बोटी भी है । मराठी में उंगली को बोट कहते हैं । उंगलियों से रगड़ कर बनाए गए महीन सूत्र के लिए बोटी नाम सार्थक है । प्रसंगवश, सेवँई को अंग्रेजी में वर्मीसेली कहते हैं जो मूलतः इतालवी भाषा से आयातित शब्द है और लैटिन के वर्मिस vermis से बना है जिसका मतलब होता है कृमी या रेंगनेवाला नन्हा कीड़ा । एटिमऑनलाइन के मुताबिक वर्म के मूल में भारोपीय भाषा परिवार की धातु wer है जिसमें घूमने, मुड़ने का भाव है । वृ बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं । गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है । इतालवी वर्मीसेली  और हिन्दी के सेवँई का शब्द-निर्माण ध्यान देने योग्य है ।
रोटी के लिए मराठी में पोळी शब्द है । पूरणपोळी शब्द में यही पोळी है । पोळी बना है पल् धातु से जिसमें विस्तार, फैलाव, संरक्षण का भाव निहित है इस तरह पोळी का अर्थ हुआ जिसे फैलाया गया हो। बेलने के प्रक्रिया से रोटी विस्तार ही पाती है । पत्ते को संस्कृत में पल्लव कहा जाता है जो इसी धातु से बना है । पत्ते के आकार में पल् धातु का अर्थ स्पष्ट हो रहा है । पेड़ का वह अंग जो चपटा और विस्तारित होता है । हिन्दी का पेलना, पलाना, पलेवा जैसे शब्द जिनमें विस्तार और फैलाव का भाव निहित है इसी शृंखला में आते हैं । पालना शब्द पर गौर करें इसमें बारम्बारता, विस्तार, संरक्षण जैसे सभी भाव स्पष्ट हैं । कहने का तात्पर्य यह कि पल् धातु में जो भाव आटे की लोई को पोळी (रोटी) के रूप में विस्तारित करने में उभर रहा है वैसा ही कुछ सेव् धातु से बने सेव या सेवँई में भी हो रहा है । स्पष्ट है कि सेव् धातु से बने सेव में निहित बारम्बारता, बढ़ाना, विकसित करना और पालना जैसे अर्थ भी पल् की तरह हैं । बेसन या मैदे की लोई को चकले पर गोल-गोल घुमाने से  पतले, लम्बे,  धागेनुमा सूत्र के रूप में उसका आकार बढ़ता जाता है । यही सेव या सेवँई है । बेलने या घुमाने की क्रिया में बारम्बारता पर गौर करें तो भी सेव् क्रिया का अर्थ स्पष्ट होता है ।
सेवफल की बात । जिस तरह सेव या सेवँई में विस्तार, वृद्धि का भाव है, और सेव और सेवँई के आकार से यह अर्थ साफ़ नज़र भी आता है वहीं सेवफल को देखने से यह स्पष्ट नहीं होता । मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में सेवि या सेव शब्द है जिसका अर्थ है सेवफल । मोनियर विलियम्स के कोश में सेवि शब्दान्तर्गत सेव का अर्थ बदरी यानी बेर भी बताया गया है । apple के अर्थ में हिन्दी सेव की व्युत्पत्ति संस्कृत की सिव् धातु से है जिसमें जिसमें नोक, काँटा जैसे भाव हैं । टर्नर कोश के मुताबिक फ़ारसी में सेव का सेब रूप है । इसी तरह उड़िया और गुजराती में भी सेब ही है इसलिए यह निश्चयूर्वक नहीं कहा जा सकता की भारतीय भाषाओं में सेव के सेब रूप के पीछे फ़ारसी का सेब है ।

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