Sunday, November 29, 2015

ख़ब्ती की ख़ब्त

हिन्दी की लोकप्रिय शब्दावली में ख़ब्त, ख़ब्ती जैसे शब्द भी प्रचलित है। अरबी की त्रिवर्णी धातु खा-बा-ता خ ب ط से इस शब्द का विकास हुआ है। ख़ब्त का रूढ़ अर्थ अब आमतौर पर धुन, सनक या झक से होता हुआ मूर्खता, उन्माद,प्रमाद और भ्रम तक पहुँचता है। इसी तरह ख़ब्ती का अर्थ हुआ सनकी, धुनी, झक्की, प्रमादी, ग़ाफ़िल, उन्मादी, भ्रमित या मूर्ख। जानते है ख़ब्त की जन्मकुण्डली। पहले देखते हैं सेमिटिक धातु खा-बा-ता में कौन कौन सी अभिव्यक्तियाँ छुपी हैं। प्राचीन ग्रामीण एवं पशुपालक समाज के क्रियाकलापों से निकली शब्दावली से ही हमारी आज की भाषा का विकास हुआ है। इसे किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा के अध्ययन से समझा जा सकता है। ऐसे अनेक शब्द पशुओं को चराने, घुमाने, हाँकने, आखेट करने, तलाशने आदि से निकले हैं। खा-बा-ता में तोड़ना, कूटना, फेरना, ठोकना जैसे भावों के साथ-साथ भटकना, घूमना, भ्रमण करना जैसे आशय भी हैं। इसी के साथ दागना, निशान लगाना, छाप लगाना जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हुआ।

गौर करें प्राचीन अरब के बद्दूजन (बेदुइन) कबाइली घुमक्कड़ ही थे। पशुओं और खुद की आहारचर्या की खातिर निरन्तर भटकन ही जीवन। पशुओं के अनेक समूहों में अपने रेवड़ की सुरक्षा, देखरेख तभी बेहतर हो सकती है जब उन पर निशान लगाया जाए। अक्सर पहचान के लिए चिह्नित करने का आसान तरीका था, इन पशुओं की पीठ या पुट्ठों पर तपती छड़ से दाग देना। भेड़, बकरी, ऊँट जैसे पशु ही बद्दुओं की सम्पत्ति थे। इनमें ऊँट के बिना तो रेगिस्तान से पार नहीं जाया जा सकता था। ऊँट बद्दुओं के लिए दुनिया की सबसे सुन्दर चीज़ था। अरबी में ‘ग’ और ‘ज’ आपस में बदलते हैं। अरबी में ऊँट को ‘गमाल’ कहते हैं। ‘क’ और ‘ग’ एक ही वर्णक्रम में आते हैं। इसी ‘गमाल’ से अंग्रेजी में ‘कैमल’ बना। ‘जमाल’ का अर्थ ऊँट भी होता है और यह अनायास नहीं कि इसका अर्थ सौन्दर्य भी होता है। रेगिस्तान में घास नहीं होती, कँटीली झाड़ियाँ होती हैं। अल सईद, एम बदावी के कुरानिक कोश को मुताबिक खा-बा-ता में निहित तोड़ना, कूटना, ठोकना जैसे भावों के अलावा दोनों पैरो से रौंदने का भाव भी निहित है। ध्यान रहे पशुओं के लिए ऊँची झाड़ियों से पत्तियाँ तोड़ने और उन्हें दोनों पैरों से रौंद कर टहनियों से मुक्त करने का आशय है। जॉन रिचर्ड्सन के अरबी-फ़ारसी कोश में इसके अलावा इसमें चीज़ों को एक दूसरे में मिलाने, ऊँट की रानों में निशान लगाने और ऊँट द्वारा अपने चारों खुरों से ज़मीन को खुरचने, कुरेदने जैसे भावों का स्पष्ट उल्लेख भी सिद्ध करता है कि यह मूलतः पशुचारी सभ्यता से विकसित हुआ शब्द है। ख़ब्त के अन्दर मूल भाव है सब कुछ गड्डमड्ड हो जाना, आपस में मिला देना, अव्यवस्था फैलना, उथल-पुथल फैलना
 

प्रश्न उठता है खब्त में निहित उक्त सारी अभिव्यक्तियों में उन्माद, पागलपन, धुन, सनक या झख जैसे आशय कैसे शामिल हुए ! बात दरअसल ये है कि शब्दों का अर्थान्तर, अर्थविकास, अर्थावनति, अर्थोपकर्ष जैसी स्थितियाँ भी सामाजिक विकास के साथ-साथ अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ने से होती चलती हैं। रिचर्ड्सन एक और महत्वपूर्ण अर्थ बताते हैं- किसी भी स्थान पर पर बैठ कर सुस्ता लेना या सो जाना। यह भी गड़रिया समाज का गुण है। जब चरने-विचरने की जगह मिल जाती है तब मवेशी चरते रहते हैं और गोपाल सुस्ताते रहते हैं। कई बार इसी गफ़लत में पशुओं के रेवड़ एक दूसरे में मिल जाते हैं। गौर करें पशुओं पर निशान इसीलिए लगाया जाता है ताकि उन्हें पहचाना जा सके। इसका दूसरा अर्थ यह है कि सारे पशु एक समान दिखते हैं। उन्हें किसी निशान के आधार पर ही पहचाना जा सकता है अन्यथा भ्रम की स्थिति बनी रह सकती है। पशुओं की अदला-बदली, फिर उन्हें सही समूह तक पहुँचाना, उससे उपजने वाले झगड़ों आदि के चलते निशान देने की क्रिया को भी खबाता नाम मिला। खब्ती के लिए भ्रमित शब्द की अर्थवत्ता का एक कारण यह भी है कि भ्रम शब्द ही भ्रमण से बना है अर्थात जिसका दिमाग घूमा हुआ हो।

सो, खब्त का मूलभाव खबाता में निहित मिलावट से ही आ रहा है। वह चाहे मवेशियों का आपस में मिलना हो या उनके लिए दाना-रातिब को आपस में मिलाना हो। आगे चल कर यह भाव सब भ्रमित होने के सन्दर्भ में रूढ़ हुआ। ख़ब्त यानी सब कुछ गड़बड़ कर देना। मद्दाह इसे बुद्धि में पागलपन की मिलावट कहते हैं अर्थात बुद्धि विकार। ख़ब्ती या ख़ब्तुल-हवास यानी विकृतबुद्धि, पागल, मिराक़ी, विकृतमस्तिष्क, दूषितबुद्धि। यूँ देखा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ ख़ब्त तो होती ही है। चलते-चलते अकबर इलाहाबादी साहब के शेर से बात ख़त्म करते हैं-
हम ऐसी कुल किताबें काबिले जब्ती समझते हैं
जिन्हें पढ़कर के लड़के बाप को खब्ती समझते हैं

महत्वपूर्ण कड़ी- रेगिस्तानी हुस्नो-जमाल 
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें




अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, November 19, 2015

पत्थर के सनम...



बॉलीवुड के फिल्मी गीतों ने भी आम आदमी के शब्दज्ञान को बढ़ाया है। ‘सनम’ भी ऐसा ही एक शब्द है जिसका साबका आम आदमी से किसी न किसी फिल्मी गीत के ज़रिये ही हुआ है जिनमें आमतौर पर इसका अर्थ प्यारा, प्रिय, प्रियतम के अर्थ में ही प्रयोग होता आया है मसलन “ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम” या “आजा सनम मधुर चान्दनी में हम”। मगर सनम का इसका मूल अर्थ है बुत या प्रतिमा। हालाँकि “पत्थर के सनम...तुझे हमने मुहब्बत का खुदा माना...” जैसे गीतों में बुत के अर्थ में भी इसका प्रयोग देखने को मिलता है। सनम फ़ारसी के रास्ते हिन्दी में आया मगर है अरबी ज़बान का।

सेमिटिक मूल का ‘सनम’ صنم बनता है साद-नून-मीम ص ن م से मिलकर। इस्लाम से पहले सामी संस्कृति मूर्तिपूजक थी। अगर यूँ कहे कि मनुष्य का धार्मिक रुझान बुतपरस्ती के ज़रिये ही उजागर होता आया है तो भी ग़लत न होगा। प्रतीक, प्रतिमा, सनम या बुत तब तक निर्गुण-निराकारवादियों को नहीं खटकते जब तक वे धर्म के सर्वोच्च प्रतीक के तौर पर पूजित न हों। सनम का सन्दर्भ भी प्रतिमा के ऐसे ही रूप का है। कुरान की टीकाओं व अरबी कोशों भी सनम को “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” के तौर पर ही व्याख्यायित करते हैं। हालाँकि अरबी सन्दर्भ सनम को किसी विदेशी भाषा से आयातित शब्द बताते हैं पर उस ज़बान का हवाला नहीं देते।

अनेक सन्दर्भों से पता चलता है कि सनम का व्युत्पत्तिक आधार हिब्रू भाषा का है और वहाँ से अरबी में दाखिल हुआ। हिब्रू में यह स-ल-म अर्थात salem है जिसमें बिम्ब, छाया अथवा प्रतिमा का आशय है। इस्लाम से पहले काबा में पूजी जाने वाली प्रतिमाओं के लिए भी सनम शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। चूँकि “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है इसलिए सनम, सनमक़दा और सनमपरस्ती का उल्लेख इस्लामी के परवर्ती सन्दर्भों में तिरस्कार के नज़रिये से ही आता रहा है।

प्राचीन सेमिटिक भाषाओं में अक्कद प्रमुख है जिसकी रिश्तेदारी हिब्रू और अरबी से रही है। उत्तर पश्चिमी अक्कद और उत्तरी अरबी के शिलालेखों में भी सनम का ‘स-ल-म’ रूप मिलता है। दरअसल न और ल में बदलाव भारतीय आर्यभाषाओं में भी होता रहा है। मिसाल के तौर पर पश्चिमी बोलियों में लूण ऊत्तर-पूर्वी बोलियों में नून, नोन हो जाता है। इसी तरह नील, नीला जैसे उत्तर-पूर्वी उच्चार पश्चिम की राजस्थानी या मराठी में जाकर लील, लीलो हो जाते हैं। नीलाम का मराठी रूप लिलाँव है। यही बात सलम के सनम रूपान्तर में सामने आ रही है।

इस सन्दर्भ में s-l-m से यह भ्रम हो सकता है कि इस्लाम की मूल क्रिया धातु s-l-m और सनम वाला s-l-m भी एक है। दरअसल इस्लाम वाले स-ल-म में सीन-लाम-मीम س ل م‎ है जिसमें सर्वव्यापी, सुरक्षित और अखंड जैसे भाव हैं। जाहिर है ये वही तत्व हैं जिनसे शांति उपजती है। जबकि प्रतिमा के अर्थ वाले स-ल-म का मूल साद-लाम-मीम है। ख़ास बात यह कि प्राचीन सामी सभ्यता में देवी पूजा का बोलबाला था। लात, मनात, उज्जा जैसी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित थी। इसलिए बतौर सनम अनेक बार इन देवियों की प्रतिमाओं का आशय रहा। बाद के दौर में सनम प्रतिमा के अर्थ में रूढ़ हो गया।

इस सिलसिले की दिलचस्प बात ये है कि जहाँ बुत, मूर्ति या प्रतिमा जैसे शब्दों का प्रयोग ‘प्रियतम’ के अर्थ में नहीं होता मगर प्रतिमा के अर्थाधार से उठे शब्द में किस तरह प्रियतम का भाव भी समा गया। यहाँ समझने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर आराधना की प्रमुख दो शैलियाँ रही हैं- पहली है सगुण साकार और दूसरी है निर्गुण निराकार। सगुण साकार पन्थ में ईश्वर की उपासना करने वाले समूह में भी प्रतिमा, परमशक्ति का रूप नहीं है। जिस प्रतीक को परमशक्ति माना गया, उसकी प्रतिमा को ईश्वर की तरह पूजा जाता है। सनम में प्रियतम की अर्थस्थापना का सम्बन्ध दरअसल इस्लाम की प्रेममार्गी रहस्यवादी विचारधारा के विकास से है। इस धारा के प्रवर्तक सूफी थे। खासबात है कि सूफ़ीमत का जन्म सामी ज़मीन पर नहीं हुआ बल्कि गैरइस्लामी और बुतपरस्त इलाक़ों में हुआ। सूफ़ियों की इबादत के दो प्रमुख सोपान थे इश्क़ मजाज़ी और इश्क़ हक़ीक़ी।

लौकिक प्रेम को ही आध्यात्मिक प्रेम की सीढ़ी मानने वाले सूफ़ियों के भीतर ईश्वरप्राप्ति की अन्तर्धारा तो सनमपरस्ती की ही बह रही थी। इस्लाम के पैग़ाम को आमजन तक पहुँचाने में सूफ़ियों ने गीत-संगीत का मार्ग चुना और इस्लाम को स्वीकारने की राह खुल गई। अरब में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लिए प्रचलित सनम शब्द तो उनके ख़ज़ाने में पहले से था। इश्क के ‘मजाज़ी’ पड़ाव पर जो सनम प्रियतम की तरह दिलो-दिमाग़ पर असर करता था, ‘हकीक़ी’ पड़ाव पर वही सनम रुहानी बन जाता। फ़ारसी और हिन्दुस्तानी में इस तरह सनम शब्द का प्रवेश हुआ। कहना न होगा कि बॉलीवुड के लोकप्रिय गीतकारों में पंजाब के शायरों का बड़ा योगदान रहा है जिनकी रूह में सूफ़ियाना शायरी थी। ‘सनम’ का हासिल मुकाम ‘प्रियतम’ ही था।

 

जासूस की जासूसी    हैलो हाय प्रणाम नमस्ते    सलामत रहे अदब ऐ सलाम  जासूस की जासूसी

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें



अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, November 18, 2015

'रमना' में कोई रमे तो कैसे !!


हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अनेक स्थानों के नाम ‘रमना’ हैं। इनमें गाँव-बस्ती भी है और अरण्य-वाटिका भी। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, हरियाणा और पंजाब में रमना नामधारी अनेक स्थान या बस्तियाँ हैं। 'रमना' बना है रमण से जिसका अर्थ है सुन्दर, सुखद, रमणीय, मनोरम। ध्यान रहे संस्कृत की धातुक्रिया रम् में सुख, आनंद, तुष्टि, चमक, केलि जैसे भाव हैं। इससे ही रमण, रमणी, आराम, विराम, राम जैसे शब्द बने हैं जिनमें मूलतः सौन्दर्य, सुख, आनंद, हर्ष, प्रसन्नता, विलास जैसे भाव हैं।

'रमना' हिन्दी की लोकअभिव्यक्ति है। आशय घूमना-फिरना, टहलना, चलना, भोग-विलास और मज़े करना है।  पहले गाँव के आसपास की वह भूमि जिसे पशुओं के चरने के लिए सुरक्षित कर दिया जाता था 'रमना' कहलाती थीं अर्थात जहाँ पशु रमते हों, रमण करते हों। "छुट्टा घूमना" मुहावरे से भाव ग्रहण करें। जहाँ पशु उन्मुक्त विचरण करते हों वह उनकी रमण-भूमि ही तो कहलाएगी न! बाद में उस गोचर भूमि पर भी आबादी काबिज हो गई और बस्ती को भी रमना पहचान ही मिली।

आरा में एक रमना बाग है। देखना होगा कि वह किसी ज़माने में वह भूखण्ड सम्भवतः गोचर भूमि की तरह सुरक्षित रखी गई होगी बाद में शहर बढ़ कर वहाँ तक पहुँचा हो और वह सार्वजनिक मैदान बन गया हो जिसे रमना मैदान ही नाम मिला। इसी तरह ‘रमनाबाग’ या ‘रमना फ़ॉरेस्ट’ जैसे नामों से ही स्पष्ट है कि यहाँ आशय उस स्थान के रमणीक होने से है। ढाका के बाहरी हिस्से मे एक जमाने मे बीहड जंगल था और वहां संन्यासियों को समाधि दी जाती थी। उसे भी रमना के जंगल कहते थे। 1971 युद्ध के बाद वहा जंगल साफ कर शहीद स्मारक बनवाया गया। इस रमना का मूल जितना खूबसूरत है, ज़्यादातर ‘रमना’ बस्तियों की हक़ीक़त उसके उलट है। वाराणसी में गंगा किनारे किसी ज़माने में गोचरभूमि रहा रमना क्षेत्र अब आबादी के दबाव से घिरा ब्लॉक है। विसंगति यह कि आज इस स्थान पर शहरभर का कचरा डाला जाता है। यहाँ सॉलिड वेस्ट प्लान्ट है जो शायद ही कभी ठीक से चलता हो।

जहाँ तक ‘रमना’ नाम से जुड़े ‘गोचर’ शब्द का सवाल है, उसका प्रमुख अर्थ पशुओं के लिए छोड़ी गई भूमि से ही है। बाकी वैदिक शब्दावली में ‘ग’ ध्वनि का आशय गमन से है। गम् धातुक्रिया का अर्थ गमन करना ही है। गति का ग भी यही कहता है। इसलिए ‘गो’ का अर्थ सिर्फ़ धेनु अथवा गाय नहीं बल्कि पशु मात्र से भी है, क्योंकि वह चलता है, गति करता है। यूँ कहें कि प्राचीन मनीषियों ने हर उस पदार्थ को ‘गो’ के दायरे में रखा जो गतिशील है। इसीलिए पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे ये भी 'गो' ही हैं। मन की गतियाँ भी 'गो' हैं। स्वाभाविक है तब इन्द्रियगतियाँ इसके दायरे से बाहर कैसे रहतीं? आँखों से जितना दिख रहा है वह भी गोचर और पैरों से जितना नापा जा सके वह भी गोचर। यहाँ पशुओं और मनुष्यों में फ़र्क़ न करें। पशुओं के पैर भी इन्द्री ही हैं सो कोई पशु जहाँ विचरण करे वह गोचर भूमि है। इसीलिए कहा जाता है “सबै भूमि गोपाल की”।

पशुओं का घूमना यानी ‘चरना’ किस लिए? ज़ाहिर है उदरपूर्ति के लिए सो जिन चरणों की गति को ‘चरना’ कहा जाता है, वही क्रिया आहार कहलाई। चरने यानी चलने का साध्य हुआ ‘चारा’। ‘चरना’ का कारक हुए ‘चरण’ अर्थात इन्द्री। कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘चरना’ और ‘चलना’ एक ही हैं। दुनियाभर की अनेक भाषाओं में भी यही अर्थस्थापन प्रक्रिया है। अर्थात गतिशील को ही पशु कहा जाता है।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें



अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin