सभी धर्मग्रंथों में दया को धर्म का मूल बताया गया है। सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का धर्म होता है। दया के बिना मनुश्य को पशु समान मानने की बात भी कही जाती है। दया के लिए हिन्दी में एक और शब्द भी प्रचलित है रहम । जो व्यक्ति दया करता है उसे दयालु कहा जाता है। अरबी , फारसी, उर्दू में इसका रूप होता है रहमदिल।
मध्यकाल के प्रसिद्ध कवि रहीम ने कहा है-वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग। बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥ तो ऐसा ही है दया ,करुणा और रहम का रंग। रहम मूलतः अरबी ज़बान का शब्द है और सेमेटिक धातु रह्म से बना है जिसमें दया का भाव है। रहम शब्द उर्दू , अरबी , फारसी , हिन्दी में खूब प्रचलित है। सेमेटिक मूल का शब्द होने के नाते इसके रूपांतर हिब्रू भाषा में भी नज़र आते हैं। हिब्रू का रश्म या रशम racham शब्द भी इसी कड़ी में आता है जिसका मतलब भी करुणा , दया , प्रेम, ममता आदि है।
अरबी के रहम का सर्वोत्तम रूप है रहमान। इसका हिन्दी अनुवाद दयावान अथवा करुणानिधान हो सकता है। आस्था के संसार में ये दोनो ही शब्द ईश्वर का बोध कराते हैं। ठीक यही बात रहम से बने रहमान के साथ है जिसमें ईश्वर को रहमान बताया गया है। जो संसार में सर्वाधिक कृपानिधान, दयावान हैं।
इस्लाम में सिफ़ाते खुदावंदी अर्थात ईश्वरीय गुणों में रहम को सर्वोपरि बताया गया है। इसकी एक व्याख्या यह भी है कि रहम, दयालुता , करुणा, कृपा, परोपकार आदि सद्गगुण ईश्वर के समान बनाते हैं क्योंकि ईश्वर ऐसा ही है। इसीलिए उसे रहमान यानी परम कृपालु, दयानिधान कहा जाता है। रहमान की तरह ही रहीम शब्द भी दया, करुणा की अर्थवत्ता रखता है और जिसके मायने भी दयालु या कृपालु ही होते हैं। ईश्वर के कई नामों में रहमान की तरह ही रहीम का भी शुमार है। ईश्वरीय के लिए उर्दू में रहमानी शब्द शब्द है।
... जिस हृदय में दया, करुणा और कृपा के अलावा और कुछ नहीं हैं वह परमात्मा ही हो सकता है और कोई नहीं...
कुरान की प्रसिद्ध पंक्ति बिस्मिल्लाह अर रहमान, अर रहीम [बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम- शुरू करता हूँ उस अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयावान और करूणामय है ] में प्रभु के इसी गुण को उजागर करते हुए उनकी स्तुति की गई है। इसी तरह हिब्रू में भी कहा गया है बशेम इलोहीम, हा रश्मन वा रशम [ bshem elohim, ha-rachaman, va rachum ] ये पंक्तियां भी क़रीब क़रीब कुरान की तरह ही हैं।
रहम से रहमत भी बना है जिसमें मेहरबानी , कृपालुता आती है। सभी धर्मग्रंथों में मनुश्य के लिए नसीहत है कि उसके मन में करुणा, दया , परोपकार की भावना होनी ही चाहिए। मगर अक्सर ऐसा नहीं होता । स्वार्थ, दुष्टता, लोभ-लिप्साओं का वहां पहले से डेरा रहता है और रहम जैसी कोमल सी भावना वहां दबी-कुचली रहती है। मगर जिस हृदय में दया, करुणा और कृपा के अलावा और कुछ नहीं हैं वह परमात्मा ही हो सकता है और कोई नहीं । इसीलिए रहमान यानी परमकृपालु अर्थात परमात्मा।
इस श्रंखला की अन्य कड़ियां-
रहीम का ताल्लुक दया से होगा पता ही नहीं था। हम शब्दों के अर्थ जाने बिना प्रयोग करते हुये जिन्दगी बिता देते हैं । जब अर्थ पता चलता है तो मालूम होता है कि अरे इसका मतलब यह था।
ReplyDeleteअनूप शुक्ल जी का कहना बिल्कुल सही है। एक बात और कई बार तो अर्थ मालूम होता है पर जब कोई पूछता है उसका अर्थ, तो याद नहीं आता है। ऐसा क्यों होता है ?
ReplyDeleteपर यह सफर काफी कुछ याद करा रहा है मानस तक।
इस्लाम में रहम को सर्वोपरि ईश्वरीय गुण बताया गया है। इसकी सोदाहरण (इतिहास के संदर्भ में) व्याख्या जरूरी है। आम हिन्दू को इससे उलट परसेप्शन है। उस परसेप्शन का करेक्शन होना चाहिये।
ReplyDeleteइस्लाम में खुदा रहीम है। रहमत उसका एकाधिकार। बहुत से लोग उस के इस काम में दखल नहीं देते। वरना कहा जा सकता है रहम कर के खुदा बनना चाहते हो। ज्ञान जी उन का परसेप्शन सही कर लें।
ReplyDeleteदया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। हमारे पूर्वजों ने भी काफी सटीक कहा है। सभी धर्मों की मूल शिक्षायें एकसी ही हैं। धर्म के नाम पर हो रहे झगड़े तो व्याख्या करने वालों की कला है जो वे अपने धर्म को अलग दिखाने के लिये कर रहे हैं।
ReplyDeleteवाह इस बार तो आना सार्थक हुआ.. बहुत सारी जानकारी लेकर जा रहा हू आपके ब्लॉग से...
ReplyDeleteधर्म अगर ये काम ना कर सके तो धर्म ही क्या ! आज शब्दों के साथ-साथ और भी ज्ञानवर्धन हुआ.
ReplyDeleteबहुत बहुत सुंदर पोस्ट है यह.शब्द विवेचना के बहने बहुत सुंदर बात कही आपने.साधुवाद.
ReplyDeleteजन्म तो हर मनुष्य एक सा ही लेता है पर उसके सद्गुण और कर्म ही ईश्वरत्व प्रदान करते हैं.बस इतना जो ध्यान में रख ले और कर्म में उतार ले तो यह धरती स्वर्ग बन जायेगी.
खुदा रहीम = करुणा सागर ईश्वर
ReplyDeleteएक ही तो हैँ
सार्थक पोस्ट !
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