Monday, September 8, 2008

ऐश्वर्य, ईश्वर और ऐश...[भगवान-3]

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विश्व की सभी संस्कृतियों में इस ब्रह्मांड को संचालित करनेवाली परमशक्ति की कल्पना की गई है और उसे कई नामो से पुकारा जाता है। हिन्दी में भगवान के अलावा भी कई शब्द प्रचलित हैं। अकेले विष्णु के ही सहस्रनाम हैं। परमसत्ता के अर्थ में प्रचलित एक शब्द ईश्वर भी है। वह सृष्टि का निर्माता है और सर्वोच्च नियंता भी है। वह सुखदाता और दुखहर्ता है। परमशक्तिवान सूर्य ही आदिदेव थे यह व्याख्या सही साबित होती है ईश से बने ईशान शब्द से जिसका अर्थ होता है सूर्य।
 
नुष्य ने जब सृष्टि को अनुभव किया तभी से उसे प्रकृति की शक्तियों का बोध होने लगा। सर्वाधिक प्रभावित वह सूर्य से हुआ जिसकी प्रखरता, ताप और प्रकाश से वह चकित रहता था। प्रायः सभी संस्कृतियों में सूर्योपासना की परंपरा यही सिद्ध करती है कि मनुष्य का आदिदेव सूर्य ही है। देवनागरी का वर्ण बड़ा अनोखा है। इस एक वर्ण में चमकना और व्याप्त होना जैसे भाव समाहित हैं। गौर करें प्रखरता और प्रकाश में ये दोनों गुण होते हैं। प्रखरता से चमक उत्पन्न होती है और प्रकाश का गुण है व्याप्ति। ये दोनों ही संकेत परमशक्तिमान सूर्य की और संकेत कर रहे हैं। में निहित यही भाव संस्कृत के ईश् में व्यापक होकर योग्य , शक्तिवान , स्वामी, अपनानेवाला जैसे अर्थों में व्यक्त होते हैं। ईश से हिन्दी में कई शब्द बने हैं जैसे ईसर, ईसुरी , ईश्वरीय आदि। हिन्दी में प्रचलित कई नामों का जन्म भी इससे ही हुआ है जैसे नरेश, सुरेश, रमेश, महेश, हरीश, मुनीश, ब्रिजेश आदि ।
रमशक्तिवान सूर्य ही आदिदेव थे यह व्याख्या सही साबित होती है ईश से बने ईशान शब्द से जिसका अर्थ होता है सूर्य , शासक स्वामी, शिव और विष्णु आदि। ज्योतिष में ईशान कोण पूर्व दिशा को कहते हैं। जाहिर है पूर्व से ही सूर्योदय होता है इसीलिए यह शब्द बना। इससे ही बने हैं ईशा और ईशिता जिनका अर्थ होता है दुर्गा, देवी। शक्तिशालिनी, सम्पन्न महिला। ईश से बने ईश्वर में शक्ति सम्पन्न , योग्य, समर्थ जैसे अर्थ भी समाहित हुए। कालांतर में राजा, मालिक, शासक भी ईश्वर शब्द के दायरे में आ गए। हिन्दू दर्शन में ईश्वर के मुख्यतः दो रूप दिखाई पड़ते हैं – सगुण साकार और निर्गुण निराकार । सगुण ईश्वर के कई रूप हैं जैसे विष्णु , शिव आदि। सगुण ब्रह्म ही सृष्टि के निर्माकर्ता के रूप में पूजित हैं । इसके बावजूद ईश्वर की अवधारणा अंततः निर्गुण ब्रह्म पर ही जाकर टिकती है। सगुण भक्ति, निर्गुण ब्रह्म में विलीन होती है।  
न समृद्धि के लिए ऐश्वर्य शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है जो कि ईश्वर से ही बना है। ऐश्वर्य का अर्थ होता है प्रभुता , ताकत , शक्ति, बल जो ईश्वर में निहित है । गौर करें कि धन सम्पत्ति अपने आप में सत्ता शक्ति प्रदान करती हैं इसलिए समृद्धि जैसे अर्थों मे ऐश्वर्य शब्द सीमित हो गया किन्तु इसके व्यापक अर्थ आज भी प्रभावी हैं। ऐश का अर्थ होता है सर्वोपरि, शिव से संबंध रखनेवाला।

14 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह ही एक और ज्ञानवर्धक आलेख. बहुत बहुत आभार.

Lavanyam - Antarman said...

'ईशावास्यम्` इदम सर्वम्` -
बहुत सटीक विश्लेषण अजित भाई !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षन,
शब्दोँ के बने सुगम्धित हार,
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !
जिस क्शण से देखा उजियारा,
टूट गये रे तिमिर ~ जाल
( ये मेरी लिखी कविता याद आ गई )
- लावण्या

Satyendra Prasad Srivastava said...

ईश्वर के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिली

sidheshwer said...

अजित भाई,
आपके ब्लाग की जानकरियां कितने काम की हैं ,क्या बतायें. मुझे तो अपने नोट्स( क्लास के वास्ते) बनाने में खासी मदद मिल रहीं है.मैं यह भी सोचता हूं कि भाषा विज्ञान कितने दुरुह और नीरस तरीके से मैंने पढ़ा.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने ईश्वर शब्द को व्याख्यायित किया। आभार। अनेक व्याख्याओं से अनेक बार लगता है कि शब्दों के मूल अर्थ ही खो गए हैं। गीता में दो शब्द आए हैं देहिनः और शरीरिणः इन दो शब्दों के सभी अर्थ स्पष्ट करें तो बहुत उपकार होगा। गीता के संदर्भ में इन का अर्थ सामान्य रूप से आत्मा किया जाता है। लेकिन इन शब्दों के और भी अर्थ हैं। गीता में इन शब्दों के वे अर्थ रखे जाएँ तो गीता के श्लोकों के अर्थ बहुत गहरे हो उठते हैं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अजित भाई,

हमेशा की तरह एक बहुत अच्छी और जानकारीपूर्ण पोस्ट.
ईशान कोण पूर्व दिशा नहीं है बल्कि उत्तर-पूर्व कोण है. इसका सम्बन्ध सूर्योदय से न होकर देवताओं के वास से है और इसी कारण इसे अपराजिता भी कहा गया है.

धन्यवाद!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ईश्वर से जुड़ी यह शब्द यात्रा रोचक लगी

अजित वडनेरकर said...

@ स्मार्ट इंडियन-
ईशान कोण पर मुझे दुरुस्त करने के लिए आभार । पोस्ट में संशोधन कर दूंगा। यही है सफर का आनंद । साथ बने रहें, यूं ही साझीदार की तरह...

अजित वडनेरकर said...

@सिद्धेश्वर
प्रिय भाई, आपकी पहली बात को सिर माथे लेता हूं। आपको मेरे प्रयास सार्थक लग रहे हैं इससे बड़ी बात और प्रसाद मेरे लिए कुछ और नहीं है। दूसरी बात एकदम सही है। भाषा विज्ञान में शास्त्र ज्यादा है। मुझे लगता है कि सामान्य विद्यार्थी के लिए भाषा की जानकारियां शास्त्रीय ढंग से न दी जाकर रोचक शैली में ही दी जानी चाहिए। शास्त्र तो उसके लिए है जिसने इस क्षेत्र में काम करने की ठानी है। व्युत्पत्ति तो शब्दार्थ को समझने का पहला चरण है। मगर उसे भाषा विज्ञान के साथ चस्पा कर दिया गया और आम हिन्दीवाला भी इस दिलचस्प क्षेत्र से दूर है।

मीनाक्षी said...

ऐश्वर्य, ईश्वर और ऐश की रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी ... काश आज के हिन्दी अध्यापक भाषा को इसी तरह आसान तरीके से पढा सकें..

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अजित जी,
ऋद्धि-सिद्धि दाता गणपति महाराज की
पर्व आराधना के बीच ऐश्वर्य की
यह चर्चा बहुत अनुकूल है.....
ईश्वर आपकीशब्द साधना को
निरंतर नवीन दृष्टि व दिशा
प्रदान करे, यही मंगल कामना है.
========================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Ashok Pande said...

इष्ट भी यहीं से आया क्या अजित भाई?

अनुराग said...

ज्ञानवर्धक आलेख.

अभिषेक ओझा said...

अच्छी जानकारी रही. एक विदेशी शिक्षक थे हमारे उन्होंने एक बार आत्मा और ऐटमोसफियर की तुलना की थी. लैटिन में आत्मस जैसा कुछ शब्द होता है (अल्फाटाउम्युसिग्मा) जिसका मतलब शायद साँस से कुछ जुड़ा हुआ होता है... और हिन्दी में आत्मा भी इससे जुड़ा हुआ सा है... बाकी याद नहीं. आज ये अप्रासंगिक टिपण्णी ऐसे ही पोस्ट पढ़ते-पढ़ते याद आ गई.

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