Tuesday, August 11, 2009

दो महिनों में सत्रह फिल्में!!![बकलमखुद-96]

पिछली कड़ी- कॉलेज की रुमानियत और जिम्मेदारियों का एहसास

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और पिच्चानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

कॉ लेज आरंभ हो चुका था। यहाँ स्कूल जैसा बंधन न था। नए कॉलेज के अधिकांश प्राध्यापक भी नए थे। उन का व्यवहार वरिष्ठ विद्यार्थियों जैसा था। कॉलेजों में रेगिंग के किस्से सब ने सुने थे कि उन में क्या क्या होता है? लेकिन यहाँ वैसी कोई बात दिखाई न दी। कॉलेज के दूसरे और तीसरे वर्ष के सभी विद्यार्थी जाने पहचाने थे। कुछ दिनों में लेक्चर आरंभ हो गए जिन्हें सुन कर सरदार की हवा खिसक गई। जो भी प्राध्यापक आता अंग्रेजी बोलता। ऐसी अंग्रेजी, जो पहले कभी सुनी नहीं थी। प्राध्यापकों ने जिन किताबों को खरीदने की सिफारिश की वे सब की सब अंग्रेजी माध्यम की थीं। कुछ पुस्तकें दूसरे वर्ष के विद्यार्थियों से मांग कर पढ़ने का प्रयास किया। कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा। बड़ी मुश्किल हो चली थी। उन्हें समझने के लिए पहले हिन्दी में अनुवाद करना पड़ता था। फिर यह भी पता लगा कि पिछले साल और इस साल के सिलेबस में रात दिन का अंतर है। किताबें सब नहीं लेनी पडेंगी। अब छात्र क्या करें?
रदार ने हिम्मत दिखाई, तय किया कि अंग्रेजी पर काबू पाना होगा। पर कैसे? रोजाना अंग्रेजी का अखबार खरीदना और उसे पढ़ना शुरू किया। महिने भर मे खबरें और संपादकीय कुछ समझ आने लगे। लेकिन उन के लिए शब्दकोष साथ रखना पड़ता था। हर पैरा में एक तिहाई शब्दों के अर्थ खोजने पड़ जाते थे। यह ऐवरेस्ट चढ़ने जैसी मुहिम थी। अब तक विद्यालय में जो अंग्रेजी पढ़ी और पढ़ाई गई थी वह सिर्फ इस हिसाब से कि विद्यार्थी पास हो जाए या अधिक से अधिक अच्छे अंक ले आए। वह अंग्रेजी सीखना नहीं तो कदापि नहीं था। अंग्रेजी काबू में नहीं आ रही थी, उस से भय लगने लगा था। हिन्दी माध्यम की किताबों की तलाश आरंभ की तो पता लगा कि राजस्थान के विश्वविद्यालय के नए सिलेबस के हिसाब से हिन्दी में पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं। नए कोर्स के लिए हिन्दी में पुस्तकें लिखवाई जा रही हैं जिन के जनवरी तक बाजार में आने की संभावना थी, हो सकता था पूरे साल भी न आएँ। कॉलेज आरंभ हुए दो माह हो गए। किताबें अभी तक खरीदी नहीं गई थीं। बड़ी मुश्किल हो गई। सरदार घर में किसी को कुछ कहने का नहीं थे। वहाँ तो होशियार विद्यार्थी होने का लेबल लग चुका था। पिताजी अक्सर बाहर नौकरी पर रहते।
शहरा निकल गया। किताबों का कुछ पता नहीं था। प्राध्यापक जो कुछ लेक्चर देते उन का सार किसी तरह अपनी कापियों में लिख लेते थे। पर उस से क्या काम चलना था। अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें बाजार में आ गई थीं। धीरे-धीरे सब विद्यार्थी उन्हें ही खरीद रहे थे। सरदार ने भी हिम्मत कर के वही पुस्तकें खरीद लीं। पढ़ने लगे। परीक्षा बहुत डरते-डरते दी गई। फिर भी यह विश्वास था कि पास हो लेंगे। जीवविज्ञान के विद्यार्थियों को एक ही रास्ता दिखाई देता था। पहला साल पास करो और पीएमटी (मेडीकल प्रवेश परीक्षा) पास कर किसी तरह मेडीकल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त करो। मर खप कर पाँच बरस में डाक्टर बन कर ही निकलोगे। सब विद्यार्थी इस परीक्षा के लिए कोचिंग लेने के लिए जयपुर जाने का कार्यक्रम बनाने लगे। सरदार ने पिताजी को कहा तो उसे भी जयपुर जाने की स्वीकृति मिल गई।
चार पाँच दोस्त जयपुर के लिए लद लिए। तीन चार दिन जयपुर में कोचिंग संस्थानों की थाह ली गई और एक को चुन कर उस में दाखिला ले लिया। अब तक तो धर्मशाला में पड़े थे, अब रहने की व्यवस्था करनी थी। तीन दिन कोचिंग पढ़ने के बाद कमरा तलाश अभियान चलता रहा। चप्पलें घिस कर टूट गईं, नई खरीदनी पड़ीं, पर कमरा नहीं मिला। आखिर कोचिंग वालों से सहायता करने को कहा। उन्हों ने एक मकान में कमरा दिलाया। दो अन्य मित्रों के साथ सरदार उस में रहने लगा। पढ़ाई होने लगी। कोचिंग के अध्यापक अच्छे थे। ठीक से समझाते थे। हिन्दी बोलने से उन्हें कोई गुरेज नहीं था। सरदार जैसे जैसे पढ़ता जाता था, दिल डूबता जाता था। जिसे डिग्री कोर्स के पहले साल की परीक्षा के पहले समझ लेना था, वह अब समझ आ रहा था। उसे लगने रहा था कि वह शायद पीएमटी पास कर ले, पर पहले साल की परीक्षा में ही फेल हो गया तो क्या होगा?
दो माह तक पढ़ाई चली। वह सन् 1971 था। हिन्दी फिल्मों में राजेश खन्ना और 0ee6926c-e871-11dd-bb42-000b5dabf636 किशोर कुमार की धूम थी। अब तक साल में चार-पाँच फिल्में बहुत होती थीं। यहाँ दो माह में सरदार ने दोस्तों के साथ सोलह देख डालीं। आखिर पहले साल का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ। सरदार फेल हो गया था। विश्वविद्यालय जा कर अंकतालिका निकलवाई गई। पता लगा भौतिकी और रसायन दोनों में ही सरदार गोल था। अब कोचिंग का कोई अर्थ नहीं रह गया था। फेल होने से सरदार को बड़ा धक्का लगा था। तुरंत घर जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। छोटे मामा का घर जयपुर में ही था। सरदार ने अपना बोरिया बिस्तर समेटा और जयपुर में अपने मामा के घर पहुँच गया। वहाँ सब ने तसल्ली दी। ममेरे भाई साहब समझाने लगे। लेकिन सरदार तो पहले ही सब कुछ समझ चुका था। घर खबर कर दी गई कि वह दो-चार दिन जयपुर रुक कर लौटेगा। उन्हीं दिनों मनोजकुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ रिलीज होने वाली थी। पहले दिन के टिकट एडवांस लिए और तय हुआ कि यह सत्रहवीं फिल्म देख कर वापस घऱ लौटना है। सरदार घर लौटा, पिताजी ने पूछताछ की कि फर्स्टक्लास का यह अंत कैसे हुआ? सरदार ने माध्यम की परेशानी बताई। पिताजी अध्यापक थे परेशानी समझे और इस साल मेहनत करने को कहा। इस साल फिर माध्यम का सवाल घेरे खड़ा था। कुछ विषयों की हिन्दी की पुस्तकें उपलब्ध हो चुकी थीं। लेकिन फेल करने वाली रसायन और भौतिकी की पुस्तकों के हिन्दी संस्करण अब भी नदारद थे। सवाल का उत्तर मिला कि जब एक साल माध्यम के पीछे खराब कर दिया है तो इसे क्यों बदला जाए। फिर से अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकों से पढ़ाई परवान चढ़ने लगी। -अगले मंगलवार भी जारी

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

25 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

आज की पोस्ट इस कड़ी की बेहतरीन प्रस्तुति है। अंग्रेजी का जैसा धड़का सरदार को था वैसा ही हमें भी था। सरदार तो वकीलसाब बनकर इस कमजोरी से पार पा गया, हम क्या करें?

अंग्रेजों ने अंग्रेजी इसलिए नहीं सिखाई थी कि हमारे हिन्दीभाषी मध्यवित्त परिवेश वाले विद्यार्थी इस क़दर निरीह हो जाएं। लानत है हमारी शिक्षा पद्धति, बुद्धिजीवियों और नियामकों पर जिनकी उदासीनता के चलते छह दशकों बाद भी हिन्दी के बूते हम सर उठा कर तब तक नहीं चल सकते जब तक अंग्रेजी में प्रवीण न हो जाएं।
(ये हिन्दी बनाम अंग्रेजी की भूमिका नहीं हैं, सिर्फ तत्काल टिप्पणी है)

Sachi said...

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, मगर काबू पा लिया गया. भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कड़वी हकीकत को आपने सुन्दर शब्दों में आपने बयान किया है..
कालेज की ज़िन्दगी का एक पहलू यह भी है...

Udan Tashtari said...

इसी परेशानी से हम भी दो चार हुए थे लेकिन किसी तरह पार पा गये. बहुत उम्दा संस्मरण रहा!!

Arvind Mishra said...

अरे यह तो बड़ी किरकिरी हो गयी ...आप लोग तो शायद इस परेशानी से उबर पाए मैं तो आज भी झेल रहा इस विदेशी भाषा हूँ को !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

रोचक संस्मरण प्रकाशित करने के लिए,
धन्यवाद।

अनिल कान्त : said...

भाई मुझे बहुत मज़ा आया ये संस्मरण पढ़कर

Vivek Rastogi said...

वाकई ये बहुत बड़ी कमजोरी है जिससे हम भी गुजर चुके हैं पर धीरे धीरे सब ठीक हो जाता है।

मुनीश ( munish ) said...

इस मायने में मैं काफी भाग्यशाली रहा . मैं एक ईसाई रोमन कैथोलिक स्कूल में पढ़ा जहाँ सारे विषय हिंदी माध्यम से पढाये जाते थे मगर अँग्रेज़ी भाषा के पेपर को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरेह ही पढाया जाता था . मज़े की बात ये है पाँचवीं तक मैं एक टाट पट्टी वाले सरकारी स्कूल में पढ़ा और जब मैं इस ईसाई स्कूल में गया तो मुश्किल मुझे संस्कृत पढने में हुई चूंकि वहां ये कक्षा चार से अनिवार्य थी जबकि सरकारी में कक्षा छः से और वो भी वैकल्पिक.! उग्र राष्ट्र वाद का प्रेमी और समर्थक होते हुए भी मैं कहना चाहता हूँ दोस्तो की शिक्षा का तमाम ठेका भारत में शान्ति से ईसाई संस्थाओं को ही दे दिया जाना चाहिए , उन जैसा समर्पण और त्याग हम में नहीं है ...नहीं है ...नहीं है ! .

मुनीश ( munish ) said...

....और मुझे वहां किसी ने किसी धर्म के समर्थन या विरोध में कभी कुछ नहीं कहा . ओउम हेल मदर मैरी !

अशोक कुमार पाण्डेय said...

याद आया कि प्रोफ़ेसर पिता के आतंक से मुक्त हो जब हम गोरखपुर बीए करने पहुंचे तो पहले साल लगभग रिज़ एक फ़िल्म देखी…फिर जो ऊब पैदा हुई तो अब साल में एक देख पाना मुश्किल है…

अभिषेक ओझा said...

जे बात ! फिल्में तो हमने थोडी लेट शुरू की... अंग्रेजी थोडी पहले ... छठी कक्षा से पढना चालु किया था लेकिन उसके पहले घर पे बहुत रटाया गया था. पर आज भी परेशान करती है :) जहाँ मौका मिलता है हिंदी नहीं छोड़ते. अंग्रेजी तो मज़बूरी है. और अब तो ये मजबूरी बचपन से ही हो जाती है. हमें तो फिर भी बाद में पता चली.

अजित वडनेरकर said...

मुनीश भाई से सहमत हूं। जो लोग मिशनरियों को कोसते हैं उन्हें उनकी अच्छाइयों की जानकारी नहीं है। धर्म परिवर्तन कोई भी अपनी मर्जी से करता है, दूसरी बात यह कि यह काम इतना ही प्रभावी होता तो इस देश में ईसाई जमात का प्रतिशत इतना कम न रहा होता।

sanjay vyas said...

आगे का इंतज़ार है!
हम जब विज्ञान में स्नातक हुए, हिंदी माध्यम में किताबे आ गयी थीं. खुशकिस्मती हमारी.
अब थोडी समझे हैं अंग्रेजी पर जैसा नामवर जी ने कहा उस घोडे की सवारी कभी मत करो जिसकी लगाम तुम्हारे हाथ में न हो, तो अब भी डर लगता है.

abhivyakti said...

अजित साहब,
आपके ब्लॉग की खासियत है कि वह इतने उच्च मानदंडों को हर पोस्ट में बरकरार रखता है...और कम समय अन्तराल में एक से बढ़ कर एक उम्दा पोस्ट मिलती है...आश्चर्य इस बात पर होता है कि हमारे प्रिंट और विसुअल मीडिया में वह स्तर क्यों दिखाई नहीं पड़ता है...पर मेरे जैसे सोच कर कुछ जरा लम्बी टिप्पणी करने की इच्छा रखने वाले पाठक को एक टिप्पणी लिखने तक अगली दो पोस्ट आ जाती है....जेवियर मोरो के पेशन इंडिया पर आपकी दी जानकार पर दो दिन तक उस पर सोचता रहा...आपने एक कालखंड की यात्रा करा दी....तब तक भोंपू,ढीढोरची ढोल वाली पोस्ट आगई...और आज टिप्पणी लिखने बैठा तो बकलमखुद देखी ...अंग्रेजी की उपयोगिता पर किसी को संदेह नहीं है...आपत्ति मात्र इतनी है कि योग्यता के लिए भाषा कि सुविधा के बजाय अंग्रेजी भाषा ही योग्यता हो गई...रविन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं को उनकी श्रेष्ठता के कारण अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था..क्या उनको नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के लिए अंग्रेजी में लिखना अनिवार्य होना चाहिए था?मानव सभ्यता की उन्नति के लिए आवश्यक है कि वह अपने सदस्यों की योग्यता के समुचित उपयोग का आधार तैयार करे न कि भाषा या किसी अन्य बहाने को किसी योग्यता को कुंठित करने का औजार बनाए...
अत्यंत श्रेष्ठ रव्ह्नाओं कि प्रस्तुति के लिए आभार...
प्रकाश पाखी.

एकलव्य said...

बहुत उम्दा संस्मरण

Dr. Chandra Kumar Jain said...

लगातार पढ़ रहा हूँ,
बहुत रोचक...सूचनात्मक
और प्रेरक भी हैं कडियाँ.
=====================
आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अंग्रेजी से अपना भी छत्तीस का आकडा रहा है हमेशा से . अंग्रेजी फिल्मे देखि है बिना समझे ,टर्मिनेटर जैसी

डॉ .अनुराग said...

दूसरी फिल्मो के नाम भी बता देते ...कोई अडल्ट फिल्म रिलीज नहीं होती थी उन दिनों?.....हम तो एक बार ही गए थे ..उसमे इत्ता डर की कोई पहचान वाला न मिल जाये

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना अच्छा ही है। लेकिन जो नहीं जानते उन्हें हीनभावना से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। मेरी १२वीं तक की पढ़ाई हिन्दी में हुई। उसके बाद पिता जी की इच्छा थी कि बी.ए. में एक विषय अंग्रेजी जरूर लूँ। प्रवेश परीक्षा में अच्छे अंक मिले तो मैने अपने प्रिय विषय मनोविज्ञान, दर्शन और राजनीति विज्ञान चुन लिया। पिताजी ने फिर कहा कि बिना अंग्रेजी पढ़े क्या कर पाओगे? मैंने मजबूरी में दर्शन छोड़कर अंग्रेजी विषय पाने के लिए प्रार्थना पत्र लिखा और विश्वविद्यालय के एक छात्रनेता के पास सिफारिश कराने के लिए पहुँच गया क्योंकि संशोधन का समय बीत चुका था। उन्होंने मेरा प्रार्थना पत्र पढ़ा और फाड़कर फेंक दिया। बोले- इतनी बड़ी मूर्खता क्यों करना चाहते हो। दर्शनशास्त्र ही तुम्हे आगे सफलता दिलाएगा।

मैने पिताजी की इच्छा का जिक्र किया तो व्यग्य में हँस पड़े, फिर चुनौती देते हुए बोले, “इतना ही अंग्रेजी का शौक है तो सारे विषय ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ लो...!”


मैं इस चुनौती के लिए तैयार तो हो गया लेकिन उसके बाद वही पापड़ बेलने पड़े जिनका जिक्र यहाँ किया गया है। गनीमत ये रही कि कभी फेल नहीं होना पड़ा और प्रथम श्रेणी भी बरकरार रही। बाद में अंग्रेजी माध्यम ने खूब नम्बर दिलाए। यह बात अलग है कि हिन्दी हमेशा मेरे दिल के करीब रही और आज भी मुझे इसका प्रयोग बहुत सुकून देता है।

दर्शन शास्त्र का आजीवन ऋणी तो हो ही गया हूँ जिसने मुझे हर परीक्षा में सम्बल प्रदान किया और नौकरी भी दिला दिया।

venus kesari said...

वाह जी वाह उस समय तो सरे रिकार्ड टूट गए होंगे १७ पिच्चर
मगर आज कल के डीवीडी जमाने में दो महीने में १०० भी देखी जा सकती है :)

वीनस केसरी

अजित वडनेरकर said...

@प्रकाश पाखी
तारीफ़ का शुक्रिया हुजूर। सफ़र दिलचस्प न हो तो सारा वक्त खराब हो जाता है इसलिए शब्दों के सफर को बेहतर बनाने की लगातार कोशिश रहती है। बने रहें साथ....

बी एस पाबला said...

17 फिल्में, अंग्रेजी का भूत, पहले साल की असफलता!
यह तो लगता है कि आप मेरी ही बात कर गए :-)

वैसे अंग्रेजी के समाचार पत्रों से शब्द ज्ञान तो अवश्य बढ़ता है। उस समय के हिंदी समाचारपत्रों के साथ भी यही बात थी, आजकल नहीं है :-(

गिरिजेश राव said...

मैं अंग्रेजी और हिन्दी को एक दूसरे का पूरक मानता हूँ। भाषाएँ नहीं भाषाई पूर्वग्रह समस्या उत्पन्न करते हैं।

अंग्रेजीदाँ लोग जब कॉम्प्लेक्स वाली बातें करते हैं तो मैं हिन्दी, वह भी चालू किस्म की हिन्दी में शुरू हो जाता हूँ। कोई भोजपुरिया पास हो तो बल्ले बल्ले।

मेरे इलाके के कभी सी बी आर आई के निदेशक हुआ करते थे। जब मिलें तो चाचा कहीं भी भोजपुरी में ऐसे शुरू होते थे कि आस पास के लोग चौंक जाते थे। विडम्बना ! उनके लड़के भोजपुरी नहीं बोल पाते।

बहुत जटिल मामला है। लेकिन यदि हिन्दी वाले पूर्वग्रह से मुक्त हों तो अंग्रेजी से हिन्दी को समृद्ध किया जा सकता है। काम चल ही रहा है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अंग्रेजी पढ़े लिखे कईयों को बढिया नौकरी और पेशा भी मिला - हिन्दी को भारतीय सरकार और लोग अगर सन्मान नहीं देंगें , तब आगे क्या होगा ?
ये कड़ी भी पसंद आयी
स्नेह,
- लावण्या

HARI SHARMA said...

सबसे बढिया बात ये कि यहाँ हिन्दी में टाइप करने की सुविधा बहुत ही बढिया है.

ये इस देश का कुसंस्कार है कि होशियार कहलवाए जाने के लिए अंग्रेजी बढिया होने का प्रमाण पत्र पास में हो.

कितने ही लोग शिक्षण, चिकित्सा और अभियांत्रिकी में अपना डंका बहा रहे होते अगर इस म्लेच्छ भाषा की गुलामी नहीं होती.

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

Post a Comment

Blog Widget by LinkWithin