Tuesday, August 4, 2009

रंगमहल के दस दरवाज़े...

संबंधित कड़ी-बस्ती थी बाजार हो गई...

हिन्दी के द्वार , अग्रेजी के डोर और फारसी के दर शब्द मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इन तमाम शब्दों के लिए संस्कृत का शब्द है द्वार् । इसका अर्थ है फाटक–दरवाजा,उपाय या तरकीब । हिन्दी में आमतौर पर बोले जाने वाले द्वारा शब्द (इसके द्वारा, उसके द्वारा) में भी उपाय वाला भाव ही है। द्वार् से ही द्वारम् भी बना है जिसके मायने है तोरण, प्रवेशद्वार, घुसना, मार्ग वगैरह। इसके अलावा शरीर के छिद्र ( आंख, कान, नाक वगैरह ) भी द्वार कहलाते है इसीलिए मानव शरीर को दशद्वार की उपमा दी गई है। मध्यकाल में सूफी कवियों ने भी आत्मा परमात्मा के संदर्भ में देह को रंगमहल की उपमा देकर इसके दस दरवाजों की बात कही है। गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित कृष्ण की राजधानी के द्वारवती, द्वारावती या द्वारका जैसे नाम भी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश वाले भाव की वजह से ही ऱखे गए है। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार इस नगर में प्रवेश के भी कई द्वार थे इसलिए इसे द्वारवती कहा गया।

इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में द्वार शब्द के लिए मूल धातु dhwer या dhwor है। अब संस्कृत के द्वार (dwaar) शब्द से इसकी समानता पर गौर करें। ओल्ड इंग्लिश में इसके लिए दुरा शब्द है तो पोस्ट जर्मेनिक में दुर। ग्रीक में इसे थुरा तो रशियन में द्वेर ,स्लोवानी में दुरी, चेक में द्वेरी और पोलिश में द्रेज्वी कहते हैं। इसी क्रम में आता है अंग्रेजी का डोर। उर्दू में भी फाटक के लिए दरवाज़ा शब्द आम है और हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता और वेदों के भाषा मे काफी समानता है। अवेस्ता में भी द्वारम् शब्द ही चलन में था जिसने पुरानी फारसी में द्वाराया की शक्ल ले ली और फारसी तक आते आते बन गया दरः जिसका मतलब है दो पहाड़ों के बीच का रास्ता। संस्कृत के द्वारम् का अर्थ रास्ता भी है। इसी से निकला है दर्रा या दर लफ्ज के मायने भी यही हैं। बीच का रास्ता वाली विशेषता पर गौर करे। फारसी में एक लफ्ज है सफदर पर जिसके मायने हैं शूरवीर, योद्धा, महारथी आदि। यह भी बना है दर से ही। दर शब्द के मद्देनज़र इसका भाव हुआ सेना की पंक्ति को चीरता हुआ आगे बढ़ जाने वाला। सेना की बीच से रास्ता बना लेने वाला अर्थात सफदर। फारसी के दरगाह या दरबान और हिन्दी के द्वारपाल, द्वारनायक अथवा द्वाराधीश जैसे शब्द इससे ही बने हैं। दर शब्द से हिन्दी में कई मुहावरे जन्में हैं मसलन दर-दर की ठोकरें खाना, दरवाज़े पर नाक रगड़ना, दरवाज़ा बंद होना, दरवाज़ा खुलना आदि।

हिन्दी में दरवाजे के अलावा फाटक शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है। फाटक बना है संस्कृत के स्फाटः+कः से जिसमें विभाजन, खुलना, लेनदेन(मौद्रिक) जैसे भाव हैं। दिलचस्प तथ्य है कि स्फाटः में शामिल मौद्रिक लेनदेन का संदर्भ यहां किस तरह तार्किक सिद्ध हो रहा है। प्राचीन काल से ही किसी भी किस्म का चुकारा अथवा भुगतान, कर अथवा शुल्क की

... संस्कृत के द्वारम् का अर्थ रास्ता भी है। इसी से निकला है दर्रा या दर लफ्ज के मायने भी यही हैं। बीच का रास्ता वाली विशेषता पर गौर करे। फारसी में एक लफ्ज है सफदर पर जिसके मायने हैं शूरवीर, योद्धा, महारथी आदि।...
अदायगी का एक स्थल नियत रहता आया है। चौकी या चेकपोस्ट आमतौर पर नगर, ज़िला या राज्य के मुख्य प्रवेश-मार्ग पर ही होती हैं। यह प्रवेश ही उस स्थान का द्वार होता है। ऐतिहासिक स्थलों पर किलों के दरवाज़ों पर इस किस्म की अदायगी होती थी। सामुद्रिक मार्ग से होने वाले व्यापार और यात्रियों से भी शुल्क की वसूली बंदरगाह (पत्तन) पर होती थी। यह पत्तन ही दरअसल समुद्री मार्ग से राज्य में प्रवेश का द्वार होता था। गुजरात समुद्र तट पर बसी द्वारका नगरी का नाम इसी वजह से पड़ा। पत्तन का मतलब भी संस्कृत में व्यापारिक केंद्र ही होता है। देशभर में पत्तन, पट्टणम्, पाटण, पाटन नामधारी कई आबादियां हैं जिनका यही अर्थ है कि वे प्राचीनकाल में व्यापार केंद्र थीं। दूसरे अर्थों में कहें तो किसी भी किस्म के भुगतान के उपरान्त ही कोई अनुबंध पूरा होता है अर्थात व्यापार-व्यवसाय की राह खुलती है। राह खुलने में द्वार या दरवाजे़ का भाव स्पष्ट है। पर्वतीय उपत्यकाओं के बीच के समतल में आबाद बस्तियों तक पहाड़ी दर्रों से होकर ही पहुंचा जा सकता था।
दो पहाड़ियों के बीच के संकरे स्थान को दर्रा कहते हैं। जाहिर है यह द्वार का ही फारसी रूप है। दर्रों पर ही व्यापारिक चुंगियां भी होती थीं।

द्वार के लिए अंग्रेजी में गेट शब्द भी प्रचलित है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी के डोर शब्द की तुलना में गेट शब्द का उतना ही इस्तेमाल होता है जितना कि दरवाज़ा या फाटक शब्द का होता है। अंग्रेजी के gate शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है मगर भाषा विज्ञानी इसे भारोपीय भाषा परिवार का ही मानते हैं और इसकी व्युत्पत्ति पोस्ट जर्मनिक धातु गातां gatan से मानते हैं जिसमें खुले रास्ते, मार्ग या दर्रे का भाव है। इसी तरह प्राचीन नॉर्डिक, फ्रिशियन, और ड्यूश भाषाओं में gat धातु खोजी गई है जिसमें मौद्रिक लेनदेन के अर्थ में खुलने का भाव है यानी टिकटों की बिक्री से होने वाली आय का संग्रहण करना। इस तरह स्फाट्+कः (या कपाटकः) से बने फाटक और गेट शब्द में अंतर्निहित मौद्रिक संदर्भ एक ही हैं। हिन्दी मे प्रचलित घाट की तुलना इस gat से की जा सकती है। पुराने ज़माने में जहां पत्तन समुद्रपारीय व्यापार के बड़े केंद्र होते थे वहीं नदियों के जरिये होने वाले व्यापारिक केंद्रों के लिए अक्सर घाट शब्द का प्रयोग होता था। यूं सामान्यतौर पर अब घाट का अर्थ नदीतट पर स्थित वह स्थान होता है जहां से पानी भरा जाता है और स्नानकर्म किया जाता है। घाट शब्द का व्यापक अर्थ है। घाट शब्द बना है संस्कृत के घट्टः से जिसमें आश्रय, पत्तन, बंदरगाह समेत नहाने की जगह का भाव शामिल है। गौर करें हिन्दी के घट या घटम् का अर्थ होता है कलश जिसमें पानी आश्रय पाता है। गौरतलब है घट में समष्टि और समुच्चय का भाव है। नदी तट की प्राचीन बस्तियों के साथ जुड़े घाट शब्दों पर गौर करें मसलन-ग्वारीघाट, बुदनीघाट, बेलाघाट आदि। जाहिर है यहां स्नान का भाव न होकर व्यापारिक पत्तन होने का भाव अधिक है। घाट सिर्फ मनुष्यों के नहाने का स्थान भर नहीं थे बल्कि वे नौकाओं का आश्रय स्थल भी थे। [संशोधित-परिवर्धित पुनर्प्रस्तुति]


19 कमेंट्स:

ab inconvenienti said...

घाट शब्द का व्यापक अर्थ है। घाट शब्द बना है संस्कृत के घट्टः से जिसमें आश्रय, पत्तन, बंदरगाह समेत नहाने की जगह का भाव शामिल है। गौर करें हिन्दी के घट या घटम् का अर्थ होता है कलश जिसमें पानी आश्रय पाता है। गौरतलब है घट में समष्टि और समुच्चय का भाव है।

घाट के ज़िक्र में अंग्रेजी के 'घेट्टो' (ghetto) का उल्लेख आपसे छूट गया.

Udan Tashtari said...

आभार..अच्छा लगा जानना.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"द्वार के लिए अंग्रेजी में गेट शब्द भी प्रचलित है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी के डोर शब्द की तुलना में गेट शब्द का उतना ही इस्तेमाल होता है जितना कि दरवाज़ा या फाटक शब्द का होता है। अंग्रेजी के gate शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है मगर भाषा विज्ञानी इसे भारोपीय भाषा परिवार का ही मानते हैं और इसकी व्युत्पत्ति पोस्ट जर्मनिक धातु गातां gatan से मानते हैं जिसमें खुले रास्ते, मार्ग या दर्रे का भाव है।"

द्वार की विवेचना सुन्दर ढंग से की गई है।
बधाई!

सतीश सक्सेना said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुतीकरण ! शुभकामनायें !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर विवेचना। इस तरह की विवेचना अन्यत्र असंभव है।

अभिषेक ओझा said...

आपके ही दर पे ये जानकारी संभव है !

गिरिजेश राव said...

भाऊ आप ने तो पूरा पात्र ही उड़ेल दिया। सम्भवत: मैं सही नहीं हूँ। अभी पात्र में बहुत कुछ शेष है।

'पात्र' शब्द का स्रोत क्या है? हमारी भोजपूरी के 'परात' से इसकी संगति बैठती है क्या?

हिमांशु । Himanshu said...

द्वार शब्द के हिन्दी, अंग्रेजी और फारसी पर्याय एक ही परिवार के हैं - जानकरी अच्छी लगी । आभार ।

sanjay vyas said...

कुछ दिन से आपकी प्रतीक्षा हो रही थी..
आज की पोस्ट शानदार रही हमेशा की तरह.
कई भाषाओं में 'द' शब्द का 'ब' में रूपांतरण क्यों होता है, जिसके कारण छोटे दरवाज़े को यहाँ बारी बोलते है...

somadri said...

घट, घाट तो समझ में आ गया, एक शब्द है घाटा , इसका मतलब है नुकसान होना

अजित वडनेरकर said...

@संजय व्यास
शु्क्रिया संजय भाई,

बार, बारी या बारजा में ब वर्ण दरअसल द से परिवर्तित नहीं होता है।
बल्की व से परिवर्तित होता है। द्वार-दुवार-बार यह क्रम रहता है। हिन्दी की कई बोलियों में व बडी़ आसानी से ब में तब्दील हो जाता है।

AlbelaKhatri.com said...

waah !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ज्ञानवृद्धि की एक और किश्त जारी करने का शुक्रिया।

हेमन्त कुमार said...

नित नूतन प्रयोग जारी रहे।आभार...।

मुनीश ( munish ) said...

There is still a place in Panjab--Hari ke Pattan. This place once had flourishing trade via river Ravi.Ravi enters Pakistan soon after so that Pattan is defunct now. It literally meant Port of God.

मुनीश ( munish ) said...

पं जाब में एक जगह है 'हरि के पत्तन' . वहां एक बार रुकना हुआ तो पता चला की वहां नदी के रास्ते कभी खूब व्यापार हुआ करता था . पानी , नावें और मछलियाँ अब भी वहां खूब हैं मगर रावी पाकिस्तान चली जाती है सो व्यापार भी ठप्प है . भगवान् का पत्तन माई गौड पंजाब में !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

संस्कृत ही तो जननी है सभी भाषाओ की यह विश्वास और अटल हो जाता है आपको पढ़ कर

Vijay Kumar Sappatti said...
This comment has been removed by the author.
Vijay Kumar Sappatti said...

ajit ji ,

aapki ye post bahut hi gyaanwardhak hai . itni acchi jaankaari ke liye aapka dil se abhaar , waise main ek baat kahna chahta tha ki kya moksh ka koi sambandh ,deh ke dash dwaar se hai .

itne acche aur gahre lekhan ke liye aabhar ..


vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

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