Sunday, March 16, 2008

विमल की चीज़ अपनी कहने पर तुले हैं प्रमोदसिंह ! [बकलमखुद - 5]

दोस्तों बकलमखुद की अगली कड़ी में पेश है ठुमरी जैसा सुरीला ब्लॉग चलानेवाले विमल वर्माकाआत्मकथ्य। विमलजी एक शानदार शख्सियत वाले इन्सान हैं और मुंबई के एक मनोरंजन चैनल से जुड़े हैं। खांटी रंगकर्मी हैं। विमल जी से हमारी ब्लागिंग की शुरूआत से ही बिना ये जाने निभ रही है कि रंगकर्म और संगीत में हमारी भी दिलचस्पी खूब रही है। अलबत्ता जैसा रियाज़ उन्होंने किया, वैसा कोई मौका हमें नहीं मिला। बहरहाल ,विमलजी को पढ़ने से पहले ये जान लें कि उनका ये आत्मकथ्य मेरे पास बरास्ता प्रमोदसिंह पहुंचा है। प्रमोदजी के पास ये आत्मकथ्य सिर्फ मश्वरे के लिए गया था मगर अज़दकी दिमाग़ ने तभी कुछ खेल रचना शुरू कर दिया था। पढ़िये उनकी बात-

विमल जिसे अपना बता रहा है दरअसल मेरी ही लिखी चीज़ है, जिसे पुरानी यारी के नाम पर वह अपने खाते में यूज़ करने की ज़ि‍द कर रहा है.. अब चूंकि पुराने दिनों की सेंटिमेंटैलिटी वाली बात है जाने दे रहा हूं.. आप भी इस खाकसार को जाने दीजिए..

सीधी सी बात है , प्रमोदजी बकलमखुद लिखने से बचना चाहते हैं । और साथियों , बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हम ऐसा होने नहीं देंगे। प्रमोदजी लिखेंगे और ज़रूर लिखेंगे। तो पढ़िये बकलमखुद की पांचवीं कड़ी में विमल वर्मा को।

टांग तोड़ देंगे जो संघ की शाखा में गए

पिता बैंक में थे, लिहाज़ा उनके तबादलों की वजह से नयी जगहों पर पहुंचने की खुशी और पुरानों को छोड़ने का दर्द हम लम्बे समय तक झेलते रहे। हम पाँच भाई बहनों में मैं तीसरे नंबर पर था... बचपन में हर दो-एक साल में तबादले की वजह से हमारा स्कूल बदल जाता। इससे हमारी पढ़ाई लिखाई में काफ़ी अव्यवस्थित रही। ज़्यादातर हम उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल यानी गोरखपुर और उसके आस पास। खेलना मुझे बहुत भाता था। एक बार हम आरएसएस की शाखा में गये वहाँ खो-खो कबड्डी वगैरह जम कर खेले। मगर जब लौट कर पिता को शाखा में जानें की बात बतायी तो उनकी खूब डांट खानी पड़ी.. उन्होने कहा- ‘ये सब गाँधीजी के हत्यारे हैं! आज के बाद अगर फिर शाखा में देखा तो टांग तोड़ देंगे’

क्रिकेट से अलगाव और अदाकारी से लगाव

संगीत और क्रिकेट हमेशा से मेरे प्रिय रहे हैं। बचपन में स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेने का मौका और मैं इस विधा पर मोहित हो गया। फिर भी, लम्बे समय तक खेल की संगत ज़्यादा रही ...उसमें ही रमा रहा। क्रिकेट खेलने, मसखरी करने में मुझे मज़ा बहुत मिलता था। दोस्त लोग मेरी बातों पर बहुत हँसते। पर एक बार क्रिकेट के टीम सलेक्शन में मुझे बाहर कर दिया गया तो भाई, अपना दिल टूट-सा गया। सोचा था तेज़ गेंदबाज़ बनूंगा, पर दुखी होकर बल्ला - पुलोवर घर के स्टोर में फ़ेंक आया ! सोचता रहा कि एक लड़का था जो क्रिकेट वाले कील लगे जूते पहनकर रात में सड़कों पर चलता तो कीलों की रगड़ से चिन्गारियां फूटने लगती थी जिन्हें देख कर मन रोमांचित हो उठता था। मगर रोमांच का वो एहसास अब कहीं काफूर हो चुका था । कह नहीं सकता कि क्रिकेट ने विमल नाम के शख्स से आंखें फेरी या विमल ने क्रिकेट का साथ छोड़ा । खासतौर पर उस मोड़ पर जहां इसी क्रिकेट की बदौलत एक साल मैट्रिक में गंवाने का माइलस्टोन भी गड़ा था। खैर, मज़े का एक मोड़ मातमवाली गली में भी मुड़ता है। उस गली से निकलकर हमारे कदम रंगकर्म की ओर बढ़ चले।
[सबसे पीछे विमल वर्मा (बाईं ओर)अमरेश मिश्र और उदय यादव। नीचे अनिलसिंह (दायीं ओर), प्रमोदसिंह तथा एक अन्य साथी]

और वो मुंबई में एके हंगल से मुलाकात

इस दौर को मैं अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दौर मानता हूँ। शहर था उत्तर प्रदेश का आज़मगढ़। संस्था थी समानान्तर... शुरुआत बादल सरकार के वर्कशॉप से हुई। फिर तो नाटकों का सिलसिला बहुत लम्बा चला। अस्सी के दशक में यह वो समय था जब रंगकर्म में खूब प्रयोग हो रहे थे- इन्टीमेट थियेटर, फिजिकल ,थियेटर, साइकोफिज़िकल थियेटर, थर्ड थियेटर, प्रोसीनियम थियेटर। एक वर्ग का कहना था कि प्रोसीनियम मंहगे ताम झाम की वजह खुद ब खुद मर जायेगा। प्रोसीनियम थियेटर अपने जैसे गरीब देश में चल नहीं सकता। तो ऐसे माहौल में मेरी रंगमंचीय यात्रा की शुरूआत थर्ड थियेटर से हुई ... थर्ड थियेटर के फ़ॉर्म में मेरा पहला नाटक बादल सरकार का लिखा भोमा था जिसे हमने मुंबई में खेला। जब हम नाटक कर रहे थे तो इसे देखने मशहूर चरित्र अभिनेता ए.के हंगल आए हुए थे। मैं अभिभूत होकर उनसे मिला और उनसे पूछा कि आप रंगमंच पर कम और फ़िल्मों में ज्यादा दिखाई देते है, तो उनका जवाब था- पेट के लिये सब कुछ करना पड़ता है । मैं चकित हुआ.. । आहत भी, कि बताइये हम तो बिना स्वार्थ के नाटक कर रहे हैं, घर से पैसे लगाकर नाटक करते हैं और ए.के हंगल जैसा अभिनेता कह रहा है कि पेट के लिये सब करना पड़ता है ! मैं अन्दर ही अंदर उन पर हँस रहा था कि हंगल साहब से तो बेहतर ! हम हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के नाटक करते हैं! मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं भी इन्हीं सवालों से जूझ रहा होऊंगा !

मुक्तिबोध यानी विचारधारा !

खैर, हमने आज़मगढ़ में आदि विद्रोही स्पार्टाकस , बाकी इतिहास, जुलूस, रस गंधर्व, पगला घोड़ा जैसे मशहूर नाटक खेले। इसके अलावा और भी बहुत से नाटक किये। मैं नाटक करते हुए हमेशा सोचता कि इन लोगों से पहले क्यों नही मिला। नाटक के निर्देशक अनिल भौमिक का तो मै एकदम दीवाना बना हुआ था। उनके घर में जितनी किताबें थी, सब पढ़ गया था। गज़ब का एहसास था उस समय। हमारे बीच एक चित्रकार थे अशोक भौमिक - उनसे बहुत मै बहुत प्रभावित था क्योंकि उनसे मुझे बहुत सी बातें पता चलती थीं। उन्होंने ही पहली बार मुक्तिबोध के बारे में मुझे बताया वर्ना तो मुझे यही लगता था कि मुक्तिबोध भी कोई विचारधारा है ! तब उनकी मुक्तिबोध पर एक पेंटिंग एग्जिबिशन हुई थी जिसमें उन्होंने मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में पर एक पूरी सिरीज़ तैयार की थी। मैं अपने जीवन की पहली पेंटिंग प्रदर्शनी देख रहा था। भौमिक दा से बहुत सी बात होतीं। वो अक्सर बौद्धिक स्तर पर बातें करते जो मेरे क्रिकेटिया दिमाग में बहुत समा नहीं पाती थीं।

इंटेलेक्चुअलपन यानी सिगरेट के कश !

घर में भी मेरे नाटक करने को लेकर सब प्रसन्न रहते थे। कोई मेहमान आ जाए तो बताया जाता कि विमल आजकल नाटक कर रहे हैं ! मगर इस मामले में भाई बहनों का रुख थोड़ा अलग था। वे हमारे इस नए बदलाव की ख़बर तो देते थे मगर साथ में यह जोड़ने से बाज नहीं आते कि आजकल विमल वो वाला नाटक कर रहे है जो समझ में नहीं आता ! मॉडर्न नाटक कर रहे हैं भई... शहर के इंटेलेक्चुअल इनके मित्र हैं ! और मेरे इंटेलेक्चुअलपन का अब यह हाल कि सबकी देखा-देखी मैंने भी सिगरेट पीना शुरू कर दिया। किसी होटल, गुमटी के आगे बैठे चाय पीते इंटेलेक्चुअल बने बातें करते। संस्था जो भी नाटक करती सारे व्यवस्था विरोधी हुआ करते थे।

कुछ उचाटपन भी...

भारतीय राजनीति से मुझे घृणा थी। मेरे लिये राजनीति का मतलब गंदा दलदल था। पर हम नाटक के लिये नाटक कर रहे थे। एक बार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का लिखा नाटक कल भात आएगा हमने किया जिसमें मैने जड़ होते समाज के प्रतीक के रूप में लेटर बॉक्स की भूमिका निभाई थी। पर उस नाटक के करने की तुक मुझे समझ में नहीं आ रहा था। किसी दर्शक को मैने कहते सुन लिया कि कैसा नाटक करते हैं समझ में ही नही आता है , कि हम ही मूर्ख हैं ! मुझे अब कुछ बातें कचोटती लगतीं कि चीज़ें साफ़-साफ़ होनी चाहियें, समझ में आनी चाहिए। हमारे नाटकों का कोई सामाजिक दायित्व होना चाहिये। बिना सरोकार के इस नाटकबाजी का कोई औचित्य नहीं। तभी बादल सरकार के वर्कशॉप के दौरान इलाहाबाद के लड़कों से मिलने का मौका मिला...

दिन इलाहाबाद के... नयी ज़िंदगी, नये सबक...

इलाहाबाद के लड़कों से मिलकर मुझे लगा इनके साथ काम करने में मज़ा आएगा । और एक दिन मैं बोरिया बिस्तर लेकर पहुंच गया इलाहाबाद! वहाँ प्रमोद सिंह, अनिल सिंह( अनिल रघुराज) , उदय यादव और अन्य दूसरे साथियों से पहली बार मिला। पता चला सभी प्रगतिशील छात्र संगठन (पीएसओ) के सदस्य हैं और इस राजनीतिक इकाई से जुड़ी सांस्कृतिक संस्था दस्ता है जिसके लिए ये लोग नाटक वग़ैरह करते हैं। अनिल सिंह उन दिनों इस दस्ता के ग्रुप लीडर हुआ करते थे। इनकी बातों से, इनके साथ काम करके ये तो महसूस करने लगा था कि हमारे देश की गंदी राजनीति से लड़ने के लिए पढ़े-लिखे लोगों को ही आगे आना होगा। दस्ता के साथी उस काम को बाकायदा कर रहे थे।

जुड़ना दस्ता से...ज़िंदगी की दूसरी पारी

तो इस तरह मैने इलाहाबाद में दस्ता के साथ जुड़ कर नुक्कड़ नाटक करने का फ़ैसला ले लिया । इस नये माहौल में नाटक करते हुए जनता से संवाद करना ग़ज़ब लगता। आस पास के गाँव-शहर के छोटे-छोटे मोहल्ले, यहां तक की कोई हॉस्टल नहीं छूटा जहां हमने नाटक ना किया हो। यहां हम जो कह रहे थे उससे नाटक खत्म होने के बाद भी जूझने की कोशिश में लगे रहते। दस्ता के साथ काम करते हुए लगता कि भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद के सपनों को साकार करने के लिये आज भी लोग काम कर रहे हैं। मुझे तसल्ली थी कि मैं भी इस बड़े समाजिक बदलाव में कोई भूमिका अदा कर रहा हूं। तो यहां से शुरू हुई जीवन की दूसरी पारी। शुरू हुआ राजनीतिक नाटकों का दौर ! खूब जम के नुक्कड़ नाटक किया। बड़ा जोश था मुझमें । शहर और उसके आस - पास तो हम नाटकों के प्रदर्शन कर ही रहे थे, इसके अलावा हमने इस दौर में पंजाब, दिल्ली, बिहार, बंगाल, मुंबई में खूब सारे प्रदर्शन किये। हमने इन्कलाब ज़िन्दाबाद ,जनता पागल हो गई है, सरकारी साँड़ जैसे नाटक किये। ['द्स्ता'के बैनर से इलाहाबाद में खेले गए राजा का बाजा नाटक का एक दृश्य। इसमें मैने (विमल), प्रमोद, अनिल और अमरेश ने अभिनय किया था।]

हम राजनीतिक संगठन के भौंपू नहीं...

ये ऐसा दौर था जब हम नाटक के अंत में मशाल जलाकर जनता का आह्वान करते थे। नाटक के अंत में हाथ में मशाल लेकर गाना गाना मुझे रोमांचित तो कर देता था लेकिन कुछ समय पर वही चीज़ दोहराते-दोहराते ऐसे नाटकों से ऊब भी होने लगी थी। पर जनता इन नाटकों को देखती और खूब ताली बजाती। मगर अंदर ही अंदर यह हो गया था कि ताली सुनकर भी हम अपने काम से संतुष्ट नहीं होते। फिर एक दिन आया कि हमने इन घिसे हुए नाटकों को न करने का फ़ैसला ले लिया। ये बात भी सामने आने लगी थी कि हम राजनीतिक संगठन का भोंपू हुए जा रहे हैं ! हमें और बेहतर एस्थेटिक्स के लिए काम करना चाहिये और नुक्कड़ नाटकों की अपनी सीमा है। उसे एक स्तर तक किया जा सकता है मगर यह विधा समूचे रंगकर्म का पर्याय नहीं हो सकती। आखिरकार सवाल हमारे आत्मसंतोष का था। इसी चिंतन के बाद हमने नए नाटकों पर काम करना शुरु किया।
[ अगली कड़ी में कुछ और बातें जानते हैं विमलजी के बकलमखुद में ]

18 कमेंट्स:

swapandarshi said...

ajit ji aapkaa dhanyavaad, vimal ji se parichay karaane ke liye. behatareen anubhav hai vimal ji kaa, aage kee Kadee ka mujhe intzaar rahegaa. Nainital me nukkad Natako ke mene bhee khoob Tikat beche hai, hostel me aur kuchh achche natak dekhane kaa maukaa bhee milaa hai.

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लग रहा है विमलजी के बारे में जानना! आगे की कड़ी का इंतजार है।

yunus said...

विमल के इस आत्‍मकथ्‍य को तसल्‍ली से पढ़ने के लिए रख छोड़ा है । आज दिन हड़बड़ी भरा है । बस इतना कहना है कि अगर आप थोड़ा रूकें तो हमें वो सीडी खोजनी होगी जिसमें अनीता जी ने विमल को गाते हुए रिकॉर्ड किया है । हम आपको उस वीडियो फाईल को अपलोड करके उसका एच टी एम एल कोड भेजने का प्रयास करेंगे । किंतु थोड़ा समय दें राजन ।

Pramod Singh said...

एक छोटी भूल सुधार: ऊपर दर्शाया फोटो कॉकेशियन चाक सर्किल का नहीं, बल्कि एक दूसरा नाटक 'राजा का बाजा' के मंचन का है.

अफ़लातून said...

प्रमोदजी , पढ़ा जा रहा है ।

अनिल रघुराज said...

जबरदस्त, विमल जी। पूरा प्रागैतिहासिक काल तक पहुंचा दिया। चलिए इसी बहाने सोचने का मौका मिलेगा कि क्या खोया, क्यों खोया और क्या पाया है। अगर भटकें हैं तो यह लाजिमी तो नहीं था। यो कोई और भी सूरत हो सकती थी?

चंद्रभूषण said...

बहुत अच्छा है। भाई अजित को इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। विमल बाबू, बाद में और ज्यादा ब्योरों के साथ भी इस बारे में लिखिएगा।

Sanjeet Tripathi said...

विमल जी से उन्हीं के शब्दों द्वारा परिचित हो रहा हूं!
प्रतीक्षा रहेगी!!

anitakumar said...

बहुत अच्छा लग रहा है विमल जी आप के बारे में इतना विस्तृत रूप से जानना, कहीं खुद को जुड़ा भी पा रहे हैं अजीत जी की तरह, कॉलेज के जमाने में नाटकों का शौक हमको भी रहा, इप्टा से पुरुस्कार भी जीते, लेकिन आप के जैसे नाटकों को ही समर्पित नहीं हो पाए, मौका ही नहीं मिला।
ऊपर आप ने नाटकों के कई प्रकारों का उल्लेख किया है उस पर जरा ज्यादा जानकारी दें तो और अच्छा है, ये साइकोफ़िजिकल नाटक क्या हैं , प्लीज बताएं।
युनुस जी मैं आज ही विमल जी के गाये गीतों की सी डी बना कर आप को भेज देती हूँ, आइडिया अच्छा है , मैं तो आज भी उनके गाये गीत सुन कर झूम उठती हूँ, अगर मुझे आता होता कि कैसे करना है तो बहुत पहले उनके गीत ब्लोग जगत पर सब सुन रहे होते।
विमल जी अगली कड़ी का इंतजार है…।:)

anuradha srivastav said...

अगली कडी का इन्तजार है।

आभा said...

इन सब को अलग अलग देखा ,सुना जाना है पर इगुटिय तो आज देख रही हँ, फोटू भी बढिया

Shiv Kumar Mishra said...

विमल जी के बारे में जानकर बहुत प्रसन्नता हुई. अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं विमल जी.अगली कड़ी का इंतजार है.

Ghost Buster said...

अजित जी, आप कमाल का काम कर रहे हैं. इस कड़ी में अनिता जी की चारों पोस्ट आज हमने पहली बार पढीं. बहुत बढ़िया. विमल जी के आगामी आलेखों की भी आतुरता से प्रतीक्षा है.

डा० अमर कुमार said...

इतना सधा हुआ और संयमित वर्णन
इसके कथ्य को हृदयग्राही बना देता है।
अब तो यहाँ नित्य एक टक्कर मारने
की अनिवार्यता दिख रही है । मेरी तो
इतनी हैसियत भी नहीं है कि आपकी
पीठ ठोक सकूँ !

अभिवादन ।

इरफ़ान said...

कमाल है भाई विमलजी ये टेरिटरी भी आपने हथिया ली...हमारा क्या होगा?

Mired Mirage said...

अगली कड़ी की प्रतीक्षा है ।
घुघूती बासूती

इरफ़ान said...

बोग्यापोन: इच्छुक व्यक्ति इस बक़लम ख़ुद को बाआवाज़ ख़ुद सुनना चाहें तो यहाँ क्लिक करें. मतलब इस पते पर आएं.

http://tooteehueebikhreehuee.blogspot.com/2007/12/blog-post_09.html

सागर नाहर said...

विमलजी के बारे में जानना अच्छा लगा.. अगली कड़ी का इंतजार है।

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