Friday, March 7, 2008

पॉकेटमारी नहीं जेब गरम करवाना ! [ जेब- 1 ]

रोज़मर्रा की बोली में जिन शब्दों का इस्तेमाल खूब होता है उनमें एक है जेब । जी हां वही जेब जिसे हम सब भरी रखने के जतन में दिन रात खटते हैं मगर वो तब भी खाली ही रहती है । घर गिरस्ती की ज़रूरतें कभी इसे भरी नहीं रहने देतीं, इसीलिए ग़ालिब साहब को भी कहना पड़ा था कि-हमारी जेब को अब हाज़ते रफ़ू क्या है ?

जेब शब्द की आमद हिन्दी में उर्दू-फारसी के ज़रिये हुई। यह मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और इसकी व्युत्पत्ति ज-ब धातु से हुई है जिसका मतलब होता है बटुआ। अरबी ज़बान में इसके लिए अल-जेब और जिब जैसे शब्द हैं। हिब्रू में इसके लिए जुबा शब्द मिलता है जिसका मतलब है पैसा। जाहिर है पैसे का ताल्लुक जेब से ही है। अरब में एक खास पोशाक का नाम भी जुबाह है जो शेरवानीनुमा लम्बी होती है । जेब का रिश्ता जुबाह से साफ-साफ जुड़ रहा है। जेब शब्द से जुड़े और भी कई शब्द रोज़मर्रा मे आम बोले-सुने जाते हैं जैसे जेबकट, जेबकतरा, जेबतराश , जेबी, जेबखर्च आदि। हिन्दी में जेब का इस्तेमाल इतना आम है कि कई मुहावरों में इसके प्रतीकार्थ इस्तेमाल होते हैं मसलन जेब खाली होना, जेब ढीली करना, जेब काटना, वगैरह वगैरह। सभी का रिश्ता धन की हानि या धन की प्राप्ति से ही है। जेब गरम करना जैसा मुहावरा रिश्वत के लेन-देन से जुड़ा है । गौरतलब है कि रिश्वत भी समाज में अनादिकाल से जुड़ी है मगर अंग्रेजी शासनकाल में इसने सामाजिक संस्कृति के तौर पर पहचान बनाई और अब तो तनखा से नहीं बल्कि रिश्वत से जिसकी जेब भरी रहती है ,उसका रुतबा ज्यादा ऊंचा माना जाता है। सरकारी कारिंदे की जेब गरम करने में चाहे ग़रीब की जेब ढीली हो जाए मगर कारिंदे को जेबतराश हरगिज़ नही कहा जा सकता। एशिया यूरोप के कई मुल्कों में जेब शब्द प्रचलित है मगर इसके रूप अलग अलग हैं । देखे-हिब्रू में गेव, अल्बानी में ज़ेप, बुल्गारी में झ़ेब, सर्बियाई में द्जेप,अज़रबैजानी में सिब, हंगारी में ज्सेब, तुर्की में सेप और ग्रीक में त्सेपी जैसे शब्द हैं जो मूल रूप से अरबी जेब के ही रूप हैं।
जेब के लिए हिन्दी में एक और शब्द प्रचलित है पॉकेट । वैसे यह अंग्रेजी का शब्द है मगर बोलचाल में सभी भारतीय भाषाओं में धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। पॉकेट का एक और प्रचलित रूप पाकिट भी है। हिन्दी में जेबखर्च के लिए पॉकेटमनी शब्द खूब चलता है। इसी तरह किताबों के गुटका संस्करण के लिए पॉकेट बुक , पॉकेट गाइट, पॉकेट डिक्शनरी जैसे शब्द भी नई पीढ़ी में प्रचलित है। इसकी व्युत्पत्ति जर्मनिक की पुक धातु से हुई है जिसका मतलब है पोशाक के साथ सिली हुई छोटी जेब। इसके कई रूप यूरोपीय भाषाओं में अलग-अलग उच्चारण के साथ मिलते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान दुश्मन से छीने गए इलाकों के लिए ब्रिटिश फौज में पॉकेट शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ । आबादी की बसाहट के संदर्भ में आधुनिक नगरनियोजन की शब्दावली में भी इसका प्रयोग किया जाने लगा है। पॉकेट शब्द ने भी खालिस देशी अर्थ में मुहावरों मे जगह बनाई मसलन पॉकेटमार, पॉकेटमारी वगैरह।
इसी कड़ी से जुड़े कुछ और शब्दों की चर्चा होगी अगली कड़ी में।

(पेश है पुराने दौर की फिल्म पॉकेटमार (1956) का यह गीत जिसे तलत और लता ने गाया है। फिल्म का संगीत मदनमोहन ने दिया था और गीत लिखे थे राजेन्द्रकृष्ण ने। फिल्म के खास किरदार थे देवआनंद और गीताबाली) आपकी चिट्ठियों का हाल सफर के अगले पड़ाव पर । फिलहाल इस गीत का आनंद लीजिए।

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13 कमेंट्स:

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

दिमागी हार्ड डिस्क मे आपकी इस पोस्ट को भी सहेज लिया। अभी और स्पेस है। आप लिखते रहे हम सेव करते रहेंगे। :)

Sanjay said...

हमारी तो घर गिरस्‍थी भी नहीं लेकिन जेब है कि हरदम खाली ही रहती है.. और कोई गरम करने वाला भी नहीं मिलता...
सो हमारी जेब को भी हाज़ते रफ़ू नही है .... :(

दिनेशराय द्विवेदी said...

तराशा खूब जेब आप ने,
मारा पाकिट भी आप ने।
कापीराइट का रखा ध्यान,
गाना खूब सुनाया आप ने।
भाई संगीतीय रिकार्ड पर कॉपीराइट साठ साल तक है, आप का बजाया गाना कॉपीराइट से मुक्त है।

Tarun said...

जानकारी के लिये धन्यवाद, एक बात बतायें -

जब ये सजे पेंट के पीछे तब कहलाये जेब
और जब सजे पांवों में तब क्या कहलाये पाजेब

Pramod Singh said...

बाबू दिनेशराय और तरुन वाली बातें दोहराते कहूंगा- भई, सुभो-सुभो हमारे ज्ञान के दलिद्दर की क्‍या जेब काटी है आपने!

Mala Telang said...

पोस्ट के साथ साथ तरुण जी की टिप्पणी भी तारीफे का़बिल है....

Mala Telang said...

गाने में मजा़ नहीं आया...

Dr. Chandra Kumar Jain said...

AJIT JI,
AAP KITNEE JANKARI
ZEB MEIN RAKHTE HAIN!
ITNA LUTATE HAIN PHIR BHI
AAPKI ZEB BHARI HI RAHTI HAI.
SACHMUCH KAMAAL HARTE HAIN AAP...
SHANDAR POST...BADHAI.

जोशिम said...

हम पढ़ रहे हैं और अटकल लगा रहे हैं कि अगला पड़ाव पाजेब (जैसा तरुण कहते हैं) होगा कि जबर / गब्बर (कल्पना की उड़ान से) होगा - सादर - मनीष
[ वैसे एक और समाजवादी गाना/ प्रार्थना था फ़िल्म हाथ की सफाई में - "ऊपर वाले तेरी दुनिया में कभी जेब किसी की न खाली मिले, कोई गरीब न हो जग में हर पाकिट में हरियाली मिले" - याद आया ]

Sanjeet Tripathi said...

बहुत खूब!!

कभी छलकती है जेब
तो कभी तरसती है जेब
जेब का मतलब है तब
भरें हों कलदार जब

anitakumar said...

बड़िया पोस्ट के साथ सुंदर गाना भी, सोने पर सुहागा॥अगली कड़ी का इंतजार है

चंद्रभूषण said...

जेब के साथ गणित का एक दिलचस्प प्रकरण भी जुड़ा हुआ है। समकोण त्रिभुज में लंब और कर्ण के अनुपात को संस्कृत में ज्या कहते हैं। अरबों ने जब भारतीय गणित सीखना शुरू किया तो इसके सबसे करीब का अपना शब्द उन्हें जेब ही समझ में आया। लेकिन उनके मार्फत जब रोमनों की त्रिकोणमिति से वाकफियत बननी शुरू हुई तो उनके पास इस वजन का कोई शब्द ही नहीं था। उन्होंने इसे छाती के समतुल्य मानते हुए इसे sinus नाम दिया, जो बहुत बाद में अंग्रेजी में पहुंचकर sine हो गया। अपने घर में आप बच्चों को साइन थीटा, कॉस थीटा का जो घोटा लगाते देखते हैं, वह वही ज्या-जेब- सइनुस- साइन है।

अनूप शुक्ल said...

शब्दों का सफ़र पढ़ते हुये यह अनुभूति होती है कि देखो ये सब शब्द आपस में कित्ते जुड़े हैं। अद्भुभुत। इस पोस्ट में भी लेख,चित्र और गाना सब चित्ताकर्षक हैं। चंदूजी की टिप्पणी भी मजेदार। तरुण की तारीफ़ अब न करेंगे। :)

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