Saturday, March 15, 2008

बावर्ची, लज्ज़त के साथ भरोसा भी [बावर्ची -1]

फारसी भाषा से हिंदी-उर्दू में शामिल हुआ बावर्ची लफ्ज दरअसल लज्जत के अहसास से भरा है। बावर्ची यानी रसोइया। और अलग अंदाज में कहें तो शेफ। लज्जतदार खाने के खाने के शौकीन सब होते है। इसीलिए रसोई या या रसोइया शब्द का जिक्र होते ही लजीज पकवानों के ख्यालात दिमाग में आने लगते है। जैसे रसोइया के साथ रसोई जुड़ी है, वैसा बावर्ची के साथ नहीं है। फारसी में `बावर´ के मायने होते है भरोसा या विश्वास। फारस में बावर अपने आप में एक संस्कृति है, सभ्यता है , रीति है । पुरानी कबाइली संस्कृति में अलग-अलग समूहों या कबीलों में किसी भी विवाद की स्थिति में बावर व्यवस्था ही इकलौता समाधान थी। जब कभी विवाद होता तो बावर यानी भरोसा देने की रस्म पूरी की जाती थी। दोनो पक्ष एक दूसरे को भरोसा देते थे ताकि फिर विवाद न हो। अगर भरोसा तोड़ा जाता तो उसे गैरकानूनी माना जाता था ।
तो इसी बावर में इसमें `ची´ यानी 'वाला' प्रत्यय लगने से मतलब निकलता है भरोसेमंद या विश्वासपात्र। फारसी में बावर्ची का रूतबा रसोईघर के व्यवस्थापक का होता था। जाहिर है तत्कालीन राजनीति में षड़यंत्रों की भरमार के चलते हर कदम पर भरोसेमंद लोगों की दरकार थी। और जब बात खान-पान की हो तो सावधानी सबसे ज्यादा होनी चाहिए थी। इसीलिए शाही रसोइये के लिए नया शब्द चल पड़ा `बावर्ची´। शाही दौर बीत जाने के बावजूद `बावर्ची´ के लिए लज्जतदारी के साथ वफादारी आज भी पहली कसौटी है।

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली आठ कड़ियों में हमें कुल 118 टिप्पणियां मिलीं जिनमें से 76 सिर्फ बकलमखुद की चार कड़ियों पर थी। यहां उन सबके नाम देना संभव नहीं है अलबत्ता बटुए में हुआ बंटवारा, अंटी में छिपाओ तो भी अंटी खाली, बहादुर कौन है और सरकारी खरीता और रेशमी थैली पर आई टिप्पणी करने वाले साथियों का जिक्र कर रहे हैं। सर्वश्री आशीष , प्रत्यत्क्षा, संजीत त्रिपाठी, दिनेशराय द्निवेदी, अफलातून,डा चंद्रकुमार जैन, अनूप शुक्ल , संजय , मीनाक्षी, अनिताकुमार, घोस्टबस्टर, पंकज अवधिया , परमजीत बाली और काकेश । आप सबका आभार ।

10 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने अपनी ट्यूबलाइट जला दी। अब जा कर फिल्म बावर्ची समझ आई।

अनूप शुक्ल said...

अच्छा बताये आप! शुक्रिया!

Anonymous said...

यही बात थी फिल्म बावर्ची में, देखी तब थी लेकिन नाम का मतलब आज समझ आया।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

लज़्ज़तदारी के साथ वफ़ादारी ! क्या बात कही !
बावरची के साथ जुड़े भरोसे की जानकारी देकर
आपने हमारे इन स्वाद -सेवकों का मान बढ़ाया है .
ये पोस्ट भी जायकेदार है अजीत जी !
धन्यवाद.

Rajesh Roshan said...

आजकल बावर्चियो की कमी हो गई है!!! केवल खानसामे मिलते हैं
Rajesh Roshan

Sanjeet Tripathi said...

वाकई बावर्ची फिल्म देखना तो पहले हो चुका था लेकिन उसका भावार्थ अब समझ मे आया

Anita kumar said...

मतलब अब अगर कहना हो कि वो मेरा भरोसे का दोस्त है तो कह सकते है वो मेरा बावर्ची है? …:)
चंद्र कुमार जैन जी आज से देवनागरी लिपि में लिख पा रहे हैं देख कर अच्छा लगा

Anonymous said...

This comment has been removed because it linked to malicious content. Learn more.

Ghost Buster said...

एक बार फिर बेहतरीन जानकारी दी आपने. वैसे रसोइये के लिए महाराज शब्द का प्रयोग भी आम प्रचलन में है. प्रेमचंद की इस रचना में देखिये.

Unknown said...

बावर्ची के साथ पिछले हफ्ते का माल आज छक कर पढ़ा - बकलमखुद बहुत अच्छी प्रस्तुति है - खरीता और बघातुर पहले सुना ही नहीं था - क्या बाघ भी बहादुर से जुड़ा है ? - मनीष [ अनुपस्थिति का कारण - छोटे बहादुर पिछले हफ्ते मैदान-ऐ-जंग में थे - वो बाद में बात होगी ]

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