Tuesday, May 19, 2009

तारीखों और वारों का चक्कर- [बकलमखुद-86]

... दिनेश भाई और शोभा भाभी को वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं...

दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, Meआप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और चौरासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अब तक अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून,बेजी,  अरुण अरोरा,  हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा,  रंजना भाटिया और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

रा त को बारह बजते ही तारीख बदल जाती है और दिन शुरू होता है सुबह सूरज के उगने से। आधी रात से सुबह सूरज उगने तक का समय हमेशा गड़बड़ियाँ पैदा करता है। तारीख बदल जाती है और तिथि वही रहती है, वार का पता नहीं। शायद संडे रात के बारह बजे ही शुरू होता है और रविवार सुबह रवि उदय होने के साथ।
धर हिन्दी ब्लागरी में कोई बीस महिने से अपने दो ब्लाग ले कर एक वकील साहब आ गए हैं, दिनेशराई दुबेदी। इन के साथ भी यही चक्कर है। बीस के न हुए थे की ब्याह हो गया। गनीमत थी कि तब शादी के लिए कम से कम उमर पुरुषों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 16 हुआ करती थी, वरना बालविवाह के शिकार हो गए होते। न्योते में शादी की तारीख अठारह छपी थी, दुल्हन के घर बरात पहुँची रात डेढ़ बजे, सुबह पाँच बजते-बजते शादी संपन्न हुई। ये सारी कारगुजारियाँ हुईं उन्नीस तारीख को। पर शादी की सालगिरह अठारह को ही मनाई जाती रही, न्योते पे जो छप गई थी। आज कल एक रिवाज और चल गया है, आधी रात को जब घड़ियों में तारीख बदलती है फोन की घंटियाँ बजने लगती हैं। जन्मदिन और तरह-तरह की सालगिरहों की बधाइयाँ शुरू हो जाती हैं। अब वकील साहब के फोन की घंटी सत्रह तारीख की रात को ही बजनी शुरू हो जाती हैं। पत्नी शोभा कहती है, एक दिन पहले ही बधाई? घंटी बजाने वाले को कहो कल दुबारा दे। वकील साहब किसी को रहस्य नहीं बताते। कहते हैं, क्यों बताएँ? यह ठीक है न, आज का दिन इन का, कल का हमारा, पूरी प्राइवेसी रहेगी।
ह संकट केवल शादी की तारीख के साथ ही हुआ हो ऐसा नहीं है। जनाब पैदा भी रात को साढ़े तीन पर हुए थे। अब जनमपत्री में तारीख लिखी है तीन और घड़ियों में चार हो चुकी थी। यूँ शनिवार ही चल रहा था पर कलेंडर में संडे हो चुका था। उस साल देसी महिनों का लीप इयर था साल में दो सावन पड़ रहे थे। अब दोनों सावन के बीच के अमावस से अमावस तक का अधिक मास हुआ। उस की पूनम के दूसरे दिन यानी पड़वा को पैदा हुए। अगले साल वह महीना ही पंचांग से गायब हो गया। सालगिरह किस दिन मनाई जाए। अंग्रेजी कलेंडर से सालगिरह मनाने का रिवाज नहीं था। तो तय किया गया कि रक्षा बंधन के दूसरे दिन सालगिरह मनाई जाए। तो बरसों तक उसी दिन सालगिरह मनती रही। बाद में तारीख से तीन को मनाते रहे। कोई चालीस बरस की उमर में जन्मपत्री साढू भाई को दिखाई तो बोले वे खुद बनाएँगे। जब साढू भाई ने जन्मपत्री बना कर भेजी तो पता लगा कि जनाब तीन को नहीं चार तारीख को पैदा हुए थे।

कुछ साल पहले यूं मना था वकील साब का पच्चीसवां विवाहोत्सवscan0023 scan0025 बिटिया पूर्वा, शोभाजी, वकील साब और बेटा वैभव scan0002

पत्नी को बताया तो बोली अब तीन ही रहने दो, अपन चार को प्राइवेसी वाली मनाया करेंगे।
ब उस दिन वकील साहब अदालत से चले तो पहले मोड़ पर ही पास बैठे मुंशी ने कार का प्लेयर चालू कर दिया। अमीन सयानी की बिनाका वाली कमेंट्री चल रही थी, फिर पहला गाना बजा... “मेरा जूता है जापानी..पतलून इंग्लिस्तानी...सर पे लाल टोपी रूसी..फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी....” वकील साहब का पसंदीदा गाना। हो भी क्यों न यह उसी साल पहली बार बजा था जब वकील साहब पैदा हुए थे। पैदा हुए उस रोज पिता जी घर में नहीं। केवल अम्माँ थी और थे चाचाजी। रात को ही चाचा जी ने जा कर मामा जी बैद्जी को जगाया। मामी जी अम्माँ के पास आ गईं। चाचा जी लालटेन हाथ में लेकर दाई को बुलाने गए। सुबह पिताजी उन के चचेरे भाई को साथ ले कर लौटे तो वकील साहब पधार चुके थे।
किराये का घर था। पिताजी बाराँ में गाँव से अध्यापक की नौकरी करने आए थे। बाद में अपने पढ़ने वाले छोटे भाई को साथ ले आए। वकील साहब के आने के बाद दादाजी, दादी जी भी गांव से बाराँ आ गए, साथ में बुआ भी थी और थी दादाजी की नेत्रहीन माँ, यानी बड़ी दादी। दादा जी को नगर के प्रधान मंदिरों में से एक के पुजारी की जिम्मेदारी सोंपी गई थी। दोनों चाचा दादा जी के साथ मंदिर में ही रहते थे। महिलाएं रात को मंदिर परिसर में नहीं रह सकती थीं। यह नियम दादाजी ने लागू किया था। घर में रात को माँ, बुआ, दादी, बड़ी दादी, पिता जी रहते। बड़ी दादी एक कमरे में बैठी माला फेरती रहती और बार बार पानी मांगती। वहाँ एक पानी की टंकी थी नल वाली। वकील साहब को टोंटी चला कर पानी भरने का शौक, कोई उन की नहीं सुनता तो उन के गिलास में उसी टंकी से पानी भर कर दे देते। माँ ने देखा तो डाँटा, वह पीने का पानी नहीं है। वकील साहब को क्या पता कि पानी और पानी में भी फर्क होता है, मौका लगते ही दुबारा वही करते।
दादा जी दिन में दो बार बड़ी दादी को संभालने जरूर आते। फिर बड़ी दादी एक दिन उठी नहीं, उन्हें घास में लपेटा गया, और लोग उन्हें कांधों पर लाद कहीं ले गए, वे फिर कभी नहीं लौटीं। वकील साहब के पूछने पर जवाब मिला, वे भगवान के बुलावे पर भगवान के घर चली गईं हैं, और जिसे भगवान बुला लेता है वह वापस नहीं लौटता। कुछ दिन बाद बुआ, जो गोद में उठाए फिरती थीं। उन का ब्याह हुआ और वे भी चली गईं। वे जाने लगीं तो वकील साहब बहुत रोए पर बताया कि वे भी साथ ही जा रहे हैं। बुआ का ब्याह बड़ी मौसी के लड़के से ही हुआ था। वकील साहब ने पहली बार मौसी का घर देखा। वहाँ कुछ दिन रहे वापस आए तो बुआ भी साथ थी।

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24 कमेंट्स:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अजी वाह, आप भी कहाँ कहाँ से खजाना खोद लाते हैं. धन्यवाद.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

बहुत आत्मीय वृत्तांत. पढकर मन खुश हो गया. ऐसा तरल गद्य कम ही पढने को मिलता है. बधाई. द्विवेदी दम्पती को भी अनेकानेक शुभकामनाएं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

दिनेशराय द्विवेदी जी को vaivaahik varshganth पर बहुत-बहुत shubh- kamnayen.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बधाई.

रामराम.

कंचन सिंह चौहान said...

बहुत अच्छा लगेगा द्विवेदी जी के विषय में जानना..!

अभिषेक ओझा said...

बहुप्रतीक्षित था ये तो. आभार.
मजेदार शुरुआत.

मीनाक्षी said...

द्विवेदीजी का बकलमखुद की शुरुआत ही प्रभावशाली रही..संयुक्त परिवार का प्रेम सदा से आकर्षित करता आया है...एक बार फिर द्विवेदीजी और शोभाजी को शादी की सालगिरह मुबारक...

Science Bloggers Association said...

Aapko aur dwivediji ko badhaayi.

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंजना said...

वाह !! शब्द यात्रा के बीच यह व्यक्तिव परिचय...
बड़ा ही अच्छा लगा....
हमारी ओर से भी बधाई...
सही कहा आपने,यह मध्यान्ह वाला अंगरेजी समय का चक्कर मुझे भी बड़ा ही अजीब और अटपटा लगता है...
पर यह भी ठीक है,असल तिथि पूर्णतः व्यक्तिगत रह जाता है....अच्छा है यह दृष्टिकोण भी,खुश होने को नया बहाना मिला...
आभार..

हिमांशु । Himanshu said...

वाह बकलम खुद द्विवेदी जी ! यहाँ प्रयुक्त गद्य के लिये विशेषण मिल गया टिप्पणियों के बीच से ही - एक दम सच्चा विशेषण - तरल गद्य ।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छा तो उकील साहब हम आपको 19 को ही दे रहे हैं बधाई.

vijay gaur/विजय गौड़ said...

जिस आत्मीयता से आपने लिखा है, उससे ऎसा लगा कि द्विवेदी जी को निकट से जानने लगा हूं। संस्मरण कहूं या आलेख, जो भी है रोचक है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

तारीखों का सम्बन्ध तो होता ही वकील साहिब से . बधाई हो बधाई

बी एस पाबला said...

बढ़िया है। द्विवेदी जी के बारे में कुछ और जानकारी स्वयं उन्हीं से मिल सकेगी। अगली कड़ी की प्रतीक्षा।

Harkirat Haqeer said...

आपके माध्यम से पता चला आज द्विवेदी जी की वैवाहिक वर्ष गाँठ है .....बहुत - सारी बधाई हमारी भी .....!!

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बड़े रोचक अन्दाज में लिखा है दिनेशराई दुबेदी जी ने! जनतन्तर कथा से कम रोचक नहीं!

RDS said...

आज द्विवेदी जी के व्यतिगत जीवन में भी झांका और उनके ब्लॉग में भी | सब कुछ विधिसम्मत | विधि की महिमा से उन पर सदैव विधाता के कृपा बनी रहे यही शुभ कामना है |

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

हमारे सब के चहेते द्वीवेदी दँपत्ति को विवाह की बहुत बहुत बधाईयाँ
चि. पूर्वा बिटीया और चि. वैभव की शादी अब जल्द से हो ताकि और आनँद मना सकेँ
रोचक रहा ये पढना -
स स्नेह,
- लावण्या

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

तारीख पे तारीख....तारीख पे तारीख....तारीख पे तारीख.... :-)

वकील साहब को शादी की सालगिरह की बधाई ...

Sanjeet Tripathi said...

आज पहली फुरसत मिलते ही पढ़ा। बहुत ही रोचक तरीके से लिखा गया है।
इस रोचकता से भी ज्यादा अच्छा लगा पंडित जी के जीवन यात्रा को जानना।
पंडित जी वकील तो बाद में बने लेकिन उनके जीवन में तारीख और वारों का लोचा शुरु से रहा, शायद विधि को यही मंजूर रहा हो कि ये वकील ही बनें।

अब अपने चले इसकी अगली किश्त पढ़नें। फुरसत है अभी ही पढ़ लेते हैं।

anitakumar said...

्बहुत दिनों बाद बकलम का काफ़िला आगे बढ़ा है, बधाई, द्विवेदी जी के बारे में जानना अच्छा लग रहा है। आज कल ऐसे सयुंक्त परिवार तो मात्र एक सपना बन कर रह गये हैं।

अनूप शुक्ल said...

फ़िर से बांचना शुरु किया है।

लोकेश कुमार उपाध्याय said...

आज फुरसत मिलते ही पढ़ा। बहुत ही रोचक लिखा गया है।

Allah Islam Muslim Dajjal said...
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