Thursday, July 16, 2009

रब्बी हो या रब्बा, बस… ख़ैर करें [संत-15]

इस कड़ी की पिछली पोस्टः पीर-पादरी से परमपिता तक [संत-14]Divine Light Hands

श्वर या परमात्मा के संदर्भ में रब, रब्बी, रब्बा जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। जिस तरह हिन्दी के भक्ति-साहित्य में प्रभु या परमसत्ता के प्रतीक के तौर पर प्रायः सभी भक्तिकालीन कवियों ने राम शब्द इस्तेमाल किया है, उसी तरह रब या रब्बा जैसे शब्दों का प्रयोग सूफी-साहित्य में इफ़रात में हुआ है। सूफी साहित्य में ईश्वर को रब कहते हुए उसके प्रति अपनी लगन को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है कि रब में प्रियपात्र के सभी रंग उतर आए हैं जो प्रिय, प्रेमी, संगी, सखा, रखवाला, गुरु, ज्ञानी और सबसे श्रेष्ठ है। संत कवियों के राम में भी यही सारे रंग नजर आते हैं।
ब शब्द का प्रयोग समूचे उत्तर भारत की बोलियों में होता है पर पश्चिमोत्तर की भाषाओं में, खासतौर पर पंजाबी में यह आम शब्द है। सूफी कवियों की वाणी ने ही इसे भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया है। इश्क, प्यार, मुहब्बत के प्रसंगों में रब्ब, रब्बा या रब्बी जैसे शब्द हिन्दी फिल्मी गीतकारों के लिए भी अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया है। हर दूसरी तीसरी फिल्म के प्रेमगीत में इसका इस्तेमाल नजर आता है। रब शब्द मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का है। हिब्रू में रब्ब शब्द का रूप रव या रब है जबकि अरबी में यह रब्ब है। हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में इस शब्द का जन्म प्रोटो सेमिटिक धातु rbb से हुआ है। रब्ब यानी महान, शक्तिशाली, सर्वोच्च आदि। मोटे तौर पर रब्ब में कुछ प्रमुख भाव समाहित हैं- 1.रखवाला, साथ ले जाने वाला, हर ज़रूरत का ख्याल रखनेवाला, इच्छा-पूर्ति करनेवाला। 2.संरक्षक, पालक, पिता, मार्गदर्शक। 3.सत्ताधीश, स्वामी, शक्तिमान, राजा। 4.नेता, प्रमुख, सर्वोच्च, धर्मगुरु, अन्नदाता, जिसके आगे सभी सर झुकाएं।
रमशक्ति के अर्थ में रब्ब का अर्थ ईश्वर है। कुरआन में खुदा के 99 नामों में इस नाम का भी शुमार है। अरबी से रब्ब शब्द फारसी में चला आया और फिर इसके रब, रब्ब या रब्बा जैसे रूप सामने आए। सूफीबानी के जरिये रब का महत्व परवान चढ़ा। पश्चिमोत्तर क्षेत्र में रब के नाम पर क़सम खाई जाती है। हिब्रू में रब्बी शब्द का मतलब होता है स्वामी अथवा मालिक मगर अर्थ में छूट लेते हुए रब्बी का अर्थ अब ईश्वर, स्वामी के साथ-साथ मित्र, सखा और सर्वप्रिय भी होता है। यहां भी भाव ईश्वर से ही है। प्रमुख पुजारी को भी हिब्रू में रब्बी कहा जाता है। जिस तरह ईसाइयों में चर्च का प्रमुख पादरी होता है वैसे ही यहूदी धर्मगुरू को रब्बी कहा जाता है। गौरतलब है पादरी शब्द भारोपीय मूल का है और पितृ (संस्कृत), पिदर(फारसी) और फादर(अंग्रेजी) की श्रंखला से जुड़ा है।
गौरतलब है कि
रब्ब का अर्थ होता है-स्वामी,   सर्वशक्तिमान, गुरू, मार्गदर्शक या राजा। प्रेमपात्र, मित्र-बंधु या सखा का भाव भी इसमें समाया है। buddha
भारोपीय भाषाओं में प (प,फ,ब,भ,म) वर्णक्रम की ध्वनियों और ऋ, र जैसी ध्वनियों में उच्चता, अनुकरण, गुरुता, प्रकाश, मार्ग और शक्ति का भाव है। इसीलिए परम, पितृ, पिता, प्रकाश, ऋषि, रास्ता, राह, पीर, जैसे अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जो उपरोक्त भावों से जुड़ते हैं। इसका असर सेमिटिक भाषा परिवार पर भी पड़ा है। रब्ब पर इसका असर साफ देखा जा सकता है। संस्कृत के बल, बलम् जैसे शब्दों का शक्तिवाची अर्थ और हिब्रू के बाल अर्थात शक्तिवान, सर्वोच्च जैसे शब्दों का अर्थसाम्य महज़ संयोग नहीं है। भारोपीय धातु में सरलता, अनुगमन, जाना-पाना जैसे भाव निहित हैं और इससे ऋषि जैसा शब्द बनता है क्योंकि वह पथ-प्रदर्शक है, रास्ता दिखाता है। उसके पास जाने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। फारसी का मुर्शिद यानी गुरु, उस्ताद। अंग्रेजी में शिक्षा संस्थान का प्रमुख रेक्टर कहलाता है क्योंकि संस्थान उसी की देख-रेख में चलता है। इससे ही बना है डायरेक्टर अर्थात निदेशक शब्द जिसका अर्थ होता है जो किसी भी कार्य का संचालन करे। उसे पूर्णाहुति तक पहुंचाए।
कुछ ऐसे ही भाव हैं प्रोटो सेमिटिक धातु र-ब-ब में यानी ले जाना, पहुंचाना। सर्वोच्च सत्ता, गुरु या प्रमुख का दायित्व भी अपने लोगों, अनुयायियों को जीने की राह बताना है जिसे रब्बानियत अर्थात प्रभुता या देवत्व कहा जा सकता है। ईश्वरीय के अर्थ में रब्बानी शब्द बनता है। उर्दू के एक मशहूर शायर हुए हैं जिनका नाम था गुलाम रब्बानी ताबां। परमब्रह्म की तरह अरबी में रब्बुलआलमीन शब्द है। आलम यानी सृष्टि जिसमें कई संसार हैं, उनमें भी सर्वोच्च स्वामी को रब्बुलआलमीन कहते हैं।

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Wednesday, July 15, 2009

कश्मीरी शाल और पश्मीना

संबंधित कड़िया-1.धोती खुल गई भैया 2.कपड़े छिपाओ, किताबें छिपाओ 3.पांच हजार साल पुरानी साड़ी 4,अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामाshawl-2

भा रतीय संस्कृति की विविधता उसके खान-पान, रीति-रिवाज़ों के साथ पहनावे में भी झलकती है। कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी ये तीन ऐसे परिधान हैं जो प्राचीनकाल से भारतीयों की पहचान रही है। कुर्ता-पायजामा भारतीयों को सीथियनों की देन मानी जाती है जो मध्य एशिया के घास के मैदानों में निवास करनेवाली घुड़सवार घुमंतू जाति थी। भारत में ये आकर ये शक कहलाए। शाल भी इसी कड़ी में आनेवाला परिधान है।
भी प्राचीन सभ्यताओं में सिलाई से पहले बुनाई की कला विकसित हुई। मनुष्य ने जब ताना-बाना की कला जानी उससे पहले उसके शरीर को ढकने का काम पशुओं की नर्म खाल, वृक्षों की छाल के जरिये होता था। हालांकि पशुओं की खालों से शरीर को ढकने के लिए उसे अनघड़ तरीके से सिलना मनुष्य ने सीख लिया था, मगर सुंदर-सुरुचिपूर्ण वस्त्रों का रूपाकार और टिकाऊ सिलाई के लिए जैसे उपकरणों की ज़रूरत होती है उसकी सूझ तो कपड़े का ताना-बाना रचने के बाद ही आई। प्रारम्भिक दौर में मनुष्य कपास या अन्य रेशों से कपड़ा बुनता था और उसे ही उत्तरीय और अधोवस्त्र की तरह शरीर के इर्दगिर्द लपेटता था। स्त्री-पुरुषों की धोती, उत्तरीय अथवा साड़ी के रूप में इनका प्रचलन आज भी जारी है।
शाल भी इसी कतार में आती है। शाल की पहचान देश के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों से है। आज दुनियभर में अगर शाल का नाम जाना जाता है तो उसकी वजह कश्मीरी शाल है जहां की नर्म ऊन से बुनी शालों की गुनगुनी गर्माहट सबको लुभाती है। शाल शब्द की ठीक-ठीक व्युत्पत्ति कहीं नहीं मिलती मगर इस ऊनी परिधान का उल्लेख अत्यंत प्राचीनकाल से मिलता है। मौर्यकाल और उसके बाद बनी
कुर्ता-पायजामा भारतीयों को सीथियनों की देन मानी जाती है जो मध्य एशिया के घास के मैदानों में निवास करनेवाली घुड़सवार घुमंतू जाति थी। भारत में ये आकर ये शक कहलाए।Scythian_Art
बुद्ध की जितनी भी प्रतिमाएं और चित्र है उनमें सब में बुद्ध शाल ओढ़े हुए ही नज़र आते हैं। कश्मीर समेत पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में शाल उद्योग बहुत तरक्की पर था और यहां से रोम साम्राज्य तक इनकी मांग थी। शाल शब्द की बना है शाल्मलि से। शाल्मलि यानी कपास का पेड़ जिसे हम लोग सेमल का पेड़ कहते हैं। इस पेड़ पर लगनेवाले फल का गूदा इसके पकने के साथ ही सूख  कर सफेद नरम रेशे में बदल जाता है। इसे ही सेमल की रुई कहा जाता है। सेमल शब्द शाल्मलि का ही अपभ्रंश है। सूती कपड़े की बुनाई से पहले मनुष्य पशुओं की खाल ही ओढ़ता था इसलिए शाल की व्युत्पत्ति संस्कृत के शल्क से भी लगाई जाती है जिसका अर्थ होता है पशु की खाल अथवा वृक्ष की छाल। गौरतलब है कि संस्कृत शब्द शल्कम से ही छाल बना है। इसका ही समानार्थी एक अन्य शब्द खल्कः है जिससे खाल शब्द बना। शाल्मलि वृक्ष को ही फारसी में साल कहते हैं। शाल्मलि का एक रूप शालः भी है जिससे शालिक शब्द बना है। शालिक का अर्थ होता है बुनकर, जुलाहा।
श्मीर की शाल ही पश्मीना कहलाती है। कश्मीरी भेड़ के नर्म रोंए से बनने वाली इस खास शाल की दुनियाभर में मांग है। संस्कृत की पस धातु से बने पक्ष्मल, पक्ष, पुस्त और पुच्छ जैसे शब्द बने है और इन सभी का रिश्ता खाल, ढंका हुआ,बाल ,ऊन, छिपाना जैसे अर्थों से जुड़ता है। इससे ही पोश जैसे हिन्दी, उर्दू और फारसी के कई शब्द बने हैं। पस् से ही बना संस्कृत का पक्ष्मल जिसके मायने हुए बड़े बड़े बाल वाला। यहां इसका मतलब भी पशुओं की खाल से ही है जो रोएं दार होती है। फारसी में ही पक्ष्मल का रूप बना पश्म यानी ऊन अथवा बाल। पश्मीं का मतलब हुआ ऊन से बना हुआ या ऊनी। पश्मीनः या पश्मीना जिसका मतलब हुआ बहुत ही नफीस ऊनी कपड़ा जिसकी मुलायमियत और मजबूती लाजवाब हो।

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Tuesday, July 14, 2009

मेवाड़ के पंडित बारां आ बसे [बकलमखुद-91]

पिछली कड़ी> कॉपी के लिए चांटा, सरदार सुन्न से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और इक्यानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

कि तना कठिन जीवन रहा होगा पूर्वजों का? यह सोच कर ही सरदार को झुरझुरी आ जाती है। हल्दीघाटी युद्ध के उपरांत जब मेवाड़ के सूर्य महाराणा प्रताप को जंगलों की शरण लेनी पड़ी और नगरीय जनता मुगलों की अधीनता में जीने लगी। मेवाड़ में स्वाभिमानी लोगों का जीवन भी कठिन हो गया। अनेक लोग मेवाड़ से पलायन कर गए। ब्राह्मणों के श्रेष्ठ आश्रयदाता राज्य से ब्राह्मणों की भी पूरी एक शाखा निकल कर कोटा राज्य और आज के श्योपुर, गुना, राजगढ़ भोपाल और रायसेन जिलों में जा बसी। निश्चित ही ये लोग अपने कर्म और शिक्षा में श्रेष्ट रहे होंगे तभी तो उन्हें यहाँ कुछ ही समय में राजाओं, सामंतो के यहाँ पुरोहित और ग्राम पुरोहित के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इन्ही में सरदार का परिवार भी था।
लायन करने वाली पीढ़ी से बारहवीं पीढ़ी में सरदार के दाज्जी थे और वे केवल पाँच भाई और एक बुआ शेष थीं। इन में भी पिता जी की पीढ़ी में एक पिताजी स्वयं, एक उन के सगे भाई और एक चचेरे भाई कुल तीन पुरुष शेष रहे, लेकिन बहनों की संख्या आठ थी। कुल ग्यारह भाई-बहिन। दाज्जी सब से बड़े थे तो सब उन के पास ही एकत्र होते। सरदार के चाचा-बुआओं, मौसियों और मामा की संतानों की संख्या पचास से ऊपर। पितृ-कुल के भाई-बहन लगातार दाज्जी के पास आते और हफ्तों रहते। सरदार अपने मामा-मौसी के यहाँ जाता तो वहाँ मातृ-कुल के भाई-बहन मिल जाते। पलायन के बाद का संघर्ष अब रंग ला रहा था। ज्ञान दारिद्र्य तो कभी फटका ही नहीं था। देश की आजादी के बाद अब आर्थिक दारिद्र्य भी दूर हो रहा था। जीवन सुखद होने लगा था। सरदार की छठी कक्षा की पढ़ाई आरंभ हुई ही थी कि पिताजी का तबादला सांगोद से बारां हो गया। अब वे हायर सैकंडरी स्कूल में अध्यापक थे। अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल कुछ ही दिनों में हेडमास्टर जी के अधिकांश दायित्व वे ही निभाने लगे। लेकिन सरदार का दाखिला उन्होंने एक अन्य मिडिल स्कूल में कराया। छठी कक्षा में अंग्रेजी की पढ़ाई बाकायदे आरंभ हुई। अध्यापक अच्छा नहीं था।
क दिन अध्यापक कम होने से सरदार की कक्षा को किसी दूसरे सेक्शन के साथ मिला दिया। उस में अंग्रेजी के अध्यापक कठोर तो थे, लेकिन पढ़ाते अच्छा थे। दो दिन बाद सब छात्र अपने सेक्शन में लौटे लेकिन सरदार उसी दूसरे सेक्शन में पढ़ता रहा। पूरा डेढ़ महीना निकल गया। इस सेक्शन में नाम न था तो सरदार की हाजरी भी न होती। एक दिन सरदार पकड़ा गया। अध्यापक जी ने पूछा –तुम इस कक्षा में कैसे बैठते हो? उन्हें सरदार ने बताया कि वह दूसरे सैक्शन में था और डेढ़ माह पहले उन का सैक्शन इस सैक्शन में मिलाया गया था तब आप का अंग्रेजी पढ़ाना भा गया और तब से वह इसी सेक्शन में बैठता है। दूसरे सैक्शन का रजिस्टर देखा गया तो पता लगा वहाँ गैरहाजिर रहने के कारण कक्षा से नाम हटा दिया गया था। पिता के बारे में पूछताछ की तो पता लगा कि सरदार मास्टर वैद्यजी की पुत्र है। हेडमास्टर साहब के सामने पेशी हुई। नाम तो लिख दिया गया लेकिन सजा यह मिली कि वापस उसी क्लास में जा कर बैठना पड़ा। सरदार की अंग्रेजी का ऐसा सत्यानाश हुआ कि वह वकालत आरंभ होने पर अदालतों के फैसले और कानून की किताबें पढ़ने के बाद ही कुछ सुधऱ सकी। साल भर में ही पिताजी की बदली हो गई और वे मोड़क स्टेशन पर मिडिल स्कूल के हेड मास्टर बना दिए गए। पिताजी फिर सरदार से दूर चले गए। लेकिन इस एक वर्ष में हायर सैकेंडरी स्कूल के पुस्तकालय की अधिकांश बालोपयोगी पुस्तकें और सारे कॉमिक सरदार ने पढ़ डाले। वह सप्ताह में एक दिन जाता और पिताजी के खाते में पुस्तकालय से पाँच-सात किताबें निकलवा लाता। लगभग रोज एक पुस्तक पढ़ना आदत बन गई थी। सरदार को उस के साथी किताबी कीड़ा कहने लगे। देर रात तक पढ़ने के कारण सुबह देर से सो कर उठने के कारण आलसी होने का खिताब भी मिला।
स बीच पढ़ाई के साथ वह मंदिर में दाज्जी के काम में हाथ बंटाता।
ऊपर बाएं से मोहनी बुआ, अम्मा (चेहरा ठीक न आने से खुद ही हटा दिया) छोटी बा, बा, और ललिता बुआ। नीचे बाएं से मोहन चाचा, बाबू चाचा, पिताजी, दाज्जी(गोद में सरदार) और छोटे दाज्जी.Family-2
उसे मंदिर में काम के दौरान बहुत चीजें सीखने को मिलीं। मंदिर एक प्रायोगिक पाठशाला था। कस्बे के कई मंदिरों में सावन के महिने में रोज नए-नए तरीके से झूले सजाए जाते। रोज कृष्ण-लीला, रामकथा और भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की कथाओं से सम्बन्धित झांकियाँ सजाई जातीं। दाज्जी और पिता जी का प्रयास रहता कि सब से आकर्षक झूले और झाँकियाँ अपने मंदिर में  ही बनें। पूरा सावन इसी में निकलता। स्कूल से आने के बाद यही एक काम। सरदार सचित्र भागवत को पढ़ कर नई-नई कथाओं पर झांकियाँ बनाने की तलाश करता रहता। फिर उस के लिए सामग्री तैयार की जाती। पिता जी सीता स्वयंवर, और सीता-हरण की झांकियाँ बहुत सुंदर बनाते। “मुचुकंद की दृष्टि से कालयवन का वध” जैसी लोगों के लिए अनजानी कथाओं पर अनेक झांकियाँ सरदार ने तलाश कर बनाईं। अनजानी कथाओं पर झांकियाँ बनाने पर उन्हें दर्शक के लिए खोले जाने पर गाइड बन झाँकी की पूरी कथा सुनाने का आनंद और श्रेय कुछ और ही होता। छठी कक्षा में प्रवेश के दिनों से ही झांकियों में अस्थाई विद्युत रोशनी की व्यवस्था तो सरदार के जिम्मे ही थी। इस के अलावा सफेद, रंगीन, चमकीले कागजों की कटिंग कर विभिन्न डिजाइनें बना कर झूले सजाना। झांकियों के लिए मिट्टी के पुतले बनाना और कच्चे रंग से उन्हें मानवाकृति देना, कपड़ों से सजावट करना जैसे बहुत से काम वहाँ सीखने को मिले। सरदार के अध्यापक फूफा जी भी इन दिनों काम में हाथ बंटाने के लिए मंदिर पर ही रहते। सब मिल कर खूब काम करते। दिन बहुत आनंद से गुजरते।
फूफा जी बीड़ी पिया करते थे, लेकिन दाज्जी और पिता जी से छुप कर। छोटे चाचा को उन्हें चिढ़ाने में आनंद आता। एक बार केले के तनों से झूले सजाए गए। लेकिन बरसात जोर की हो जाने से दर्शक बहुत कम आए। चढ़ावे की थाली में भी दस पांच ही सिक्के निकले। दूसरे दिन फूफाजी कहने लगे -कल मेहनत से सुंदर सजावट की लेकिन बरसात के कारण दर्शक और चढ़ावा बहुत कम आया। छोटे चाचा ने जोर से कहा जिस से दाज्जी सुन लें–जीजा जी आप का बीड़ी का बंडल और माचिस जितने तो आ ही गए थे। फूफा जी सिटपिटा गए। उधर दूर काम कर रहे दाज्जी सुन कर मुस्कुराने लगे थे।

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Monday, July 13, 2009

लीला, लयकारी और प्रलय….

... सृष्टि में प्रतिक्षण होता परिवर्तन ही लीला है। जब हम इसे विराट रूप में देख रहे होते हैं तब उसकी अनुभूति होती है।...DSC_8694-KrishnaLeela-Big

सं सार की प्रायः सभी संस्कृतियों में महाविनाश की कथा है। इसे अतीत और भविष्य से जोड़ कर देखा जाता है। एक प्रलय जो अतीत में घटित हुआ था जिसे जल-प्रलय कहा जाता है। कबीरदास भी इससे सचेत करते हुए कहते हैं-काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।। प्रलय शब्द का अर्थ होता है विश्व विनाश, व्यापक संहार, तबाही, बरबादी आदि। इन सभी शब्दों में एक बात स्पष्ट है कि विनाश में ईश्वर रचित अथवा मानव निर्मित किसी भी किस्म की वास्तु, शिल्प, निर्माण अथवा संरचना की बरबादी निहित है। दार्शनिक अर्थों में देखें तो प्रकृति के नियमों में सबसे खास-बात ही यह है कि यहां निर्माण-विध्वंस जारी रहता है और इसमें एक तारतम्य होता है जिसे लय कह सकते हैं। जब भी कभी विनाश हो जाता है अथवा कोई चमत्कारिक मगर मांगलिक घटना घटती है तब उसे प्रकृति की या ईश्वर की लीला कहा जाता है। सृष्टि में प्रतिक्षण होता परिवर्तन ही लीला है। जब हम इसे विराट रूप में देख रहे होते हैं तब उसकी अनुभूति होती है।  प्रलय में लय भी है और लीला भी क्योंकि ये शब्द एक ही मूल से जन्मे हैं।
प्रलय बना है प्र+ली+अच् से। ली धातु में विघटित होना अर्थात टूटना, पिघलना, जुड़ना, बांधना, एक हो जाना, छिपाना जैसे भाव हैं। किन्ही दो वस्तुओं का आपस में जुड़ना क्या है? जाहिर है दोनों का अस्तित्व एक हो जाता है। अर्थात दोनों वस्तुएं एक-दूसरे से मिलकर एक हो जाती हैं। इसे ही कहते हैं लीन होना। लीन शब्द इससे ही बना है जिसका अर्थ होता है मग्न होना। ध्यान के संदर्भ में खोना, खो जाना शब्द भी इस्तेमाल किया जाता है। साधक जब अपना मन परमात्मा से जोड़ लेता है तब सिर्फ उसका शरीर उजागर रहता है, बाकी सम्पूर्ण चेतना ईश्वर से एकाकार हो जाती है। उसे ही ध्यानमग्न होना, खोना या लीन होना कहते हैं। तल्लीन शब्द भी इसी कड़ी में आता है। गायब होने, घुलने के अर्थ में विलीन शब्द का निर्माण भी इसी धातुमूल से हुआ है। लीला शब्द भी इसी कड़ी में आता है। मनोरंजन का अर्थ होता है मन का रमना। ली शब्द में निहित ध्यान लगने या खो जाने का भाव यहां क्रीड़ा के अर्थ में उद्घाटित हो रहा है। छद्मवेश धारण करना, बच्चों का खेलना, मनोविनोद करना, किसी भी किस्म की आंगिक चेष्टा जो रुचिकर लगे अथवा नृत्य-गान आदि क्रियाएं लीला कहलाती हैं क्योंकि इससे मनोरंजन होता है। मनोरंजन का उद्धेश्य भी यही होता है कि यथार्थ की अनुभूति से कुछ पलों के लिए अन्यत्र लीन हो जाना। प्रलय-लीला और विनाश-लीला जैसे शब्दों से आशय प्रकृति की ऐसी हलचल अथवा गतिविधियों से है जिसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रह जाता है। लीला शब्द की महिमा अलग ही है। इससे बने शब्दों में रासलीला जैसा शब्द भी है। कृष्ण चरित इतना वैविध्यपूर्ण और उसकी व्याख्या इतनी निराली है कि उसे कृष्णलीला शब्द ही व्यक्त कर सकता है। गोकुल-वृदावन को कृष्ण की लीलाभूमि कहा जाता है। रामचरित के लिए रामलीला शब्द प्रचलित है।  
संगीत का प्रमुख अंग है लयकारी अर्थात स्वरसंगति, स्वरआवृत्ति जिसका एक निश्चित क्रम होता है। संगीत की खूबसूरती लयकारी से ही उभरती है। यह लय भी इसी ली धातु

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से उपजा शब्द है क्योंकि लय में ही वह शक्ति होती है जिससे ध्यान लगता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में किए जानेवाले कर्म में अगर लयकारी न रहे तो सफलता संदिग्ध रहती है। लयकारी में न सिर्फ कलाकार डूब जाता है, बल्कि श्रोता भी अपनी सुध-बुध खो देते हैं। ली में निहत जुड़ने, संप्रक्त होने या गायब होने का भाव बेहद रोचक तरीके से आश्रय से भी जुड़ता है। मनुष्य ने खुद को सुरक्षित करने के लिए जब वृक्षों की कोटरों, शिलाखंडों की दरारों अथवा पर्वत कंदराओं में रहना शुरु किया तो इसमें भाव यही था कि उसने अपने अस्तित्व को इन संरचनाओं से एकाकार कर लिया। उसने खुद को इनमें छुपा लिया। प्राचीनकाल में निवास या आश्रय को भी लय ही कहते थे। लय अर्थात आराम करने की जगह। आराम क्या है? शरीर को सुस्ताने देने का जरिया जब हम अपनी इन्द्रिय-चेतना को भूलने का प्रयास करते हैं। प्राचीनकाल में मनुष्य आराम भी उसी स्थल पर करता होगा जहां वह प्रकृति और हिंस्र जंतुओं से सुरक्षित रहे। इसीलिए आरामस्थल के लिए संस्कृत में य शब्द है। बाद में लय ही आश्रय हुआ। लय में आ उपसर्ग लगाने से बना आलय जिसका स्पष्ट अर्थ होता है निवास, मकान, भवन आदि। आज देवालय, विद्यालय, ओषधालय, हिमालय जैसे शब्दों में घर, निवास जैसे अर्थ साफ नजर आ रहे हैं। देहात में कमरों की दीवार में बने छोटे कोटरों को आला कहा जाता है। यह आला भी इसी आलय से आ रहा है। नि उपसर्ग लगने से निलय अथवा निलयम् जैसे शब्द भी बनते हैं जिनका अभिप्राय भी निवास अथवा भवन से है। एक दूसरे में समाने के लिए विलय शब्द भी इसी कड़ी में आता है।
य में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रलय जिसमें विनाश और व्यापक संहार के भाव हैं। प्रलय का अर्थ सृष्टि का अंतकाल भी होता है। गौर करें कि प्रलय अर्थात अग्निकांड, बाढ़, भूकम्प आदि विभीषिकाओं में सब कुछ बरबाद-तबाह हो जाता है। इमारतें गिर जाती हैं, जो कुछ जहां था, वहां पर उसकी शक्ल बदल जाती है। सब कुछ समाप्त हो जाता है। यहां लीन होने अर्थात गायब होने का ही भाव है। जाहिर है विनाश में किसी भी चीज़ का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहता है। प्रलय में संरचनाएं एक-दूसरे में समा जाती हैं, बस्तियां या तो पानी में गुम हो जाती हैं या धरती में समा जाती हैं। इमारतें आग में विलीन हो जाती हैं। यही प्रलय है।

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Sunday, July 12, 2009

भूलिये नहीं, ब्लागर भी हैं उदयप्रकाश…

संदर्भः भगवाजोगी के हाथों सम्मान

पुस्तक चर्चा के स्थान पर आजka[10]रविवारी मुद्दा

निवार की सुबह चार बजे से कबाड़खाने पर उदयप्रकाश से संबंधित पोस्ट से कुछ अनमना सा था। बहुत ज्यादा इसलिए नहीं क्योंकि उदयजी को सुलझा हुआ मानता हूं और आश्वस्त था कि बाकी साथी भी इस मंच को तथाकथित तौर पर सनसनी का वैसा औजार नहीं बनने देंगे जैसा होते जाने की वृत्ति इस माध्यम के साथ जन्म से जुड़ी है। यहां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण जो बात रही वह थी उदयजी की त्वरित प्रतिक्रिया, जो कहीं न कहीं उन्हें समझनेवालों को अशालीन भी लग सकती थी और लगी भी है। मैं खुद उनमें से एक हूं। पहली बात तो यह कि अनिल यादव की टिप्पणी में ऐसा कुछ नहीं था जिसे सोची-समझी साजिश कहा जाए। यह अचानक बिफरने का मसाला उपलब्ध नहीं कराती। सच पूछें तो इस टिप्पणी को पढ़ चुकने के बाद और यह पता होने के बावजूद कि उदयजी भी कबाड़ी हैं, मुझे उनसे ऐसी किसी प्रतिक्रिया की आशंका तक नहीं हुई।
निवार देर रात जब इस प्रसंग पर कबाड़खाना में दिलीप मंडल की हमेशा की तरह निरपेक्ष और सुलझी हुई बात पढ़ रहा था तो मुझे लगा कि वर्तमान में हिन्दी के पोंगे साहित्यकारों की जमात में उदयजी जैसे चंद नाम ही हैं जो इस तकनीकी दौर में संवाद के नए सरंजामों की समझ रखते हैं और उनसे जुड़े हुए हैं। ब्लाग इनमें एक है। ब्लाग बनाम साहित्य के संदर्भ में मेरी अपनी धारणा यही है कि एक ब्लाग पर साहित्य नहीं, संवाद रचा जाता है। किन्हीं शास्त्रीय परिभाषाओं में साहित्य को भी समाज का आईना, संवाद का माध्यम आदि बताया जाता रहा है। ये और बात है कि साहित्य का स्वरूप ही नहीं चरित्र तक बीते दशकों में, खासतौर पर आज़ादी के बाद इतनी तेजी से बदला कि उसका समाज से संवाद भी टूटा और आईने की सिफ़त भी जाती रही, वो अलग। ब्लागर बिरादरी में उदय प्रकाश जैसा नाम जुड़ने की खबर पर मिश्रित प्रतिक्रिया थी। पर ज्यादातर ने इसका स्वागत ही किया था। उदयजी से व्यक्तिगत रूप से मैं सिर्फ एक बार मिला हूं। वह भी आज से करीब दस बरस पहले भोपाल में मध्यप्रदेश विधानसभा के अंदर। उनके कृति व्यक्तित्व से भी ज्यादा परिचित नहीं हूं। कुछ कहानियां, कुछ कविताएं पढ़ी हैं। पढ़ना चाहता हूं, पर तिरिछ को पढ़ने के बाद ही उदयजी अच्छी तरह समझ में आ गए थे। सर्वाधिक अगर पढ़ा है तो उनके बारे में। जो प्रभाव मन पर आता है वह आदर का स्थायी असर छोड़ता है।
मैं मानता हूं कि कबाड़खाना पर मौजूदा प्रसंग में आया कसैलापन इस वजह से नहीं है कि उदयजी ने भगवाजोगी के हाथों सम्मान क्यों ग्रहण किया। इसके पीछे उनकी तेज, तुर्श प्रतिक्रिया ही प्रमुख है। यक़ीनन कबाड़खाना वैसा ब्लाग नहीं है जैसा उदयजी ने प्रतिक्रियास्वरूप अपनी पोस्ट में लिखा है। कबाड़खाना के कबाड़ियों में ( ब्लाग संचालक अशोक पांडे ने यही नाम सदस्यों को दिया है ) भी कोई वैसा नहीं है जैसा संकेत उदयजी ने किया है। उदयजी हिन्दी के ऐसे साहित्यकार हैं जिनका हिन्दी कथा-साहित्य के इतिहास में उल्लेख होगा। वे हिन्दी जगत के मान्य हैं सो उनसे हमेशा भाषायी अनुशासन और विनम्रता की अपेक्षा ही की जाएगी। यहां मेरा मानना है कि यह ब्लागजगत अगर आज भी साहित्य बनाम ब्लाग की बहस में उलझा है तो सिर्फ इस वजह से क्योंकि ब्लाग की त्वरता, तीव्रता और तीक्ष्णता ही उसे साहित्य बनने से रोकती है क्योंकि यही उसकी पहचान है। साहित्य की शक्ल में जो कुछ सामने आता है वह ठोस, जमा हुआ, सुचिन्तित होता है। उसे कुरेदा जा

Uday_prakash[6] दयजी, मैं इतना ही कह सकता हूं कि यह सब किसी डिजायन का हिस्सा नहीं है बल्कि स्वतःस्फूर्त और अनायास है। कबाड़खाने के कुछ सदस्यों से व्यक्तिगत परिचय के अलावा मैं किसी से मिला तक नहीं हूं। व्यक्तिगत सम्पर्क भी इस ब्लाग से पहले के हैं, पर जितने भी कबाड़ी हैं, अपने से लगते हैं। अशोक पांडे हों या कोई और, मुझे किसी नेक्सस का आभास तक नहीं होता, बल्कि यहां आपकी ज्यादती लगती है। बेहतर है हम इस विवाद को भूल जाएं। उदयजी कबाड़खाने से पूर्ववत जुड़े रहें। हम यह मानते हैं कि बहुत सी बातें अनजाने में होती हैं, बहुत सी भावुकता में घटती हैं और बहुत सी न चाहते हुए करनी पड़ती हैं। ऐसा करनेवालों में देवता भी थे। कृपया अपने मन से यह बात निकालें कि कबाड़खाना पर कोई साजिश हो रही है। हमें तो अभी तक कबाड़खाने पर किसी जातिवादी गुट या  ठाकुर-ब्राह्मण की मौजूदगी पता नहीं चली है। अलबत्ता किसी दिन शब्दों का सफर में ज़रूर इस पर बात हो सकती है।570349-Offerings-for-Buddha-1

सकता है। ब्लाग पर ऐसा नहीं है। कुरेदने पर इतनी तरलता और चिकनाई मिलती है कि पोस्ट की तो छोड़िये, ब्लाग तक फ़रमाईश पर डिलीट करने जैसी पारसाई देखने को मिलती है। ये इस माध्यम की संवेदनशीलता है। ऐसे हालात में प्रिंट का लेखक फौरन राजनीतिक गोटियां फिट करने में व्यस्त हो जाता है। यहां शब्द महत्वपूर्ण है, वर्तनी नहीं। शब्द का प्रकाशन ज़रूरी है, सम्पादन नहीं। यहां भाव प्रमुख है, कला नहीं। इसीलिए ब्लाग साहित्य नहीं है। ब्लाग पर भावनाओं का जोर दिखता है। ज्वार उमड़ता है। जब यह उतर जाता है तब संपादन की सुविधा भी यह आपको देता है। यानी सचमुच जैसा आप चाहते हैं। प्रिंट में यह नहीं है। अगले संस्करण तक के लिए किताब तो बैन ही होनी है।  इसीलिए एक ब्लागर एक साथ सिपहसालार और हरकारा दोनों है। ब्लागर फौजी नहीं है। ब्लागर जंगजू नहीं है। ब्लागर पत्रकार है, साहित्यकार नहीं हैं। एक साहित्यकार से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अपने वक्त के समाज को बदलने में पत्रकार की होती है। 
सार यही कि सम्मान-प्रसंग में अनिल यादव के कबाड़खाना वाले आलेख के संदर्भ में उदयजी की प्रतिक्रिया एक ब्लागर की प्रतिक्रिया है जो त्वरित है, तीव्र है और तीक्ष्ण भी है। हम उदयजी से बहुत शालीन, साहित्यिकों जैसी गोल-मोल प्रतिक्रिया की उम्मीद क्यों कर रहे हैं? ब्लागजगत ऐसे ही विवादों के लिए जाना जाता है और ऐसी ही प्रतिक्रियाएं यहां आएंगी भी। कबाड़खाना की सदस्यता का यह अर्थ नहीं है कि सदस्यों से जुड़े विवादों पर यह ब्लाग मौन रहेगा। मगर इसका यह मतलब भी नहीं कि इस मामले में हम उन्हें अपने से परे मानकर पतित-पावन जितना फर्क पैदा कर दें? अनिल यादव की टिप्पणी एक सामयिक टिप्पणी थी। उसमें कही भी उदयजी के प्रति सोची-समझी साजिश या द्वेषभाव मुझे नजर नहीं आया। ऐसे में उदयजी की तीखी प्रतिक्रिया का जो असर होना था, वही हुआ भी। हम एक साहित्यकार को ब्लागर कैसे मान सकते हैं? जाहिर है कि उनकी प्रतिक्रिया को इस रूप में नहीं देखा गया। फौरी उत्तेजना में जिस भावुकता, छीछालेदारी तक हम पहुंच जाते हैं क्या वह सब असामान्य बाते हैं? कतई नहीं। लिहाज़ा इस विवाद को भी मुझे लगता है पूर्ण विराम देना चाहिए। कबाड़खाने के सदस्यों को समझ में तो आए कि आखिर कहां क्या हुआ?
दयजी को भी अपनी प्रतिक्रिया के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए क्योंकि उनके प्रति आदरभाव रखनेवाले तमाम लोग हैं जो इस अनपेक्षित बयान से  स्तब्ध हैं। कबाड़खाना और उससे जुड़े लोग उनकी कही बातों की लपेट में हैं। वे खुद जल्दबाजी में थे, यह उनकी भाषा से साफ जाहिर है। किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है। छुई-मुई ग्रंथि से उबरना पड़ेगा, तभी पार पड़ेगी। कष्टप्रद है ( ऐसे कटु सत्य? ) बड़े लोगों के मुखारविंद से सुनना कि इसमें जातिवादी षड्यंत्र है !!! इस विषय में ज्यादा नहीं बोलना चाहता मैं। पर  जातिवाद से हटकर कुछ और सोचिये!!! मैं भी बीते चार दशकों से भारतीय ही हूं। अगर कुछ न कर पाने की टीस है तो उसके पीछे जाति नहीं, शिक्षा खास वजह है। मैं आज से बेहतर हो सकता था अगर किन्हीं क्षेत्रों में और अच्छी शिक्षा पाता। मगर इसके पीछे जातीय हीनता/श्रेष्ठता जैसे कारण नहीं हैं। मुझे अपना बचपन अच्छी तरह याद है। तथाकथित सवर्ण होने के बावजूद आर्थिक भेदभाव के हम शिकार थे। इस समस्या पर गौर करने की ज़रूरत है। जातिवाद से हटकर भी बहुत कुछ है। फैशन की तरह सिर्फ जातिवादी बातें करना हम छोड़ें। पहले व्यवहार में जातिवाद ज़रूर नजर आता था, मगर अब विचार में जातिवाद प्रमुखता पाता जा रहा है। इसके बिना कोई विमर्श पूरा नहीं होता।
मुझे तो लगता है कि हम हिन्दी वाले हैं ही इस लायक की गोबर जैसे मुद्दों पर लड़ें, गोबर उठाएं और गोबर उछालें। मीडिया में रहते हुए हम तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के बीच होते हैं। यहां भ्रष्टाचार शब्द का बेहद व्यापक प्रयोग मैं कर रहा हूं क्योंकि उतनी व्यापकता उसमें है। लेन-देन, रिश्वत तक उसे सीमित न मानें। अनैतिकता जैसी ही अर्थवत्ता है उसकी भी। बाकी को क्या गिनाएं, हम तो भाषा के भ्रष्टाचार पर भी कुछ नहीं कर पाते!!! लेखक, भगवा, सम्मान इन विषयों को हमें छोड़ देना चाहिए। पर कर नहीं सकते, छोड़ नहीं सकते। हिन्दीवाले हैं न!!!! रचना से ज्यादा रचना-प्रक्रिया पर हम बातें करेंगे। हमने भी तमाम नैतिकताएं सिर्फ लेखकों-पत्रकारों पर लाद दी हैं। मुझे नहीं लगता कि भगवाजोगी के हाथों सम्मानित होने मात्र से उदयजी की ब्लाग सदस्यता खत्म करनी चाहिए। बल्कि ऐसे मामलों में इस किस्म के बिंदुओं पर व्यक्तिगत चर्चा के आधार पर निर्णय होना चाहिए। उदयजी ने दिलीप मंडल के लेख की प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी टिप्पणी न दी होती तो मुझे यह तथ्य भी पता न चलता।
पका इशारा जिस ओर है उदयजी, वैसा तो अक्सर हो जाता है। जल्दबाजी न हो तो ब्लागिंग कैसी? जैसे आप आहत हुए, वैसे ही कुछ और भी आपके कहे से आहत हुए हैं। उम्मीद करता हूं, यह किस्सा जल्दी ही खत्म होगा। आमीन।

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Saturday, July 11, 2009

नेस्तनाबूद करने की नास्तिकता

संबंधित पोस्ट> आबादी को अब्रे-मेहरबां की तलाश> c

नेस्तनाबूद शब्द दरअसल फारसी मूल का शब्द है और इसका संबंध प्राचीन इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। यह बना है नेस्त+नाबूद से।112105 crescent_city_cars March 1964
प्रा चीन ईरानी संस्कृति का भारतीय सभ्यता से घनिष्ठ रिश्ता है। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसकी पुष्टि कई स्तरों पर होती है और प्राचीन भारत-ईरान करीब-करीब एक सी संस्कृति वाले क्षेत्र के रूप में दिखाई पड़ते हैं। भारत का प्राचीनकाल से ही यूरोपीय समाज से रिश्ता रहा है। अफगानिस्तान, ईरान होते हुए काकेशस पर्वतों के पार तुर्की होते हुए इंडो-यूरोपीय संबंधों ने भूमध्यसागरीय संस्कृति को समृद्ध किया।
न संबंधों का प्रभाव समाज के विभिन्न आयामों में नजर आता है किन्तु खान-पान और रहन-सहन जैसे साक्ष्य बचे तो हैं मगर केवल संग्रहालयों या पुरातात्विक खनन स्थलों पर ही ये मौजूद हैं, क्योंकि सभ्यताएं विनष्ट हो चुकी हैं। एकमात्र जीवित प्रमाण अगर कहीं मिलता है तो वह भारत से यूरोप के बीच बिखरे विभिन्न समाजों की भाषा में है जहां विभिन्न शब्दों के अनगिनत रूप प्रचलित हैं जो ध्वनिसाम्य-अर्थसाम्य के जरिये अपने एक ही मूल और प्रकारांतर से सभ्यताओं की रिश्तेदारी की बात कहते हैं। समूल नाश के अर्थ में हिन्दी में नेस्तनाबूद शब्द प्रचलित है। संचार-माध्यमों से लेकर बोलचाल तक में यह शब्द इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है नष्टभ्रष्ट करना, समूचा खत्म करना, उजाड़ना, तोड़-फोड़ करना, बरबादी आदि। नेस्तनाबूद शब्द दरअसल फारसी मूल का शब्द है और इसका संबंध प्राचीन इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। यह बना है नेस्त+नाबूद से। यह शब्द हिन्दी में इतना लोकप्रिय है कि समूलनाश के अर्थ में इसका प्रयोग मुहावरे की तरह भी होता है।
संस्कृत में एक धातु है पा जिसका अर्थ है पीना,एक ही सांस में चढ़ाना। संस्कृत के अप् से ही बना है पानी। पानी के अर्थ वाला संस्कृत का अप् फारसी में आब बनकर मौजूद है । आब का एक अर्थ चमक भी होता है, ज़ाहिर है प्रकाश के सम्पर्क में आने पर पानी में पैदा होने वाली कान्ति से आब में चमक वाला अर्थ भी समा गया। आब का एक अर्थ इज्जत भी होता है जिसे आबरू कहते हैं। फारसी का रु दरअसल रुख का संक्षेपीकरण है और चांदी के लिए संस्कृत शब्द रौप्य से जन्मा है जिससे संसकृत में बना रूप और फारसी में जन्मा रुख। इसका एक रूप आबरुख भी है जिसका मतलब हुआ चेहरे की चमक । माना जा सकता है यहां चेहरे पर चरित्र की चमक से अभिप्राय है। वैसे हिन्दी में बेइज्जती के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली कहावत में भी चरित्र का संबंध पानी से जुड़ रहा है। प्राचीनकाल से ही जलस्रोतों के नज़दीक मानव का आवास हुआ सो जनशून्य जलस्रोतों के निकट जब लोग बसे तो वे आबाद कहलाए। जाहिर है इसी बसाहट को आबादी कहा गया जो बाद में जनसंख्या के अर्थ मे हिन्दी में रूढ़ हो गया। भोजन-पानी के संदर्भ में आबो-दाना शब्द भी फारसी का है और इसी मूल से जन्मा है। आब यानी पानी, दाना यानी खुराक।
बाद का ही एक रूप प्राचीन ईरानी में हुआ आबूद। भारोपीय भाषाओं में नकारात्मकता, विलोम अथवा रहित के अर्थ में जो उपसर्ग प्रयोग होते हैं उनमें मुख्यतः ध्वनि सुनाई पड़ती है। आबाद/आबूद का विलोम हुआ नाबूद यानी ध्वंस का शिकार, विनष्ट, गायब, बरबाद आदि। यहां नेस्त शब्द की दो व्युत्पत्तियां हो सकती हैं।

... नेस्तनाबूद शब्द में किसी चीज़ को समूलनाश करने का अभिप्राय छिपा है तो भी इसका प्रयोग किसी बसाहट, संरचना और ढांचे के संदर्भ में ही सही होता है।  ... building fire

वैदिक दर्शन में कई तरह के पारिभाषिक शब्द आते हैं। भारतीय मनीषा में अस्ति और नास्ति दो तरह के विचारों की एक लम्बी दार्शनिक परम्परा रही है जो ईश्वर के होने, उसके सगुण-साकार, निर्गुण निराकार रूपों की विभिन्न तरह से व्याख्याएं करती हैं। अस्ति यानी होना, नास्ति या न होना। यहां संदर्भ ईश्वर का है। नास्ति विचार के लोग ईश्वर को नहीं मानते। आसानी से समझने के लिए इसे यूं भी समझ सकते हैं कि जो लोग ईश्वर को मानते हैं वे आस्तिक और जो नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। हालांकि यह सरलीकरण है। इसकी विस्तार से विवेचना उचित शब्द के संदर्भ में अगली किसी कड़ी में की जाएगी। नेस्त शब्द संभवतः इसी वैदिक दर्शन के नास्ति से जन्मा है और अवेस्ता में इसका रूप नेस्त होता है। इस तरह नेस्तनाबूद का मतलब हुआ जो अब बसा सहुआ नहीं है अर्थात जो विनष्ट हो चुका है।
गर नास्ति से नेस्त की व्युत्पत्ति तार्किक है। किसी रचना को नष्ट करने के पीछे जो सोच काम करती है वह नास्तिवाद की हो सकती है। बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं का तोड़ा जाना क्या साबित करता है? बुद्ध नष्ट हुए या प्रतिमाएं?  एक नास्तिक वृत्ति की नकार अभिव्यक्ति का यह जबर्दसस्त उदाहरण है। नेस्तनाबूद के नेस्त की रिश्तेदारी एक अन्य इंडो-ईरानी धातु नश् से जुड़ती है। नश् का अर्थ होता है खो जाना, गायब होना, अन्तर्धान होना, लुप्त होना आदि। जाहिर है किसी वस्तु, रचना आदि में टूट-फूट या अन्य विकार आ जाने से भी उसके मूल आकार का तो लोप हो ही जाता है। इस तरह देखें तो नश् से बने नाश शब्द में हानि, विध्वंस, अस्थाई जैसे भाव आए। नष्ट, विनष्ट, विनाशकारी, नाशवान जैसे शब्द इसी धातुमूल से जन्मे हैं। नश्वर का मतलब होता है क्षणभंगुर या जिसका अस्तित्व अल्पकालीन हो। नेस्तनाबूद में फारसी के नेस्त शब्द की नश् से रिश्तेदारी पर गौर करें तो नेस्तनाबूद की व्याख्या का मजबूत आधार मिलता है।
फारस की खाड़ी में शत-अल-अरब समुद्री मार्ग के मुहाने पर एक छोटा सा द्वीप है अबादा। यह ईरान के खुजेस्तान प्रांत की राजधानी है और तेल व्यापार का बड़ा केंद्र और बंदरगाह है। यह ऐतिहासिक शहर  है जिसका उल्लेख प्राचीन संदर्भों में खूब आया है। नाम से ही स्पष्ट है कि अबादान का मतलब खुशहाल आबादी से है जिसमें आबोदाना छुपा हुआ है। अबादान यानी एक ऐसी जगह जहां वे तमाम सरंजाम थे जिनकी ज़रूरत खुशहाली के लिए होती है।   उर्दू-फारसी में अबादान का एक अर्थ आबाद से भी होता है। अरबी में अबादान, अब्बादान बनकर पहुंचा। मतलब यहां भी वही है। कुल मिलाकर नेस्तनाबूद शब्द में किसी चीज़ को समूलनाश करने का अभिप्राय छिपा है तो भी इसका प्रयोग किसी बसाहट, संरचना और ढांचे के संदर्भ में ही सही होता है। 

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Friday, July 10, 2009

गप्पी, बातूनी और बतोलेबाज

... यूं गप्पी और बातूनी में हलका सा फर्क है। बातूनी बेलगाम बोलता है गप्पी अक्सर झूठ ही बोलता है... 2377

रतों पर हमेशा ज्यादा बोलने का आरोप मढ़ा जाता है। यूं वार्तालाप का शौक किसी को भी हो सकता है। जिस तरह से सभी औरतें ज्यादा नहीं बोलती उसी तरह सभी पुरुष भी  अल्पभाषी नहीं होते। वैसे स्त्री-पुरुष के वर्गीकरण से हटकर देखें तो सबसे ज्यादा बोलने की आदत बच्चों में होती है। युवावस्था की तुलना में बूढ़े भी ज्यादा बोलते हैं, मगर उनकी बातें सुनने के लिए नई पीढ़ी के पास वक्त नहीं होता। ज्यादा बोलनेवाले को बातूनी कहते हैं। गप्पी या गपोड़ा भी इसी श्रेणी में आते हैं। बतोला या बतोलेबाज जैसे शब्द भी इस श्रेणी के लोगों के चर्चित विशेषण हैं। यूं गप्पी और बातूनी में हलका सा फर्क है। बातूनी बेलगाम बोलता है, हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि वह झूठ भी बोलता है। पर हमेशा सच ही बोलने की नैतिकता का पालन करना उसके लिए ज़रूरी भी नहीं। अलबत्ता गप्पी सब कुछ तत्काल रचता है। गप्पी सब कुछ कपोल-कल्पित ही कहता है। बहरहाल पहले बातूनी की बात।
 ह तो ज़ाहिर है कि किसी व्यक्ति को बातूनी इसीलिए कहते हैं क्योंकि वह ज्यादा बोलता है। बोलना यानी बात करता। यानी बातूनी का बात से ज्यादा रिश्ता है। बात शब्द बना है संस्कृत के वार्त्ता से जिसमें गुप्त समाचार, कहना, बात, विवरण आदि अर्थ हैं। यह बना है वृत्त से जिसमें गोल, घेरा जैसे भाव तो हैं ही साथ ही घटना, बीता हुआ, खबर,समाचार, नियम आदि भाव भी हैं इसे आप इतिवृत्त से समझ सकते हैं। इतिवृत्त का अर्थ होता है सम्पूर्ण घटनाक्रम। इति यानि शुरुआत। किसी बिंदु से कोई बात शुरु कर वहीं समाप्त करने को ही इतिवृ्त्त कहते हैं जिसमें कथाचक्र का भाव शामिल है। वृत्ति भी इससे ही बना है जिसमें अवस्था, शैली, कार्य जैसे भावों के साथ शब्द की शक्ति का भाव भी शामिल है। भाषिक-रचना की शैली भी वृत्ति कहलाती है। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में बातां, बतियां जैसे शब्द-प्रयोग भी प्रचलित है। कुल मिलाकर वार्त्ता में अफ़वाह, कहानी, कहावत, किस्सा आदि अर्थ शामिल हैं। इतिवृत्त की तरह ही वृत्तांत भी इससे ही बना है। वृत्त+अन्त से यह बना है जिसमें वही भाव हैं जो इतिवृत्त में हैं।
वृत्त से बने वार्त्ता और फिर इसके अपभ्रंश रूप बात से कई शब्दों की रिश्तेदारी है। ज्यादातर शब्द हिन्दी की लोकशैलियों में प्रचलित हैं जिनसे बातूनी शब्द भी जन्मा है। संस्कृत में एक प्रत्यय है वत् जिसमें स्वामित्व का भाव है। इसमें अनु्स्वार लगकर इसका रूप वन्त हो जाता है। इसका एक रूप मन्त भी होता है। बातूनी शब्द का विकास निश्चित ही वार्ता+वन्त> वाताअन्त> बाताअन> बातूनी से मिलते जुलते क्रम में हुआ होगा। यहां वार्तावन्त का अर्थ हुआ खूब बात करने वाला। मगर बातूनी में हल्की सी नकारात्मकता भी है और इसकी व्यंजना वाचाल के करीब पहुंचती है। परिस्थितियों के मद्देनजर इसे सद्गुण भी माना जाता है। बातूनी को बातूनिया भी कहते हैं।
बातूनी की तरह ही एक शब्द है बतोला या बतोलेबाज मगर इसका मतलब ज्यादा बोलने से कुछ अधिक है। बतोला शब्द बना है वार्ता+कारकः>वत्तकारअ>बताला> बतोला से। बतोलेबाज व्यक्ति को झांसेबाज की श्रेणी में रख सकते हैं। यह व्यक्ति

aa14... गपबाज आमतौर पर विश्वसनीय नहीं होता अर्थात गप में काल्पनिक वार्त्ता ही होती है। 

अक्सर बातों से लोगों को धोखा देने का प्रयास करता है। हिन्दी में बातें बनाना मुहावरा प्रसिद्ध है। बतोलेबाज दरअसल बातें बनानेवाला ही होता है। एक बतोलेबाज, धोखेबाज भी हो सकता है जबकि बातूनी व्यक्ति सिर्फ अधिक बोलता है और दूसरे का समय ही नष्ट करता है। वार्त्ता से बने कुछ अन्य प्रचलित शब्द हैं बतरस यानी बोलने में आनंद लेना, बतरसिया यानी बातूनी, बतबाती यानी बेसिरपैर की बातें करना आदि।
प शब्द की व्युत्पत्ति भी दिलचस्प है। आमतौर पर गल्प से गप की व्युत्पत्ति मानी जाती है। हिन्दी में गल्प का अर्थ होता है कहानी, झूठ, डींग आदि। यूं संस्कृत में गल्प शब्द नहीं है। गल्प का जन्म हुआ है संस्कृत के जल्प् धातु से जिसमें बोलना, बातें करना जैसे भाव है। गुनगुनाना, कलरव करना और कहना-पुकारना जैसी अर्थवत्ता भी इसमें है। जल्पः इससे ही बना है और इसमें इन तमाम अर्थों के साथ प्रलाप और वाद-विवाद जैसे अर्थ भी शामिल हो गए जो ज्यादा बोलने से ही जुड़े हैं। जल्प का ज हिन्दी में आकर ग मे तब्दील हुआ। गल्प से बना गप्प जिसका मतलब हुआ झूठ या मन से कहना। गप में अफ़वाह का भाव भी शामिल है। गपबाज आमतौर पर विश्वसनीय नहीं होता अर्थात गप में काल्पनिक वार्त्ता ही होती है। इससे ही बना है गपशप जिसमें हलकी-फुलकी, गुफ्तगू, मनबहलाव की बातें शामिल हैं। गप को गप्प भी कहते हैं और गप लगानेवाले को गप्पी, गपोड़ी, गपोड़ा या गपबाज तक कहा जाता है।

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Thursday, July 9, 2009

मुहब्बत करनेवाले कम न होंगे…

पिछली कड़ियों>प्रेमलता और इश्क के पेचोख़म और इश्क से ईश्वर और ईंट तक से आगे>

... द्वैत से एकत्व के नैसर्गिक क्रिया-कलाप में सन्नद्ध सृष्टि के कण-कण में प्रतिक्षण सिर्फ प्रेम की हलचल हो रही है। प्रेम गति में ही सद्गति है।... omar_khayyam_ba18

श्क की ही तरह मुहब्बत शब्द भी प्रेम के अर्थ में खूब इस्तेमाल होता है। यह मूलतः सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द है और अरबी भाषा से फारसी, उर्दू और हिन्दी में आया है। मुहब्बत की रिश्तेदारी भी एक जैसे मिलते-जुलते अर्थ वाले कई शब्दों से है और इन तमाम शब्दों से हिन्दी वाले भी कमोबेश परिचित हैं।
जिस तरह इश्क शब्द की रिश्तेदारी इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से भी है (कुल-गोत्र को और छोटे दायरे में देखें तो इसे भारत-ईरानी परिवार का भी कह सकते हैं) और सेमेटिक भाषा परिवार से भी और दोनों ही परिवारों में इश्क का रिश्ता प्रकृति यानी वनस्पति से जुड़ता है। अरबी में ‘श्क’ (shq) धातु को इश्क का मूल माना जाता है वहीं इश्क भारोपीय मूल का है इसके भी पुख्ता प्रमाण हैं और इसका संबंध संस्कृत-अवेस्ता (प्राचीन ईरानी) के इश्-इष् से है जिनमें लगाव, गतिवाचक, प्रेम, चाह से लेकर कामना, इच्छा जैसे भाव हैं। प्रेम का तादात्म्य प्रकृति से है, सृष्टि की गति से है। द्वैत से एकत्व के नैसर्गिक क्रिया-कलाप में सन्नद्ध सृष्टि के कण-कण में प्रतिक्षण सिर्फ प्रेम की हलचल हो रही है। प्रेम गति में ही सद्गति है। अरबी भाषा में बीज के लिए एक धातु है हब्ब (habb/hibb) जिसमें मित्र, प्रिय, पात्र, जैसे भाव हैं।
श्क की रिश्तेदारी प्रेमवल्लरी यानि अरबी की आशिका और फारसी की इश्क-पेचाँ से है उसी तरह हब्ब धातु में भी मित्रता, प्रिय आदि जो भाव हैं वह यूं ही नहीं हैं। एक तरह जहां इसका अर्थ मित्र है, दूसरी ओर इसका मतलब होता है बीज। गौर करें बीज और प्रिय में भाव एक ही है। यही बात पात्र अर्थात बरतन में भी है। एक बीज को धरती के गर्भ में स्थान मिलता है। धरती का स्नेह-स्पर्श पा कर उसमें अंकुरण होता है और बीज से हटकर धीरे-धीरे एक समूचा पृथक अस्तित्व नजर आने लगता है। जीवन का स्पंदन आकार लेने लगता है। बिना प्रेम के जीवन संभव नहीं है। सदियों से वनस्पति जगत का विस्तार विकिरण के जरिये होता है। विकिरण यानी बीजों का बिखरना, फैलना। अरब के रेगिस्तान में बीजों के बिखरने की क्रिया को हिब्बत कहते हैं। बीज यानी हब्ब और बीजों का बिखरना यानी हिब्बत। यह अरबी प्रत्यय (अत) संज्ञा-सर्वनाम को क्रियारूप में बदलता है।
शुष्क रेगिस्तान में बीजों का बिखराव यानी हिब्बत!!! धरती से बीजों के मिलन का क्षण। बीज, जिनमें जीवन की धड़कन है, अजाने-अजन्मे से रूपाकार जिनमें कुलबुला रहे हैं। और धरती, किसी बीज के भीतर पनपती जीवन की संभावनाओं को अपनी कोख में सुरक्षित स्नेहgrape&wine की गर्मी से तपाना चाहती है। यह बीज कुदरत का है। ख़ल्क यानी सृष्टि की सृजन भावना का प्रतीक है यह बीज जो धरती की कोख में पलता है। यही प्रेम है। हिब्बत में अरबी उपसर्ग जुड़ने से बनता है महब्बत जिसे हिन्दी में मुहब्बत कहा जाता है। इश्क के नज़रिये से भी देखें तो और भी दिलचस्प नतीजे मिलते हैं। अरबी हिब्ब का एक अर्थ होता है अंगूर या अंगूर का बीज। अंगूर का पौधा भी इश्क-पेचां की तरह ही बेलदार पौधा होता है। प्रकृति में अंगूर की बेल भी किसी न किसी छोटे-बड़े, तने वाले वृक्ष का सहारा लेकर ही फैलती है। वृक्ष से लिपटने, चढ़ने की क्रिया में चाहत, कामना, समर्पण जैसे भाव यहां भी सार्थक हो रहे हैं। अंगूर के रस में नशा होता है। यह नशा प्यार का नशा है। यह यूं ही नहीं आ जाता। इसमें धरती की गर्माहट, बसी है। स्नेहसिक्त है यह रस जो धरा की कोख से निकला है।
रबी में मित्र को हबीब कहते हैं जो इसी धातुमूल से जन्मा है। हबीबी का मतलब होता है प्रियतम, सुप्रिय, प्यारा, दुलारा। महब्बत का मतलब होता है स्नेह-स्पर्श अथवा प्रेमाभिव्यक्ति। प्यार जताना। जिससे प्यार किया जाता है वह पुरुष पात्र कहलाता है महबूब और स्त्री पात्र कहलाती है महबूबाहब्ब में मित्र का भाव है इसीलिए इसका बहुवचन हुआ हुबूब। इसमें उपसर्ग लगने से बनता है महबूब या महबूबा। कई बार यह अंगूरी ही किन्ही प्रेमपात्रों के लिए महबूब और महबूबा साबित होती है। नतीजा वही होता जो प्रेम का चरित्र है। दो में से किसी एक को अपना अस्तित्व खोना पड़ता है। इसे चाहें समर्पण कहें या कुर्बानी!!!! अक्लमंद इस प्रेम को बेवकूफी भी कहते हैं।

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Wednesday, July 8, 2009

इश्क से ईश्वर और ईंट तक

पिछली कड़ी> प्रेमलता और इश्क के पेचो-ख़म...से आगे>

...भारतीय-ईरानी परिवार की धातु इष् में चलना, फिरना, प्राप्त करना, लक्ष्य पाना, अनुसरण करना, तलाश करना, ढूंढना आदि भाव हैं। इश्क शब्द में ये तमाम क्रियाएं और अवस्थाएं साफ नज़र आती हैं…Shahnameh-2

श्क शब्द के मायने होते हैं प्रेम। यह शब्द अरबी में भी है और फारसी में भी। कुछ भाषाशास्त्री इसे सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द न मानते हुए इंडो-ईरानी परिवार का मानते हैं। देखा जाए तो यह शब्द सिर्फ सेमेटिक भाषा परिवार का कम और इंडो-ईरानी परिवार का ज्यादा है। शब्द की व्युत्पत्ति पर आमराय नहीं है। ईरानी मूल के प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी और भाषाशास्त्री मोहम्मद हैदरी मल्येरी ने इश्क शब्द के इंडो-ईरानी होने के महत्वपूर्ण कारण गिनाए हैं।
इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में एश, इश, जैसे शब्द हैं जिनका ताल्लुक इच्छा, कामना अथवा चाहने से है। प्राचीन ईरान की प्रमुख भाषा अवेस्ता जो वेदों जितनी ही पुरातन है, में इष शब्द है जिसका अर्थ है इच्छा, कामना, खोज आदि। इसके कुछ अन्य रूपों पर गौर करें। इशति यानी वह चाहता है, इश्त यानी जिसे चाहा जाए अर्थात आराध्य, इश्ती यानी प्रेरणा, उद्धेश्य आदि है। इसका ही एक रूप है इश्क जिसमें प्रेम, समर्पण, कामना के भाव हैं। गौरतलब है कि एश, इश के करीब-करीब यही सारे रूप संस्कृत में भी उपस्थित हैं जैसे एष, एषा, एषणा, इष आदि में कामना, इच्छा, चयन, प्रयास, चाह आदि भाव हैं। इसी क्रम में आते हैं इष्ट अर्थात इच्छित, चाहा गया, जिसकी कामना की जाए, वर, प्यारा, प्रेमी आदि। इसी मूल से उपजा है ईश्वर शब्द जिसमें परमशक्तिवान, ताकतवर, गुरू, भगवान, प्रेमी आदि भाव हैं। यह भी साफ है कि प्रेम ही ईश्वर है या इश्क खुदा है जैसी बातें महज़ दार्शनिक नहीं हैं। इश्क खुदा है कि बजाय ईश्वर ही इश्क कहने में भाषावैज्ञानिक आधार भी है।
हैदरी का मानना है कि अरबी मूल का इश्क मूलतः फारसी से ही गया है इसलिए यह सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द नहीं हैं। भारतीय-ईरानी परिवार की धातु इष् में चलना, फिरना, प्राप्त करना, लक्ष्य पाना, अनुसरण करना, तलाश करना, ढूंढना आदि भाव हैं। इश्क शब्द में ये तमाम क्रियाएं और अवस्थाएं साफ नज़र आती हैं। इसीलिए फारसी में एक प्रसिद्ध वल्लरी के लिए इश्क-पेचाँ अर्थात प्रेमलता या प्रेमवल्लरी जैसा शब्द सामने आया क्योंकि यह किसी वृक्ष का सहारा लेकर, उसके इर्दगिर्द वलयगति से आगे बढ़ती है और शीर्ष तक पहुंचती है। जिस वृक्ष को इश्क-पेचाँ आधार बनाती है, वह कुछ समय बाद सूख जाता है। अर्थात उसका अस्तित्व सिर्फ उस बेल के लिए ही सुरक्षित हो जाता है। भाव यही कि प्रेम में किसी एक को समर्पण करना ही होता है। लिपटने, चाहने, समर्पित करने का यह दर्शन ही अरबी समाज में भी लोकप्रिय हुआ और इस तरह अवेस्ता का इश्क चला आया अरबी में।
हैदरी के पास इश्क शब्द के भारतीय-ईरानी मूल का होने के पीछे इसकी संस्कृत से रिश्तेदारी है और दूसरा महान फारसी कवि फिरदौसी द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल करना है। फ़िरदौसी (935-1020ई) ईरान के प्रखर राष्ट्रवादी कवि थे। इनकी कृति शाहनामा ईरान पर अरबों के आक्रमण से पहले के काल से जुड़ी है। शाहनामा Shahnameh को ईरान की आत्मा भी कहा जा सकता है। यह वह महत्वपूर्ण कृति है जिसने भाषाविज्ञानियों, साहित्यकारों, इतिहासकारों को हमेशा प्राचीन सभ्यताओं को समझने के संदर्भ में सहायक सामग्री प्रदान की है।
 ferdowsi-sized ..फ़िरदौसी जानते थे कि इश्क शब्द ईरानी मूल का है और इसीलिए इश्क का , प्रयोग उनके काव्य में है ...
शाहनामा के जरिये ही रुस्तम-सोहराब जैसे पात्र दुनियाभर में मशहूर हुए। हैदरी का मानना है कि चूंकि फिरदौसी ईरानी संस्कृति को प्यार करते थे और अरब के बढ़ते प्रभाव को ईरानी संस्कृति के लिए खतरा मानते थे। फिरदौसी की भाषा पर अरबी प्रभाव नहीं है। शाहनामा में उन्होंने इश्क शब्द और उसके अन्य रूपों का खूब इस्तेमाल किया है। अरबी विरोधी छवि देखते हुए यह मानना मुश्किल है कि उन्होंने इश्क जैसे अरबी शब्द का इस्तेमाल किया होगा। दूसरी बात यह कि अरबी साहित्य में और बोलचाल में भी इश्क़ शब्द से ज्यादा मुहब्बत शब्द का प्रयोग होता है। जाहिर है, फिरदौसी इश्क शब्द को ईरानी मूल का ही मानते थे। यह बहुत बड़ा साक्ष्य है। हैदरी तर्क देते हैं कि फारसी का क(k) वर्ण अरबी में जाकर क़(q) में बदल जाता है। इस तरह फारसी का इश्क (isk) अरबी में इश्क़ (isq) हो जाता है।
हिन्दी का इच्छा शब्द भी इष् धातु से ही बना है। ईश्वर, ऐश्वर्य, इष्ट जैसे शब्दों के मूल में भी यही धातु है। वैदिककाल में इष्ट का अर्थ यज्ञ भी होता था। सीधी सी बात है, आर्यजन अग्निपूजक थे और ईश्वर-आराधना के लिए, इच्छापूर्ति की कामना में यज्ञ का आयोजन करते थे। चूंकि यज्ञों का संबंध ईष् यानी कामना से जुड़ा है इसलिए इसे भी इष्ट कहा जाने लगा। भवन निर्माण की प्रमुख इकाई को ईंट कहते हैं जो इष्ट से ही बना है। इसका संस्कृत रूप था इष्टिका या इष्टका। यज्ञवेदी का निर्माण मिट्टी से होता था। यज्ञाग्नि से तपकर यह वेदिका काफी मज़बूत हो जाती थी। यहीं से आर्यजनों ने मिट्टी पकाने की तकनीक जानी और कालांतर में मिट्टी के पिंडों को आग पर तपा-पका कर उससे भवन निर्माण शुरू किया जिसे इष्टका या इष्टिका नाम दिया। पौराणिक संदर्भों में तीन प्रमुख आर्य-एषणाओं अर्थात इच्छाओं में लोकैषणा (ख्याति की चाह), वित्तैषणा (धन की चाह) और पुत्रैषणा (पुत्र की चाह) का उल्लेख है। आधुनिक युग की तीन प्रमुख इच्छाओं में रोटी-कपड़ा और मकान हैं(बाकी तीन खत्म नहीं हुईं हैं बल्कि और भी विकराल होकर हमारे मन-मस्तिष्क में जम गई हैं) इनमें मकान के बारे में सोचें तो ईष्ट शब्द में निहित एषणा अर्थात कामना, इच्छा इसमें भी नज़र आती है क्योंकि ईंट का प्रयोग हुए बिना भवन बन नहीं सकता।

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Tuesday, July 7, 2009

कॉपी के लिए चांटा- सरदार सुन्न..[बकलमखुद-90]

पिछली कड़ी> मुंडन और चाचा की शादी से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, dinesh r आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और नब्बे-वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

रसात आरंभ हो गई, जुलाई शुरु होते ही दाज्जी ने पंचांग में देख कर तय किया कि सरदार का किस दिन स्कूल में दाखिला करवाना है। उस दिन छुट्टी ले कर पिताजी बाराँ में ही रहे, सांगोद न गए। स्कूल के अधिकतर अध्यापक पिताजी के छात्र थे। तीसरी क्लास में नाम लिखवा दिया गया, सरदार स्कूल जाने लगा। यहाँ नाम बदल कर दिनेश हो गया था, जो जन्म नक्षत्र के हिसाब से था। उस ने अब तक पढ़ने का काम तो खूब किया था, लेकिन कभी कागज-कॉपी में न लिखा था। अब तक बर्रू की कलम और चॉक बत्ती ही लिखने के औजार थे। लकड़ी की तख्ती को मुलतानी मिट्टी से रोज पोता जाता, सूख जाने पर वह खूब चमकने लगती। उस पर अम्माँ या बाबू-चाचा पेंसिल से लाइनें खींचते, फिर बर्रू की कलम से उस पर सुलेख लिखी जाती। इस के अलावा सारा काम स्लेट पर बत्ती से किया जाता।
हले ही सप्ताह के अंत में मास्साब ने हुक्म दे दिया कि बाजार से कॉपी लानी है, निब वाली होल्डर लानी है और हिन्दी की किताब के पहले पाठ की नकल खूबसूरत लिखावट में कॉपी के पन्ने पर कर के लानी है सोमवार को दिखानी है। सरदार ने हुक्म मंदिर पहुँच कर दाज्जी को सुना दिया। दाज्जी को हुक्म पसंद नहीं आया। उन के हिसाब से पाँचवीं तक तो स्लेट-बत्ती, तख्ती और कलम ही पर्याप्त थे। कागज जैसे हिलते-डुलते ढुलमुल स्थान पर होल्डर से लिखना हस्तलिपि को सुंदर बनाने में अच्छा खासा रोड़ा था। उन्हों ने कहा नन्दकिशोर (पिताजी) आएगा, वह कॉपी, होल्डर, दवात, स्याही दिला लाएगा। सरदार को भी मौज हो गई। उसे लिखने में वैसे ही आलस आता था। किस्मत से उस शनिवार पिताजी सांगोद से न आए। रविवार निकला और सरदार बिना कॉपी के ही स्कूल पहुँचा। प्रार्थना समाप्त हुई और कक्षा शुरू। मास्साब ने आते ही कॉपी दिखाने को कहा। सब बच्चे कॉपी ले कर आए थे। सब ने कुछ न कुछ कॉपी में लिखा था। सरदार की बारी आई तो उस ने सीधे से कहा कि उस ने दाज्जी से कहा था, जिन्हों ने पिताजी के आने पर कॉपी-कलम लाने को कहा था। पिताजी आए नहीं, इस लिए कॉपी न आई। मास्साब गुस्सा गए, दाहिना हाथ चला और सीधे सरदार के बाएँ गाल पर जोर की आवाज के साथ टकराया। सरदार का सिर घूम गया, कुछ देर तक कुछ भी दिखाई न दिया, अंदर की साँस अन्दर और बाहर की बाहर रह गई। वह हिचकियाँ खाने लगा। रुलाई फूटने वाली थी, पर उस ने उसे रोक लिया। जैसे-तैसे सांस मुकाम पर आई तो गाल जलने लगा। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि उस से क्या गलती हुई थी? जिस की सजा उसे मिली। तभी मास्साब का हुक्म हुआ –बस्ता उठाओ, घर जाओ। जब कॉपी-होल्डर आ जाएं, तब कॉपी में नकल कर लो तभी स्कूल आना सरदार ने बस्ता उठाया और स्कूल के बाहर आ कर जी भर रो-कर खुद को हलका किया।
मंदिर पहुँचा तो दाज्जी ने उसे रुआँसे चेहरे के साथ बस्ता उठाए आते देख लिया। वे मंदिर के अपने काम को छोड़, सीधे सरदार के पास आए। उस का चेहरा देखा तो गाल पर पांचों उंगलियों की सुर्ख छाप मौजूद थी। उन्हें कारण बताया, तो वे तुरंत अपनी हाड़ौती बोली में मास्टर को शापित करने लगे। उधर बा’ ने देखा तो वह रोने लगी और स्कूल को ही कोसने लगी। उन के हिसाब से इतनी छोटी उम्र में सरदार को स्कूल भेजना ही गलत था। रहा सवाल पढ़ाई का तो वह तो हो ही रही थी। स्कूल से भी तेज गति से। तभी पिताजी भी आ पहुँचे। उन्हें स्कूल के किसी काम से कोटा जाना पड़ा था और लौटते में घर संभालने आ गए थे। उन्हों ने सरदार को देखा, फिर देखा अपने पिता को मास्साब को शापित करते और फिर अपनी माँ को रोते हुए। अब तो मामला उन की भी बरदाश्त के बाहर था। वे अपने पिता जी को गुस्सा होते तो देख सकते थे लेकिन माँ का रोना? उन्हें किसी हाल में बर्दाश्त न था। वे तुरंत सरदार को ले स्कूल जा पहुँचे। स्कूल के प्रवेश द्वार के ठीक सामने कक्षा थी वहीं मास्साब से उन का मुकाबला हो गया।
च्छा,

मुंडन के ठीक पहले बुआ के साथ सरदार Sardarbua 1

तुम पढ़ाते हो तीसरी कक्षा!!! पिताजी सीधे मास्साब से मुखातिब थे। यह प्रश्न था, या संज्ञान, यह सरदार को पता नहीं लगा। -तुम्हें हमने यही सिखाया था। तुम ने तो बीएसटीसी ट्रेनिंग भी की है। वहाँ यही सब सिखाया गया था? कि बच्चों से इसी तरह निपटा करो। तुम जैसे अध्यापकों के कारण ही अपने बच्चों को माँ-बाप स्कूल नहीं भेजते। गुस्से में पिताजी की आवाज बहुत तेज होती थी। सब मास्टर अपनी-अपनी कक्षाओं से निकल कर पिताजी को तीसरी कक्षा के मास्साब को डाँटते हुए देखने लगे। किसी को साहस न हुआ कि बीच में कुछ बोले। तभी दुमंजिले पर स्थित दफ्तर से हेड मास्साब उतरे और नरमी से पिताजी को समझा कर अपने दफ्तर में ले गए और तीसरी कक्षा के मास्साब को आने को कहा। सरदार अपना बस्ता लिए कक्षा के बरांडे के नीचे मैदान में खड़ा रहा। कई छात्रों ने उसे कक्षा में आ कर बैठने को कहा भी। लेकिन वह बिना मास्साब के कहे, दो सीढ़ी चढ़ कर कक्षा में जाने को तैयार न था। कुछ देर हेड मास्टर जी के दफ्तर में शिखर वार्ता हुई। फिर तीनों नीचे उतरे। सरदार को मास्साब ने कक्षा में बैठने को कहा तो वह कक्षा में चला गया।
या हुक्म जारी हुआ कि अभी कुछ दिन किसी को कॉपी में लिखने की जरूरत नहीं। सब कुछ स्लेट-बत्ती और तख्ती-कलम से ही होगा। फिर हेड मास्साब के कहने पर सरदार को कक्षा से बुलाया और पिताजी उसे अपने साथ ले कर मंदिर आ गए। पिता जी ने उसी दिन एक के स्थान पर दो चौसठ पृष्ठ वाली कैपीटल कॉपियाँ, एक निब वाला होल्डर, एक दवात और कुछ नीली स्याही की टिकड़ियाँ ला कर दीं। बताया गया कि कैसे टिकड़ी को पानी में घोल कर स्याही बनानी है? और कैसे निब वाली होल्डर से कॉपी पर लिखना है? एक कॉपी तुरंत सरदार को अभ्यास के लिए दे दी गई। दूसरी दाज्जी ने संभाल कर रख ली, स्कूल में कहे जाने पर स्कूल का काम करने के लिए। कक्षा में कॉपी का प्रचलन फिर दो माह बाद ही हुआ। स्कूल में हिन्दी और गणित ही पढ़ाई जाती। सामान्य विज्ञान और सामाजिक ज्ञान की पुस्तकें तो थीं, लेकिन सिर्फ पढ़ने और जानकारी के लिए। उस की न कोई लिखाई होनी थी और न कोई परीक्षा। बस सप्ताह में एक-दो बार मौखिक सवाल पूछ लिए जाते। दीवाली तक ही इस स्कूल में जाना हुआ। उस के बाद तो सरदार पिताजी के साथ वापस सांगोद आ गया।

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Monday, July 6, 2009

भाषाई देहातीपन शहरी भद्रलोक का

पिछली कड़ी> हिन्दी में शब्दकोशों की कमी… से आगे>

... टीवी चैनलों के मीडियाकर्मियों को शायद इस बात का एहसास नहीं है कि जिस हिन्दी के बूते वे इस सशक्त माध्यम पर तगड़ी छान रहे हैं, उसी के बूते वे करोड़ों हिन्दीवालों को भाषा का सही संस्कार भी दे सकते हैं, बशर्त वे खुद पहले सही बोलना सीख लें... scan0001

रल और आसान भाषा लिखने की (कु)चेष्टा के चलते संचार माध्यमों में जो हिन्दी रची जा रही है, राष्ट्रभाषा और मातृभाषा जैसे विशेषणों के संदर्भों में लगता नहीं कि हम हिन्दी का सम्मान करते हैं। पिछले एक अर्से से लगातार संचार माध्यमों में हिन्दी का स्तर गिरा है। भाषाओं के संदर्भ में वर्तनी की गलती या अशुद्ध उच्चारण आमतौर पर किसी से भी हो सकता है मगर आसान भाषा की आड़ में बोलचाल के शब्दों से लगातार किनारा करते जाना भयावह है।
सान भाषा का इस्तेमाल नारे की तरह इतनी तेजी से प्रसारित हुआ है कि लोग हिन्दी के आसान शब्द तलाशने की ज़रूरत से ऊपर उठ गए। सीधे सीधे अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल लिखित रूप में होने लगा है। चिकित्सक के स्थान पर वैद्य लिखने के आग्रही हम नहीं हैं क्योंकि हिन्दी परिवेश में वैद्य शब्द के साथ एक अलग व्यंजना जुड़ गई है मसलन देशी पद्धति से इलाज करनेवाला। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में डॉक्टर शब्द सर्वमान्य हो चुका है। अब इसे हिन्दी कोशों में जगह दी जानी चाहिए। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हर साल प्रचलन के आधार पर अंग्रेजी में समाते जा रहे अन्य भाषाओं के शब्दों को अंग्रेजी भाषा में स्वीकार्य शब्दों के तौर पर शामिल करती है। बैंक, सैलरी, फंड, टीवी, जींस, पेंट, टी-शर्ट, जैसे दर्जनों शब्दों को हिन्दी कोशों में स्वीकार्य शब्द के तौर पर स्थान दिया जाना चाहिए तभी हम शुद्धतावादियों के दुराग्रह से भी बच पाएंगे। देश में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के चलते संस्कृतियों के बीच अंतर्संबंध बढ़ने लगा है। आज मुंबइया शैली की हिन्दी भी सामने आई है। इस शैली के अनेक शब्दों की व्यंजना निराली है। फंटूश, बिंदास, फंडा, फंडू, भिड़ू,   जैसे शब्द भी इसी कतार में आते हैं।
मारी चिन्ता छात्र या विद्यार्थी के स्थान पर स्टूडेंट, पीढ़ी के स्थान पर जेनरेशन, जाति के स्थान पर कास्ट, रोजगार के स्थान पर कॅरियर, खरीदारी के स्थान पर शॉपिंग, मार्केटिंग आदि अनेक शब्दों के बढ़ते प्रचलन पर है। बोलचाल में इनका इस्तेमाल सही हो सकता है पर प्रिंट मीडिया में पेज थ्री संस्कृति के बढ़ते विस्तार के मद्देनजर अब ऐसी भाषा इस्तेमाल की जा रही है जिसे हिंग्लिश कहा जाता है। हमने हिन्दी शब्दों को दुरूह मानते हुए, अपनी भाषा में अंग्रेजी शब्दों का गैरजरूरी निवेश शुरू कर दिया है जो खतरनाक है। हिन्दी का वह स्वरूप जो संस्कृत, अरबी, फारसी, तुर्की आदि अनेक भाषाओं के मेल से बीती क़रीब पांच सदियों में विकसित हुआ था, जिसमें हिन्दी की अनेक बोलियों की सुवास भी शामिल थी, अब लगातार ध्वस्त हो रहा है। बोलचाल की भाषा और रोजमर्रा के लेखन की भाषा में हर दौर में फर्क रहा है। हमारी शब्द संपदा बोलचाल की भाषा की तुलना में लिपि में आश्रय पाकर ही सुरक्षित रहती है। अगर बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल मुद्रित रूप में बहुत ज्यादा होता रहा तब


सफर की पिछली कड़ी-हिन्दी में शब्द कोशों की कमी पर कई सुधी पाठकों की बेहतरीन प्रतिक्रियाएं मिली हैं जिन्हें संक्षिप्त रूप में इस आलेख के साथ दे रहे है ताकि नए पाठक भी विषय से जुड़ सकें।


अशोक पाण्डेय …भाषा का रूप परिवर्तनशील होता है और उसी के अनुरूप शब्‍दकोशों में भी लगातार संशोधन और परिवर्धन की जरूरत पड़ती है, लेकिन अफसोस कि हमारे यहां इसके लिए भाषाशास्त्रियों और साहित्‍यसेवियों के पास अवकाश और त्‍याग-भाव नहीं है।
गिरिजेश राव ... यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है क्यों कि एक ही बोली के अनेक रूप मिलते हैं और शब्द/अर्थ सम्पदा में भी पर्याप्त भेद हैं।कोष का सृजन बहुत ही समय और धन की माँग करता है। राजकीय संरक्षण में ही यह काम हो सकता है। चलिए हिन्दी संस्थान ने शुरुआत तो की।
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल …असल में हमने अपनी भाषा के श्रेष्ठता का जितना बखान किया है, अगर उसका एक अंश भी अगर वाकई इसे बेहतर बनाने में किया होता तो स्थिति आज इतनी बुरी नहीं होती.हमारी संस्थाएं और संस्थान उतना नहीं कर पाए हैं जितना उनको करना चाहिए. लोगों का ज़्यादा ज़ोर सर्जनात्मक साहित्य, और उसमें भी कविता लिखने पर है.
बालसुब्रमण्यम ...हमारे यहां पुराने विद्वान कंप्यूटर के मामल में अंगूठा छाप हैं, और नई पीढ़ी के लोग अंग्रेजी से इतने प्रभावित हैं, कि उनके लिए हिंदी का मतलब रोमन में लिखा हिंगलिश ही है। शब्दकोश रचना उनके बस की बात नहीं है।शब्दकोश निर्माण श्रम और व्यसाध्य काम है और कोई सर्वांगीण शब्दकोश निर्माण किसी संस्था के बस की ही बात है। दिनेशराय द्विवेदी... भारत में पढ़ने और बोली जाने वाली भाषाओं के एक संयुक्त नागरी कोष की महति आवश्यकता है। यह भारतीय भाषाओं को समीप लाने और हिन्दी को समृद्ध करने का काम करेगा। इस काम को कोई दल ही मिल कर कर सकता है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान को इस विषय में किसी परियोजना को मूर्त रूप देना चाहिए।
RDS..दोष तंत्र का है। शोधार्थियों को तंत्र रुकावट न डाले तो इस देश में भी विदेशियों से बेहतर शब्दकोष , विज्ञान के बेहतर शोध संभव हैं। वैसे इधर शोध के क्षेत्र में जुनूनी लोग भी नगण्य ही समझें।

बड़े-बड़े शब्दकोश भी सिर्फ भार बनकर रह जाएंगे क्योंकि उनमें सुरक्षित शब्द संपदा को हम प्रचलन से बाहर कर चुके होंगे। संचार माध्यमों की अभिव्यक्ति अब कितनी दरिद्र हो चुकी है उसकी मिसाल असरदार जैसा बेहतर और आसान शब्द होने के बावजूद असरकारक जैसा शब्द गढ़ने और उसके इस्तेमाल में नज़र आती है। अफ़सोसनाक की बजाय अफ़सोसजनक छपा देखना विडम्बना है। बेहतर है खेदजनक शब्द का इस्तेमाल कर लिया जाए। ऐसे प्रयोग बोलचाल में धकाए जा सकते हैं, मगर इनका मुद्रित रूप भाषा के प्रति खुली अनुशासनहीनता को बढ़ावा देता है।
खुद को आधुनिक माननेवालों को शायद पता नहीं कि हिन्दी के प्रति उनका यह बर्ताव भी भदेसपन की श्रेणी में ही गिना जाएगा। शहरी भद्रलोक में यह भाषायी देहातीपन इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि लोगो नें शब्दों को लेकर कोश देखना बंद कर दिया है। लोग यह मानकर चलते हैं कि वे जो कुछ लिख-बोल रहे हैं, वह सत्य है या फिर साथी से पूछ कर वे खुद को दुरुस्त करते हैं चाहे बतानेवाला खुद भी गलत क्यों न हो। अक्सर आप्रवासी को अप्रवासी लिखा जाता है। कई लोगों को ये दोनों शब्द हमने लिख कर दिए और कहा कि सही पर निशान लगा दीजिए, अफ़सोस की बात है कि ज्यादातर ने अप्रवासी को ही सही चुना। जब आप्रवासी ही अप्रवासी है तो उसे प्रवास करने की ज़रूरत क्यों पड़ी यह समझाने में हमें सिर्फ एक मिनट लगा, और वे समझ गए। उपसर्ग में ‘सहित’, ‘सीमा सूचक’ या ‘से लेकर’ जैसे अर्थ शामिल हैं। प्रवासी के साथ इसके जुड़ने से बनता है आप्रवासी जिसका अर्थ होता है बाहर से आकर किसी अन्य देश में बसना अर्थात इमिग्रैंट। जब इसके साथ भारतीय विशेषण लगता है तो स्पष्ट है कि भारत से जाकर कहीं और बसनेवाले हिन्दुस्तानियों की बात हो रही है। इसके विपरीत उपसर्ग में रहित या विलोम का भाव होता है। इस तरह अप्रवासी का अर्थ हुआ जो प्रवासी नहीं है। अभयारण्य को अक्सर अभ्यारण्य लिखा जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि हम कोश को देखने की ज़रूरत से ऊपर उठ चुके हैं।
भाषा वह माध्यम है जिसने मनुष्य जाति को अभिव्यक्ति की ऐसी विरल और निराली सुविधा दी है जो किसी अन्य प्राणी के पास नहीं है। मगर खुद को अभिव्यक्त करने के इस जरिये को हम लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। खाने में कंकर की उपस्थिति को तुरंत अनुभव करनेवाली रसेन्द्रियों जैसी सजगता का कर्णेन्द्रियों से लुप्त होते जाना चिंताजनक है। सही बोलनेवाला ही सही लिख सकता है। घर से लेकर टीवी तक अशुद्ध हिन्दी सुनने के आदी लोगों से सही लिखने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। मज़े की बात यह कि इन्ही में से आते हैं वे तमाम लोग जो संचार माध्यमों में अपना उज्जवल भविष्य  देखते हैं। टीवी चैनलों के मीडियाकर्मियों को शायद इस बात का एहसास नहीं है कि जिस हिन्दी के बूते वे इस सशक्त माध्यम पर वे तगड़ी छान रहे हैं, उसी के बूते करोड़ों हिन्दीवालों को भाषा का सही संस्कार भी दे सकते हैं, बशर्त वे खुद पहले सही बोलना सीख लें।

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Sunday, July 5, 2009

हिन्दी में शब्दकोशों की कमी

logo रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार केंद्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित भोजपुरी-हिन्दी-इंग्लिश शब्दकोश के बहाने से कुछ हिन्दी की बात। इस कोश के प्रधान संपादक अरविंदकुमार हैं। संस्थान हिन्दी की 48 बोलियों में इस तरह के कोश निकालने की परियोजना पर काम कर रहा है जो हिन्दी की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने की दिशा में महती कदम है।

हि न्दी में अच्छे कोश उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। हमारे यहां ज्ञान और भाषा को समृद्ध करने में कोशों की ज़रूरत वैसा महत्व नहीं पा सकी जैसा यूरोपीय समाज में है। कईCover_Bhojpuri Hindi-English लोगों के लिए हैरत की बात हो सकती है कि आज से डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज भारत में रेलवे लाईन बिछाने का साथ-साथ भारतीय भाषाओं का सर्वे भी कर रहे थे और कोश बना रहे थे। सिर्फ शब्दकोशों की बात कर लें तो हिन्दी से हिन्दी के शब्दकोश तो अब कई हैं मगर ज्यादातर में पूर्वी बोलियों के उच्चारण वाले शब्दों का ही संकलन है क्योंकि शुरुआत से ही हिन्दी शब्दकोशों का गढ़ बनारस रहा है। आज हिन्दी का जो रूप है उसे देखते हुए ऐसा शब्दकोश ज़रूरी लगता है जिसमें वे तमाम शब्द हों जो मौजूदा हिन्दी भाषी परिवेश खासतौर पर नागर समाज के लिए उपयोगी हो। यह समाज कलकत्ता, पटना, दिल्ली, भोपाल, पुणे से लेकर चेन्नई, बेंगलुरू, श्रीनगर, देहरादून, जयपुर, गौहाटी, रायपुर, भुवनेश्वर जैसे शहरों में रहता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि शब्दकोशों का महत्व शहरी समाज के लिए ही अधिक है।
हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दकोशों की बेहद कमी है। कोई भाषा प्रेमी अगर हिन्दी के जरिये अन्य देशी-विदेशी भाषाओं का ज्ञान बढ़ाना चाहे तो यह मुमकिन नहीं। जबकि यही काम वह अंग्रेजी के जरिये कर सकता है। हिन्दी भाषियों की विशाल संख्या को देखते हुए  भारत की सभी प्रमुख भाषाओं के शब्दकोश देवनागरी में आ जाने चाहिए थे जैसे तमिल हिन्दी, तेलुगू हिन्दी, गुजराती… मगर तलाशने पर ये नहीं मिलते। इन राज्यों में रहने वाले अपने तमाम संबंधियों-मित्रों से मै लगातार आग्रह करता रहता हूं। मगर अभी तक सफलता नहीं मिली। मराठी भाषा को बेहतर समझने के लिए मुझे मराठी-हिन्दी शब्दकोश आजतक नहीं मिल सका जबकि मराठी तो देवनागरी पर ही आधारित है। ऐसा नहीं कि इन भाषाओं में कोश निकले नहीं होंगे। ज़रूर निकले होंगे, मगर एक औपचारिकता की तरह। उसके बाद इनकी सुध नही ली गई होगी। शोधार्थियो, स्वप्रेरित-छात्रों को इस क्षेत्र में निराशा ही होती रही है

भोजपुरी-हिन्दी शब्दकोश-खुशी की बात है केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। संस्थान ने हिन्दी परिवार की 48 बोलियों की शब्द-संपदा को सहेजने की महती परियोजना शुरू की है जिसके प्रधान संपादक हैं सुप्रसिद्ध कोशकार अरविंदकुमार जिनके नेतृत्व में फिलहाल सात बोलियों- भोजपुरी, ब्रजभाषा, बुंदेली, मालवी, अवधी और छत्तीसगढ़ी के शब्दकोश gview1बनाने का काम चल रहा है। इस योजना के अंतर्गत क्षेत्रीय बोलियों के शब्दकोशों के कुल 48 खंड प्रकाशित होने हैं। इस परियोजना का परिचय देते हुए पुस्तक के कवर पर लिखा गया है कि हिन्दी की कई बोलियां, उपभाषाएं और भाषाएं सकटग्रस्त और लुप्त हो रही हैं। इनके साथ अद्भुत नाद और अर्थ सौन्दर्य वाले शब्द भी गुम होते जा रहे हैं। यदि आगामी 10-15 वर्षों में इनकी सुध नहीं ली गई तो इन्हें हम हमेशा के लिए खो देंगे।  इसे देखते हुए कतिपय बोलियों / भाषाओं / उपभाषाओं के लोक-शब्दकोशों के प्रकाशन / डिजीटलीकरण और इंटरनेट पर उपलब्ध कराने की योजना है जिससे न सिर्फ हिन्दी के विशाल शब्दभंडार का संरक्षण होगा बल्कि हिन्दी की सांस्कृतिक जड़ें भी पुष्ट होंगी। इस कड़ी की पहली प्रस्तुति भोजपुरी-हिन्दी-इंग्लिश लोक शब्दकोश के नाम से इसी सप्ताह प्रकाशित हो चुकी है। कोश का मूल्य 275 रुपए है और इसे केंद्रीय हिन्दी संस्थान ने ही प्रकाशित किया है। इसे प्रकाशन विभाग, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा-282005 के नाम से 375 रुपए का बैंक ड्राफ्ट भेज कर मंगाया जा सकता है।

या खास पुस्तकालयों की शरण में जाकर धन, श्रम और समय का निवेश करना पड़ा है। जब भारतीय भाषाओं की यह दशा है तो विदेशी भाषाओं की तो बात ही अलग है। होना तो यह चाहिए कि हिन्दी में जिन पड़ोसी भाषाओं की महक समायी है, उन सभी भाषाओं के शब्दकोश देवनागरी में उपलब्ध होने चाहिए, मसलन  तुर्की-हिन्दी, अरबी-हिन्दी, फारसी-हिन्दी आदि। इसका लाभ यह होगा कि अभी तक विदेशी भाषाओं से आए शब्दों की संख्या अनुमानित तौर पर ही बताई जाती है, उसका सही हिसाब मिल सकेगा। मसलन अरबी-फारसी से हिन्दी में आए शब्दों की संख्या करीब 6000 है या पुर्तगाली शब्दों की संख्या 100 के आसपास है। जब कोश परियोजना पर काम होगा तो संभव है यह संख्या कहीं ज्यादा निकले। इससे कई स्तरों पर लाभ होगा। भारत के विभिन्न क्षेत्रों स भाषाओं के जरिये विकसित सांस्कृतिक संबंधों को समझने में मदद मिलेगी। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का भला होगा।  हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश ज़रूर इस मामले में अपवाद कहे जा सकते हैं क्योंकि इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
जो महत्वपूर्ण काम भाषाओं के क्षेत्र में हुआ है उनमें से काफी बड़ा हिस्सा विदेशी विद्वानों के खाते में जाता है। जब तक भारत में उनके शोध चले या प्रकारांतर से भारत उपनिवेश रहा, यह काम भी सहज सुलभ रहा। इस दिशा में भारतीय विद्वानों ने भी बहुत काम किया पर कोश के क्षेत्र में काफी सूखा है। (अगली कड़ी में जारी)

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Saturday, July 4, 2009

उत्सव का अवसाद, पीड़ा का पर्वत

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र्वों और उत्सवों में जहां हर्षोल्लास समाया है वहीं इनके साथ श्रम और थकान भी जुड़ी है। जयशंकर प्रसाद ने तो इससे भी आगे उत्सव के बाद अवसाद को अनिवार्य माना है। यह सच भी है। तीज-त्योहारों की वेला बीतने के बाद हर्ष की अनुभूति ज्यादा नहीं टिकती बल्की उदासी और शून्य का अहसास भीतर समाने लगता है जिसे प्रसाद ने अवसाद कहा है।
त्सव का सामान्य़ अर्थ होता है आनंद की घड़ी, खुशी का अवसर, कामना इच्छा आदि। यूं पर्व और त्योहार के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है किन्तु पर्व और त्योहारों का रिश्ता जहां किन्हीं तारीखों और काल विशेष से जुड़ा होता है साथ ही धार्मिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण हो जात हैं वहीं उत्सव का अर्थ इनसे व्यापक है और हर्ष प्रकट करने के किसी भी सार्वजनिक मौके को उत्सव कहा जा सकता है। उत्सव बना है उद्+सू धातुओं के मेल से। उद् धातु में श्रेष्ठता, उच्चता, ऊपर उठना, खोलना, फुलाना, मुक्ति आदि भाव समाए हैं।

... आनंद का अतिरेकी उल्लास जब छलक पड़े वहीं उत्सव है... 610x

सू धातु में फल देने वाला, पैदा करनेवाला या उत्पन्न करनेवाला जैसे भाव हैं। भाव यही है कि दैनंदिन जीवन में होने वाले अनुभवों से ऊपर उठकर जो आचार-व्यवहार किए जाएं वह उत्सव है। डॉ राजबली पाण्डेय ऋग्वेद के हवाले से उत्सव शब्द का भाव बताते हैं-‘ऊपर उफन कर बहना’ अर्थात आनंद का अतिरेक। जाहिर है उत्सवों पर हर्षोल्लास उमड़ पड़ता है और यह सामूहिकता में होता है इसीलिए उत्सव के साथ खान-पान-गान, उपहार-सम्मान, दान-पुण्य आदि संस्कार जुड़े हैं।
सी कड़ी में आता है त्योहार शब्द। यह बना है तिथि+वार से। क्रम कुछ यूं रहा-तिथिवार > तिहिवार > तिहवार > तिवहार > त्योहार। इसका सम्बंध चंद्रकलाओं से है। तिथि शब्द बना है अत+इथिन से। अत् शब्द का अर्थ होता है घूमना, चक्कर लगाना, फिरना  और वार का मतलब होता है दिन। चंद्रमा की कलाएं चंद्रगतियों की वजह से ही होती हैं। दुनियाभर की संस्कृतियों में समय की गणना मनुष्य ने चंद्रमा के घूमने की आवृत्ति को ध्यान में रखकर ही की है। इस तरह तिथि का अर्थ हुआ चांद्रदिवस अर्थात वे दिन जब चंद्रमा आसमान में नज़र आता है। शुक्लपक्ष में ही अधिकांश पर्व आते हैं क्योंकि हमारी संस्कृति में अग्नि को ही आदिदेव माना गया है। अग्नि ही प्रकाशस्रोत है इसलिए शुक्लपक्ष को पवित्र और मांगलिक मानने के सहज निष्कर्ष पर प्राचीनकाल से ही मानव पहुंच चुका था। अक्सर मुहावरे के तौर पर तीज-त्योहार कहा जाता है। यहां तीज का अर्थ तृतीया से है अर्थात शुक्लपक्ष का तीसरा दिन।
त्सव, त्योहार या धार्मिक अवसरों का ही एक अन्य का एक अन्य महत्वपूर्ण अर्थ है पर्व। इसका संबंध गांठ, जोड़ या संधि जैसे अर्थों से है। प्राचीनकाल में सभी प्रमुख धार्मिक तिथियां ग्रहों की स्थितियों के आधार पर तय की जाती थीं। जैसे सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण। पूर्णिमा अथवा अमावस्या की समाप्ति। ऐसे संधिकाल को ही पर्वसंधि कहा गया । इन तिथियों पर पुण्यकर्म अथवा मांगलिक कार्य तय किये जाते थे। बाद में ये अवसर पर्व यानी त्योहार के अर्थ में प्रचलित हो गए।
ज्यादा मेहनत के बाद थकान की स्थिति का बखान करते वक्त आमतौर पर पोर-पोर दुखने का मुहावरा सुनने को मिलता है। पोर-पोर का अर्थ होता है एक- एक जोड़ में दर्द होना। थोड़ा और विस्तार में जाएं तो कह सकते हैं कि पर्व की मस्ती में चूर होने और पर्वतारोहण की मेहनत के बाद स्वाभाविक है कि शरीर का पोर-पोर दुखे अर्थात
Pain -----------------    पर्व की मस्ती में चूर होने और पर्वतारोहण की मेहनत के बाद स्वाभाविक है कि शरीर के पोर-पोर में पीड़ा रहे…..          
पोर-पोर, पर्व और पर्वत तीनों शब्दों के बीच रिश्तेदारी है। मगर ये अनायास नहीं है बल्कि इसलिए है क्योकि इनका जन्म एक ही मूल से हुआ है और अर्थ लगभग समान है। संस्कृत की मूल धातु पर्व् से इनका निर्माण हुआ है जिसके मायने हैं गांठ , जोड़ या संधि। हिन्दी में पहाड़ के लिए पर्वत या देशी बोलियों में परबत शब्द आम है। इसका जन्म भी इसी प्रक्रिया के तहत हुई है। गौर करें कि जोड़ या गांठ जहां भी होती है वह स्थान कुछ उभरा हुआ, खुरदुरा या ऊबड़-खाबड़ होता है। इसी आधार पर पहाड़ी उभारों के लिए भी पर्व की कल्पना की गई और नया शब्द बना पर्वत। चूंकि पहाड़ों में सर्वोच्च हिमालय है इसलिए इसीसे उसके लिए वैकल्पिक शब्द बने पर्वतराज, पर्वतपति या पर्वतेश्वर। पुराणों में हिमालय की पुत्री के लिए पार्वती नाम इसी से बना। बाद में पहाड़ों से निकलने के कारण नदियों के अनेक नामों में एक नाम पार्वती भी जुड़ गया।
सी तरह शरीर के संधि स्थल को भी पर्व कहते हैं जैसे घुटना , कहनी, कंधा आदि। इसीलिए लोकबोली में जोड़ के लिए पोर-पोर शब्द चल पड़ा। जोड़ या संधि के अर्थ में ही किसी पुस्तक या ग्रंथ के अध्याय को भी पर्व कहते हैं। गौर करें कि महाभारत में विभिन्न अध्यायों के नाम के साथ भी पर्व शब्द का प्रयोग हुआ है जैसे द्रोण पर्व, भीष्म पर्व।  [नए संदर्भों के साथ संशोधित पुनर्प्रस्तुति]

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Friday, July 3, 2009

कौन धाम, कहां के वासी?

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गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था।
हकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम, निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम
श्रय के अर्थ में भारतीय मनीषा में धाम शब्द का बड़ा महत्व है। धाम का मोटा अर्थ यूं तो निवास, ठिकाना, स्थान आदि होता है मगर व्यापक अर्थ में इसमें विशिष्ट वास, आश्रम, स्वर्ग सहित परमगति अर्थात मोक्ष का अर्थ भी शामिल है। आश्रय के अर्थ में धाम शब्द का प्रयोग चारों तरफ नज़र आता है। जैसे पावन धाम, परम धाम आदि। निवास, कुटीर की तर्ज पर ही धाम शब्द का भी प्रयोग लोग करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आध्यात्मिक-धार्मिक संस्थानों के भवनों के साथ धाम शब्द का प्रयोग अधिक होता है जबकि सामान्य आवासीय स्थापत्य के लिए निवास, आवास अथवा कुटीर शब्द का इस्तेमाल होता है।
धाम इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की dome/domu धातुओं से इसकी रिश्तेदारी है जिनका अभिप्राय निर्माण से है। संस्कृत धातु धा इसके मूल में है जिसमें धारण करना, रखना, रहना, आश्रय जैसे भाव शामिल हैं। मां के लिए धात्री शब्द में शिशु के पालन का, संरक्षण का भाव उभर रहा है। पृथ्वी हम सबकी पालनहार है। सभी प्राणी पृथ्वी से जन्मे हैं इसीलिए उसे वसुधा कहा जाता है। वसु का अर्थ होता है धन दौलत अथवा समृद्धि। पृथ्वी के गर्भ में जितनी दौलत समायी है इसीलिए उसे वसुमति अथवा वसुधा कहा गया है। गर्भस्थ शिशु भी स्त्री के लिए दौलत होता है इसीलिए वसु शब्द का अर्थ शिशु भी होता है। जन्म देने के बाद संतान ही माँ के लिए ऐश्वर्य समान होती है। डॉ राजबली पांडेय के हिन्दू धर्मकोश के मुताबिक शास्त्रों में एक धामव्रत भी होता है जो फाल्गुन की पूर्णमासी से तीन दिनों तक होता है। इसके तहत एक गृहदान करना होता है। धाम का देवता सूर्य माना जाता है अतः एक तरह से यह सूर्योपासना व्रत है जिसका उद्धेश्य सद्गति ही है। आस्तिकों की निगाह में स्वर्ग ही परमधाम है सो धामव्रत में एक घर बनवा कर दान करने से संभवतः वैकुण्ठलोक में आरक्षण की गारंटी मिल जाती होगी।
यूरोपीय भाषाओं में dome/domu मूल से कई शब्द बने हैं। गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था। सर्वप्रथम जो छप्पर मनुष्य ने बनाया वही डोम था। बाद में स्थापत्य कला का विकास होते होते डोम किसी भी भवन के मुख्य गुम्बद की अर्थवत्ता पा गया मगर इसमें मुख्य कक्ष का आशय जुड़ा है जहां सब एकत्र होते हैं। प्राचीनकाल में बने आश्रय एक कक्षीय ही होते थे। पूरा कुनबा उसमें ही रहता था। जब कई प्रकोष्ठों वाले आवास बनने लगे तब भी एक विशिष्ट कक्ष की ज़रूरत बनी रही जहां पुराने समय की तरह सब एक साथ वक्त गुज़ार सकें। यह परिपाटी आज भी हर भवन के हॉल या मुख्य कक्ष के रूप में विद्यमान है जिसे बैठक कहते हैं। यह बैठक याद दिलाती है कि

... स्वर्ग ही परमधाम है सो धामव्रत में एक घर बनवा कर दान करने से संभवतः वैकुण्ठलोक में आरक्षण की गारंटी मिल जाती होगी। ... 25838kailash_mansarovar_yatra

यहां कभी संयुक्त परिवार ही विराजता था जिसे आज सिर्फ अतिथियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
धाम से ही जुड़ा है अंग्रेजी का डोम dome शब्द जो मूल रूप से ग्रीक .doma से आया है। आज भारत में सरकारी-प्रशासनिक क्षेत्रों सहित समाज के मध्यवर्गीय तबके में भी डोमेस्टिक domestic शब्द सुनाई पड़ता है जिसके व्यापक अर्थ हैं मगर वे सभी किसी न किसी रूप में एक हद, दायरा या आंतरिकता से जुड़ते हैं जिनका घर या निवास-क्षेत्र जैसी व्यवस्था से गहरा संबंध है। गौर करें इसके कुछ मायनों पर- घरेलु, क्षेत्रीय, पारिवारिक, आपसी, देशी, आंतरिक, पालतू, निजी, कुटुम्बी, गृहस्थी वगैरह। अंग्रेजी का डोमेस्टिक बना है लैटिन के डोमेस्टिकस से जिसमें स्वामित्व अथवा गृहस्थी संबंधी भाव हैं। इसी तरह एक और शब्द है डोमैन जिसका अर्थ इलाका, क्षेत्र आदि होता है। यह भी इसी मूल का है। लैटिन के डोमस शब्द में घर का भाव है। इससे बने डोमिनस का मतलब होता है स्वामी, मालिक, ज़मींदार, भूपति, गृहपति, राजा आदि। डोमिनस से ही डोमेस्टिक, डोमेन आदि शब्द बने हैं। अंग्रेजों के ज़माने में ब्रिटिश उपनिवेशों को डोमिनियन स्टेट कहा जाता था जिसका अर्थ अंग्रेजों द्वारा शासित इलाकों से ही था। रूसी भाषा में भी दोम शब्द है जिसका अर्थ घर होता है। लिथुआनी भाषा में दिमस्तिस का मतलब होता है बाडा या घिरा हुआ संरक्षित क्षेत्र।
गौर करें कि अंग्रेजी में घर के लिए होम home शब्द है। इसका विकास हुआ है पोस्ट जर्मनिक धातु khaim से जिसका अर्थ है घर, निवास। इसी से मिलता-जुलता शब्द है ग्रीक भाषा का कोम kome जिसमें घिरे हुए स्थान अथवा आश्रय का भाव है। ग्रीक के doma से इसकी सादृश्यता पर गौर करें। लिथुआनी में kaimas शब्द का अर्थ होता है ग्राम। ध्यान रहे प्राचीन मानव बस्तियां एक ही वंश या परिवार का समूह होती थीं सो ग्राम शब्द में परिवार का ही भाव है। पोस्ट जर्मनिक के khaim शब्द की तुर्क-मंगोल मूल के ख़ेमा शब्द से समानता पर गौर करें जिसमें तम्बू, पड़ाव या टेंट का भाव है।

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Thursday, July 2, 2009

क़ुदरत की क़द्र से तक़दीर का रिश्ता

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म बोलचाल में भाग्य के अर्थ में तक़दीर शब्द का इस्तेमाल भी होता है। यह सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द है और अरबी से हिन्दी में आया है। तक़दीर इस्लामी धर्मशास्त्र के एक प्रमुख पारिभाषिक शब्द कद्र (क़दर) से आया है जिसका अर्थ होता है ईश्वरीय न्याय, कृपा अथवा विधान।
मुस्लिमों में रमज़ान से पहले एक पर्व आता है जिसे शबे-कद्र कहते हैं जिसका अर्थ हुआ क़द्र की रात अर्थात ऐसी रात जब ईश्वर अपने बंदों पर कृपालु होता है। मान्यता है कि इस मौके पर रात भर जाग कर इबादत करने से खुदा अपनी नेमतें देता है। क़द्र बना है अरबी धातु क़दारा से जिसका अर्थ होता है मूल्यांकन करना, जांचना, परखना। इसके बारे में कहा जाता है कि खुदा क़द्र की रात यह जांचता-परखता है कि उसकी बनाई सृष्टि में सब कुछ उसके विधान के अनुसार चल रहा है, इसी वजह से क़द्र में परख का भाव जुड़ा। हिन्दी में भी क़द्र या क़दर शब्द का प्रयोग आमतौर पर इज्ज़त, आदर, परख, सम्मान सत्कार, आवभगत के रूप में होता है। जाहिर है यह भाग्य है। जो क़द्र करता है वह क़द्रदां अर्थात पारखी है। स्पष्ट है कि जिसकी क़द्र हो वह भी भाग्यशाली है और जो पारखी है वह भी क़िस्मतवाला है। क़द्रदां अरबी का नहीं बल्की फारसी का शब्द है और अरबी क़द्र में दाँ प्रत्यय लगने से बना है। फारसी का बे उपसर्ग लगने से बेक़द्री शब्द भी इससे बना जिसका मतलब असम्मान या अवमानना माना जाता है।
क़द्र का ही एक रूप है क़ुद्र जिससे बना है कुद्रत। हिन्दी में यह कुदरत के तौर पर इस्तेमाल होता है। कुदरत का अर्थ सृष्टि, प्रकृति, संसार होता है। इसमें सामर्थ्य, शक्ति, माया, समृद्धि सब शामिल है। जाहिर है जो कुछ भी प्रकृति में शामिल है सब कुदरत है। भाव यही है कि ईश्वर के द्वारा रचा गया सृजन ही कुद्रत(क़ुदरत) कहलाता है। हर धर्म में प्रकृति को ईश्वर का रूप बताया गया है, क्योंकि इसकी रचना उसी सर्वशक्तिमान ने की है। ईश्वर द्वारा जो कुछ भी हमें दिया गया है, वही हमारा भाग्य है। हमारे भाग यानी हिस्सा ही हमारा भाग्य होता है। इस तरह देखें तो कुदरत यानी प्रकृति ही हमारा भाग्य है…तक़दीर है। खुदा की बनाई क़ुदरत की क़द्र अगर इनसान नहीं करेंगे तो खुदा अपने बंदों की क़द्र कैसे करेगा? कुदरत के मायने यह भी हैं कि प्रभु ने मनुष्य को सोचने-समझनेवाला बनाया, उसे भावनाएं दीं, उसे दिमाग़ दिया, दया दी, ममता दी। क्या इन क़ुदरती गुणों कों
...खुदा की क़ुदरत की क़द्र अगर इनसान नहीं करेंगे तो खुदा अपने बंदों की क़द्र कैसे करेगा...
हम सहेज पा रहे हैं? अगर हां, तो यह हमारा भाग्य है और नहीं तो दुर्भाग्य!!!! शबे-क़द्र पर अल्लाह खै़रात बांटने तो नहीं निकलते होंगे। यक़ीनन उनके पास हर चीज़ का हिसाब रहता होगा। हिन्दी में क़ुदरत का प्रयोग भी भाग्य की तर्ज पर ही होता है जैसे खुदा की कुदरत। यहां अभिप्राय ईश्वर के विधान या इच्छा से है।
सी शब्द श्रंखला से बने हैं अरबी के क़दीर या क़ादिर जैसे शब्द जो मुस्लिम समाज में पुरुषों के लोकप्रिय नाम हैं। क़दीर/क़ादिर का मतलब होता है समर्थ, सामर्थ्यवान, योग्य, लायक, शक्तिमान, प्रभावशाली अर्थात ईश्वर। इसी क़दर के साथ अरबी का ता उपसर्ग लगने से बनता है तक़दीर जिसका स्पष्ट रूप से मतलब निकलता है भाग्य अथवा क़िस्मत। मुसलमानों में एक उपनाम या पंथ होता है क़ादरिया जो सूफ़ी होते हैं। भारत में भी क़ादरी (क़ादिरी) या क़ादरिया होते हैं। इस सम्प्रदाय की शुरुआत ईरान के जीलान में करीब एक हजार साल पहले जन्में शेख़ अब्दुल कादिर जिलानी बग़दादी (1078ई -1166ई) से मानी जाती है जो सूफियों में सर्वाधिक आदरणीय माने जाते हैं और उन्हें पीराने-पीर, गौसुल-आज़म और पीर-दस्तगीर जैसी पदवियां दी गई हैं। भारत में क़ादरिया सम्प्रदाय की शुरुआत मौहम्मद गौ़स से मानी जाती है जो चौदहवीं सदी में यहां आए।

संबंधित कड़ियां-1.कमबख्त को बख्श दो भगवान.2.सबका भाग्यविधाता कौन?.3.सुख भी भोगो, दुख भी भोगो.4.क़िस्मत क़िसिम-क़िसिम की

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Tuesday, June 30, 2009

मुंडन और चाचा की शादी [बकलमखुद-89]

logo baklam_thumb[19] दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, dinesh r आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और नवासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

ताते-बताते सरदार चूक गया। मुन्नी जिज्जी का ब्याह तो अगले साल जब वह तीसरी पास कर चुका था तब हुआ था। उस साल तो गर्मी में मोहन चाचाजी का ब्याह हुआ था और उस से पहले सर्दी में मुंडन भी हो चुका था। राखी के दूसरे दिन जब उस का पांचवां जन्म दिन था तभी दाज्जी ने घोषणा कर दी थी कि उस का मुंडन इसी साल होगा। छठे साल में मुंडन नहीं हो सकता। सातवें साल तक बहुत देर हो चुकी होगी। इतनी उम्र तक तक गर्भ के बाल रखना ठीक नहीं है। संक्रांति के बाद मुंडन का मुहूर्त तय हो गया। बारां से कोई सौ किलोमीटर उत्तर में पीपल्दा तहसील का डूंगरली ग्राम, जहाँ कोई सोलह फुट ऊंचे एक चबूतरे पर हनुमान जी की आदमकद मूर्ति थी। यहीं मुण्डन होना था। वहाँ तक जाने के लिए पीपल्दा के आगे सड़क नहीं थी। आगे खेतों में हो कर ही जाना होता था। सूखणी नाम की एक बारहमासी नदी बहती थी जो घूम फिर कर पीपल्दा और डूंगरली के बीच तीन बार आ जाती थी। सर्दियों में खेत खाली रहते, जिन में हो कर बस जा सकती थी। बाराँ से वहाँ तक जाने के लिए एक बस ठीक कर ली गई।
रदार के मन में बहुत कुछ चल रहा था। बचपन से सिर के बाल जूड़े में बंधे रहते थे। जिस ने उसे सरदार बना दिया था। सिख सरदारों की सारी चिढ़ें उसे झेलनी पड़ती थीं। हर कोई कभी भी बारह बजा देता था। पर इस से उसे एक विशिष्टता मिली थी। इस विशिष्टता के कारण बालों से एक तरह का मोह हो गया था। दशहरे पर या जब भी कोई जीवंत झाँकी बनानी होती, तुरंत मेकप कर राम बना दिया जाता। जो उसे अच्छा लगता था। राम उस की सब से प्रिय कहानी के नायक जो थे। अब उन बालों के कटने और सिर गंजा हो जाने के सोच से रुलाई फूट पड़ती थी। लेकिन जब वह दूसरे बच्चों को देखता, तो सब के करीने से कटे हुए अंग्रेजी ढंग के बाल। कोई झंझट नहीं, बस नहाए, बालों को तेल लगाया, कंघी की और झट तैयार। खुद भी नहा सकते थे। अभी तक तो अम्मा या कोई और ही इस काम को करता था। फिर बाल संवार कर जूड़ा बंधवाने के लिए दूसरे के भरोसे। अम्माँ को कोई काम आ गया तो बस बालों को बिखेर कर बैठे रहो। सोचते सोचते सरदार के बालों से विरह की रुलाई रुक जाती। सोचता कि फिर वह भी औरों की तरह दूसरों के भरोसे न रहेगा, अपने बहुत से काम खुद करने लगेगा। आखिर वह दिन नजदीक आ गया।
सुबह ही बस बारां से रवाना हुई, बारह बजते-बजते डूंगरली पहुँच गए। सब से पहले सरदार ने चाचा जी के साथ हनुमान जी के दर्शन किए। हनुमान जी बहुत बड़े थे, एक हाथ कमर पर, दूसरा सिर पर और एक पैर के नीचे कोई उकडूँ हो कर दबा हुआ। जैसे किसी राक्षस को मार कर उस की जीत पर नृत्य कर रहे हों। फिर बुआ उसे मंदिर से नीचे ले आई। वहाँ नाई कैंची ले कर तैयार था। उस क्षण सरदार को नाई उसी राक्षस की तरह लगा जिसे पैर के नीचे दबा हनुमान जी नृत्य कर रहे थे। वहाँ पिता जी के सांगोद के साथी चम्पाराम जी चौबे कैमरा ले कर हाजिर थे। यह कैमरा उन्हें विशिष्टता प्रदान करता था। सरदार से विशेष स्नेह के कारण वे उस के हर जन्मदिन  पर बाराँ आते थे। उन्हों ने बुआ के साथ एक फोटो खेंचा। उस के बाद नाई ने बिठा कर कैंची से सारे बाल उतार डाले। बाद में
ब्लागजगत के वकीलसाब बचपन में सरदार थे। सफर के पाठकों के लिए उन्होंने कुछ खास चित्र भेजे हैं। sardar copy-2
बुआ ने सिर पर गीली हल्दी का लेप कर दिया।
नुमान जी की पूजा की गई, हवन हुआ और उस के बाद साथ आए सभी मेहमानों ने सरदार को कपड़े पहनाए। उन में एक मखमल का पाजामा, मेहरून रंग का कोट था और गोल टोपी थी। तीनों पर सलमे-सितारे जड़े थे। वह कीमती पोशाक वहाँ से दो किलोमीटर दूर स्थित खेड़ली-बैरीसाल की जागीर के जमींदार के यहाँ से आई थी, जिन्हें इलाके के लोग राजा साहब कहते थे। सरदार के परदादा राजा के पुरोहित थे। दादा जी के एक रिश्ते के भाई अब भी यही काम करते थे। वह पोशाक सरदार को पहना दी गई, बालों की विदाई का सारा रंज जाता रहा। इस के बाद भोजन शुरू हो गया जिस के निपटते निपटते रात हो गई। कोई नौ बजे बस वापस रवाना हुई। सड़क तो थी नहीं ऊपर से रात का अंधेरा। बस खेतों में रास्ता भूल गई। जिधर जाती उधर सूखणी नदी आ जाती और उसे पार करने का रास्ता नदारद। थक हार कर ईंधन समाप्त होने के भय से बस को खड़ा कर दिया गया। सुबह जब प्रकाश होने लगा तो रास्ता तलाश कर बस ने पीपल्दा पहुँच कर सड़क पकड़ी। दोपहर होते-होते बारां पहुँचे।
केश विदा हो चुके थे। लेकिन सर गंजा हो गया था। नाई ने इस बेतरतीबी से उन्हें काटा था कि कहीं बाल दिखते थे तो कहीं गंजा सिर, हाथ बार-बार सिर पर जाता। दो दिन बाद दाज्जी की निगाह उन पर पड़ गई थी। दोपहर में नाई को बुलवा कर सिर पर उस्तरा चलवा दिया। जिस से सर बिलकुल साफ हो गए। गंजा सिर अच्छा नहीं लगता था तो सरदार अक्सर टोपी पहने रहता। गर्मियों में मोहन चाचा जी की शादी आ गई। बारात कोटा जानी थी। होने वाली चाची चाचा की तरह ही बीए पास थी। सरदार को यह अच्छा लग रहा था। ‘बा’ तो बिलकुल अनपढ़ थीं। अम्मा भी चार कक्षा ही पढ़ी थी। दादा जी भी बहुत प्रसन्न थे, उन्हें पढ़े लिखे लोग बहुत अच्छे लगते थे। वे लोगों को कहते -मोहन की लाडी (दुल्हन) बी.ए. का इम्तहान दे रही है। बारात में कोटा पहली बार देखा। वहाँ जगह-जगह पानी के खूबसूरत नल देखे, जिन से चौबीसों घंटे पानी आता। बारात नगर बीच की सुंदर धर्मशाला में दो दिन रुकी। पास ही चाची का घर था।
शादी हो गई, चाची आ गई। वह बहुत गोरी और सुंदर थीं। सरदार को बहुत प्यार से बुलाती, बात करतीं। सरदार भी बस हर दम चाची-चाची कहते उन के ही साथ चिपका रहता। इतना कि उन्हें और चाचा को परेशानी भी होने लगती। तभी अम्माँ या दादी सरदार को बुला कर ले जातीं किसी और खेल में लगा देतीं। चाचा ने कहीं से तीसरी कक्षा की पुस्तकें ला कर सरदार को दे दी। सरदार को उन्हें पढ़ने में मजा आ रहा था। गर्मियाँ बीतते बीतते उस ने हिन्दी, सामाजिक ज्ञान और विज्ञान की पुस्तकें पढ़ डालीं थीं। उन में कुछ समझ में आया था और कुछ नहीं आया। हाँ गणित की किताब के अधिकतर सवाल उस ने खुद हल कर डाले थे। जो नहीं आ रहे थे उन्हें दाज्जी ने हल करवा दिया था। स्कूल खुलने के दिन आ गए थे। अगले मंगलवार भी जारी

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