ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र और अफ़लातून को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के आठवें पड़ाव और अड़तीसवें सोपान पर मिलते हैं दुबई निवासी बेजी से। ब्लाग जगत में बेजी जैसन किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका ब्लाग मेरी कठपुतलियां हिन्दी कविताओं के चंद बेहतरीन ब्लाग्स में एक है। वे बेहद संवेदनशील कविताएं लिखती हैं और उसी अंदाज़ में हमारे लिए लिख भेजी है अपनी वो अनकही जो अब तक सिर्फ और सिर्फ उनके दायरे में थी।
घर-परिवार में रम गए...
शादी के बाद का सफर भी कम दिलचस्प नहीं था। मैं पुरानी हिन्दी की हीरोइन्स से पूरी तरह इन्सपायर्ड थे। सो घर का काम बड़ा दिल लगाकर करते। जब तक जयसन घर नहीं पहुँचते खाना नहीं खाती।
अजीब सी बात थी। पाँच बहनों के दुलार में बड़े जयसन को लड़की और लड़के का फर्क बिल्कुल समझ नहीं आता। जिस दिन मुझे देर होती वो भी भूखे प्यासे बैठे रहते।
जयसन को बच्चों से बेहद लगाव है। उनकी तरफ की जिम्मेदारियों की तरफ वो बहुत सजग हैं। काम में अपना सहयोग देना कर्तव्य समझते हैं। नहीं कर पाते तो दुखी भी हो जाते हैं। 
हम में से कोई भी धर्म को लेकर धुनी नहीं है। दोनों को धर्म के भीतर के चिंतन में ज्यादा रुचि है। जो दिल को भा जाता है याद रख लेते हैं। जयसन को बाईबल, रामायण, महाभारत के बारे में मुझसे ज्यादा पता है। जानना हम दोनो चाहते हैं।
त्योहार सभी मनाते हैं। दुबई में भी।
बहुत कुछ साथ साथ देखा। प्लेग, गुजरात का साइक्लोन, भूकंप, दंगे.... । नर्मदा बचाओ की गर्मी देखी...उसपर नया पुल बनते देखा, नर्मदा की गोद में किश्ती में झूलकर देखा।
सबसे मुश्किल मेरा दुबई में आकर काम करना रहा। जयसन अभूदाबी में कार्यरत थे। मैं चाह कर भी कहीं काम नहीं कर पा रही थी। हज़ार झंझट थे। फिर से एक्साम लिख कर क्वालिफाई करना। फिर काम ढूँढना। अँधाधुँध काम के लिये अप्लाई किया। दुबई में नौकरी मिली। सवा साल की गुड़िया और चार साल का जोयल। दुबई का द भी मालूम नहीं था। जुलाई की गर्मी। कार एकही थी जो जयसन के पास थी । जयसन के काम की जगह से चार घंटे का रास्ता था। आना जाना हफ्ते में सिर्फ एक बार।
पर मैं अड़ी थी। बहुत मुश्किल था ऐसे में ऐसे जज़्बाती निर्णय को समर्थन देना। पर जयसन ने दिया।
एक साल में अकेले एक नये देश में जीना सीखा। कार खरीदी। सड़के और रास्ते सीखे। बच्चों को जैसे तैसे सँभाला। काम किया। किसी तरह अपना आत्मविश्वास बनाये रखा।
करीब तीन साल दूर रहने के बाद....हर हफ्ते अप डाउन करने के बाद आज हम सब दुबई में साथ हैं।
भाई (http://www.blogger.com/profile/08211042258385059443) आइ बी एम, माइक्रोसॉफ्ट और फिर इंटेल पहुँचा। भाभी भी स्टेट्स में भाई के साथ। मम्मी पापा ने पाँच बेडरूम बड़ा सुंदर बँगला बना लिया।
मैने क्लीनिक की नौकरी साल भर के बाद छोड़ दी। यहाँ स्कूल में जब बच्चों की सँख्या 1500 से अधिक हो जाती है तो डॉक्टर लाजिमी होता है। जोयल और गुड़िया के स्कूल में जब जगह बनी मैंने भर दी।
दुबई में अपने शौक नहीं छोड़े। बैडमिन्टन, टेबलटैनिस स्कूल में अक्सर अब भी खेलती हूँ।
गुड़िया भरतनाट्यम और कर्नाटिक म्यूसिक सीखती है। जोयल कीबोर्ड सीखता है। दोनो सी बी एस ई स्कूल में जाते हैं। ऑप्शनल लैंगुएज हिंदी है।
जयसन जो हिन्दी बिल्कुल नहीं जानते थे अब मलयालम एक्सैंटेड हिन्दी फर्राटे से बोलते हैं। लक्ष्मी और प्रीती आज भी साथ है। कॉलेज में जास्मिन, वैशाली , शशि और ममता मिले। लक्ष्मी बरोड़ा में। कल ही जन्मदिन के लिये एक पार्सल आया। प्रीती भी बरोड़ा में। साउदी से वापस जाते जाते दुबई होकर गई। वैशाली और ममता भी नहीं छूटे।
[जयसन के मम्मी-पापा के साथ]
दोस्ती के मामले में हमेशा कंजूसी की। बहुत सोच समझ कर....और एक बार हो गई तो कभी छूटी नहीं।
पिछला साल बहुत अजीब रहा। जीवन में जो कोई – पहचान, ख्याल, सपना....कहीं छूट गया था वापस मिल गया। फिर से रूबरू होना अपने आप में एक अनुभव था।
खुद भावनाओं के उतार चढ़ाव पर रही। जयसन ना जाने कैसे संयत होकर समझते रहे।
मैं और तू
मैं
समंदर बवंडर
मैं हलचल चंचल
गहरे में उतरती
उथले में उभरती
लहरों में सँभलती
साहिल पर छलकती
बहकती चहकती
सिमटती बिखरती
चाँद की चाह में
ललक से उछलती
सीपी सी शर्माई
मोती सी भर्राई
तूफान हूँ
मन का ऊफान हूँ
बोतल में राज़
की राजदार हूँ
डुबोया भी है
और उभारा भी है
मैं बेचैन हूँ
स्वप्निल नैन हूँ
तू
वो आगोश है
जिसके होश में
सँभलती भी हूँ
संवरती भी हूँ
जहाँ सिमट कर
आराम से
नींद की छाँव में
ठहरती हूँ मैं
मैं समंदर हूँ
तरंगों भरा....
तू वो तल है
जो इसको लेकर खड़ा....
और ब्लागिंग की सतरंगी दुनिया में बेजी
दो साल हुए ब्लागिंग को। भाई ने ही रास्ता दिखाया था। काफी लिखा, वहुत पढ़ा।
मेरे पसंद के कई ब्लॉग हैं। सबसे पसंदीदा ब्लॉगर अ से ही हैं-
अजदक, अनामदास, अजगर, अनिल, अभय, अजित, अफलातून, अनुराग आर्या, अनुराग अन्वेषी, अनिताजी, अनूप भार्गव और अरुण
अविनाश की कवितायें पसंद है
ब्लॉगर दंपति- आभा और बोधिसत्व ,.अनूप और रजनी, मसीजीवी और नीलिमा
आलोक जी के फैन हैं हम...
अज़दक, मीत और पारुल की आवाज़ बेहद पसंद है
उड़न तश्तरी का जवाब नहीं...जब कभी उड़ना हो तो हाज़िर और रेस्क्यू ऑपरेशन्स से भी परहेज नहीं...
फुरसतिया जी की चिट्ठाचर्चा और लंबी पोस्ट्स...पता नहीं क्यों पर फुरसतिया शब्द दिमाग में कौंधते ही वे साईकल पर दिखते हैं...
मनीष जोशी की कलम, प्रत्यक्षा दी का लेखन, रविश जी की रिपोर्टिंग और मीनाक्षी दी के हाईकू...
मनीष जी की शामें , सृजन जी की संयत कलम और विमल जी की ठुमरी
प्रियंकर जी की पसंद, कवितायें और टिप्पणी,
पर्यानाद, बलविंदर जी , दिनेश जी और शास्त्री जी की सजग कोशिश...
संजीत, प्रशांत , बालकिशन और अजय कुमार झा का तारीफ करने का अंदाज़
घोस्ट बस्टर जी का चित्र, ज्ञानदत्त जी की रेलगाड़ी और शिव कुमार जी की बंदूक
घुघूति जी का अंदाज़, लेखन और परिपक्व सोच...
चोखेरबालियाँ...
नये लोगों में पल्लवी, रश्मि प्रभा, महक, कंचन
दो दो - रचना, नीलिमा, बेंगाणी ब्रदर्स
स्वप्नदर्शी , लावण्या जी ,आशा जी, ममता और रजनी जी का शालीन व्यक्तित्व
देबू दा, जीतू जी, गीतकार –पुराने ब्लॉग साथी
अशोक जी का कबाड़खाना, सस्ता शेर,युनुस जी का रेड़ियो , इरफान जी की टूटी बिखरी और काकेश की काँव काँव
इन ब्लाग्स के पीछे के लोग काफी दिलचस्प लगे। सभी के पीछे एक व्यक्ति साफ नज़र आता है।
हमेशा लोगों को समझने का शौक रहा। भाषा की खूबी से ज्यादा कौन किस परिस्थिति में किस प्रकार की प्रतिक्रिया देता है जान सकी।
कितने विवाद हुए - ब्लॉग जगत के लगभग हर विवाद में हिस्सा लिया ....
हिंदू मुसलमान- सारा को खत
पत्रकार क्यों बने ब्लॉगर
नारी क्या करे क्या नहीं..
मेरे लिये ब्लॉगजगत मेरा पसंदीदा पड़ोस है....दोस्त भी हैं, अच्छे लोग भी है, अपने भी है, सपने भी...सीखने की काफी गुंजाइश..... अनामदास ने एक बार कहा था आज का कॉफी हाउस...
बकलम पर डॉ चँन्द्रकुमार जी की टिप्पणियों ने खुश किया।
खुद टिप्पणी करने में कितनी भी कंजूसी की हो...मुझ पर सभी मेहरबान रहे हैं...
विजय शंकर जी भी...
पत्रकार एक ऐसा जीव था जिसके बारे में सिर्फ अज्ञान था। यहाँ चैनल्स और अखबार के पीछे काम करने वाले दिल और दिमाग को जाना। अलग अलग स्त्रियों के भूगोल को समझा।
मेरे दोस्तों के लिस्ट में इतनी तेजी से कभी अपडेटिंग नहीं हुई। 
मीनाक्षी, अर्बुदा, मनीष जोशी, पूर्णिमा वर्मन , श्वेता सभी से मिलना हुआ। मीनाक्षी दी , अर्बुदा और मनीष जी से दोस्ती हो गई। [अगली कड़ी में समाप्त]
Tuesday, May 20, 2008
बेजी का पसंदीदा पड़ौस-ब्लागजगत [बकलमखुद-38]
लेख-
अजित वडनेरकर
5
टिप्पणियाँ
पर
12:35 AM
लेबल:
बकलमखुद,
बेजी
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Monday, May 19, 2008
निखट्टू, लानत है तुझ पर !!
निकम्मे-नाकारा लोगों की दुनिया में बड़ी दुर्गति होती है ।
ऐसे लोगों की न सिर्फ कोई कद्र नहीं करता बल्कि उन्हें अपने पास भी कोई फटकने देना चाहता। काम का न काज का , दुश्मन अनाज का जैसी कहावतें इन्हीं लोगों के लिए कही जाती हैं। ये कहावतें समाज ने ही अपने अनुभवजनित ज्ञान के आधार पर बनाई। मगर समाज में हर चीज़ के दो पहलू कई बार इस अंदाज में सामने आते हैं मानों चित भी मेरी, पट भी मेरी । मलूकदास जी का वह प्रसिद्ध दोहा भी याद कर लीजिए –
अजगर करे न चाकरी , पंछी करे न काम ।
दास मलूका कह गए , सबके दाता राम ।।
अब इस दोहे से क्या सीख मिल रही है ? यही न कि रामजी सबकी भली करते हैं , बेफिक्र रहें ! चाहे न मिल रही हो मगर लोग तो इसका भावार्थ यही बताते हैं कि काम करने की ज़रूरत क्या है ? यूं अजगर और पक्षी का संदर्भ तो मलूकदास जी ने इसलिए दिया है कि मनुश्य का जन्म ही कर्म करने के लिए हुआ है सो कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो। शायद यही है उनका भावार्थ। रामजी सबको देंगे !!!
बहरहाल बात हम कर रहे हैं आलसी , नाकारा और निकम्मों की । ऐसे ही लोगों के लिए हिन्दी में निखट्टू जैसा शानदार शब्द भी है और खूब इस्तेमाल होता है। आलसियों को चाहे निकट न फटकने की समझाइश दी जाती हो मगर निखट्टू और निकट शब्द में तो गहरी रिश्तेदारी है। जानते हैं ।
संस्कृत में एक धातु है कट् जिसमें जाना, स्पष्ट करना , दिखलाना आदि भाव समाहित हैं। संस्कृत-हिन्दी का एक प्रसिद्ध उपसर्ग है नि जो शब्दों से पहले लगता है और कई भाव प्रकट करता है। नि में निहित एक भाव है पास आने का , सामीप्य का। कट् धातु में जब नि उपसर्ग का निवेश होता है तो बनना है- नि+कट्=निकट । कट् यानी जाना, इसमे नि जुड़ने से हुआ पास जाना, पाना आदि। इससे मिलकर संस्कृत का शब्द बनता है नैकटिक जिसका मतलब हुआ , नज़दीक का, पास का, पार्श्ववर्ती, सटा हुआ आदि। एक अन्य शब्द बना नैकटिकः जिसका मतलब हुआ साधु, सन्यासी या भिक्षु।
नैकटिक में संन्यासी या वैराग्य का भाव समझना आसान है। कट् धातु मे स्पष्ट करना , दिखलाना जैसे भाव तो पहले ही उजागर हैं जो संत-सन्यासियों का प्रमुख कर्तव्य है। अब मनुश्य सन्यास लेता ही इसलिए है ताकि वो खुद को पा सके । शास्त्रों में आत्मा को ही ब्रह्म कहा गया है । जिसने अपनी अंतरात्मा को पा लिया अर्थात् खुद को पा लिया वही, ज्ञानी। संन्यस्त होने का सुफल उसे मिल गया। इसीलिए उसे नैकटिकः कहा गया। यही नैकटिकः दरअसल निखट्टू है। 
संत मलूकदास के कहे को समझे बिना लोगों ने उस पर अमल शुरू कर दिया तो नैकटिकों के ऐसे सम्प्रदाय को यानी भिक्षुकों को निखट्टू कहा जाने लगा। बुद्ध से बुद्धू और पाषंड से पाखंड और पाखंडी जैसी अर्थगर्भित नई शब्दावली बनाने वाले समाज ने अगर इधर-उधर डोलने वाले, आवारा, जिससे कुछ काम न हो सके अथवा नाकारा-निकम्मे के लिए नैकटिकः से निखट्टू जैसा शब्द बना लिया हो तो क्या आश्चर्य ? किसी ज़माने में भिक्षावृत्ति सिर्फ सन्यस्त लोगों के लिए आहार जुटाने की प्रणाली थी मगर बाद में इसकी अवनति इतनी हुई कि – जाओ, भीख मांगो, जैसे उलाहने प्रचलित हुए जो मुहावरा बन गए।
ज़रूर देखें-
बुद्ध और पाखंड ।
लेख-
अजित वडनेरकर
12
टिप्पणियाँ
पर
2:54 AM
लेबल:
निकट,
निखट्टू,
पाखंडी,
बुद्ध
इस संदेश के लिए लिंक
Sunday, May 18, 2008
अंडे वाली मेम यानी बेजी... [बकलमखुद-37]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र और अफ़लातून को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के आठवें पड़ाव और सैंतीसवें सोपान पर मिलते हैं दुबई निवासी बेजी से। ब्लाग जगत में बेजी जैसन किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका ब्लाग मेरी कठपुतलियां हिन्दी कविताओं के चंद बेहतरीन ब्लाग्स में एक है। वे बेहद संवेदनशील कविताएं लिखती हैं और उसी अंदाज़ में हमारे लिए लिख भेजी है अपनी वो अनकही जो अब तक सिर्फ और सिर्फ उनके दायरे में थी।
प्यार , इकरार और शादी...
जयसन को हमने देखा और हमारा दिल आ गया। पर अब हम सयाने हो चुके थे। इस बार दिल के साथ दिमाग का भी इस्तेमाल करना जरूरी समझा। साहब भी कुछ हमारी ही सिचुएशन में थे। सो वो भी फूँक फूँक कर आगे बढ़े। लिहाजा हम 1993 फरवरी को मिले... मिलते रहे। बात होती रही। दोस्ती हो गई। पर मजाल है कि किसी ने प्यार का जिक्र किया हो।
1996 में इनकी हिम्मत हुई। मम्मी और पापा निश्चिंत नहीं थे। उन्हे मैं जयसन के परिवार और माता पिता को सँभालने के लिये परिपक्व नहीं लगती थी। पर मैं जिद पर अड़ी थी। ऐसा लड़का लाओ जो दहेज ना ले, मेरे आगे पढ़ने पर एतराज ना करे, अच्छी नौकरी करता हो, डोनेशन से ना पढ़ा हो, सिगरेट शराब नहीं पीता हो और हमारे परिवार से रिश्ता जोड़ना चाहता हो।
अपने समाज के बारे में कोई यूफिमिस्म नहीं था। ऐसा लड़का मिलना लगभग असंभव था।
और आठ जनवरी 1997 को जयसन से विवाह हो गया।
विवाह एमडी के पहले साल में किया था। इसके आगे रास्ता बहुत कठिन था।
दोनो को आगे बढ़ना था।
मेरा खर्चा उठाओगे ?
बच्चे हमेशा से पसंद रहे। एम डी के लिये मैने खुद के सामने सिर्फ दो विकल्प छोड़े थे। साइकियाट्री और पीडियाट्रिक्स। बहुत जल्द अहसास हुआ की मैं अच्छी साइकियाटरिस्ट नहीं बन सकती। और अगर बनी तो खुद भी पागल होने की संभावना बहुत थी। किंतु पीडियाट्रिक्स की सीट टॉपर्स के हाथ थी। मैं अच्छे विद्यार्थियों में होने के बावजूद टॉप पर नहीं थी। पर ऐन वक्त पर एक सीट खाली हुई और मेरे हाथ लग गई। नान स्टाइपेन्डरी सीट( यानि सिर्फ स्टूडेन्ट एलौअन्स) । तब जयसन से शादी नहीं हुई थी। जयसन और जोबी (भाई जो तब तक यू एस पहुँच चुका था) दोनो को पूछा...मेरा खर्चा उठाओगे....दोनों ने झट हाँ कर दी।
जूनियर और सीनीयर की चक्कियों में पिसती, खटती मैं पीडियाट्रिशियन हो गई। प्रीति ने पैथोलोजी में पीजी किया। लक्ष्मी की शादी हो गई। और जास्मिन....
जास्मिन ने नेह से शादी की। और फिर पता चला एक धीरे धीरे बढ़ते हुए ब्रेन ट्यूमर का।
जास्मिन मानसिक, शारीरिक , व्यवसायिक और घरेलू ...ना जाने किस किस स्तर पर संघर्ष कर रही थी। मेरे लिये नेह और जास्मिन का प्रेम किसी अजूबे से कम नहीं था। दवाई और बीमारी की वजह से ना जाने उसमें कितने बदलाव आये....पर नेह कहता.... “heaven’s envy is togetherness!!...”
ट्यूमर और जीवन का संघर्ष दोनो बखूबी जीत गये और आज एक बच्चे के माता पिता हैं। नेह पीड़ियाट्रीशियन और जास्मिन गायनेकोलोजिस्ट।
लक्ष्मी एक बच्ची की माँ बनी...कुछ उलझनों से शादी टूटी.....बिखरते-बिखरते बनाने के लिये एक बेहद प्यारा हमसफर मिला...और वो दोनो अपने दोनो बच्चों के साथ अपनी दुनिया में संतुष्ट और खुश।
पहली नौकरी-भरूच के सेवाश्रम में...
नौकरी के लिये पहला कदम रखा भरूच के सेवाश्रम अस्पताल में। वहाँ डॉ मूबीना से दोस्ती हुई। किसी मुसलमान से पहली बार दोस्ती हुई। डॉ मूबीना ने हमें अपने परिवार जनों से मिलाया, घर बुलाया, ईद में मेहमान नवाज़ी की। किसी मुसलमान परिवार को पहली बार करीब से देख रहे थे। अपने ढेर सारे पूर्वाग्रहों को गलत पाया।
पर काम के हिसाब से सेवाश्रम में मन नहीं लगा। मुझे काम करना था। बहुत सारा और बहुत मन लगाकर। जगह मुझे पता थी। जगड़िया में बसा सेवा रूरल।
पगुथन से दो घँटे का रास्ता। बीच में नर्मदा जिसपर देर देर तक ट्रैफिक अटका खड़ा रहता था। जयसन शिफ्ट ड्यूटी में थे। ऐसा सपना भी पागलपन ही था। नाइट ड्यूटी के बाद बाइक में ऐसा सफर चुनना महज पागलपन था। पर मेरे आँखों में उगते सपने जयसन को दिख रहे थे। वो बहुत सहजता से और पूरे स्नेह से मान गये।
[सेवा में]
मेरे सपनों की सेवा
सेवा रूरल (www.sewarural.org) बिलकुल मेरे सपने जैसा था। गाँव , गाँव में जरूरतमंद बच्चे और हमारी पहुँच उन तक। गाँव जाते, वहाँ बच्चे देखते, ओ पी ड़ी चलाते, राउन्ड लेते, हैल्थवर्कर्स को सिखाते। बहुत सारे बच्चे झिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए मिलते। मुझे दिनरात का होश नहीं था। अनिल भाई और लता बेन से बेहद प्रभावित हुए। जयसन भी वहाँ सबके प्यारे बन गये। कर्म और धर्म का मर्म यहाँ समझा और यह भी की चाहो तो कुछ नामुमकिन नहीं है चिकित्सक की तरह मेरे दिल की सबसे अजीज जगह आज भी यही है....जहाँ मुझे लगा कि सचमुच मैं एक अच्छे बदलाव का हिस्सा थी।
पूर्ण गर्भवती होने पर भी खुशी खुशी काम करती रही। सास ससुर मुझे ऐसे समय अकेला पा कर केरल से साथ रहने आये। उनके साथ रहकर कभी सास बहू जैसा नहीं लगा। उनके लिये मैं महज एक बच्ची थी जिसे वो धीरज से सही और गलत समझा सकती थी।
सरकारी ढर्रे से साबका
मम्मी पापा ज्यादा दूर नहीं थे। हमेशा शादी के बाद भी आसपास ही रहे और मुझे सहेजने की कोशिश करते रहे।
1999 डिसेंबर में जोयल आया..। हमारी जिन्दगी में एक नया अध्याय। और फिर लगने लगा कि जयसन के ऊपर इतना शारीरिक और मानसिक दबाव ड़ालना उचित नहीं और दो साल जगड़िया में काम के बाद मैने नौकरी छोड़ दी।
अगला पड़ाव था भरूच सिविल अस्पताल । यहाँ सरकारी ढर्रे से पहली बार मिली।
पूरी तत्परता से काम करती रही। सिस्टम के अंदर रह कर भी अच्छी सेवा दी जा सकती है ऐसा मेरा विश्वास था।
कई बाते याद आती हैं-मैं कुपोषित बच्चों के लिये अंडा लिखती और एक दो दिन बाद फिर नहीं मिलता। अंडा जिसका खर्च सरकार उठाती है जाता कहां था ? मैने भी सोचा की इस बात को छोड़ा नहीं जा सकता। अंडे के पीछे पीछे मैं पहुँची सरकारी कर्मचारियों के किचन तक। मेरे बात के पीछे लगे रहने की वजह से अंडा बच्चों को मिलने लगा। और नाम भी हुआ....अंडे वाली मैम।
बहुत अच्छी दवाईयाँ सरकारी दवाखानों में हासिल थी। मेरा प्रिस्क्रिप्शन बाहर की दवा के लिये हरगिज नहीं होता। दस पंद्रह की ओपीड़ी सौ में बदलने लगी। मैडिकल रिप्रेजेंटेटिव से बहुत कम मिलती। मिलती तो भी उसे ही हताशा होती। दो महीने बाद हॉस्पीटल सुपरिंटेडेंट के दफ्तर मे बुलाया गया और पूछा गया.....क्यों इतनी दवाइयाँ खर्च करती हो... सब क्या यूँ ही बाँट दोगी...बाहर से लिखा करो...।
सीज़ेरियन और मुस्किल प्रसव में बतौर पीड़ियाट्रीशियन हाज़िर रहती। एक दिन गायनेक वॉर्ड में एक दर्दी मिला और पूछने लगा आपको क्या फिर पैसे देने पड़ेंगे। मैं हैरान....मैने पूछा फिर मतलब....। उसने कहा वो साब ने आपके नाम से लिये हैं ना। तब से सभी दर्दियों को समझाना शुरु किया की मेरे लिये किसी को पैसा ना दे।
जिस सरकारी सिस्टम से मैं रूबरू हुई थी उससे आज भी घिन आती है। क्लर्क, पुराने कर्मचारियों की अजीब सी मानसिकता......। अच्छे और सही लोगों का इतना अभाव।
सिविल अस्पताल में मुझे जो सबसे अधिक दिखा वह थी सरकार और सरकारी कर्मचारियों की आम जनता की तरफ उदासीनता और बेपरवाही।
और पहुंच गए यूएई...
सिविल अस्पताल की हर बात निराली थी। एमरजन्सी में रात को ऐम्बूलैंस आता और मैं निकलती...जोयल पीछे पीछे आता ...ड्राइवर बोनेट पर एक लात मारता...फिर खर्र खर्र करती चालू होती ऐम्बूलैन्स। इसका असर यह हुआ कि जोयल को जब खिलौने वाली ऐम्बूलैंस दी गई वह जोंर से उसे पटकता और देखता की चालू होती है कि नहीं।
2002 अक्तूबर में गुड़िया हमारी जिंदगी मे आ गई। उसी समय जयसन के एक अच्छे नौकरी के ऑफर के चलते सिविल छोड़ हम पहुँच गये यू ए ई।
जयसन ने शादी के बाद छह अलग जगह-सूरत, हैदराबाद, जामनगर, भरूच, अबूधाबी और दुबई में नौकरी की।
मैने शादी के बाद पाँच अलग –सूरत, जगड़िया, भरूच,दुबई(2) जगह नौकरी की।
कुल सात घर बदले।
दो बच्चे।
आठ हाउस मेड।
शादी के बाद एम डी पूरा किया। जयसन ने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी एम बीए के लिये ज्वाइन किया।
कई बार अलग रहे।
एक दूसरे पर कभी कुछ थोपा नहीं।जारी
[जोयल और गुड़िया नाना-नानी के साथ]
लेख-
अजित वडनेरकर
16
टिप्पणियाँ
पर
12:58 AM
लेबल:
बकलमखुद,
बेजी
इस संदेश के लिए लिंक
Saturday, May 17, 2008
दुश्मन अनाज का

काम का न काज का, दुश्मन अनाज का
निकम्मे , नाकारा व्यक्ति के लिए यह कहावत बड़ी मशहूर है । अब आलसी चाहे दिनभर खाट तोड़ता रहे मगर खाना तो तब भी खाएगा ही न ! तो यह अनाज का अपव्यय ही हुआ। लिहाज़ा दुश्मन अनाज का जैसी बड़ी लाक्षणिक बात तत्काल प्रतिक्रिया करनेवाले समाज में पैदा हो गई।
बोलने-सुनने में उर्दू फारसी के असर वाला अनाज शब्द हिन्दी का ही है । अनाज यानी गल्ला, राशन, गेहूं, चना, चावल ,दलहन और धान्य आदि। अनाज बना है संस्कृत के अन्नः या अन्नम् और अद्य शब्द के मेल से । अन्न का सामान्य अर्थ होता है भात अथवा चावल । गौरतलब है कि प्राचीनकाल में अन्य खाद्यान्नों की तुलना में चावल से ही मनुश्य अधिक परिचित था। बाद में अन्न का अर्थ सम्पूर्ण भोजन अथवा भोज्य पदार्थ हो गया । अन्न बना है संस्कृत धातु अद् से जिसमें खाने , निगलने या नष्ट करने का भाव शामिल है। इससे ही बना अद्य जिसका मतलब होता है खाने योग्य पदार्थ । इस तरह बना अन्न+अद्य > अन्नाद्य > अण्णाज्ज > अनाज । मालवी , राजस्थानी और पूर्वी हिन्दी में आदि स्वरलोप होने से सिर्फ नाज शब्द भी प्रचलित है। इस नाज के ज में जब नुक्ता लग जाता है तो उर्दू का नाज़ बन जाता है जिसका इस शब्द से कोई लेना देना नहीं है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक अनाज के अर्थ वाला नाज शब्द दरअसल ईरानी परिवार का शब्द है । उनके मुताबिक ईरानी परिवार में नाद् क्रिया पीटने के अर्थ में प्रयुक्त होती है और चूंकि उपज को पीटकर ही अनाज निकाला जाता है इसलिए इसी नाद् से नाज शब्द चल पड़ा । मगर भारत भर में प्रचलित अनाज और नाज दोनों रूपों को देखते हुए और संस्कृत के अन्न शब्द के मद्देनज़र अन्न+अद्य से ही इसकी उत्पत्ति तार्किक नज़र आती है।
आपकी चिट्ठियां
सफर की पिछली तीन कड़ियों नन्हा कातो , महंगा बिकेगा, और मिठास का कानून पर सर्वश्री चंद्रभूषण , अभिषेक ओझा, दिनेशराय द्विवेदी, डॉ चंद्रकुमार जैन,पंकज अवधिया, लावण्या शाह , मीनाक्षी, आलोक पुराणिक,समीरलाल, यूनुस , महाशक्ति, पंकज सुबीर , संजय पटेल, बेजी, शिवकुमार मिश्र, संजीत त्रिपाठी ,सिद्धार्थ , अविनाश वाचस्पति, दीपा पाठक , विजयशंकर चतुर्वेदी, अनिताकुमार,संजय की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका बहुत बहुत आभार।
लेख-
अजित वडनेरकर
11
टिप्पणियाँ
पर
2:49 AM
लेबल:
अनाज,
अन्न,
नाज
इस संदेश के लिए लिंक
Friday, May 16, 2008
बेजी की दुनिया में बदलाव...[बकलमखुद-36]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र और अफ़लातून को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के आठवें पड़ाव और तैतीसवें सोपान पर मिलते हैं दुबई निवासी बेजी से। ब्लाग जगत में बेजी जैसन किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका ब्लाग मेरी कठपुतलियां हिन्दी कविताओं के चंद बेहतरीन ब्लाग्स में एक है। वे बेहद संवेदनशील कविताएं लिखती हैं और उसी अंदाज़ में हमारे लिए लिख भेजी है अपनी वो अनकही जो अब तक सिर्फ और सिर्फ उनके दायरे में थी।
और फूलों में महक हुई तेज...
भाई के बारहवीं करने के बाद पहली बार भाई से दूर हुए। अकेलेपन का अहसास हुआ।
पहली बार किसी की नज़रों को अपने ऊपर दौड़ते महसूस किया। मन को बिना नियंत्रण उड़ते पाया। शीशे में निहारना शौक बन गया।
बिना सोचे समझे सपनों और विचार के पड़ाव आने लगे।
पढ़ाते हुए टीचर पर कभी नज़र अटक जाती, कभी उन्हे हमें देख कनफ्यूज्ड पाते। माँ की कोई बात सीधी तरह नहीं मानते। पापा से दूरी बनाने लगे। सपनो में खोना आम बात हो गई। लड़कों के सामने बदल जाते। अदायें, नजाकत....हर तरह से इम्प्रेस करने की कोशिश।
भाई इंजीनियरिंग के आरईसी कॉलेज में। वह भी बातें छिपाने लगा। रैगिंग, हौस्टेल, संघर्ष....पढाई...वह कई बातों से जूझ रहा था। एक ऐसी दुनिया में जिसके बारे में हम में से किसी को कुछ पता नहीं था। मैं चिंतित रहती। खोद खोद कर उसकी डायरी पढ़ती। खत लिखती। साथ रहती।
पर मैं तेजी से बदल रही थी। जुल्फों में हवा रुकने लगी....चुन्नी में पलने लगी....ओस की बूँद में रंग खिलने लगे....बारिश की बूँदों में नूर....बादल में सपनों की दुनिया.....हरा रंग जोश से खेतों में, फूलों में महक तेज हुई.....अपनी अंगड़ाई पर आप ही प्यार आने लगा....
अजीब अहसास थे। चूड़ियों की खनक सपनों पर दस्तक दे देती। पायल पहन मोर की तरह नाचने का जी होता।
मम्मी यह देखकर परेशान होती। जहाँ यौवन में संवरती बेटी पर नाज़ था वहीं बाकी कई चिन्ताएं सता रही थी। यह सपने कहीं बीच में ही नहीं छोड़ दें। उन्हे महसूस होने लगा था कि मैं दुनिया को कई शेड्स में देख रही हूँ। ऐसे शेड्स जो उन्हे नहीं दिख रहे थे। और जिन्हे वह देखना भी नहीं चाहती थी। उनके लिये हम सबके जीवन का एक मकसद था। मेरा ऐसे मकसद का नहीं होना उनके मकसद को खोने जैसा था।
एक द्वन्द्व उठने लगा। माँ-बेटी, अनुभव और कल्पना, सच और स्वप्न के बीच।
मैं एक साथ बहुत स्तरों पर दिशा तय कर रही थी। सही गलत का मापदण्ड, अपने जीवन साथी की छवि, आगे क्या बनना है.....। मम्मी जानती थी कि यह समय यह तय करने का नहीं बल्कि अध्ययन करने का है। बारहवीं के परिणाम में थोड़ा पिछड़ गई। मेडिकल में दाखिला हुआ पर मनचाहे कॉलेज में नहीं। खुश होने से ज्यादा मम्मी परेशान थी। जानती थी कि उन्हे मेरी बागडोर समय के ही हाथ में देनी होगी।
मेडिकल में पहुँचते पहुँचते भाई सँभल चुका था। समय की जगह मम्मी के हाथ से बागडोर उसने सँभाली। उसे सब बता सकती थी। ट्रेन की बीच की बर्थ में रात को उठकर एक आदमी को घूरते हुए देखने पर जहन में उठा डर। किसी लड़के की मुस्कुराहट पर उड़ान भरता मन। धर्म में कही गई बातों से अलग विचार।
हाथ पकड़ कर बाहर की दुनिया दिखाने ले गया। किताबें, संगीत, मूवीज़, फिलॉसफी, जगह, विकल्प....। भाई कंप्यूटर इंजीनियर बना....परिणाम निकलने से पहले ही कैम्पस सेलेक्शन में नौकरी मिल गई। उसका टेक ऑफ टाइम था।
मैं मेडिकल कॉलेज पहुँची। प्रमुख स्वामी मेडिकल कॉलेज करमसद में दाखिला मिला। कॉलेज नया था। जगह खूबसूरत। सरदार वल्लभ भाई पटेल की अपनी जगह। आनन्द से कुछ दूरी पर। एकदम गाँव में हरियाली के बीच बसा हुआ कॉलेज। आसपास गन्ने के खेत। एक गाँव..गाँववाले, तंदुरुस्त गायों का झुंड, बेरी के पेड़.... और बड़े बड़े हरे भरे पेड़। गाँव की नवरात्रि और उस समय सज सँवर कर गागरा चोली में , “घूमतो घूमतो जाय”
प्राइवेट कॉलेज था। जिसकी करीबन आधी सीट्स ओपन कोटा के लिये थी। बाकी मैनेजमेन्ट की। शायद यही वजह थी की कॉलेज में अजीब सी संस्कृति थी। एक बिरादरी उन लोगों की जिन्होने संघर्ष से सब हासिल किया। और एक ऐसी जिन्हे उँगली उठाने से पहले आसमान मिल जाता।
मेरे लिये यह संस्कृति काफी कुछ रावतभाटा और गुजरात के सीखे हुए पाठ को दोहराने जैसी थी। लिहाजा दोनो ही तरफ के लोगों में अपने ढूँढे। मेरे दोस्त बहुत अटपटे थे। कुछ लोग ऐसे थे जिनकी मम्मियाँ कार से हौस्टेल आती, अच्छा खाने, पीने , पहनने का लाती। जिनके पास जूतों के बारह तेरह जोडे़ होते।
कुछ ऐसे जो खादी ही पहनने में विश्वास रखते। बॉलपेन के रीफिल पैक भी सोच समझ कर खरीदते।
जहाँ कभी लगता कि मैं सभी को समझती हूँ वहीं कभी ऐसा भी लगता कि मैं दोनों की तरह ही नहीं हूँ। जो भी हो...इन दोनों जुटों की एक दूसरे के साथ कभी बनी नहीं...और सिद्धान्त के हिसाब से दोनो बिल्कुल अलग थे।
प्रीति मेरे साथ नहीं आ सकी। उसे जामनगर मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला। लक्ष्मी बीएससी करने आनंद पहुची।
करमसद में मेरी रूम पार्टनर थी अनु। और मुझसे दोस्ती की जास्मिन ने। 
जास्मिन काठियावाड़ी गुजराती है। हमारी दोस्ती में कुछ और लोग जुड़े- नेह, हेमन्त और तपस्वी। यह गुट गाँधीवादी टाइप था। ऐसे लोग जो समाज को कुछ देना चाहते थे।
जास्मिन सबसे होशियार छात्रा थी। लेकिन कुछ शर्मीली, कुछ सहमी हुई। उसे मैं पसंद थी...और मेरे लगातार उसे भाव ना देने पर भी वह मेरे साथ, मेरे पास रही। उस समय मैं सोचती थी की मेरा साथ उसे देकर शायद मैं कुछ अहसान करती रही। लेकिन आज बहुत अच्छे से जानती हूँ कि यह मेरा भाग्य ही था जो मुझे जास्मिन मिली।
हौस्टेल की रूखी सूखी के समय जास्मिन अपने घर ले जाती। डेबरा, थेपला, बाखरी, खमण, फाफड़ा...इनका असली स्वाद जास्मिन के हाथ के जरिये पता चला। घर के सारे काम जास्मिन के जिम्मे थे। रात को जास्मिन किताब खोलकर पढ़ती और सब कुछ उसकी फोटोग्राफिक मेमरी में दर्ज। कॉलेज में जास्मिन ने मेरे जीवन में वही भूमिका निभाई जो कभी प्रीति ने निभाई थी।
दूसरे बरस मेरिट कम चॉइस के ऊपर मेरा सूरत तबादला हो गया। जास्मिन पीछे छूट गई। सूरत में आने वाले हम चार लोग थे। दो लड़के और मैं और ममता। लड़के दोनों बेहद अच्छे दोस्त थे...सूरत के ही निवासी।
सूरत मेडिकल कॉलेज....पिछले कॉलेज के तुलना में एकदम रूखा सूखा था। देखकर ही मन बुझने लगा। हमारे साथ के दोनो लड़के अपने शहर में पहुँचने की खुशी में दूर हो गये। ममता और मैं एक ही कमरे में पहुँचे। साथ में वैशाली।
ब्लॉगजगत के अनुराग...डॉ अनुराग आर्या की सहपाठी थी वैशाली। हमारे कमरे के बाजू में थे उनकी ही क्लास की बाकी लड़कियाँ जो ठेठ हिंदी वाले थे और उनसे हमें एक खास लगाव था।
सूरत एकदम सूरत था। शहर,गंदा, कौनक्रीट का जंगल। पर फिर भी यहाँ के दिन कुछ कम हसीन नहीं थे। कॉलेज बंक करना, पिक्चर देखना, ब्लैक में टिकट खरीदना, सिनेमा हॉल में अपर में सबसे आगे बैठकर देखना....यह सब सूरत की बदौलत। बिंदास और खुश..उन दिनों अजीब सा अहंकार सा था। उस समय लिखी एक कविता-
हवा हूँ....
चल रही थी....चल रही हूँ......
किसे छुआ...किसे नहीं...
पता नहीं...
कुछ याद है...कुछ भूल गई...
पर रुकी नहीं...
तभी किसीने रोका....
और पूछा...
तुमने मुझे छुआ...
क्यों ........??????
अरे हवा हूँ.....
चल रही थी....
चल रही हूँ......
किसे छुआ...
किसे नहीं...
पता नहीं... पढ़ाई में दिल लगाया। लगाते लगाते दिल यहाँ वहाँ भी लगने लगा। बहुत नोट्स बनाये, अपनी चिन्ता किये बिना पढ़ाया लिखाया......। पता नहीं कौन सी लैला मज्नू की कहानी से प्रेरित थी।
खैर। जिन दो लड़कों को पसंद किया....उन्होने कहा.... “तुम एक बहुत प्यारी दोस्त हो...उसके आगे कभी सोचा नहीं।”
मुझे जिसने पसंद किया मैने उनसे कहा , “तुमने इस लायक समझा बहुत अच्छा लगा....किंतु तुम्हे मुझसे बेहतर कई लड़कियाँ मिल सकती हैं।”
बात की बात यह कि चाह कर भी हम इश्क नहीं कर सके। हाँ कुछ हिन्दी वालों की तरफ झुकाव की वजह से हिन्दी में लिखना जरूर शुरु किया।
कब से जुगनुओं के पीछे हूँ
उन्हे पकड़ मुट्टी में रख
उनसे वफाओं के वादे करती हूँ
और जब विश्वास से मुट्टी खोलती हूँ
जुगनू मुझे छोड़
अपनी रोशनी ले
दूर उड़ जाता है
कुछ देर पीछे भागती हूँ
फिर यह सोच कि यह तो
उसकी अपनी रोशनी है
रुक जाती हूँ
कहाँ हो तुम
मेरी रोशनी?!
सायों के अँधेरों में अपने
संदेशों को खोजती हूँ
अंदेशों को ढूँढ़ती हूँ
भावनायें
संभावनायें
फिर जैसे सब उस अँधेरे में खो जाता है
उन सायों की धुँधली लकीरें मिट जाती हैं
और होता है एक घना अँधेरा
क्या तुम तन्हा नहीं?
तुम्हे मेरी आरज़ू नहीं?
क्या तुम बेताब नहीं?
हवा पर कान लगा कर हर सन्नाटे को सुनती हूँ
शायद तुम्हारी आहट सुनाई दे
सागर के किनारे हर पद