Tuesday, August 25, 2009

किस्से सरदार की शादी के [बकलमखुद-98]

पिछली कड़ी- अंग्रेजी से मुक्ति, वैद्यकी से नाता… 

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और सत्तानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

बी एससी. होने के दो बरस पहले ही जब सरदार कुल जमा अठारह साल का भी न था उस के ब्याह के लिए रिश्ते आने लगे। पिताजी माँ और बहन-भाइयों के साथ लड़की भी देख आए। इस का पूरा हाल आप अनवरत के आलेख ‘सौ साल पहले ............ आज भी है, और कल भी रहेगा’ पर पढ़ सकते हैं। सरदार को इस का पता लगा तो वह परेशान हो गया। अभी अपना ही ठिकाना नहीं, और यहाँ शादी की पड़ी है। पर जीवन साथी के बारे में सोच आरंभ हो गई। भावी जीवन साथी को देखना संभव नहीं हो सका था, लेकिन जैसी जानकारियाँ मिली थीं उस से लगता था कि वह चाह जैसी तो नहीं होगी, लेकिन वैसा तो किसी के साथ संभव नहीं। जो है वह ठीक ही होना चाहिए। बी.एससी. का अंतिम वर्ष आरंभ होता उस के पहले ही सरदार को सगाई के लिए मना लिया गया और गर्मियों में सगाई हो ली।
गाई के बाद जब जीवन साथी तय हो चुका तो उसे देखने और जानने की, कम से कम पत्र सम्पर्क बनाने की इच्छा बनी रही। लेकिन यह भी संभव नहीं हो सका। वास्तविक होते हुए भी जीवन साथी केवल कल्पना पर आधारित था। शादी की कोई तारीख तय नहीं थी लेकिन लगता था उसे दो-तीन साल तक तो टाला ही जा सकता है। तब तक जीवन की कुछ दिशा बनने ही लगेगी। इस बीच दाज्जी की एक देवरानी का अचानक देहान्त हो गया। दाज्जी ने कहना आरंभ कर दिया, सरदार का ब्याह करो। मुझ से दस बरस छोटी अचानक चली गई। मेरा क्या भरोसा? शादी की तारीखें देखी जाने लगीं। सरदार ने बहुत प्रयत्न किया कि शादी साल दो साल तो टाल ही दी जाए। लड़की वाले शायद तैयार भी हो जाते। लेकिन दाज्जी को कौन समझाता। आखिर वह दिन आ ही गया जब विवाह होना था।
बीएससी अंतिम वर्ष के पेपर हो चुके थे केवल केमिस्ट्री की प्रायोगिक परीक्षा होनी शेष थी। तभी वह दिन आ गया। उन दिनों शादी के बाद के आशीर्वाद समारोह नहीं हुआ करते थे। बारात रवाना होने के दिन या उस से एक दिन पहले मंडप में सब को दावत दे दी जाती थी। दावत के ठीक पहले सरदार को शौच की हाजत हुई। किराए वाले घर में यह सुविधा थी ही नहीं। मंदिर के नोहरे में ही इस सुविधा का उपयोग होता था। लेकिन वहाँ जाने का रास्ता दावत की तैयारी से अवरुद्ध था। सरदार शंका निवृत्ति के लिए अपने एक मित्र के घर पहुँचा। वहाँ विजया तैयार थी। उस से भी आग्रह किया गया। मना करते करते भी कुछ तो लेना ही पड़ा। शाम को दावत हुई। आधी दावत तक तो सरदार को पता रहा कौन आया? और कौन नहीं? उस के बाद का तो विजया को ही पता। रात नौ बजे दावत निपटी तो निकासी निकाली गई। सरदार घोड़ी पर सवार। आधी रात निकासी निपटने के पहले ही बारात की बस आ गई। सरदार चाहता था कि कुछ खास दोस्त बारात में जरूर चलें। सब से कह भी चुका था। पर वे नहीं आए। जो दोस्त साथ गए उन में दो-चार हम उम्र थे तो इतने ही बुजुर्ग भी। बाराती बस में अपनी-अपनी जगह बैठ चुके थे।
स सरदार के लिए ही सीट न बची थी। एक दो बुजुर्गों ने उसे अपना स्थान देना चाहा पर वह अशिष्टता होती। एक पीपे में सामान का था। उसे ही सीटों के बीच रख कर बैठने की जगह बनाई ससुराल तक का पहला सफर किया। ऐसे में सोने का तो प्रश्न ही न था। पास की सीट पर मामा जी और एक बुजुर्ग मित्र विष्णु वर्मा बैठे थे। बस रूट की पुरानी बस थी, जिस के ठीक बीच में एक दो इंच की दरार थी ऐसा लगता था दो डिब्बों को जोड़ दिया हो। जब भी वर्मा जी सोने लगते, मामाजी उन्हें जगा देते, कहते वर्मा जी आप पीछे के हिस्से में हैं, देखते रहो, अलग हो गया तो बरात छूट जाएगी। भोर होने तक बस चलती रही। सड़क के किनारे के मील के पत्थर बता रहे थे कि नगर केवल चार किलोमीटर रह गया है। तभी धड़ाम¡ आवाज हुई और कोई तीन सौ मीटर दूर जा कर बस रुक गई। शायद बस से कुछ गिरा था। जाँचने पर पता लगा कि बस के नीचे एक लंबी घूमने वाली मोटी छड़ होती है जो इंजन से पिछले पहियों को घुमाती है वह गिर गई थी। बस का ड्राइवर और खल्लासी उसे लेने पैदल पीछे की ओर चल दिए। उजाला हो चुका था, शीतल पवन बह रही थी। यह सुबह के टहलने का समय था। सरदार और उस के कुछ हम उम्र दोस्त पैदल नगर की ओर चल दिए। एक किलोमीटर चले होंगे कि बस दुरुस्त हो कर पीछे से आ गई। उस में बैठ गए।
सुबह-सुबह बारातियों का चाय-नाश्ता, नहाना और सजना चलता रहा। शाम चार बजे अगवानी हुई और उस के बाद बारात का नगर भ्रमण। पाँच बजे घुड़चढी हुई। नगर घूमते आठ बज गए। बारात का अनेक स्थानों पर स्वागत हुआ। कहीं फल, कहीं ठण्डा पेय कहीं कुल्फी। मालाएँ तो हर जगह पहनाई गई। हर मोड़ पर एक पान मेरे लिए कोई न कोई ले आता। घोड़ी पर बैठे बैठे थूकना तो असभ्यता होती, सब सीधे पेट में निगले जा रहे थे। सरदार सोच रहा था, आज पेट, आँतों और उस से आगे क्या हाल होगा? साढे तीन घंटे हो चुके थे। अब तो लघुशंका रोकना भी वकील साब दुष्कर हो रहा था। एक स्थान पर स्वागत कुछ तगड़ा था, आखिर वहाँ घोड़ी से नीचे उतरने की जुगत लग ही गई। वहाँ एक सजे हुए तख्त पर दूल्हे को मसनद के सहारे बैठाने की व्यवस्था थी। पर सरदार ने अपने एक मित्र से कहा -बाथरूम? उस ने किसी और को कहा, तब बाथरूम मिला। वहाँ खड़े-खड़े दस मिनट गुजर गए। शंका थी कि निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। तीन घंटे से रोकते-रोकते रोकने वाली पेशियाँ जहाँ अड़ाई गई थीं जाम हो चुकी थीं और वापस लौटने को तैयार न थी। अब वहाँ अधिक रुकना तो मुनासिब न था। सरदार ने पैंट के बटन बंद किए और जैसे गया था वैसे ही बाथरुम से बाहर आ गया।
गर भ्रमण दुल्हन के मकान के सामने से भी निकला। वहाँ महिलाओं ने खूब स्वागत किया। हर महिला टीका करती, नारियल पर कुछ रुपये देती। सरदार वहाँ तलाश करता रहा शायद कहीं से उसे उस की जीवन साथी देख रही हो और उसे दिख जाए। वह दिखाई नहीं ही दी, दिखी भी हो तो चीन्हने का संकट भी था। किस्मत में तो पहली नजर का प्यार और लव मैरिज भी नहीं थी? साढ़े दस बजे वापस जनवासे में लौटे तो बाराती सीधे भोजन पर चले गए। सरदार ने यहाँ भी आते ही कोशिश की लेकिन शंकानिवृत्ति यहाँ भी नहीं हुई। उस से भोजन के लिए कहा जा रहा था। पर मन और शरीर दोनों शंका में उलझे थे। पता लगा कच्चे आम की आँच बनी है। बस वही दो-तीन गिलास पिया तो पेशियाँ नरम पड़ीं और शंका को जाने का अवसर मिला। कुछ देर विश्राम किया। रात साढ़े बारह पर फिर घोड़ी हाजिर थी दूल्हे को भाँवर के लिए ले जाने को। शादी होते-होते सुबह हो गई। सुबह गौरण का भोज था। भोज के बाद आधे बाराती वहीं से अपने अपने गाँवों को खिसक लिए। बारात आधी ही रह गई थी। पिताजी समझदार से वापसी के लिए बस रोकी ही नहीं थी। रूट की बस में बैठ बारात सालपुरा स्टेशन आई और वहाँ से रेलगाड़ी में बाराँ वापस। सालपुरा में प्रयास किया गया कि दुल्हन से बात हो जाए पर विफल रहा। बाराँ स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही सरदार नीचे उतरा और सीधे बुक स्टॉल पर पहुँचा। कलाई में पड़े कड़े-डोरड़े आस्तीन में छुपाए, एक पत्रिका खरीदी। तभी एक सहपाठी सामने आ खडा हुआ। पूछ रहा था। क्या शादी में से आ रहे थे। उसे सरदार की शादी की खबर नहीं थी। सरदार ने जवाब दिया –हाँ, एक बारात में गया था। तब दुल्हन गाड़ी से उतर रही थी। पलट कर प्रश्न हुआ –किस की बारात में? तो सहपाठी को उत्तर मिला। वह दुल्हन उतर रही है उसी बारात में गया था।

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17 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब और ईमानदार बयान...वकीलसाब की इसी शैली के तो हम कायल हैं। जिन परिस्थितियों के उल्लेख मात्र से हम कतराना चाहें, सरदार के भेष में वकीलसाब उसी पर आधारित वृतांत रच देते हैं।
घोड़ी पर डटे हुए जम रहे हैं हुजूर!!! नायक आप और बन्नायक कौन है?

बब्बन सिंह said...

वर्णन बहुत पसंद आया :)

हिमांशु । Himanshu said...

इतनी सहज अभिव्यक्ति का दर्शन हो रहा है यहाँ कि एक-एक घटना मूल्यवान हो गयी है । बस पढ़ते ही जाना है - न जाने कितने ही घटना सम्पुट अभी प्रतीक्षित हैं यहाँ उद्धृत होने को ।

Udan Tashtari said...

बहुत सही..हम तो अभी सरदार के बचपन र कालेज के दिनों में टहल रहे थे और सरदार घोड़ी भी चढ़ गये. वाह जी, खूब रही यह दास्तां भी.

हेमन्त कुमार said...

वाह! बह गया मैं भी अपनी यादों में ।बहुत सुन्दर सफर।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत सच्चा और
खरा लेखन है आपका और विवाह की तस्वीर अतो भव्य !!
अब बहुरानी की दुल्हन रूप की फोटो भी
दुल्हा के संग बतला दीजिये ..:)
- लावण्या

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सरदार का संस्मरण रोचक रहा।
बधाई!

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

दूल्हा बनने पर सरदार को बधाई , आज क्यों क्योकि लग रहा जैसे हम बराती है . उस समय बरात की खातिर कमाल है . आज तो लोग बरात को देखते भी नहीं क्योकि टाइम नहीं है का बहाना जो है .

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सचमुच बहुत ही साफ़गोई से कही गई बातें, बेहद रोचक भी.

अनिल कान्त : said...

पूरे वर्णन ने बाँध कर रख लिया...मजा आ गया

शोभना चौरे said...

बुहुत ही रोचक प्रसंग |उस समय लगभग ऐसे ही बाराते होती थी

Dhiraj Shah said...

सुन्दर सफर शादी का

Arvind Mishra said...

वह दुल्हन उतर रही है उसी बारात में गया था। हा हा यह तो सबसे मजेदार !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

@लावण्यम अन्तर्मन
दीदी, पहले सरदार तो देखे दुल्हन। तभी न दिखाए, आप को।

मीनू खरे said...

बहुत रोचक संस्मरण. बिल्कुल बाँध कर रखता है पाठक को. अच्छा लगा पढ कर.

बी एस पाबला said...

हा हा!
हमें तो शंका-प्रकरण से कुछ आशंका होने लगी थी :-)

एक क्षण को तो लगा कि (सुपुत्र) वैभव है घोड़ी पर!!

अभिषेक ओझा said...

बहुत कठिन है डगर पनघट की :)

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