Monday, April 28, 2008

शिवजी की ससुराल तो ऊटी में !!! [बकलमखुद-22]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और बाइसवें सोपान पर मिसिरजी से।

परिश्रम के अलावा कोई और रास्ता नहीं

लकत्ते आने के बाद पढ़ाई ठीक-ठाक की. पिताजी जिस कालेज में पढाते थे, उसी कालेज में दाखिला लिया. शुरू के कुछ महीने बड़े कठिन गुजरे. कठिन इसलिए कि मुझे इतने अनुशासन में न तो रहने की आदत थी और न ही पढने की. लेकिन और कोई रास्ता नहीं था.
कलकत्ते आने के बाद तीन-चार महीने मुझे उत्तर प्रदेश में ट्रकों के ऊपर पढे गए नारे की याद खूब आई. नारा था "परिश्रम के अलावा और कोई रास्ता नहीं." जब भी याद आती, लगता मेरे लिए ही लिखा गया है. हायर सेकेंडरी की पढाई के दौरान नए-नए मित्र मिले. बड़ा बदला-बदला माहौल था. बदले हुए माहौल की कल्पना आप गाँव में रहते हुए मेरे दोस्तों के नाम और कलकत्ते आने के बाद मिले दोस्तों के नाम से ही लगा सकते हैं. जहाँ गाँव में रहते हुए मेरे दोस्तों में मुन्ना पाण्डेय, मैना सिंह, मुन्ना सिंह, बिरेंदर सिंह, प्रेम बहादुर सिंह प्रमुख थे, वहीं कलकत्ते आने के बाद मुझे प्रकाश पटोदिया, आनंद जोशी, पंकज राठी, गौरव चतुर्वेदी, संजीव माहेश्वरी और विकास माहेश्वरी जैसे दोस्त मिले. इन लोगों का नाम सुनकर ही लगता है कि बहुत पढ़वैये टाइप बच्चे थे. और गाँव के दोस्तों के नाम से आप ख़ुद अंदाजा लगा लीजिये कि उनके नाम सुनकर मन में क्या भाव आते हैं. मेरे दोस्तों में लगभग सब के साथ अभी तक संवाद बना हुआ है. सबसे प्रमुख हैं, तारकेश्वर मिश्रा. तारकेश्वर मिश्रा बड़े सरल और उसके साथ बुद्धिमान और बलवान भी है. हम दोनों की दोस्ती बहुत गहरी है. उनकी बलवानी के किस्से बहुत से हैं. मुझे याद है, तारकेश्वर जब हायर सेकेंडरी में पढता था उस समय उसका वजन ८३ किलो था. लम्बाई छ फुट से ज्यादा. चलता था तो देख कर यकीन नहीं होता था कि कोई विद्यार्थी है. हमेशा आभास होता जैसे कोई पहलवान चला आ रहा है. किसी को अगर ये बता देते कि ये विद्यार्थी है तो शायद जवाब ये मिलता कि 'पहलवानी का विद्यार्थी होगा.'

मैनर नहीं जानता, चला आता है यूपी-बिहार से!

लकत्ते आने के बाद भाषा की वजह से बड़ी समस्या होती. सबसे ख़राब तब लगता जब यहाँ के 'प्रबुद्ध' लोगों को ये लगता कि बाहर से आया है और हिन्दी बोलता है, मतलब 'खतम' ही होगा. मुझे याद है, एक बार मैं और तारकेश्वर कलकत्ते से हावड़ा आ रहे थे. जब तारकेश्वर साथ में रहता था तो कोई चिंता नहीं रहती. एक तो वो बांग्ला बोल सकता था और दूसरे काया ऐसी थी कि साथ वाला हमेशा 'सिक्योर्ड' फील करता. एक बार हम दोनों बस में चढ़े. चूंकि हावड़ा ब्रिज पार करके स्टेशन तक जाना था, और हम लोग एकदम लास्ट वाले स्तापेज पर चढ़े थे लिहाजा बस में बहुत भीड़ थी. बस में चढ़ते ही तारकेश्वर तो अन्दर चला गया लेकिन मैं दरवाजे पर ही खड़ा था. हमने ये सोचा कि और कोई नहीं बस पर शायद नहीं चढ़े. लेकिन ठीक उसी समय एक साहब ब्रीफकेस लिए बस पर चढ़े. वे चाहते थे कि मैं बस में अन्दर चला जाऊं. तारकेश्वर अन्दर जा चुका था. लेकिन जगह नहीं होने की वजह से मैं अन्दर नहीं जा सका. ये साहब जो ब्रीफकेस लिए चढ़े थे, उन्होंने बहुत भला-बुरा कहना शुरू किया. मुझे सबसे बुरा तब लगा जब उन्होंने कहा; "मैनर नहीं जानता है. चला आता है यूपी-बिहार से. बुद्धि कुछ है कि नहीं?" मैंने उनसे कहा कि ये सब बोलकर वे थोड़ा रिस्क ले रहे हैं. उन्हें गाली नहीं देनी चाहिए. खैर, किसी तरह हावड़ा स्टेशन पहुंचे. और जैसे ही बस रुकी, तारकेश्वर जी अपना पूरा शरीर लेकर बस से बाहर आए. नजारा ठीक वैसा था जैसे हिन्दी फिल्मों में विलेन के ताली बजाने से बड़ा भयंकर किस्म का साढ़े छ फुट का असिस्टेंट गुंडा सामने आता है. तारकेश्वर महाराज बाहर आए और तुरंत सवाल किया; "कौन था जो गाली दे रहा था?" तारकेश्वर को देखते ही उन महाशय की सिट्टी-पिट्टी गुम. अभी कुछ सोचते, उससे पहले ही तारकेश्वर जी ने उन्हें दो तमाचा लगा दिया.

गणित में फिसड्डी

मैं विज्ञान का विद्यार्थी था. लेकिन गणित से हमेशा भागता था. लिहाजा गणित में हमेशा कम नंबर मिलते. बारहवीं पास करने के बाद स्कॉटिश चर्च कालेज से बायलाजी और केमिस्ट्री में बी एससी किया. पढ़ाई में समय कम देता था. इसलिए घरवालों को हमेशा चिंता रहती. मुझे याद है, जिस दिन रिजल्ट आया था, मैं घर देर से पहुंचा. घर वाले परेशान थे. उन्हें लगा, शायद मैं फेल हो गया इसलिए घर वापस नहीं आना चाहता था. लेकिन शाम को घर पहुँच कर बताया कि मैं ओ अच्छे नंबरों से पास हो गया. तब सबने राहत की साँस ली. उसके बाद मैंने सीए में प्रवेश लिया.

पेट्रिक स्वेज,डेमी मूर और माशूक का भाई!

सीए में अर्टिकिलशिप के दौरान मेरी मुलाकात पामिला से हुई. जी हाँ, मेरी पत्नी, पामिला. उनका परिवार तमिलनाडु से हैं. हमदोनों एक ही फर्म में अर्टिकिलशिप कर रहे थे. अब इनके साथ भी कई किस्से ऐसे हैं जो हमेशा याद आ जाते हैं. आफिस में मिलने के बाद हमदोनों एक बार मूवी देखने गए. पैट्रिक स्वेज और डेमी मूर की बड़ी हिट फ़िल्म आई थी, द घोस्ट. हम दोनों सिनेमा हाल पहुंचे. अभी पहुंचे ही थे कि देखा कि टिकेट विंडो पर किसी को देखकर पामिला ठिठक गई. एक लड़का बहुत लंबा और बड़ा कठोर सा दिखने वाला. मजे की बात ये कि देखने में पामिला से चेहरा मिलता था. मैं समझ गया कि ये पामिला के भइया हैं. लेकिन अब कुछ कर नहीं सकता था. एक बार के लिए लगा कि आज धुनाई न भी हुई तो शायद कल हो जाए. लेकिन मेरे भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ. [ असल में ये तस्वीर साल २००६ में दीवाली के दिन की है. मेरा छोटा भाई, बब्लू आया था उन दिनों. बब्लू न्यूकैसल में रहता है. डॉक्टर है. तस्वीर में मेरे अलावा, मेरी पत्नी पमिला, जाह्नवी (बब्लू की बेटी), अम्मा और बब्लू की पत्नी रीना है. हमारी अपनी कोई संतान नहीं लिहाजा, मेरे बड़े भैया के दो बेटे और बब्लू की दो बेटियाँ ही हमारे लिए सबकुछ हैं.]


हम तो मुहब्बत करेगा, दुनिया से नही डरेगा...


मैने पामिला से १९९६ में शादी कर ली. घर वालों की तरफ़ से शादी की मुखालिफत हुई. सामान्य बात थी. इसके पहले हमारे परिवार में किसी ने भी अंतर्जातीय विवाह नहीं किया था, लिहाजा विरोध होना स्वाभाविक बात थी. पिताजी और अम्मा के साथ-साथ मेरे चाचा, चचेरे भाई वगैरह, सभी नाराज थे. शादी के करीब डेढ़ साल बाद तक मैं घर नहीं गया. इस दौरान मेरी मुलाक़ात मेरे छोटे भाई, बबलू से होती रहती थी. बबलू कालेज के हॉस्टल में रहकर डाक्टरी की पढ़ाई करता था. मैं उससे मिलता रहता. फिर एक दिन पिताजी और अम्मा घर पर आए. उसके बाद सबकुछ सामान्य हो गया. ऊटी में मेरी ससुराल है. पामिला के घर वाले ऊटी के ही हैं. उनदिनों हिन्दी फिल्मों की शूटिंग स्विटजरलैंड में कम ही होती थी. इसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता. जब कोई फ़िल्म देख रहा होता तो श्रीमती जी ठीक गाइड की तरह शुरू हो जातीं; 'और ये देखो, ये जो जगह है वो ऊटी का बोटेनिकल गार्डन हैं. यहाँ बहुत शूटिंग होती है. और हाँ, ये जो जगह है, ये वहाँ की एक झील है.' मैंने एक बार सोचा कि श्रीमती जी को इस गाईड वाले मोड से निकालने का एक ही रास्ता है कि मैं एक बार ख़ुद ही ससुराल चला जाऊं. एक बार वहाँ जाकर आया तबसे ये गाईड वाला एपिसोड फ़िल्म देखने के आड़े नहीं आया. [जारी]

23 कमेंट्स:

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

:)

और विस्तार से लिखे भाई।

काकेश said...

आपके मित्रों को हमने भी पहचान लिया.

मजा आ रहा है पढ़कर.

नीरज गोस्वामी said...

अजित जी
आप ने हमारे ब्लॉग मित्रों को जिनसे शब्दों या अधिक से अधिक ध्वनी से नाता था नए अंदाज़ में मिलवाने का जो काम किया है उसके लिए उपयुक्त शब्द ढ़ूढ़ने पड़ेंगे. आप शब्दों के चितेरे हैं आप ही बतईये आप की प्रशंशा कैसे करूँ?
शिव के बारे में जितना पढता हूँ उसके प्रति प्रेम उतना ही बढ़ता है.सिर्फ़ शब्दों और ध्वनी का ही उनसे नाता है लेकिन लगता ही नहीं की उनसे कभी नहीं मिला हूँ. विलक्षण प्रतिभा के धनि हैं वो. कभी लगता है मेरा ही छोटा भाई है जो शायद कभी कुम्भ के मेले में बिछुड़ गया होगा, लेकिन माता जी बताती हैं की वो कभी कुम्भ गयी ही नहीं, फ़िर भी उनके संस्मरण पढ़के खूब आनंद आ रहा है. इश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे.
नीरज

रवीन्द्र प्रभात said...

सचमुच मजा आ रहा है पढ़कर !

mamta said...

शिव जी के बारे मे पढ़कर उनका एक अलग ही रूप सामने आ रहा है।

डॉ. चन्द्रकुमार जैन said...

अजित जी ,
पतंग वाली पोस्ट में
आपकी शुभकामना पढ़ीं.
मुझे सिर्फ़ ये मालूम है कि
इस सफ़र ने मुझे हमराह ही नहीं
दीवाना भी बना दिया है .
बड़ी मिन्नतों के बाद भी अच्छी बातों का
ऐसा सुंदर ठौर-ठिकाना कहाँ मिलता है ?
===========================
रहा सवाल टिप्पणियों का तो
उसकी पसंदगी की वज़ह भी आप ही हैं .
.....और दीवानों को हर दौर में थोड़ी या अधिक दीवानगी
दुनिया की भी मिल ही जाती है न ?
वही अपने हिस्से आ रही होगी .
लिहाज़ा शुक्रिया उनका भी
जिन्हें अच्छे को ....अच्छे से.... अच्छा कहना......अच्छा लगता है !
===========================================
...और शिव जी की जीवन यात्रा स्वयं कह रही हॅ
कि कठिन परिश्रम का विकल्प नहीं है .

आभार .
डा.चंद्रकुमार जैन

vimal verma said...

क्या बात है विवाह वाला मामला भी आपका खूब रहा...अच्छा लग रहा है आपको जानना.....अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..

Priyankar said...

बहुत अच्छा लिखा है . किसी भी सिद्ध लिक्खाड़ को टक्कर देती शिव की शैली बहुत सधी हुई है . नीरज भाई की तरह मुझे भी शिव के प्रशंसकों में गिन लीजिए . मैं उनके लिखे में अपना बचपन ढूंढ रहा हूं .

अजित वडनेरकर said...

प्रियंकर और नीरज गोस्वामी एकदम सही कह रहे हैं। मैं दोनों साथियों की बात से सौ फीसद सहमत हूं। दरअसल ये पहल हुई इसीलिए थी कि सभी ब्लागर साथी सचमुच एकदूसरे से जुड़ाव का स्थायी आधार पा सकें। इसके लिए ब्लागर की उस शख्सियत को जानना निहायत ज़रूरी था जो उसके ब्लाग से हटकर है और सचमुच है। मुझे खुशी है कि आप सबके सहयोग से ये पहल रंग ला रही है।
शब्दों का सफर चलता रहेगा।
शुक्रिया साथियों.....

Parul said...

पिछ्ली कड़ियाँ छूट गयी थीं - अभी पढ़ीं -धुनायी,पढ़ाई और सगाई -शिव जी, अच्छा लगा-सफ़र जारी रक्खें :}}

Gyandutt Pandey said...

तारकेश्वर मिेश्र से दोस्ती करनी है। कहां मिलेंगे?

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अजित जी,
सफ़र के इस प्रतिष्ठित स्थल पर
मैं सभी सम्मानित सहयाती मित्रों को
सादर सूचित करना चाहता हूँ कि
मसि कागद मेरा एक और नया ब्लॉग है
जिसका लिंक मैने ऊपर अपने संदेश में दिया है .
===============================
धन्यवाद
डा.चंद्रकुमार जैन

बोधिसत्व said...

lage rahen muisir ji jay ho

दिनेशराय द्विवेदी said...

एसा लग रहा है कि गाड़ी बहुत तेजी से दौड़ रही है।

Lavanyam - Antarman said...

पामिला जी से मिलवाया आपने इसकी खुसी है उन्हेँ मेरी हेल्लो और नमस्ते कहियेगा.
आपके परिवार के सभी की तस्वीर बडी सहज व आत्मीय सी लगी -
आप के ओस्तो
के बारे मेपहकर खूब हँसी आयी.
आगे भी पढना चाहेँगेँ आप लिखियेगा.
अजित भाई को पुन: बधाई उन्के एस स्तँभ व प्रयास के लिये.
- लावण्या

जोशिम said...

आय हाय - "दिल" चस्प लिखे रहें - [ आशिक आवारा सुना था यहाँ अजित जी के वास्ते आशिक अकाउनटेंट से भी साक्षात्कार हो गया - ऊटी - आपकी ससुराल- उम्दा जगह है - हम भी एक समय हो आए थे [देर आयद ]

Udan Tashtari said...

शिव जी

लेखन गंगा बहाये रखिये. पावन डुबकी का आनन्द उठा रहे हैं हम. साथ में अजित भाई की जय भी करते जा रहे हैं.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

शिव भाई, हमारे मन में तो मुन्ना पाण्डेय, मैना सिंह, मुन्ना सिंह, बिरेंदर सिंह, प्रेम बहादुर सिंह के नाम सुन और पढ़ कर भी बड़े अच्छे-अच्छे भाव आ रहे हैं. हमारे एक मित्र हैं हवलदार दुबे. वह शायर भी हैं और महानगरपालिका में इंजीनियर भी. नाम में क्या रखा है?

लेकिन हाँ, तारकेश्वर मिश्रा जी का वर्णन सुनकर जरूर हाथ-पाँव फूल रहे हैं.

Neeraj Rohilla said...

तारकेश्वरजी जैसे मित्र हों तो अक्सर काम आ जाते हैं । अभी पिछ्ले महीने ही हमारे ६ फ़ुट ३ इंची और ११० किग्रा वजनी मित्र ने एक पब में हमारे एक दूसरे मित्र का साथ निभाया था :-)

अभी तो कहानी चल रही है, आगे और मजा आयेगा । थोडा विस्तार से लिखें ।

अनूप शुक्ल said...

बहुत सुन्दर! आगे का इंतजार है। जरा विस्तार से लिखा जाये। बहुत सरपट विवरण दे रहे हैं जी।

अरुण said...

देर से आने के लिये माफ़ी , लेकिन ये ऊटी मे जब आप हमसे पंगा लिये थे,वो कहानी काहे नही सुनाई :) और शादी कैसे हूई कहा हूई, जरा तफ़सील से बताये ताकी नये वालो का साहस बढ सके :)

anitakumar said...

शिव जी बहुत मजेदार विवरण चल रहा है। लेकिन हम भी सबसे सहमत हैं जरा ज्यादा विस्तार से लिखिए, ये क्या बस एक पिक्चर देखी और शादी भी हो गयी।

आभा said...

अरे वाहं मै तो सोच रही थी की शिव जी पढे लिखे सोझिया बुझिया है पर यह प्रमिला जी का किस्सा असली किस्सा है ...।एक प्रगतिशील शिव जी से मिली शुक्रिया

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