Wednesday, March 19, 2008

बीस साल बाद तुम क्या करोगे विमल ? [बकलमखुद -6]

बकलमखुद की छठी कड़ी में जानते हैं विमल वर्मा के आत्मकथ्य में आगे का हाल। आज़मगढ़ से इलाहाबाद का सफ़र... रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों की मौजमस्ती, फिर भटकाव....और दिल्ली को कूच ...

हमने राजा का बाजा जो जन नाट्य मंच का लिखा था, उसे इम्प्रोवाइज़ करके और बेहतर बना कर उसके प्रदर्शन किये और साथ ही भारतीय इतिहास पर आधारित नाटक इतिहास गवाह है जैसे नाटकों के प्रदर्शन किये। ये सिलसिला करीब '८९ तक चला और इस यात्रा में प्रमोद सिंह (अज़दक?), अनिल सिंह (एक हिन्दुस्तानी की डायरी), उदय, अभय तिवारी (निर्मल आनन्द), इरफ़ान,राजेश अभय, अमरेश मिश्र , पंकज श्रीवास्तव, तिगमांशु धूलिया और भी बहुत से साथी शामिल थे। हमने पूरे देश में घूम घूम कर नुक्कड़ नाटक किये, खूब गीत गाए। हमारे हर नाटक के हज़ार से ज़्यादा शो हो चुके थे और उन्हें देखने-सराहने वाली भी हजारों जोड़ी आंखें थीं। जन संस्कृति मंच की स्थापना में भी हमारी भूमिका थी। लगभग इसी दौरान हमने मेक्सिम गोर्की का नाटक 'पेटिबूर्ज़ुआ' को अपने ढंग से अडॉप्ट करके बड़े फ़लक का नाटक करने की कोशिश की थी। इस नाटक को अमरेश मिश्र ने निर्देशित किया और स्क्रिप्ट पर मेहनत प्रमोद ने की थी। इस नाटक से हमने अपना खर्चा भी निकाल लिया था( जो हिन्दी रंगमंच की तब तो कम से कम दुर्लभ उपलब्धि थी) इसमे प्रमोद, तिगमांशु धूलिया और अमरेश मिश्र ने भी अभिनय किया ।

मूडी प्रमोद की बेमुरव्वती !

इलाहाबाद में हमने बादल सरकार का नाटक घेरा किया जो ब्रेख्त के नाटक कॉकेशियन चॉक सर्किल का अडॉप्टेशन था। इस दौर मैं और प्रमोद सिंह रूम मेट थे। समय अपनी तरह से चलता रहा, सो वो हमारे साथ भी हुआ। प्रमोद सिंह जैसे मित्र के साथ हमने पूरे पाँच साल गुज़ारे। प्रमोद के साथ गुज़रे दिन मेरे लिये अविस्मरणीय है। साथ- साथ रहना और नाटक करना अद्भुत था। प्रमोद के साथ रहकर मुझे बांग्ला संगीत से लेकर बीटल्स और भी बहुत सी बातों का ज्ञान हुआ। हालांकि इसे स्वीकारने में मुझे हिचक नहीं है कि हमारे और प्रमोद में मनमुटाव भी हुए। जैसे कभी नाटक करने हमें जाना हो तो प्रमोद इसलिये मना कर देते कि फ़लाना फ़िल्म फ़ेस्टिवल है। आप लोग जाइये, नाटक करिये, मुझे तो फ़िल्म देखनी है। भला ये भी कोई बात होती है ! अब हम किसी नये साथी को तलाश कर प्रमोद वाला रोल समझाते, और प्रमोद मियाँ अपने फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मगन रहते। अलबत्ता फ़िल्म का अगर कोई चक्कर ना हो तो प्रमोद हमेशा हमारे शो करते,नाटक के साथ हम गीत भी गाया करते थे। गीत गाना मुझे हमेशा पसन्द रहा है.. लेकिन हमारे गाने ज़्यादातर कोरस वाले गाने हुआ करते थे।

कूंची वाले हाथों में कार्बाइन थामोगे ?

"दस्ता" के एक साथी संजय चतुर्वेदी ने हमें एक दिन खबर दी कि उनका सेलेक्शन सीडीएस में हो गया है। कुछ साथी उस पर पिल पड़े । अपने अभय तिवारी ने उनसे कहा कि जिन हाथों में कूँची पकड़ते हो उन हाथों में तुम अब कार्बाइन थामोगे? मैं इस सोच का विरोध करता हूँ! पर संजय का कहना था कि भाई, मेरे पिता का सपना है कि मैं फ़ौज में जाऊँ, और मैनें भी इसीलिए हां कह दिया है कि अब पांच साल तो वहीं रहना है। उसके बाद सब दस्ता के साथियों के साथ कल्चरल वर्क ही करना है.. बस पाँच साल की ही तो बात है!... और संजय पाँच साल बाद जब मेजर बन के वापस आया तो इन पाँच साल में सब कुछ बदल गया था।

...जाऊं कहां बता ऐ दिल !

सब साथी अपने अपने जीवन की भागा- दौड़ी में इधर उधर छिटक चुके थे। दस्ता में फिर से नये नये चेहरे दिखने लगे थे और मेरा मन भी बहुत ज़्यादा नाटक करते ऊब चुका था। अब हम उकताए उकताए यहां वहां टहल रहे थे। धीरे धीरे शहर से कहीं दूर चले जाने की इच्छा होने लगी थी... पर जाना कहां है ये अभी तय नहीं कर पा रहा था। पर इतना ज़रूर था कि अपने प्रियतम शहर इलाहाबाद को छोड़ने का मैंने मन भी बना लिया था। अलबत्ता छोड़ें कैसे ? ...कुछ समझ नहीं आ रहा था कि एक दिन छोड़ने का बहाना भी मिल गया! इसका भी एक क़िस्सा है...

एक सवाल जो दिमाग़ में गूंजता रहा

सिविल लाइन में नीलाभ प्रकाशन में हमारा अक्सर बैठना होता था। मशहूर साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क के बेटे नीलाभ अश्क जी ने हमारे साथ ब्रेख़्त का एक नाटक एक्सेप्शन एन्ड द रूल का अनुवाद और साथ साथ निर्देशन भी किया था। एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मुझे देखते ही नीलाभ भाई ने कहा? कि "आपसे कुछ बात करनी है कहीं निकल मत लीजियेगा" मुझे लगा कुछ आम बात होगी, बहुत दिनों बाद मिले है, पान वान खिलायेंगे। नीलाभ भाई आए। थोड़ी देर खामोश रहने के बाद उन्होंने कहा "बहुत दिनों से आप लोग के बारे में ही सोच रहा था क्या आपने कभी सोचा है कि बीस साल बाद आप क्या कर रहे होंगे? सवाल तो बड़ा विकट था पर मैने हँस कर टालने की कोशिश? की और कहा "क्या नीलाभ भाई भविष्य की कौन सोचता है हम तो वर्तमान में ही जीते है। आगे की आगे देखी जाएगी''... बात खत्म हुई और? मैं साइकिल पर वापस कमरे लौट रहा था पर मेरे दिमाग में एक ही.बात इको हो रही थी कि "बीस साल बाद तुम क्या कर रहे होगे?" बार बार दिमाग में ये वाक्य गूंज रहा था।
[इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में किए गए एक नाटक का नज़ारा]

दिल्ली में रहेंगे खायेंगे क्या ?

नीलाभ जी की कही बात मन में घर कर गई थी। इसी गूँज की वजह से इलाहाबाद छोड़कर शायद दिल्ली आना पड़ा और व्यावसायिक तौर पर रंगमंच से जुड़ने का अहम फ़ैसला ले लिया। मेरे दिमाग में एक बात बार-बार आ रही थी कि समाज परिवर्तन की जंग तो लगता है बहुत लम्बी चलेगी.. अपना देश भी इतना बड़ा है कि जनता को मोबलाईज़ करते करते तो जीवन निकल जाएगा.. पंजाब की अलग समस्या है तो बिहार की अलग तो मिजोरम, मेघालय हैं तो गोआ सबको इकट्ठा करना बाप रे, ये तो मेरी ज़िन्दगी में तो हो नहीं पायेगा। बस अब ब्रेख्त की जिस कविता से प्रभावित था, उसी से नये अर्थ निकालने लग गया, कविता थी:

तुम्हारा ये उद्देश्य ना हो
कि तुम एक बेहतर इंसान बनो
बल्कि ये हो कि
तुम एक बेहतर समाज से विदा लो


अब मैं सोचने लग गया कि भाई इस विशाल देश में बेहतर समाज बनाने की लड़ाई लड़ने में तो जीवन दे भी दें तो भी जिस परिवर्तन को हम देखना चाहते हैं वो मैं अपनी ज़िंदगी में शायद ही देख पाऊं, बेहतर इंसान ही बनना शायद ये मेरे लिये बहुत बड़ी बात होगी। अपनी जितनी भूमिका थी निभा दी अब कुछ और देखा जाय..और अब हमने ८९ दिल्ली की तरफ़ रूख किया।

हमारी फ़ाकामस्ती और गुज़र जाना पिता का...

दिल्ली में खिलौना थियेटर फ़ॉर चिल्ड्रेन संस्था के साथ जुड़ा और बच्चों के लिये खूब नाटक किये। यहाँ नाटक करने के पैसे भी मिलते थे, पर कहते हैं पैसा रिश्ते की मिठास तय करता है..यहाँ कुछ ही दिनों में मुझे आटे-चावल का भाव पता चल गया। जिनके खिलाफ़ अपनी पिछली ज़िन्दगी में लड़ता रहा आज मेरा सामना उसी से हो रहा था- मतलब शोषण-दमन-उत्पीड़न.... पता चला पैसे के लिये वो सब कुछ मेरे साथ हुआ जो एक बंधुआ मजदूर के साथ होता है। लड़ झगड़ कर वहाँ से भी चलता बना, पर यहा काम अच्छा था। दिल्ली और हरियाणा में जितने भी पब्लिक स्कूल थे उन सारे स्कूलों में हमने अपने नाटकों के के प्रदर्शन किये। इसी दौरान मेरे पिता गुज़र गये। घर पर किसी को पता ही नहीं कि हम कहाँ है... आखिरी समय पिता को देख नहीं पाया ये आजतक अंदर तक सालता है। जब लौट कर आया तो मेरे मित्र आशीष विद्यार्थी ने सीपीसी दूरदर्शन में मेरे लिये बात कर थी और हम साथ साथ वहाँ वेद सिन्हा के असिस्टेन्ट हो गये, यहां हमने कुछ टेलीफ़िल्में की, काम करना अच्छा लगता रहा। कुछ समय काम करने के बाद के बाद मैने वहां से भी नमस्कार किया ।

अशोक पुरंग भरते रहे मकान का किराया...

प्रमोद सिंह और अनिल भी दिल्ली में ही थे,
प्रमोद साँचा में कला संपादक थे और अनिल सिंह पब्लिक एशिया मैगज़ीन में सह सम्पादक थे, इन्हीं के भरोसे मैं दिल्ली आ गया था, पर इन दोनो से मिलना उतना हो नहीं पाता। बाद में प्रमोद सिंह चले गये इटली। दिल्ली में मित्रमंडली के साथ खूब नाटक के वर्कशाप किये। एक मित्र का ज़िक्र अगर नहीं करूंगा तो मामला अधूरा ही रह जाएगा.. अशोक पुरंग जिन्होंने हमेशा हमें सम्भाला। यकीन नहीं मानेंगे काफ़ी दिनों तक हमारे खाने और यहाँ तक कि कमरे का किराया भी उन्होने ही अदा किया।[चित्र में धंआं छोड़ते शख्स अज़दक हैं]
सीखना दिल्ली में गालियां और सड़कों पर गाना...

दिल्ली के मंडली में एन के शर्मा, आशीष विद्यार्थी, पीयूष मिश्रा, गजराव राव, अनुभव सिन्हा , निर्मल पाण्डे, मनोज बाजपेई- जो मेरे रूम पार्टनर भी थे। मेरा छोटा भाई नवीन भी इस मंडली का हिस्सा था। खूब गाली गलौज होती थी, मैने दिल्ली आकर तरह तरह की गालियाँ सीखी। खूब शराब पार्टियों में धुत्त रहा और बाद मे इसी गाली गलौज के बीच एक नाटक की संस्था खड़ी हुई जिसका नाम एक्ट वन ग्रुप था। खूब जम कर नाटक किया हमने। एक समय तो गीत की मंडली में तब्दील होकर सड़क पर गीत गाने का दौर भी खूब चला...

गिरना बाबरी मस्जिद का , समझा जाना हमे बुद्धिजीवी...

ये तब की बात है जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरी थी पर यहाँ दिल्ली में भी पेट पालना मुश्किल हो रहा था। जब बाबरी मस्जिद गिरी थी तब मैं वहाँ कैमरा टीम के साथ कवर करने गया था, वहाँ से बड़ी मुश्किल से जान बचाकर हम आए थे। और दिल्ली आते ही हमारे मित्र राजेश जोशी, जो अब बी बी सी सेवा में हैं, मेरे घर आए इस बात से वो बहुत आहत थे। उन्होंने कहा हम लखनऊ में इसका विरोध करने जा रहे हैं, आप भी चलिये। मैं भी गया । वहाँ उपस्थिति देखकर शर्म आ रही थी... हम पूरे साठ लोग थे! दूसरे दिन अखबार में निकला साठ बुद्धिजीवियों ने बाबरी मस्ज़िद गिराये जाने का विरोध किया। इन बुद्धिजीवियों मे मुझे भी गिन लिया गया था, मुझे तो इस बात की खुशी थी! [बाकी हाल अगली कड़ी में]

और एक बानगी, विमल गान की ।
सौजन्यः अनिताकुमार वाया यूनुस





अजीत भाई
अनीता जी ने मुझे सीडी दी थी पर मुझसे खो गयी थी । मुंबई की दूरियों की करामात देखिए कि उनसे कुरियर से सीडी दोबारा मंगानी पड़ी ...अब दाल में काला था या काले में दाल थी का भेद खुल जायेगा । जहां तक मुझे याद आता है ये गोरख पांडे का गीत है । विमल से कंफर्म करें । पीछे दाढ़ी में बैठे संतश्री हैं अज़दक । फिर कैमेरा पैन होता है तो चश्‍मा लगाये दो प्राणी हैं मनीष और मैं । बांई ओर तबला विकास बजा रहा है । ब्‍लॉग बुद्धि विकास । और हां इस वीडियो को शूट करने का करिश्‍मा अनीता जी ने किया है । इसलिए सारे धन्‍यवाद नवी मुंबई की ओर प्रेषित किये जाएं । हम तो मठ के सेवक हैं सरकार । जय हो ।
यूनुस
[शुक्रिया तो अनिताजी और आपका है यूनुस भाई की इस पोस्ट को समृद्ध बनाने में आप लोगों ने वक्त निकाला ]

19 कमेंट्स:

Sanjay said...

बाकी सब तो ठीक है बड़े भाई लेकिन सनद रहे धूम्रपान का सरेआम प्रचार करने पर पाबंदी है. बिल्‍कुल भी छूट नहीं है जी..... बच्‍चा लोग को क्‍या संदेश नहीं मिलेगा. स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को पता चल गया तो आफत होगी अलग.... यूं ही बस एक बात.... :)

अनिल रघुराज said...

विमल से अनुरोध है कि गोरखपुर, सलेमपुर, बलिया के पारिवारिक किस्से, आज़मगढ़, इलाहाबाद और दिल्ली से लेकर मुंबई तक के आंतरिक सफर को कलमबंद करे। इससे हमारे समय का एक मानवीय जीवंत इतिहास दर्ज हो जाएगा। साथ ही सबको पढ़ने की रोचक सामग्री मिल जाएगी। बहुत ही अच्छे अंदाज़ में अभी तक पेश हुई है ये कथा।

आनंद said...

बहुत ही रोचक कथा है। अगले अंक का इंतज़ार रहेगा। - आनंद

इरफ़ान said...

विमलजी कमाल है...आप लिखते रहिये. हम पढ रहे हैं. बस शिकायत ये है कि जिन कहानियों को आप छ: छः लाइनों में निपटा रहे हैं उन पर थोडा और टिकिये.

vimal verma said...

"पहले दाल में काला था" सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचना है,धुन प्रमोदजी की है,...अजित भाई आप कमाल हैं,मेरे लिखे का परिमार्जित रूप मुझे तो लग ही नहीं रहा कि मैने लिखा है,आपको और प्रमोद का बहुत बहुत शुक्रिया,और उन साथियों से जो इसे पढ़ रहे हैं,उन्हें मेरा तहे दिल से धन्यवाद।

आशीष said...

विमल जी के बारें में जानकार अच्‍छा लगा, यात्रा जारी रखें

अजित वडनेरकर said...

विमल भाई, आपकी कहानी के किरदार कुछ कह रहे हैं, ज़रा उस पर गौर करें।

चंद्रभूषण said...

जारी रहे विमल बाबू, शानदार है। अजित जी को एक बार फिर बधाई और धन्यवाद।

अफ़लातून said...

विमल , गीत सुन कर मस्त हो गए।

Anonymous said...

हम भी इरफ़ान जी से सहमत हैं. छह लाइनों की बजाय अगर कुछ और विस्तार दें तो
बहुत आभार होगा..
नाट्य मंच ही नहीं , जीवन के अनेकों अनुभवों का खज़ाना मिलने के इंतज़ार में .... !
मीनाक्षी

Sanjeet Tripathi said...

किसी संघर्ष को सालों बाद शब्दों का जामा पहनाने पर वह एक कहानी का रूप धारण कर ही लेता है।
लेकिन इरफान जी की बात वाकई सही लग रही है कि छै-छै लाईन मे निपटा रहे हैं।

विमल जी, आपने और आपकी सारी मित्रमंडली ने सिर्फ़ जीवन ही नही जीया है बल्कि उस समय को डूबकर जीया है।
मैं तो कहूंगा कि आपकी मित्र मंडली के जो-जो सदस्य हैं ब्लॉग जगत पर, वह खुद अपना सफ़र इस शब्दों के सफ़र में जरुर डालें!!
शायद हम आप सबके अनुभवों से कुछ सीख सकें!!

अज़दक साहेब तो एक्दमै धांसू लग रहे है फोटू मा।

vimal verma said...

इरफ़ानजी और संजीत भाई, अब यही मेरे लिये दुरूह हो रहा था,ये तो कहिये कैसे कैसे कुछ चित्र से दिमाग पर आ रहे थे मैं लिख रहा था,पर बह्त से प्रसंगों को अब यहाँ उठाने लगता तो रूप औपन्यासिक हो जाता बचने की कोशिश कर रहा था,और वैसे भी इतना सब पढ़ने का धैर्य किसमें है,हां इसको लिखने के बाद बहुत सी बातें जो जानबूझ कर छोड़ दी थीं, उसे लिखने की कोशिश ज़रूर करूंगा,आप इसे पढ़ रहे हैं यही मेरे लिये काफ़ी है, आप सभी का फिर से शुक्रिया

काकेश said...

पढ़ क्या रहे हैं सुबह से तीन बार यहाँ का चक्कर लगा चुके हैं. और ये गाना तो पहले से ही कॉपी कर के रखा हुआ है जब मन होता है सुन लेते हैं. बहुत खूब जारी रहें. अजीत जी को भी धन्यवाद.

Ghost Buster said...

अत्यन्त रोचक संस्मरण हैं. आनंद आ रहा है. अजित जी को भी धन्यवाद.

anitakumar said...

विमल जी आप के गायन के कायल तो पहले ही हो गये थे अब आप की लेखन के भी कायल हो गये। युनुस जी को धन्यवाद जिन्होंने इस गान को यहां सुनाने की व्यवस्था की। युनुस जी से अनुरोध है कि विमल जी के दूसरे गाने भी यहां डालें, ताकि एक बार फ़िर हम पूरा आंनद ले सकें।
विमल जी अनिल जी की बात को ध्यान में रखिए और दूसरे ब्लोगर भाइयों से भी हमारा परिचय कराइए ॥:)

रवीन्द्र प्रभात said...

संस्मरण अत्यन्त रोचक है, मजा आ गया !

yunus said...

विमल जी छह लाईनों में मत निपटाईये भई ।
हमारे पास पढ़ने का शौक़ और धीरज है, अजीत भाई के पास प्रस्‍तुति का हुनर और जुनून है तो आपको चिंता किस बात की है ।
और हां सभी दिल थाम कर बैठें शब्‍दों का सफ़र के सुनहरे परदे पर जल्‍द आ रहा है विमल भाई के स्‍वर में फैज़ का एक गीत ।
और उसके बाद नया चलचित्र । मस्‍ती की तरंग में विमल पर चढ़ेगा कवि नीरज का रंग ।
कीजिए इंतज़ार
फिलहाल नमस्‍कार :D

अनूप शुक्ल said...

दुबारा पढ़ रहे हैं इसे। अच्छा लग रहा है। जारी रखें।

vimal verma said...

[इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में किए गए एक नाटक का नज़ारा]में "एक नाटक" की जगह अगर ब्रेख्त का नाटक "खड़िया का घेरा" लिख दें तो मेहरबानी होगी.. सूचना मैं देर से दे रहा हूँ इसके लिये माफ़ करियेगा।

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