Tuesday, July 14, 2009

मेवाड़ के पंडित बारां आ बसे [बकलमखुद-92]

पिछली कड़ी> कॉपी के लिए चांटा, सरदार सुन्न से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और इक्यानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

कि तना कठिन जीवन रहा होगा पूर्वजों का? यह सोच कर ही सरदार को झुरझुरी आ जाती है। हल्दीघाटी युद्ध के उपरांत जब मेवाड़ के सूर्य महाराणा प्रताप को जंगलों की शरण लेनी पड़ी और नगरीय जनता मुगलों की अधीनता में जीने लगी। मेवाड़ में स्वाभिमानी लोगों का जीवन भी कठिन हो गया। अनेक लोग मेवाड़ से पलायन कर गए। ब्राह्मणों के श्रेष्ठ आश्रयदाता राज्य से ब्राह्मणों की भी पूरी एक शाखा निकल कर कोटा राज्य और आज के श्योपुर, गुना, राजगढ़ भोपाल और रायसेन जिलों में जा बसी। निश्चित ही ये लोग अपने कर्म और शिक्षा में श्रेष्ट रहे होंगे तभी तो उन्हें यहाँ कुछ ही समय में राजाओं, सामंतो के यहाँ पुरोहित और ग्राम पुरोहित के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इन्ही में सरदार का परिवार भी था।
लायन करने वाली पीढ़ी से बारहवीं पीढ़ी में सरदार के दाज्जी थे और वे केवल पाँच भाई और एक बुआ शेष थीं। इन में भी पिता जी की पीढ़ी में एक पिताजी स्वयं, एक उन के सगे भाई और एक चचेरे भाई कुल तीन पुरुष शेष रहे, लेकिन बहनों की संख्या आठ थी। कुल ग्यारह भाई-बहिन। दाज्जी सब से बड़े थे तो सब उन के पास ही एकत्र होते। सरदार के चाचा-बुआओं, मौसियों और मामा की संतानों की संख्या पचास से ऊपर। पितृ-कुल के भाई-बहन लगातार दाज्जी के पास आते और हफ्तों रहते। सरदार अपने मामा-मौसी के यहाँ जाता तो वहाँ मातृ-कुल के भाई-बहन मिल जाते। पलायन के बाद का संघर्ष अब रंग ला रहा था। ज्ञान दारिद्र्य तो कभी फटका ही नहीं था। देश की आजादी के बाद अब आर्थिक दारिद्र्य भी दूर हो रहा था। जीवन सुखद होने लगा था। सरदार की छठी कक्षा की पढ़ाई आरंभ हुई ही थी कि पिताजी का तबादला सांगोद से बारां हो गया। अब वे हायर सैकंडरी स्कूल में अध्यापक थे। अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल कुछ ही दिनों में हेडमास्टर जी के अधिकांश दायित्व वे ही निभाने लगे। लेकिन सरदार का दाखिला उन्होंने एक अन्य मिडिल स्कूल में कराया। छठी कक्षा में अंग्रेजी की पढ़ाई बाकायदे आरंभ हुई। अध्यापक अच्छा नहीं था।
क दिन अध्यापक कम होने से सरदार की कक्षा को किसी दूसरे सेक्शन के साथ मिला दिया। उस में अंग्रेजी के अध्यापक कठोर तो थे, लेकिन पढ़ाते अच्छा थे। दो दिन बाद सब छात्र अपने सेक्शन में लौटे लेकिन सरदार उसी दूसरे सेक्शन में पढ़ता रहा। पूरा डेढ़ महीना निकल गया। इस सेक्शन में नाम न था तो सरदार की हाजरी भी न होती। एक दिन सरदार पकड़ा गया। अध्यापक जी ने पूछा –तुम इस कक्षा में कैसे बैठते हो? उन्हें सरदार ने बताया कि वह दूसरे सैक्शन में था और डेढ़ माह पहले उन का सैक्शन इस सैक्शन में मिलाया गया था तब आप का अंग्रेजी पढ़ाना भा गया और तब से वह इसी सेक्शन में बैठता है। दूसरे सैक्शन का रजिस्टर देखा गया तो पता लगा वहाँ गैरहाजिर रहने के कारण कक्षा से नाम हटा दिया गया था। पिता के बारे में पूछताछ की तो पता लगा कि सरदार मास्टर वैद्यजी की पुत्र है। हेडमास्टर साहब के सामने पेशी हुई। नाम तो लिख दिया गया लेकिन सजा यह मिली कि वापस उसी क्लास में जा कर बैठना पड़ा। सरदार की अंग्रेजी का ऐसा सत्यानाश हुआ कि वह वकालत आरंभ होने पर अदालतों के फैसले और कानून की किताबें पढ़ने के बाद ही कुछ सुधऱ सकी। साल भर में ही पिताजी की बदली हो गई और वे मोड़क स्टेशन पर मिडिल स्कूल के हेड मास्टर बना दिए गए। पिताजी फिर सरदार से दूर चले गए। लेकिन इस एक वर्ष में हायर सैकेंडरी स्कूल के पुस्तकालय की अधिकांश बालोपयोगी पुस्तकें और सारे कॉमिक सरदार ने पढ़ डाले। वह सप्ताह में एक दिन जाता और पिताजी के खाते में पुस्तकालय से पाँच-सात किताबें निकलवा लाता। लगभग रोज एक पुस्तक पढ़ना आदत बन गई थी। सरदार को उस के साथी किताबी कीड़ा कहने लगे। देर रात तक पढ़ने के कारण सुबह देर से सो कर उठने के कारण आलसी होने का खिताब भी मिला।
स बीच पढ़ाई के साथ वह मंदिर में दाज्जी के काम में हाथ बंटाता।
ऊपर बाएं से मोहनी बुआ, अम्मा (चेहरा ठीक न आने से खुद ही हटा दिया) छोटी बा, बा, और ललिता बुआ। नीचे बाएं से मोहन चाचा, बाबू चाचा, पिताजी, दाज्जी(गोद में सरदार) और छोटे दाज्जी.Family-2
उसे मंदिर में काम के दौरान बहुत चीजें सीखने को मिलीं। मंदिर एक प्रायोगिक पाठशाला था। कस्बे के कई मंदिरों में सावन के महिने में रोज नए-नए तरीके से झूले सजाए जाते। रोज कृष्ण-लीला, रामकथा और भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की कथाओं से सम्बन्धित झांकियाँ सजाई जातीं। दाज्जी और पिता जी का प्रयास रहता कि सब से आकर्षक झूले और झाँकियाँ अपने मंदिर में  ही बनें। पूरा सावन इसी में निकलता। स्कूल से आने के बाद यही एक काम। सरदार सचित्र भागवत को पढ़ कर नई-नई कथाओं पर झांकियाँ बनाने की तलाश करता रहता। फिर उस के लिए सामग्री तैयार की जाती। पिता जी सीता स्वयंवर, और सीता-हरण की झांकियाँ बहुत सुंदर बनाते। “मुचुकंद की दृष्टि से कालयवन का वध” जैसी लोगों के लिए अनजानी कथाओं पर अनेक झांकियाँ सरदार ने तलाश कर बनाईं। अनजानी कथाओं पर झांकियाँ बनाने पर उन्हें दर्शक के लिए खोले जाने पर गाइड बन झाँकी की पूरी कथा सुनाने का आनंद और श्रेय कुछ और ही होता। छठी कक्षा में प्रवेश के दिनों से ही झांकियों में अस्थाई विद्युत रोशनी की व्यवस्था तो सरदार के जिम्मे ही थी। इस के अलावा सफेद, रंगीन, चमकीले कागजों की कटिंग कर विभिन्न डिजाइनें बना कर झूले सजाना। झांकियों के लिए मिट्टी के पुतले बनाना और कच्चे रंग से उन्हें मानवाकृति देना, कपड़ों से सजावट करना जैसे बहुत से काम वहाँ सीखने को मिले। सरदार के अध्यापक फूफा जी भी इन दिनों काम में हाथ बंटाने के लिए मंदिर पर ही रहते। सब मिल कर खूब काम करते। दिन बहुत आनंद से गुजरते।
फूफा जी बीड़ी पिया करते थे, लेकिन दाज्जी और पिता जी से छुप कर। छोटे चाचा को उन्हें चिढ़ाने में आनंद आता। एक बार केले के तनों से झूले सजाए गए। लेकिन बरसात जोर की हो जाने से दर्शक बहुत कम आए। चढ़ावे की थाली में भी दस पांच ही सिक्के निकले। दूसरे दिन फूफाजी कहने लगे -कल मेहनत से सुंदर सजावट की लेकिन बरसात के कारण दर्शक और चढ़ावा बहुत कम आया। छोटे चाचा ने जोर से कहा जिस से दाज्जी सुन लें–जीजा जी आप का बीड़ी का बंडल और माचिस जितने तो आ ही गए थे। फूफा जी सिटपिटा गए। उधर दूर काम कर रहे दाज्जी सुन कर मुस्कुराने लगे थे।

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14 कमेंट्स:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आपके पूजनीय दाज्जी की तस्वीर बहुत पसँद आयी - देखकर लगता है उनमेँ जीवन के प्रति उत्साह रहा होगा
ये कडी भी जानदार रही ..आगे भी इँतज़ार रहेगा
- लावण्या

Udan Tashtari said...

पूरे परिवार के बारे में जानकर और तस्वीर देखकर बहुत हर्ष हुआ! आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सभी से मिलकर अच्छा लगा।
श्वेत-श्याम चित्र की महिमा ही निराली है।
परिवार के बारे में जानकर हर्ष हुआ!

मुनीश ( munish ) said...

very interesting and touching account of times gone by!

P.N. Subramanian said...

उनके और उनके परिवार के भूत में झाँकने का अवसर मिला. उन दिनों आप्रवासन कितना कष्ट साध्य रहा होगा. आभार.

Anil Pusadkar said...

भाऊ वकील साब का सरदार नाम मुझे यंहा के कांग्रेस नेता महेश शर्मा के पुत्र की याद दिलाता है।वे भी राजस्थान के ही ब्राह्मण है और उनके पुत्र क सर पर केश के कारण मैं उसे सरदार ही कहता था।आज भी महेश शर्मा या उनकी श्रीमति यानी भाभी कंही मिलती है तो ज़रूर बताती है भैया आपका सरदार अब बडा हो गया है। सरदार नाम से आज उसकी याद आ गई।वकील साब की जीवन यात्रा मे छोटी-बड़ी सभी बातों का बेहद ईमानदारी से वर्णन है जो इसे और प्रभावी बना देता है।

शोभना चौरे said...

परिवार के बारे में जानकर ऐसा लगा मनो हम अपने ही परिवार की कोई पुरानी फोटो देख रहे है |आपकी प्रभाव शाली भाषा शैली ने इसे और प्रभावी बना दिया है |
आभार

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

आपकी यह पारिवारिक कहानी कुछ-कुछ देश की भी कहानी कहती लगती है.

Science Bloggers Association said...

रोचक जानकारी, आभार।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत सरस और प्रभावी
है ये दास्तान....आभार
====================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सरदार से जुडाव सा होगया है . आगे का इंतज़ार

Arvind Mishra said...

पढ़ रहा हूँ !

sanjay kareer said...

मेवाड़ की भली याद दिलाई सरदार ने... अच्‍छा है सफर

अनूप शुक्ल said...

पढ़ लिये ये भी।

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