Sunday, July 12, 2009

भूलिये नहीं, ब्लागर भी हैं उदयप्रकाश…

संदर्भः भगवाजोगी के हाथों सम्मान

पुस्तक चर्चा के स्थान पर आजka[10]रविवारी मुद्दा

निवार की सुबह चार बजे से कबाड़खाने पर उदयप्रकाश से संबंधित पोस्ट से कुछ अनमना सा था। बहुत ज्यादा इसलिए नहीं क्योंकि उदयजी को सुलझा हुआ मानता हूं और आश्वस्त था कि बाकी साथी भी इस मंच को तथाकथित तौर पर सनसनी का वैसा औजार नहीं बनने देंगे जैसा होते जाने की वृत्ति इस माध्यम के साथ जन्म से जुड़ी है। यहां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण जो बात रही वह थी उदयजी की त्वरित प्रतिक्रिया, जो कहीं न कहीं उन्हें समझनेवालों को अशालीन भी लग सकती थी और लगी भी है। मैं खुद उनमें से एक हूं। पहली बात तो यह कि अनिल यादव की टिप्पणी में ऐसा कुछ नहीं था जिसे सोची-समझी साजिश कहा जाए। यह अचानक बिफरने का मसाला उपलब्ध नहीं कराती। सच पूछें तो इस टिप्पणी को पढ़ चुकने के बाद और यह पता होने के बावजूद कि उदयजी भी कबाड़ी हैं, मुझे उनसे ऐसी किसी प्रतिक्रिया की आशंका तक नहीं हुई।
निवार देर रात जब इस प्रसंग पर कबाड़खाना में दिलीप मंडल की हमेशा की तरह निरपेक्ष और सुलझी हुई बात पढ़ रहा था तो मुझे लगा कि वर्तमान में हिन्दी के पोंगे साहित्यकारों की जमात में उदयजी जैसे चंद नाम ही हैं जो इस तकनीकी दौर में संवाद के नए सरंजामों की समझ रखते हैं और उनसे जुड़े हुए हैं। ब्लाग इनमें एक है। ब्लाग बनाम साहित्य के संदर्भ में मेरी अपनी धारणा यही है कि एक ब्लाग पर साहित्य नहीं, संवाद रचा जाता है। किन्हीं शास्त्रीय परिभाषाओं में साहित्य को भी समाज का आईना, संवाद का माध्यम आदि बताया जाता रहा है। ये और बात है कि साहित्य का स्वरूप ही नहीं चरित्र तक बीते दशकों में, खासतौर पर आज़ादी के बाद इतनी तेजी से बदला कि उसका समाज से संवाद भी टूटा और आईने की सिफ़त भी जाती रही, वो अलग। ब्लागर बिरादरी में उदय प्रकाश जैसा नाम जुड़ने की खबर पर मिश्रित प्रतिक्रिया थी। पर ज्यादातर ने इसका स्वागत ही किया था। उदयजी से व्यक्तिगत रूप से मैं सिर्फ एक बार मिला हूं। वह भी आज से करीब दस बरस पहले भोपाल में मध्यप्रदेश विधानसभा के अंदर। उनकी रचनाएं ज्यादा नहीं पढ़ीं पर उनके कृति व्यक्तित्व से बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। कुछ कहानियां, कुछ कविताएं पढ़ी हैं। पढ़ना चाहता हूं, पर तिरिछ को पढ़ने के बाद ही उदयजी अच्छी तरह समझ में आ गए थे। सर्वाधिक अगर पढ़ा है तो उनके बारे में। जो प्रभाव मन पर आता है वह आदर का स्थायी असर छोड़ता है।
मैं मानता हूं कि कबाड़खाना पर मौजूदा प्रसंग में आया कसैलापन इस वजह से नहीं है कि उदयजी ने भगवाजोगी के हाथों सम्मान क्यों ग्रहण किया। इसके पीछे उनकी तेज, तुर्श प्रतिक्रिया ही प्रमुख है। यक़ीनन कबाड़खाना वैसा ब्लाग नहीं है जैसा उदयजी ने प्रतिक्रियास्वरूप अपनी पोस्ट में लिखा है। कबाड़खाना के कबाड़ियों में ( ब्लाग संचालक अशोक पांडे ने यही नाम सदस्यों को दिया है ) भी कोई वैसा नहीं है जैसा संकेत उदयजी ने किया है। उदयजी हिन्दी के ऐसे साहित्यकार हैं जिनका हिन्दी कथा-साहित्य के इतिहास में उल्लेख होगा। वे हिन्दी जगत के मान्य हैं सो उनसे हमेशा भाषायी अनुशासन और विनम्रता की अपेक्षा ही की जाएगी। यहां मेरा मानना है कि यह ब्लागजगत अगर आज भी साहित्य बनाम ब्लाग की बहस में उलझा है तो सिर्फ इस वजह से क्योंकि ब्लाग की त्वरता, तीव्रता और तीक्ष्णता ही उसे साहित्य बनने से रोकती है क्योंकि यही उसकी पहचान है। साहित्य की शक्ल में जो कुछ सामने आता है वह ठोस, जमा हुआ, सुचिन्तित होता है। उसे कुरेदा जा

Uday_prakash[6] दयजी, मैं इतना ही कह सकता हूं कि यह सब किसी डिजायन का हिस्सा नहीं है बल्कि स्वतःस्फूर्त और अनायास है। कबाड़खाने के कुछ सदस्यों से व्यक्तिगत परिचय के अलावा मैं किसी से मिला तक नहीं हूं। व्यक्तिगत सम्पर्क भी इस ब्लाग से पहले के हैं, पर जितने भी कबाड़ी हैं, अपने से लगते हैं। अशोक पांडे हों या कोई और, मुझे किसी नेक्सस का आभास तक नहीं होता, बल्कि यहां आपकी ज्यादती लगती है। बेहतर है हम इस विवाद को भूल जाएं। उदयजी कबाड़खाने से पूर्ववत जुड़े रहें। हम यह मानते हैं कि बहुत सी बातें अनजाने में होती हैं, बहुत सी भावुकता में घटती हैं और बहुत सी न चाहते हुए करनी पड़ती हैं। ऐसा करनेवालों में देवता भी थे। कृपया अपने मन से यह बात निकालें कि कबाड़खाना पर कोई साजिश हो रही है। हमें तो अभी तक कबाड़खाने पर किसी जातिवादी गुट या  ठाकुर-ब्राह्मण की मौजूदगी पता नहीं चली है। अलबत्ता किसी दिन शब्दों का सफर में ज़रूर इस पर बात हो सकती है।570349-Offerings-for-Buddha-1

सकता है। ब्लाग पर ऐसा नहीं है। कुरेदने पर इतनी तरलता और चिकनाई मिलती है कि पोस्ट की तो छोड़िये, ब्लाग तक फ़रमाईश पर डिलीट करने जैसी पारसाई देखने को मिलती है। ये इस माध्यम की संवेदनशीलता है। ऐसे हालात में प्रिंट का लेखक फौरन राजनीतिक गोटियां फिट करने में व्यस्त हो जाता है। यहां शब्द महत्वपूर्ण है, वर्तनी नहीं। शब्द का प्रकाशन ज़रूरी है, सम्पादन नहीं। यहां भाव प्रमुख है, कला नहीं। इसीलिए ब्लाग साहित्य नहीं है। ब्लाग पर भावनाओं का जोर दिखता है। ज्वार उमड़ता है। जब यह उतर जाता है तब संपादन की सुविधा भी यह आपको देता है। यानी सचमुच जैसा आप चाहते हैं। प्रिंट में यह नहीं है। अगले संस्करण तक के लिए किताब तो बैन ही होनी है।  इसीलिए एक ब्लागर एक साथ सिपहसालार और हरकारा दोनों है। ब्लागर फौजी नहीं है। ब्लागर जंगजू नहीं है। ब्लागर पत्रकार है, साहित्यकार नहीं हैं। एक साहित्यकार से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अपने वक्त के समाज को बदलने में पत्रकार की होती है। 
सार यही कि सम्मान-प्रसंग में अनिल यादव के कबाड़खाना वाले आलेख के संदर्भ में उदयजी की प्रतिक्रिया एक ब्लागर की प्रतिक्रिया है जो त्वरित है, तीव्र है और तीक्ष्ण भी है। हम उदयजी से बहुत शालीन, साहित्यिकों जैसी गोल-मोल प्रतिक्रिया की उम्मीद क्यों कर रहे हैं? ब्लागजगत ऐसे ही विवादों के लिए जाना जाता है और ऐसी ही प्रतिक्रियाएं यहां आएंगी भी। कबाड़खाना की सदस्यता का यह अर्थ नहीं है कि सदस्यों से जुड़े विवादों पर यह ब्लाग मौन रहेगा। मगर इसका यह मतलब भी नहीं कि इस मामले में हम उन्हें अपने से परे मानकर पतित-पावन जितना फर्क पैदा कर दें? अनिल यादव की टिप्पणी एक सामयिक टिप्पणी थी। उसमें कही भी उदयजी के प्रति सोची-समझी साजिश या द्वेषभाव मुझे नजर नहीं आया। ऐसे में उदयजी की तीखी प्रतिक्रिया का जो असर होना था, वही हुआ भी। हम एक साहित्यकार को ब्लागर कैसे मान सकते हैं? जाहिर है कि उनकी प्रतिक्रिया को इस रूप में नहीं देखा गया। फौरी उत्तेजना में जिस भावुकता, छीछालेदारी तक हम पहुंच जाते हैं क्या वह सब असामान्य बाते हैं? कतई नहीं। लिहाज़ा इस विवाद को भी मुझे लगता है पूर्ण विराम देना चाहिए। कबाड़खाने के सदस्यों को समझ में तो आए कि आखिर कहां क्या हुआ?
दयजी को भी अपनी प्रतिक्रिया के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए क्योंकि उनके प्रति आदरभाव रखनेवाले तमाम लोग हैं जो इस अनपेक्षित बयान से  स्तब्ध हैं। कबाड़खाना और उससे जुड़े लोग उनकी कही बातों की लपेट में हैं। वे खुद जल्दबाजी में थे, यह उनकी भाषा से साफ जाहिर है। किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है। छुई-मुई ग्रंथि से उबरना पड़ेगा, तभी पार पड़ेगी। कष्टप्रद है ( ऐसे कटु सत्य? ) बड़े लोगों के मुखारविंद से सुनना कि इसमें जातिवादी षड्यंत्र है !!! इस विषय में ज्यादा नहीं बोलना चाहता मैं। पर  जातिवाद से हटकर कुछ और सोचिये!!! मैं भी बीते चार दशकों से भारतीय ही हूं। अगर कुछ न कर पाने की टीस है तो उसके पीछे जाति नहीं, शिक्षा खास वजह है। मैं आज से बेहतर हो सकता था अगर किन्हीं क्षेत्रों में और अच्छी शिक्षा पाता। मगर इसके पीछे जातीय हीनता/श्रेष्ठता जैसे कारण नहीं हैं। मुझे अपना बचपन अच्छी तरह याद है। तथाकथित सवर्ण होने के बावजूद आर्थिक भेदभाव के हम शिकार थे। इस समस्या पर गौर करने की ज़रूरत है। जातिवाद से हटकर भी बहुत कुछ है। फैशन की तरह सिर्फ जातिवादी बातें करना हम छोड़ें। पहले व्यवहार में जातिवाद ज़रूर नजर आता था, मगर अब विचार में जातिवाद प्रमुखता पाता जा रहा है। इसके बिना कोई विमर्श पूरा नहीं होता।
मुझे तो लगता है कि हम हिन्दी वाले हैं ही इस लायक की गोबर जैसे मुद्दों पर लड़ें, गोबर उठाएं और गोबर उछालें। मीडिया में रहते हुए हम तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के बीच होते हैं। यहां भ्रष्टाचार शब्द का बेहद व्यापक प्रयोग मैं कर रहा हूं क्योंकि उतनी व्यापकता उसमें है। लेन-देन, रिश्वत तक उसे सीमित न मानें। अनैतिकता जैसी ही अर्थवत्ता है उसकी भी। बाकी को क्या गिनाएं, हम तो भाषा के भ्रष्टाचार पर भी कुछ नहीं कर पाते!!! लेखक, भगवा, सम्मान इन विषयों को हमें छोड़ देना चाहिए। पर कर नहीं सकते, छोड़ नहीं सकते। हिन्दीवाले हैं न!!!! रचना से ज्यादा रचना-प्रक्रिया पर हम बातें करेंगे। हमने भी तमाम नैतिकताएं सिर्फ लेखकों-पत्रकारों पर लाद दी हैं। मुझे नहीं लगता कि भगवाजोगी के हाथों सम्मानित होने मात्र से उदयजी की ब्लाग सदस्यता खत्म करनी चाहिए। बल्कि ऐसे मामलों में इस किस्म के बिंदुओं पर व्यक्तिगत चर्चा के आधार पर निर्णय होना चाहिए। उदयजी ने दिलीप मंडल के लेख की प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी टिप्पणी न दी होती तो मुझे यह तथ्य भी पता न चलता।
पका इशारा जिस ओर है उदयजी, वैसा तो अक्सर हो जाता है। जल्दबाजी न हो तो ब्लागिंग कैसी? जैसे आप आहत हुए, वैसे ही कुछ और भी आपके कहे से आहत हुए हैं। उम्मीद करता हूं, यह किस्सा जल्दी ही खत्म होगा। आमीन।

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24 कमेंट्स:

डॉ कविता वाचक्नवी said...

मैंने भी उदय जी की टिप्पणी और कबाड़खाना पर ३-४ लेख अभी शाम को पढ़े. पूरे प्रकरण पर स्वयं मुझे बड़ा धक्का -सा लगा.मुझे पल्लव ने ४-६ दिन पूर्व उस समाचार की कतरन भेजी थी, जिसमें उस सम्मान समारोह का समाचार था. आपने काफी संतुलित लिखा है.

Anonymous said...

Uday Prakash jee is a very respected hindi writer. One incidence, for which the motives, and circumstances are unknown (or family may have been crucial factor) is not enough reason to question his integrity. He is not a left cader. And even left Caders do cross lines of ideology often when there is a demand from family front.

Udan Tashtari said...

क्या कहें..यूँ तो उदय जी हमारे भी मित्र हैं.

मुनीश ( munish ) said...

Ajit bhai , i say to hell with these left and right cadres ! Just see the kind of adjectives used against Ashok . Moreover, this violator of gentlemen's code of conduct is not ready to apologies and crying 'jativaad', 'jativaad' !
Being famous or being a good artist doesn't give one the right to hurl false accusations against an individual. Here, Ashok is simply being taken for granted just because he is always a down to earth gentleman. Kabaadkhaana is Ashok's brainchild and he reserves the final right regarding this membership issue.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

उदय प्रकाश जी के बारे में क्या कहें।
आपका यह लेख ही पर्याप्त है।

मुनीश ( munish ) said...

अजित भाई , मैं कहता हूँ की भाड़ में जाएँ ये वाम और दक्षिण दोनों ! ज़रा देखिये किस क़िस्म के विशेषणों का इस्तेमाल किया गया है अशोक के विरुद्ध . यही नहीं , सज्जनता को ताक़ पे रखने वाला वो इंसान माफ़ी मांगने के बजाय 'जातिवाद' ,'जातिवाद' चिल्ला रहा है !
मशहूर हो जाने या एक बढ़िया कलाकार होने से ये अधिकार नहीं मिल जाता की किसी के विरुद्ध मिथ्या प्रचार किया जाए . अशोक के साथ ये मनमानी हो रही है इसलिए चूंकि वो हमेशा एक विनम्र ,सभ्य पुरुष की तरह पेश आता है . कबाड़खाना अशोक की सृजनात्मक सोच से उत्पन्न एक मंच है और कौन उसका सदस्य रहे कौन न रहे इसका अंतिम अधिकार सिर्फ उसे है !

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

अशोक की पोस्ट में कुछ भी जातिगत नहीं है. पता नहीं लोग किस चश्मे से इसे देख रहे हैं.

ravishndtv said...

मैंने भी बिना कबाड़खाना पर गए उदय जी की भावनाओं का साथ देते हुए लिख दिया था। शायद ब्लॉगरी मन उत्पाती होता है। फिर शांत होता है तो लगता है कि इसमें बदलाव करें। आपने अच्छा किया कि सबको रास्ता दिखा दिया।

एक पत्रकार के नाते मेरा भगवा वालों से भी संवाद रहता है। मुझे उनके खेमे में जाकर लौट आने में कुछ भी बुरा नहीं लगता। बिना संवाद के हम बहस कैसे करेंगे। किसी भगवा वाले के साथ भोजन कर लेने से वैचारिक स्वतंत्रता सौंप देने की बात हो तो अलग लेकिन उनके घर में रात गुज़ारने से क्या परहेज़। हो सकता कि संवाद के ऐसे किसी लम्हों में उसकी अपनी विचारधारा पर पकड़ ढीली हो। न भी हो तो अपने अपने घर में बैठकर बंदूक चलाने से क्या मतलब।

जोगी की आलोचना अपनी जगह है। लेकिन नज़दीक तो जाना ही होगा।
मुझे नहीं लगता कि उदय प्रकाश वहां जाकर जोगी जैसा हो गए होंगे।
ये तो जोगी की हार है कि जिस व्यक्ति ने उसकी आलोचना की, उसे सम्मानित करना पड़ गया। संबंध और संवाद की कीमत नहीं चुकानी चाहिए। मैं जिसके साथ दिल्ली में रहता था,वह घोर संघी था। मारपीट जैसी हालत हो जाती थी। वो इतना उत्तेजित हो जाता था कि पूछिए मत। लेकिन क्या करता। उसके साथ कई साल रहा। आना जाना आज भी है। मुझे यही लगा कि अलग अलग कमरे लेकर बहस करने से अच्छा है कि एक ही कमरे में रहकर बहस की जाए।

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

"अजित जी, फेसबुक पर आपको पढने के बाद मैंने भी कबाड़खाना का पूरा विवाद पढा और दुखी हुआ. मुझे लगा कि उदय जी अपनी प्रतिक्रिया में हद पार कर गए. बेहतर यह होता कि या तो वे पुरस्कार लेने के अपने कृत्य को उचित ठहराते या स्वीकार करते कि उनसे ग़लती हुई. बात वहीं खत्म हो गई होती. लेकिन उन्होंने अपने बचाव में जो प्रति-प्रहार किए उनकी प्रतिक्रिया में जो कीचड़ उछल रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है."

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' said...

आपकी टिप्पणी सही है । किसी बात प्रतिक्रिया देते समय शालीनता और धैर्य से काम लेना चाहिए ।

अजित वडनेरकर said...

@मुनीश
आपकी बात एकदम सही है। ज़बान से कही बात अच्छी लगती है तो बुरी भी लग सकती है। निश्चित ही उदयजी की प्रतिक्रिया खराब थी, हम सबके लिए थी...हम यही चाहते हैं कि इस प्रसंग को समाप्त किया जाए। प्रस्तुत लेख भी कबाड़खाने पर ही लगना था मगर वहां दिलीपजी का लेख लगा हुआ था इसीलिए शब्दों का सफर पर पब्लिश किया।
कल तक के साथी इसलिए अपना वक्त खोटी करते नजर आएं कि 'ठन गई, सो ठन गई'

किशोर चौधरी said...

साहित्य में दलित चेतना और उसके बाद का दौर अब इतनी दूरी बना चुका है कि इस अप्रासंगिक को नए कलेवर के साथ प्रस्तुत करने के प्रयास जब पत्र पत्रिकाओं और गोष्ठियों में उबाऊ हो गए तो बहाने और नए मंच तलाशे जा रहे हैं . बात तो प्रतिबद्धता से निकली थी किन्तु उसे घुमा के वहीं लाया गया जहां एक गंध विशेष पर खेमेबाजी की जा सके. वडनेरकर जी भी इस मुद्दे पर लिबरल हो जाते हैं इसका कारण शायद न काहूँ सूं दोस्ती वाला विचार रहा होगा किन्तु मैं समझता हूँ कि जो व्यक्ति शब्दों की उत्त्पत्ति की तलाश जैसा महत्वपूर्ण कार्य ब्लॉग के जरिये भले ही ना कर रहा हो पर उसे मंच बना कर पाठकों के बीच बाँट रहा है वो ये कैसे कह सकता है कि ब्लॉग पर महज विचार आदान प्रदान का कार्य हो रहा है साहित्य सृजन का नहीं. उदय जी के लिए मेरे मन में कोई तल्ख़ विचार नहीं है मैं उनको जानता नहीं हूँ पढ़ने के नाम पर आपसे भी कम कहानियां और कविताये पढ़ी हैं पर ये जरूर जानता हूँ कि वे किन खंभों के लिए लिखने का दावा करते हैं और उनकी साहित्य समाज व विचारधारा के साथ क्या प्राथमिकताये, कबाड़खाना पर आरम्भ हुए इस प्रकरण का आधार यही था कि क्या हाथी के दांत खाने के और हैं ?
दावा ये है कि उनके पास गए बिना उनको जानेंगे कैसे, बदलेंगे कैसे ? क्या ये अपराध है ? ऐसे सवाल अब टिप्पणियों के माध्यम से वे पूछ रहे हैं जिनके सर पर उन्होंने अपने हाथ देर तक फेरे हैं. किसी सम्मान को पद को ठुकराने का इतिहास काफी लम्बा है इसमें नाम गिनाने की जरुरत नहीं है और साहित्यकारों की सूची तो बहुत लम्बी है. आप सम्मान और आयोजक प्रायोजक से वैचारिक रेखा को विभक्त नहीं कर सकते हैं तो फिर ये विचारधारा का बोझा क्यों ढो रहे हैं ? जिस बैनर की आड़ से आप माल रोड पर एक सदी पूर्व अपनी पीठ पर झाडू बांधे झुके हुए जा रहे लोगों के दर्द को इस तरह से रूपायित करते हैं कि आज के विजातीय दूधमुंहें बच्चे के दांत उखाड़ लिए जाने की प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं जबकि सम्मान और पद की रोशनी में आप सब भूल जाते हैं दक्षिणपंथ, वामपंथ और दलित लेखन का मसीहा होना भी. आदरणीय वडनेरकर जी आपने जितनी रेत डाल कर इस गन्दगी को ढकने का प्रयास किया है वह सम्मान योग्य है पर लेखन और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में ये खेमेबंदी ज़हर है और इन खंभों की आड़ में खड़े हुए कायर और भीरु हैं साथ ही कुछ लोग इसे प्रतिबद्धता दोहराने का सुअवसर मान कर अपनी जाति का उदघोष करते हैं, ये शर्मनाक और असहनीय है. कबाड़खाना के नवजात ब्लोगर के ताजा आलेख [जो इस प्रकरण से ज्यादा वास्ता नहीं रखता है ] पर जय हो के नारे आने लगे हैं टिप्पणियों के रूप में. कबाड़खाना को मोहल्ला बनाने की रूपरेखा तैयार है देखें. मैं इस विषय पर कुछ लिखना नहीं चाहता था इस लिए अशोक जी और उअद्य जी के ब्लॉग पर नहीं लिखा आपसे कोई राग है इसलिए रोक नहीं पाया, कहीं कुछ व्यथित करने वाला हों तो अल्पबुद्धि जान कर क्षमा कर देने का कष्ट उठा लीजियेगा.

अजित वडनेरकर said...

@kishore choudhary
किशोर भाई, मायूस न हों। ब्लाग और साहित्य के बीच बेमतलब की तुलनाओं के चलते यहां मैने अपने विचार भर व्यक्त किए हैं। ब्लाग पर कहानी, कविता भी लिखी जा रही है और बहुत खूब लिखी जा रही है। मैने तो सिर्फ ब्लाग का चरित्र स्पष्ट किया था। बेशक कई ब्लाग है जो एक उद्धेश्य को लेकर चल रहे हैं और उस क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रहे हैं। ब्लाग पर साहित्य भी लिखा जा रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मैने माध्यम के तौर पर ब्लाग और साहित्य का फर्क बताने का प्रयास किया है। कृपया कोई भी इसे अन्यथा न लें।

सतीश पंचम said...

"मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ब्लॉग एक प्रकार का त्वरित साहित्य है। यहां प्रतिक्रियाएं भी उसी प्रकार त्वरित आनी अपेक्षित हैं। इसलिये उदय प्रकाश जी के तुरंत प्रतिक्रिया देने को लेकर ज्यादा हो हल्ला करना ठीक नहीं लग रहा। आप ने भी अपनी पोस्ट में लगभग यही भाव व्यक्त किये हैं।
और हां, सभी ब्लॉग साहित्य नहीं हैं पर कुछ ब्लॉग जरूर साहित्यिक स्तर को छू रहे हैं।"

अनूप शुक्ल said...

आपने भले मन से इस मसले पर अपने विचार व्यक्त किये। इसके लिये आप बधाई के पात्र हैं।

उदयप्रकाशजी हिन्दी के सर्वाधिक प्रशंसा पाने वाले साहित्यकारों में से हैं। मेरे भी पसंदीदा रचनाकार हैं, सालों से।

आलोचकों की बजाय पाठकों की प्रतिक्रियाओं और प्यार को उदयप्रकाशजी ज्यादा महत्व देते आये हैं। भावुकता की हद तक जाकर पाठकों का शुक्रिया अदा करते रहे हैं उनकी प्रतिक्रियाओं पर।

जो पाठक प्रशंसक उनके लेखन के मुरीद हैं उनको उनसे सवाल पूछने का भी अधिकार है। उनको इस पर इतना खफ़ा और निराश नहीं होना चाहिये।

लेकिन मैंने कई बार देखा है कि उदयप्रकाशजी का आलोचनाओं के प्रति हाजमा उतना दुरुस्त नहीं है जितना सहज वे प्रशंसा से रहते हैं। साहित्यकार में कुछ सहज मानवीय दुर्बलतायें भी होती हैं यह मानकर इस बात को रफ़ा-दफ़ा किया जा सकता है। ब्लागरी में तो यही होता है लेकिन साहित्यकार का मसला है सो जरा मामला कायदे से निपटेगा। अपनी आलोचना को साहित्यकार तमाम जातिवादी/फ़ासीवादी और न जाने कौन सा वादी हिसाब-किताब बतायेगा। :)

उदय प्रकाशजी द्वारा अशोक पाण्डेय के प्रति की गयी अशोभनीय टिप्पणी कहीं से उचित नहीं है। चाहे वह ब्लागर उदयप्रकाशजी ने की हो या साहित्यकार उदयप्रकाशजी ने।

अजितजी अब चूंकि आप बता ही चुके हैं कि आपका मकसद ब्लागर और साहित्यकार की तुलना करना नहीं है इसलिये हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन हम भरे बैठे थे आपकी ब्लागर/पत्रकार/साहित्यकार वाली तुलना देखकर। :)

ब्लागर होने का मतलब त्वरित प्रतिक्रिया की सुविधा मिल जाना है। लेकिन इसका मतलब गैरजिम्मेदारी की प्रतिक्रिया देने की अनुमति मिल जाना नहीं है। ब्लागिंग तो अभी शुरू हुई है महाराज! साहित्यजगत में न जाने कित्ती उठापठक सालों से हो रही है। उस ऊंचाई(?) और सुनियोजित उठापटक तक पहुंचने में ब्लागजगत को अभी सालों लगेंगे।

अगर कुछ बुरा लगा हो तो इसे एक ब्लागर की टिप्पणी समझकर माफ़ कीजियेगा। हम ब्लागर हैं कौनौ साहित्यकार तो हैं नहीं न!

अजित वडनेरकर said...

@अनूप शुक्ल
बहुत सही अनूप जी। हमें कछु भी बुरा ना लगा। पर ब्लागिंग और साहित्य की अक्सर तुलना से खीझ पैदा करती है। अरे भाई जो कुछ भी अच्छा है, वही सराहा जाएगा। ब्लाग पर अच्छा लिखेंगे तो उसे साहित्य कहने में किसी को भी एतराज नहीं होगा:)दशकों पहले ऐसी ही बहस साहित्य और पत्रकारिता को लेकर होती थी। शुक्र है कार्पोरेट दबावों ने अब दोनों के बीच स्पष्ट दूरी बना दी है। दोनों का स्वभाव और चरित्र अब एकदम साफ है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कहाँ शब्दों का सफ़र कबाडियों के चक्कर में पड़ गया . कबाड़खाने में तो यही कबाड़ ही होगा .आज नाम सार्थक हो गया इस ब्लॉग का . एक शिक्षा सस्थान से सम्मान गुनाह तो नहीं . और योगी आदित्य नाथ राष्ट्र द्रोही तो नहीं

डॉ. मनोज मिश्र said...

अनूप जी नें सही कहा है. .

संजय व्यास said...

उदय दा की प्रतिक्रिया त्वरित थी। ब्लाग में सम्पाद का समय नहीं होता। पर बाद में माहौल जो बना वो भी ठीक नहीं।
"uday da kee pratikriya tvarit thi.blog men sampaadan ka samay nahin hota. par baad men mahoul jo bana vo bhi theek nahin"

varsha said...

पूरे मसले पर सबको पढ़ा ... शायद जो कुछ हो रहा है यही ब्लोगिंग है ...ब्लाग पर भावनाओं का जोर दिखता है। ज्वार उमड़ता है। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ है जो उदय प्रकाशजी से कहते नहीं बन रहा है .

Rahul Upadhyaya said...

हमने देखी हैं
इन ब्लागों की टपकती लारें
भूल से भी इन्हें
टिप्पणी का इनाम न दो
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से इग्नोर करो
ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

ब्लाग कोई विकि नहीं
ब्लाग साहित्य नहीं
एक ई-मेल है
आए दिन पोस्ट हुआ करती है
न कोई लिखता है
न कोई पढ़ता है
न पढ़ी जाती है
एक चैन-मेल है
जो फ़ारवर्ड हुआ करती है
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से इग्नोर करो
ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

सिनिस्टर से रिमार्क्स
छुपे रहते है
स्माईलिस में कहीं
स्पेलिंग-मिस्टेक्स से
भरे रहते हैं
सेंटेंसेस कई
बात कुछ कहते नहीं
काम की या कमाल की मगर
जर्नलिज़्म की डींग भरा करते हैं
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से इग्नोर करो
ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

अजित वडनेरकर said...

@राहुल उपाध्याय
वाह !! क्या नज्म है राहुल जी। मज़ा आ गया।
गुलजार जी से क्षमायाचना क्यों? वो भी इसकी रवानी देखकर खुश ही होंगे। बहुत खूब। इसे पढ़वाने का शुक्रिया....

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

गुलज़ार जी क्षमा मागने की ज़रुरत क्या है ?
हम हैं ताना हम हैं बाना
आप सोचिये कैसे ब्लॉग ब्लॉग रहेगें सबसे पहले ब्लॉग को किसे कहतें हैं सबको बताना ज़रूरी है

nayachintan said...

shabdo ka safar ek shandar, zandar koshish hai. ise dekh kar mujhe badi prerana mili. iss mahadesh me gajab ki mehanay ho rahi hai. ajit bhai ki mehanat rang laee. mai poornkalik nekhak hoo. utana samay nahi de paunga, kypki net ka abhi poora gyan bhi nahi hai, fir bhi koshish kar raha hu. kuch ajitbhai jaise log sikha de. filhal to mai ajit bhai ko dil se badhaiya de raha hu ki shabd ka safar chalta rahe.

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