Sunday, July 26, 2009

मुसलमां कैसे कैसे-हकीकत से आगे...

mm महमूद ममदानी अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रशासन विषय के हर्बर्ट लेहमैन प्रोफेसर हैं। वे यूगांडा में पैदा हुए। उनके माता-पिता भारतवंशी थे। महमूद 2008 में विश्व के 20शीर्ष बुद्धिजीवियों की सूची में थे। उनका शुमार चोटी के मानवशास्त्रियों में होता है।

logo पुस्तक चर्चा इस बार की पुस्तक-चर्चा कुछ खास है। प्रसिद्ध लेखक महमूद ममदानी की चर्चित कृति– Good Muslim, Bad Muslim का हिन्दी अनुवाद मुसलमां कैसे कैसे हम बीते कई महिनों से पढ़ रहे थे और अक्सर इसकी चर्चा अपने मित्र, लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी से करते थे। नतीजा यह निकला कि इसे पूरा कर पाने से पहले ही हमें इसे उन्हें पढने को सौपना पड़ा, मगर इस शर्त के साथ कि इसकी समीक्षा उन्हें ही लिखनी है। VMT_ विजय ने भी क़रीब पांच महिने इसे पढ़ने में लगाए। दो-दो चुनाव जो इस बीच निपटाए। विजय प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वृहत्तर भारत की साझी विरासत पर गर्व करनेवाले गंभीर विचारशील पत्रकार हैं। उनकी पुस्तक- एक साध्वी की सत्ता कथा पर इसी स्तम्भ में हम चर्चा कर चुके हैं। चर्चित पुस्तक पर उनकी समीक्षा  दरअसल एक स्वतंत्र आलेख है। सामान्य ब्लाग-पोस्ट से इसका आकार कुछ बड़ा है। मगर इसे पढ़ने का मज़ा एक साथ ही है सो हमने इसे किस्तों में तोड़ना ठीक नहीं समझा। हम चाहेंगे कि प्रस्तुत आलेख पर ज़रूर चर्चा हो। पुस्तक पेंगुंइन इंडिया से प्रकाशित हुई है। पृष्ठ संख्या 300 और मूल्य 225 रु है।  ... 

हमूद ममदानी बीती आधी सदी की बारीक पड़ताल के बाद इस्लामी आतंकवाद के मौजूदा चेहरे की असलियत सामने लाते हैं। उनकी इस कोशिश में जो असली चेहरा सामने आता है, वह साफतौर पर अमेरिका है। यह किताब अपनी तरफ से कुछ नहीं कहती। इसमें और तकोZ के बेहतरीन इस्तेमाल से आतंकवाद की पैदाइश, इसके पाले-पोसे जाने और फिर पलटकर वार करने की दुनिया की मौजूदा तस्वीर से धूल साफ की गई है। अमेरिका और उसकी खुफिया संस्थाओं ने अपने शिकार मुल्कों को खत्म करने के लिए इकस तरह दूसरे की जमीन पर वहीं के फौजी और फौजें खड़ी कीं, अपनी छिपी हुई लड़ाई में इन फौजों को खुली जंग में खपाने और फिर अपने काबिल फौजियों को ही निशाना बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिशों की कहानी किसी हाईटैक हॉलीवुड फिल्म की उत्तेजक स्क्रिप्ट मालूम पड़ती है।
अमेरिका का डरावना चेहरा-
राक से लेकर अफगानिस्तान के फसाद और सद्दाम हुसैन से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब अमेरिका  की कोख से पैदा हुए। सद्दाम को बाद में ठिकाने लगा दिया गया और अब अमेरिका को  इंतजार है कि अगली खबर ओसामा की तरफ से भी आ जाए। सद्दाम तो एक हुकुमत के मालिक थे, सो शिकंजे में घिरकर मर गए, लेकिन ओसामा ने खुद के लिए आरामदेह हुकूमत नहीं पथरीले पहाड़ और रेतीले रेगिस्तानों को ठिकाना बनाया है, जहां अमेरिका सिर मारने में लगा हुआ है। महमूद ने 50 सालों की दुनिया की एक अलग scan0001[8]ही हकीकत से रूबरू कराया है। वे सतह की तह में गए हैं, जहां खबरों के पीछे की हकीकतों की परतें उधड़ती हुई आप देख सकते हैं। हर परत के हटने से अमेरिका का डरावना चेहरा और साफ होता जाता है। आखिरकार आप अमेरिका को उस शक्ल में देख पाते हैं, जो वह है। मीडिया में, टेलीविजन और इंटरनेट पर, अमेरिका बेहतर नागरिक सुविधाओं से लैस एक मालामाल दुनिया का नजारा पेश करता है, जहां ऊंची नौकरियों के बेहतरीन अवसर हैं, जहां हमारे जैसे भ्रष्ट, मूर्ख और कुर्सी से ताजिंदगी चिपके रहने वाले खूसट नेता नहीं हैं, जहां स्कूल, अस्पताल, सड़क, पानी, बिजली की बदहाली, कचरा कानूनों, भ्रष्ट प्रशासनिक और न्यायिक निजाम का नर्क नहीं है-तरक्की की एक चमकदार और सपनों से भरी दुनिया, जहां किसी भी कीमत पर जाने का जवाब दूसरे देशों की आला दरजे की यूनिविर्सटियों की डिग्रियों में चमकता है। दुनिया का एक बेहतरीन मुल्क।
…और सच यही है
तो दुनिया के पढ़े-लिखे नौजवानों की आंखों में झिलमिलाते इस सपने के पीछे की दागदार हकीकत हमारे मुल्कों के बदजात और बदतरीन लीडरों को भी मात देती मालूम चलती है। हमारे घटिया लीडर….ये बिचारे तो सिर्फ मुल्क का माल ही चट कर रहे हैं और जिंदगी भर खुद कुर्सी से चिपके रहने के बाद ज्यादा से ज्यादा अपने नालायक बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों को ही हुकूमत में ला रहे हैं, किसी मुल्क को बरबाद करने की साजिशें तो नहीं चल रही है ये…..? इनकी साजिशों से किसी मुल्क के छोटे-छोटे बच्चे तो खूनी जंगों में नहीं मारे जा रहे……? वैसे हमारे लीडरों ने अपने कारनामों से मुल्क को इस हालत में लाने ही नहीं दिया है कि वह ऐसा कुछ करने का खयाल भी कर सके, जिससे उसकी ताकत झलकती हो। नपुंसक नेताओं ने देश को भी ऊर्जाहीन बना दिया है। बुझी हुई बत्तियों की अंधेरी लालटेन। खैर,  तो अमेरिका जैसे विकसित, मानवाधिकारों का राग सबसे तेज सुर में अलापने वाले और हॉलीवुड की फिल्मों में रोशन खूबसूरत मुल्क के लीडर क्या करते हैं, वहां के नौकरशाह व मैनेजर क्या कमाल दिखा रहे हैं और वैज्ञानिकों की ईजाद की हुई तकनीकों को किस तरह तबाही के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं,  आप सच्चाई जान लें तो होश फाख्ता हो जाएं। यह किताब उसी सच्चाई को सामने लाती है। यह अमेरिका का असली चेहरा है।
आगे की बात...
अब मैं इसके आगे की बात करता हूं। महमूद ममदानी ने

विचार-1bamiyanविचार-2 Bamiyan-afghan(1)असर-1bamiyan2असर-2 bamiyan-1

अमेरिका की असलियत का पर्दाफाश करने के लिए 50 साल का फ्रेम बनाया है। वैसे आधुनिक अमेरिका का कुल जमा इतिहास तीन सदी से पीछे नहीं जाता। दुनिया के नक्शे पर उम्र के लिहाज से पाकिस्तान का बड़ा भाई। इसलिए आज के दौर की कहानी में तो इस्लामी आतंकवाद की जड़ों में अमेरिका दिखाया जा सकता है, लेकिन जब अमेरिका पैदा भी नहीं हुआ था, तब हिंदुस्तान जो भोग रहा था, एक हजार साल से, उसके लिए कुसूरवार ठहराने के लिए किस मुल्क को पुराने दौर के नक्शे पर ढूंढा जाए? तब तो पाकिस्तान भी इस बदकिस्मत मुल्क का ही एक मजबूत हिस्सा था। आप इसके कंधे पर सिर रखकर रोएंगे? कराची के किनारे से कसाब को खुदा हाफिज कहने वालों को यह पता ही नहीं है कि इस्लाम के शुभागमन के पहले उनके मुल्क की सतह पर क्या था और तह में क्या था?
स्लाम की आंधी में सतह का सबकुछ उड़ गया या बरबाद हो गया, लेकिन तह में तक्षशिला अब भी झांकता है, मदरसों के नीचे मुर्दों की राख मोहनजोदड़ों की खुशबू देती है। जनाबेआली, अब यह पाकिस्तान है, जिसे यहां दुश्मन कहा जाता है। वहां हम इसके दुश्मन बताए जाते हैं। अभी के इस फसाद में तो नामुराद अमेरिका है, लेकिन जब इस्लाम के झंडाबरदार ईरान में दाखिल हुए, जब काबुल और सिंध में आए और जब काश्मीर में उनके पांव पड़े तब यहां क्या हो रहा था? ईरान के अग्निपूजक पारसियों ने कहां जाकर अपनी खैर मनाई और कश्मीरी पंडित अपनी पोथियों को लेकर कहां-कहां भागे? कश्मीरियों के भागने के पहले और बाद में किसकी कोख से पाकिस्तान पैदा हो गया और किसने बांग्लादेश की किलकारियां सुना दीं?
कितने बामियान?
बामियान के बुद्ध को बेइज्जत करने का हादसा तो सारी दुनिया ने देख लिया न? यह अकेली घटना हिंदुस्तान के एक हजार साल में यहां देखे गए ऐसे हजारों हादसों की नुमाइंदगी करती है। इसकी आवाजें उन पुरानी इमारतों की दीवारों के पत्थर सुनाएंगे, जहां पहले कुछ और था, जिसे तोड़-ताड़कर कुछ और बना दिया गया। हम अयोध्या की राम जन्मभूमि, बनारस के विश्वनाथ और मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि को इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि इनसे जुड़े राजनीतिक और कानूनी विवादों पर कुछ हिंदूवादी संगठनों का नाम जुड़ा है। लेकिन हमें नालंदा के विश्वविद्यालय, विजयनगर के खंडहरों, मांडू, उज्जैन, धार और विदिशा जैसे प्राचीन शहरों के उन स्मारकों के इतिहास में जरूर जाना चाहिए, जो बामियान की कहानी बयान करते हैं। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक ऐसे करीब 23 हजार स्मारक हैं, जो सुलतानों और मुगलों के जमाने में सिर्फ इसलिए तोड़ डाले गए, क्योंकि ये उनकी मान्यताओं से मेल नहीं खाते थे। चूंकि शासन में वे थे, इसलिए दूसरों की मान्यताओं का कोई मतलब नहीं था। ये वो दौर था जब  यहां के करोड़ों मूल निवासियों के हकों को सदियों तक कूड़ेदान में डाला जाता रहा था। तब न ओसामा था, न अमेरिका। इतिहास के एक प्रवक्ता का यह कथन सब कुछ कह देता है-इस्लाम आया, सबका सफाया।
आधी हकीकत!
तालिबान को अफगानिस्तान में हुकूमत का मौका मिला तो हमने औरतों और बच्चों के हाल भी देख लिए, जो इस्लामी कानून के मुताबिक सही हैं। उनके आदिमयुगीन तौर-तरीकों में इस्लाम अपने पाक-साफ और पुराने रंग में नजर आया। इतिहास की इकताबों में भरे-पड़े ब्यौरों में यही तस्वीर नजर आती है, जो हमने अभी देखी। इसलिए बामियान में बुद्ध की बेइज्जती हो या अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर धूल में मिलता दिखाई दे, हमारी आंखों के सामने कुछ ही साल पहले टेलीविजन की मेहरबानी से नजर आई इन तस्वीरों और उन 23 हजार स्मरकों के मटियामेट होने के ब्यौरों में कोई फर्क नहीं है। दुनिया की आज की सियासत अमेरिका की ताकत तय कर रही है और बिलाशक वह गुनहगार है, इराक में बेमौत मरे लाखों बेकसूर मासूम बच्चों का या अफगानिस्तान की तबाही का, लेकिन यह आधी हकीकत है।
हम बुलबुलें है उसकी…किसे शक है!!!
गर इस्लाम का यह दावा बेबुनियाद नहीं है कि वह अमन पसंद और बराबरी का मजहब है, जो एक खूबसूरत दुनिया बनाने में सक्षम है तो इसका उदाहरण हर मुस्लिम बस्ती से सामने आना चाहिए। जहां मुस्लिम रहते हों, वहां ऐसे मॉडल खड़े दिखने चाहिए कि न चाहते हुए भी दूसरे मजहबों के लोग वहां चले आएं। अमन, तरक्की, सबकी बराबरी और बेहतरी की ऐसी बस्तियों के मॉडल, जो इस्लामी फलसफे के धरती पर खड़े जिंदा सबूत हों। फिर किसी को क्या मुश्किल होगी कि वह एक अल्लाह और उसके एकमात्र रसूल के आगे अपना यकीन न ले आएगा। भई कुछ तो बेहतर कीजिए और यह अलकायदा, लश्करे-तोएबा, हिजबुल मुजाहिदीन, सिमी…..का शोर तो कुछ कम कीजिए। सिर्फ इस जिद का क्या मतलब है कि जो हम मानते हैं, वही सही और आखिरी सही है, उसे तुम भी मानो वर्ना मरने के लिए तैयार रहो। महमूद ममदानी की किताब मुस्लिमों के लिए भी यही चुनौती पेश करती है कि वे इस्लाम को एक खूबसूरत दुनिया को गढ़ने का सहारा बनाएं, जिसमें सभी मजहबों को मानने वालों को भी इज्जत से रहने की गुंजाइश हो, आखिर उन्हें भी तो उसी खुदा ने बनाया है। आमीन।

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24 कमेंट्स:

इंशानियत said...

एक घटिया पुस्तक की बढ़िया वेवेचना, और जहनियत की भी। लेकिन आश्चर्य ! ये महानुभाव विश्व के २० महान विचारकों में गिने जाते हैं? किसी नें ठीक ही कहा था कि वर्ल्ड़ इस गवर्न्ड बाइ थर्डरेटर्स।

श्यामल सुमन said...

विवेचना अच्छी लगी।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

गिरिजेश राव said...

I'm unable to write in Hindi and dislike writing Hindi in roman script. So this comment in English.

This post has forced me to comment this instant only without waiting. The post is written without baggage of forced secularism. It is said that due to Hindu caste system and its evils, invaders succeeded in spreading destruction. But that is only one aspect and our secularists, progressives etc. are habitual of showing only that aspect.
This review deserves appreciation in BOLD LETTERS. The courage should be appreciated - atleast there is one who dares to say truth without fear of being labeled as fascist communal.

हिमांशु । Himanshu said...

असरदार समीक्षा । आभार ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

I had not read this book by Mr Mamdani -
Every one is free to express, HIS or HER
point of view
What is paramount is, what one learns from it
or is able to impliment
( I too am commenting in Eng -
bear with me please )
warm rgds ,
- L

निशांत said...

लोगों को बिना पढ़े ही बहस का ज़ोरदार मसाला मिलने की उम्मीद करता हूँ मैं.
समीक्षा से सहमत न होने के सिवाय क्या किया जा सकता है?
या इसे भी साजिश का जामा पहना दिया जाए और दफा कर दिया जाए?
अफ़सोस, बहुत देर हो चुकी है.

Anil Pusadkar said...

ज़मी खा गई………………………………कैसे कैसे?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

असरदार समीक्षा। इस्लाम को जो कुछ साबित करने के लिए कहा जा रहा है। उसे साबित करने में वह न पहले सक्षम था और न आगे हो सकेगा। भारत में सब से बढ़िया मुस्लिम सम्राट अकबर था, जो खुद मुसलमान न रह गया था और एक नया मजहब चलाने की फेर में था। इस्लाम ही नहीं कोई भी धार्मिक राज्य अच्छा शासन देने में कामयाब नहीं हो सकता, यह हकीकत दुनिया को समझ आने लगी है। किसी दिन पूरी दुनिया भी इसे समझेगी। सुंदर उपयोगी समीक्षा के लिए बधाई!

बालसुब्रमण्यम said...

(यह टिप्पणी कुछ लंबी है और कमेंट बक्सा उसे स्वीकार नहीं कर रहा है, इसलिए अनेक टुकड़ों में दे रहा हूं।)

1
आपका यह लेख महत्वपूर्ण है, पर कई जगह आप भावों में बहक गए हैं।

अमरीका के बारे में यही बात डा. रामविलास शर्मा ने 50 साल पहले अपनी कई किताबों में (मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, भारत में अंग्रेजी राज और मार्कस्वाद (दो भाग), गांधी, अंबेडकर, और लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं, आदि) कही थी, पर घर की मुर्गी तो दाल बराबर ही होती है। जब यही बात अमरीका के एक आला विश्वविद्यालय के प्रोफसर कहते हैं, तो दाल मुर्गी बन जाती है। यह हमारी हीन मानसिकता को ही दर्शाती है।

उक्त पुस्तकों में डा. शर्मा ने सिलसिलेवार दिखाया है कि किस तरह अमरीका ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से पूजीवाद का चोगा उत्तराधिकार में प्राप्त किया है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमरीका आदि में जो अत्याचार किए थे, उसे ही अलग तरीकों से अपने प्रभाव क्षेत्र में (दक्षिण अमरीका, मध्य पूर्व, वियतनाम, उत्तर कोरिया, और अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान) जारी रखे हुए है।

जैसा कि गांधी जी ने कहीं कहा है, हमें पापी से नफरत नहीं करनी है, उसके द्वारा किए गए पाप से नफरत करनी है। इसलिए अमरीका को कोसने से कोई लाभ नहीं मिलेगा, हमें जिस पूंजीवाद का अमरीका अनुसरण कर रहा है, उसके असली स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है, तब हमें समझ में आ सकेगा कि पहले अंग्रेजों ने और अब अमरीकियों ने जो कुछ किया या कर रहे हैं, वह क्यों कर रहे हैं। पूंजीवाद की खास विशेषता यह होती है कि उसका एक मात्र लक्ष्य होता है पूंजी में और-और वृद्धि लाते जाना। इसमें जो भी कार्य सहायक को, नीति अनीति का विचार बिना किए, उसे पूंजीवाद निस्संकोच उसे करता जाता है। इसीलिए मार्क्स, ऐंजेल्स, लेननि आदि ऋषि-तुल्य पुरुषों ने पूंजीवाद को नाथने की आवश्यकता बताई थी और उन्होंने इसका मार्ग समाजवाद, साम्यवाद में दिखाया था। उन्होंने दिखाया कि पूंजी का असली उपयोग पूंजी में वृद्धि करने में नहीं है, बल्कि उसके उपयोग से मानव कल्याण साधने और सभी मनुष्यों की एकता, समता और सम्मान की व्यवस्था करने में है। उनके ये विचार कई देशों में अत्यंत सफतापूर्वक आजमाए भी गए, यथा, रूस, चीन, वियतनाम, क्यूबा, तथा पूर्वी यूरोप के अनेक देश। भारत सहित सभी उपनिवेशी देशों के नेताओं के लिए भी ये विचार प्रेरणा के स्रोत थे, यथा, भगत सिंह, नेहरू, हो चिन मीन, आदि।

डा. शर्मा ने अपनी किताबों में दर्शाया है कि किस तरह अमरीकी साम्राज्यवाद ने एक-एक करके इन सब देशों में इन मानव कल्याणकारी प्रयोगों को विफल बनाया। इसे विफल बनाने में अमरीकी साम्राज्यवाद को इन्हीं राष्ट्रों के भीतर के जयचंदों (टिटो, गोर्बाचोफ, आदि) की मदद भी मिली।

बालसुब्रमण्यम said...

2
इसलिए अमरीका आज जो अफगानिस्तान, ईरान, ईराक में कर रहा है, वह अंग्रेजों ने हमारे यहां के अवध के नवाबों, मराठों, टीपू सुल्तान, सिक्ख आदि के साथ जो किया था, उससे जरा भी भिन्न है। चूंकि हमारा इतिहास बोध ठस है, हम इन पुरानी घटनाओं के साथ आज की इन नई घटनाओं का संबंध स्थापित नहीं कर पा रहे हैं।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एक गंदा खेल हिंदुओं और मुसलमानों को बांटना था, और उनमें वैर के बीज बोना था, जिसमें वे अत्यंत सफल हुए। पाकिस्तान का बनना इसका प्रमाण है। पर 1857 में हिंदु-मुसलमान कंधे-से-कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़े थे और उनकी इस एकता से भयभीत होकर ही अंग्रेजों ने उनके बीच कांटे बोने की रणनीति विकसित की थी, उनकी वही पुरानी फूट डालो और राज करो वाली नीति।

इस नीति के अनेक पहलू थे, जिनमें से एक हिंदी और उर्दू का विवाद खड़ा करना भी था। अंग्रेजों के आने से पहले हिंदी और उर्दू के विवाद का नाम भी सुनाई नहीं देता है। रसखान, रहीम, जायसी आदि वही हिंदी लिखते बोलते थे, जो उनके हिंदू भाई। स्वयं अक्बर अपनी मातृभाषा तुर्की से अनजान थे, और उनकी मातृभाषा ब्रज ही थी। पर अंग्रेजों के आते ही, फोर्ट विलयम में गिलक्राइस्ट आदि के नेतृत्व में हिंदी-उर्दू को जबर्दस्ती अलग करने का प्रयास शुरू हुआ।

डा. शर्मा ने अपनी पुस्तकों में इन सब साजिशों की पोल खोली है। वे पूछते हैं, केरल में 40 फीसदी आबादी मुसलमान है, वहां के मुसलमानों की भाषा हिंदुओं की भाषा से भिन्न नहीं है। इसी तरह बंगाल में मुसलमानों की आबादी 50 फीसदी है, पर वहां मुसलनों की बंगाली हिंदुओं की बंगाली से अलग विकसित नहीं हुई है। केवल हिंदी प्रदेश में ही हिंदू-उर्दू का झगड़ा क्यों पनपा? इसका उत्तर वे यह देते हैं कि 1857 ने उग्र रूप केवल हिंदी प्रदेश में लिया था, और ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ तक हिला दिया था। इसलिए अंग्रेजों ने हिंदी जाति की कमर तोड़कर रख देने में अपनी सारी ताकत लगा दी। दमन तो किया ही, लाखों स्त्रियों, बच्चों और जवानों को अंग्रेज सेनाओं ने खुलेआम पेड़ों से लटाक दिया था, पर कूटनीति से भी हिंदी जाति को तोड़ने का प्रयास किया।

हिंदी-उर्दू का विवाद तो खड़ा किया ही, साथ में हिंदी और उसकी बोलियों के बीच भी खाई खोदी। उन्होंने यह दुष्प्रचार किया कि भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी आदि स्वतंत्र भाषाएं। इस विघटनकारी तर्क को कई भारतीय विद्वानों ने भी बिना सोचे-समझे अपनाया, जैसे हमारे राहुल सांकृत्यायन ने, और अभी हाल में उदय प्रकाश ने।

डा. शर्मा ने अपनी किताबों में (भारत की भाषा समस्या और हिंदी, भाषा और समाज, भारत के भाषा परिवार (तीन भाग)) में इन सभी कुतर्कों का पुरजोर जवाब दिया है और बताया है कि क्यों हिंदी हिंदी प्रदेश की जातीय भाषा है और भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी आदि हिंदी की बोलियां हैं।

बालसुब्रमण्यम said...

3
साम्राज्यवाद, चाहे वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद हो, या अमरीकी, समुदायों को तोड़ने की नीति अपनाता है। तोड़ने की एक नीति धर्म, जाति, संस्कृति आदि के आधार पर लोगों को कटघरों में रखना होती है। अभी कुछ साल पहले सैम्यूल हंटिंगटन नामक अमरीकी विद्वान ने क्लैश ओफ सिविलाइसेशन (सभ्यताओं की भिडंत) नामक सिद्धांत सामने रखा था। इसमें भी इस्लामी सभ्यता को पश्चिमी सभ्याता का विरोधी सिद्ध किया गया था। मुहम्मद ममदीनी की यह नई किताब इसी विचार को आगे ले जाती हुई प्रतीत होती है। वरना, ब्रिटिशों ने भारत के अनेक राज्यों में, यथा, 1857 में लखनऊ की लूट, या 1757 में बंगाल की लूट के दौरान जो राक्षसी कृत्य किए थे, उससे तालिबान के कारनामें कुछ भी अधिक शर्मनाक नहीं है। इसी प्रकार अमरीका ने अभी हाल में ईराक पर हमला करके वहां जो तबाही मचाई थी, और लाखों लोगों की मृत्यु के कारण बने था, या ईरान और ईराक के बीच 10 साल की लड़ाई उकसाई थी और दोनों पक्षों को हथियार देकर करोड़ों लोगों की मौत का रास्ता साफ किया था, उसकी तुलना में तालिबान संत नजर आते हैं।

हमारे जैसे बहु सांस्कृतिक, बहुभाषी, देश के लिए इस तरह के विचार घातक और विघटनकारी हैं। हमें इनमें निहित खतरे को भांपना चाहिए और अमरीकी प्रचार के जाल में फंसकर इनका माउथपीस नहीं बनना है। हमारे यहां अकबर जैसे लोगों की मिसाल भी है जिन्होंने संस्कृतियों, धर्मों और वर्गों को मिलाने का प्रयास किया था, वही हमारे लिए अनुकरणीय हैं।

मैं आपसे आग्रह करूंगा कि अपने ब्लोग के पुस्तक चर्चावाले स्तंभ में डा. रामविलास शर्मा की हर किताब का सिलसिलेवार समीक्षा छापें। इससे स्वयं आप तो उनकी किताबों को पढ़ेंगे ही, आपके ब्लोग के माध्यम से सैकड़ों दूसरे लोग भी पढ़ेंगे।

डा. शर्मा की किताबों में इतनी सारी देश-हितकारी बातें भरी पड़ी हैं, कि उन्हें पढ़ना हर भारतीय के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए और उसके अध्ययन के लिए देश भर में जगह-जगह केंद्र खोले जाने चाहिए और स्कूली और कालेजी पाठ्यक्रमों में उसके पठन-पाठन को अनिवार्य कर देना चाहिए। हर विश्वविद्यालय में डा. शर्मा के विचारों के अध्ययन के लिए अलग फैकल्टी खोल देना चाहिए।

Anonymous said...

I liked this description of yours specially last paragraph, its self motivating specially if they implement this by thinking in right way ! but ah ..! I feel they cannot because they are illiterate in terms of logical reasoning due to their forced one way of religious thinking. This will let us towards one more conclusion that why america was not able to influence sikhs, hindus, yahudes and other religions in the way similar to "these people".

गिरिजेश राव said...

@बालसुब्रमण्यम
अन्ना, एक अलग पोस्ट ही लिख देते यहाँ का लिंक देकर। यारी का असर होने लगा है - आलसी हो रहे हो ;)

मतलब यह कि अतिवादी अमेरिका को अतिवादी तालीबानी गरियाएँ, अमेरिकी उन्हें गरियाएँ और हम दोनों को गरियाएँ। इस गाली गलौज में अपनी समस्याओं को न भूलें और न उन तत्वों को जिन्हों ने इन्हें जन्म दिया और जो इनका पोषण कर रहे हैं। बहुत खूब। आँखें खुली रखो, जागते रहो।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

क्या कहें!

अजित वडनेरकर said...

भारतीय मुसलमानों की दुर्दशा की एक बड़ी वजह यह भी है कि जिन पर उन्हें आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी थी, वे सब पाकिस्तान चले गए। गौर करें, भारत से पाकिस्तान जानेवाले मुसलमानों में अधिकांश वे थे जो समर्थ थे। पैसे वाले थे, अपने तबके में रसूखदार थे। वहां भी बेहतरी का भरोसा उन्हें मिला और उन्होंने पाया भी। अपने सम्पन्न समर्थ तबके से छिटके जो मुसलमान भारत में छूट गए, वे उतने ही कमजोर थे जितने कि यहां के अछूत-पिछड़े।
यही हाल सरहद पार के हिन्दुओं का भी हुआ। अलबत्ता कुछ कम। मगर जो हिन्दू चाहे सिन्ध के हों या पंजाब के, वहीं रह गए वे इसलिए क्योंकि उनमें इतनी सामर्थ्य भी नहीं थी कि अपना ठिकाना छोड़ सकें। बहुत पेचीदा मामला है। किसी भी समाज की बेहतरी का दारोमदार उसके पढ़ेलिखे,ताकतवर तबके के हाथों में होती है। भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समाज का कटु सत्य यही है कि यहां उलेमाओं-मौलवियों की ज्यादा चलती है जो स्वार्थी हैं। जिनकी दिलचस्पी अपने लोगों को आगे बढ़ाने में नहीं है। ऐसे में राजनीतिक दलों से ज्यादा उम्मीदें लगाना व्यर्थ है।

अजित वडनेरकर said...

@बालसुब्रमण्यम
रामविलास जी की पुस्तकों की समीक्षा के बारे में आपका सुझाव के लिए शुक्रिया बालाजी। आपकी टिप्पणी महत्वपू्र्ण है और इससे सहमत हूं।

cmpershad said...

यह तो अनादि काल से चला आ रहा है...भस्मासुर से लेकर भिन्द्रानवाले तक के भारत के प्रमाण यही तो साबित करते हैं!!!!

बालसुब्रमण्यम said...

@अजित
"भारतीय मुसलमानों की दुर्दशा की एक बड़ी वजह यह भी है कि जिन पर उन्हें आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी थी, वे सब पाकिस्तान चले गए। गौर करें, भारत से पाकिस्तान जानेवाले मुसलमानों में अधिकांश वे थे जो समर्थ थे। पैसे वाले थे, अपने तबके में रसूखदार थे। वहां भी बेहतरी का भरोसा उन्हें मिला और उन्होंने पाया भी। अपने सम्पन्न समर्थ तबके से छिटके जो मुसलमान भारत में छूट गए, वे उतने ही कमजोर थे जितने कि यहां के अछूत-पिछड़े।"

यहां तथ्यों की गड़बड़ी लगती है। जहां तक मैं आजादी के समय के इतिहास को समझता हूं, सरहदी प्रांतों ने, खासककर के पंजाब ने, विभाजन को ठुकरा दी थी, और जिन्ना को वहां करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। पाकिस्तान को यूपी-बिहार में ज्यादा समर्थन मिला था, पर यहां के मुसलमान बहुत कम पाकिस्तान गए।

पाकिस्तान की मांग थोड़े से अंग्रेजी पढ़े मुसलमानों में ही उठी थी, खास तौर से जिन्ना। जिन्ना को नेहरू, गांधी आदि के साथ व्यक्तिगत स्तर पर वैर था। जब वे इंग्लैंड में अपनी राजनीतिक संन्यास के बाद भारत की राजनीति में लौट आए, तो पहले उन्होंने संयुक्त भारत के समर्थन में ही आवाज उठाई। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें अपनी तरफ फोड़ लिया और आजाद भारत को कमजोर रखने के इरादे से उन्हें मुसलमानों के लिए अलग राज्य की मांग करने के लिए उकसाया और यह आश्वासन भी दिया कि इसका उनकी ओर से समर्थन किया जाएगा।

कहने का मतलब यह कि हमारे जैसे अनेक धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों वाले देश में धर्म को लेकर लोगों को बांटने से कुछ हाथ नहीं लगनेवाला है। यह सब अंग्रेजों के खेल को हम फिर से आजाद भारत में दुहरा भर रहे हैं।

हमें अपने देश को सुदृढ़ करने की ओर प्रयत्न करना चाहिए। इसमें धर्म का पचड़ा लाने से काम बिगडे़गा ही।

विभाजन को उस समय के नेताओं ने कोई अंतिम निर्णय नहीं माना था, और आजकल पाकिस्तान की तरफ से हमें जो तकलीफ उठानी पड़ रही है, वह यही साबित कर रहा है कि विभाजन कोई उपयोगी चीज नहीं रही है, हमारे लिए भी नहीं और पाकिस्तान के लिए भी नहीं। पाकिस्तान को चीन, अमरीका, आदि भारत के विरुद्ध कैट्स पॉ के रूप में अलग उपयोग कर रहे हैं।

इसलिए भारत की असली सुरक्षा के लिए इस उपमहाद्वीप के सभी देशों को एक छत्र के नीचे कभी न कभी आना ही होगा, यानी विभाजन को निरस्त करना होगा। हमें कूटनीतिक रूप से अभी से इस ओर सोचने लगना चाहिए, कि इसे कैसे संभव बनाया जा सकता है।

यदि हम धर्म से चिपके रहेंगे, तो यह काम और मुश्किल होता जाएगा।

हमें धर्म से भी ज्यादा पहचान देनेवाले तत्वों की खोज करनी होगी।

ऐसे तत्व गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अविकास आदि है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों की सामान्य पहचान है। इनके विरुद्ध सम्मिलित मोर्चा खोलकर इन सब देशों को एक किया जा सकता है।

यही हमारा प्रयास होना चाहिए, खासकर पढ़े लिखे लोगों का जो देश के मामले में दीर्घ दृष्टि अपना सकते हैं, और उन्हें अपनाना भी चाहिए।

यथास्थिति से उलझे न रहकर आज से 25-50 साल बाद कैसी परिस्थितियां रहेंगी, उसे ध्यान में रखते हुए आज की नीति गढ़नी होगी।

धर्म की राजनीति पुरानी राजनीति है, नए समय के लिए अलग राजनीति चाहिए।

बालसुब्रमण्यम said...

एक बात और कहना चाहूंगा। अमरीकी प्रचार-तंत्र अपने मतलब के शोध-परिणामों को दुनिया भर में प्रचारित करने में खूब पैसा खर्च करता है। डा. ममदीनी को रिसर्च के लिए कहां से पैसे मिले, और उनके इस पुस्तक को इतना महत्वपूर्ण क्यों समझा गया कि उसका हिंदी अनुवाद कर दिया गया और एक विदेशी प्रकाशन गृह पेंग्विन ने उसे क्यों छापा, इस पर भी खोज होनी चाहिए। ताकि हम जाने-अनजाने अमरीकी साम्राज्यवाद की चाल में फंसकर, उनके मन-माफिक विचारों का प्रचार करने से बच सकें।

यह इसलिए मैं लिख रहा हूं क्योंकि इस्लाम के प्रति अंध विरोध भारतीय संस्कृति के बिलकुल प्रतिकूल है, क्योंकि भारतीय संस्कृति हर धर्म और विचार को अपने में बिना डरे समावेश करने की नीति अपनाती है।

पर साम्राज्यवादियों के लिए हमेशा एक "अदर" की आवश्यकता पड़ती है। पहले वे उपनिवेशों के लोग थे, जिन्हें किप्लिंग ने "वाइट मैन्स बर्डन" कहा था, और बाद में साम्यवादी थे, और अब इस्लाम।

इन सबमें भारत का हित कहां है? यहां 12 करोड़ मुसलमान हैं। इसलिए मुस्लिम विरोध भड़काने का मतलब है, देश को कमजोर करना।

हमें तो यह सोचना चाहिए कि किस तरह सभी 100 कोरोड़ भारतीयों को एक करके एक मजबूत राष्ट्र में बदला जाए, जहां किसी को न लगे कि वह इस राष्ट्र का अंग नहीं है। हमें इस विचार को आगे बढ़ानेवाले पुस्तक चाहिए। जाहिर है कि ऐसे पुस्तक अमरीकी विश्वविद्यालयों में नहीं लिखे जाएंगे।

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया और फिर से कुछ गहन सोचने को मजबूर करती एक सश्क्त पोस्ट आभार

अजित वडनेरकर said...

@बालसुब्रमण्यम
1.मैने जो कहा है उसका सामाजिक नज़रिये से बहुत महत्व है। अलग-अलग नज़रिये से कई राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक इसे कह चुके हैं। आप जो कह रहे हैं वह राजनीतिक इतिहास है और इससे किसी को इनकार नहीं है।
2.ममदानी की पुस्तक अमेरिकी नज़रिये का समर्थन नहीं बल्कि विरोध करती है। समीक्षा में भी ऐसा कोई इशारा नहीं किया गया है:)

दिगम्बर नासवा said...

Poori bahas padh kar lag rahaa hai ki saarthak bahas hai....... nateeja kuch bhi ho...... itihaas batata hai ki nuksaan hindu ka hi huva hai... shaktiwaan bharat desh hi is baat ki gaurantee hai ki sab surakshit hain bharat varsh mein....

Harkirat Haqeer said...

सशक्त व् असरदार समीक्षा...बहस भी जोरदार है .... !!

pramod said...

बहुत अच्छी जानकारी मिली .बालाजी की समीछा ने काफी प्रभावित किया

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