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Saturday, December 18, 2010

“सफ़र” का विमोचन...खरीदें और पढ़ें

book realese 056

ख़िरकार किताब आ ही गई। शब्दों का सफ़र नाम के ब्लॉग का परिष्कृत रूपान्तर पुस्तक की शक्ल में आए यह साध सफ़र के सभी साथियों समेत हमारे मन में भी अर्से से थी।

book realese 006इस तरह बना है कवर…कारवाँ बने हैं शब्दों के सफ़र का जरिया  book realese 012लेखक से परिचय करवाया डॉ सविता भार्गव ने book realese 025और लीजिए पुस्तक विमोचन हो गया...book realese 031...अब बारी है मंजूर साहब की...क्या बोले? book realese 070 अपन भी बोल लेते हैं...book realese 074 श्रोता झेल रहे हैं...book realese 106 जैसे ही बात समझ में आई...book realese 093...और श्रीमती जी ने सिर पकड़ लिया...कहाँ फँस गए...book realese 099श्रोताओं मे संवाद जारी रखा...book realese 110अंत में मामा कमलकांत बुधकर ने खाकसार की पोल खोली...चलिए, जो हुआ, अच्छा हुआ...

शुक्रवार शाम भोपाल के हिन्दी भवन में चल रही राजकमल प्रकाशन की पुस्तक प्रदर्शनी में ही शब्दों का सफ़र का विमोचन हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मंज़ूर एहतेशाम ने किया। इस मौके पर ख्यात नाटककार अलखनंदन, कवि-कहानीकार गीत चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय मनोहर तिवारी, ख्यात ब्लॉगर-लेखिका मनीषा पाण्डे, ख्यात शिल्पी देवीलाल पाटीदार, कवयित्री डॉ सविता भार्गव और हरिद्वार से पधारे विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार-प्राध्यापक डॉ कमलकांत बुधकर भी मौजूद थे। डॉ सविता ने कार्यक्रम का संचालन किया। अध्यक्षता की अलखनंदन ने। करीब डेढ़ घंटे चले इस कार्यक्रम में सबसे पहले मंजूर एहतेशाम के हाथों पुस्तक की प्रतियों का विमोचन हुआ। इसके बाद लेखक से आमंत्रितों को मिलाने और पुस्तक का संक्षिप्त परिचय देने की जिम्मेदारी डॉ सविता ने निभाई। ख़ाकसार ने शब्दों का सफ़र से जुड़ी याद आने लायक और क़ाबिले ज़िक्र बातें श्रोताओं से साझा की। फिर संत शृंखला पर लिखे एक आलेख का पाठ किया गया। पाठ-सत्र के बाद श्रोताओं और लेखक के बीच सीधा संवाद हुआ। श्रोताओं में ज्यादातर शब्दों का सफ़र के किसी न किसी रूप में पाठक ही थी। चाहे वे दैनिक भास्कर के नियमित स्तम्भ के पाठक थे या चर्चित ब्लॉग शब्दों का सफ़र के। पेश है दिवाकर पाण्डेय की रिपोर्ट
यायावर हैं शब्द, माँ जाई बहने हैं भाषाएं
हिन्दी भवन में पुस्तक मेले केदौरान लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित
भाषाओें का रिश्ता बहनों जैसा है और शब्द यायावर होते हैं। भाषा में शब्दकोष तो हैं पर उनकी व्युत्पति का कई कोश मुझे नहीं दिखाई दिया। इसी ने मुझे एक ऐसा कोश तैयार करने के लिए प्रेरित किया। यह बात लेखक-पत्रकार अजित वडनेरकर ने अपनी किताब शब्दों के सफर के लोकार्पण के दौरान कही।  शुक्रवार को हिन्दी भवन में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पुस्तक मेले में लेखक से मिलिए कार्यक्रम के दौरान लोकार्पण किया गया। पुस्तक में शब्दों की रिश्तेदारी, उनका जन्म और वर्तमान स्वरूप के लंबे इतिहास की तर्कसंगत तरीके से पड़ताल की गई है। श्री वडनेरकर ने पुस्तक से संत शृंखला में लिखे आलेख कलंदर का पाठ भी किया। उन्होंने बताया कि इस पहले खण्ड में 10 पर्व और करीब 1500 शब्द शामिल हैं। उनकी योजना बोलचाल की भाषा क दस हजार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना कोश बनाना है। इस पुस्तक का दूसरा और तीसरा खण्ड भी लगभग तैयार हैं। लोकापर्ण करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मंजूर एहतेशाम ने कहा कि इस पुस्तक में जिस तरह सभी भाषाओं को एक दूसरे के करीब बताया गया है, यह बहुत दिलचस्प है। हिन्दी-उर्दू को मिलाने का भी यह एक सकारात्मक प्रयास है। अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ रंगकर्मी-नाटककार अलखनन्दन ने कहा कि जुदा करने वाली किताबें बहुत हैं और जोड़ने वाली कम। जो लोग साहित्य में शब्द की स्वतन्त्र सत्ता में विश्वास करते हैं वे इससे जान सकेंगे कि शब्दों के इतिहास के कितने आयाम हैं। उन्होंने पुस्तक में शब्दों के जन्मसूत्र और उनकी विवेचना शैली से प्रभावित होते हुए कहा कि इसके जरिए शब्दों के अलग अलग क़िरदार सामने आ रहे हैं, वे इसमें नाट्यतत्व की तलाश कर रहे हैं। संचालन कर रहीं कवयित्री सविता भार्गव ने पुस्तक के विभिन्न अंशों का उल्लेख करते हुए उनके रोचक इतिहास पर प्रकाश डाला। इस दौरान गीत चतुर्वेदी, विजय मनोहर तिवारी, मनीषा पाण्डेय, रवि रतलामी सहित कई साहित्य रसिक लोग उपस्थित थे। प्रकाशन के जनसम्पर्क अधिकारी रमण भारती ने बताया पुस्तक मेले में शनिवार क शाम 4 बजे मनोज सिंह के उपन्यास हॉस्टल के पन्नों सें पर गोष्ठी आयोजित की जा रही है।

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Friday, October 15, 2010

सफ़र के साथियों को बधाई- हम सब हुए हज़ार



जाने-माने ब्लॉगर और हमारे मित्र, भोपालवासी रवि रतलामीजी का एक ईमेल हमें कल प्राप्त हुआ, जिसे जस का तस यहाँ दे रहा हूं।
अजित जी,आपके नियमित सब्सक्राइबरों की संख्या 1 हजार से ऊपर पार करने पर आपको बधाई. मेरे विचार में आपका ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का ऐसा पहला ब्लॉग है.यह आलेख देखें -फ़ोर फ़िगर सब्सक्राइबरों की ओर छलांग लगाते हिंदी चिट्ठे आपका, रवि
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Sunday, June 20, 2010

बोधिसत्व से भोपाल में मुलाकात…

बोधिभाई को कुछ दुर्लभ दिखाने की फिक्र अभी से खाई जा रही है। करता हूं कुछ जुगाड़। न हो सका तो उनकी संभावित भोपाल यात्रा में अड़ंगा लगाने कोशिश की जाएगी।
जित भाई, आप मुझे कुछ दुर्लभ दिखा सकते हैं? बोधिसत्व ने चलने से कुछ देर पहले हमसे पूछा था। यह सुनकर हम अचकचा गए थे। बात बनाने के लिए कह दिया था कि आप अगली बार हमारे घर ही मुकाम करिए, तब शायद कुछ ढूंढ कर दिखा सकूं। यहां बात हो रही है हिन्दी के ख्यात कवि बोधिसत्व की जो अपने दोस्त हैं और गुरुवार को भोपाल में थे। उक्त संवाद हमारे घर का है। बोधिभाई ने भोपाल आने की सूचना बुधवार को ही दे दी थी। हमने तभी कर लिया था कि शुक्रवार को सांची जाया जाएगा जो कि प्रसिद्ध बौद्धतीर्थ है और भोपाल से मुश्किल से तीस किमी की दूरी पर है। बोधिभाई से बात होने के बाद हम रसोई में कुछ खटराग फैलाने लगे। घर पर मैं और अबीर ही थे। फ्रीजर में रखे पाषाणवत घी को तेज़ चाकू से कड़ाही में डालने की कोशिश में चाकू तेज़ी से बाईं हथेली में जा घुसा। बात की बात में अस्पताल जाना पड़ा। चार टांको के साथ हथेली सिलवानी पड़ी। डेढ़ घंटा उसमें खर्च हो गया क्योंकि अस्पताल से लौटते वक्त कार पंक्चर हो गई। फिर स्टेपनी बदली और फिर टायर की मरहमपट्टी का सिलसिला शुरु हुआ। हमारे साथ ये अक्सर होता रहता है। मगर मरहमपट्टी के बाद लौटते ही पूरी लगन के साथ दाल फ्राई की गई।
हना ये चाहते हैं कि बोधिभाई के लिए ली गई छुट्टी उसी दिन हथेली के जख्म को नजर हो गई और सांची का कार्यक्रम बिना मेहमान से पूछे रद्द हो चुका था। वजह यह कि उस दिन दर्द के चलते हम दफ्तर नहीं जा पाए नतीजतन बोधि के हिस्से की छुट्टी कैंसिल हो गई। नौकर पत्रकार अपने जीवन पर अक्सर इसीलिए लानत भेजता है। खैर, अगले दिन यानी शुक्रवार की सुबह ठीक साढ़े नौ बजे हम
बोधिभाई जिंदाबाद…तस्वीरें ली है अबीर ने। बोधिभाई ने अबीर को बताया कि उन्हें अपनी तस्वीरें छपी देखने में बहुत सुख मिलता है। साहबजादे ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और कुल जमा तीन तस्वीरें ही खींची। वर्ना उनकी खुशी के लिए हम यहां दर्जनों फोटू छापने करने को राजी थे। tanu baba mom 006 tanu baba mom 008 tanu baba mom 009
बोधिभाई को लेने उनके संबंधी के घर के लिए निकल तो पड़े मगर उनका घर ढूंढने में ही खप गए। आखिरकार उन्हें ही उस जंगल में आना पड़ा जहां हम अटके खड़े थे। खैर किसी तरह उनसे भेट हुई और फिर हम उन्हें अपने घर लिवा लाए। बोधिभाई ने कई बार आग्रह किया कि कार वे ड्राईव कर लेंगे क्योंकि उन्हें हमारे जख्मी हाथ की चिन्ता सता रही थी, पर हम भी जख्मी हाथ के सहारे उन्हें अपनी ड्राईविंग के जौहर दिखाने की ठाने बैठे थे, सो वो आड़ी-तिरछी वडनेरकरिया, राजगढ़िया इस्टाईल में गाड़ी चलाई कि बोधिभाई प्रवचन की मुद्रा में आ गए। उनकी जगह “सुजाता” होती तो प्रवचनों को खीर समझ कर ग्रहण करते और हम सम्बुद्ध यानी समझदार हो जाते। पर क्यों होते? कोरी समझाईश सुनकर तो सिर्फ समझदारी से सिर हिलाया जा सकता है, असली समझदारी समझाईशों को खारिज कर देने में ही होती है, सो वही हमने किया भी और लगातार ट्रैफिक रूल तोड़ते हुए घर आ पहुंचे। बोधि को शायद दुर्लभ की तलाश तभी से होने लगी थी।
बोधिभाई के भोपाल प्रवास का उद्धेश्य कला-साहित्य से जुड़े यहां के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान के प्रतिष्ठित प्रकाशन के अतिथि संपादक बनने से जुड़ा था। हालांकि उनसे यह हमारी पहली मुलाकात नहीं थी। इलाहाबाद की बहुचर्चित और विवादास्पद ब्लागर कांफ्रेस में हम बीते साल उनसे मुलाकात हो चुकी है। बोधिभाई एक सुदर्शन, सजीले व्यक्तित्व के धनी हैं। टीवी-फिल्मों की दुनिया में भी घुसे पड़े हैं। मीडिया की मोटाई-पतलाई सब जानते हैं। कई खूबियों वाले किरदार हैं। मगर हमारी उनकी पटरी सिर्फ इसलिए बैठती है क्योंकि वे भी किताबों के जबर्दस्त शौकीन हैं और हम भी। शब्दों का सफर के वे शुरुआती साथियों में हैं। हमारे संग्रह को बोधि देखते रहे। हमने अपने मामा कमलकांत बुधकर की ताजी पुस्तक “मैं हरिद्वार बोल रहा हूं” भेंट की। यह किताब इस पुण्यतीर्थ के करीब दो सदी पुराने चित्रों के साथ कही गई इतिहास से वर्तमान तक की कहानी है। पुस्तक चर्चा में इसका उल्लेख विस्तार से होगा। काफी देर हम इस पर ही चर्चा करते रहे कि हम हिन्दुस्तानी डाक्यूमेंटेशन के मामले में बहुत गैरजिम्मेदार हैं। अगर लिखत-पढ़त वाले लोग अपने मूलस्थान के बारे में तथ्यात्मक जानकारियों को एकत्रित कर उन्हें प्रकाशित कराने का काम शुरु कर दें तो सामाजिक इतिहास के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम हो जाएगा। पर यह सब हमारे खून में नहीं है। इसके लिए हमें किसी गोरी कौम का ही मुंह देखना पड़ता है। वे सिखा कर चले भी जाते हैं, तो भी हमारी तंद्रा नहीं टूटती।
वि, कविताई का धर्म, हिन्दी कवि के कुटैव, कवि की परमगति, दुनिया की रफ्तार, दीगर कलाओं के हाल के बारे में भी बतरस हुआ। हमने कहा कि हर विधा का फनकार आज बदल रहा है मगर हिन्दी का बहुसंख्यक कवि नहीं बदलता। वहीं घिसापिटा माहौल। राजनीति, छपास, आत्ममुग्धता, लिजलिजी भावुकता, परपीड़न वगैरह वगैरह से ग्रस्त है यह वर्ग। “तुम मुझे निराला कहो, मैं तुम्हें पंत” जैसे अनुबंध, संधियां या दोस्ताने यहां दशकों से जारी हैं। इसे काव्य रसिकता कहा जाता है।  वे राजी दिखे। हमें ध्यान आया कि खुद भी कवि हैं और इस वक्त इनके सारथी हम हैं सो संभव है दिखावा कर रहे हों। पर बाद में लगा कि सच्ची में वे हमारी बात से सहमत थे। बोधिभाई को कवि मित्र और भास्कर के मैगजीन एडिटर गीत चतुर्वेदी से भी मिलना था सो यूं पूरा हुआ एक बेहतरीन शख्सियत से मिलने का दौर। बोधिभाई को कुछ दुर्लभ दिखाने की फिक्र अभी से खाई जा रही है। करता हूं कुछ जुगाड़। न हो सका तो उनकी संभावित भोपाल यात्रा में अड़ंगा लगाने कोशिश की जाएगी। और कुछ न हुआ तो रसोई का खटराग फैलाऊंगा। अपना हाथ जगन्नाथ। इस बार मिलने ही नहीं जाऊंगा, बहाना कर दूंगा कि ज़ख्मी हो गया हूं। पर डर ये भी है कि बोधि घर देख गए हैं। मिजाजपुर्सी को ही आ जाएंगे!!!!

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Sunday, February 7, 2010

विश्व पुस्तक मेला में मित्रों से मिलना

Cover1राजकमल से छपेगा शब्दों का सफर

बी ते तीन दिनों से हम शब्दों का सफर से छुट्टी पर थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के द्विवार्षिक आयोजन विश्वपुस्तक मेला देखने की बड़ी इच्छा थी। दिल्ली में रहते हुए भी इसे देखने का कभी योग नहीं बना। इस बार एक खास वजह से इस आयोजन में शरीक होने का सुयोग बन गया। बीते दो साल से सफर के साथियों का आग्रह था कि इसे पुस्तकाकार आना चाहिए। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग और राजकमल प्रकाशन से इसके लिए हमने सम्पर्क किया था और खुशी की बात है की दोनों ने ही इसमें रुचि दिखाई थी। दोनो ही प्रकाशनों का हिन्दी किताबों की दुनिया में एक नाम है, मगर किताब का प्रकाशन तो किसी एक जगह से ही होना था, सो राजकमल को किताब देने का फैसला किया गया। उम्मीद है मई जून तक किताब का पहला खण्ड बाजार में आ जाएगा। इससे जुड़ी औपचारिकताओं के संदर्भ में दिल्ली आना था सो इसी अवसर पर पुस्तक मेला घूमने-फिरने का भी मन था। अपने काम से जुड़ी कई पुस्तकों को एक ही जगह तलाशने की सुविधा और उनके मिलने की आशा भी थी। कई मित्रों से मिलने का कार्यक्रम भी बन गया और वे पुस्तक मेले में ही पंहुचे। दिल्ली अमर उजाला में डिप्टी एडिटर पंकज मुकाती सबसे पहले मिलने पहुंचे, मगर उनसे पहले मुलाकात हो गई कवि ब्लागर अविनाश वाचस्पति और पवन चंदन से। अविनाश जी से तो यह दूसरी मुलाकात थी, मगर पवन चंदन से पहली बार मिलना हुआ। इनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। फिर आए पंकज मुकाती। पंकज हमारे बहुत स्नेही-लाड़ले दोस्त हैं। पवन चंदन और अविनाशजी ने कुछ तस्वीरें इस मौके पर लीं। अविनाशजी ने बताया कि कविता वाचक्नवी भी कुछ देर में आएंगी। हम और पंकज पत्रकारिता की दुनिया के हालचाल साझा करने के लिए इन दोनों से इजाज़त लेकर कुछ देर को अलग हो गए।
दिल्ली पुस्तक मेला से मैं कतई प्रभावित नहीं हुआ। मैं हिन्दी का पाठक हूं और लगातार दुर्लभ और मूल्यवान प्रकाशनों की खोज में रहता हूं।
baba tanu 043 baba tanu 048 baba tanu 052 सबसे ऊपर दाएं से अभय, मनीषा, स्वधा, नीलाभ और एक अन्य साथी। नीचे अविनाश वाचस्पति के साथ पंकज। सबसे नीचे पवन चंदन। IMG_1664   aap     
ऐसे आयोजनों में प्रकाशकों को भी सुविधा रहती है कि वे बहुप्रतीक्षित पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन कर सकें और पुराना स्टाक भी खपा सकें। मेरे पास हिन्दी-मराठी के करीब तीस ग्रंथों की सूची थी। बड़ा अजीब लगा कि चाही गई पुस्तकों में मुझे मराठी भाषा की तीन पुस्तकें मिलीं, मगर हिन्दी के अधिकांश ग्रंथ अनुपलब्ध ही रहे। दो ऐसी पु्स्तकें जरूर मुझे काम की मिलीं जो मेरी सूची में नहीं थी। एक सांस्कृतिक प्रतीक कोश और दूसरी केंद्रीय हिन्दी संस्थान की उर्दू परिचय कोश। किताबों का बोझा संभालते हम थक चले थे अभय भाई का कहीं अता-पता न था। पंकज को अखबार के दफ्तर पहुंचना था क्योंकि साढ़े चार बज चुके थे। हमने वापसी का फैसला किया और मेट्रो स्टेशन पहुंच गए। तभी अभय का फोन आया कि वे 12 नंबर स्टाल पहुंच गए हैं। पंकज को विदा कर हम फिर भारी क़दमों से लौटे मगर अभय से मिल कर सारी थकान दूर हो गई। अभय ने aaइलाहाबाद से आए नीलाभ जी से परिचय कराया और शब्दों का सफर के बारे में उन्हें जानकारी दी। यह सुखद संयोग था कि जिन अभय ने शब्दों का सफर को हिन्दी ब्लाग-जगत से सबसे पहले भलीभांति परिचित कराया, उसके पुस्तकाकार आयोजन का पुख्ता आधार जिस दिन रखा गया, वे हमारे साथ थे और उनसे रूबरू होने का वह पहला अवसर था। तभी गीत चतुर्वेदी, मनीषा पांडे नमूदार हुए। एक प्यारी सी नन्हीं-मुन्नी भी उनके बीच चहक रही थी। पता चला कि गीत की बिटिया स्वधा हैं, पापा के साथ अकेली चली आईं। मनीषा से खूब हिली हुई थीं। सबके किरदारों को अपने अंदाज़ में पहचान कर उसके साथ एक टैग लगवाने का शग़ल चल रहा था। बिटिया ने अभय को हैडमास्टर का खिताब दिया और हमारे किरदार की शिनाख्त डस्टबिन के रूप में की। गीत बेटी से नाराज हो गए। हमने कहा कि हमें यह नाम अच्छा लगा है। हालीवुड का एक किरदार है मि.बीन्स। खूब हंसाता है। हम भी डस्टबिन बनकर  खुश हैं।
भय, नीलाभ से बातें हो रही थीं कि और चोखेरबाली समूह की ब्लागर सुजाता के साथ अन्य सदस्य यानीमसिजीवी, राजकिशोर  और  प्रकाशन विभाग की संपादक  आर.अनुराधा  आ गए। कुछ देर में डॉ वेदप्रताप वैदिक भी आ पहुंचे। साढ़े छह बज चुके थे और अभय को गोरखपुर के लिए शाम साढ़े सात की ट्रेन पकड़नी थी जहां आठ को उनकी फिल्म का प्रदर्शन था। मनीषा और गीत को भी रात नौ की ट्रेन से भोपाल लौटना था। सबने विदा ली। हमने वहीं अनुराधाजी को यह सूचना दी कि शब्दों का सफर का प्रकाशन राजकमल से होना तय किया है। शब्दों का सफर प्रकाशन विभाग से निकले यह हमारी भी इच्छा थी। अनुराधाजी यह जानकर कुछ नाराज भी हुईं, हमें भी बुरा लग रहा था। पर क्या किया जा सकता था। उसे छपना तो किसी एक संस्थान से ही था। अनुराधाजी ने इस दौरान बहुत सहयोग किया। हम उनके आभारी हैं।  निश्चित ही आगे उनके लिए काम करने का योग बनेगा। टीवी के दिनों के साथी पत्रकार समरेन्द्र भी वहां मिले। प्रगति मैदान से इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग तक हम, मनीषा और नन्ही स्वधा पैदल मार्च करते हुए आए। यहां हम नवभारत टाईम्स में चंदूभाई से मिलने चले गए और गीत मनीषा भोपाल के लिए रवाना हो गए। चंदूभाई के साथ ही हम आटो से वैशाली तक आए। कुछ देर हमारे घर चंदूभाई गपियाए। छह फरवरी को कुछ अन्य लोगों से मिलने का मंसूबा बांधे इस तरह पांच फरवरी का दिन तमाम किया मगर अगले दिन किसी से मिलना हो नहीं पाया। नोएडा में मोबाईल सिग्नल की समस्या रही। अजय झा, खुशदीप सहगल से फोन करते रहे पर सम्पर्क नहीं हुआ। प्रतिभावान गायक-पत्रकार गिरिजेश सुबह मिलने आ गए थे। स्टार न्यूज के ज़माने की यादें साझा की। हर्षवर्धन त्रिपाठी से भी मिलना तय था पर गिरिजेश ने बताया कि उन्हें अचानक उत्तराखण्ड जाना पड़ा।  रवि पाराशर, आलोक शर्मा, अजित अंजुम, मुनीष, अशोक पांडे, दिलीप मंडल, प्रत्यक्षा सहित नभाटा के दफ्तर जाकर भी कई साथियों से मिलना न हुआ। शकील अख्तर और अरुण दीक्षित से चलती सी मुलाकात हुई। छह की शाम हम भी भोपाल के लिए रवाना हो गए।

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Thursday, December 31, 2009

मित्र-चर्चा के साथ नए साल का स्वागत

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सफर के साथियों को 2010 की खूब-खूब शुभकामनाएं
2009 की शुरुआत भी मित्रों के आगमन से हुई थी। नए-नए ब्लाग मित्र, जिनसे मिलें तो नए से नहीं लगते। देखते-देखते साल बीत गया। इस बीच ब्लाग-मित्रों की आमद लगी रही। इलाहाबाद में साथियों से मिलना हुआ और यूं लगा मानों बरसों से पता-ठिकाना तो जानते थे, पर सिरहाने की किताब में दबा कर बिसराए थे।
खुशकिस्मती से साल के आखिरी महीने की शुरुआत में भी दो अपनों का घर पर आना हुआ। हिन्दी कविता के जाने-पहचाने नाम हैं गीत चतुर्वेदी और विजयशंकर चतुर्वेदी। गीत दैनिक भास्कर में मैगजीन एडिटर हैं और भोपाल में ही रहते हैं। बेहद सीधे, सरल। पढ़ाकू, विचारक। कम उम्र में ख्याति और विद्वत्ता  अर्जन कर पाने का सौभाग्य और जतन दोनो ही उनके हिस्से में हैं। जितना हम जान पाए।  चंद अर्सा पहले तक वे जलंधर में होते थे। अब बढ़ी हुई जिम्मेदारियों के साथ भोपाल में हैं। उनसे रोज मुलाकात की सुविधा है मगर हम मिल नहीं पाते। फोना-फोनी हो जाती है। महिने के पहले हफ्ते में अचानक उनका फोन आया। हम संयोग से उस दिन छुट्टी पर थे। सूचना थी कि दफ्तर में हमारे मित्र बैठे हैं-विजय शंकर चतुर्वेदी जो मध्यप्रदेश के सतना शहर के रहनेवाले हैं, मगर अब मुंबई जा बसे हैं। वहां काफी सालों से हैं।  बाहर से शांत मगर चेतना के स्तर पर सजग-असंतोषी। हिन्दुस्तानियत के वकील। इतिहास-परम्परा के अध्येता की मुद्रा में भी नजर आते हैं। अखबार, टीवी के बाद अब एक टेलीकम्युनिकेशन से जुड़ी भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी में मोबाइल पत्रकारिता कर रहे हैं। दोनों साथी गंभीर ब्लागर भी हैं, मगर हमारे घर पर इन दो “चौबे” के आगमन को छब्बे से दुबे बनने की कहावत सुना हुआ मन कहीं न कहीं यह भी कह रहा था कि कहीं यह अपशकुन न हो। दो – दो चौबे और वो भी कवि, पत्रकार। ईश्वर जाने क्या होगा…कर्णपिशाचिनी ने भी तो कोई चेतावनी नहीं दी थी? खैर, हमने छुट्टी के बावजूद घर से निकलने का मन बनाया पर फिर इरादा बदलते हुए दोनों को घर आने के लिए निमंत्रित किया जो फौरन ही स्वीकार कर लिया गया।
विजय जी को उसी दिन रात को जबलपुर जाना था। इससे पहले उन्हें वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज के घर भी जाना था। बहरहाल दोनों मित्रों के साथ बिताए कुछ पलों का झरोखा हैं ये तस्वीरें। इस मुलाकात को इसलिए भी आप तक पहुंचा रहे हैं ताकि अपने मित्रों और शुभचिंतकों से मिलने-जुलने का मौका नए साल भी इसी तरह मिलता रहे, मन की यह बात सब तक पहुंच सके। चित्रों में बीच में बिराजे हैं गीत, दाएं हैं विजय। क्लिक किया अबीर ने।
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