Sunday, May 30, 2010

कुंदन जैसी आवाज वाले सहगल

logo_thumb[20] ... इस बार पुस्तक चर्चा कर रहे हैं सोलह वर्षीय अबीर जो भोपाल के केन्द्रीय विद्यालय में 12वीं कक्षा के छात्र हैं। इतिहास, भूगोल में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। मानचित्र-पर्यटन के शौकीन हैं। पिछले साल भी उन्होंने शब्दों का सफर के लिए पुस्तक समीक्षा की थी। इस बार  भी जब वे हमारे संग्रह से शरद दत्त की पुस्तक-कुंदनलाल सहगल पढ़ रहे थे, हमने सफर के लिए उनसे समीक्षा की मांग रख दी थी।

पंजाब से आया हुआ एक नौजवान कोलकाता के गली कूचों की ख़ाक छान रहा था। संयोग से उसकी मुलाक़ात न्यू
1946 में जन्मे शरद दत्त मूलतः बहुआयामी व्यक्तित्व के मीडियाकर्मी रहे हैं। फिल्म भी बनाई, कई वृत्तचित्र बनाए, sd फिल्म-संगीत पर खूब लिखा। सिनेमा के इतिहास पर बहुचर्चित लेखन।
थियेटर्स के संगीत निर्देशक आर सी बोराल से हो जाती है। वे उसके गाने से प्रभावित हो कर उसे न्यू थियेटर्स ले जाते हैं जहां उसकी नियुक्ति गायक अभिनेता के रूप में हो जाती है। बस, यहीं से भारत के पहले सुपरस्टार का जन्म होता है। यह बयान पिछली सदी के चौथे दशक में हिंदी फिल्मो के पहले महानायक का दर्जा हासिल करने वाले गायक अभिनेता कुंदन लाल सहगल पर हिंदी में लिखी गयी इकलौती पुस्तक का है। इसे लिखा है शरद दत्त ने जो दूरदर्शन में चीफ प्रोड्यूसर रह चुके हैं। इस पुस्तक को पेंगुइन बुक्स इंडिया ने प्रकाशित किया है। दो सौ दस पन्नो इस पुस्तक में हमें कुंदन के पूरे जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी मिल जाती है। उनकी बहुआयामी शख्सियत, उनके बचपन से लेकर जीवन के अंतिम दिनों तक की विविध छवियां, उनके संघर्ष से लेकर उनकी लोकप्रियता तक, हर चीज़ जानने को मिलती है। सहगल का जन्म जम्मू में 4 अप्रैल 1904 को तहसील दार अमरचंद सहगल के घर हुआ था, वे उनके चार बच्चो में से तीसरे थे। बचपन में वे कभी पहाड़े तो याद नहीं कर पाए लेकिन भजन जरूर उन्हें याद हो जाती थे। पिता के सेवानिवृत्त होने पर 22 साल के होने पर वे जम्मू छोड़ जालंधर आ गए। यहाँ उनके पिता ने ठेकेदारी का काम शुरू किया। उसमे भी मन न लगने पर वे दिल्ली आ गए। यहाँ दो तीन नौकरियाँ बदलने के बाद उनके बड़े भाई की सिफारिश पर उन्हें रेलवे में नौकरी लग गयी। साथ ही साथ ही संगीत भी जारी रहा। यहाँ उनके मुलाकात राघवानंद गौतम से हुई जो उनके गाने से प्रभावित हो उन्हें अपने साथ शिमला के नॅशनल एमेच्योर ड्रामेटिक क्लब ले गए।
कुछ समय यहाँ काम करने के बाद वे कानपुर चले आए। कानपुर में उन दिनों रामपुर सहसवान घराने के उस्ताद रशीद अहमद खां का मुकाम था। उनके चचेरे भाई उस्ताद गुलाम जाफर खां और उस्ताद गुलाम बाकर खां भी वहीं रहते थे। कानपुर की तवायफें भी उस दौर में संगीत में खूब दखल रखती थीं। सहगल इस बाबत जानते थे। बस, पहुंच गए कानपुर इन गुणीजनों की सोहबत में। रोजी रोटी के लिए रेमिंग्टन कंपनी में नौकरी कर ली। काम था टाईपराइटर बेचना। सहगल का ज्यादातर वक्त उस्तादों और तवायफों की सोहबत में गुजरता। कानपुर की एक तवायफ को वे मां का दर्जा देते थे। उनसे सहगल ने नायाब ठुमरियां सीखीं। कानपुर में भी जब बेकारी का साया मंडराया तो वे वे कोलकाता चले गए। यहीं उनकी मुलाक़ात आर सी बोराल से हुई और उनका न्यू थियेटर्स में प्रवेश हुआ और  फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ। 1935 में न्यू थियेटर्स की देवदास के साथ वे हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े अभिनेता बन गए। अपने जीवन काल में कुंदन ने 34 फिल्मो में काम किया और लगभग 176
 scan0001प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स इंडिया/ शरद दत्त/ मूल्य-150रु/ पृष्ठ 211
गाने गाए। सहगल ने बांग्ला, तमिल, पंजाबी, फारसी भाषाओं में गाने गाए।
बंगाली और हिंदी फिल्मो में अभिनय से उन्होंने सभी की वाहवाही हासिल की जिनमे रविंद्रनाथ टैगोर भी शामिल थे। टैगोर ने एक बार सहगल के बांग्ला गायन को सुनकर कहा था “की शुंदॉर गॉला तोमार...। ” सचमुच सहगल का संगीत सुनकर यह भरोसा करना कठिन है कि उन्होंने घरानेदार शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल नहीं की थी। वे खुद भी यही कहते थे कि उन्होंने जो कुछ भी सीखा, सुन सुन कर। विधिवत तालीम कभी नहीं ली। एक बार वे उस्ताद फैयाज खां साहब के पास सीखने पहुंचे। उस्ताद ने कुछ सुनाने को कहा। सहगल ने शायद कुछ अर्धशास्रीय बंदिश सुनाई थी। उस्ताद बोले, मेरे पास सिखाने को ऐसा कुछ नहीं जिसे तुम न जानते हो। किताब लिखने के लिए  शरद दत्त ने सहगल के दौर के लोगों और उन्हें जाननेवालों से गुफ्तगू के मौके तलाशे और  अपनी लेखनी के जरिए इन सुरीली यादों को बेशकीमती दस्तावेज में बदल दिया। 
चालीस के दशक में सहगल माया नगरी मुंबई आए। वे शोहरत की बुलंदियों पर थे पर सेहत जवाब देने लगी थी। यहां उन्होने कुरुक्षेत्र, तदबीर, उमरखय्याम जैसी फिल्में की जो साधारण समझी गईं। शाहजहां ने कुछ सहारा दिया, वह भी नौशाद के संगीत की वजह से। 18 जनवरी 1947 को सहगल ने सुरीले संसार से विदा ली। इस पुस्तक के लिए सामग्री इकठ्ठा करने के लिए शरद दत्त ने सहगल की सभी फिल्मे देखी। गाने हासिल किए और सहगल से जुड़े रहे सभी जीवित व्यक्तियों से मिले। शरद दत्त ने हाल ही में संगीत प्रेमियों के लिए पुराने दौर के महान संगीतकर्रों को समर्पत एक मंच '' कुंदन '' बनाया है। वे कुंदन लाल सहगल पर एक फिल्म भी बना चुके हैं। कुल मिलाकर कुंदन लाल सहगल के बारे में जानने की इच्छा रखने वालो के लिए ये एक जरूरी किताब है।

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11 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

एक महत्वपूर्ण पुस्तक की सुंदर समीक्षा के लिए अबीर को बहुत बहुत बधाइयाँ, और शुभकामनाएँ।

बेचैन आत्मा said...

कुंदन लाल सहगल के गाए गीत की खूब नक़ल करता था.
...जगमग-जगमग दिए जलाओ... आज उनके बारे में पढ़कर अच्छा लगा.

Shekhar Kumawat said...

अरे वाह जी बहुत सुंदर जबाब नही

धन्यवाद

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा आलेख! सहगल साहब की बात निराली.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अपनी तरह के अकेले कलाकार पर लिखी अकेली पुस्तक के लिए शरद दत्त का और इसकी सुन्दर समीक्षा के लिए अबीर का और आप का आभार. अबीर को शुभकामनाएं! सही कहा है - होनहार बिरवान के होत चीकने पात!

राजकुमार सोनी said...

नई जानकारी के लिए धन्यवाद। काफी गंभीरता से लिखा भी है आपने।

ali said...

आयुष्मान अबीर की निगाहों से सहगल को देखने के लिए दम साध कर बैठ गए है ! अशेष शुभकामनायें !



{ अजित भाई, आपका टिप्पणी बाक्स सुबह से बहुत तंग कर रहा है तीसरे राउंड पर सफलता मिल पाई है :) }

Sanjeet Tripathi said...

kya bat hai abir sahab ne to shandar samiksha kar li hai yaha. jab yah samiksha hi jankari se itni bhari hai to kitab to mano khajana hi hogi...

शोभना चौरे said...

वाह बहुत अच्छी समीक्षा |शुभकामनाये

RDS said...

अच्छी समीक्षा वह जो मूल पुस्तक को पढने की तलब ज़गा दे ! रोचक शैली और सार्थक शब्दों की गागर सी रही यह पुस्तक चर्चा ! चीकने पात, भावी भव्य-बिरबान के लक्षण दर्शा रहे हैं । बधाई और मेरे ज्ञानवर्धन के लिये धन्यवाद ।

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब! अच्छी समीक्षा लिखी है।

यह जानकर बड़ा अच्छा लगा कि सहगल साहब कानपुर में संगीत की तालीम पाये।

सुंदर पोस्ट!

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