Tuesday, September 1, 2009

समाजवाद के चक्कर में सरदार[बकलमखुद-100]

पिछली कड़ी- सरदार, सरदारनी और पसीना

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और निन्नानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

रदार की दुल्हन ‘शोभा’ सप्ताह भर रुक कर अपने मायके प्रस्थान कर गई। शादी ने दोनों को आपस में ही नहीं, एक दूसरे के परिवारों से भी जोड़ा था। यह जुड़ाव स्थाई होने का भाव लिए हुए था, लेकिन उस में अभाव भी था। प्रेमचंद के मुताबिक प्रेम साहचर्य से पैदा होता है। दोनों के बीच इन सात दिनों में वह अंकुरा गया था, उस का पल्लवित होना शेष था। मिलने की बाधा समाप्त हुई थी। बात करने को फोन की सुविधा नहीं थी, लेकिन डाक घर तो था। दनादन चिट्ठियों का आदान-प्रदान होने लगा, प्रेम के विकसित होने में इन का योगदान कम नहीं था। पता लगा कि बहुत सी छिपी भावनाएँ इन में ही व्यक्त की जा सकती थीं।यह बहुत महत्वपूर्ण साल था। बिहार से उठा संपूर्ण-क्रांति आंदोलन देश भर में असर दिखा रहा था। इंदिरागांधी के खिलाफ पूरे देश में नाराजगी थी। तभी छोटे मामा बैद्जी का पुत्र गायब हो गया। खबर करने के लिए टेलीफोन एक्सचेंज की मदद ली गई।
हीं परिचित ऑपरेटर जोशी जी ने एक ठिगने, दुबले-पतले खद्दर का कुर्ता पाजामा पहने, काँधे पर झोला लटकाए एक सज्जन से मिलवाया -ये शिवराम हैं। अभी कोई छह माह से बाराँ एक्सचेंज में आएसए हैं, साहित्य, नाटक आदि में दिलचस्पी रखते हैं। कुछ ही देर के की मुलाकात में शिवराम ने सरदार को एक पर्चा पकड़ा दिया। जिस में 24-25 जून को बाराँ में होने वाले कवि-सम्मेलन, नाटक और साहित्यिक विषयों पर गोष्टियों के एक बड़े कार्यक्रम की सूचना थी जिस में सभी हिन्दी प्रदेशों से कवि-साहित्यकार हिस्सा लेन आने वाले थे। दो दिन का आयोजन था। सरदार पर्चा देख कर हैरान था। वह तीन बरस से नगर के साहित्यिकों को एकत्र करने में लगा था। दिनकर साहित्य समिति नाम की संस्था भी बनाई थी जिस का सारा काम वह अकेला देखता था। तीन साल में बात माह में एक-दो कवि गोष्टियों से आगे नहीं बढ़ सकी थी। चर्चा और पत्रिका प्रकाशन की बात करते ही लोग बिदक लेते थे। पता नहीं यह शिवराम क्या बला है? जिसे बाराँ में आए छह माह नहीं हुए और इतना बड़ा, महत्वाकांक्षी कार्यक्रम बना बैठा। शिवराम ने नाटकों की रिहर्सल में आने का न्यौता दिया, सरदार ने दिनकर साहित्य समिति के बारे में बताया।
रदार नाटकों के रिहर्सल में गया तो आनन-फानन में शिवराम ने भूमिका मंढ़ दी। अब रोज रिहर्सल में जाना होने लगा। यहीं शायर दोस्त पुरुषोत्तम 'यक़ीन' से पहली भेंट हुई, वह कॉलेज में मुझ से एक साल पीछे था। पता लगा, नाटक शिवराम ने खुद लिखे हैं और वही निर्देशित भी कर रहे हैं। वे जहाँ से आए थे वहाँ उन के नाटक बहुत चर्चित हुए थे। खानों में काम करने वाले लोग प्रेरित हो कर उन के पास पहुँचे थे और वहाँ हो रहे शोषण से मुक्ति का उपाय पूछने लगे थे। खानों में यूनियन बनी तो खान मालिकों की शिकायत पर शिवराम का ट्रांसफर कर दिया गया। कार्यक्रम जोरदार हुआ। दोनों दिन गरमागरम बहसें हुईं। पहली रात नाटकों के मंचन सफल रहे। नगर में शिवराम चर्चित हो गए। दूसरी रात तत्कालीन काँग्रेस सरकार के खिलाफ जनता के आक्रोश को प्रदर्शित करने वाला जबर्दस्त कवि-सम्मेलन हुआ। उसी रात देश में आपातकाल की घोषणा हो गई। पता किया तो बहुत से प्रमुख लोग गिरफ्तार हो चुके थे। आयोजकों को चिंता सताने लगी, थोड़ी देर पहले तक कवि-सम्मेलन में सरकार के खिलाफ आग उगल रहे कवियों को कैसे यहाँ से निकाला जाए? कहीं वे यहीं गिरफ्तार न हो लें। जैसे-तैसे सुबह
Shivramसरदार और शिवराम की दोस्ती की बुनियाद आपात्काल के दौर में रखी गई और दिनोंदिन वह बेहद मजबूत होती गई...
तक सब को नगर से रवाना किया गया।
तीन साल पहले कुछ चीजें एक साथ हुई थीं। फुफेरी बहन विमला कोटा के दशहरा मेला में लगी सोवियत पुस्तक प्रदर्शनी से गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीद लाई थी और सरदार को बताया था कि इस की कीमत सिर्फ पाँच रुपया है। सरदार ने भी अगली रात उसे खरीदा और रात तीन बजे मेले से लौटने के बाद ही उसे पढ़ने बैठ गया। उपन्यास समाप्त हुआ तो सूरज उग चुका था। उपन्यास लेखक इतना पसंद आया था कि दूसरे दिन प्रदर्शनी में गोर्की का जो भी कुछ उपलब्ध था सब खरीद लिया गया। प्रदर्शनी के संचालक ने इसे गौर से देखा और एक पुस्तक खुद अपनी ओर से मुफ्त भेंट की। सरदार ने इस मुफ्त पुस्तक को पढ़ा तो, लेकिन तब उसे समझ नहीं सका। गोर्की की ‘माँ’ ने यह जरूर समझा दिया था कि संगठित शोषित लोग ही समाज और दुनिया को बदल सकते थे। देश के हालात देखते हुए समझ बनी कि अपने अंदर एक सोशलिस्ट ग्रुप रखने वाली इंदिरा काँग्रेस को परिवर्तनकारी संगठन में बदला जा सकता था। इसी सोच के साथ उस ने काँग्रेस में प्रवेश पा लिया। जल्दी ही युवा काँग्रेस का ब्लाक प्रधान बन गया था। दूसरी ओर उन दिनों की सब से मशहूर कहानी पत्रिका सारिका के संपादक कमलेश्वर क्रांति समझा रहे थे जो सीधे-सीधे जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के समानांतर कोई और ही चीज थी। उस का प्रभाव भी सरदार पर था।
न्हीं दिनों एक मामूली बात पर नगर में हुए सांप्रदायिक दंगे से सीखने को मिला कि लोग अपने आर्थिक हितों को परवान चढ़ाने को लोगों में नफरत फैलाने और उन की जान लेने से भी परहेज नहीं करते। सरदार साहित्यिकों को जोड़ने और उन के बीच समाज-परिवर्तन पर विचार-विमर्श आगे बढ़ाने की कोशिशों में लग गया था। 24-25 जून के आयोजन ने सिखाया था कि समाज लगातार बदलता है और उस के बदलने की गति को तेज या धीमा किया जा सकता है। उसे लगा कि शिवराम से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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16 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

बहुत शानदार सफरनामा है वकीलसाब। आपके भीतर जनवाद के बीज तो शुरु से थे मगर उन्हें दिशा और संस्कार संभवतः शिवराम जी की सोहबत में मिला। अच्छे मित्र विरल होते हैं। शिवराम जी का उल्लेख आपसे अक्सर सुनता हूं और कोटा प्रवास के दौरान उनसे एकाधिक बार मिल भी चुका हूं। शायद उन्हें याद हो, या न याद हो।

हेमन्त कुमार said...

बेहतर सफर ।आभार ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सरदार के संस्मरणों की श्रंखला रोचक है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

" सरदार " नामक पात्र से
अपने को अलग रखते हुए
तटस्थता से देखा और जिया जीवन- दर्शन
अपनी रवानी में
पाठक को पूरी तरह बांधे , आगे बढ़ रहा है -
- ऐसा उम्दा आप ही लिखते हैं दीनेश भाई जी !!
- लावण्या

Arvind Mishra said...

मुझे ई बताया जाय की इसमें मेरी आत्मकथा के अंश कहाँ से आ टपकते हैं -अजित जी यह घालमेल कैसे हो रहा है ?

मीनू खरे said...

बहुत रोचक संस्मरण सफ़र के. बधाई.

बी एस पाबला said...

कमाल है! लगभग उसी समय भिलाई के सिविक सेंटर से सोवियत पुस्तक प्रदर्शनी में हमने भी गोर्की की "माँ" खरीदी थी जो आज भी मेरे सामने की रैक में दिख रही! अद्भुत संयोग!!

इससे पुष्टि होती है कि सब सरदार एक जैसे ही होते हैं :-)

संस्मरण की अगली कड़ी की प्रतीक्षा

Sanjeet Tripathi said...

janvad ya samajvad ke bijo ka ankuran to batchit se ho jata hai lekin unka pallavan aaspaas ke mahaul aur logo ke dvara hi hota hai. yahi bhumika aapke liye gorqi ke upanyas maan ne aur shivram ji ne nibhai.

rochak kadiyan hai
padhta chal raha hu

हिमांशु । Himanshu said...

आपके अत्यन्त अमूल्य अनुभवों का सारांश पा रहे हैं हम । बकलम खुद की यह यात्रा जारी रहे ...

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

चोचलिस्ट एक राजकपूर की पिक्चर में सोशलिस्ट के लिए कहा गया था . आपमें भी राजनीती के कीडे कुलबुलाने लगे , आगे का इंतज़ार

रवि कुमार, रावतभाटा said...

उफ़...
पंद्रह पड़ाव निकल गये...
चलिए देरआयद दुरस्त आयद...

इनसे गुजरना...आपसे गुजरना तो है ही...साथ-साथ शायद एक युग से गुजरना भी हैं...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छा लगा दिनेश जी से इतने करीब से मिलकर

अभिषेक ओझा said...

गोर्की का असर तो आपकी कई पोस्ट में दिखा है... अब पता चल रहा है कैसे ये विचारधारा आई.

शरद कोकास said...

द्विवेदी जी ,शिवराम जी से आपकी मित्रता का जिक्र तो उस दिन आपसे सुना था आज इसके डिटेल्स मिल गये । और पुरुशोत्तम यकीन जी की गज़ले भी आपने पढवाई हैं । शिवराम जी का हिन्दी साहित्य में जो योगदान है उसे ठीक तरह से रेखांकित नहीं किया गया है । मठाधीशों की राजनीति में ज़मीन से जुड़े हुए लोगों की उपेक्षा तो हुई है । खैर क्भी तो यह लोग पहचानेंगे ।

Nitish Raj said...

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति। सरदार और शिवराम के बारे में अच्छी जानकारी। सबसे अच्छा लगा मुझे वो वर्णन, खद्दर का कुर्ता पहने, दुबला पतला, थैला टांगे....।

PD said...

ये गलत है.. आपने आंटी जी का चेहरा कैसे देखा ये आपने बताया ही नहीं और सीधे सात दिनों के बाद की कहानी बताने लगे.. पिछले अंक को आप वहीं से शुरू करें.. :)

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