Friday, September 25, 2009

नांद, गगरी और बटलोई [बरतन-4]

पिछली कड़ी-1.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना 2.मर्तबान यानी अचार और मिट्टीmatka

पा नी के भंडारण से जुड़े शब्दों की श्रंखला मे एक और शब्द है नांद। यह नांद आमतौर पर पशुओं को पानी पिलाने के काम आती है। दो हाथ गहरी दो हाथ चौड़ी और करीब छह हाथ तक लम्बी होती है। इसमें न सिर्फ मवेशी पानी पीते हैं बल्कि चारा खिलाने के लिए भी इसका प्रयोग होता है। यह बना है संस्कृत के नंद से जिसका अर्थ होता है बड़े मुंह वाला जलपात्र। नांद के मूल नंद मे देवनागरी के वर्ण की विशेषताएं समाई हुई हैं। वर्ण में समृद्धि का भाव प्रमुख है। इसके अलावा इसमें परिधि, मंडल और रिक्तता का अर्थ भी समाया है। समृद्धि और सम्पन्नता में सुख का भाव विद्यमान है। इस तरह नन्द् शब्द में मूलतः प्रसन्नता, हर्ष, शांति, संतोष का अर्थ स्थापित हुआ।
र्य संस्कृति में यज्ञ की प्रधानता थी। आर्यजन कुटुम्ब की समृद्धि और शांति के लिए नाना प्रकार के यज्ञ किया करते थे। यज्ञ पूजा-अनुष्ठान का ही आर्य रूप थे और आनंद-मंगल का साधन भी थे।  आर्यो को मंत्रोच्चार, स्वस्तिवचन और अभिषेक में बहुत रुचि थी। नन्दन, नन्दक जैसे शब्दों का अर्थ आनन्द प्रदान करनेवाला है। नन्दा भी इसी कड़ी में आता है। अभिषेक के निमित्त मिट्टी से बने एक छोटे पात्र को भी नन्दा कहा जाता था। यह नांद का प्राचीनतम रूप था। समृद्धि स्थापना का अनुष्ठान यज्ञ का प्रारम्भ नांदीपाठ से होता था जिसका मतलब होता है देवस्तुति अथवा मंगलाचरण, हर्षनाद। कालांतर में यह नांदीपाठ नाट्यकला का अंग बन गया। नाटकों की शुरूआत में जो मंगलाचरण होता है उसे भी नांदीपाठ ही कहते है। स्पष्ट है की मवेशियो के चारा-पानी की व्यवस्था से जुड़ी नांद का रिश्ता वैदिक काल की यज्ञ परम्परा से जुड़ रहा है।
र्तनों की श्रंखला में, खासतौर पर जल भंडारण व्यवस्था के संदर्भ में गागर, गगरी, गगरिया जैसे शब्द हिन्दी के लोकसंसार में रचे बसे हैं। संस्कृत के गर्गरः से ये शब्द बने हैं। गर्गरः से गागर और cooking-pot-winter-waldemarफिर बना गगरा या गगरी। गर्गरः के मूल में है गृ धातु जिसमें तर करना, गीला करना के साथ ही विवर्त, छिद्र, कोटर आदि भाव भी हैं। इसी तरह शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में घड़ा शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है जो बना है संस्कृत की घट् धातु से जिसमें समाने, रहने का भाव है। घट से ही बने है घाट और घटम्। गौर करें हिन्दी के घट या घटम् का अर्थ होता है कलश जिसमें पानी आश्रय पाता है। नदी तट की प्राचीन बस्तियों के साथ जुड़े घाट शब्द पर ध्यान दें, मसलन-ग्वारीघाट, बुदनीघाट, बेलाघाट आदि। जाहिर  है यहां स्नान का भाव न होकर व्यापारिक पत्तन होने का भाव अधिक है। जमघट, पनघट जैसे शब्द इसी कड़ी के हैं।
संस्कृत की कुट् धातु में आश्रय का भाव है। कुटिया, कोट, कुटुम्ब जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। कुट का अर्थ घड़ा भी होता है और घर भी। दोनों ही शब्दों में आश्रय का भाव है। घर में कुटुम्ब आश्रय पाता है और घड़े में जल। व्यापक अर्थ में बात करें तो कुट में घट व्याप्त है। वर्ण क्रम में ही भी आता है। घट में जल व्याप्त है। कुट पहाड़ को भी कहते हैं इसीलिए एक पहाड़ी वृक्ष का नाम कुटज भी है। यानी कुट में जन्मा। कुट से बना कोट किले में तब्दील हो गया। कुटज का एक अर्थ गमले में उगा पौधा भी है। जल में ही जीवन जन्मा है और उसी पर टिका है। वृक्ष घड़े में नहीं उगते, मगर पुष्पीय पौधे ज़रूर गमले अर्थात कुण्ड में उगाए जाते हैं। कुण्ड एक प्रकार का घड़ा ही है। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी।
टलोई भी इसी किस्म का एक शब्द है। घड़ा, मटका, भांड या गागर में बटलोई का ही आकार सबसे छोटा है। बटलोई एक ऐसा पात्र है जिसमें पानी तो भरा ही जा सकता है मगर जिसे चूल्हे पर भी चढ़ाया जा सकता है। यूं भांड से बने हांडी और हंडिया भी चूल्हे पर चढ़ती है। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती मुहावरा हिन्दी में खूब मशहूर है। बटलोई आमतौर पर खाना पकाने के काम ही आती है। मालवा, राजस्थान और उप्र के कुछ हिस्सों में देगची या घड़े के लिए बटलोई शब्द भी बोला जाता है। बटलोई का विकासक्रम यूं रहा है- वर्त+लोहिका > वट्टलोईआ > बटलोई। वर्त यानी गोल और लोहिका यानी लोहे का पात्र।

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11 कमेंट्स:

हेमन्त कुमार said...

"बटलोई का विकासक्रम यूं रहा है- वर्त+लोहिका > वट्टलोईआ > बटलोई। वर्त यानी गोल और लोहिका यानी लोहे का पात्र |"
इतना बेहतर रहा यह सफर । मत पूछिये !
हम तो अभी तक समझते थे कि यह रस्टिक शब्द है ।

Unknown said...

नन्द से बटलोई तक बड़ा अच्छा विवरण. बटलोई जैसा ही कुछ होता है बट्टू जिसमे dal या भात चूल्हे पर पकाया जाता था, उसीको मराठी में गुंड भी कहते हैं.

Udan Tashtari said...

बटलोई शब्द ने दादी की याद दिला दी..बहुत समय बाद याद आईं आज एकाएक!

दिनेशराय द्विवेदी said...

शब्द यात्रा हमेशा गंभीर होती रही है। घट् शब्द बहुत व्यापक है। जरा घट-घट का प्रयोग देखें जब कहा जाता है, घटघटवासी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस पोस्ट से तो कई प्रचलित शब्दों के बारे में अच्छी जानकारी मिल गई है।
बधाई!

ghughutibasuti said...

सदा की तरह गजब का सफर! बस एक बात सोचती हूँ कि क्या अब कोई नए शब्द हिन्दी में कभी बनेंगे या फिर केवल अंग्रेजी से आयात ही किए जाएँगे?
घुघूती बासूती

Himanshu Pandey said...

एक उम्दा आलेख । हम सबके बीच प्रचलित शब्दो का इस तरह अँगड़ाई लेकर खुलना गजब की अनुभूति देता है । हम तो मुग्ध हुए जाते हैं । आभार ।

विनोद कुमार पांडेय said...

जानकारी से लबरेज एक उम्दा प्रस्तुति..मुझे तो इन बातों के बारें में कोई जानकारी ही नहीं थी..आपने बहुत ही रोचक और बढ़िया बातें बताई..
सुन्दर आलेख..बधाई..

निर्मला कपिला said...

बहुत बदिया हमारे यहाँ जो गागर से बडा पीतल का घदा सा होता है उसे बलटोह और जो उससे छोटा उसे बलटोई कहते हैं धन्यवाद्

निर्मला कपिला said...

माफी चाहती हूँ घडा लिखना था घदा लिखा गया

शोभना चौरे said...

नन्द ने बटलोई की यात्रा बडी ही रोचक रही .बटलोई के आकार का उससे छोटा गोल बर्तन जो की भरत धातु का बना होता है जिसमे हमेशा चूल्हे पर दाल ही पकाई जाती थी जिसकी थ काफी मोटी होती है उसे निमाड़ और मालवा में "भरत्या "कहते है |
आभार

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