Sunday, September 20, 2009

मर्तबान यानी अचार और मिट्टी [बरतन-3]

संबंधित कड़ियां-1.बालटी किसकी? हिन्दी या पुर्तगाली की 2.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना

रतन भाण्डों की श्रंखला का एक शब्द है मर्तबान जो हिन्दी में खूब प्रचलित है। यह शब्द शहरी पिज्जा-संस्कृति में अब कम सुनाई पड़ता है मगर गांवों-कस्बों की भाषा में यह खूब प्रचलित है। मर्तबान यानी एक भारी पेंदे, संकरे मुंह और गहरे पेट वाला चीनी मिट्टी, कांच या धातु का ऐसा बरतन जिसमें अचार-मुरब्बों के अलावा रसायन या दवाएं भरी जाती हैं। होम्योपैथी, आयुर्वेद और यूनानी हकीमों के यहां आज भी ये मर्तबान रखे दिखते हैं। मर्तबान किस भाषा का शब्द है, इस पर भाषाविद् एकमत नहीं हैं। इसे अक्सर अज्ञात मूल का माना जाता है। पर ऐसा नहीं है। कुछ साक्ष्य हैं जिनसे माना जा सकता है कि यह भारोपीय मूल का शब्द है। वैसे मर्तबान के लिए हिन्दी में अमृतबान, म्रितबान, अमरितबान, मरतबान जैसे रूप मिलते हैं। मगर मर्तबान का अमृत शब्द से कोई लेना देना नहीं है।
र्तबान पर आने से पहले कुछ दीगर बातों पर चर्चा कर ली जाए। घड़ा, गगरी जैसे पात्र आमतौर पर मिट्टी से ही बनाए जाते रहे इसीलिए लोक-संस्कृति में इनका चलन भी ज्यादा रहा। संस्कृत की भण् धातु से जन्मे भाण्ड के साथ ऐसा नहीं है। भाण्ड शब्द मे एक तो विशाल आकार का भाव है। दूसरे यह प्रायः धातु के होते थे। मिट्टी के हंडों को मृद्भाण्ड कहा जाता है। मिट्टी से बने एक अन्य पात्र को मटका कहते हैं। घरेलु जल भंडारण के साधनों में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है। मिट्टी शब्द बना है संस्कृत की मृद् धातु से जिसमें मिट्टी, गारा, टीला जैसे भाव हैं। मृद् से ही मिट्टी के लिए मृदा शब्द बना है। घड़े को इसीलिए मद्भाण्ड कहते हैं। इसी धातु से बना है मृत्तिका शब्द जिसका अपभ्रंश हुआ मट्टिआ और फिर बना मिट्टी। मटका इसी कड़ी में आ रहा है। इसका संस्कृत रूप है मार्तिक+कः। देशज रूप में यह हुआ माट्टिकआ जो हिन्दी में मटका बना। भाण्ड, घड़ा या मटका के भीतर आश्रय या संग्रहस्थल का भाव महत्वपूर्ण है। इन सभी पात्रों में जल के अलावा अन्य पदार्थ भी रखे जाते रहे हैं। ज़मीन में गड़े खजाने अक्सर घड़ों और कलशों से ही बरामद होते हैं। घरेलु बचत योजना के तहत सदियों से महिलाएं छोटी छोटी मटकियों में सिक्के एकत्रित करती रही हैं। यही गुल्लक है। मटका शब्द का एक अर्थ सट्टा-जुआ भी होता है। दरअसल इस खेल में दांव लगानेवालों की इनामी पर्चियां एक मटके में संग्रह की जाती हैं और फिर विजेताओं की लाटरी निकाली जाती है इसलिए इस जुए का नाम ही मटका पड़ गया।
र्तबान शब्द को यूं अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति मथाबान mauthaban से बताई जाती है जिसका अभिप्राय बैठी हुई मुद्रा से है अर्थात सिंहासन पर बैठा शासक। अग्रेजी में एक शब्द है मार्जपैन जो यूरोपीय खान-पान शब्दावली से आया है यानी मीठी ब्रेड, बादाम का जैम, कैंडी की तरह की एक मिठाई। अरब में शासक की सिंहासन पर बैठी मुद्रा के एक सिक्के का नाम भी मथाबान था। अरबों के lemon-limeस्पेन से रिश्तों के जरिये यह शब्द यूरोप में पहुंचा। वहां भी सलीब पर टंगे ईसा की तस्वीर वाले एक सिक्के को यही नाम मिला। बाद में इस सिक्के के आकार की एक कैंडी को भी यही नाम मिल गया। मज़े की बात यह कि सिक्के के साथ साथ मार्जपैन में सिक्के का वज़न अथवा आकार की माप का भाव भी आ गया।  कैंडी के बंडल जिस बाक्स में रखे जाते थे, उसे भी यही नाम मिला। यूं मथाबान से मार्जपैन अर्थात एक बक्से की मर्तबान जैसे पात्र में ढलने की कल्पना कुछ दुरूह है।
क अन्य व्युत्पत्ति के मुताबिक दक्षिणी बर्मा का एक प्रसिद्ध तटवर्ती शहर है मोट्टामा जिसका प्राचीन नाम था मर्तबान। यह इलाका मर्तबान की खाड़ी के नाम से ही जाना जाता है। यह शहर चीनी मिट्टी से बने सामानों खासतौर पर विशिष्ट आकृति के बरतनों के लिए मशहूर था। यहां निर्मित सामान भारत समेत पश्चिमी देशों तक जाता था। अरब व्यापारी यहां से दूरदराज तक सामान ले जाते थे। बहुत मुमकिन है यहां के विशिष्ट पात्रों को मर्तबान नाम इसी वजह से मिला है। इसी वजह से यह शब्द अरबी, फारसी ज़बानों में दाखिल हुआ हो। मगर यह सिर्फ संभावना ही है। यह भी संभव है कि मर्तबान शब्द मृद+भाण्ड से बने मृदभाण्ड का बिगड़ा रूप हो। मिट्टी शिल्प के धनी बर्मा के एक स्थान का नाम मृद्भाण्ड निर्माण के लिए चर्चित हुआ और शिल्प की वजह से स्थान को भी यह नाम मिल गया यह नामुमकिन नहीं है। दूसरी बात यह कि बर्मा विपरीत या दूरस्थ सभ्यता का देश न होकर प्राचीनकाल से ही वृहत्तर भारत का हिस्सा रहा है। बर्मा का नाम ही भारोपीय मूल के ब्रह्मा से बना है।
ताज्जुब नहीं कि मर्तबान भारतीय मूल का शब्द है न कि सेमिटिक मूल का। अरबी और फारसी शब्दकोशो में मर्तबान शब्द का इन्ही हिज्जों और उच्चारण के साथ उल्लेख भी नहीं मिलता है। अरबी, फारसी की तो छोड़िए हिन्दी में लोकप्रिय मद्दाह साहब के उर्दू कोश में भी मर्तबान शब्द का इन्द्राज इनमें से किसी भाषा के खाते में नहीं है। हालांकि प्रख्यात भाषाविद भोलानाथ तिवारी शब्दों का जीवन में मर्तबान शब्द की व्युत्पत्ति मृद्भाण्ड से नहीं मानते। उनकी राय में यह अरबी शब्द है। इसके बावजूद वे मर्तबान शब्द के अरबी मूल की ओर कोई संकेत नहीं करते हैं और न ही इसके सेमिटिक संदर्भों का उल्लेख करते हैं। अब तक मर्तबान शब्द की जितनी भी व्युत्पत्तियों की हमने चर्चा की है उनमें मृद्भाण्ड शब्द से मर्तबान का जन्म तार्किक नज़र आता है। -जारी

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14 कमेंट्स:

Varun Kumar Jaiswal said...

बड़ी सार्थक और संरक्षित चर्चा रही आज की |
धन्यवाद ||

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मर्तबान के मामले में आप का मत ही उत्तम दिखाई दिया।

मीनू खरे said...

वाह वाह मर्तबान ! जानकारी बढ़िया लगी.

AlbelaKhatri.com said...

आनन्द आया..........
बधाई !

हिमांशु । Himanshu said...

"बहुत मुमकिन है कि मर्तबान शब्द मृद+भाण्ड से बने मृदभाण्ड का बिगड़ा रूप हो।"

यही सही लग रहा है । आभार ।

हेमन्त कुमार said...

आजकल तो बस इसे जार कहा जाता है ।
बेहतर । आभार ।

शोभना चौरे said...

mrtban के बारे में बहुत अछि जानकारी दी |हमें तो मर्तबान शब्द बहुत आकर्षित करता है क्योकि उसमे चटखारे वाली चीजे रखी जाती है |
आभार

RDS said...

वडनेरकर जी,

बांचोगा तो हसी हसी ने लोटपोट हो जाओगा । मथाबान mauthaban से मालवा में तो बण्यो ‘माथनो’ । माथनो , जीमे अथानो धरां । प्रयोग देखजो :- अथाना को माथनो / माथना को अथानो (शब्दानुवाद क्रमशः - अचार का मटका / मटके का अचार )

माथनी नानी होये ने माथनो मोटो । ऊसे बी छोटी को कईं नाव ? चक्ल्यो. घणो कामको ! माळ में ली जाव तो कुवा पे ली जाव तो . . जसो चाओ !

कांच नी तो चीनी को बरतन बरनी केवाय ।


वडनेरकर जी, ( खडी बोली मे अनुवाद ) पढेंगे तो हॅस हॅस कर लोट पोट हो जाएंगे । मथाबान mauthaban से मालवा मे शब्द बना - माथनो । माथनो , जिसमे अचार संग्रहित कर रखा जाता है । प्रयोग देखियेगा :- अथाना को माथनो / माथना को अथानो (शब्दानुवाद क्रमशः - अचार का मटका / मटके का अचार ) माथनी छोटी होती है जबकि 'माथना' बडा लेकिन उससे भी छोटी को क्या कहेंगे ? चक्ल्यो. बहुत उपयोगी ! चाहें जंगल में ले जायें या कुए पर .. जैसा चाहें ।

मर्तबान के तौर पर मटके के अलावा चीनी मिट्टी या कांच का उपह्योग में आता है वह बरनी ही कहलाता है ।

विनय ‘नज़र’ said...

लाजवाब जानकारी

Mansoor Ali said...

दिलचस्प आपका ये 'अजी' मर्तबान है
एक शख्स पारसी है, 'अदि मर्ज़बान' है.
है आपका विचार कि ये मृद्भाण्ड है,
फारस से न आया हो? ये मेरा गुमान है.

सुशीला पुरी said...

bahut chatpati jankari hai.........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हमारे यहाँ मर्तबान को अमृतबान कहते हैं।

Nirmla Kapila said...

कुछ दिन से कम्प्यूटर की वजह से परेशान थी कुछ शब्द पढने से रह गये फुरसत मे पढूँ गी आपकी पोस्ट पढ कर तो लगता है जिस चीज़ को भी हाथ लगायेंगे आपकी पोस्ट जरूर याद आयेगी धन्यवाद और शुभकामनायें

गिरिजेश राव said...

मृद्भाण्ड भारतीय सभ्यता के पड़ावों को भी दर्शाते हैं - Painted grey ware और red ware।

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