Sunday, May 2, 2010

[नामपुराण-11] घुड़दौड़ वाले वाजपेयीजी

 VCharRace

दे वीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपनी पुस्तक लोकायत में वाजपेय का रिश्ता अन्न और पेय से जोड़ते हैं। वाजपेय यज्ञ सोमयज्ञ की श्रेणी में आता है। अपने सरल रूप में वाजपेय जैसे अनुष्ठान का रिश्ता अन्न और पेय से ही है। अन्न उत्पादन और कृषि उत्पादन कार्यों के संदर्भ में इस अनुष्टान के साथ दार्शनिक सामाजिक और राजनैतिक चिंतन बाद में जुड़ा। कालांतर में वाजपेय अनुष्ठान यज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। कहा जा सकता है कि ग्रामीण संस्कृति में वाजपेय अनुष्ठान उत्तम कृषि उत्पादन की अभिलाषा में किया जाने वाला अनुष्ठान था। उपज प्राप्ति के बाद इसे करने का प्रचलन शुरू हुआ जिसमें प्राप्त सम्पदा में और अभिवृद्धि की अभीप्सा शामिल थी। कालांतर में यह अनुष्ठान एक
पिछली कड़ियां-1.नाम में क्या रखा है 2.सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक 3.हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल 4. एक घटिया सी शब्द-चर्चा 5.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी 6.नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल, नैनीताल 7.दुबे-चौबे, ओझा-बैगा और त्रिपाठी-तिवारी 8.यजमान का जश्न और याज्ञिक.9.पुरोहित का रुतबा, जादूगर की माया.10.वाजपेयीजी की गति, जोश और शक्ति
उत्सव में परिवर्तित हुआ। वाजपेय यज्ञ में यज्ञादि क्रिया से इतर जनपदीय लोकानुरंजन भी जुड़े। वाज में निहित क्षमता, उत्साह, जोश, गति, वेग जैसे भावों का विस्तार परीक्षण, स्पर्धा, दौड़ जैसे भावों में हुआ। सदा के घुमक्कड़ आर्यों के साथ घोड़े शुरु से रहे हैं। पशुपालन संस्कृति में अश्व की बहुत महत्ता है।
वैदिक साहित्य में अश्व का विविधरूपी उल्लेख है। इस तरह वाज शब्द का एक अन्य अर्थ घोड़ा भी स्थिर हुआ और वाजपेय यज्ञ के संदर्भ में इसमें जंगी घोड़ा, युद्धाश्व जैसे अर्थ बने। ग्रामीण मेलों-ठेलों में होने वाले बैल दौड़, घुड़दौड़ जैसे आयोजनों में इसी वाजपेय की छाया देखी जा सकती है। वाजपेय यज्ञ का आयोजन अपने आरम्भिक स्वरूप में लोकोत्सव जैसा ही था। घुड़दौड़ या रथदौड़ इसका प्रमुख घटक बना। यह अश्व विजय का प्रतीक था और इस पर यज्ञकर्ता का स्वामित्व होता था। यज्ञकर्ता को वाजपेयी कहा जाता था। यह माना जा सकता है कि ब्राह्मण यजमान भी वाजपेयी कहलाता था और आहूति दिलानेवाला यज्ञकर्ता भी, जो बाद में पुरोहित कहलाता था।  हिलब्रांट ने इन आयोजनों की तुलना प्राचीन ओलिम्पिक से की है जो प्राचीन ग्रीकोरोमन संस्कृति का जनपदीय उत्सव ही था। राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार बाद में यह यज्ञ शासक की सार्वभौम सम्राट बनने की इच्छापूर्ति का जरिया बने। जो शासक अन्य राज्यों पर अधिकार कर उनके अधिपति बन जाते थे वे राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ अथवा वाजपेय यज्ञ कराने के भी अधिकारी बन जाते थे। प्रायः वाजपेय आयोजन में होने वाली घुड़दौड़ में यज्ञकर्ता के अलावा उसके परिजनों और अधीनस्थों के अश्व भी हिस्सा लेते थे पर यज्ञकर्ता का अश्व ही विजयी कहलाता था। प्रभावशाली व्यक्ति के लिए हर आयोजन में सुभीते निकल आते हैं। पुरोहित बहुत आसानी से रास्ते निकालते थे। मैच फिक्सिंग की परिपाटी बहुत प्राचीन रही है। वैतरणी पार कराने वाली कामधेनु आज तीर्थघाट पर अशक्त बछिया के रूप में दिखाई पड़ती है और दिन में सवा सत्ताईस बार वैतरणी पार करते हुए  बुढ़ा जाती है।
क्षत्रियों के वाजपेय में इसका प्रतीकार्थ शौर्य और दिग्विजय से जुड़ा। काशीप्रसाद जायसवाल के मुताबिक वाजपेय यज्ञ राजनीतिक उद्धेश्य से न होकर ऐश्वर्य की विजय (ओलिम्पिक विक्ट्री) का ही प्रतीक था। अलबत्ता इसे करनेhorse1 के बाद सम्राट की सार्वभौमिकता सिद्ध हो जाती थी। विद्वानों के मुताबिक प्राचीनकाल में विभिन्न वर्णों के लिए अलग अलग यज्ञों का विधान था। क्षत्रिय के लिए राजसूय यज्ञ धर्म था तो ब्राह्मण के लिए अधर्म। वाजपेय यज्ञ ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए धर्म था मगर वैश्य के लिए अधर्म। क्षत्रिय यज्ञकर्ता के लिए यह यज्ञ राज्याभिषेक से लेकर सम्राट पद प्राप्ति का निमित्त था और ब्राह्मण के लिए यह पुरोहित पद का पूर्वसंस्कार था। वाज या वाजि शब्द में निहित शक्ति का प्रतीकार्थ आयुर्वेद में भी काम आया। आयुर्वेद में ओषधि के जरिए शक्तिवर्धक प्रक्रिया को वाजिकरण कहा जाता है। यहां भाव अश्व के समान शक्तिवान होने से ही है। यह स्पष्ट है कि वाजपेय अनुष्ठान करानेवाले यज्ञकर्ता ही वाजपेयी कहलाए।  क्षत्रिय शासक द्वारा प्रतिष्ठा सिद्ध करने हेतु किए वाजपेय यज्ञ के बाद वह राजा या सम्राट कहलाता था और ब्राह्मण इस यज्ञ के बाद पुरोहित पद का अधिकारी होता था। दिलचस्प है यह कि इस अनुष्ठान के जरिये पुरोहित का रुतबा हासिल करनेवाले ब्राह्मणों ने अपने नाम के साथ वाजपेयी जोड़ कर इस यज्ञ को पुरोहित उपाधि की तुलना में भी अधिक महत्व दिया।
स यज्ञ में सतरह की संख्या का महत्व है। आश्वलायन श्रौत सूत्र में वाजपेय यज्ञ की दक्षिणाओं का ब्योरा मिलता है। वाजपेय यज्ञ के उपरांत यजमान के जीते हुए रथ का अधिकारी हो जाता है। यज्ञ दक्षिणा के रूप में 17 परिधान, 1700 गाएं, 17 घोड़े, 17 बैल, 17 अन्य पशु, 17 गाडियां और 17 हाथी पुरोहितों में बांट दी जाती हैं। वाजपेय जैसे सोम यज्ञों के दौरान दिन में तीन बार यानी प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल प्यालियों में सोमरस पिया जाता था। ध्यान रहे वाजपेय में वाज अर्थात वनस्पति या अन्न- शक्ति तथा पेय यानी तरल, रसपान का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में सोम का अत्यंत महत्व रहा है और इसके विविध प्रतीकार्थ हैं। मोटे रूप में सोम को शक्तिवर्धक तत्व के रूप में ही देखा जाता है और इसे उपज, मनुष्य को प्रदत्त दैवीय प्रसाद समझा जाता है। -जारी

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9 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आज मुझे लगा कि मैं कल विनोद में की गई अपनी टिप्पणी एक पोस्ट पहले ही कर गया।
"बाद में यह यज्ञ शासक की सार्वभौम सम्राट बनने की इच्छापूर्ति का जरिया बने।"
इस पंक्ति को पढ़ कर राजनेताओं द्वारा की जा रही दिल्ली और लखनऊ की रैलियाँ याद आ गईँ।

अजित वडनेरकर said...

बहुत सही कहा द्विवेदी जी। आज की रैलियां अतीत के राजसूय, दिग्विजय, वाजपेय, अग्निष्टोम, अश्वमेध जैसे आयोजनों का ही बदला हुआ रूप हैं। मर्म दोनो का एक ही है।

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल said...

बहुत खूब अजीत जी...शुक्रिया!!!

Udan Tashtari said...

पढ़कर द्विवेदी जी खूब याद किया. :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाजपेई के साथ यज्ञ शब्द की विवेचना बहुत सटीक रही!

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बहुत जानकारी भरी पोस्ट .दिनेशजी ने जो कहा सोचने लायक है .

प्रवीण पाण्डेय said...

ज्ञान और बढ़ा आज भी ।

ali said...

यज्ञं और रैलियों पर आप और द्विवेदी जी से सहमत !
अजित भाई क्या सत्रह के अंक की स्वीकार्यता / अर्थ / सिग्निफिकेंस आदि के विषय में कुछ अधिक जानकारी मिल सकेगी ?

Mansoor Ali said...

अश्व पहले जिताए जाते थे,
अब तो बस वे गिनाये* जाते है,
थी वफ़ा उनकी 'वाज' में शामिल,
माल-ओ-ज़र से रिझाए जाते है.

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-mansoor ali hashmi
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