Tuesday, March 23, 2010

[नामपुराण-2] सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक

मू ल स्थान के नाम से अपने समूह की पहचान जोड़ने की प्रवृत्ति भारत के सभी समुदायों में देखी जा सकती है। खासतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा बसने वाले जनसमूहों ने अपनी पहचान को क्षेत्र विशेष के साथ जोडा। राजेश खन्ना के नाम के साथ जुड़ा खन्ना khanna उपनाम दरअसल पंजाब का एक कस्बा है। इसी तरह तलवंडी, भिंडरावाला, माहिवाल, साहिवाल जैसे न जाने कितने शब्द हैं जो मूलतः स्थानों के नाम हैं मगर हम इन्हें किन्हीं व्यक्तियों के उपनाम के तौर पर जानते हैं। महाराष्ट्र के निवासियों के नाम के साथ “कर” ancient-indus-mapशब्द अक्सर जुड़ा होता है। दरअसल यह उनका जातीय परिचय नहीं बल्कि क्षेत्रीय परिचय होता है। गावस्कर gavaskar, बुधकर, वडनेरकर, मंगेशकर जैसे नामों के साथ जुड़े “कर” से अभिप्राय वहां का निवासी होना ही है। कोंकण के मंगेशिम् गांव से ताल्लुक रखनेवाले लोग मंगेशकर हो गए और गावस गांव के लोग गावसकर। महाराष्ट्र के आम्बेड से नाता रखनेवाले महार जाति के एक परिवार ने मध्यप्रदेश के महू में बसेरा किया। इस परिवार में जन्में पुत्र ने आम्बेडकर उपनाम को शोहरत दिला दी। ये थे डॉ भीमराव आम्बेडकर। बुध नामक आबादी से हटकर कहीं और जा बसे लोगों ने अपने नाम के साथ बुधकर लगाना शुरु किया और वडनेर कस्बे से निकले लोग वडनेरकर कहलाए। गौरतलब है यह ‘नेर’ संस्कृत के नगरम् का देशज रूप है। वडनेर कभी वटनगर-बड़नगर अर्थात जहां वटवृक्षों की बहुतायत हो,  रहा होगा। आज यह स्थाव बड़नेरा या वडनेरा के नाम से जाना जाता है। खुद के नाम के साथ स्थान का नाम जोड़ने से जातिभेद भी मिटता था, क्योंकि अलग अलग वर्गों के लोग जब परदेश में जा बसेंगे तब उनकी पहचान जाति नहीं, वह स्थान होगा जहां से वे आए हैं। शिक्षा के विस्तार और आप्रवासन के चलते जातिप्रथा शिथिल हुई थी। कल्पना की जा सकती है कि मुहूर्त विचार और शुभ-अशुभ जैसी सोच के चलते मध्यकालीन समाज ने अपने बौद्धिक विकास के सारे रास्ते बंद कर लिए थे। जातिवाद जैसी बुराइयां सदियों के इसी ठहरे पानी वाले कूपमंडूक समाज की देन रहीं। अब बालठाकरे अगर मुंबई में रहनेवालों की पहचान मुंबईकर से करते हैं तो बुरी बात नहीं, मगर इसे अमल में लाने के उनके तरीके की भर्त्सना की जानी चाहिए। 
नाम की वजह से उपनाम बनने के कुछ अन्य उदाहरण देखें। निरन्तर आप्रवासन के चलते स्थान आधारित पहचान को अपने मूल नाम से जोड़ने का मकसद पुरखों की भूमि या मूलस्थान के नाम को अपने परिचय से जोड़ कर स्थायी बनाना था। स्थान नाम की तरह नदियों के नाम से भी मानव समूहों की पहचान होती रही है। खास तौर पर ब्राह्मण वर्ग में यह परिपाटी अधिक रही है। गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही दुनियाभर में जलस्रोतों के किनारे ही बसाहटों की शुरुआत हुई और फिर वहां स्थायी बस्तियां बस गईं जो कालांतर में नगरीय सभ्यता का केंद्र बनीं। सिंधु नदी के किनारे आज से चार हजार साल पहले जो समृद्ध सभ्यता विकसित हुई उसे इस महान नदी के नाम पर ही सिन्धु घाटी sindhu की सभ्यता सैंधव सभ्यता कहा Copy of collage-715691 जाता है। भारतवर्ष में निवास करनेवाले सभी लोग हिन्दू कहलाते हैं। हिन्दू शब्द का उद्गम सिन्धु से ही हुआ है। हिन्दू नाम से जुड़ी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनकी नकारात्मक और सकारात्मक व्याख्या की जाती है। इस बारे में विस्तार से यहां लिखना अभीष्ठ नहीं है क्योंकि इस पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है। किन्तु यह निर्विवाद है कि किसी जमाने में हिन्दू शब्द जाति बोधक नहीं, बल्कि स्थानवाची था। आज भी हिन्दू और हिन्दुस्तान से स्थान का बोध पहले होता है न कि धर्म या जाति का। सैंधवजनों का मूल स्थान ही हिन्दुस्तान है। ग्रीक भाषा में सिन्धु को इंडस कहा गया। इंडियन, इंडियाना जैसे शब्दों के मूल में सिन्धु ही है। दिलचस्प यह भी कि भारत की खोज के नाम पर शुरु हुए अभियान का हासिल था आज की महाशक्ति अमेरिका। कुछ देशोवाले पूर्वी द्वीपसमूह को वेस्ट इंडीज नाम मिला जिसके मूल में यही इंडिया india यानी सिन्धु है। पौराणिक चरित्रों राजा दुष्यंत और शकुंतला के  पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत हुआ। भरत bharat की संतति या भारत से जुड़ा हुआ व्यक्ति ही भारतीय कहलाता है। मूलनाम से जुड़ी यह पहचान कितनी महत्वपूर्ण है, इसे जानने के लिए कभी पाकिस्तानी दूरदर्शन या रेडियो प्रसारण सुनें। दुनियाभर में भारत को इंडिया कहा जाता है, मगर पाक संचार माध्यमों में भारत के उल्लेख से बहुत सुकून मिलता है। ध्यान रहे, भरत शब्द उसी भृ धातु से बना है जिसमें भरण-पोषण का भाव है। जाहिर है राजा ही प्रजा का भरणपोषण करता है। भरथः का अर्थ है प्रभुसत्ता प्राप्त राजा। भाषाविज्ञानियों के अनुसार संस्कृत के भ्रातृ bhratri, फारसी के बिरादर bradar और अंग्रेजी के ब्रदर जैसे भाईचारा साबित करनेवाले शब्दों के मूल में भी यही भृ धातु है। माना जा सकता है कि सदियों पहले भरतभूमि पर जन्मे जैन और बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने तब के ज्ञात संसार में विश्वबंधुत्व का प्रसार करने की ऊर्जा, अर्थ और प्रेरणा इसी शब्द से ग्रहण की होगी।

भारत में ब्राह्मणों की अनेक शाखाएं नदियों के नाम पर हैं। नदियों को अक्सर सीमा रेखा भी माना जाता रहा है। विद्याध्ययन या विद्याप्रसार के लिए जब ब्राह्मण वर्ग के लोगों का आप्रवासन हुआ तब अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को उन्होंने अपने नाम से जोड़ा या परदेश के लोगों नें उनकी शिनाख्त उनके मूलस्थान के आधार पर की।  जैसे सरयू नदी के आधार पर ब्राह्मणों का एक वर्ग सरयूपारीण या सरयूपारीय ब्राह्मण कहलाता है। नर्मदा घाटी और वहां के विशाल उपजाऊ क्षेत्र में निवास करनेवाले ब्राह्मणों को नार्मदीय ब्राह्मण कहा जाता है। गंगा के नाम से गांगेय शब्द चला। प्राचीन सरस्वती नदी के नाम पर सारस्वत ब्राह्मणों की पहचान बनी। प्राचीनकाल में स्थल मार्ग की तुलना में जलमार्ग आवागमन और व्यापार का बड़ा जरिया था। नदियों के किनारे नगरों के बसने का क्रम शुरु हुआ। नदियां ही परिवहन का प्रमुख जरिया थीं। नदी किनारे बड़े नगर इसलिए बसे क्योंकि वहां बड़े घाट विकसित हुए जो व्यापार का केंद्र थे। इन्हें पत्तन, पट्टण कहा जाता था। देशभर में कई ऐसे नगर हैं जिनके साथ पट्टन शब्द लगता है जैसे विशाखापट्टन, मछलीपट्टन, मद्रासपट्टिनम्, प्रभासपट्टन। पट्टन का ही एक रूप पाटण हुआ। देश में पाटण नाम की भी कई बस्तियां हैं जैसे झालरा पाटन, फूटी पाटन, पाटन आदि। जाहिर है कभी ये नदी आधारित व्यापार के बड़े केंद्र रहे होंगे। -जारी
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11 कमेंट्स:

sidheshwer said...

अजित भाई,
नाम पुराण दिलचस्प है!

Suman said...

nice

तारकेश्वर गिरि said...

बहुत ही बढ़िया सीरीज है। इसे कृपया जारी रखें। कम से कम लोग अपना वजूद तो याद रखेगे।

Udan Tashtari said...

हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इस श्रंखला की जानकारी बहुतों के लिए नई होगी। नाम अपने साथ इतिहास को लिए चलते हैं।

किरण राजपुरोहित नितिला said...

शहर के नामों की पोस्ट मुझे बहुत पसंद आती है .
राजस्थान के बहुत से गावो के नाम में बासनी आता है .जैसे -
मनना की बासनी ,राजगुरु की बासनी, भाटियो की बासनी ,सेपावतो की बासनी . जो बस्ती से बना लगता है .
गुड़ा नाम से भी बहुत सारे गाव है जैसे - जैत्सिंघ्जी का गुड़ा ,गुड़ा बालोतान,केशार्सिंघ्जी का गुड़ा आदि आदि .

शोभना चौरे said...

bahut rochak jankari .jyadatar bahuo ko bhi unke ganv ke nam se hi bulaya jata hai ssural me ,aur bahoo apne gav ki khyati ho to hmesha achha achran karti hai .nam ka gaourv bdhane ke liye .

Mansoor Ali said...

कुछ तो है नाम में!

नाम से धाम* जुड़े उससे तो पहचान मिले,
नाम से काम जो जुड़ जाये तो सम्मान मिले,


मिलते-मिलते ही मिला करती है शोहरत यारों,
नाम ऊंचा उठे; 'स्वर्गीय' जो उपनाम मिले.

नाम बदले से बदल जाती है तकदीर भी क्या?
भूल* कर बैठे तो 'बाबा' से क्यों इनआम मिले!

*धाम=स्थान
* भूल= CST को VT कहने की
-मंसूर अली हाश्मी
http://aatm-manthan.com

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

मुझे याद है कुछ रोज़ पहले जब ओबीसी कोटे को लेकर हो हल्ला हो रहे थे तब आईआईटी और एनआईटी के छात्रो ने अपने नाम के आगे भारत लगाया था जैसे पंकज भारत...

बहुत अचछा लगा पढकर। बहुत बढिया जानकारी...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

"गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही दुनियाभर में जलस्रोतों के किनारे ही बसाहटों की शुरुआत हुई और फिर वहां स्थायी बस्तियां बस गईं जो कालांतर में नगरीय सभ्यता का केंद्र बनीं"

ये अवश्य गौर करने वाली बात है...

Baljit Basi said...

राजेश खन्ना के नाम के साथ जुड़ा 'खन्ना' कसबे के नाम पर नहीं है. राजेश खन्ना और उसका परिवार अमृतसर शहर के रहने वाले थे. खन्ना, कपूर, मल्होत्रा की तरह पंजाबी खत्रीओं का गोतर/ उपनाम है. एक्टर विनोद खन्ना जो पंजाब के गुरदासपुर हलके से बीजेपी के सांसद चुने गए थे, पेशावर के रहने वाले थे और वे भी पंजाबी खत्री थे. खन्ना के रहने वाला एक पंजाबी का श्रेष्ट कहानीकार है जिस का नाम है प्रेम प्रकाश खंनवी, लेकिन आज कल उस ने आपने नाम से खंनवी हटा दिया है.

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