Wednesday, March 10, 2010

पाखाना लगना, लैट्रिन आना, बाथरूम करना…

Defecation_img_1907पिछली कड़ियां-1.गोबरगणेश का चिंतन अर्थात गोबरवाद.2.निकम्मों की लीद और खाद निर्माण.3.टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी

नि त्यकर्म से निवृत्त होने की क्रिया को सभी संस्कृतियों में तरोताज़ा होने, स्वच्छ होने या निर्मल होने से जोड़ा गया है। टॉयलेट toilet को शुद्ध हिन्दी में शौचालय कहते हैं। शंकानिवारण की क्रियाएं शौच से जुड़ती हैं। टट्टी जाने के लिए संस्कारी भाषा में शौच जाना भी कहते हैं जो बना है संस्कृत की शुच् धातु से जिसमें स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता, पावनता, सफाई जैसे भाव जुड़े हैं। पवित्रता के अर्थ में हिन्दी का शुचिता शब्द इसी धातुमूल से जन्मा है। शौचक्रिया का अर्थ मोटे तौर पर मलविसर्जन है किन्तु उसमें सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होने का भाव है। ऐसे काम, जिनसे शरीर की मलिनता दूर हो और तनमन में शुचिता का भाव जगृत हो, वही शौचकर्म है। इस तरह शौचालय का अर्थ हुआ जहां जाकर शुद्ध हुआ जाए। टट्टी की तरह इस शब्द का भी अर्थ विस्तार हुआ। हिन्दी में मानव मल के अर्थ में शौच शब्द का इस्तेमाल भी होता है जैसे वहां बहुत सारा शौच पड़ा था।
ट्टी या शौचालय के अर्थ में हिन्दी में पाखाना शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे पैखाना, पखाना या पाखाना। यह फारसी के पाखानः या पाखानह से जन्मा शब्द है। पाखाना के साथ लगा खाना” साफ बता रहा है कि यह स्थानवाची शब्द है। मगर शंका समाधान के लिए लोग पाखाना जाते भी हैं, पाखाना करते भी हैं। शिशु कपड़ों में ही पाखाना कर देते हैं और कई लोगों को डर के मारे पाखाना लग जाता है। पाखाना में आए पा का अर्थ प्रायः पैर से लगाया जाता है। फारसी का पा दरअसल इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द है। संस्कृत हिन्दी का पद, पैर और अंग्रेजी का फुट, पैडल, पैड जैसे शब्द इसी मूल से निकले हैं जिनमें चलने, टिकने, आधार या पैरों का भाव है। कुछ व्याख्याकार पाखाना का अर्थ वह स्थान बताते हैं जहां पाद प्रक्षालन अर्थात पैर धोए जाएं। इस अर्थ में पाखाना का अन्वय हुआ पा + खाना। पुराने ज़माने में बाहर से आने पर लोग घर के आंगन में एक नियत स्थान पर पैर धोकर ही कमरों में प्रवेश करते थे। नित्यकर्म में हस्त-पाद प्रक्षालन तो निहित है मगर पाखाना शब्द सीधे सीधे टट्टी या टॉयलेट से जुड़ रहा है। इसी तरह नित्यकर्म के संदर्भ में पैर धोने की क्रिया में मलविसर्जन क्रिया स्पष्ट नहीं होती साथ ही पा + खाना के पा शब्द से धोने की क्रिया अथवा विशेषण का बोध भी नहीं होता। शौचालय में निहित व्यंजना के आधार पर अगर पाखाना शब्द का अन्वय अगर पाक+ खाना किया जाए तब इसका भावार्थ वहीं निकलता है जो शौचालय का स्थूल अर्थ है अर्थात पवित्र होने, स्वच्छ होने का स्थान। पाक में क्रिया और विशेषण का बोध भी होता है। मुझे लगता है बतौर शौचालय इस शब्द की यह व्युत्पत्ति तार्किक है।
हिन्दी में लेट्रिन latrine शब्द का इस्तेमाल भी शौचालय या टट्टी के अर्थ में खूब होता है। इसकी आमद अंग्रेजी से हुई है। इसकी मूल भारोपीय धातु है लू lou-जिसका अर्थ है धोना। लैटिन में इससे बना लैवेयर lavare जिसमें भी प्रक्षालन,

... टट्टी की तरह अब बाथरूम भी ‘आती’ है और बाथरूम ‘किया’ भी जाता है अर्थात बाथरूम पदार्थ भी है... roman-latrine-j000112_440440प्राचीन रोमन युग का सार्वजनिक शौचालय  

नहाना-धोना जैसे भाव हैं। lavare में लैटिन का -trina प्रत्यय जुड़ा जिसमें स्थान या कार्यस्थल का भाव है। इस तरह lavatrina होते हुए इसका लैट्रिना latrina रूप स्थिर हुआ जिसका अर्थ हुआ नहाने की जगह, स्नानागार। पाश्चात्य समाज में नहाने और शौच के लिए एक ही स्थान पर व्यवस्था रहती है जिसे हम अटैच्ड लैटबाथ कहते हैं। इस तरह लैट्रिन शब्द का अर्थ किसी ज़माने में बाथरूम ही था मगर बाद में इसमें टॉयलेट या शौचालय का भाव रूढ हो गया। अब पाश्चात्य समाज में भी टॉयलेट या लैट्रिन के स्थान पर वाशरूम शब्द का अधिक इस्तेमाल होता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे टट्टी की बजाय हमने पहले लैट्रिन शब्द का इस्तेमाल शुरू किया। बाद में लैट्रिन शब्द का प्रयोग हिन्दी में भी विष्टा की तरह होने लगा जैसे लैट्रिन आना, लैट्रिन करना, लैट्रिन पड़ी है वगैरह वगैरह। तरोताज़ा होने के स्थान के लिए जिस तरह से टॉयलेट या लैट्रिन से पीछा छुड़ाकर अंग्रेजी ने वाशरूम का दामन पकड़ा है उस तरह का कोई शब्द हिन्दी में नहीं बना। अलबत्ता टट्टी की बजाय टॉयलेट शब्द हमें अधिक सभ्य लगता है। शुचिता का अर्थ ही निर्मलता है और निर्मलता का अर्थ है निर् + मल अर्थात मल का न रहना या मल का तिरोहित होना। इस क्रिया को स्थूल रूप में देखें तो यह नित्यकर्म से जुड़ती है। देह से मल निस्तारण की क्रिया में नहाना भी शामिल है और मल विसर्जन भी। दोनों क्रियाओं में शरीर निर्मल हो रहा है। शब्दविलास के तौर पर हम चाहें तो शौचालय को निर्मलधाम कह सकते हैं।
विभिन्न समाजों की संस्कृति, तौरतरीकों और आदतों का प्रभाव भी भाषा पर पड़ता है जिससे शब्दों की अर्थवत्ता बदलती चलती है। कई बार यह बदलाव हास्यास्पद होता है मगर भाषा तो समृद्ध होती ही है। ऐसा ही एक शब्द है बाथरूम। भारतीय परम्परा में आमतौर पर स्नानागार और शौचालय अलग अलग होते हैं। शौचालय चाहे निर्मल और शुद्ध होने का स्थान हो पर उसमें स्नानगृह का भाव नहीं है। ज्यादातर भारतीय अटैच्ड लैटबाथ पसंद नहीं करते। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में यह प्रवृत्ति अधिक है। यह दिलचस्प है कि भारतीय स्त्री-पुरुष लघुशंका के लिए स्नानागार का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी तर्ज पर स्नानागार के लिए हिन्दी में बाथरूम इतना प्रचलित हो चुका है कि कोई दूसरा शब्द नहीं सूझता। देश के मध्यवर्ग में लघुशंका के अर्थ में बाथरूम शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। खासतौर पर महिलाएँ इस शब्द का प्रयोग अधिक करती हैं। टट्टी की तरह अब बाथरूम भी ‘आती’ है और बाथरूम ‘किया’  भी जाता है अर्थात बाथरूम पदार्थ भी है।

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14 कमेंट्स:

अनूप शुक्ल said...

जय हो! निर्मलधाम यात्रा करके जी जुड़ा गया।
ये रोमन वाली फोटो चकाचक है।
बहुत अच्छा लगा ये लेख!

खुशदीप सहगल said...

बाथरूम आया है, बाथरूम गया है...चलायमान दुनिया में सब चलायमान है...

वैसे आजकल मॉडर्न बच्चे सिर्फ लू और शिट की भाषा जानते हैं...

जय हिंद...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मुझे बहुत हँसी आई, आप के शौचालय को निर्मलधाम कहने के सुझाव पर। क्यो?
इसलिए कि शौचालय शब्द में शुचिता है, लेकिन निर्मल शब्द में फिर भी मल मौजूद है।

Mansoor Ali said...

# डगर लम्बी लचक भी थी कमर में,
हया से हाथो में भी कपकपी थी,
'निबट' कर दम लिया ही था कि पाया,
कि लुटिया उनकी खाली हो चुकी है.

# वो छप्पन भोग का यक-रंग होना,
बदलना शौच में ?... था पाक खाना!
कहा निर्मल तो वह* भी हँस दिए है,
नतीजे में मिला है "हाथ-धोना"

*D.R.D

W.C. भी कही प्रयुक्त होते दिखा है, लेट्रिन के लिए?
खैर, बहुत स्थान बता दिए आपने, आदमी बेचारा कहाँ-कहाँ जायेगा.

अजित वडनेरकर said...

# वो छप्पन भोग का यक-रंग होना,
बदलना शौच में ?... था पाक खाना!
बहुत खूब हाश्मी साहब। आपकी शायरी का जवाब नहीं। हर पोस्ट का रंग जमा देती है।
शुक्रिया।

Kishore Choudhary said...

अब एक अभिजात शब्द उपयोग में लाया जा रहा है "वाशरूम".

अजित वडनेरकर said...

द्विवेदीजी, शौचालय का शौच ही मल का पर्याय बन गया। तभी तो इसे बोलने से लोग कतराने लगे और अंग्रेजी का दामन थाम लिया।

अजित वडनेरकर said...

@किशोर चौधरी
आप सही कह रहे हैं किशोर भाई। मगर इसका इस्तेमाल अभिजातवर्ग में ही अधिक होता है। यर अभी हिन्दी ज़बान पर नहीं चढ़ा जैसे लेट्रिन, टॉयलेट या बाथरूम चढ़े हैं। इसीलिए हमने भी लिखा है-

"तरोताज़ा होने के स्थान के लिए जिस तरह से टॉयलेट या लैट्रिन से पीछा छुड़ाकर अंग्रेजी ने वाशरूम का दामन पकड़ा है उस तरह का कोई शब्द हिन्दी में नहीं बना।"

अफ़लातून said...

ज्ञानपुर के तहसील अस्पताल में मेरी बहन की डॉक्टर के रूप में पहली तैनाती थी। एक मरीज ने अत्यन्त कष्ट के साथ अपनी व्यथा सुनाई,’डॉक साब , कुल्ला नहीं हो रहा है !’
डॉक साब ने कहा,’ उस कोने में बेसिन है, जाओ, कुल्ला कर लो"
मरीज अचरज से उन्हें घूरने लगा । फिर किसी ने बताया कि वह क्यों घूर रहा है ! निपटने के बाद चूँकि कुल्ला करने की स्वस्थ परम्परा रही है इसलिए निपटने के लिए भी ’कुल्ला करना ’ चलता है ।
फिर तो वे ’ पतला कुल्ला,काला कुल्ला’ आदि भी समझने लगीं ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

अजित जी,
संकट यही है कि मनुष्य मल से छुटकारा पाना चाहता है। हर बार नया शब्द तलाश कर लेता है। लेकिन मल है कि उस का पीछा नहीं छोड़ता।
हमारे यहाँ तंबाकूपानमसाला गुटखा 'विमल' खूब बिकता है। पान की दुकान पर जब तक पान वाला मेरा पान बनाए तब तक चार-पांच ग्राहक विमल के आ जाते हैं। मैं कइयों से पूछता हूँ -विमल (शब्द) किस से बनता है। वह गुटखे के बारे में सोचता है और कहता है -पता नहीं।
जब मैं उस से कहता हूँ कि विमल (शब्द) मल से बनता है। तो उस के पास शर्मिंदा होने के सिवा कोई चारा नहीं होता।

गिरीश बिल्लोरे ''पॉडकास्टर'' said...

अजित भैया
इसे ललित जी ने सुभीता खोली नाम से अलंकृत किया है

Baljit Basi said...

पंजाबी में 'शौच' शब्द नहीं चलता, इसका रूप है 'सोच' परन्तु यह भी आज कल नहीं है. 'जपुजी' में आया है:

' सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार'

अर्थात बाहरी शौच करने से हम निर्मल नहीं हो सकते.
आज कल पंजाबी में 'सुच' शब्द है जिस से संज्ञा बनी 'सुचम' और फिर 'सुचमता'. 'हाथ सुचे करने' का मतलब है खाना खाने से पहले हाथ धोना. यहाँ पूरी तरह शौच वाले भाव नहीं है.

सुच्वाद प्यूरिटनवाद(puritanism) है.मल से संबंधत हर भाषा अपने शब्द बदलती रहती है क्योंकि थोड़ी देर चलने के बाद यह अशिष्ट लगने लगते हैं.
हमारे जब architecture पश्चिमी आ गया जिससे किचन, बेड रूम, लिविंगरूम आए तो फिर टॉयलेट, लेट्रीन वाश रूम भी आने ही थे.
अमरीका में सर्वजनक जगहों पर रेस्टरूम(restroom) भी चलता है.
बाथरूम का तो इंडिया जितना ही बोलबाला है यहाँ तक कि हाफ बाथरूम (half bathroom)भी है और मजे की बात है इसमें नहाना नहीं होता, मल त्याग ही होता है. नहाने के लिए 'बाथ' तो कब का अप्रचलित हो चूका है . अब तो शावर लेना(shower) ही चलता है.
Baritain में कपडे टांगने वाली जगह के लिए प्रयुक्त होता शब्द क्लोक रूम भी यही अर्थ देता है क्योंकि पहले क्लोक रूम की एक तरफ एक छिद्र इस काम के लिए होता था. बाद में जब यह अलग हो गया तो इसे वाटर क्लोजिट(water closet) कहा जाने लगा.

रंजना said...

सही कहा आपने ...हिन्दी में बाथरूम लगना,जाना,आना इत्यादि के अतिरिक्त अभी तक कोई सर्वमान्य सुलभ शब्द का प्रचालन नहीं हुआ है....

निर्मलधाम शब्द का प्रयोग बड़ा लाजवाब लगा....

शरद कोकास said...

धन्य हुए इस पोस्ट को पढकर । इस विषय पर मेरे पास अनेक किस्से है । वह फिर कभी फिलहाल तो इतना ही कि , बाथरूम जाने तक भी ठीक है , बाथरूम करना है है भी ठीक है , बाथरूम लगी है भी ठीक है लेकिन पिछले दिनो एक महिला को दूसरी महिला से कहते सुना .." बहन डॉक्टर ने बाथरूम टेस्ट कराने को कहा है " ..अब कहिये ?
फिलहाल एक नये शब्द के साथ इस तस्वीर के लिये मियाँ चिरकन का एक शेर........
"चिरकन मिया बाग में चिरके अलग अलग
खुशबू अलग अलग है और रंगत अलग अलग "
जय हो....

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