Monday, March 1, 2010

गोबरगणेश का चिंतन अर्थात गोबरवाद

Cow-Pie-3 ... अपने मित्र, गोबरवाद शब्द के जनक और इस दर्शन के व्याख्याकार,  वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीशकुमार को यह पोस्ट समर्पित है। वे कहते है -“मैं गोबरवाद का प्रवर्तक हूं। गोबर को सम्मान दिलाने की लड़ाई लड़ूंगा। कहूंगा लीक को मत बदलो। लीक को गोबर से पोत कर नया कर दो।” इस दिशा में शब्दों का सफर ने गोबर शब्द के इर्दगिर्द ताकझांक करने की कोशिश की है...

गो बर की महिमा न्यारी है। हमारी संस्कृति गोबरमय है। धर्म से कर्म तक गोबर व्याप्त है। सड़कों चौराहों से लेकर दिमाग़ तक में गोबर पाया जाता है। विदेशी भी हमारा गोबरप्रेम जानते हैं इसलिए डेनमार्क जैसा बित्ते भर का देश अपना टनों गोबर जहाजों में भरकर भारत भेजने की पेशकश करता है। प्रचलित अर्थों में गाय के अपशिष्ट को गोबर कहा जाता है। हिन्दुओं में कोई भी मांगलिक कार्य पंचगव्य के बिना पूरा नहीं होता। गाय द्वारा प्रदत्त उत्पादों में पंचगव्य को सर्वाधिक  पवित्र और ओषधीय महत्व का माना जाता है। यह गोवंशीय उपहारों का समग्र रूप है जिसमें दूध, घी, दही, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण होता है। भारतीय संस्कृति मे एक ओर तो गोबर का आयुर्वैदिक, ओषधीय और आनुष्ठानिक महत्व है वहीं गोवंशीय पशुओं द्वारा त्याज्य अपशिष्ट के रूप में इसमें विष्ठा से जुड़े हुए हीन भाव भी अभिव्यक्त होते हैं। होली के मौके पर उन्मुक्त और भदेस अभिव्यक्ति के नाम पर कई स्थानों पर गोबर होली भी खेली जाती रही है। आपटे के संस्कृत कोश में गोबर के लिए गोविष्ठा शब्द का उल्लेख है, पर वहां गोबर की व्युत्पत्ति नहीं मिलती। प्रसंगवश कंडा या जलावन के तौर पर गोईठा शब्दdung-beetles दरअसल गोविष्ठा शब्द का ही देशज रूप है। गोविष्ठा > गोइट्ठा >  गोईठा के क्रम में इसका रूपांतर हुआ। गोबर शब्द की व्युत्पत्ति अनिश्चित है और शब्दकोशों में इसके बारे में ठोस जानकारी नहीं मिलती। गाय के प्रति सनातन कृतज्ञता का भाव रखने वाली भारतीय मनीषा ने गाय को माता का दर्जा दिया जिसके विविध आयाम कृषि आधारित सामाजिक संस्कृति में प्रकट हुए।

कुछ संदर्भों के अनुसार गोबर शब्द गो+वरः से बना है। संस्कृत की ध्वनि हिन्दी में में तब्दील होती है। संस्कृत में वर् धातु की व्यापक अर्थवत्ता है जिसमें उपहार, प्रदान करना, मनोकामना, अनुग्रह या परिपूर्ण करने जैसे भाव हैं। मोनियर विलियम्स के कोश में उक्त व्युत्पत्ति की पुष्टि होती है। वर् धातु में पदार्थ, वस्तु या पिण्ड का भाव भी है। इस रूप में ध्यान दें गोबर के रूपाकार पर।  गौरतलब है गो शब्द का अर्थ है गमन करना। संस्कृत की गो धातु में गाय का अर्थ बहुत बाद में स्थिर हुआ, प्रारम्भिक अवस्था में गो शब्द में सिर्फ पशु या चौपाए का भाव था जिसके मूल में उनका लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलते रहने का भाव था। गो का एक अर्थ पृथ्वी भी है क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरि पर लगातार गतिमान रहती है। जॉन प्लैट्स की हिन्दुस्तानी उर्दू इंग्लिश डिक्शनरी में गोबर की व्युत्पत्ति गोवरः के अलावा गो + वट् से भी मानी गई है। वट् में पिंड, गोली, गेंद, वटिका या बट्टी का भाव है। जाहिर है विष्ठापिण्ड
गोबरवाद- गोबर हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया/ हगने के तुरंत बाद नरम रहता है/ सूखने पर सख्त हो जाता है/ जब यह नदी गंगा सूख जाएगी/ एक दिन उसकी तलछटी को गोबर से ही लीपा जाएगा/ रेमण्ड के सूट में पन्डी जी,ग्लब्स पहिन कर/ बिसलेरी के पानी को अंजुरी में भर कर छिड़क देंगे तलछटी पर [रवीशकुमार की पूरी पोस्ट पढ़ें यहां]
के रूप में यह व्युत्पत्ति भी तार्किक है मगर वट् का बट तो हो सकता है किन्तु ध्वनि का में रूपांतर कुछ मुश्किल है।
क अन्य संदर्भ के अनुसार गोबर शब्द का मूल संस्कृत रूप गोर्वरः है। मराठी में गोबर आधारित पदार्थ जैसे कंडा के लिए गोवरी शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति गोर्वरः से मानी गई है।  गो अर्थात गाय अपने अपशिष्ट से भूमि की उर्वराशक्ति को स्थायी बनाती थी। ब्रज प्रदेश में गोवर्धन पर्वत का धार्मिक महत्व है। गोवर्धन नाम से स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर था जिसकी वजह से यहां पशुधन की बहुतायत थी। गो+वर्धन का अर्थ है जहां गोवंश वृद्धि प्राप्त करे। गो के व्यापक स्वरूप अर्थात समस्त चौपायों के संदर्भ में भी गोवर्धन शब्द को समझा जा सकता है। हरियाली भरा यह क्षेत्र सिर्फ गोवंश नही बल्कि सभी पशुओं के लिए समृद्ध  आश्रयस्थली था। भाषा के विकास में शब्दों में अर्थविकास के साथ अर्थ संकोच भी होता है। गोवर्धन कालांतर में गोबरधन हो गया। गोबर को सुखा कर, उपले पाथ कर आजीविका चलानेवालों के लिए इस तरह गोबरधन शब्द भले ही अर्थवान होता हो पर यह है शुद्ध शब्दविलास ही। प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास के नायक होरी के पुत्र गोबर का नाम उपहास के रूप में नई पीढ़ी के हिन्दीभाषियों की स्मृति में है जो इसमें छुपे गोवर्धन को शायद पहचान नहीं पाई है।
रामचंद्र वर्म्मा के वृहत प्रामाणिक कोश के मुताबिक गोबर शब्द फारसी मूल का है और गो + बअर का युग्मरूप है। संस्कृत का गो अवेस्ता में भी इसी रूप में विद्यमान है जो फारसी में भी कायम रहा। फारसी में भी गाय समेत अन्य पशुओं के लिए गो शब्द है। कोश के मुताबिक अरबी में बअर का अर्थ गोबर होता है। खोजने पर अरबी में बअर तो नहीं बअर्र, बरर या बर्र शब्द ज़रूर मिलते हैं, जिनका अर्थ है गाय, भेड़ या अन्य पशुओं की विष्ठा। हिन्दू संस्कृति में गोवंश की महत्ता को देखते हुए यह व्युत्पत्ति तार्किक तो है, मगर प्रामाणिक नहीं लगती। भारतीय भाषाओं में गोबर से बने कई देशज शब्द है जिनके आधार पर इतना कहा जा सकता है कि फारसी और अरबी से बना गोबर शब्द हिन्दी में समाया विदेशज शब्द नहीं है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक गोबर शब्द गोमल का देशज रूप है जिसकी व्युत्पत्ति गो + मल से हुई है अर्थात गाय का अपशिष्ट। यह व्युत्पत्ति भी विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि म-ल ध्वनियों से ब-र ध्वनियों का निर्माण एक विरल उदाहरण है। भारतीय संस्कृति में गोवंश के महत्व को देखते हुए गोबर शब्द की व्युत्पत्ति गोवरः या गोर्वरः से मानी जानी चाहिए।
सी कड़ी से जुड़े कुछ अन्य शब्द और मुहावरे भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे गोबरगणेश। मूर्ख, भोंदू, भद्दा या नालायक के अर्थ में गोबरगणेश मुहावरा हिन्दी में खूब प्रयोग होता है। गौरतलब है कि गोबरगणेश का संदर्भ पुराणों से जुड़ा है। गौरतलब है कि देवों-दानवों में हुए अमृतमंथन के दौरान नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला पांच कामधेनुएं भी निकली थीं। देवों को दानवों के संत्रास से मुक्ति दिलाने के लिए आदिशक्ति दुर्गा ने सुरभि गाय के गोबर से गणेश की रचना की और उन्हें avalisa-green-cowsविभिन्य शक्तियां प्रदान कर अपना वाहन सिंह प्रदान किया। गणेश ने दानवों का संहार किया और इस तरह गणनायक या गणपति की उपाधि प्राप्त की।  गोबरगणेश मुहावरे में दरअसल यह संदर्भ छिपा रह जाता है पर अर्थवत्ता पूरी तरह उभर रही है। गोबर से गणेश की रचना एक महान उद्धेश्य के निमित हुई। देवी दुर्गा ने अपनी शक्तियों का संचार कर उसे समर्थ बनाया। लौकिक अर्थों में किसी व्यक्ति को गोबरगणेश कहने के पीछे यही आशय है कि वह मूर्ख है और पौराणिक गोबरगणेश की तरह उसमें अलौकिक क्षमता  नहीं हैं। वह निरा मिट्टी का माधौ है। कुछ लोग देसी गाय के गोबर में उभरी रेखाओं में नजर आती विभिन्न आकृतियों में भी गणेश का रूपाकार देखते हुए गोबरगणेश को इससे जोड़ते हैं। गुड़गोबर करना मुहावरा भी इसी मूल से आ रहा है। यहां भी गोबर के प्रति नकारात्मक भाव सामने आ रहा है। बना बनाया काम बिगड़ना के अर्थ में इसका प्रयोग होता है। गुड़ के निर्माण की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है। निर्माण के विभिन्न चरणों में अगर सावधानी न बरती जाए तो गुड़ ठोस आकार नहीं ले पाता है और पतला रह जाता है। इसीलिए कहा जाता था कि सब गुड़, गोबर कर दिया। बाद में गुड़ से विराम हट गया और गुड़गोबर एक शब्द बन गया।
राठी में कंडे या उपले को गोवरी कहा जाता है, पूर्वी बोलियों में इसके लिए गोबरी शब्द है। अन्न के भंडारण के लिए गोबर मिट्टी मिलाकर बड़ी टंकियां बनाई जाती हैं, उस पर गोबर की मोटी परत चढ़ाई जाती है जिसे गोबरी कहते हैं। विष्ठा पर पलनेवाले एक कीट को गुबरैला या गोबरैला कहते हैं। यह जीव गोबर के कण को लगातार भूमि पर धकेलता-लुढ़काता रहता है। पूर्वी भारत के गंगा-जमनी इलाके को गोबर पट्टी भी कहा जाता है। इस इलाके को अंग्रेजी में काऊबैल्ट कहते हैं जिसमें गोबरपट्टी का ही भाव है। यह गोबर प्रतीक है यहां की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का, गोबर प्रतीक है यहां की गरीबी से उपजे पिछड़ेपन और दीनता का, गोबर प्रतीक है निम्नवर्ग पर दबंगों के वर्चस्व का। गोबर प्रतीक है दूध उत्पादकों, यदुवंशियों और घोसियों की बहुलता का।  इसी संस्कृति से उपजता है गोदान का गोबर। उम्मीद है कि गोबरवाद शब्द भी जल्दी ही हिन्दी में प्रचलित हो जाए।
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19 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

गोबर महिमा गान के साथ आज होली खेलने को अच्छा मसाला दिया है आप ने।
होली पर बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

Udan Tashtari said...

गोबरवाद का जयकारा हो, यही दुआ है होली में. :)



ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

हिमांशु । Himanshu said...

गोबर से बने गोईंठे को गोहरी भी कहते हैं इधर !
गोबर विश्लेषण में यह व्युत्पत्ति ठीक लगी - "गोबर शब्द का मूल संस्कृत रूप गोर्वरः है।
सुन्दर प्रविष्टि ! होली की हार्दिक शुभकामनायें ।

Suman said...

आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मै गोबर गणेश आपको होली की शुभकामनाये देता हूँ स्वीकार करे

निर्मला कपिला said...

होली पर गोबर की महिमा जान कर अच्छा लगा। आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ

Baljit Basi said...

पंजाबी में गोबर के लिए प्रचलत शब्द है 'गोहा'. जलावन के लिए पथे हुए गोबर को 'पाथी' बोलते हैं. आम तौर पर पाथी के छोटे हिस्से को 'गोहटा'( जिस को आप 'गोईठा' बोल रहे हैं) बोला जाता है, मुझे लगता है कि 'गोईठा' को भी कई जगह पर या पुराने ज़माने में 'गोहा' बोला जाता होगा. लोहड़ी के त्यौहार में बच्चे घर घर मांगते हैं तो यह गीत गाते हैं:
"लिया माई पाथी, लिया माई गोहा
माई का बचड़ा नवां नरोया"
लेकिन एक और शब्द विचारने योग्य है वह है 'गूंह'. पंजाब में यह मनुष्य का विष्टा है और 'गुड का गोबर होना' पंजाबी में 'गुड का गूंह होना' है. 'गूंह' 'गोबर' का ही रूप है, यह आप के विचारने की बात है लेकिन यह निश्चत है कि 'गूंह' केवल मनुष्य का विष्टा ही है.
गब्रैला को 'गोधा' भी बोला जाता है.
गो का एक अर्थ पृथ्वी है, इस की वजह पृथ्वी के गतिमान होने के साथ जोड़ने से पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि जब यह शब्द
पृथ्वी के साथ जोड़ा होगा तब क्या लोगों को पृथ्वी के घूमने की सचाई का पता होगा. मुझे संदेह है.
इन शब्दों के साथ बेशुमार मुहावरे आदि हैं पर फिर कभी.

संजय भास्कर said...

रंग बिरंगे त्यौहार होली की रंगारंग शुभकामनाए

लवली कुमारी said...

हमें गोदान के गोबर की याद आ गई ..यह गोबर - आधारित पोस्ट पढ़कर. होली की शुभकामनायें.

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी पोस्ट,शुभ होली.

ali said...

अजित भाई
रंग पर्व के दिन के लिये सार्थक पोस्ट किन्तु लेखन , ख़ासकर व्याख्या में ईमानदारी बरती जानी चाहिये थी :)

(१) मसलन गोबरधन शब्द पति पत्नि के संबंधों की ओर संकेत करता है पर आपने बताया ही नहीं ! गोबरधन = गो+बर+धन =गाय के वर का धन ( अर्थात स्वयं गाय ) = और जब वधु स्वयं धन है तो गोबर कौन ? अतएव ...गोबर = पति !

(२) मसलन गोबर शब्द की व्युत्पत्ति गोबहर शब्द से हुई हो सकती है जैसा कि आपने कहा कि गो मतलब चलना लेकिन चलने का मतलब रवानी भी तो हो सकता है तो कुछ यूँ समझिये ... गोबहर = गौ गीत की बहर = अर्थात गाय अपने श्रोताओं / लाभार्थियों के लिए चलते फिरते छंद रचती है = छंद यानि उर्जा से भरे हुए खंड = कंड / कंडे जोकि खंड का अपभ्रंस है = उपले अर्थात उपलय ! अतएव कंड / खंड / छंद / उपलय इस बात के प्रमाण हैं कि गोबर शब्द गोबहर से उपजा हो सकता है !

(३) मसलन गोबरैला शब्द ही लीजिये ... गो + बर + रैला ..यहां रैला शब्द में पीछे से ठेलने का भाव निहित है...बड़ा सांकेतिक और अर्थपूर्ण शब्द समुच्चय है ये , ठीक होली के दिन युवतियों से ठलुवाई करते हुए मर्द जैसा ! अतएव गोबरैला भी ठलुवे प्रजाति के मर्दों का एक रूप है !

देखिये व्याख्यायें और भी हो सकती हैं लेकिन इस चक्कर में गोबरैलों पर रंग डालने का समय निकला जा रहा है ! लिहाज़ा चिट्ठा आप संभालिये हम चले उपलय की ओर ...!

Sanjay Kareer said...

मीडिया में गोबरगणेशों ने गोबरवाद पहले से ही चला रखा है और आप भी इसे भली भांति देख सुन रहे हैं बड़े भाई....
गोबर महमा पढ़ने के बाद अब यही कह सकता हूं कि होली की गोबरीली शुभकामनाएं। :)
बुरा न मानो होली है...

Mansoor Ali said...

होली के गुड़ में आप जो गोबर मिलाये है,
सारे ब्लागरी इसे मिल-बैठ खाए है,
संस्कृत,फारसी से न जाने कहाँ से धूंद !
शब्दों के धन से झान का वर्धन कराये है.

MOBILE:- 9202234298

regards.

-mansoor ali hashmi

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया लिखा है!
होली की शुभकामनाएँ!

अजित वडनेरकर said...

बलजीत भाई,
गो के पृथ्वी अर्थ के संबंध में आपने बडी अजीब बात कही। धातुओं के साथ अर्थ तो लगातार विकसित होते हैं और जुड़ते जाते हैं। जाहिर है गति से ही गो का प्रमुख रिश्ता है। बाद में जब पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने का ज्ञान हुआ तो गो भी एक नाम हुआ पृथ्वी का। पोस्ट साफ कह रही है कि गो में सर्वप्रथम घूमने विचरने का भाव उसे सिर्फ आम चौपाए से जोड़ता है। फिर इसका अर्थ गाय में स्थिर हुआ, अन्य अर्थ अपनी जगह कायम रहे। धातुओं की अर्थवत्ता का व्यापक होना उसके जन्म के साथ नहीं बल्कि समाज के विकास के साथ होता चलता है।

अजित वडनेरकर said...

अली भाई,
आपकी मनमौजी व्याख्याएं भी समयानुकूल रहीं। बहुत शुभकामनाएं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही ज्ञानवर्धक था यह सफर । आनन्द आ गया ।

abcd said...

शान्दार.......अजित भैय्या की जै हो !

'अदा' said...

बहुत ही शानदार पोस्ट...
हृदय प्रसन्न हुआ..

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