Monday, March 15, 2010

सत्तू-प्रेम या सत्तू-आसक्ति…

Image310 आप कहां से जुगाड़ करते हैं ?

भा रतीय खानपान के चर्चे दुनियाभर में यूं ही नहीं हैं। इसे बनाने की आसान विधियां, पौष्टिकता और ज़ायका ही इसे सबसे खास बनाता है। यही वजह है कि आम आदमी का सत्तू, दाल-बाटी, दाल-बाफले या लिट्टी-चोखा जैसे व्यंजन फुटपाथ से लेकर फाइवस्टार होटलों तक बनते और परोसे जाते हैं। सत्तू अपने आप में पूरा आहार है। खासतौर पर अपने सुपाच्य गुण और ठंडी तासीर के चलते गर्मियों की शुरुआत से ही घरों में सत्तू का प्रयोग शुरू हो जाता है। भुने हुए अनाज जैसे गेहूं, जौ, मक्का के साथ भुने हुए चने को पीस कर बनाए गए चूर्ण को सत्तू कहते हैं। गांव-देहात की रसोई की अनिवार्य वस्तु है सत्तू। समझदार गृहस्थों के यहां सत्तू एक ज़रूरी आहार है। पोहा, उपमा से भी ज्यादा गुणवान और जल्दी बननेवाला इंडियन फास्टफूड या चटपट रसोई। डब्बे में से सत्तू पाऊडर निकालिए, पानी मिलाइये फिर नमक या शकर मिलाइये और पी जाइये।
किसी ज़माने में राहगीरों-बटोहियों का पसंदीदा आहार होता था सत्तू। साथ में पानी का गिलास और चम्मच रखने भर से काम हो जाता था। जहां कहीं ठौर मिला, सत्तू घोलकर पिया और सुस्ताने लगे। कहीं पढ़ा है कि मगध की सेनाओं नें सत्तू के भरोसे कई मोर्चे फतह कर लिए थे।  फौज के लिए सत्तू से ज्यादा मुफीद भोजन भला और क्या हो सकता था। नासा वाले चाहें तो  अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सत्तू जैसे भोजन पर विचार कर सकते हैं।सत्तू का इस्तेमाल लगभग समूचे भारत में होता रहा है। हिन्दी, मराठी और पंजाबी में इसे सत्तू कहते है। सिंधी में इसका रूप है सांतु, कश्मीरी में यह सोतु है तो गुजराती, कुमाऊंनी में यह सातु कहलाता है और भोजपुरी समेत पूर्वी बोलियों में इसे सतुआ भी कहते हैं। सत्तू बना है संस्कृत के सक्तु या सक्तुकः से जिसका अर्थ है अनाज को भूनने के बाद उसे पीस कर बनाया गया आटा। प्राचीनकाल में भारत में जौ का प्रचलन अधिक था। गेहूं का इस्तेमाल बढ़ने के बाद सत्तू में इसकी अनिवार्यता भी बढ़ गई। गेहूं के स्थान पर मकई का प्रयोग भी होता है। सामान्यतौर पर एक भाग चना और आधा भाग गेहूं और चौथाई भाग जौ को पानी में कुछ घंटों भिगाने के बाद सुखाया जाता है। फिर उसे भून कर पीस लेते हैं। यह मिश्रण ही सत्तू कहलाता है।
संस्कृत के सक्तु या सक्तुक का जन्म हुआ है सञ्ज् या संज् धातु में क्तिन् प्रत्यय लगने से, जिसमें मिलने, जुड़ने, संयुक्त होने, संलग्न होने का भाव है। क्रम कुछ यूं रहा होगा-सक्तुकः >सत्तुकः > सत्तुअ > सत्तू / सतुआ। इसी तरह जकड़ना, चिपटना, चिपकना, सम्पर्क में आना आदि अर्थ भी इसमें निहित हैं। स्पष्ट है कि एक दूसरे मे मिलाना, जोड़ना ही इसमें प्रमुख भाव हैं। सत्तू के अर्थ में किन्हीं अनाजों को आपस में मिलाने और पीस कर एकाकार करने में सञ्ज् धातु में निहित भाव स्पष्ट है। सञ्ज् या संज् धातु का ज दरअसल संस्कृत की यु धातु का अगला रूप रहा होगा। संस्कृत की यु धातु भारोपीय भाषा परिवार की आदिधातुओं में है जिसका विस्तार भारतीय भाषाओं के अलावा कई विदेशी भाषाओं में हुआ है। bihari-littiयु धातु में जुड़ने, जोड़ने का भाव है। युक्त, युग, जुग, जोड़ी, जुट्, संयुक्त, योग, जोग, संजोग, जुगाड़ जैसे अनेक शब्द इस मूल से निकले हैं। कुल मिलाकर सत्तू भी एक किस्म का जुगाड़ ही है। वर्ण में ही तब्दील होता है जैसे योग से जोग का रूपांतर। सञ्ज् में इसी यु की अर्थछाया नज़र आ रही है। बहरहाल। सक्तु की तरह सञ्ज् धातु में क्त प्रत्यय लगने से सक्त भी बना है जिसमें जुड़ना, चिपकीना, भक्त, संबंध होना, जैसे भाव हैं। सक्त का स्वतंत्र प्रयोग हिन्दी में नहीं होता मगर इसमें उपसर्ग लगने से बने आसक्त का प्रयोग प्रेम, अनुराग, अनुरक्त होने के संदर्भ में खूब होता है। आसक्ति का अर्थ है किसी से प्रेम संबंधी जुड़ाव। अनासक्त्ति में वैराग्य या उदासीनता का भाव है।
त्तू के विविध व्यंजन बनते हैं। महानगरों के ड्राईंगरूम में भी अब सत्तू की पहुंच है जहां इसे सुगंधित बना कर शर्बत की तरह पेश किया जाता है। इसी तरह सत्तू घोलकर, उसे ठण्डा कर आइस्क्रीम की तरह भी खाया जाने लगा है। पारम्परिक तरीकों में सत्तू के गाढ़े या पतले घोल में नमक, जीरावण डालकर पिया जाता है। ऊपर से नीम्बू भी डाल लें तो आनंदम् आनंदम्। गुड़ या शक्कर डालकर इसका जायका बदला जाता है। लिट्टी चोखा का भरावन (स्टफिंग) भी सत्तू से ही होती है। सत्तू की पीठी की कचौरी या परांठा भी बनता है। वैसे सत्तू देश के पूर्वांचल में ज्यादा खाया जाता है जहां के लोक जीवन में बतौर फटाफट आहार इसके विविध रूप हैं। सत्तू में जब तक चने का अनुपात और अनाज की सिंकाई सही न हो, स्वाद नहीं आता। बाजार के सत्तू में चने का अनुपात सही नहीं मिलता।

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21 कमेंट्स:

चंदन कुमार झा said...

शब्द चर्चा अच्छी लगी ।

सच में सत्तू का जबाब नहीं,
क्या बड़े क्या छोटे इसका कोई हिसाब नहीं ॥

धन्यवाद ।

anil gupta said...

बहुत ही सुन्दर वर्णन किया आपने

Udan Tashtari said...

अच्छी चर्चा...सत्तु खाये तो जमाना हो गया, इसी बहाने याद आ गया.

Arvind Mishra said...

सत्तू मतलब तुरंता भोजन

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सत्तू अर्थात सत्व की विवेचना सुन्दर रही!

Baljit Basi said...

बढ़िया जानकारी. पंजाब में तो लगता है कब के ख़तम हो गए हैं. ज्यादा तो यही सुनते आए हैं कि गरीब सुधामा क्रष्ण के लिए सतू लेकर गया था. मैने कभी सतू घोलकर नहीं पिए. यह शब्द ज्यादा बहुवचन रूप में ही सुना है . अब तो एक मुहावरे में ही रह गया:
सतू मुक़ (ख़तम हो) जाने या सतू विक जाने : ठन ठन गुपाल हो जाना.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

साल का अंतिम दिन सत्तू से। हम तो नीम की कोंपलें देख रहे हैं। कल से एक पखवाड़े तक मिल जाएँ तो अच्छा है। वैसे सामने वाले नीम पर बहुत हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ये कस्टर्ड क्या है? सत्तू का ही भाईबंध ना?

अनुनाद सिंह said...

क्या सत्तू, 'सक्तु' की अपेक्षा 'सत्व' के अधिक करीब नहीं दिखता?

अजित वडनेरकर said...

अनुनादजी, सत्व से सत्तु का ध्वनिसाम्य ज़रूर है पर अर्थसाम्य नहीं। एक आहार के तौर पर सत्व के सार जैसे अर्थ पर सत्तू को तौलना उचित नहीं होगा। सत्व का देशज रूप सत्त या सत बनेगा और ये रूप देशी बोलियों में प्रचलित भी हैं। सक्तु में विभिन्न पदार्थों के सम्मिलन का भाव महत्वपूर्ण है। मोनियर विलियम्स और वाशि आप्टे के कोश में भी सक्तु का अभिप्राय सत्तू ही है।

gs said...

आज कल पुराने भोज्य पदार्थ भी बाजार में मिलने लगे है इसलिए सत्तू भी बाज़ार में उपलब्ध है. कई फास्ट फ़ूड पुराने वक़्त में भी उपलब्ध थे जैसे सत्तू, भुने चने, मुरमुरे, खाखरे (गुजरात में) आदि.

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर शब्द चर्चा...सत्तू तो सचमुच बहुत ही गुणकारी है...पर कहाँ है, महानगरों में इसकी पहुँच?...मुंबई में तो नहीं मिलता...उत्तर भारतीयों के बीच ही यह प्रचलित है...

अमिताभ मीत said...

किसी भी भाषा में कुछ भी कहा जाए .... मेरी तो हमेशा से प्रिय चीज़ रही है सत्तू. अब गर्मियां आ गई हैं .. अब रोज़ सुबह घर से निकलने से पहले सेवन किया जाएगा इस का,

शोभना चौरे said...

ajeet bhai
aapne sattu ki chrcha kar purane din yad dila diye .agli amavas satu amavas khlati hai nimad me .jab ham chote the chuttyo me ganv jate tab brhmno ko is din satuu aur aur sath me srbat pilane ka bahut prchlan tha hmare ganv me hmara akmatr brhamn privar hone ke karn ham ghar ke sabhi log 15 se 20 log milkar bhi sbhi ghar me nahi ja pate the tb vo log hme sukha sttu aur shakar de dete the aur sath me 10 paise dksina bhi aaj bhi vi vo sondhi khushboo mn me basi hai sattu aur pyar ki.

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

laddoospeaks.blogspot.com

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

बहुत कठिन भाषा में समझाया है...

अमित said...

रोचक जानकारी। सत्तू खाने का मन करने लगा। अभी जा कर लाता हूँ। याद दिलाने के लिये धन्यवाद! अजित जी, मेष संक्रांति (१३ अप्रैल को जब सूर्य मीन से मेष राशि में प्रवेश करता है) को सतुआ संक्रांति भी कहते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में घर-घर बुला कर बच्चों को विशेष रूप से कन्याओं को सतुआ खिलाते थे। अब सब स्वप्न हो गया क्योंकि बड़े शहरों में शायद सत्तू कार्पोरेट सेक्टर में चला गया है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सत्तू मतलब ठंडा ठंडा कूल कूल

शरद कोकास said...

एक लघु कथा याद आई । सत्तू और धान के बँटवारे मे चालाक जेठानी ने सीधी सादी देवरानी को बहकाया " सत्तू मे बहुत मेहनत है ..बेहतर है तुम धान ले लो ..सुना नही ..सत्तू...मनमत्तू.. जब घोलो.. फिर खाओ.. और धान ? धान बिचारी भली कूटे खाय चली "
इन दिनो चालाक लोगो द्वारा गरीबो को ऐसे ही बहकाया जा रहा है ।

अजित वडनेरकर said...

लड्डूप्रसादजी:)
सफर में बने रहें। बीते छह साल में आप बिरले साथी हैं सफर के जिसने कठिन भाषा की शिकायत की है। कठिन को स्पष्ट भी करते तो मेहरबानी होती और सफर को और आसान बनाने में मदद मिलती।
कृपया ज़रूर लिखें।

Anonymous said...

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