
बहरहाल, पुराने दौर की अरबी में जहाज़ा में वे तमाम आशय शामिल रहे होंगे जिन्हें रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी ज़रूरियात का साज़ो-सामान समझा जा सकता होगा। वे तमाम चीज़ें जिनका व्यापार होता है। यही नहीं, चीज़-बस्त से लेकर मशीनी उपकरण तक इसमें शामिल हैं। किसी वस्तु के अंग, उपांग, अवयव, अंश, भाग, हिस्सा आदि भी इसमें शामिल हैं। मसलन नववधु के लिए उबटन, गन्ध, इत्र, फुलेल, सुरमा, अंजन, कजरा, महावर, मेहँदी, वस्त्र, गहना, जूड़ा, गजरा जैसी चीज़े अत्यन्त आवश्यक हैं, सो जहाज़ा में इसका भी आशय है। इसे जहेज़ कहा जाता है। मसलन ऊँट की ज़ीन (लकड़ी की काठी) और उसका दूसरा साज़ो-सामान भी जहाज़ा कहलाता है। यही नहीं, अन्तिम संस्कार से जुड़ी बातें जैसे ग़ुस्ल, तख़्ता, लिफ़ाफ़ा, कमीज़, सिनाबंद, शिगाफ़, जनाज़ा आदि जहाज़ा के दायरे में थीं।
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