Thursday, July 16, 2009

रब्बी हो या रब्बा, बस… ख़ैर करें [संत-15]

इस कड़ी की पिछली पोस्टः पीर-पादरी से परमपिता तक [संत-14]Divine Light Hands

श्वर या परमात्मा के संदर्भ में रब, रब्बी, रब्बा जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। जिस तरह हिन्दी के भक्ति-साहित्य में प्रभु या परमसत्ता के प्रतीक के तौर पर प्रायः सभी भक्तिकालीन कवियों ने राम शब्द इस्तेमाल किया है, उसी तरह रब या रब्बा जैसे शब्दों का प्रयोग सूफी-साहित्य में इफ़रात में हुआ है। सूफी साहित्य में ईश्वर को रब कहते हुए उसके प्रति अपनी लगन को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है कि रब में प्रियपात्र के सभी रंग उतर आए हैं जो प्रिय, प्रेमी, संगी, सखा, रखवाला, गुरु, ज्ञानी और सबसे श्रेष्ठ है। संत कवियों के राम में भी यही सारे रंग नजर आते हैं।
ब शब्द का प्रयोग समूचे उत्तर भारत की बोलियों में होता है पर पश्चिमोत्तर की भाषाओं में, खासतौर पर पंजाबी में यह आम शब्द है। सूफी कवियों की वाणी ने ही इसे भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया है। इश्क, प्यार, मुहब्बत के प्रसंगों में रब्ब, रब्बा या रब्बी जैसे शब्द हिन्दी फिल्मी गीतकारों के लिए भी अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया है। हर दूसरी तीसरी फिल्म के प्रेमगीत में इसका इस्तेमाल नजर आता है। रब शब्द मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का है। हिब्रू में रब्ब शब्द का रूप रव या रब है जबकि अरबी में यह रब्ब है। हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में इस शब्द का जन्म प्रोटो सेमिटिक धातु rbb से हुआ है। रब्ब यानी महान, शक्तिशाली, सर्वोच्च आदि। मोटे तौर पर रब्ब में कुछ प्रमुख भाव समाहित हैं- 1.रखवाला, साथ ले जाने वाला, हर ज़रूरत का ख्याल रखनेवाला, इच्छा-पूर्ति करनेवाला। 2.संरक्षक, पालक, पिता, मार्गदर्शक। 3.सत्ताधीश, स्वामी, शक्तिमान, राजा। 4.नेता, प्रमुख, सर्वोच्च, धर्मगुरु, अन्नदाता, जिसके आगे सभी सर झुकाएं।
रमशक्ति के अर्थ में रब्ब का अर्थ ईश्वर है। कुरआन में खुदा के 99 नामों में इस नाम का भी शुमार है। अरबी से रब्ब शब्द फारसी में चला आया और फिर इसके रब, रब्ब या रब्बा जैसे रूप सामने आए। सूफीबानी के जरिये रब का महत्व परवान चढ़ा। पश्चिमोत्तर क्षेत्र में रब के नाम पर क़सम खाई जाती है। हिब्रू में रब्बी शब्द का मतलब होता है स्वामी अथवा मालिक मगर अर्थ में छूट लेते हुए रब्बी का अर्थ अब ईश्वर, स्वामी के साथ-साथ मित्र, सखा और सर्वप्रिय भी होता है। यहां भी भाव ईश्वर से ही है। प्रमुख पुजारी को भी हिब्रू में रब्बी कहा जाता है। जिस तरह ईसाइयों में चर्च का प्रमुख पादरी होता है वैसे ही यहूदी धर्मगुरू को रब्बी कहा जाता है। गौरतलब है पादरी शब्द भारोपीय मूल का है और पितृ (संस्कृत), पिदर(फारसी) और फादर(अंग्रेजी) की श्रंखला से जुड़ा है।
गौरतलब है कि
रब्ब का अर्थ होता है-स्वामी,   सर्वशक्तिमान, गुरू, मार्गदर्शक या राजा। प्रेमपात्र, मित्र-बंधु या सखा का भाव भी इसमें समाया है। buddha
भारोपीय भाषाओं में प (प,फ,ब,भ,म) वर्णक्रम की ध्वनियों और ऋ, र जैसी ध्वनियों में उच्चता, अनुकरण, गुरुता, प्रकाश, मार्ग और शक्ति का भाव है। इसीलिए परम, पितृ, पिता, प्रकाश, ऋषि, रास्ता, राह, पीर, जैसे अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जो उपरोक्त भावों से जुड़ते हैं। इसका असर सेमिटिक भाषा परिवार पर भी पड़ा है। रब्ब पर इसका असर साफ देखा जा सकता है। संस्कृत के बल, बलम् जैसे शब्दों का शक्तिवाची अर्थ और हिब्रू के बाल अर्थात शक्तिवान, सर्वोच्च जैसे शब्दों का अर्थसाम्य महज़ संयोग नहीं है। भारोपीय धातु में सरलता, अनुगमन, जाना-पाना जैसे भाव निहित हैं और इससे ऋषि जैसा शब्द बनता है क्योंकि वह पथ-प्रदर्शक है, रास्ता दिखाता है। उसके पास जाने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। फारसी का मुर्शिद यानी गुरु, उस्ताद। अंग्रेजी में शिक्षा संस्थान का प्रमुख रेक्टर कहलाता है क्योंकि संस्थान उसी की देख-रेख में चलता है। इससे ही बना है डायरेक्टर अर्थात निदेशक शब्द जिसका अर्थ होता है जो किसी भी कार्य का संचालन करे। उसे पूर्णाहुति तक पहुंचाए।
कुछ ऐसे ही भाव हैं प्रोटो सेमिटिक धातु र-ब-ब में यानी ले जाना, पहुंचाना। सर्वोच्च सत्ता, गुरु या प्रमुख का दायित्व भी अपने लोगों, अनुयायियों को जीने की राह बताना है जिसे रब्बानियत अर्थात प्रभुता या देवत्व कहा जा सकता है। ईश्वरीय के अर्थ में रब्बानी शब्द बनता है। उर्दू के एक मशहूर शायर हुए हैं जिनका नाम था गुलाम रब्बानी ताबां। परमब्रह्म की तरह अरबी में रब्बुलआलमीन शब्द है। आलम यानी सृष्टि जिसमें कई संसार हैं, उनमें भी सर्वोच्च स्वामी को रब्बुलआलमीन कहते हैं।

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10 कमेंट्स:

अनिल कान्त : said...

हमें आपका ये सफ़र बहुत सुहाना लगा...अच्छा लगता है आपकी ज्ञान भरी बातों को पढना

Udan Tashtari said...

रब्ब ओ रब्बा..सफर बेहतरीन रहा!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

ईश्वर के बारे में,
रब़ और रब्बा तो सुना था परन्तु,
रब्बी भी कहा जाता है। यह आज ही जाना।

िकरण राजपुरोिहत िनितला said...

पितृ और फादर का रिश्ता बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद

Mansoor Ali said...

सफ़र की डगर आध्यात्मिक मूल्यों से गहरी जुड़ी हुई है, जिसमे तमाम नैतिक मूल्य समाहित है. शब्दों की खोज में जिस तरह आप भाषा, धर्म, समाज और देशो के दायरों को तोड़ते हुए, अनेको भाषाओं के रिश्ते आपस में जोड़ते हुए यात्रा रत है वह मानव समाज की अमूल्य सेवा है. ख़ास कर ऐसे समय में जब कुछ लोग भाषाओ और शब्दों को धर्म से जोड़ कर देखने लगे है. हिंदी के शुद्धिकरण का बीड़ा उठाये कतिपय व्यक्ति या समूह इस लोकपिर्य भाषा का अहित ही कर रहे है.इस विषय पर अक्सर मुझे डाक प्राप्त होती है.
रब आपको सलामत रखे. आमीन.
-मंसूर अली हाश्मी

अजित वडनेरकर said...

@मंसूर अली हाश्मी
शुक्रिया मंसूर साहब,
सफर के मक़सद को उसकी गहराई से समझा है आपने।
तमाम झगड़े एक तरफ, सबसे बड़ा धर्म है हम प्रकृति को समझें। प्रकृति यानी नेचर।
जो कुछ भी प्राकृतिक है वही ईश्वरीय है।
विभिन्न मानव समूहों में धर्म सुविधा के लिए है, बंधनकारी नहीं।

क्या कहें जो यह जानते हुए भी कि गंगोत्री सब की है, हवा पानी सबके हैं। दया, करुणा, माया का कोई धर्म नहीं होता। क्योंकि
ये सब प्राकृतिक हैं।
भाषा का भी कोई धर्म नहीं होता। शब्द तो ब्रह्म ही है।
हमारे बंटवारे नकली हैं यही तो साबित करती है हवा, भाषा और परिंदे!!!
कोई इन्हें कैद कर दिखाए?
सादर, साभार
अजित

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अद्भुत चित्र...अनोखी बातें.
=====================
आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हम तो राम को ही रब मानते है .

डॉ. मनोज मिश्र said...

फिर अच्छी जानकारी ,आभार.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पंजाबी में संस्कृत के शब्दों का उच्चारण जिस प्रकार मात्राएँ खो देता है उससे पंजाबी के "रब" का उद्गम प्रभु से हुआ भी प्रतीत होता है. प्रभु -> प्रब -> रब

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