Wednesday, April 2, 2008

चिड़िया चुग गई खेत ....


खेतों की समृद्धि ही किसी भी देश को सोने की चिड़िया बना सकती है,जैसा कि सदियों पहले भारत था और कहावतों में अब भी है ... जब चिडिया चुग गई खेत जैसा पछतावे का एहसास ही नज़र आता है । पृथ्वी का असीम विस्तार ही मनुश्य के लिए सुख-दुख की वजह रहा है। इसकी व्याख्या फिर कभी, फिलहाल इतना ही कि यही विस्तार क्षेत्र कहलाता है जिससे खेत जैसा शब्द जन्मा है। क्षेत्र शब्द की मूल धातु है क्षि जिससे बने क्षितिः शब्द के मायने व्यापक हैं। क्षितिः यानी पृथ्वी, आवास , घर आदि। इसके अलावा इस शब्द के कुछ अन्य अर्थ भी हैं जैसे हानि, विनाश, आघात आदि। इसी तरह क्षः वर्ण का अर्थ भी क्षेत्र, खेत और किसान ही होता है।
क्षका अगला रूप खः होता है। खः में निहित अंतरिक्ष, आकाश , ब्रह्म जैसे भावों और क्ष से बने अक्षर शब्द के अविनाशी, ब्रह्म जैसे अर्थों पर अगर गौर करें तो देखते हैं मूलतः इनमें खालीपन और विस्तार का ही भाव समाया है जिसे अंग्रेजी मे स्पेस कहा जाता है। जो कि अरबी के ख़ला(खाली स्थान, शून्य, अंतरिक्ष), ख़ल्क़ ( संसार, राज्य) जैसे शब्दों में भी साफ हो रहा है। जाहिर है क्षेत्र में भी मूल भाव विस्तार और खालीपन और रिक्तता का ही है। क्षेत्र ने ही खेत का रूप लिया है। पृथ्वी की सतह पर जितनी भी खाली जगह है क्षेत्र कहलाती है मगर भूमि का वही क्षेत्र खेत कहलाता है जिसे जोता जा सके।
जुताई क्या है ? धरती के कठोर सीने को हल की नोक से छील कर मुलायम मिट्टी मे तब्दील करने की प्रक्रिया ही जुताई है। यहां आकर क्षितिः शब्द में अंतर्निहित हानि, विनाश अथवा आघात जैसे शब्दों का अर्थ जुताई के संदर्भ में साफ़ होता है। क्षि धातु से ही क्षत, क्षतिः जैसे शब्द बने है जिनमें चोट, जख्म, हानि , बर्बादी जैसे भाव शामिल हैं। जंग में मारे जाने के लिए एक मुहावरा खेत रहना भी प्रचलित है जिसका अभिप्राय यही है कि शरीर से प्राणों की मुक्ति।
में शामिल शून्य, विस्तार, खालीपन जैसे भाव इससे बने संस्कृत के खलकः जैसे शब्द में भी शामिल है जिसका अर्थ है घड़ा। सूफी कवियों ने घड़े की व्याख्या भी ब्रह्म और आकाश के रूप में ही की है। गौर करें की खेत की उपज अन्न कहलाती है । शास्त्रों में अन्न को भी ब्रह्म की ही उपमा दी गई है। अन्न अपने आप मे ब्रह्म है और अन्न भूख नाम के उस अविनाशी तत्व का आंशिक शमन करता है जो उदर नामक घड़े में(स्पेस, खालीपन)आश्रय पाता है और लोभ, मोह, माया जैसे विभिन्न रूपों में मन में भी अपना डेरा जमाए रहता है। इसीलिए लालच , तृष्णा का घड़ा और भूख के संदर्भ में पेट को घड़ा या गड्ढ़ा कहा जाता है।
आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली दो कड़ियों -पहले ऑफर में ही मान जाते हैं काकेश और मुग्ध हुआ मूर्ख पर सर्वश्री गीत चतुर्वेदी, हर्षवर्धन, अनूप शुक्ल, डॉ चंद्रकुमार जैन, मीनाक्षी, माला तैलंग, विनीत उत्पल, अनुराधा श्रीवास्तव, विमल वर्मा, प्रमोद सिहं, संजीत त्रिपठी, अनिताकुमार , आशीष , ज्ञानदत्त पांडे, दिनेशराय द्विवेदी, नीलिमा सुखीजा अरोरा और अनामदास की टिप्पणियां मिलीं । आप सबका आभार । काकेश जी की बतकही पर फिलहाल आंशिक विराम है। उनका कोलकाता प्रवास इतना संक्षिप्त था कि हमें विमलजी वाला अनुभव याद आ गया। इससे पहले कि जल्दी खत्म कर देने , और फटाक से निपटा देनें जैसे जुमले सुनने को मिलें , हमने काकेश जी को कह दिया है कि ....लोग जो चाहते हैं उस पर ध्यान दें।

@नीलिमा सुखीजा अरोरा-
मूढ़ भी इसी शब्द श्रंखला की कड़ी है नीलिमा। इस ओर ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया क्योंकि मैने आलेख में मूढ़ शब्द का प्रयोग तो किया है पर यह बताना भूल गया कि इसकी भी मुह् से रिश्तेदारी है। आपकी हाजिरी बहुत दिनों बाद लग रही है, क्यों ?
@डॉ चंद्रकुमार जैन-
डॉक्टर साहब शानदार संदर्भों के लिए शुक्रिया। मेरी ओर से नीलिमा की जिज्ञासा आपने मिटाई इसका भी आभार ।

8 कमेंट्स:

Sanjay said...

वाह भैया... खेत से खलक: तक... बहुत बढि़या जानकारी दी. वो बावुकूफ के बारे में भी जरूर बताएं.

दिनेशराय द्विवेदी said...

खला कि बिना कुछ नहीं. पर जहाँ अन्न को ब्रह्म कहा है वहीं यह भी कि खला भी वही है जो खेत है। खाने वाला भी वही है जो खाया जा रहा है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सत् कर्म क्षेत्र के धीर-वीर
क्षतशीश हुए नतशीश नहीं !
रह जाए खेत बस काफी है
मंज़ूर उन्हें बख्शीश नहीं !
धरती पर हल जब चलता है,
ये ख़ल्क मचलता तुम देखो
माटी पूजक इन्सान सही
पर क्या वो ही जगदीश नहीं ?
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इस पोस्ट की प्रेरणा से उपजी
उक्त आशु कविता.
आभार अजित जी .
शुभकामनाएँ
डा.चंद्रकुमार जैन

Mrs. Asha Joglekar said...

bahut maza aya padh kar hamesha kee tarah jankari badhane wala bhi aur anand dene wala bhi.

anitakumar said...

लिजिए साब हमने तो कभी सोचा ही नही था कि खेत का मूल ऐसा हो सकता है। बहुत ही बड़िया जानकारी। जनाब आप की सब पोस्ट्स तो किताब के रूप में छापी जा सकती हैं , कब आ रही है आप की किताब

Lavanyam - Antarman said...

अनिता जी के सुझाव पारा ध्यान दीजिये अनिता भाई ..ख शब्द वाकई , हिन्दी भाषा का एक ख़ास शब्द है जिस पर, आपने अच्छी शोधा की है दिनेशा जी के विचार भी बढिया लगे ..

Milind Kale said...

Bahut achcha lekh hai aapka!
Man me vichar aya - Kha yane Space. atah Sun -kha yane Good Space aur Du -kha yane Bad Space.
Sukhee yane with good space aur dukhee ane with bad space. phir yah space man me bhee ho sakti hai!

Milind Kale said...

Please read Su instead of sun

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