Sunday, August 9, 2009

कपूरथला राजघराने की प्रेमकथा-जुनून

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logo पुस्तक चर्चा में इस बार प्रख्यात कपूरथला राजघराने की स्पेनी रानी अनीता देलगादो और उनके प्रेमी राजा जगतजीत सिंह के जीवन पर लिखे उपन्यास जुनून की बात करेंगे। scan0001आज से करीब सौ साल पहले घटी एकचंद अविश्वसनीय घटनाओं का इसमें उल्लेख है। हालांकि लेखक ने इसे उपन्यास कहा है फिर भी ऐतिहासिक घटनाओं और संदर्भों का प्रामाणिक ब्योरा इसमें है। पुस्तक फुल सर्कल ने प्रकाशित की है और मूल्य है तीन सौ रुपए।

भारतीय इतिहास में राजा-महाराजाओं के जीवन से जुड़े़ किस्सों-कहानियों और सनकों का जिक्र लगातार होता रहा है।
javier-moro-finland जेवियर मोरो प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार हैं। स्पनी मूल के मोरो यात्रा-वृत्त लिखने में माहिर हैं। उनके चर्चित उपन्यास पैशन इंडिया पर एक फिल्म भी बनी है। यह कृति 2006 की बेस्ट सेलर थी।
पौराणिक देवी-देवताओं के आख्यानों को भी अगर अलौकिकता के दायरे से बाहर रखकर देखा जाए तो वहां भी हमें वैसी ही बेतुकी और सनक भरी लहर नजर आती है। उसकी वजह यही है कि राजा-रानी हों या देवी-देवता, जन-साधारण की आस्था ने उन्हें स्वामी भाव से देखा। उनकी छवियों में महानता या तो पैदाइशी रही या भक्तों द्वारा स्थापित की गई। इसी महानता को कायम रखने में राजा-महाराजा खुद विलक्षण हरकतें करते थे। अब सनक तो विलक्षणता से भी उपजती है और मूर्खताओं से भी। हमारे राजा-महाराजाओं में ये दोनों ही तत्व पर्याप्त मात्रा में थे। कपूरथला के महाराज जगतजीतसिंह और और उनकी स्पेनी रानी अनीता देलगादो के जीवन पर आधारित जेवियर मोरो के चर्चित उपन्यास पैशन इंडिया के हिन्दी अनुवाद जुनून को पढ़ते हुए मैं यही सोच रहा था।
भारतीय रजवाड़ों में प्रेम-गाथाएं भी पुराने ज़माने से चर्चित रही हैं। अंग्रेजी दौर में, जब राजशाही सिर्फ एक रस्म अदायगी रह गई थी और अंग्रेज धीरे-धीरे रजवाड़ों पर अपना शिकंजा बढ़ा रहे थे, तब भी राजमहलों में कई प्रेमकथाएं पनप रही थीं। कपूरथला राजघराने के वारिस जगतजीतसिंह और उनकी स्पेनिश प्रेयसी अनीता देलगादो वेरोनेस के प्रेम ने भारत ही नहीं समूचे यूरोप में धूम मचाई थी। कपूरथला के महाराजा जगतजीतसिंह और स्पैनिश फ्लेमेंको नर्तकी अनिता देलगादो का प्यार तेजी से परवान चढ़ा था। राजा की मुलाकात उससे 1906 में अपनी स्पेन यात्रा के दौरान एक नाईट क्लब में हुई थी जहां अनीता और उसकी बहन कैमेलिया सिस्टर्स के नाम से प्रसिद्ध थीं। एक बेहद ग़रीब अंडलूसियाई परिवार से ताल्लुक रखनेवाली सामान्य सी लड़की, जो माता-पिता की मदद करने के लिए मेड्रिड आकर क्लब में नृत्य करने लगती है। उत्तर भारत के एक प्रसिद्ध राजघराने के वारिस की अर्धांगिनी बनना उसके भाग्य में लिखा था। लेखक जेवियर मोरो ने लोकप्रिय हो सकनेवाले एक ऐसे विषय को चुना जिसमें बेस्टसेलर होने की तमाम खूबियां भी थीं।
raja अनीता देलगादो की अलग अलग मुद्राएंanitaanita4[1]r007fw8anita_delgado_esmeralda1और ऐसे थे राजा जगतजीत सिंह 338px-Major-General_H.H._Farzand-i-Dilband_Rasikh-
भारतीय राजा-महाराजाओं की प्रेमकथाएं, दुर्दांदता की मिसालें, शिकार की बहादुरी, अंतःपुर की मूर्खताएं और दिशाहीन राष्ट्रभक्ति जैसे विषयों को पश्चिमी दुनिया में आज भी बिकाऊ माल समझा जाता है। कोई ताज्जुब नहीं कि जेवियर मोरो को लगातार अगर बेस्टसेलर लिखना है तो यह विषय मुफीद था।
मोरो ने राजा और सामान्य नर्तकी की इस प्रेमगाथा को उपन्यास की शक्ल इसलिए दी क्योंकि उसके बिना यह सपाट इतिहास हो जाता। एक पाठक के नाते मोरो से जैसे शोध की मैं उम्मीद करता था, उससे कुछ कम हकीक़त या खुलासों का बयान पुस्तक में है। इसके बावजूद लेखक ने बीती दो सदियों के भारतीय-यूरोपीय साझा ऐतिहासिक संदर्भों का बखूबी इस्तेमाल इस किताब में किया है जो इस किताब की खासियत है। भारतीय रजवाड़ों का रूप, महाराजाओं की खासियतें, फिरंगी सरकार से उनके तनावपूर्ण रिश्तों की पड़ताल भी इस किताब में हुई है। किताब बताती है कि 1857 की क्रांति से पहले तक जो अंग्रेज भारतीय संस्कृति की खूबियों की तह तक जाकर पड़ताल कर रहे थे, उसके विशद अध्यययन के जरिये इस रहस्यमय उपमहाद्वीप के दिमाग़ को समझना चाहते थे और खुद को भारतीय रंग में ढाल रहे थे, म्यूटिनी के बाद वे बदल गए। जिन अंग्रेजों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने में झिझक नहीं होती थी, क्रांति के बाद उन्होंने न सिर्फ इससे कन्नी काटनी शुरू कर दी, बल्कि रजवाड़ों और प्रभावशाली भारतीयों के अंग्रेज स्त्रियों से विवाह में भी वे बाधा डालने लगे। हालांकि दुनियाभर के राजपरिवारों में प्राचीनकाल से विदेशी स्त्रियों को रनिवास में रखने की परम्परा रही है। भारतीय राजाओं में भी यह कायम थी। सर्वप्रथम दक्षिणी राजाओं द्वारा रोमन स्त्रियों से विवाह के संकेत मिलते हैं। यह मौर्यकाल से भी पहले की बात है। यूरोपीय महिला को भार्या बनाने की ललक अंग्रेजीकाल में और बढ़ गई।
भारतीय राजघरानों में 1857 के बाद शिक्षा का प्रसार बढ़ने के साथ यूरोपीय सभ्यता के प्रति ललक भी बढ़ी। पंजाब के रजवाड़े उन्नीसवीं सदी के आखिर में अंग्रेजों के पिछलग्गू बन गए थे। लगातार यूरोप के दौरों पर रहना और पूरे राज्य की आमदनी को जनकल्याण पर खर्च न करते हुए वे आमोद-प्रमोद, सनकों और स्थायी ऐशगाहों के निर्माण पर फूंक दिया करते थे। कपूरथला के राजा जगतजीतसिंह ने अपने सबसे बड़े बेटे के विवाह आयोजन पर राज्य की सालभर की आय का आधा हिस्सा खर्च कर डाला था। पुस्तक ऐसे ही दिलचस्प ब्योरों से भरी है।  इस उपन्यास में बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में घटित कुछ प्रमुख घटनाओं का भी वर्णन किया गया है जैसे देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाने का फैसला। जार्ज पंचम की दिल्ली यात्रा और उसके लिए रजावाड़ों में शक्ति प्रदर्शन की होड़। मगर ये सब बातें क्षेपक की तरह सामने आती हैं, मुख्य कथावस्तु अनीता देलगादो के आसपास ही घूमती है। राजा से विवाह के वक्त उसे चार माह का गर्भ होता है। राजा की अन्य चार रानियों का उपेक्षापूर्ण रवैया, अंग्रेज हाकिमों द्वारा इस विवाह को मान्यता न देना मगर इसके बावजूद प्रेमी राजा का लगातार रानी के सम्मान की खातिर इस मुद्दे को हाकिमों के सामने उठाते रहने की की जिद यह साबित करती है कि राजा का रानी के प्रति अनुराग सिर्फ हरम में गोरी चमड़ी वाली औरत रखने की सनक भर नहीं था बल्कि वास्तविक प्रेम था।
स प्रेमकहानी का अंत भी दुखद ही होना था। अनीता करीब बीस साल महाराजा के महल में रानी बनकर रहीं। उन्हें जीवन में सिर्फ और सिर्फ महाराजा ने रानी माना। जिस लड़की ने कभी संस्कारी स्पेनी भाषा नहीं बोली थी, जो सिर्फ अंडलूसियन भाषा जानती थी, जिसने राजा के कहने पर विवाह से पहले पेरिस में रह कर तहज़ीब सीखी, फ्रैंच भाषा और संस्कार सीखे जिस पर राजा तहेदिल से फिदा था। रानी के मुंह से झरती अंडलूसियन खूशबू वाली फ्रैंच ज़बान का चर्चा किताब में कई जगह है। उसी रानी पर अपने हम उम्र सौतेले बेटे के साथ अवैध रिश्तों का आरोप भी लगा। अंततः अनुरागभरे दो दशकों बाद फ्लेमेंको की धुन पर थिरकनेवाली अनीता देलगादो को भारी भरकम पेंशन के साथ फिर यूरोप रवाना कर दिया गया। कपूरथला के राजा से उत्पन्न रानी का बेटा अजितसिंह बाद में भारतीय विदेश सेवा के उच्च ओहदे तक पहुंचा। 1980 के आसपास उनका निधन हुआ जबकि रानी ने 1962 में इस दुनिया से कूच किया। पुस्तक का अनुवाद आमतौर पर ठीक है। जहां विशिष्ट यौन-स्वभाव के तहत “ठंडा” शब्द का इस्तेमाल होना था, वहां “शीतल” जैसा शब्द खटका। कई जगर पर प्रूफ की मामूली गलतियां हैं। किताब मूल रूप से स्पेनी में लिखी गई है और पहले उसका अंग्रेजी अनुवाद पीटर जे हर्न ने किया फिर संजय कुंदन और अरुणचंद्र ने हिन्दी अनुवाद किया है। पुस्तक का प्रमुख आकर्षण उसके ऐतिहासिक फोटो हो सकते थे पर उनकी छपाई बेहद घटिया है। यहां नेट से चित्र  लिए गए है।

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8 कमेंट्स:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

पुस्तक मिली तो अवश्य पढेंगे -
- आपकी समीक्षा बढिया लगी अजित भाई --
ये राजे रजवाडों की रंगीन तबियत की कई कहानियां ,
बिखरी पडी हैं
अजित सिंह जी का ब्याह
किसके साथ हुआ था उसके बारे में
जानकारी है क्या ?
( आपके हमनाम राज कुंवर :)
- लावण्या

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पुस्तक चर्चा अच्छी रही।
बधाई।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन समीक्षा..कोशिश रहेगी पढ़ पायें.

Arvind Mishra said...

जूनून के अंत तो ऐसे ही होते हैं -बढियां जानकारी !

मुनीश ( munish ) said...

The observations of Xavier on the life of Royals are credible because other sources also support them . Kings of Panjab helped East india co. suppress the mutiny and thus delayed our independence by 90 years.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अजित जी
अभी कुछ दिन पहले एक दोस्त किसी दरबारी की लिखी दो किताबें महाराजा और महारानी दे गये थे। शुरु से ही मज़ा नहीं आया तो नहीं पढी।
इसे पढना चाहूंगा।

हां आप यहां आने वाले थे…क्या हुआ?

गिरिजेश राव said...

तो अनुवाद कारण है इस पुस्तक की अचानक बढ़ी लोकप्रियता का !

मेरी सुपुत्री इसे अंग्रेजी में पढ़ रही है।

हिमांशु । Himanshu said...

पुस्तक जरूर पढ़ने लायक है । कुछ एक घटनायें, वास्तविकतायें और उनमें घुला मिला भावनात्मक तत्व - आकर्षण है इस पुस्तक में । आभार ।

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