Thursday, May 21, 2009

औलाद बिन वालदैन इब्न वल्दीयत

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सं तान के अर्थ में हिन्दी में औलाद शब्द का इस्तेमाल भी खूब होता है। मूलतः यह सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द है और अरबी ज़बान से फारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ है। संतति के लिए हिन्दी में बहुत विकल्प नहीं हैं। पुत्र या पुत्री के संयुक्त अर्थ को अभिव्यक्त करने की स्थिति में संतति या संतान के अलावा औलाद शब्द का प्रयोग ही होता है, इसके अलावा कोश में तलाशने पर भी अन्य प्रचलित शब्द नहीं मिलते हैं। यूं 'बच्चे' से भी काम चलाया जाता है जिसमें लड़का+लड़की का अभिप्राय होता है। मगर मूलतः इसमें संतान का भाव न होकर अल्पवय का भाव ज्यादा है।
लाद शब्द बना है सेमेटिक धातु व-ल-द (w-l-d) से जिसमें जन्म देने का भाव है। अरबी में वालीद, वलद जैसे शब्द भी हैं जिनका मतलब होता है पुत्र या लड़का। इसका बहुवचन होता है विल्दैन। इसी धातु से बना है औलाद शब्द जो सर्वाधिक प्रचलित है और वलद का बहुवचन है, लिहाज़ा इसमें से सिर्फ पुत्र वाले भाव का लोप हो जाता है और संतान का भाव उभरता है। वालिद walid और वालिदा जैसे शब्द जिनमें जन्मदाता का भाव स्पष्ट है, इसी धातु की उपज हैं। वालिद यानि पिता और वालिदा यानी मां। अभिभावक या माता -पिता के संयुक्त अर्थ में अरबी में वालदैन शब्द है जो हिन्दी में भी समझा जाता है। उर्दू में इसका व्यापक इस्तेमाल होने से इसकी अर्थवत्ता से सब परिचित हैं। माता-पिता के संयुक्त अर्थ में हिन्दी में पालक शब्द अभिभावक की तुलना में अधिक सही है। क्योंकि अभिभावक में संरक्षक का भाव ही प्रमुख है। वंश परम्परा के अर्थ में वल्दीयत शब्द भी इसी कड़ी में आता है।यूं इसमें पुत्रवान होने का भाव भी है और बाप का नाम भी है । मुस्लिमों में पैगंबर का जन्मदिन ईद मिलादुन्नबी पर्व के तौर पर मनाया जाता है। मिलाद शब्द इसी मूल अर्थात व-ल-द से बना है।
हिन्दी में जिस तरह संततिक्रम के संदर्भ में पहले संतान का नाम फिर पिता का नाम जोड़ा जाता है उसी तरह दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों में परम्परा रही है। मुस्लिम शासनकाल में फारसी ही राजभाषा थी और सरकारी दस्तावेज़ो में नाम लिखने की परिपाटी कुछ यूं थी- मोहनदास वल्द करमचंद गांधी। यहां वल्द का अर्थ संतान से है जो इसी मूल से उत्पन्न शब्द है। बाद में इसी तर्ज पर इसे हिन्दी में यूं लिखा जाने लगा- मोहनदास पुत्र करमचंद गांधी। मगर खालिस अरबी तरीके से यह होगा मोहनदास बिन करमचंद गांधी। हालांकि अरबों में इस क्रम में पितामह का नाम भी शामिल करने की परिपाटी रही है। 'का बेटा' के लिए इब्न विशेषण भी लगता है। मिसाल के तौर पर इब्न बतूता का अर्थ हुआ बतूता का बेटा। हालांकि उसका पूरा नाम था अबु अब्दुल्लाह मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह अल लवाती अल तंजी इब्न बतूता। ईसा मसीह को इसी तर्ज पर इब्ने मरियम कहा जाता है अर्थात मरियम का बेटा। यह ठीक उसी तरह है जैसे हिन्दुओं के नाम है जैसे देवकीनेदन यानी कृष्ण या पवनसुत यानी हनुमान। पुत्री के लिए बिन्त लगाया जाता है जैसे फातिमा बिन्त कासिम यानी कासिम की पुत्री फातिमा।

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16 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

इब्न बतूता का अर्थ पिछले वर्ष दुबई के इब्न बतूता मॉल में जा कर जाना था, आज विश्लेषण पढ़कर अच्छा लगा. आभार.

मीनाक्षी said...

अजितजी आज का सफ़र तो बहुत रोचक लगा. वलद तो दो है लेकिन बिन्त माफी....
समीरजी, आप हमारे घर के पास से निकल गए इब्न बतूता देखने... मेहमाननवाज़ी का मौका ही नही दिया...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आज का यह आलेख माता-पिता और पुत्र के इर्द-गिर्द घूमता है और अपने आप में बहुत कॉम्पेक्ट है।

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

आत्मज-आत्मजा, सुत-सुता, बेटा-बेटी?

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर लेख!

RDS said...

जब अदालत में अपराधी के लिए पुकार गूंजती है : ' नत्थू वल्द बिजेसिंग हाजीर हो..., ' तो बिजेसींग इस वल्दियत को कोसते हुए अपना सिर धुनते होंगे | ( दोनों काल्पनिक नाम ) |

वल्दियत की बड़ी महिमा है | औलाद जो करे सो सभी वालदैन का | नाम कमाए या गवाएं असर वालिद के सिर पर भी होता ही है |

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

इब्ने देवकी या इब्ने दशरथ तो मुस्लिम विश्व में भी एकॉमोडेट हो जायेंगे! :-)

हिमांशु । Himanshu said...

बहुत जरूरी शब्दों का परिचय । आभार ।

अजित वडनेरकर said...

@सुमंत मिश्र
कात्यायनजी हम औलाद या संतान के समकक्ष किसी ऐसे शब्द की चर्चा कर रहे हैं जिसमें पुत्र-पुत्री का भाव समाहित हो। आत्मज-आत्मजा, सुत-सुता, बेटा-बेटी जैसे युग्म भी वह विकल्प कहां प्रस्तुत करते हैं? अलबत्ता पुत्र-पुत्री की अर्थवत्ता वाले शब्दों पर अगली कड़ियों में चर्चा करेंगे।

डॉ .अनुराग said...

जे तो आपने आँख खोल दी आज !

रंजना said...

दक्षिण भारत में तो अभी भी परंपरा है ,अपने नाम के साथ पिता पितामह ग्राम आदि का नाम लगाने की...पर सुविधा यह है की यह संक्षिप्त रूप में लगाया जाता है...नहीं तो पूरा नाम व्यवहृत करना या किसी और द्वारा उसे याद रखना कितना कठिन हो जाता है..इतिहास में इसी लम्बे टेढ़े मेढे नाम के चक्कर में मेरे नंबर कटते थे...

बड़ा ही रोचक आनंद दायक रहा यह सफ़र....आभार आपका.

अनुपम अग्रवाल said...

आपका लेख जानकारीपूर्ण्र है और रोचक भी .

औलाद और वलद का विलय फिर एक बार निरीक्षण करें .

कुछ कम समझ में आ रहा है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

यह सफर भी जानकारीपूर्ण्र है और रोचक लगा।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

ajit ji,
bahut achchhi jankaari de rahe hain aap.dhanyawaad...

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

वसीयत का ताल्लुक वालदैन से इसी लिए होता होगा शायद . बिन का पता आज चला यह क्यों लगाया जाता है .

MAYUR said...

इब्न बतूता पहन के जूता,
निकल पड़े तूफान में।
थोड़ी हवा नाक में घुस गई,
थोड़ी घुस गई कान में।
कभी नाक को, कभी कान को,
मलते इब्न बतूता।
इसी बीच में निकल पड़ा,
उनके पैरों का जूता।
उड़ते-उड़ते जूता उनका,
जा पहुंचा जापान में।
इब्न बतूता खड़े रह गए,
मोची की दूकान में।
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

इश्किया फिल्म के गाने से आपकी इस पोस्ट कि याद आ गई और फिर इस कविता की . नमस्कार

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