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Saturday, October 31, 2009
कभी धूप, कभी छाँव [बकलमखुद-112]
Friday, October 30, 2009
मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17]
चलते चलते - हिन्दी में चावल के स्टार्च को माण्ड कहा जाता है। गौर करें यह एक किस्म का फेन होता है जो चावल को उबाले जाने पर ऊपर की ओर उठता है। यहां उभरने के गुण की वजह से ही चावल से निसृत चिपचिपे पदार्थ को मण्डः कहा गया है जिससे हिन्दी में माण्ड या माड़ बना है।
मण्डल शब्द का इस्तेमाल होता है जैसे रेल मण्डल, मण्डल अधीक्षक आदि। अलग अलग विभाग भी अपने प्रशासनिक क्षेत्रों के लिए मण्डल शब्द का प्रयोग करते हैं। परगना, सूबा, जिला, उपनिवेश आदि भी इसी दायरे में आते हैं। मण्ड धातु की रिश्तेदारी इंडो-यूरोपीय धातु men ले भी है जिससे ऊंचाई, उभार, सजाना, आधार प्रदान करना जैसे भाव हैं। गौरतलब है कि अंग्रेजी का mount, mountain जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं जिसमें आधार, उभार और ऊंचाई साफ झलक रही है। पर्वत शुरु से ही मनुष्य के आश्रय-आधार रहे हैं। मण्ड धातु में घेरा, घेरना जैसा भाव भी माऊंट में उजागर है। पर्वत एक विशाल क्षेत्र को घेरते हुए सीमांकन का काम करते हैं। हिन्दी में किसी खुले क्षेत्र की उठी हुई सीमारेखा या चहारदीवारी के लिए मेड़ शब्द प्रचलित है जो मण्ड् धातु से ही निकला है। इस धातु से ही बने हैं मण्डलेश्वर, महामण्डलेश्वर, मण्डलाधीश, मण्डलाधिपति जैसे शब्द जिनमें राजा, सम्राट, शासक अथवा धर्मगुरु का भाव है। आजकल मण्डलाधिकारी शब्द चलता है जो आमतौर पर डिस्ट्रक्ट मजिस्ट्रेट यानी कलेक्टर होता है।Thursday, October 29, 2009
गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]
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Wednesday, October 28, 2009
हे भीष्म पितामह, हम ब्लॉगर नहीं, पर वहां थे…
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Wednesday, October 21, 2009
लाईन, लिनेन, लिनोलियम [लकीर-6]
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Tuesday, October 20, 2009
घर-शहर की बदलती सूरत [बकलम खुद-111]
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Sunday, October 18, 2009
सूत्रपात, रेशम और धागा [रेखा-5]
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Saturday, October 17, 2009
मेहरौली, मुंगावली, दानाओली, दीपावली[लकीर-4]
संबंधित पोस्ट-1.लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत [लकीर-1] 2.रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2)3.कोलतार पर ऊंटों की क़तार [लकीर-3] 4.पतली गली से गुज़रना [सफर के रास्ते-1]
क़ तार के अर्थ में हिन्दी के के अवलि, पंक्ति जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। हालांकि अवलि मूलतः संस्कृत का शब्द है। इसका देशज रूप अवली है। बोलचाल की हिन्दी में यह कम प्रयुक्त होता है मगर कई शब्दों में इसकी अर्थछाया नज़र आती है। कई कोशों में इसके अवलि, अवली, आवलि, आवली, औली, आलि जैसे रूप मिलते हैं। मूलतः इस शब्द में रेखा, पंक्ति, कतार, सजावट आदि का भाव है। दीपावली, दीवाली, दिवाली जैसे विभिन्न शब्दरूपों में यही आवलि झांक रही है जिसका अर्थ है दीयों की क़तार। संस्कृत में आलि शब्द है जिसका प्रयोग काव्य में किसी स्त्री की सहेली के तौर पर भी होता है। आलि में रेखा, लकीर, पुल, पुलिया का भाव है। आलि शब्द बना है अल् धातु से जिसमें साज-सज्जा का भाव प्रमुख है। इसके अलावा इसमें रोकना, थामना जैसे भाव भी है। स्तम्भ को परिनिष्ठित हिन्दी में आलम्ब कहते हैं अर्थात लम्बवत स्थिति। एक पुल कई आलम्बों पर टिका रहता है जो एक पंक्ति में होते हैं। आलि शब्द में पुल और क़तार शब्द का भाव एक साथ स्पष्ट हो रहा है। यही नहीं ध्यान दें तो कतार या पंक्ति सज्जाविधान का एक प्रमुख अंग भी है। सो पंक्ति के रूप में आलि में निहित सजावट का भाव भी स्पष्ट है। अल् से बने हैं अलंकार, आलंकारिक, अलंकरण जैसे शब्द जिनमें गहना, सजावट, शृगार के भाव हैं। सजावट के बिना दीपावली की कल्पना नहीं की जा सकती।
इस आलि में निहित पंक्ति, कतार के भाव की तुलना और आलि शब्द की ध्वनियों की तुलना अवली, अवलि से की जा सकती है। ये दोनों ही शब्द निकट के हैं। आप्टे कोश में अवलि शब्द नहीं मिलता इसकी जगह आवलि शब्द है। हिन्दी शब्दसागर में अवलि शब्द को संस्कृत का बताया गया है और अवली को देशज हिन्दी शब्द। संस्कृत का आवलि शब्द वल् धातु से बना है जिसमें जाने का, गति का, आगे बढ़ने का, मुड़ने का, घेरने, लुढ़कने, लुढ़काने का भाव है। बिंदु को रेखा का उद्गम माना जाता है। बिंदुओं का वृद्धिक्रम ही रेखा कहलाता है। सो रेखा में गति और वृद्धि का भाव स्पष्ट है। क़तार में क़तरा-क़तरा यानी बूंदों के टपकने का भाव साफ नजर आ रहा है जो एक लम्बवत लकीर ही होती हैं। वृद्धिक्रम ज़रूरी नहीं कि सीधा हो। रेखाएं सरल भी होती है और वक्र भी। ऊर्ध्व भी होती है और क्षैतिज भी। गोल घेरा भी रेखा से ही निर्मित होता है। वल् शब्द में घेरने और मुड़ने का भाव भी निहित है। जाहिर है किसी पदार्थ को मोड़ने, घुमाने के अर्थ में हिन्दी में बल शब्द का प्रयोग किया जाता है जो शक्ति वाले बल से अलग होता है। माथे पर बल पड़ना में यही बल झांक रहा है। वल्लरी में भी यही बल है जो वृक्ष के सहारे घूमते हुए ऊपर चढ़ती है। इसका ही देशज रूप है बेल। रोटी बनाने का उपकरण बेलन भी इसी मूल से जन्मा है क्योकि इसे घुमाया जाता है।
आवलि शब्द का सर्वाधिक प्रयोग बसाहटों के अर्थ में हुआ है। वल् में निहित घेरने का भाव किसी ग्राम-नगर की सीमा में स्पष्ट हो रहा है। किसी भी बसाहट के लिए सीमांकन ज़रूरी है। गांव-आबादी की कैसी भी बसाहट हो, बिना घेरे के पूरी नहीं होती। घेरा का अर्थ गोल-चक्र ही नहीं होता बल्कि वह समूचा क्षेत्र जो चारों दिशाओं में किसी कृत्रिम रचना से आवृत्त हो, घेरा हुआ कहलाता है। जगप्रसिद्ध कुतुबमीनार दुनियावालों के लिए दिल्ली में है मगर हमारे लिए वह मेहरौली में स्थित है जो दिल्ली के पास स्थित एक प्राचीन बसाहट है। जब दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ था, तब प्रख्यात खगोलशास्त्री वराहमिहिर का इस इलाके में आश्रम था। इतिहासकारों के मुताबित चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा वहां में 27 मंदिरों का निर्माण कराया जा रहा था। यह काम वराहमिहिर के मार्गदर्शन में चलता रहा। इन मंदिरों को मुस्लिम शासको द्वारा नष्ट किया गया मगर इस स्थान को मिहिरावली यानी वराहमिहिर की देखरेख में बन रहे मंदिरों की पंक्ति के नाम से जाना गया। इसी तरह चंदौली, अतरौली, मुंगावली, डबवाली, बिलावली जैसी आबादियों के नामों के पीछे भी यही आवलि छुपी नजर आती है। भण्डौली शब्द का मतलब हुआ बरतनों की कतार। यही नहीं एक वनौषधि का नाम होता है पंचौली क्योंकि उसके फूल में पांच दल होते हैं जिसकी वजह से उसे पंचावलि कहा गया जो पंचौली हो गया। ब्राह्मणों का एक गोत्र पंचौली होता है। संभवतः इस व्युत्पत्ति से उसका रिश्ता नहीं है। पंचाल जनपद के ब्राह्मण पांचाल कहलाते होंगे जो कालांतर में पंचौली हो गया। मराठी में ओळी किसी गली या कतारनुमा रिहाइश को कहते हैं। मराठा शासकों की राजधानी ग्वालियर में इस शब्दमूल से जुडे कई स्थाननाम मिलते हैं जैसे दानाओली जिसका अर्थ हुआ जहां दाना यानी अनाज मिलता हो। साफ है कि आशय ग्रेन मार्केट से है। इसी तरह दर्जीओली का मतलब हुआ जिस गली में दर्जियों की दुकानें हों।यहां अवलि का मतलब कतार, पंक्ति से ही है जो अंत में गली के अर्थ में रूढ़ होता है।
Thursday, October 15, 2009
कोलतार पर ऊंटों की क़तार [लकीर-3]
संबंधित पोस्ट-1.लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत [लकीर-1] 2.रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2) 3.घासलेटी साहित्य और मिट्टी का तेल 4.ममी की रिश्तेदारी भी केरोसिन से…
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