Saturday, December 6, 2008

कोठी में समाएगा कुटुम्ब ?[आश्रय-2]


घट में जल व्याप्त है। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी
भ्यता के विकासक्रम में मनुश्य ने जिस बात पर सबसे पहले गौर किया वह थी आश्रय की तलाश । एक ऐसा ठिकाना बनाना जहां वह सुरक्षित रह सके। सुरक्षा चाहिए थी हिंस्र प्राणियों से , अन्य कबीलों के मनुष्यों से। इसके अलावा प्राकृतिक शक्तियों से भी उसे सुरक्षा चाहिए थी। छत की तलाश में मनुश्य ने सबसे पहले प्रकृति का ही सहारा लिया और शैलाश्रय ढूंढ निकाले। पहाड़ों में बनी गुफाओं में उसने रहना शुरू किया ।

भाषा के संसार में आश्रय के लिए वर्ण का रिश्ता अद्भुत है। वर्ण पर अगर गौर करें तो इससे बने ऐसे अनेक शब्द कई भाषाओं में नजर आएंगे जिनमें आवास,निवास,आश्रय का भाव समाया है। संस्कृत में कुट् धातु का अर्थ होता है पहाड़ी कंदरा , छप्पर आदि। कुट् में निहित आश्रय का भाव कुटीर, कुटिया में नजर आता है। कुट् धातु में निहित भाव का अर्थविस्तार ही कुटुम्ब में नजर आता है जहां आबादी भी झांक रही है और आश्रय भी। अब कुटुम्ब के निवास के तौर पर तो हवेली या प्रासाद ही चाहिए। मगर भाषाविज्ञान में कुटुम्ब का रिश्ता जुड़ता है कुटी से। कुटि या कुटी दरअसल झोपड़ी या एक छप्परदार घर को कहते हैं। यह बना है कुट् धातु से जिसका मतलब हुआ वक्र, टेढ़ा। गौर करें टेढ़े व्यक्ति को भी हिन्दी में कुटिल ही कहते इसका एक अन्य अर्थ होता है वृक्ष। पथिक को भी कुट यानी वृक्ष का ही आसरा रहता है। प्राचीन काल में झोपड़ी या आश्रम निर्माण के लिए वृक्षों की छाल और टहनियों को ही काम मे लिया जाता था जिन्हें मोड़ कर, टेढ़ा कर दो दीवारों पर इस तरह से रखा जाता था कि ढलुआं छत बन जाती थी। यही भाव है कुट् से बनी कुटिया में। इस तरह कुट् से बने कुटः शब्द में छप्पर, पहाड़ (कंदरा), किला या दुर्ग जैसे अर्थ भी समाहित हो गए । भाव रहा आश्रय का। इससे ही बना कोट जिसका अर्थ किला होता है। स्यालकोट, राजकोट जैसे दुर्गनगरों के पीछे यही कोट लगा है। इसके अन्य कई रूप भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे कुटीर, कुटिया, कुटिरम्। छोटी कंदरा या वृक्ष के खोखले तने को कोटर भी कहते हैं।

दिलचस्प बात है कि कुट् का अर्थ पहाड़ भी है और वृक्ष भी। मगर हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध निबंध कुटज की बात करें तो कुटज एक वृक्ष विशेष का नाम भी निकल आता है। यहां कुट पहाड़ है और कुट+ज से अभिप्राय है पहाड़ पर जन्मा। जाहिर है निबंध में द्विवेदी जी ने एक खास पहाड़ी वृक्ष की ही बात कही है। कुट का अर्थ घड़ा भी होता है और घर भी। दोनों ही शब्दों में आश्रय का भाव है। घर में कुटुम्ब आश्रय पाता है और घड़े में जल। व्यापक अर्थ में बात करें तो कुट में घट व्याप्त है । वर्ण क्रम में ही भी आता है। घट में जल व्याप्त है। जल में ही जीवन जन्मा है और उसी पर टिका है। वृक्ष घड़े में नहीं उगते, मगर पुष्पीय पौधे ज़रूर गमले अर्थात कुण्ड में उगाए जाते हैं। कुण्ड एक प्रकार का घड़ा ही है। कुट यानी गमले में जन्मा पौधा भी कुटज ही कहलाया। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी।

... यह संयोग नहीं है कि हिब्रू में क़ला का अर्थ चट्टान को तराशना, खोदना, छेदना होता है। प्रकृति में आश्रय का निर्माण करने के लिए यही क्रियाएं सहायक होती हैं...
ह संयोग नहीं है कि हिब्रू में क़ला का अर्थ चट्टान को तराशना, खोदना, छेदना होता है। प्रकृति में आश्रय का निर्माण करने के लिए यही क्रियाएं सहायक होती हैं। अरबी, फारसी, हिन्दी, उर्दू में दुर्ग के अर्थ में क़िला शब्द इससे ही बना है। यहां भी ही प्रमुखता से उभर रहा है। कुटुम्ब शब्द की व्युत्पत्ति का रिश्ता चाहे छोटी सी कुटिया से जुड़ रहा हो मगर कुटुम्ब को रहने के लिए कोठी ही चाहिए। हिन्दी में कोठी के दो अर्थ होते हैं । पहला अर्थ है अट्टालिका, प्रासाद या भवन। दूसरा अर्थ है टंकी, या बखारी जिसमें अनाज भरा जाता है। दोनो की ही व्युत्पत्ति संस्कृत के कोष्ठ से ही हुई है। भाव भी लगभग एक ही है-सुरक्षित या घिरा हुआ स्थान।

कोष्ठ की व्युत्पत्ति हुई है कुष् धातु से जिसमें फाड़ना, खींचना जैसे भाव शामिल हैं। कोष्ठ का प्रारंभिक अर्थ रहा होगा चहारदीवारी या घिरा हुआ स्थान। मनुष्य ने पहाड़ों को छेदकर, मिट्टी उलीच कर ही अपने लिए प्रारंभिक कोष्ठ बनाए होंगे। कोष्ठ शब्द के साथ बाद में भंडार वाला भाव भी जुड़ता चला गया जिससे कोष्ठागार जैसे शब्द बने। कोठी, कोठार जैसे शब्द इससे ही बने हैं। कोष्ठागार का अधिपति कोष्ठागारिक कहलाता था। यह एक पद था। बाद के दौर में यह कोठारी के अर्थ में वणिकों का उपनाम हो गया । भाव वही था, भंडारगृह के स्वामी का। भंडारी उपनाम भी इसी तरह बना है। कुष् धातु से ही बना है कोष या कोश जिसका अर्थ भंडार ,समूह, ढेर होता है। शब्दकोश भी तो भंडार ही है। भाषा के संकेत चिह्नों में कोष्ठक प्रमुख है। घिरे हुए स्थान में रखे गए शब्द को इससे विशेष महत्व मिल जाता है। इसी तरह कोठी भी मनुष्य को विशेष महत्व प्रदान करती है और कोठरी भी। फर्क सिर्फ सम्पत्ति का है। इसी कड़ी का एक अन्य शब्द है कोठा । यूं तो इसका अर्थ अटारी, बड़ा कमरा, हॉल होता है मगर बोलचाल में कोठा तवायफ के ठिकाने को कहते हैं।
अगली कड़ी में इसी श्रंखला के कुछ और शब्दों की चर्चा

8 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

कुटिल शब्द बना कुटि से -आभार इस ज्ञान का. बहुत बढ़िया.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कोठारी मेरी सहेली की सरनेम हुआ करती थी :)
और पर्णकुटी मेरी बहन के घर का नाम था -
ये सारे शब्द संबन्धी हुए तब तो !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

... यह संयोग नहीं है कि हिब्रू में क़ला का अर्थ चट्टान को तराशना, खोदना, छेदना होता है। प्रकृति में आश्रय का निर्माण करने के लिए यही क्रियाएं सहायक होती हैं...
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सिर्फ़ शब्दों का नहीं
जिंदगी का सफ़र है
आपका यह अनुष्ठान !
और...
जिसे न तराशा गया हो वह चट्टान
तराशे जाने के बाद पूजनीय भी तो
बन जाता है न !
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आभार अजित जी.
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Gyan Dutt Pandey said...

कोठा । यूं तो इसका अर्थ अटारी, बड़ा कमरा, हॉल होता है मगर बोलचाल में कोठा तवायफ के ठिकाने को कहते हैं।
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अच्छा, कुटनी कोठे से आया है? भैया शब्द कहां से कहां तक बह लेते हैं।

दिवाकर प्रताप सिंह said...

आशा है कि अब अगली पोस्ट मे कूटनीति एवं कौटिल्य भी आने वाले है, इस समय उनकी ज़रूरत भी है देश को !

ताऊ रामपुरिया said...

शब्दों का बड़ा शानदार सफर है ! आज पहले बार आया हूँ ! बड़ा आनंद दायक लग रहा है !
राम राम !

Shastri said...

यह आलेख काफी अच्छा लगा. किस तरह आम जीवन में प्रयुक्त होने वाले विविधता लिये शब्द वाकई में एक माला के ही फूल हैं यह पढ कर काफी अच्छा लगता है.

सस्नेह -- शास्त्री

kiran rajpurohit nitila said...

sadar
bahut rochk laga.
kiran rajpurohit

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