Saturday, December 27, 2008

रूप की चमक, रूपए की खनक [सिक्का-4]

मुद्रा के बतौर रूपया शब्द शेर शाह सूरी
[1540 - 1545 ]के वक्त में शुरू होने का हवाला मिलता है जिसने इसी नाम से चांदी का सिक्का चलाया था
रोज़मर्रा के जीवन में सोना-चांदी को बेशकीमती धातुओं में गिना जाता है। इसके बावजूद दुनिया सोने के पीछे जितनी पागल है वैसी दीवानगी चांदी के लिए नहीं है । मगर हमारा मानना है कि दुनिया सोने के पीछे नहीं चांदी के पीछे पागल है। कहावत है कि सूरत नहीं , सीरत देखिये। सार यही है कि बाहरी रूप को न देखते हुए आंतरिक गुणों पर गौर करना चाहिए। बुजुर्गों को इस नसीहत की ज़रूरत ही इसलिए पड़ी होगी क्योंकि दुनिया रूप की दीवानी है।

हावत है कि हर चमकदार चीज़ सोना नहीं होती इसके बावजद लोग चमक-दमक के पीछे भागते हैं। चेहरा यानी रूप की चमक लोगों को लुभाती है। इस रूप मे चांदी की चमक जो छुपी हुई है। हिन्दी-उर्दू मे चेहरा, मुखड़ा,शक्ल के लिए प्रचलित रूप शब्द संस्कृत की रूप् धातु से आया है जिसका मतलब होता है सुंदर, चमक, कांति आदि। चांदी के लिए भी रूप्य या रौप्य शब्द प्रचलित है। अति शुद्ध स्वर्ण के लिए भी रूप्य शब्द है। रूप में निहित चमक या कांति का भाव किसी भी दृश्य पदार्थ या वस्तु को रूप बताता है। स्थिति या दशा भी रूप है और प्रतिबिंब या प्रतिच्छाया भी रूप ही है। तुलना के संदर्भ में “ के रूप में ” जैसे प्रयोग वाला रूप भी यही है। रूप में निहित चमक और चांदी-सोना जैसे अर्थ यही बताते हैं कि रूप का प्रयोग पहले सुंदर के अर्थ में ही सीमित था। बाद में शक्ल या चेहरे के अर्थ में सामान्यतः रूप शब्द प्रचलित हुआ। सौन्दर्य के प्रतीक चन्द्रमा से ही हमेशा सुंदर रूप की तुलना होती है। रूप में सु या कु उपसर्ग जोड़ कर कुरूप और सुरूप शब्द बने। खूबसूरत मनुश्य के लिए इस शब्द से बने कई नाम है जैसे रूपाली जो बना है रूपावली से। एक चेहरे में कई चेहरों की चमक ! रूपा, रूपिणी, स्वरूप, रूपल, रूपन, रूपिन, रूपक आदि। स्वांग धरने वाले कलाकार के बहुरूपिया विशेषण में भी यही रूप झांक रहा है।गौरतलब है कि चांदी नाम के पीछे भी चन्द्रमा की चमक ही छुपी है। सिनेमा के पर्दे के लिए अंग्रेजी में सिल्वर स्क्रीन शब्द है । इसके दो हिन्दी अनुवाद खूब चले थे एक था रजत-पट और दूसरा रूपहला-पर्दा। इनमें दूसरा भी इसी कड़ी का शब्द है। संस्कृत धातु चंद् से बना है चन्द्रमा जो निरंतर प्रकाशित रहता है। यही चंद् धातु चांदी के नामकरण की वजह बनी है।

मुद्रा के अर्थ में रूपया शब्द कई एशियाई देशों में प्रचलित है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, मलेशिया का इनमें नाम लिया जा सकता है। रूपए में भी चांदी की चमक दिखाई दे रही है। संस्कृत शब्द रौप्य का अर्थ

1917 में प्रचलित एक रूपए का नोट... सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वारेन हेस्टिंग्ज के ज़माने में बंगाल के कुछ बैंकों ने काग़ज़ के नोट छापने शुरू कर दिए थे...

होता है चांदी। प्राचीन काल में चांदी के सिक्के को रौप्यमुद्रा कहा जाता था। रोप्य, रूप्य , रूपकः अथवा रूपकम् भी इसके रूप बनते है। भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांतो में ईस्वी पूर्व से रौप्य मुद्राएं मिली हैं। गौरतलब है कि भारत में मुद्राओं को सिक्के की शक्ल में ढालने की तकनीक यूनानी लेकर आए थे। पश्चिमोत्तर भारत यूनानियों के द्वारा शासित था जाहिर है कि चांदी के सिक्कों के शुरुआती प्रमाण भी वहीं से मिले। यूं देश के हर हिस्से से चांदी के प्राचीन सिक्के मिलते रहे है। मौर्यकाल से लेकर इस्लामी शासन और फिर अंग्रेजी दौर मे भी रूपया भारत की प्रमुख मुद्रा बना रहा । मुद्रा के बतौर रूपया शब्द शेर शाह सूरी [1540 - 1545 ]के वक्त में शुरू होने का हवाला मिलता है जिसने इसी नाम से चांदी का सिक्का चलाया था। अंग्रेजों ने ही इस चांदी की खनखनाहट में काग़ज का करारापन पैदा किया। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वारेन हेस्टिंग्ज के ज़माने में बंगाल के कुछ बैंकों ने काग़ज़ के नोट छापने शुरू कर दिए थे। इसके बावजूद चांदी का सिक्का भी अंग्रेज चलाते रहे। जार्ज पंचम की तस्वीर वाला चांदी का सिक्का आज भी कई घरों में लक्ष्मीपूजन के दिन बुजुर्गों के बक्से से बाहर आता है। चांदी की शक्ल में रूपया 1946 तक बतौर मुद्रा डटा रहा फिर इसमें चांदी की चमक सिर्फ नाम भर को रह गई और इसके निर्माण में निकिल का प्रयोग होने लगाजो चमक में चांदी से कमतर नहीं है। स्वर्णमुद्रा को पीछे छोड़ कर चांदी की मुद्रा यानी रुपया आज दुनिया के कई देशों की प्रमुख मुद्रा के रूप में डटा हुआ है। रूपया यानी धन-सम्पत्ति। दुनिया चांदी यानी रूपए के पीछे ही पागल हैचाहे उसमें चांदी की चमक और खनक बाकी न रही हो।

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13 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हर शब्द का सार्थक अर्थ और उसकी उत्पत्ति आपके द्वारा जानकर अच्छा लग रहा है . अब तो बुद्धिमानो के बीच बैठ कर आपके शब्दों का अर्थ बताकर ख़ुद को उनकी श्रेणी मे साबित करूँगा

हिमांशु said...

बहुत अच्छी जानकारी-भरा आलेख.
पसन्द आया और मैने क्लिक भी कर दिया.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

फानी दुनिया में रूप का ही बोलबाला है। देखिए सब जगह रूप ही रूप दिखाई देगा। मगर रूप का मूल्य उतना ही होता है जितनी उस के पीछे अंतर्वस्तु छिपी है। किसी भी मुद्रा का मूल्य भी उतना ही होगा जितनी उस में अंतर्वस्तु छिपी होगी।

रंजन said...

बहुत रोचक, मेरी रुचि और बढ़ गई सिक्का संग्रह की!!

विवेक सिंह said...

आज तो रुपये की बातें पढकर धनी हो गए हम .

डॉ .अनुराग said...

हम तो सिर्फ़ शौक रखते थे...आज अर्थ मालूम पड़ा

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही लाजवाब जानकारी दी आपने रुपये की ! बहुत बढिया लगता है आपकी भाषा मे ये शब्दों और आज इस रुपये की यात्रा के बारे मे जानकर !

रामराम !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

फिर एक चमकदार पोस्ट
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आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

शब्दों के सफर का यह रूप बड़ा चमकदार है। चाँद सा...। अहा!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

चांदी के चाँद टुकडों के लिए
ईमान को बेचा जाता है,
इन्सान को बेचा जाता है -
ये गीत याद आ गया
सबसे बड़ा रुपैया भी सही है -
ये यात्रा भी रोचक रही अजित भाई

'Yuva' said...

काफी संजीदगी से आप अपने ब्लॉग पर विचारों को रखते हैं.यहाँ पर आकर अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉग पर भी आयें. ''युवा'' ब्लॉग युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अभिव्यक्तियों को सार्थक रूप देने के लिए है. यह ब्लॉग सभी के लिए खुला है. यदि आप भी इस ब्लॉग पर अपनी युवा-अभिव्यक्तियों को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो amitky86@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं. आपकी अभिव्यक्तियाँ कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, वैचारिकी, चित्र इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती हैं......नव-वर्ष-२००९ की शुभकामनाओं सहित !!!!

hempandey said...

रूप से रुपया. वाह ! एक और जानकारी से भरा रोचक लेख.

अल्पना वर्मा said...

बहुत ही अच्छा लेख है..बहुत सी नयी बातें पता चलीं.
आप का यह लेख संग्रहणीय है.

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