Sunday, March 31, 2013

हथियारों के साथ ‘पंचहत्यारी’

‘पंचहत्यारी’ शिवाजी की सैन्य शब्दावली का एक शब्द है जिससे ऐसा जान पड़ता है मानों इसका रिश्ता पाँच जनों की हत्या करने वाली से हो। दरअसल यह एक विशेषण, पद या उपाधि है जिसका अर्थ है बंदूक, भाला, ढाल, तलवार और तीर-कमान से सज्जित सैनिक या शिकारी पशु। यहाँ अभिप्राय मुख समेत चारों पंजों के ज़रिये शिकार को चीर-फाड़ करने से है। पंच से तो पाँच स्पष्ट है, हत्यारी क्या है ? दरअसल मराठी में हथियार को हत्यार ही लिखते और बोलते हैं। ‘पंचहत्यार’ का तात्पर्य पाँच हथियारों से है। हिन्दी में ‘हत्यार’ का आशय ‘हत्यारा’ से है और हत्यारी यानी हत्या करने वाली स्त्री।
ऐसे ही बनती है। मराठी में हथियार की 'थ' ध्वनि से 'ह' का लोप होकर 'त' शेष रहा। मध्य वर्ण 'य' चूँकि अन्तस्थ व्यंजन है इसलिए 'त' में निहित 'इ' स्वर य से जुड़ गया और 'त' का बर्ताव अर्धव्यंजन की तरह होने से हथियार का देशी रूप ‘हत्यार’ हुआ। उधर हिन्दी का ‘हत्यार’ दरअसल ‘हत्यारा’ से बन रहा है। इसके मूल में ‘हत्या’ है। जिसका अर्थ किसी के प्राण लेना है। संस्कृत के हत से हत्या का रिश्ता जोड़ा जाता है। वैसे वैदिकी में ‘हथ’ शब्द भी है जिसका अर्थ है मारना, जान लेना, धकेलना, वार करना आदि। इस हथ से साबित होता है कि वैदिक संस्कृत में भी हस्त से ‘हथ’ रूप बन चुका था जिसमें हाथ से सम्बन्धित का भाव था। गौर करें हथियार का रिश्ता दरअसल ‘हाथ’ से नज़र आता है। प्राकृत में ‘हत्थ’ शब्द का अर्थ हाथ है। ‘हत्थ’ का संस्कृत या वैदिक रूप ‘हस्त’ है। ये दोनों शब्द हिन्दी के हाथ के पुरखे हैं। हथेली, हथौड़ी, हत्था, हाथी जैसे अनेक शब्दों के मूल में हस्त ही है। ‘हथिया’ में ‘आर’ प्रत्यय लगने से हथियार बना जिसमें ऐसे उपकरण का आशय है जिसे हाथ में पकड़ कर या हाथों से फेंक कर कोई काम किया जाए या किसी पर घात किया जाए। मूलतः हथियार में शस्त्र का भाव है।
हथियार हिन्दी का बहुप्रयुक्त शब्द है। शस्त्रास्त्रों के लिए इसका इस्तेमाल आम है। मराठी में इसकी प्रकृति बदल गई और यह ‘हत्यार’ हो गया। हथियार से जुड़े कई मुहावरे प्रचलितहैं जैसे हथियार डालना यानी पराजय स्वीकार करना, हथियार चलाना यानी लड़ाई छेड़ना, हथियार बांधना या हथियार लगाना यानी संघर्ष के लिए सुसज्ज होना। चलताऊ या बाज़ारू हिन्दी में ‘हथियार’ शब्द का प्रयोग पुरुष जननेन्द्रिय के लिए भी होता। हथिया से ही ‘हथियाना’ क्रिया भी बनती है जिसका अर्थ है जबर्दस्ती कब्ज़ा करना, अपने स्वामित्व में लेना आदि।

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Friday, March 15, 2013

ऐश-ओ-आराम से ऐषाराम से

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क भी ‘ऐषाराम’ सुना है ? संस्कृत शब्दावली का शब्द लगता है। बौद्ध विहारों के संदर्भ में सुने हुए ‘संघाराम’ जैसा । यह हिन्दी का नहीं बल्कि मराठी का शब्द है और इसका आशय हिन्दी के ऐशो-आराम से है । यूँ हिन्दी का ऐशो-आराम मूलतः फ़ारसी के ‘ऐश-ओ-आराम’ से आ रहा है जिसमें आनंद, विलास या सुखोपभोग का आशय है। मराठी के ऐषाराम में ऐश और आराम है। हिन्दी वाले इसी तर्ज़ पर ऐशाराम सपने में भी नहीं लिखेंगे। ‘ऐश’ अरब का शब्द है और आराम फ़ारसी का। यूँ भारत ईरानी परिवार का होने के नाते आराम संस्कृत, हिन्दी में भी मौजूद है। मज़े की बात देखिए कि अरबी के ‘ऐश’ में शकर वाला ‘श’ है और षट्कोण वाला ‘ष्’ संस्कृत की अपनी खूबी है। इसके बावजूद मराठी ने ऐश औ आराम से ‘ऐषाराम’ यूँ बना लिया कि किसी को इसके विदेशी होने का शक भी न होगा। यूँ माधव ज्यूलियन के मराठी-फ़ारसी कोश में ‘ऐषाराम’ का ‘ऐशाराम’ रूप ही दिया गया है मगर यू.एम.पठाण के मराठी-फ़ारसी कोश में इसका रूप “ऐषाराम’ है।
आज हर कोई ऐश करने की जुगत में लगा हुआ है। बिना काम किए अच्छी गुज़र बसर, यानी ऐश। फ़ारसी ने हमें ‘ऐश’ सिखाया अलबत्ता शब्द फ़ारसी में भी अरबी से दाखिल हुआ। अरबी में इसकी धातु ऐन-या-शीन (ع-ى-ش) है जिसमें सुख के साथ जीना, चैन की गुज़र-बसर या विलासयुक्त जीवन का आशय है और इससे बनी आश क्रिया में रोज़, रोटी, जीवनचर्या जैसे भाव हैं। दिलचस्प बात यह कि किसी ज़माने में ऐश का वह मतलब नहीं था जो आज प्रचलित हो चुका है। अरबी में ऐश का मूल अर्थ था रोटी, रोज़ी, आजीविका, जीवन, किसी के साथ रहना आदि। ऐश के दार्शनिक अर्थ पर विचार करें तो यह सच भी है। इन्सान को हवा-पानी तो ईश्वर ने मुफ्त में दिया। मगर इसके बूते उसकी जिंदगी चलनी मुश्किल थी। उसने तरकीब लगाई। मेहनत की और रोटी बना ली। बस, उसकी ऐश हो गई। हर तरह से वंचित व्यक्ति के लिए सिर्फ रोटी ही जीवन है। रोटी जो अन्न का पर्याय है, अन्न से बनती है। लेकिन बदलते वक्त में ऐश में वे तमाम वस्तुएँ भी शामिल हो गईं जिनमें से सिर्फ रोटी को गायब कर दिया जाए तो उस तथाकथित ऐश से हर कोई तौबा करने लग जाए।
ऐश के मूल आश के साथ अरबी उपसर्ग ‘म’ लगने से बनता है मआश जो इसी कड़ी से जुड़ता है। मद्दाह के कोश में मआश का अर्थ है जीविका, रोज़ी, जागीर जो किसी काम के इनामस्वरूप मिले। मआशदार यानी जागीरवाला। मआशी यानी जीविका सम्बन्धी और मआशियात यानी अर्थशास्त्र। मआश की मौजूदगी वाला फ़ारसी का हिन्दी का एक मज़ेदार शब्द हिन्दी में आकर रच-बस गया है- बदमाश। इसमें फारसी के बद उपसर्ग की भी मौजूदगी देखी जा सकती है। इस बद् यानी bad शब्द का अंग्रेजी के bad बैड से अर्थसाम्य का रिश्ता तो है मगर दोनों का जन्म से रिश्ता नहीं है। बद् यानी बुरा, निकृष्ट, अशुभ, खराब, अपवित्र, अमंगल, गिरा हुआ, बिगड़ा हुआ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक बद् शब्द पुरानी फारसी के ‘वत’ से बना है । यह भी सम्भव है कि इसकी व्यत्पत्ति का आधार संस्कृत की ‘पत्’ धातु हो जिसमें नैतिक रूप से गिरना, अधःपतन, नरक में जाना जैसे भाव शामिल हैं। पतित, पातकी, पतन जैसे शब्द भी इससे ही बने हैं। बहुत सम्भव है कि फारसी के बद् की रिश्तेदारी पत् से हो। अरबी के ‘मआश’ का मतलब होता है आजीविका, जीवन, रोज़ी। इस तरह बदमाश का शुद्ध रूप हुआ बदमआश जिसका मतलब है गलत रास्ते पर चलनेवाला, बुरे काम करनेवाला, ग़लत तरीक़ों से रोज़ी कमाने वाला, जिसके जीने का ढंग ग़लत हो। मआशदार का अर्थ अय्याश है।
ऐश से ही बनता है अय्याश (ऐयाश) जिसका अर्थ है विलासिता से रहने वाला, कामुक, लम्पट, ऐश करने वाला। अय्याश के लिए एक और प्रचलित शब्द ऐशबाज भी है। ऐशबाजी, अय्याशी जैसे शब्द आरामतलबी और आडम्बरपूर्ण जीवन शैली के संदर्भ में इस्तेमाल होते हैं। अय्याश का जिक्र होते ही एक नकारात्मक भाव उभरता है। सुखविलास के सभी साधनों का अनैतिक प्रयोग करनेवाले के को आमतौर पर अय्य़ाश कहा जाता है। मद्दाह साहब के शब्दकोश में तो लोभी, भोगी के साथ व्यभिचारी को भी अय्याश की श्रेणी में रखा गया है। यह अय्याश शब्द भी ऐश की ही कतार में खड़ा है और उसी धातु से निकला है जिसका मूलार्थ जीवन का आधार रोटी थी मगर जिसका अर्थ समृद्धिशाली जीवन हो गया। उर्दू-फारसी-अरबी में लड़कियों का एक नाम होता है आएशा / आयशा ayesha जो इसी कड़ी का शब्द है मगर इसमें सकारात्मक भावों का समावेश है। आयशा का मतलब होता है समृद्धिशाली, सुखी, जीवन से भरपूर। पैगम्बर साहब की छोटी पत्नी का नाम भी हजरत आय़शा था और उन्हें इस्लाम के अनुयायियों की माँ का दर्जा मिला हुआ है।
ऐशो-आराम का दूसरा पद यूँ तो फ़ारसी शब्द है मगर यह इसी अर्थवत्ता अर्थात खुशी, प्रसन्नता या इन्द्रिय आनंद के साथ संस्कृत और हिन्दी में भी है। आराम: मूलत: रम् धातु से बना है जिसमें आराम, अन्त, उपसंहार, बंद करना, स्थिर होना, रुकना, ठहरना जैसे भाव शामिल हैं। इन्द्रियों को शिथिल करने अथवा उनकी क्रियाशीलता को रोकने से शांति उपजती है। यह शांति ही आनंद, उल्लास, प्रसन्नता और तृप्ति का सृजन करती है। आराम शब्द के मूल में यही सब बाते हैं। इसमें ‘वि’ उपसर्ग लगाने से बने विराम शब्द में भी थमना, रुकना, बंद करना, उपसंहार जैसे भाव हैं मगर इसका अर्थ आराम नहीं होता है बल्कि किन्हीं क्रियाओं या स्थितियों के अंत का इसमें संकेत है। आराम को भी विराम दिया जाता है अर्थात विराम दरअसल सक्रियता की भूमिका भी हो सकती है। भगवान राम के नाम का मूल भी यह रम् धातु ही है। राम का अर्थ भी आनंद देने वाला ही होता है। इसके अलावा रमण, रमणीय, रमणी, रमा, राम, संघाराम, रम्य, सुरम्य, मनोरम, रमाकान्त, रमानाथ, रमापति जैसे शब्द भी इसी कड़ी में हैं। अवेस्ता यानी ईरान की प्राचीन भाषा ने आरामः को ज्यों का त्यों अपना लिया। फिर ये आधुनिक फारसी में भी जस का तस रहा। फारसी से ही उर्दू में भी आराम आया। यहां इस शब्द का अर्थ बाग-बगीचा न होकर शुद्ध रूप से विश्राम के अर्थ में है।

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Sunday, March 10, 2013

‘बिलंदर’ की बुलंदी

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प त्रकार एम. हुसैन ज़ैदी की मुंबई माफ़िया पर लिखी क़िताब डोंगरी टू दुबई मराठी अनुवाद पढ़ते हुए एक नए शब्द से साबका पड़ा- बिलंदर। दाऊद इब्राहिम के अंडरवर्ल्ड में बढ़ते असर के संदर्भ में उसे बिलंदर कहा गया। कुछ कुछ अंदाज़ तो था कि इस बिलंद का हिन्दी-फ़ारसी के बुलंद से रिश्ता होना चाहिए। जिसमें पक्का, परम, कारगुज़ार, कद्दावर, असली जैसी अर्थवत्ता है। फ़ारसी शब्द चोला बदल कर जिस तरह से मराठी भाषा में पैठ गए हैं, वैसा हिन्दी में नहीं है। इस पर विस्तार से कभी लिखेंगे, फ़िलहाल बात बुलंद की। हिन्दी में भी बुलंद का एक रूप बिलंद होता है पर यह क़रीब-क़रीब अप्रचलित है। हिन्दी फ़ारसी में जहाँ बुलंद, बुलंदी में सकारात्मक भाव हैं वहीं वहीं मराठी के बिलंदर में आमतौर पर ठग, लुच्चा, चोर, भामटा या नीच जैसी अर्थवत्ता है। अर्थात बुलंद में निहित तमाम विशेषताएँ निम्न श्रेणी में प्रयुक्त होती हैं। हालाँकि सकारात्मक प्रयोग भी होता है पर कम है। देखा जाए तो बिलंदर का इस्तेमाल हिन्दी में किया जा सकता है।
हिन्दी-उर्दू के बुलंद, बुलंदी में ऊँचाई, उच्चता का भाव है। बुलंद इरादे, बुलंद हौसला जैसे वाक्याँश की मुहावरेदार अर्थवत्ता से यह ज़ाहिर है। इसके अलावा गुरुतर, भव्य, शीर्ष, उत्तुंग, मुख्य, भारी, प्रमुख, प्रतिष्टित, प्रतापी जैसे आशय भी इसमें हैं। मराठी में बुलंद अल्पप्रचलित है और बिलंद, बिलंदी या बिलंदर जैसे शब्द यहाँ मौजूद हैं। बिलंद रूप हिन्दी में भी है। बिलंदर मराठी का अपना आविष्कार है। फ़ारसी में बिलंदर नहीं है। वहाँ बुलंद ही चलता है। तब भी शुद्धता के नज़रिये से बलंद उच्चार ज़्यादा सही माना जाता है। बुलंद फ़ारसी ज़बान का शब्द है और इसके मूल में जो उच्चता, श्रेष्ठता, परम या खरा असल जैसा भाव है इसका रिश्ता बहुत गहराई से न सिर्फ इंडो-ईरानी भाषा परिवार से जुड़ता है बल्कि इसकी अर्थछायाएं पश्चिम एशियाई सांस्कृतिक आधार वाली भाषाओं यानी सुमेरी ( मेसोपोटेमियाई), बाबुली (बेबिलोनियन) और इब्रानी (हिब्रू) में भी नजर आती है।
सुमेरी यानी मेसोपोटेमियाई भाषा में यह शब्द बेल है और हिब्रू में बाल Baal के रूप में मिलता है। बाल शब्द बहुत महत्वपूर्ण है और इसकी अर्थवत्ता बहुत व्यापक है जिसमें शीर्षस्थ, प्रकाशमान, ऊपरी, बड़ा, परम शक्तिमान, भव्य, देवता अथवा स्वामी जैसे भाव समाए हैं। हिन्दी, उर्दू व फारसी में भी यह प्रचलित है। बाल में निहित ऊँचाई दूध की ऊपरी परत बालाई में नज़र आती है। हिन्दी में इसे मलाई कहते हैं जो फ़ारसी बालाई से ही बना है। लोगों को रत्ती भर खबर हुए बिना अंजाम दी गई कारगुजारी को बाले बाले (बाला) कहते हैं। यहाँ ऊपर ऊपर मामले को निपटाने का भाव ही प्रमुख है। पुराने ज़माने में मकान की ऊपरी मंजिल को बालाखाना कहते थे। बाला यानी ऊपर और खाना यानी स्थान या कोष्ठ। अग्रेजी की बालकनी में भी ऊँचाई का ही भाव है और बालाख़ाना से बालकनी का ध्वनिसाम्य भी गौरतलब है।
सुमेर और अक्कादी मूल से उठ कर ही बाल शब्द फ़ारसी में भी दाख़िल हुआ। बाला ऐ ताक़ का अर्थ है किसी चीज़ को ऊपर रख देना। बालानशीं का अर्थ होता है सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च, सर्वोत्तम। मराठी में कही हुई बात, उल्लेख, ज़िक़्र, चर्चा के लिए फ़ारसी के मज़क़ूर शब्द का खूब प्रयोग होता है। उर्दू में मज़क़ूरे-बाला टर्म का प्रयोग ‘उपरोक्त’ यानी ऊपर लिखी हुई बात की तर्ज़ पर किया जाता है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की ‘भ’ ध्वनि फारसी, ईरानी समेत सेमिटिक भाषाओं में जाकर ‘ब’ में बदलती रही है। संस्कृत के भर्ग में भी ऊँचाई का भाव है। इसका फारसी रूप बुर्ज होता है जिसका अर्थ मीनार या ऊंचा गुम्बद है। बुर्ज का huangshan ही यूरोपीय भाषाओं में बर्ग, बरो में रूपांतर होता है। कई स्थान नामों में यह जुड़ा नजर आता है। प्राचीन मनुष्य की शब्दावली और उसकी अर्थवत्ता का विकास प्रकृति के अध्ययन से ही हुआ था।
प्रायः ऊँचाई को इंगित करनेवाले शब्दों का मूलार्थ रोशनी, चमक, दीप्ति था। प्रकाशमान वस्तु के रूप में मनुष्य ने आसमान में चमकते खगोलीय पिण्डों को ही देखा था। पूर्व वैदिक भाषाओं में ‘भा’ ध्वनि में इसीलिए ऊंचाई के साथ चमक, कांति का भाव भी निहित है। संस्कृत के भर्गस् में एक साथ चमक, प्रकाश, भव्यता का भाव निहित है। The Nostratic macrofamily: a study in distant linguistic relationship पुस्तक में एलन बोम्हार्ड, जॉन सी कर्न्स ने विभिन्न भाषा परिवारों में प्रकाश और ऊंचाई संबंधी समानता दर्शानेवाले कई शब्द एक साथ रखे हैं। प्रोटो एफ्रोएशियाटिक भाषा परिवार की धातुओं bal और bel का अर्थ भी यही है और प्रोटो सेमिटिक के bala / bale में भी यही भाव है।
स्पष्ट है कि प्राचीन भारोपीय ध्वनि भा यहां बा में बदल रहा है। गहराई से देखें तो भा ध्वनि में निहित चमक का भाव विभा, विभाकर, भास्कर जैसे शब्दों में साफ है। तमिल-तेलुगू के pala pala में भी कांति, दीप्ति, चमक का भाव है। भा के बा में बदलने की मिसाल वजन के अर्थ में हिन्दी के भार और फारसी के बर या बार (बारदान, बारदाना, बोरी) से भी स्पष्ट है। ध्यान दें, बहुत महीन अर्थ में यहां भी ऊँचाई का भाव है। जिसे ऊपर उठाया जाए, वही भार है। अंग्रेजी के बर्डन में यही बार छुपा हुआ है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। रूस की बोल्शेविक क्रांति दुनिया में प्रसिद्ध है। बोल्शेविक का शाब्दिक अर्थ हुआ बहुसंख्यक। मगर इसमें भी बाल यानी सर्वशक्तिमान की महिमा नजर आ रही है।

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Tuesday, March 5, 2013

बर्ताव, आचरण और व्यवहार

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हि न्दी की प्रचलित शब्दावली में ‘बर्ताव’ शब्द का शुमार भी है। व्यवहार, ढंग, आचरण या शैली के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग होता है मसलन- “उनके बर्ताव को सही नहीं कहा जा सकता”। हिन्दी शब्दकोशों में हालाँकि बर्ताव की वर्तनी ‘बरताव’ बताई गई है मगर अब आम चलन बर्ताव का ही है। बर्ताव के मूल में संस्कृत ‘वर्तन’ है जिसमें घूमना, फिरना, जीने का ढंग या व्यवहार आदि आशय है। वर्तन के मूल में वैदिक धातु ‘वृत’ है। इसमें भी मूलतः घूमना, फिरना, घेरा, गोल, टिके रहना, होना, दशा या परिस्थिति आदि भाव हैं। ‘वृत’ से बने ‘वृत्त’ में घेरा या गोलाई स्पष्ट है। आचरण, स्वभाव के संदर्भ में ‘वृत्ति’ शब्द का प्रयोग भी हम करते हैं जैसे-“वह अच्छी वृत्ति का व्यक्ति है।”। आचरण दरअसल क्या है? इसमें ‘चरण’ है जो चलते हैं। चरण जो करते हैं, वही चलन है अर्थात ‘चाल-चलन’ ही आचरण है।
वर्तन में निहित घूमना, फिरना, जीने का ढंग या व्यवहार सम्बन्धी जो आशय हैं वे ‘वृत’ में निहित घूमने-फिरने के भाव से जुड़े हैं। व्यक्तित्व घूमने-फिरने से ही बनता है। विचार भी इससे ही बनते हैं और आचरण भी। ध्यान रहे विचार में भी ‘चर’ यानी गति का भाव है। मानसिक विचरण से ही विचार बनते हैं। वर्तन में भी यही सब है। ‘वृत्ति’ का एक अर्थ जीविका भी है और दूसरा अर्थ आचरण भी। जीविका के लिए भी घूमना पड़ता है, गतिशील रहना पड़ता है इसीलिए वृत्ति का एक अर्थ आजीविका है और दूसरा अर्थ आचरण। ‘वर्त’ में घूमने का भाव एक अलग ढंग से यात्रा करता हुआ ‘वर्तिका’ जैसा शब्द बनाता है जिसका अर्थ है दीये की बाती। कपास को जब उंगलियों के ज़रिये घुमाया जाता है, उसका वर्तन किया जाता है तो वर्तिका बनती है। संस्कृत में इसके लिए ‘वर्ती’ या ‘वर्ति’ शब्द भी हैं। हिन्दी में इससे ही ‘बत्ती’ या बाती जैसे शब्दों का निर्माण होता है। कपास के वर्तन से ही धागा बनता है जिसे सूत कहते हैं जिसका मूल सूत्र है। आर्य भाषाओं में व ध्वनि ब में बदलती है। वर्ति > बत्ती होता है। मराठी में वर्तिका > वट्टिका > बट्टिआ > वाट बनता है। ‘वाट लगना’ आज लोकप्रिय मुहावरा है जिसका अर्थ है किसी चीज़ को नष्ट कर देना। मूल भाव है जल कर नष्ट होना। दीये की बत्ती जल कर नष्ट ही होती है। दूसरी ओर किसी चीज़ को जलाने के लिए उसे बत्ती छुआई जाती है। हिन्दी में ‘बत्ती देना’ मुहावरा है जिसका अर्थ भी नष्ट करना ही है।
वर्तन में गति के साथ साथ स्थिरता या ठहराव भी है। घुमाव, वृत्त गति से वर्तन में भी गति का आशय व्यापक रूप लेता है और इसमें चाल-ढाल, बोल-चाल, हाव-भाव का समावेश होता है। लगातार ‘वर्तन’ के बाद ही कोई विशिष्ट गुण वृत्ति के रूप में स्थिर होता है। वेतन के रूप में वृत्ति में भी यही स्थिरता है। प्रतिदिन, प्रतिमाह या प्रतिवर्ष दिया जाने वाला तयशुदा मेहनताना। वृत्ति में ही व्यवसाय, रोज़गार या पेशा का भाव भी आ गया। रसोई में काम आने वाले पात्र गोल होते हैं। ये बरतन कहलाते हैं। यह भी वर्तन से बना शब्द है। वर्तन में हिन्दी का आव प्रत्यय लगने से बर्ताव शब्द बनता है जिसमें उसी ढंग से आचरण या व्यवहार की अर्थवत्ता स्थापित होती है जिसकी ऊपर व्याख्या की गई है। वर्तन से ‘बरतना’ क्रिया भी बनती है। बरतने का भाव ही दरअसल बर्ताव है। किन्हीं लोगों के किए जाने वाले व्यवहार, किन्ही वस्तुओं के उपयोग के तरीके को बरताव कहते हैं। हमारे हाव-भाव, बोल-चाल और अन्य क्रियाएँ जिनके ज़रिये हम लोक के सम्पर्क में आते हैं, बरताव के दायरे में आती हैं।
आचरण शब्द बर्ताव की तुलना में ज्यादा व्यापक है। जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि आचरण में ‘चलना’ यानी ‘चर’ क्रिया प्रमुख है। आ+चरण यानी चल कर पहुँचना, यह रूढ़ अर्थ हुआ। चरित्र में भी यही ‘चर’ है। परिनिष्ठित भाषा में इसमें निहित ‘चल कर पहुँचना’ वाले भाव का विस्तार किसी काम को करने की शैली में प्रकट होता है। कहना, सुनना, ओढ़ना, पहनना सब कुछ इसमें आता है। ‘चाल चलन’ मुहावरे में आचरण के तमाम भाव हैं। बोल-चाल, हाव-भाव सब कुछ। आचरण या बर्ताव के लिए हिन्दी में ‘व्यवहार’ शब्द का प्रयोग खूब होता है जो आपटे कोश के मुताबिक वि + अव + हृ के मेल से बना है। संस्कृत की ‘हृ’ धातु में ग्रहण करना, लेना, प्राप्त करना, ढोना, निकट लाना, पकड़ना, खिंचाव या आकर्षण, हरण जैसे भाव हैं। संस्कृत-हिन्दी के ‘अव’ उपसर्ग की अनेक अर्थछटाएँ हैं जिनमें एक व्याप्ति भी है। इस तरह ‘वि’ उपसर्ग के अनेक अर्थ आयामों में क्रम, व्यवस्था का समावेश भी है। कुल मिला कर व्यवहार में किसी कार्य को व्यवस्थित करना। बाद में इसमें आचरण, बर्ताव, व्यापार, लेन-देन, कार्यव्यापार, शिष्टाचार जैसे अर्थ भी शामिल हो गए। बर्ताव की तुलना में आचरण और ज्यादा व्यापक है और आचरण की तुलना में व्यवहार का दायरा और भी विशाल है। आचरण और बर्ताव दोनों ही व्यवहार में शामिल हैं मगर व्यवहार में शामिल लेन-देन, व्यापार जैसी अर्थवत्ता इन दोनों शब्दों में नहीं है।

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Friday, March 1, 2013

असली ‘दारासिंह’ कौन?

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स मूचे भारतीय उपमहाद्वीप में ‘दारा’ नाम शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पश्चिम में पेशावर से लेकर पूर्व में पूर्णिया तक ‘दारा’ नामधारी लोग मिल जाएँगे जैसे हिन्दुओं में दारा के साथ ‘सिंह’ का प्रत्यय जोड़ कर दारासिंह जैसा प्रभावी नाम बना लिया जाता है वहीं मुस्लिमों में ‘खान’ या ‘अली’ जैसे प्रत्ययों के साथ दाराख़ान या दाराअली जैसे नाम बन जाते हैं। कहते हैं यह ख्यात पहलवान, अभिनेता दारासिंह के नाम का प्रभाव है कि ‘दारा’ नाम के साथ ताक़त जुड़ गई। चलिए मान लिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाँचवे-छठे दशक में उनके नाम का वो ज़हूरा था कि वे एक चलती-फिरती किंवदंती बन गए थे। उनका नाम मुहावरे की तरह इस्तेमाल होने लगा और कहावतें तक चल पड़ीं। सवाल यह है कि वो ‘दारा’ कौन था जिससे प्रभावित होकर दारासिंह के पिता ने अपने बेटे का नाम रखा और इस नाम के मायने क्या हैं ?
शब्दों का सफ़र में अक़्सर इतिहास में गोते लगाने की नौबत आ जाती है। इतिहास में ऐसे क़िरदार या प्रतीक मशहूर हो जाते हैं जिनकी खूबियाँ मनुष्य खुद में देखना चाहता है। नतीजतन वे लोग प्रतीक / संज्ञा-नाम में बदल जाते हैं। लोग अपनी संतानों, नायक-नायिकाओं को उन नामों से बुलाने लगते हैं। ऐसा ज्यादातर पुरुषवाची नामों के साथ ही होता है। उदाहरण कई हैं जैसे राम ( रामदयाल, रामकृपाल, रामनरेश, आयाराम, गयाराम आदि), कृष्ण (रामकृष्ण, हरिकृष्ण, रामकिशन आदि), बहादुर (वीरबहादुर, रामबहादुर), सिंह (रामसिंह, वीरसिंह, बहादुरसिंह) आदि कई नाम हैं। इसी कड़ी में दारा का नाम भी आता है जो ईरान के प्रसिद्ध हखामनी वंश के संस्थापक साइरस प्रथम जितना ही महान, वीर और महत्वाकांक्षी नरेश था। इस राजवंश का चौथा शासक था। दरहक़ीक़त हम जिस दारा की बात कर रहे हैं, वह इतिहास में डेरियस प्रथम के नाम से जाना जाता है। फ़ारस के इतिहास में दो साइरस और तीन डेरियस हुए हैं।
यूँ तो तीनों ही डेरियस वीर, लड़ाके थे मगर इतिहास में दारा के नाम से जो डेरियस प्रसिद्ध हो गया वह चौथा हखामनी शासक डेरियस प्रथम ( 521- 486 ) ही था। इतिहास में फ़ारस के हख़ामनी वंश को ही भारत पर चढ़ाई करने वाला पहला विदेशी वंश माना जाता है। इस वंश के संस्थापक साइरस ने 551-530 के बीच अपना साम्राज्य पेशावर से लेकर ग्रीस तक फैला लिया था। डेरियस का पिता विष्तास्पह्य भी हखामनी राजवंश का क्षत्रप था। समझा जाता है कि उसने साइरस के अधीन भी काम किया था। बहरहाल, डेरियस ने साइरस महान की आन, बान और शान को कायम रखा था इसीलिए उसके जीवनकाल में ही उसे भी डेरियस महान कहा जाने लगा था। हखामनी वंश की राजधानी पर्सेपोलिस के शिलालेखों पर ऐसा ही दर्ज है। पुरातत्व पर्यटन के लिए मशहूर पर्सेपोलिस शहर डेरियस की राजधानी हुआ करता था। ऐसा माना जाता है कि यह शहर उसने ही बसाया था। पर्सेपोलिस का अर्थ हुआ परशियनों का शहर। ध्यान रहे ईरान का पुराना नाम फ़ारस था जिसके मूल में अवेस्ता का पार्श (संस्कृत का पर्शु) शब्द था। पार्श से ही फ़ारस बना। ग्रीक संदर्भों में इसे पर्शिया कहा गया। ग्रीक भाषा के पोलिस प्रत्यय का अर्थ वही होता है जो हिन्दी में पुर या पुरी का होता है। इस तरह पर्सेपोलिस का अर्थ हुआ पर्शुपुरी अर्थात पारसिकों की राजधानी हुआ।
प्राचीन फ़ारसवासी अग्निपूजक थे। भारत के पारसी उन्हें के वंशज हैं। इस्लाम की आंधी में उजड़ कर वे भारत आ बसे, फ़ारस के पारसी मुसलमान होते चले गए। दारा का मूल दरअसल डेरियस भी नहीं है। पर्सेपोलिस के शिलालेख के मुताबिक उसका शुद्ध पारसिक उच्चारण दारयवौष है। शिलालेख में दर्ज़ कीलाक्षर लिपि वाले मज़मून का रोमन और देवनागरी उच्चार इस तरह है- Dârayavauš दारयवौष xšâyathiya क्षायथिय vazraka वज्रक xšâyathiya क्षायथिय xšâyâthiânâm क्षायथियानाम xšâyathiya क्षायथिय dahyunâm दह्युनाम Vištâspahya विष्तास्पह्य Haxâmanišiya पुश puça हक्ष्मनिषिय hya ह्य imam इमम taçaram तशराम akunauš अकौनष। इसका अर्थ है- “यह प्रासाद हखामनी वंश के विस्ताष्पह्य के पुत्र और महाराज, राजाधिराज, राज्याधिपति दारयवौष के द्वारा बनवाया गया है”। विद्वानों ने इसे पहलवी का प्राचीन रूप बताया है जो अवेस्ता के क़रीब थी। अवेस्ता को संस्कृत की मौसेरी बहन समझा जाता है।
यह समझना आसान है कि अवेस्ता के दारयवौष का ही ग्रीक रूप डेरियस हुआ होगा। ग्रीक इतिहासकार हेरियोडोटस के उल्लेखों से यही रूप प्रचलित हुआ। इसी तरह वर्णसंकोच के साथ दारयवौष का परवर्ती रूप दारा हुआ। दारयवोष के रूपान्तर की दो दिशाएँ रहीं। दारयवौष > दारयवश >दारयस > दारा (फ़ारसी) > डेरियस (ग्रीक) । पश्चिम की ओर यह डेरियस हुआ जबकि पूर्व की ओर इसका रूपान्तर दारा हुआ। दरअसल का दारा रूप ही अब व्यावहारिक तौर पर प्रचलन में है। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश आदि में दारा कई नामों में मौजूद है जैसे- दाराबख्त, दाराअली, दाराखान, वीरदारा, दारा शुकोह, दाराप्रसाद, दारानाथ, दारासिंह आदि। दारायवौष की पूर्व में दारा के नाम से प्रसिद्धी की बड़ी वजह उसके पंजाब और सिंध अभियानों की कामयाबी रही। वर्तमान पाकिस्तान का पेशावर प्रान्त दारा के आधिपत्य में था। पश्चिम में मिस्र, ग्रीस, उत्तर में आमू दरिया और पूर्व में पंजाब-सिंध दारा के साम्राज्य की सीमाएँ थीं। यही उस काल का ज्ञात विश्व भी था।
देखते हैं दारा का, प्रकारान्तर से दारियवौष का अर्थ क्या है, इसका जन्मसूत्र क्या है। आज की फ़ारसी में दारा का दाराब रूप भी मिलता है। भारत-ईरानी भाषाओं के अध्येता क्रिश्चियन बार्थोलोमिए ने (1855-1925) ने दारयवौष को अवेस्ता का शब्द माना है और इसे जरथ्रुस्ती शब्दावली में स्थान दिया है। इसका अर्थ है धारण करने वाला। राज्य को धारण करना, प्रजा को धारण करना, शासन को धारण करना, नायकोचित गुणों को धारण करना और सद्गुणों को धारण करना इसमें निहित है। दारियवौष के मूल में प्रोटो भारोपीय धातु dher है। भाषाविद् जूलियस पकोर्नी इसका रिश्ता वैदिक धातु धर् से जोड़ते हैं। धर् में उठाने, सम्भालने, देखभाल करने, अंगीकार करने जैसे भाव है। धारण करने में ये सारे भाव निहित हैं। धर् से संस्कृत, हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक शब्द बने हैं। पृथ्वी को धारिणी कहा जाता है। धरती में यही धर है। आधार यानी टिकाव, पड़ाव, फाऊंडेशन में भी यही ‘धर’ है जिसमें स्थिरता है। डॉ रामविलास शर्मा ‘धर्’ के एक रूप ‘स्थर’ की कल्पना करते हैं। संस्कृत ‘दारु’, ‘द्रुम’, ‘तरु’, ग्रीक ‘द्रुस’, अंग्रेजी के ‘ट्री’ में दरअसल धर् के रूपान्तर ‘दर्’ और ‘तर्’ हैं । यह भी दिलचस्प है की ‘धर’ में निहित स्थिरतामूलक धारण करने के भाव से ही गतिवाचक धारा शब्द भी बनता है । धारा वह जो धारण करे, अपने साथ ले जाए । धर, धरा के मूल में धृ धातु है । स्थिरता का परम प्रतीक ध्रुव का जन्म भी इसी धृ धातु से हुआ है । दारयवौष् से बने दारा का अर्थ हिन्दी फ़ारसी में सर्वशक्तिमान, भगवान, राजा, पालक आदि है।
स्पष्ट है कि ताक़त, वीरता आदि के पर्याय के रूप में दारा नाम डेरियस अर्थात दारयवौष् से आ रहा है। इसका प्रचार अनेक देशों में हुआ। नायकोचित नामकरण की अभिलाषा में अनेक दारा सामने आए मगर भारत में तो पंजाब के दारासिंह की ख्याति ने डेरियस द ग्रेट को भी पछाड़ दिया।

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Monday, February 25, 2013

क़िस्सा दक़ियानूस का

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दु नियाभर में प्रचलित मुहावरों-कहावतों में शासकों या प्रभावशाली लोगों का अत्याचारी, सनकी चरित्र भी झलकता है। ऐसे क़िरदारों में रावण, कंस, नीरो या तुग़लक जैसे नाम स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। कुछ नामों के पीछे न तो कहानी नज़र आती है न ही क़िस्सा। ऐसा ही एक नाम है दक़ियानूस जो सिर्फ़ एक संज्ञा भर नहीं बल्कि एक प्रसिद्ध रोमन सम्राट था। आज के तुर्की और प्राचीन अनातोलिया का इफ़ेसस शहर इसके राज्य में शामिल था। अंधविश्वासी या पुरानी सोच वाले व्यक्ति को दक़ियानूस कहते हैं। बोलचाल की हिन्दी में यह शब्द खूब प्रचलित है। इसी तरह दकियानूसी शब्द के तहत पुरानी सोच वाला, रूढ़ीवादी और अधिक उम्र वाला, कोई बेकार, पुरानी और मनहूस चीज़ या पुरातनपंथी विचारधारा आती है। मसलन दक़ियानूसी लोग, दक़ियानूसी बातें, दक़ियानूसी चीज़े। अरबी-फ़ारसी में दक़ियानूस शब्द का सही रूप दक़्यानूस है।
हिन्दी-फ़ारसी के कोशों में अव्वल तो दक़ियानूस के संदर्भ में ज्यादा जानकारियाँ नहीं मिलतीं। कुछ कोशों में तो इसका संदर्भ बतौर रोमन शासक भी नहीं मिलता और कहीं पर उसके अत्याचारी सम्राट होने जितनी ही संक्षिप्त जानकारी मिलती है। ग्रीक संदर्भों में दकियानूस का उल्लेख बतौर देसियस मिलता है। पश्चिम एशिया के समाज-संस्कृति पर यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की गहरी छाप पड़ी है। ईसाइयत पर यहूदी धर्म का असर और इस्लाम पर अपने पूर्ववर्ती यहूदी और ईसाई चिन्तन का असर नज़र आता है। बाईबल के गोस्पेल और कुरान के सूरों (सुरह) की अनेक कथाओं में समानता से यह साबित भी होता है। बाइबल और कुरान दोनों में ही थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ देसियस या दक़्यानूस के बारे में लगभग एक जैसी ही कहानी है।
ईसा के जन्म के वक़्त पश्चिम एशिया और समूचे यूरोप में मूर्तिपूजा का ही बोलबाला था। ईसा के बाद भी रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा का चलन था। किन्हीं संदर्भों में इतिहास प्रसिद्ध इस निरंकुश सम्राट को 359 ईपू. का बताया गया है मगर यह भ्रामक है। दक्यानूस यानी देसियस का काल ईसा के क़रीब ढाई सदी बाद का है। रोमन साम्राज्य में शासकों की मूर्तिपूजा सम्बन्धी सनक, अत्याचार और उत्पीड़न का इतिहास ईसा के सूली पर चढ़ने के बाद सातवीं आठवीं सदी तक भी जारी रहा रहा। देसियस या दक़्यानूस का रिश्ता अनातोलिया से जोड़ा जाता है और माना जाता है कि तुर्की के प्रसिद्ध तारसस और इफ़ेसस शहरों पर उसका शासन था। ईसाई धर्म के महान प्रचारक सेंट पॉल का जन्म तारसस में ही हुआ था। माना जाता है कि कि तारसस का नाम तार्कु के आधार पर पड़ा है जो हित्ती भाषा का शब्द है। इस इलाके में बसने वाले आदिजन हिट्टाइट ही थे। तार्कु एक देवता था जिसकी पूजा हित्तीजन करते थे। वैसे अधिकांश संदर्भो में इफ़ेसस से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। यह वही इफ़ेसस है जहाँ का आर्टेमिस का मंदिर सात अजूबों में गिना जाता है। अरब-फ़ारसी संदर्भों में इफ़ेसस को अफ़सूस कहा जाता है।
देसियस मूर्तिपूजा में विश्वास रखता था। उसका शासन बड़ा सख़्त और पूजा-विधान के आधार पर चलता था। कहने की ज़रूरत नहीं कि ईसाइयत के बढ़ते प्रभाव की वजह से रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा के लिए आग्रह ज्यादा बढ़ा-चढ़ा था। देसियस का नज़रिया इस सिलसिले में ज्यादा सख़्त था। पूरे राज्य में उसके जासूस फैले हुए थे जो राई-रत्ती की खबरें देते थे। मूर्तिपूजा के विरोधियों को देसियस बर्दाश्त नहीं करता था। ईश्वर एक है और अदेखा है जैसी बातों पर यक़ीन करने वालों को वह आनन-फ़ानन में सज़ाए मौत सुना देता था जिसके तहत दोषियों को ज़िंदा जलाने, ज़मीन में गाड़ देने, हाथ-पैर काट कर पशुओं का ग्रास बनाने जैसे अमानवीय तरीके  शामिल थे। बहरहाल, बाइबल में वर्णित कथा के अनुसार इफ़ेसस के सात युवा लोगों ने शहर की देवी के मंदिर में सिर झुकाने से इनकार कर दिया। किन्हीं संदर्भों में यह घटना 156ईस्वी की भी बताई गई है। देसियस के कोप से बचने के लिए उन्होंने शहर के बाहर पहाड़ी गुफा में शरण ली। थके हारे सातों लोग गुफ़ा में जाते ही नींद के आग़ोश में चले गए। उधर देसियस को जब ख़बर लगी तो उसने गुफ़ा का दरवाज़ा चट्टानों से बंद करवा दिया ताकि वे अंदर ही मर-खप जाएँ। गोस्पेल के मुताबिक ये लोग दो सदियों तक सोते रहे। इसके आगे क्या हुआ ये जानने से पहले इस कहानी के इस्लामी संस्करण का जायज़ा लिया जाए।
गोस्पेल की तरह कुरान के अध्यायों को सूरा (सुरह) कहा जाता है। गुफ़ा में सोए लोगों की कहानी कुरान के सूरह-कह्फ़ (18वाँ अध्याय) में आती है। कहानी के मुताबिक अफ़सूस शहर (ग्रीक इफ़ेसस) में सात लोगों का एक समूह था जो ईसाइयत में भरोसा रखते थे। दक्यानूस के कहर से बचने के लिए उन्होंने गुफ़ा में शरण ली, जिसका दरवाज़ा उसके ही हुक्म से बंद करा दिया गया। इस्लामी संदर्भों में इन सात लोगों को अस्हाबे-कह्फ़ कहा गया है। अस्हब का अर्थ होता है पैग़म्बर के कृपापात्र, मोहम्मद के दोस्त। मूलतः अस्हब, साहिब का बहुवचन है जिसका अर्थ है साहिबान, मान्यवर आदि। इसी तरह कह्फ़ का अर्थ होता है गुफ़ा, कंदरा, गार आदि। कह्फ़ अरबी का शब्द है लेकिन, गुहा, गुफा, कोह, खोह जैसे इंडो-ईरानी परिवार के शब्दों से इसकी साम्यता गौरतलब है।
गोस्पेल के मुताबिक क़रीब दो सौ साल ये लोग सोते रहे जबकि सूरह् के मुताबिक इनकी नींद 309 साल बाद टूटी। जो भी हो, नींद टूटने पर इनमें से कुछ लोग भोजन की तलाश में पास की बस्ती तक पहुँचे। उन्होंने कुछ रोटियाँ खरीदी। जब नानबाई को इन्होंने कुछ सिक्के दिए तो वह हैरत में पड़ गया। सिक्के उसके लिए अनजाने थे। धीरे-धीरे ये बात पूरे बाज़ार में फैल गई कि कुछ अनोखे लोग वहाँ आए हैं। जानकारों ने देख-परख कर पहचाना कि इन सिक्कों पर दक़्यानूस नाम के राजा की तस्वीर छपी है जो क़रीब तीन सदी पहले हुआ था और बेहद ज़ालिम था। नींद से जागने वालों के लिए अब हैरत में पड़ने की बारी थी। उन्होंने बताया कि बेशक दक़्यानूस ज़ुल्मी है और उससे बचने के लिए ही तो वे कल शहर छोड़ कर भागे थे। वो तो झपकी लग गई और वे नींद में ग़ाफ़िल हो गए। तीन सदी लम्बी नींद उनके लिए ही नहीं, सबके लिए बड़ी ख़बर थी। फिर यह हुआ कि वे सातों लोग वहीं रहने लगे। उनकी यही चाहत थी कि जिस काल की गुफा में सदियों तक सोते हुए उन्हें ईश्वरीय अनुभूति हुई है, उनकी उम्र पूरी होने के बाद वे हमेशा के लिए भी उसी गुफा में सोएँ। शहरवासियों ने उनकी यह इच्छा भी पूरी की। बाद के दौर में आम लोगों में भी यह धारणा बनी कि उस गुफा में दफ़नाए जाने पर उन्हें मोक्ष मिलेगा।  पुरातत्ववेत्ताओं को एशिया व यूरोप में तुर्की, जॉर्डन से लेकर चीन के उईगुर प्रान्त तक में ऐसी गुफाएँ मिली हैं जिन्हें स्थानीय लोग अस्हाबे-कह्फ कहते हैं। इन सभी स्थानों पर कब्रें हैं। 
क़िस्सा-कोताह यह कि इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्मों में इस कहानी का प्रयोग अपने अपने पैग़म्बर की महानता स्थापित करने में किया। लोगों को यह पता चला कि कुल मिला कर एकेश्वरवाद ही सही रास्ता है। ईश्वर एक है और उन्होंने ही ज़ालिम के कहर से बचाने के लिए अपने सात नेक बंदों को सदियों तक सुलाए रखा। कहानी जो भी कहती हो, धर्मों की बात धर्मोपदेशक जानें, शब्दों के सफ़र में हमें तो दक़ियानूस लफ़्ज का सफ़र जानना था, जो जान लिया। अल्लाह के उन सात नेक बंदों का नाम आज कोई नहीं जानता। हाँ, जुल्मी दक़ियानूस को हम क़रीब क़रीब रोज़ ही याद कर लेते हैं।

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Thursday, February 14, 2013

अगर, मगर, वरना, लेकिन…

question

क ल्पना करें कि किसी सुबह आपको ये फ़रमान सुनने को मिले कि दिनभर आप जो भी बोलेंगे, उसमें ‘अगर’, ‘मगर’, ‘वरना’ या ‘लेकिन’ का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो क्या इसे मंजूर कर लेंगे? व्यक्तिगत रूप से मैं इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर पाऊंगा। यह नामुमकिन है। ये जानकर भी ताज्जुब हो सकता है कि ‘अगर’, ‘मगर’, ‘लेकिन’ या ‘वरना’ हिन्दी के अपने नहीं बल्कि फ़ारसी से आयातित अव्यय हैं। यही नहीं, ‘मगर’ तो फ़ारसी-अरबी का संकर है। इन शब्दों के आसान हिन्दी पर्याय यदि, किन्तु, परन्तु, अन्यथा हैं पर इनका प्रयोग अगर’, ‘मगर’ या ‘वरना’ की तुलना में काफ़ी कम है। आप जब ये चुनौती स्वीकार करेंगे, तब इसकी आज़माइश भी हो जाएगी।
सबसे पहले बात करते हैं ‘अगर’ की। बोलचाल में अगर बेहद लोकप्रिय अव्यय है इसका पर्याय यदि है जो हिन्दी की तत्सम शब्दावली से आता है। ‘अगर’ की व्युत्पत्ति के बारे में उर्दू-फ़ारसी के शब्दकोश ज्यादा जानकारी नहीं देते हैं। अली नूराई के फ़ारसी-अंग्रेजी व भारोपीय भाषाओं के व्युत्पत्ति कोश में ईरान के भाषाविद् एम.एच. तबरिज़ी और जर्मन भाषाविद पॉल होर्न के हवाले से ‘अगर’ की व्युत्पत्ति का रिश्ता अवेस्ता के ‘हाकरत’ से जुड़ता नज़र आता है। गहराई में जाने पर पता चलता है कि ‘हाकरत’ का ‘हा’ अवेस्ता के ‘हम’ (सर्व) और ‘करत’ ‘कर्त’ [काट(ना), धार(ना)] से आ रहा है। जोसेफ़ एच पीटरसन की “डिक्शनरी ऑफ़ मोस्ट कॉमन अवेस्ता वर्ड्स” के मुताबिक इसमें एक बार या कभी-कभी का भाव है।
बहरहाल, जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक ‘यदि’ के अर्थ वाले अगर में अरबी का ‘मा’ उपसर्ग (मा+अगर) लगने से मगर बनता है। अरबी के ‘मा’ उपसर्ग में ‘ना’ की अर्थवत्ता है। इस मगर में लेकिन, किन्तु, परन्त की अर्थवत्ता है। फ़ारसी का मुहावरा “अगर-मगर” करना हिन्दी में भी लोकप्रिय है। इसी तरह “किन्तु-परन्तु” में भी वही भाव है। हील-हवाला, टालमटोल, आनाकानी या मामले को लटकाने का आशय यहाँ उभरता है। अगर और मगर में जड़ता, यथास्थितिवादिता उजागर होती है।नूराई के कोश की एक अन्य प्रविष्टि में ‘अगर’ का अर्थ ‘IF’ यानी ‘यदि’ या ‘अगर’ बताया गया है किन्तु उसके आगे ‘cut once’ भी लिखा है।अवेस्ता में ‘अक’ (ak) भी है जिसमें अक्ष, धुरी का भाव है। ‘कभी कभी’ के मद्देनज़र यदि पर गौर करे तो लगता है कि यदि में निश्चयात्मकता नहीं है। परिस्थिति प्रमुख है। अक्ष के एक पलड़े पर ‘अगर’ है और दूसरे पर ‘मगर’ है। ‘अक’ या ‘हकरत’ में ही ‘अगर’ के बीज छुपे हैं। ‘ह’ ध्वनि का लोप होकर सिर्फ़ ‘अ’ स्वर बच रहा है और ‘क’ रूपान्तर ‘ग’ में हो रहा है। अन्तिम ‘त’ भी लुप्त हो रहा है।
अन्यथा की अर्थवत्ता वाला ‘वरना’ भी हिन्दी में खूब चलता है। ‘वरना’ में ‘नहीं तो फिर’ या ‘और नहीं तो’ की अर्थवत्ता है। उर्दू-फ़ारसी में इसका ‘वगरना’ रूप देखने को मिलता है। क़तील शिफ़ाई साहब का एक शेर है- “चलो अच्छा हुआ, काम आ गई दीवानगी अपनी / वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते”। वरना के बीच में इस ‘ग’ के वजूद के क्या मायने हैं? दरअसल ‘वरना’ के मूल में भी ‘अगर’ छिपा है। जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक वरना एक वाक्याँश है “वा अगर ना”। इसका संक्षेप हुआ वगरना। उर्दू हिन्दी में यह ‘वरना’ रह गया। इसकी एक और वर्तनी है वर्ना जिसमें सिर्फ़ ढाई आखर रह जाते हैं “वा अगर ना” में जो ‘वा’ है वह अवेस्ता के अप से आ रहा है जिसमें पुनः, फिर, पार्श्व, परे, दूर जैसे भाव हैं। अगर का एक अन्य संक्षेपरूप है ‘गर’। “गर ऐसा हो जाए”, “गर वैसा हो जाए” जैसे वाक्य भी हिन्दी में चलते हैं। “वा अगर ना” का एक रूप “वा गर ना” भी हो सकता है जिससे ‘वगरना बना होगा।गर्चे या अगर्चे जैसे रूपों में ‘यद्यपि’ का भाव है।
हिन्दी में किन्तु, परन्तु के आशय वाला ‘लेकिन’ शब्द भी खूब चलता है यूँ कहें कि ‘लेकिन’ के बिना तो काम चलना ही मुश्किल है। कोशों के मुतबिक लेकिन शब्द अरबी के ‘लाकिन’ से आ रहा है जिसका अर्थ यदि, किन्तु, परन्तु जैसा ही है । सेमिटिक भाषाओं के ख्यात विशेषज्ञ मायर मोशे ब्रॉमन (1909-1977) अपनी पुस्तक स्टडीज़ इन सेमिटिक फ़िलोलॉजी में सम्भावना जताते हैं कि लाकिन के मूल में प्रोटो अरेबिक रूप ‘इल्ला-कान’ है । इल्ला दरअसल ‘ला’ का मूल रूप है जिसमें यदि, सिवाय, परन्तु जैसे भाव हैं । ‘कान’ सहायक क्रिया है । इस तरह इल्ला-कान का रूपान्तर ही लाकिन हुआ जो फ़ारसी (लाकेन) होते हुए हिन्दी का ‘लेकिन’ बना ।

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Saturday, February 9, 2013

होशियारी की बातें

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हि न्दी के प्रचलित शब्द भंडार में होशियार, होशियारी जैसे शब्द भी हैं जिसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की भाषा में खूब होता है । होशियार शब्द दरअसल फ़ारसी मूल से भारतीय भाषाओं में दाख़िल हुआ है जिसका प्रयोग बतौर विशेषण सजग और बुद्धिमान के अर्थ में किया जाता है । चतुर, निपुण, कुशल, सावधान, समझदार और दक्ष की व्यंजना भी इसमें निहित है । होशियारी एक संज्ञा है और इसकी अर्थवत्ता में होशियार के सभी गुण शामिल हैं । हिन्दी में होशियार के होश्यार, हुशियार, होश्यार, हुस्यार, होशयार जैसे रूप प्रचलित हैं । मराठी में इसे हुशार कहा जाता है ।
होशियार या होशियारी के मूल में फ़ारसी का होश है जो इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है । जोसेफ़ एच पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ़ मोस्ट कॉमन अवेस्ता वर्ड्स में उषी शब्द है । जॉन प्लैट्स के कोश में इसका पहलवी रूप हुश या होश है जबकि डी.एन.मैकेन्जी की पहलवी डिक्शनरी के मुताबिक अवेस्ता उशी का पहलवी रूप ओश होता है जिसका एक अर्थ है ज्ञान, बोध, दूसरा अर्थ है मृत्यु और तीसरा अर्थ है उदय, प्रभात, सवेरा आदि । भाषाविज्ञानी एकमत है कि उशी, ओश जैसे शब्द वैदिक भाषा के उषः, उषा जैसे शब्दों के समरूप हैं जिसमें प्रभात, उदय या सवेरा का भाव है । वैदिक उष् धातु में ताप, तपाना जैसे भाव भी हैं । पहलवी ओश में पूर्व दिशा का भाव भी है । सूर्योदय के साथ ही ताप का एक नाम उष्मा भी है । उष्मा के मूल में भी यही उष् है । उष्मा से प्रकाश निकलता है । प्रकृति में उष्मा और प्रकाश का आदिप्रतीक सूर्य ही है जो पूर्व दिशा से उगता है । यही सारे संकेत वैदिक उष और पहलवी ओश में हैं ।
फ़ारसी में आकर ओश का रूपान्तर होश होता है और इसमें ज्ञान, बोध जैसे भाव स्थायी हो जाते हैं तथा सूर्योदय, प्रभात जैसे भाव इसमें से विलीन हो जाते हैं । पहलवी में सतर्क, जागरुक, सचेत के लिए ओशयार (osyar) शब्द है । इसका अगला रूप फ़ारसी का होशयार है । हिन्दी-उर्दू में यह होशियार बनता है । मुहम्मद मुस्तफ़ा खां मद्दाह के कोश में होश का अर्थ बुद्धि, समझ, अक़्ल, चेतना, संज्ञा, ख़बरदारी, विवेक, तमीज़ और नशे में उतार की अवस्था जैसे अर्थ बताए गए हैं । होशयार शब्द में जो यार है वह भी इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है । यार शब्द का अर्थ है मित्र, दोस्त, बंधु, सखा, साथी आदि। यार शब्द की अर्थवत्ता में प्रेमी, आशिक , माशूक भी समाए हैं। इसके अलावा यह शब्द मददगार, सहायक का भाव भी रखता है। जॉन प्लैट्स के उर्दू इंग्लिश हिन्दुस्तानी कोश के मुताबिक यार शब्द की संभावित व्युत्पत्ति जारः से बताई गई है। संस्कृत के जारः शब्द में मूलतः प्रेमी, आशिक, उपपति का भाव है। किसी स्त्री के आशिक के अर्थ में जारः शब्द की अर्थवत्ता फारसी के यार में भी कायम है । यार शब्द बाद में सामान्य मित्र के अर्थ में समाज में रूढ़ हुआ । फ़ारसी का बे उपसर्ग लग कर बेहोश शब्द बनता है जिसका अर्थ है जिसमें चेतना न हो, अचेत ।
होशयार का अर्थ है जिसकी अक्ल से दोस्ती हो । अक़्ल का दुश्मन मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है । ऐसे व्यक्ति के लिए उर्दू में होशबाख़्ता शब्द है । इसके अलावा होशमंद, होशमंदी जैसे शब्द भी प्रचलित हैं । होशरुबा शब्द का अर्थ है चेतना हर लेने वाला, होश उड़ा देने वाला । हुशंग या होशांग का आशय है बुद्धिमान, विवेकी, अक़्लमंद। हिन्दी में होशो-हवास पद भी खूब प्रचलित है । यह संकर पद है अर्थात होश फ़ारसी से आया है और हवास अरबी से । हवास शब्द अरबी धातु हा-सीन-सीन से बना है (ح س س ) जिसमें स्पर्श, संवेदना या समझ का भाव है । इससे बने हास्सः का अर्थ होता है इन्द्रियाँ जो स्पर्श, संवेदना की वाहक हैं । हास्सः का बहुवचन है हवास । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक इसका अर्थ है इन्द्रियाँ, संवेदना, चेतना, संज्ञा, होश आदि । ज़ाहिर है होश-हवास में वही भाव है जो हिन्दी के सुध-बुध में है । सुधि और बोध दोनो जहाँ स्थित हो वही होश-हवास की स्थिति है ।
होश से जुड़े अनेक मुहावरे व कहावतें हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे होश उड़ना, होश गुम होना या होश फ़ाख़्ता होना । इन सभी में भय, आशंका, चिन्ता या फ़िक़्र से सुध-बुध खोने या डर जाने की अभिव्यक्ति होती है । होश आना यानी ग़लती सुधार लेना, समझदार हो जाना आदि । होश दंग होना यानी चकित रह जाना । होश ठिकाने आना अर्थात सबक मिलना, बुद्धि जाग्रत होना, अधीरता या व्याकुलता मिटना, होश की दवा करना यानी अक्ल हासिल करना, समझदारी पाना आदि ।

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Monday, February 4, 2013

“हिन्दी सराय” से गुज़रते हुए

इस बार पेश है डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल की ताज़ा पुस्तक "हिन्दी सरायः अस्त्राखान वाया येरेवान" की चर्चा । पुस्तक सोलहवीं-सत्रहवी सदी के उन भारतीय व्यापारियों की जड़ों की तलाश के बहाने से समूची भारतीय / हिन्दू संस्कृति की वैश्विक धरातल पर विद्वत्तापूर्ण पड़ताल करती है जो भारत से रूस के अस्त्राखान जा बसे थे।
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क़रीब दो साल पहले की बात है । अगस्त महिने की 21-22 तारीख़ की दरमियानी रात डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल को फ़ैसबुक पर मैसेज किया कि 11 सितम्बर 2011 को मै दिल्ली पहुँच रहा हूँ, क्या मुलाक़ात मुमकिन है ? 22 अगस्त की खुशनुमा सुबह । सात बजे डॉक्टसाब के फोन से ही नींद खुली । पता चला कि वे तो उन दिनों दिल्ली से बहुत दूर येरेवान-अस्त्राख़ान में होंगे ।
paggBपुरुषोत्तम अग्रवाल भारतीय इतिहास, साहित्य और संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं । जेएनयूँ में सत्रह बरस पढ़ाने के बाद इन दिनों संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं।
मध्यएशिया के इन दो शहरों का नाम सुनते ही रोमांचित हो उठा । पुलक के साथ डॉक्टसाब से अनुरोध किया कि वे यात्रावृतान्त ज़रूर लिखें और तस्वीरें भी लें । डॉक्टसाब ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा था-“ कोशिश पूरी होगी बंधु, अगर सब कुछ ठीक रहा तो क्योंकि वक़्त बहुत कम है ।” सात-आठ दिन का दौरा कर डॉक्टसाब लौट आए पर उनकी यात्रा तब तक अधूरी रहनी थी जब तक उनकी खोज-यात्रा के अनुभव जिल्द में बंध नहीं जाते । खुशी की बात है कि क़रीब एक साल के भीतर डॉक्टसाब ने येरेवान-अस्त्राख़ान यात्रा-वृत्तान्त पूरा कर लिया और बीते नवम्बर माह में उसका धूमधाम से लोकार्पण भी हो गया । हिन्दी जगत में आज इस क़िताब की खूब चर्चा है । ये सिर्फ़ यात्रावृत्तान्त नहीं बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन है । एक संस्कृतिकर्मी के द्वारा वोल्गा और गंगा के बीच की दूरी को पाटने वाले उन पदचिह्नों की तलाश का आख्यान है जो सदियों से इस विशाल भूक्षेत्र में उभरते रहे ।
शब्दों का सफ़र करते हुए अपन बरसों से भूमध्य सागर समेत एशिया के मध्य, पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों का मानचित्र पर्यटन करते रहे हैं । हिन्दी-उर्दू समेत इस मुल्क़ की तमाम बोलियों में पूरा संसार नुमांया होता है । मग़रिब में छुपा मोरक्कों, ब्रुनेई में छुपा वरुण अगर सामान्यतौर पर नज़र नहीं आता तो यह भी कहाँ पता चलता है कि खजानेवाला कारूँ तुर्की का सनकी क्रोशस था और जिस शाबाशी की थपकी पीठ पर महसूस होती है उस शाबाश का रिश्ता फ़ारस की खाड़ी में स्थित बंदरअब्बास के संस्थापक शाहअब्बास से भी हो सकता है । शब्दों का सफ़र करते हुए ही इन तमाम इलाक़ों से परिचय होता गया ।  बृहत्तर भारतीयता का सांस्कृतिक परागण पूरी दुनिया में सदियों से होता रहा है । चाहे पूर्व में कम्बोडिया जैसा देश हो जहाँ अवध के अयोध्या की छाया अयुथाया में नज़र आती है या फिर सुदूर पश्चिमोत्तर का पेशावर हो जिसका नाम कनिष्क के ज़माने में पुरुषपुर था । बहरहाल, डॉक्टसाब ने अपनी किताब का नाम प्रतीकात्मक रखा है- हिन्दी सरायः अस्त्राखान वाया येरेवान । हिन्दी में एक तो वैसे ही सफ़रनामे कम लिखे जाते हैं । ऐसा नहीं कि हिन्दी वाले यात्रा नहीं करते मगर उस दृष्टि का क्या कीजे जो एक सच्चे लेखक के मन में होती है । लेखक अपने दौर का कालयात्री होता है । उसकी लिखी एक एक इबारत अपने समय की सच्चाई होती है । अपनी कल्पना से वह ऐसे अनेक पुलों का सृजन करता है जिससे समाज को विभिन्न समयावधियों के बीच से गुज़रने का मौका सुलभ होता है ।
अस्त्राख़ान की जो यात्रा वाया येरेवान दिल्ली से शुरू हुई उसका बीज तो लेखक की चर्चित कृति “अकथ कहानी प्रेम की” की सृजनयात्रा के दौरान ही पड़ गया था । इसका ज़िक़्र लेखक ने अनेक स्थानों पर किया भी है । अस्त्राख़ान से अपना परिचय भी ऐतिहासिक भाषा विज्ञान पर भोलानाथ तिवारी के विद्वत्तापूर्ण लेखन के ज़रिये हुआ था । उन्होंने हिन्दी में समाए विदेशज मूल के अनेक शब्दों की पड़ताल की थी इसके लिए उन्होंने मध्यएशिया के अनेक देशों की यात्रा भी की । डॉ अग्रवाल की यह यात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है । सदियों पहले दक्षिणी रूस में वोल्गा के मुहाने पर बसा अस्त्राखान मध्यएशिया का बड़ा व्यापारिक केन्द्र था । हिन्दुस्तान के सिंध, मारवाड़ और पंजाब से कई व्यापारी वहाँ जाकर बसते रहे थे जो मूलतः वैष्णवपंथी थे । ऐसे समाज में जहाँ व्यापार के लिए सात समंदर पार करना निषिद्ध हो, ये कौन वैष्णव व्यापारी थे जिन्होंने सुदूर रूस के अस्त्राखान शहर को अपने पुरुषार्थ और व्यवसाय बुद्धि का अखाड़ा बनाने की सोची ? लेखक ने इस संदर्भ में विद्वत्तापूर्वक स्थापित किया है कि दूर-देशों की यात्रा करना भारतीयों का स्वभाव रहा है । पश्चिम की ओर जो व्यापारी जत्थे गए दरअसल वे रामानुज सम्प्रदाय से अलग हुए रामानंदी वैष्णव थे जिन्होंने रूढ़ धार्मिक मान्यताओँ के आगे अपने पुरुषार्थ और आस्था का ऐसा सन्तुलन बनाया जिसने भारत-रूस व्यापार का एक नया रास्ता खोल दिया ।
अस्त्राख़ान बरास्ता येरेवान यह सफ़र लेखक के लिए एक तीर्थयात्रा जैसा था । पुरखों की खोज में की गई एक यात्रा जिसका मक़सद था अपनी जड़ों की तलाश । प्राचीनकाल से ही समूची दुनिया में जितने भी फेरबदल, उथल-पुथल और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव आए हैं उनमें कारोबारी गतिविधियों की भूमिका ख़ास रही है । सौदागरों के ज़रिये ही न सिर्फ जिन्सों और माल-असबाब का कारोबार हुआ बल्कि उससे कई गुना ज्यादा और स्थायी व्यापार हुआ शब्दों, भाषाओं हिन्दी सरायऔर रिवायतों का । सदियों पहले भारत से अस्त्राखान जा बसे व्यापारी समुदाय के बारे में इतिहासकारों की दिलचस्पी कभी क्यों नहीं जागी, लेखक को यह सवाल लगातार मथता रहता है । इसके कारणों का चिन्तन-पक्ष भी बड़ी प्रमुखता से किताब में उभर कर आया है । तथ्यों को दर्ज़ करने की हमारी उदासीनता एक तरह से भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है । हमें अपने अतीत के गौरवगान में इतना आनंद आता है कि क्या कहें । शायद इसीलिए हम वास्तविक तथ्यों को अगली पीढ़ियों के लिए संजो कर, उनका दस्तावेजीकरण करने में कोताह हैं । सुविधानुसार अपने सुनहरे अतीत के पन्नों को जब चाहें और चमकीला बना कर नयी पीढ़ी के सामने रख देते हैं । अतीत के विवरणों को दर्ज़ न करने की भारतीयों की विशिष्ट प्रवृत्ति के बारे में ‘हिन्दी सराय’ में डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं, “...किसी घटना या अनुभव को ...लिखित दस्तावेज का रूप देने में हिन्दुओं की रुचि क्यों नहीं थी ? क्या इसलिए कि हिन्दू चित्त को, किसी सामाजिक अनुभव की स्मृति से जो सीखने योग्य है, उसे मौखिक परम्परा के जरिये अगली पीढ़ी के संस्कारों तक पहुँचा देना ज्यादा सुहाता था ...”
डॉक्टसाब की बात में काफ़ी हद तक सच्चाई है । अस्त्राख़ान के सैकड़ों गुमनाम भारतीय व्यापारियों के बारे में उनकी गहन पड़ताल के सारथी बने मास्कों में रहने वाले हिन्दी कवि अनिल जनविजय, जिन्होंने लेखक के लिए अस्त्राखान के अभिलेखागार में रूसी भाषा में दर्ज़ अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेजों का हिन्दी अनुवाद कर बेशक़ीमती मदद की । डॉक्टसाब ने किताब में अनेक स्थानों पर इस यात्रा में अनिलजी की महती भूमिका को याद किया है । अस्त्राखान के भारतीय व्यापारियों की खोज यात्रा के सम्बन्ध में मैं ज्यादा नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि उनके बारे में जो भी जानकारियाँ हैं वे पहले ही बहुत कम हैं । डॉक्टसाब ने हर उपलब्ध जानकारी का बेहद रचनात्मक प्रयोग कर लिया है इसलिए चाहूँगा कि सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के इन व्यापारियों चाहे वो मशहूर मारवाड़ी बारायेव हो या टेकचंद लालायेव अथवा बगारी आलमचंदोफ़, इनके बारे में जानने के लिए आपको क़िताब खऱीद कर पढ़नी होगी । अगर अपने इस बयान-हाल में उनके बारे में ज़रा सा भी लिखा तो पढ़ने का मज़ा जाता रहेगा । यहाँ मैं क़िताब की दूसरी खूबियों के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा । भूमिका ने डॉक्टसाब ने इस किताब को ट्रैवेलॉग के साथ थॉटलॉग की संज्ञा भी दी है । व्यक्तिगत तौर पर मुझे ‘हिन्दी सराय’ के ट्रैवेलॉग वाले स्वरूप से थॉटलॉग वाले रूप ने ज्यादा मुतासिर किया । किताब के पहले सर्ग यानी बयान येरेवान में उन्होंने आर्मीनिया के लाड़ले कवि चॉरेन्त्स के बहाने आर्मीनिया के सामाजिक, सास्कृतिक और राजनीतिक इतिहास पर जो कुछ भी लिखा है वो बेहद दिलचस्प तब्सरा है । पाठक को बांध कर रखने वाला साथ ही ज्ञानवर्धक । कमाल ये कि चॉरेन्त्स के बारे में पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह क़िस्सा रूसी क्रान्ति के महान नायकों में एक त्रात्स्की, उनके मैक्सिको निर्वासन और वहाँ उनकी हत्या तक जाएगा । रूस ही क्यों, समूचे पूर्वी यूरोप में अपने समाज नायकों से प्रेम करना एक तरह से सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है । ख़ास तौर पर कलाजीवियों के लिए उस समाज में सैकड़ों साल पहले ही कुलीन-समझ विकसित हो चुकी थी । येरेवान की माश्तोज स्ट्रीट पर वे आर्मीनियाई लेखक विलियम सारोयान की प्रतिमा देखते हुए याद करते हैं “दिल्ली में प्रेमचंद के नाम पर कोई सड़क नहीं है ।”
किताब का चिन्तन पक्ष इतना ताक़तवर है कि एक बार में इस क़िताब को सिर्फ़ फ्लैप पर दी गई तहरीर के मद्देनज़र ही पढ़ा जा सकता है, वरना इसे बार बार पढ़ना होगा । किसी ट्रैवेलॉग में सन्दर्भ ग्रन्थ की सिफ़त होनी चाहिए, मगर जैसा कि भारतीय लेखकों का स्वभाव है, उनके सफ़रनामे अक़्सर दिनांक-वृत्त या डायरी बन कर रह जाते हैं । येरेवान प्रसंग में ही डॉक्टसाब ने जरथुस्त्रवादी विचारधारा यानी शुभाशुभ संघर्ष, बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट के प्रसंग, इस्लामी कट्टरवाद, प्रसाद का आनंदवाद बनाम दुखवाद, ऋग्वैदिक सोच और एकेश्वरवाद बनाम बहुदेववाद आदि मुद्दों पर पृष्ठ 33 से 43 के बीच इतने दिलचस्प विमर्श का मुज़ाहिरा किया है कि कुछ कहा नहीं जा सकता । मेरी निग़ाह में ये सफ़हे किताब का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । बेहद कठिन चीज़ों को उन्होंने इतनी आसानी से समझा दिया है कि मैं सिर्फ उनके प्रति आभार जता सकता हूँ । किताब में किन्हीं स्थानों और वस्तुओं की व्युत्पत्तियों की चर्चा भी डॉक्टसाब करते रहे हैं । हाँ, भारतीय व्यापारियों की जारज संतानों के अगरिजान नाम नें मुझे काफ़ी परेशान किया है । इसके पीछे पड़ा हूँ । इस बात पर दृढ़ हूँ कि इस शब्द का संदर्भ भारतीय भाषाओं से नहीं है । अस्त्राखानी तातारों के बीच या वहाँ के रूसियों के बीच अगरिजान नाम हिकारत भरा सम्बोधन था, ऐसा लगता है । अग्निपुत्र जैसी व्यंजना इसमें तलाशना उचित नहीं लगता । इस पर विस्तार से लिखने की इच्छा है । काम चल रहा है । इंडो-यूरोपीय या तुर्किक-तातारी धरातल में इस शब्द के बीज दबे हुए हैं, फ़िलहाल यही मान कर चल रहा हूँ ।
चलते चलते यही कि ये सिर्फ़ पुस्तक चर्चा है । इसमें आलोचना या समीक्षा के तत्व न तलाशे जाएँ । इसके प्रारूप में कई खामियाँ होंगी । यूँ ही, जो मन में आया, ईमानदारी से लिख दिया । समाज-संस्कृति में रुचि रखने वाले हिन्दी पाठकों के लिए यह पुस्तक बेहद उपयोगी है । इसे ख़रीदने की सलाह दूँगा । प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या –131, मूल्य-395 (हार्डकवर)

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Tuesday, January 29, 2013

महिमा मरम्मत की

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मरम्मत हिन्दी में खूब रचा-बसा शब्द है । अरबी मूल का यह शब्द फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी समेत कई भारतीय भाषाओं में प्रचलित हुआ । मरम्मत शब्द का अर्थ है बिगड़ी वस्तु को सुधारना, उद्धार करना, संशोधन करना, सँवारना, कसना, योग्य बनाना, सुचारू करना, कार्यशील बनाना आदि । इन तमाम भावों के बावजूद हिन्दी में मरम्मत का प्रयोग ठुकाई-पिटाई या मार-पीट के तौर पर ज्यादा होता है । “इतनी मरम्मत होगी कि नानी याद आ जाएगी” जैसे वाक्य से पिटाई का भाव स्पष्ट है । किसी की पिटाई में भी उसे सबक सिखाने का भाव है, सज़ा देने का भाव है ।
मरम्मत के मूल में अरबी की रम्म क्रिया है और इसकी मूल सेमिटिक धातु है र-म-म [ر م م] अर्थात रा-मीम-मीम । हेन्स वेर की ए डिक्शनरी ऑफ़ मॉडर्न रिटन अरेबिक अरबी क्रिया ‘रम्म’ का उल्लेख है जिसमें जीर्णोद्धार, दुरुस्ती या सुधारने का भाव है । इसी के साथ इसमें क्षय होने, क्षीण होने, बिगड़ने या खराब होने का भाव भी है । यही नहीं, इसमें बनाने, पहले जैसा कर देने, पूर्वावस्था, प्रत्यावर्तन, जस का तस जैसे आशय भी हैं । गौर करें, किसी वस्तु को सुधारने की क्रिया उसे पूर्ववत अवस्था में यानी चालू हालत में लाना है । ऐसा करते हुए उसके कल-पुर्जे ढीले करने होते हैं, आधार को खोलना होता है । रम्म में निहित बिगड़ने, क्षीण होने जैसे भावों का यही आशय है कि सुधार की प्रक्रिया में हम बिगड़े तन्त्र को पहले तो पूरी तरह से रोक देते हैं । फिर उसके एक एक हिस्से की जाँच कर उसे सँवारने का काम करते हैं ।
रम्म में अरबी उपसर्ग ‘म’ लगने से बनता है (म)रम्मा जिसका अर्थ सुधारना, सँवारना होता है । फ़ारसी, उर्द-हिन्दी में मरम्मा के साथ ‘अत’ प्रत्यय का प्रयोग होता है और इस तरह मरम्मत शब्द बनता है । पंजाबी और हिन्दी की पश्चिमी शैलियों में इसका रूप मुरम्मत भी है । मराठी में इसके तीन रूप मरमत, मरामत, मर्हामत मिलते हैं । मरम्मत क्रिया का एक रूप हिन्दी में मरम्मती भी मिलता है । मरम्मत में पिटाई का भाव यूँ दाख़िल हुआ होगा क्योंकि अक्सर चीज़ों को सुधारने की क्रिया में ठोकने-पीटने की अहम भूमिका होती है । साधारणतया किसी कारीगर या मिस्त्री के पास भेजे जाने से पहले चीज़ों को दुरुस्त करने के प्रयास में उसे हम खुद ही ठोक-पीट लेते हैं । कई बार यह जुगत काम कर जाती है और मशीन चल पड़ती है । मरम्मत में ठुकाई-पिटाई दरअसल सुधार के आशय से है, ठीक होने के आशय से है । बाद में मरम्मत मुहावरा बन गया जैसे– “हाल ये था कि थोड़ी मरम्मत के बिना वो ठीक नहीं होती थी”, ज़ाहिर है इस वाक्य में मरम्मत का आशय पिटाई से है । पिटाई वाले मरम्मत की तर्ज़ पर कुटम्मस भी प्रचलित है जो कूटना या कुटाई जैसी क्रियाओं से आ रहा है । जिसमें सुधार की गुंजाइश हो उसे मरम्मततलब कहते हैं ।
इसी तरह रम्मा से रमीम बनता है जिसका अर्थ भी मुरझाया हुआ, पुराना, पुरातन, जीर्ण-शीर्ण या खराब है । आमतौर पर चीज़ों के परिशोधन या उनके सुधारने के लिए तरमीम शब्द का प्रयोग होता है । हिन्दी में अक्सर भाषायी सुधार के सम्बन्ध में तरमीम शब्द का प्रयोग होता है । जैसे “कमेटी ने जो सिफ़ारिशें की हैं उनमें तरमीम की ज़रूरत है” ।

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Tuesday, January 15, 2013

चर्चा कैसी कैसी !!

talk

हि न्दी से प्यार करने वालों का उसके साथ बर्ताव और व्यवहार भी अनोखा होता है । मिसाल के तौर पर चर्चा की बात करें । उर्दू-हिन्दी में बातचीत, कथन, उल्लेख, ज़िक़्र के संदर्भ में चर्चा शब्द का प्रयोग होता है । यह बहुत प्रचलित शब्द है । अक्सर यह बहस भी चलती रहती है कि चर्चा स्रीवाची है या पुरुषवाची । “चर्चा चलती है” या “चर्चा चलता है” । “चर्चा रही” या “चर्चा रहा” । कुछ लोग कह देते हैं कि कथन, ज़िक़्र या उल्लेख की तरह चर्चा के प्रयोग में पुलिंग लगना चाहिए जबकि कुछ लोग इसे स्त्रीवाची कहते हैं और इस तरह चर्चा पर चर्चा चलती ही रहती है । जो हिन्दीप्रेमी नुक़्ते से परहेज़ करते हैं उनका कहना है कि चर्चा के साथ उर्दू वाला पुल्लिंग लगाया जाए । इसके बरख़िलाफ़ जिन हिन्दीप्रेमियों को मुसलमानी बिन्दी से लगाव है वो चाहते हैं कि चर्चा को उर्दू का न माना जाए और इसके साथ स्त्रीलिंग का प्रयोग किया जाए । उर्दू में चर्चा से चर्चे बना लिया गया है जो बहुवचन है ।
सबसे पहले तो एक बात साफ़ कर दें कि चर्चा हिन्दी की अपनी ज़मीन पर तैयार हुआ शब्द है और स्त्रीवाची है । यह मूलतः तत्सम शब्द है । इसमें और संस्कृत के चर्चा शब्द में अगर कोई मूलभूत फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यही कि संस्कृत-वैदिक शब्दावली का चर्चा पुरुषवाची है और हिन्दी का चर्चा स्त्रीवाची । संस्कृत का चर्चा लोकभाषा में स्रीवाची चरचा था और हिन्दी की ज़मीन पर भी इसी रूप में सामने आया । आज से क़रीब छह सौ सात सौ साल पहले हिन्दी की विभिन्न शैलियों में चर्चा के चरचा रूप का स्त्रीवाची प्रयोग के लिखित साक्ष्य बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं । ज़ाहिर है बोलचाल में इसकी रचबस कई सदी पहले हो चुकी होगी । कबीर अपनी सधुक्कड़ी में कहते हैं - “संगत ही जरि जाव न चरचा नाम की । दुलह बिना बरात कहो किस काम की।।” वहीं विनयपत्रिका में तुलसी की अवधी में भी चरचा है- “जपहि नाम रघुनाथ को चरचा दूसरी न चालु।” तो उधर राजस्थानी में मीराँ के यहाँ भी चरचा है - “राम नाम रस पीजै मनुआँ, राम नाम रस पीजै । तज कुसंग सतसंग बैठ णित, हिर चरचा सुण लीजै ।।”
चर्चा शब्द में विभिन्न आशय शामिल हैं मगर आमतौर पर इसका अर्थ बहस या विचार-विमर्श ही है । चर्चा में मूलतः दोहराव का भाव है । तमाम कोश चर्चा के अनेक अर्थ बताते हैं मगर रॉल्फ़ लिली टर्नर कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ में चर्चा प्रविष्टि के आगे सिर्फ़ रिपीटीशन यानी दोहराव लिखते हैं । ज़ाहिर है, बाकी आशय बाद में विकसित हुए हैं विलियम व्हिटनी पाणिनी धातुपाठ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि चर्च् धातु दरअसल चर् धातु में निहित भाव की पुनरावृत्ति दिखाने वाला रूप है । चर् का मूल भाव गति है (करना, अनुष्ठान, व्यवहार, आचरण, अभ्यास आदि । इससे ही चलने की क्रिया वाला चर बना है) । चर्चर (चर-चर) में दोहराव है । बहरहाल, चर्चा के मूल में चर्च् धातु है जिसका मूलार्थ है दोहराव । आप्टे कोश के मुताबिक इसमें पढ़ना, अनुशीलन करना, अध्ययन करना, विचार-विमर्श करना जैसे भाव हैं । इसी के साथ इसमें गाली देना, धिक्कारना, निन्दा करना, बुरा-भला कहना जैसे आशय भी हैं । इससे बने चर्चा में आवृत्ति, तर्क-वितर्क, स्वरपाठ, अध्ययन, सम्भाषण, वाद-विवाद, अनुशीलन, परिशीलन, अनुसंधान के साथ-साथ शरीर पर उबटन लगाना, मालिश करना, लेपन करना जैसे भाव भी हैं ।
चर्च् में निहित दोहराव वाले भाव पर गौर करें तो चर्चा के अन्य आशय भी स्पष्ट हो जाते हैं । बार-बार या दोहराव वाली बात विमर्श के दौरान भी उभरती है और विचार मन्थन में भी । अनुसंधान या खोज के दौरान भी बार बार उन्हीं रास्तों, विधियों, प्रविधियों से गुज़रना होता है । बहस-मुबाहसों में एक ही बिन्दू पर लौटना होता है या किसी एक मुद्दे का बार बार उल्लेख होता है । चर्चा में अफ़वाह, गपशप, चुग़लख़ोरी जैसी बातें भी शामिल हैं । अफ़वाह में आवर्तन की वृत्ति होती है । किसी भी क़िस्म की गप्प, गॉसिप या अफ़वाह जैसी बातें लौट-लौट कर आती हैं । सो बारम्बारता चर्चा का ख़ास गुणधर्म है । यही बारम्बारता मालिश, मसाज़ या लेपन में भी है । मालिश या लेपन करना यानी बार-बार किसी एक सतह पर दूसरी सतह फेरना सो चर्चित का आशय लेपित से भी है । बृहत हिन्दी शब्दकोश में इसका उदाहरण दिया है चन्दन-चर्चित काया । लेपन की क्रिया को चर्चन भी कहते हैं । चर् में निहित गति की पुनरावृत्ति ही ‘चर्चन’ है ।
चर्च् से ही बना है चर्चित जिसका अर्थ है- ऐसा कुछ जिस पर लोग बातें करतें हैं । इसमें वस्तु, व्यक्ति, विचार कुछ भी हो सकता है । चर्चित यानी जिस पर चर्चाएँ चल रही हों । कोशों के मुताबिक चर्चित का अर्थ है जिस पर विचार किया गया हो, जिस पर चर्चा हुई हो, जिसे खोजा गया हो। इसके अलावा चर्चित वह भी है जिसकी मालिश हुई हो, जिस पर लेप किया हुआ हो, जो सुगंधित, सुवासित, अभ्यंजित हो । चर्चित के दोनों ही अर्थों में दोहराव की प्रक्रिया स्पष्ट है । आम अर्थों में चर्चित चेहरा वह होता है जो खबरों में हो । खबर को चर्चा का पर्याय मानें । बार बार कोई मुद्दा या व्यक्ति जब चर्चा में आता है तो वह चर्चित कहलाता है । चर्चा योग्य के लिए मुखसुख के आधार पर चर्चनीय शब्द भी बना लिया है । चर्चा करने वाले को वार्ताकार की तर्ज पर चर्चाकार कहते हैं । संस्कृत नाटकों की परम्परा में दो अंकों के बीच दृष्यविधान बदलते हुए दर्शकों के मनोरंजन के लिए गाया जानेवाला गीत चर्चरिका कहलाता था । फ़ाग, होली, बुआई, कटाई जैसे अवसरों पर भी चर्चरिका का चलन था । लोक भाषा में इसे चाँचर, चँचरी या चाँचरी कहते हैं । चाँचरी एक पहाड़ी लोकनृत्य की शैली भी है ।
चर्चा प्रायः आर्यपरिवार की सभी भारतीय भाषाओं में है । लोगों की ज़बान पर जब किसी बात का उल्लेख आम हो जाए तो उसे मराठी में जनचर्चा या लोकचर्चा कहा जाता है । इसी तरह रामचर्चा पद है जिसका शाब्दिक अर्थ तो राम का नाम लेना है मगर इसमें मुहावरेदार अर्थवत्ता है । मोल्सवर्थ का इंग्लिश-मराठी कोश इसके बारे में कहता है - A phrase used emphatically or expletively in a speech expressing any positive and utter denial. 

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Sunday, January 13, 2013

कोहरा और कुहासा

fog

स र्दियों में शाम से ही धुंध छाने लगती है जिसे कोहरा या कुहासा कहते हैं । ठंड के मौसम में आमतौर पर हवा भारी होती है जिसकी वजह वातावरण में नमी का होना है । धरती की ऊपरी परत जब बेहद ठण्डी हो जाती है तो हवा की नमी सघन होकर नन्हें-नन्हें हिमकणों में बदल जाती है इसे ही कोहरा जमना कहते हैं । कोहरा बनने की प्रक़्रिया लगभग बादल बनने जैसी ही होती है । कभी-कभी बादलों की निचली परत भी पृथ्वी की सतह के क़रीब आकर कोहरा बन जाती है । कुल मिलाकर कोहरे में कुछ नज़र नहीं आता । धुँए में जिस तरह से दृश्यता कम हो जाती है उसी तरह हवा की नमी हिमकणों में बदल कर माहौल की दृश्यता को आश्चर्यजनक रूप से कम कर देती है । कोहरे के आवरण में समूचा दृश्यजगत ढक जाता है । देखी जा सकने वाली हर शै गुप्त हो जाती है, लुप्त हो जाती है, छुप जाती है, छलावे की तरह ग़ायब हो जाती है । कोहरा की अर्थवत्ता के पीछे भी गुप्तता या लुप्तता का भाव ही प्रमुख है ।
किसी भी किस्म का आवरण मूल रूप से सुरक्षा कवच होता है । कोहरा भी एक तरह से किन्हीं फ़सलों के लिए लाभदायक ही होता है । शत्रु से खुद को बचाने के लिए युद्ध के प्राचीनतम तरीक़ों में कैमोफ्लैज या छद्मावरण शैली भी है । कोहरा भी एक तरह से प्रकृति का कैमोफ्लैज है । संस्कृत में एक धातु है गुह् जिसमें ढकने, छिपाने, परदा डालने, गुप्त रखने का भाव है । गुहा और गुफा जैसे शब्दों के मूल में यही गुह् धातु है । आदिकाल से प्राणियों को आश्रय की खोज रही है । आदिम युग में आश्रय का अर्थ सुरक्षित स्थान से था सो आश्रय का अर्थ था गुप्त जगह, जहाँ खुद को छुपाकर बचाव किया जा सके । गुहा में गुप्तता का भाव प्रमुख है जो बाद में संरक्षित-सुरक्षित स्थान हुआ आप्टेकोश के मुताबिक बंद या सुरक्षित स्थान के अर्थ में गुहा का एक अर्थ हृदय भी होता है क्योंकि यह छाती के भीतर है ।
गुह् का पूर्ववैदिक रूप कुह् रहा होगा । याद रहे ‘क’ वर्णक्रम में ही ‘ग’ भी आता है। निश्चित ही ‘कुह्’ में वही भाव थे जो ‘गुह्’ में हैं । मोनियर विलियम्स के मुताबिक कुह् से कुहयते क्रिया बनती है जिसका अर्थ है to surprise or astonish or cheat by trickery or jugglery अर्थात छलावरण या मायाजाल फैलाना जिसका उद्धेश्य वास्तविकता छुपाना हो । इसीलिए कुह से कोहरा के अर्थ में ही संस्कृत में कोहरा के अर्थ में ही संस्कृत में कुहेलिका शब्द भी है जिसका अर्थ भी अंधकार, धुंधलापन, कोहरा आदि है । कुहेलिका में मुहारवरेदार आशय भी हैं जिसमें मिथ्यावरण या छलावरण की अभिव्यक्ति होती है । हिन्दी के कोहरा के जन्मसूत्र संस्कृत के कुहेड़िका या कुहेड़ से जुड़ते हैं जिसका अर्थ कोहरा, धुंध, तुषार, fog, mist, कुहासा आदि है । कुह का मतलब छली या फ़रेबी भी होता है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक कुबेर का अन्य नाम भी कुह है । कुहक यानी मायाजाल, इन्द्रजाल । कुहककार याना माया अथवा प्रपंच रचने वाला । कुहासा भी इसी मूल से निकला है
छिपने-छिपाने, गुप्त-लुप्त जैसी अभिव्यक्ति की वजह से ही गुह् या कुह से पहाड़ की अर्थवत्ता वाले शब्द बने । संस्कृत में कुहरम् शब्द है जिसका मतलब है गुफा, गढ़ा आदि । आप्टेकोश में इसका एक अर्थ गला या कान भी बताया गया है । जाहिर है, इन दोनों ही शरीरांगों की आकृति गुफा जैसी है । नाभि के साथ नाभिकुहर जैसी उपमा भी मिलती है । संस्कृत के पूर्वरूप यानी वैदिकी या छांदस की ही शाखा के रूप में अवेस्ता का भी विकास हुआ जिससे फ़ारसी का जन्म माना जाता है । फ़ारसी में पहाड़ के लिए कोह शब्द है जो इसी मूल से आ रहा है । बरास्ता अवेस्ता कुह् में निहित गुप्त स्थान या गुफा का अर्थ विस्तार फ़ारसी में कोह के रूप में सामने आया अर्थात वह स्थान जहाँ बहुत सी गुफाएँ हों । स्पष्ट है कि गुफाएँ पहाड़ों में ही होती हैं, सो कुह् से बने कोह का अर्थ हुआ पहाड़ ।
गुफा के लिए हिन्दी में खोह शब्द भी खूब प्रचलित है । गौर करें कुह्-गुह् के अगले क्रम खुह् पर । इस खोह शब्द की फ़ारसी के कोह से समानता भी देखें । वैसे कोह से गोह भी बनता है जिसका अर्थ भी गुफा है । मोनियर विलियम्स इसका अर्थ गुप्तस्थान बताते हैं । हिन्दी शब्दसागर खोह की व्युत्पत्ति के लिए गोह का संकेत भर देते हैं । मेरे विचार में खोह का निर्माण कुह्, कोह की कड़ी में ही हुआ होगा । फ़ारसी में कोहसार का अर्थ पहाड़ ही होता है । पर्वतीय भूमि के लिए कोहिस्तान एक प्रचलित नाम है । ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में इस नाम के कई स्थान हैं । पाकिस्तान में कोहमरी नाम का एक पर्यटन स्थल भी है जिसका लोकप्रिय नाम अब सिर्फ़ मरी रह गया है ।
कोहिनूर जैसे मशहूर हीरे के नामकरण के पीछे भी यही कुह् धातु है । कोहिनूर बना है कोह-ए-नूर से अर्थात रोशनी का पहाड़ । याद रहे, कोहिनूर ( अन्य लोकप्रिय उच्चारण कोहनूर, कोहेनूर भी हैं ) सदियों पहले गोलकुंडा की हीरा खदान से निकाला गया था, जो सदियों पहले दुनिया की इकलौती हीरा खदान थी । कोहिनूर दुनिया का सबसे विशाल हीरा था और इसके आकार की वजह से ही मुगलकाल में इसे रोशनी का पहाड़ जैसा नाम मिला । अंग्रेजी में गुफा को केव कहते हैं जो भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और इसकी रिश्तेदारी भी कुह् से है । डगलस हार्पर की एटिमआनलाइन के मुताबिक केव CAVE बना है प्रोटो इंडोयूरोपीय धातु क्यू keue- से जिसका अर्थ है मेहराब या पहाड़ के भीतर जाता ऐसा छिद्र जो भीतर से चौड़ा हो ।

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Friday, January 11, 2013

देहात की बात

gaon

ग्रा मीण अंचल के लिए गाँव-देहात शब्दयुग्म का हिन्दी में खूब प्रयोग होता है । “वे दूर देहात से आए हैं,” “देहात में रहने के अपने फ़ायदे हैं,” जैसे वाक्यों में देहात का अर्थ गाँव ही है । गँवई या ग्रामीण के लिए देहात से देहाती विशेषण बनता है । देहात हमें भारतीय परिवेश से जुड़ा शब्द लगता है तो इसलिए क्योंकि यह भारत-ईरानी भाषा समूह का शब्द है और फ़ारसी मूल के ‘देह’ से हिन्दी की बोलियों में आया । फ़ारसी में देह के दीह, दिह जैसे रूप भी मिलते हैं । देह यानी गाँव और देह का बहुवचन देहात यानी ग्रामीण क्षेत्र । हिन्दी में देह, देहात जैसे शब्दों का प्रयोग ग्यारहवीं सदी से ही शुरू हो चुका था । यूल-बर्नेल के एंग्लो-इंडियन कोश हॉब्सन-जॉब्सन के अनुसार पंद्रहवीं सदी के कम्पनी राज के दस्तावेज़ों में कोलकाता को ‘दे कलकत्ता’ लिखा गया है । यह ‘दे’ दरअसल फ़ारसी का ‘देह’ है जिसका अर्थ है ग्राम । ‘दे कलकत्ता’ का अर्थ हुआ गाँव कलकत्ता जो तब हुगली के मुहाने पर स्थित एक मामूली बसाहट थी । करीब साढ़े तीन सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की कासिम बाजार कोठी का फर्स्ट आफिसर था जाब चार्नक जो बाद में कंपनी एजेंट बना और उसी की देख-रेख में सूतानटी और ‘दे कलकत्ता’ का विकसित रूप आज की कोलकाता महानगरी है ।
ख्यात भाषाविद जूलियस पकोर्नी द्वारा खोजी गई प्रोटो भारोपीय धातुओं में dheigh (-धिघ, मोनियर विलियम्स ) से बना है अवेस्ता का ‘देगा’ जिसका अर्थ है निर्माण, बनाना, मिट्टी, ढाँचा अथवा लेपन । ईरानी परिवार की भाषाओं में इसके अन्य रूप हैं दिज़, देज़, दाएज़ा, दाएजायति जिनका अर्थ है दीवार, परकोटा या क़िला । अवेस्ता में पइरीदाएज़ा शब्द है जिसका अर्थ है जन्नत, वैकुण्ठ, स्वर्गवाटिका या परकोटा । अंग्रेजी का पेराडाइस इसका ही रूपान्तर है । यूनिवर्सिटी ऑफ़ टैक्सास के लिंग्विस्टिक रिसर्च सेंटर के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में ‘दिदा’ का अर्थ कोट या क़िलेबंदी होता है । हिन्दी का ‘दीवार’ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है । यह अवेस्ता के एक सामासिक पद ‘देगावरा’ [dega-vara] से बना है । संस्कृत की ‘दिह्’ धातु का रिश्ता dheigh से जुड़ता है । इसका अर्थ परकोटा, आश्रय, कोट, हदबंदी, किलेबंदी करना, बचाव करना, लीपना, पोतना आदि । ध्यान रहे घास-फूस के ढाँचे को मिट्टी से सान-पोत कर उसे मज़बूती दी जाती थी ।
फ़ारसी के ‘दहलीज’ शब्द में यही ‘देह’ है । इन सभी में बनाने या निर्माण की क्रिया शामिल है । ‘दहलीज’ का अर्थ होता है पौड़ी, सीढ़ी, द्वार या चौखट । इसी मूल से बने हैं देहरी, देहरा, देहरी जैसे शब्द जो चौखट या द्वार की अर्थवत्ता रखते हैं । गौर तलब है कि उत्तराखंड के कई स्थानों के साथ कोट, पौड़ी या द्वार शब्द जुड़े नज़र आते हैं जैसे कोटद्वार, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल आदि । जहाँ तक ‘देहरादून’ के देहरा की व्युत्पत्ति का प्रश्न है , तमाम विकल्पों के साथ फ़ारसी के देह, दिह से भी देहरा की व्युत्पत्ति सम्भावित है जिसमें गाँव, दीवार, परकोटा जैसे भाव हैं । इस तरह ‘देहरादून’ का अर्थ हुआ वादी का गाँव । ग्वालियर के पास एक घाटीगाँव भी है । देहरादून का एक अर्थ दर ऐ वादी अर्थात घाटी का दरवाज़ा भी हो सकता है । वह बस्ती जहाँ से द्रोणिका अर्थात दून घाटी शुरू होती है । वैसे देहरादून का रिश्ता देवघर या डेरा से भी जोड़ा जाता है । इसी कड़ी में ‘टिहरी गढ़वाल’ भी आता है । संदर्भों के अनुसार टिहरी / टेहरी शब्द ‘त्रिहरी’ यानी तीन विषयों ( मनसा, वाचा, कर्मणा ) का शमन करने वाला स्थान । यह व्युत्पत्ति काल्पनिक है । ‘टिहरी’ शब्द भी ‘देहरी’ का रूपान्तर है, ऐसा मुझे लगता है ।
संस्कृत की दिह् धातु से बना है ‘देह’ शब्द जिसका अर्थ काया, शरीर होता है मगर इसका मूलार्थ है ढाँचा, आवरण, कवच या बचाव । गौर करें दिह् में निहित लेपन के अर्थ पर । किसी वस्तु पर लेपन उसे सुरक्षित बनाने के लिए ही किया जाता है । देह एक तरह से शरीर के भीतरी अंगों का सुरक्षा कवच है । मोनियर विलियम्स के कोश के अनुसार ‘देह’ का अर्थ है आवरण, लेपन, मिट्टी, ढाँचा, साँचा, गूँथना, ढालना आदि। दार्शनिक अर्थों में देह को मिट्टी से निर्मित भी कहा जाता है और इसे किले की उपमा भी दी जाती है। गौरतलब है कि अंग्रेजी के ‘डो’ dough का अर्थ होता है सानना, गूँथना आदि । डो का रिश्ता भी प्रोटो भारोपीय धिघ् dheigh से जुड़ता । कबीर ने मनुष्य को माटी का पुतला यूँ ही नहीं कहा । देह, दिह्, दिज़् शब्दों के भावार्थों पर जाएँ तो माटी के पुतले के निर्माण की सारी क्रियाएँ स्पष्ट होती है यानी मिट्टी को पीटना, सानना, राँधना, गूँथना, साँचा बनाना और फिर पुतला बनाना । स्पष्ट है कि संस्कृत के दिह् और फ़ारसी के दीह या देह परस्पर समानार्थी हैं और एक ही मूल से निकले हैं । 
गौर करें, फ़ारसी के दीह / दिह या देह शब्द में मूलतः क़िलेबंदी, हदबंदी या परकोटा बनाने का भाव ही है । प्राचीनकाल में आबादियाँ इसी तरह रहती थीं । ‘वास’ करने की वजह से ही राजस्थानी में ‘बासा’ शब्द है । बस्ती के मूल में भी ‘वास’ ही है । सर रॉल्फ़ लिली टर्नर के कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ के अनुसार संस्कृत के देही में ढूह, क़िला, परिधि, चाहरदीवारी, परकोटा की अर्थवत्ता का समावेश हैं । सिन्धी में यह दिहु है जिसका अर्थ पलस्तर लगाना, परत चढ़ाना, मज़बूत करना, ढूह बनाना आदि । फ़ारसी में इसका एकवचन रूप दिह या देह होता है और बहुवचन रूप देहात है जिसका अर्थ ग्रामीण क्षेत्र है । डीएन मैकेंजी के पहलवी कोश में ‘देह’, ‘दिह’ में देश, इलाक़ा, ग्राम या क्षेत्र, भूमि जैसे भाव हैं और इससे बने पहलवी के ‘दहिगन’ में ग्रामीण या कृषक का भाव है । दहिगन का फ़ारसी रूप देहक़ान होता है । हिन्दी में इसे दहकान भी लिखा जाता है । देहक़ानी या देहक़ानियत का अर्थ होता है गँवारू, गँवई या उजड्डपन । यह ठीक वैसे ही है जैसे ग्राम से गाँव और फिर गँवई । किसी व्यक्ति को असभ्य के अर्थ में गँवार इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह उजड्ड होता है । मगर इसका आशय यह है कि ग्रामीण व्यक्ति शहरी संस्कार से अपरिचित होता है सो वह गँवार हुआ । बाद में गँवार का रूढ़ार्थ ही असभ्य हो गया ।

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