Wednesday, December 16, 2009

जैकब, जैकेट और याकूब

 

breastplateस द्री या सदरी का जो रूप आज ज्यादा चलन में है उसे हम जैकेट के नाम से ज्यादा जानते हैं। आम लोगों में खादी जैकेट ज्यादा लोकप्रिय है जिसे नेहरू जैकेट भी कहते हैं। जैकेट jacket हिन्दी में अंगरेजी से आया शब्द है मगर मूलतः इसके जन्मसूत्र सेमिटिक आधार से जुड़े हैं। जैकेट का रिश्ता यहूदी, ईसाई और इस्लामी ग्रंथों में उल्लेखित एक पौराणिक पात्र से भी है। अरबी के सक्क शब्द से जैकेट की व्युत्पत्ति मानी जाती है जिसका अर्थ होता है वक्षकवच या पेशबंद। स्पेनी भाषा में सक्क से बना jaco जिसका मतलब है कमर से ऊपर पहना जाने वाला एक छोटा वस्त्र। फ्रैंच में इसका रूप हुआ जैक jaque जिसका अर्थ है पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला कोट। अग्रेजी का जैकेट इसका ही रूप है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह फ्रैंच भाषा से निकला शब्द है जिसके मूल में सेमिटिक आधार ही काम कर रहा है। वैसे यूरोपीय भाषाओं में जैक सर्वाधिक प्रयुक्त और बहुआयामी अर्थवत्ता रखनेवाले शब्दों में एक है। यहां जैक शब्द की व्यापकता पर नहीं बल्कि जैकेट के साथ रिश्तेदारी के संबंध में ही चर्चा की जा रही है। हां इतना जरूर है कि प्रसिद्ध नर्सरी गीत जैक एंड जिल और मशहूर कहावत जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स का रिश्ता इससे ही है।
दरअसल उत्तरी फ्रान्स के देहातियों के लिए मध्यकाल में जैक jaque शब्द प्रचलित था जो प्राचीन फ्रैंच के Jacques का छोटा रूप है। एक खास किस्म की फतूही या बंडी उनकी पोशाक का हिस्सा थी जो jaquette कहलाती थी। यह सम्बोधन उपहासात्मक था जैसे ग्रामीण के लिए हिन्दी में गंवार शब्द प्रचलित है। अब तो अभद्र या बेढंगे व्यक्ति के लिए गंवार शब्द रूढ़ हो गया है। बाद में छाती को ढक कर रखनेवाले वस्त्र के तौर पर यह (jaque) समूहवाची शब्द एक पोशाक का नाम बन गया। जैक jaque शब्द से ही जन्मा है अंगरेजी का जैक jack जो यूरोप व अमेरिका में मां-बाप के लिए अपने पुत्र के सर्वाधिक लोकप्रिय नामों में एक है। फ्रैंच के Jacques का उद्गम लैटिन के जैकोबस Jacobus से हुआ। जिसका ग्रीक रूप जैकोबॉस था। स्पेनिश में इसका रूप जैगो या इआगो हुआ। पुर्तगाली में यह डिएगो हो गया। दरअसल यह सेंट इआगो शब्द युग्म के सेंटियागो रूप से  हुआ। ग्रीक में इसकी आमद सेमिटिक परिवार की भाषा हिब्रू के याकूब या याकोव शब्द से हुई है। बाईबल में याकूब का रूप जैकब हो जाता है। इसाक व रेबेका की संतान और अब्राहम के पोते nehru याकूब दरअसल एक पैगम्बर थे और ईसाई, यहूदी और इस्लामी धर्मग्रंथो में उनका उल्लेख है। यहूदी धर्म के तीन प्रधान संरक्षकों में अब्राहम और इसाक के बाद उनका भी नाम आता है। उन्हें बारह प्रमुख जनजातियों का संस्थापक भी माना जाता है। वे अपने भाई इसाहू के साथ जुड़वां पैदा हुए थे। याकूब का अर्थ ya- aqab बताया जाता है जिसका मतलब हुआ पैर की ऐड़ी पकड़नेवाला। माना जाता है कि जन्म के समय याकूब ने अपने भाई की अक़ब यानी पैर की ऐड़ी थामी हुई थी।
जो भी हो, याकूब नाम की व्युत्पत्ति का यह आधार वास्तविक नहीं लगता। इसके ठीक उलट, ईसाई संदर्भों में जैकब का अर्थ सुरक्षित और महान बताया गया है। ध्यान रहे, प्राचीनकाल से ही दुनियाभर के जनसमुदायों में अपनी वंश परम्परा किसी महान पितृपुरुष से स्थापित करने की परिपाटी रही है जो आगे चलकर बहुत जटिल संरचना का रूप लेती चली गई। उच्चवर्ग और निम्न वर्ग के लोग एक साथ एक समान ऋषियों और देवताओं, जिन्हें वे अपना पितृपुरुष मानते हैं, से सम्बद्ध नजर आते हैं। भारत की जनजातियों में भी सूर्य और चन्द्र की वंश परम्परा दिखती है और कुलीनों में भी। तात्पर्य यही कि जैकब द्वारा स्थापित बारह जनजातियों अथवा गोत्रों में से किसी एक जातीय समूह की पहचान जैकब के नाम से हुई। ध्यान रहे, समूचे यहूदी समाज के संरक्षणकर्ता होने के भाव का ही एक रूप योद्धाओं द्वारा पहने जाने वाले जिरह-बख्तर यानी एक किस्म के अंगरखा में नजर आता है, जिसमें सीने की रक्षा के लिए लोहे की पट्टियां लगी होती थीं। यानी इस शब्द के धातु मूल में रक्षा का भाव प्रमुख है। प्रायः हर दौर में फौजी या राजसी पोशाकें कुछ परिवर्तन के साथ आम आदमी की पोशाक बनती रही है। ऐसा उच्चवर्ग से प्रभावित होने और रहन-सहन में कुलीनता का आभास कराने के लिए हुआ। यही बात फ्रांस के एक जनसमूह और उसकी पोशाक के संदर्भ में सामने आती है जिसे Jaque, Jacques के नाम से जाना गया जो अगरेजी में जैकेट यानी एक किस्म की बंडी या सदरी, कहलाया।

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Monday, December 14, 2009

मोटी तोंद और प्रतिबिम्ब की बातें

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संस्कृत का नाभिक शब्द व्यापक अर्थवत्ता रखता है और विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक इसकी अर्थवत्ता में शामिल है।
हि न्दी में नाभि शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर पेट के मध्यबिन्दु के लिए करते हैं। नाभि यानी पेट के बीच का वह स्थान जिससे जन्म के समय से गर्भनाल जुड़ी रहती है। बोलचाल की हिन्दी में इसे तुंदी, डूठी भी कहा जाता है। नाभि के कुछ अन्य अर्थ भी हैं जैसे पहिए की धुरी या केंद्र। परमाणु के केंद्रक के लिए भी नाभिक शब्द का प्रयोग होता है। भगवान विष्णु का पद्मनाभ नाम भी है जो इसी मूल से उद्भूत है। पद्मनाभ का अर्थ होता है जिसकी नाभि में कमल है। नाभि में कमल धारण करनेवाले विष्णु दरअसल सृष्टि के स्वामि हैं। नाभि दरअसल सृष्टिकेंद्र का प्रतीक ही है। कमल का निहितार्थ भी ब्रह्माण्ड की रचना-शक्ति और बुद्धि के विकास से है। पौराणिक उल्लेखों में इसी कमल से ब्रह्मा जन्में हैं इसीलिए ब्रह्मा को भी कमलयोनि अथवा पद्मयोनि कहा जाता है।
इसी तरह अंग्रेजी में भी पहिए की धुरी, गोलाकार सतह या फिर केंद्र के लिए हब (hub) शब्द है। खास बात ये कि इन सभी मे रिश्तेदारी है। यही नहीं, फारसी उर्दू का नाफ शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा है। भाषाशास्त्रियों के मुताबिक इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु नोभ् या ओम्भ (nobh/ombh) से ये तमाम शब्द जन्मे हैं और इस शब्द के संबंध कई भाषाओं के शब्दों से है जैसे ग्रीक के ओम्फेलॉस, जर्मन के नेवेल, डच में नेवल, इसी तरह ओल्ड फ्रैंच में केंद्र, नाभिक या मंडल के लिए लोम्र्बिल (lombril) शब्द है जबकि आधुनिक फ्रैंच में नोम्ब्रिल, लिथुआनियन भाषा में बम्बा, ग्रीक में बेंबिक्स जैसे शब्द हैं। पौराणिक ग्रीक मान्यताओं के मुताबिक ओम्फेलॉस एक पवित्र शिला है जिसे पृथ्वी का केन्द्र माना गया है। ध्यान रहे, प्रायः हर संस्कृति में पृथ्वी या सृष्टि के मध्य बिन्दु की कल्पना की गई है। मध्य का अर्थ नियंत्रण या स्वामित्व से है। मनुष्य ने विकास के प्रारम्भिक दौर में ही जान लिया था कि प्रकृति पर उसका नियंत्रण नहीं है। वर्षा, शीत या ग्रीष्म जैसे प्रभाव अपने आप उत्पन्न होते हैं। तब तक मानव अपनी बुद्धि से किन्हीं क्रियाओं, गतिविधियों पर  काबू करना, नियंत्रण करना सीख गया था। यही बात वर्षा, शीत या ग्रीष्म के संदर्भ में उसे परेशान करती थी। इसके अलाव दिन और रात का होना। ये सब उसकी narayanaसमझ से परे था। नियंत्रण, केंद्रीय शक्ति जैसी बातें उसके मन में घर कर गईं। इसी मुकाम पर ईश्वर की परिकल्पना जन्मी। पृथ्वी, सृष्ठि या ब्रह्माण्ड की केन्द्रीय शक्ति के रूप में अलग अलग काल खण्डों प्रकृति के विभिन्न रूपों को स्थापित किया जाता रहा। संस्कृत का नाभिक शब्द व्यापक अर्थवत्ता रखता है और विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक इसकी अर्थवत्ता में शामिल है।
गौर करें, संस्कृत- हिन्दी के बिम्ब शब्द पर। इसका अर्थ भी गोल या मंडलाकार सतह ही होता है। यही नहीं मराठी मे तो नाभि के लिए बेंबी शब्द ही प्रचलित है। बिम्ब शब्द संस्कृत के विम्ब का अगला रूप है जिसका अर्थ है सूर्यमण्डल या चन्द्रमण्डल, गोल, घेरेदार सतह। ध्यान दें सूर्य या चन्द्र की चमकदार गोल सतह पर और उससे उत्पन्न रश्मियों के गोल दायरे में फैलने पर। विम्ब बना है संस्कृत धातु वी से जिसमें गोल, चमकदार सतह, प्रसरण या फैलाव, गर्भधारण करना आदि भाव हैं। प्रसार या फैलाव जैसी क्रियाएं आमतौर पर किसी बिन्दु से ही शुरु होती हैं। ध्यान रहे, छाया, प्रतिमा, प्रतिच्छाया, परछाँई, इमेज के लिए बिम्ब शब्द का प्रयोग बाद में शुरु हुआ। दृरअसल बिम्ब के गोलाकार रूप के साथ ही उसमें दृष्यता और आकार की स्थापना हो गई थी, लिहाजा बाद में किसी भी रूपाकार के लिए बिम्ब, प्रतिबिम्ब  का प्रयोग होने लगा। बिम्बफल का अर्थ है कुंदरू नाम की तरकारी। मूलतः यह एक फल है जो पकने पर गुलाबी आभा दर्शाता है। शृंगार के अर्थ में बिम्बोष्ठ शब्द का मतलब नायिका के होठों की सुर्ख गुलाबी रंगत से है। हिन्दी अंगरेजी समेत आज ज्यादातर भाषाओं में नाभि-नेवल शब्दों का प्रयोग पेट के मध्यबिंदु के लिए किया जाता है। वैसे अंगरेजी का हब भी नाभि से ही जुड़ता है, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ केंद्र या सेंटर के लिए किया जाता है। नाभि के अर्थ में alg हिन्दी में डूठी, ढुंढी, टुंडी, तुन्दी जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। वी या विम्ब के फैलाव वाले भाव ही संस्कृत के तुन्द् में भी हैं। तुन्द् का अर्थ है किसी बिन्दु से प्रसार होना, फूलना, फैलना आदि। बिन्दु में केन्द्र का भाव तो निहित है ही साथ ही उससे जुड़े प्रभाव का प्रसार भी इसमें स्पष्ट है। नाभि के लिए तुंदि शब्द इससे ही बना और बाद में इसके देशज रूप टुंडी, डूठी आदि सामने आए। मोटे पेट के लिए तोंद शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा है। तुन्द् का अर्थ फैलाव भी है और तोंद में यह उजागर है। गणेश जी को बड़ा पेट होने की वजह से ही लम्बोदर कहा जाता है मगर सामान्य आदमी को तुंदियल या तोंदियल कहा जाता है।
पश्चिमोत्तर भारत की हिन्दी में भी अधोवस्त्र के नाड़े या इजारबंद को बंधने के स्थान को नेफा कहते हैं। नेफा मूलतः इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है और इसका मूल भी नाभः या नाभि ही है जिसका अर्थ केन्द्र बिन्दु, मध्य-स्थान या गोलाकार है। नाफ यूं तो फारसी से आया शब्द है पर इसके मूल में नाभि को पहचाना जा सकता है। शरीर का मध्यबिन्दु नाभि है। कमरबंद या इजार बंद को बांधने की जगह नाभि से ही तय होती है। संस्कृत का नीवि शब्द भी इसी श्रंखला में आता है जिसका अर्थ कमर से ऊपर बांध कर पहने जाने वाला वस्त्र, गठान, इजारबंद, नाड़ा आदि होता है। संस्कृत के नीविबंध शब्द से जाहिर है कि लहंगानुमा एक पोशाक नीवि कहलाती थी। पंजाबी में ही नहीं, कुछ अन्य क्षेत्रीय भाषाओ में भी नाला या नाल का अर्थ नाड़ा अर्थात रस्सी, चेन या श्रंखला होता है जिसका अर्थ कहीं नाभि से जुड़ता है तो कहीं नड् यानी नल् से। मालवा, जहां मैं रहा हूं, चेन या श्रंखला के लिए नाल शब्द सुनता रहा हूं। जहां तक मैं समझता हूं, नाल गड़ना मुहावरे का अभिप्राय नाभिनाल, नाभिसूत्र या जन्मनाल से है। इसका घोड़े की नाल से संबंध नहीं है। नाल के जरिये ( प्लेसेंटा ) ही दरअसल शिशु और मां के बीच जैविक संबंध रहता है। यह एक सूत्र है जो शिशु की नाभि और मां की आहार नाल से जुड़ा रहताहै। जन्म के बाद भी यह नाल शिशु की नाभि से जुड़ी रहती है, जिसे बाद में अलग कर गोपनीय स्थान पर रख दिया जाता है। यह नाल एक किस्म के जुड़ाव का प्रतीक होती है।

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Saturday, December 12, 2009

पसीने की माया और स्वेटर का बुखार

संस्कृत-हिन्दी के स्वेद और अंगरेजी के स्वेट शब्द में गहरी रिश्तेदारी है और इससे ही जन्मा है स्वेटर.

खांचों में बंटी इस दुनिया में इन्सान के एक होने का तर्क गले उतारने के लिए समाजवादी तरीके से बात समझाई जाती है और अक्सर खून-पसीने का जिक्र किया जाता है। यानी खून सबका लाल होता है और पसीने में मेहनत ही चमकती नज़र आती है वगैरह-वगैरह। भाषा विज्ञान के नज़रिये से भी यही साबित होता है कि हम सब एक हैं। पसीने के लिए अंग्रेजी के स्वेट sweat और इसके हिन्दी पर्याय स्वेद की समानता पर गौर करें। दरअसल यह शब्द भी प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार का है और भाषाविज्ञानियों ने इसकी मूल धातु sweid मानी है जो स्वेद की मूल धातु स्विद् के काफी करीब है,जिसमें मुख्यतः पसीना आना मुख्य भाव है। आप्टेकोश के मुताबिक इसमें ऐसी क्रियाएं भी शामिल है जिनके जरिये शरीर में गरमाहट आती है या पसीना उत्पन्न होता है। मालिश किया जाना, चिकना किया जाना जैसी क्रियाएं भी स्विद् में शामिल हैं। इससे बना है स्वेदः जिसमें अर्थ श्रमकण, श्रमजल, पसीन आदि है। जूं और चीलर जैसे परजीवियों का एक विशेषण है स्वेदज अर्थात "पसीने से जन्मे हुए" भाव यही है कि पसीने से उत्पन्न नमी पर गंदगी जल्दी जमती है और गंदगी की वजह से ही शरीर पर परजीवी पनपते हैं।
यूरोपीय भाषाओं में स्वेद की रिश्तेदारी वाले शब्दों की बानगी देखें मसलन स्पैनिश में यह sudore है तो जर्मन में schweib है। डच ज़बान में यह zweet है और लात्वियाई में sviedri के रूप में मौजूद है। तमाम यूरोपीय भाषाओं में इसी तरह के मिलते जुलते रूप मिलते है पसीने के अर्थ वाले शब्द के लिए। मोटे तौर पर तो पसीना शब्द इस कड़ी का हिस्सा नहीं लगता । बोलचाल की हिन्दी उर्दू में स्वेद के अर्थ में सर्वाधिक यही लफ्ज प्रचलित है। ज्यादा मेहनत करने के संदर्भ में पसीने-पसीने होना जैसा मुहावरा भी इससे ही निकला है। दिलचस्प बात ये कि पसीना भी संस्कृत के स्विद से ही निकला है। स्विद में प्र उपसर्ग लगने से प्रस्वेदः बना। इसके प्रस्विन्नः जैसे रूप भी

worsted-wool 212 paul-joe-navy-pullover ...ब्रिटेन के जर्सी द्वीप से मिली ऊनी कपड़े और वस्त्र जर्सी को पहचान...

बने जिसका मतलब हुआ बहुत ज्यादा पसीना। प्रस्विन्नः> परसिन्नअ> पसीन्न> पसीना जैसे रूपों से होते हुए ही बना पसीना।
स्वेटर यानी सर्दियों का एक आम पहनावा। यह शब्द भी अंग्रेजी से हिन्दी में आया और आज गांवों से शहरों तक बेहद आमफहम है। सर्दियां आते ही आज तो दुकानें गर्म कपड़ों से सज जाती हैं और घर के बक्सों से स्वेटर भी निकल आते है। यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि किसी जमाने में डाक्टर की सलाह के बाद स्वेटर पहना जाता था। जैसा कि नाम से पता चलता है स्वेटर अंग्रेजी के स्वेट शब्द से बना है। जाहिर है स्वेटर के मायने हुए पसीना लाने वाला। पहले लोगों को जाड़े का बुखार आने पर पसीना लाने के लिए डाक्टर एक खास किस्म के ऊनी वस्त्र को पहनने की सलाह देते थे। तब इसे कमीज के अंदर पहना जाता था। बाद में जब सर्दियों से बचाव के लिए कमीज से ऊपर पहने जाने वाले पहनावे भी चलन में आए तो भी उनके लिए स्वेटर शब्द ही चलता रहा। सर्दियों में ही पुलोवर भी पहना जाता है। इस पर गौर करें तो पता चलता है इसका यह नाम गले की तरफ से खीच कर पहनने से (पुल-ओवर) पड़ा होगा। इस पर बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आ रहा है-वो ज़ाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है। कोई जो दूसरा पहन ले तो दूसरा ही लगे।।
गले की तरफ से खींच कर पहने जाने वाले एक अन्य वस्त्र का नाम जर्सी है। जर्सी शब्द गांव से लेकर शहर तक सभी स्थानो पर समान रूप से लोकप्रिय है। पूरी बाहों के पुलोवरनुमा स्वेटर या ऊनी वस्त्र को भारत में जर्सी कहने कहने का रिवाज है। यह अंगरेजी से आया हुआ शब्द है और भारत में ही नहीं, दुनियाभर में लोकप्रिय है अलबत्ता इसके साथ सर्दियों में पहने जाने वाले वस्त्र का जो ठप्पा लगा है, वैसा पूरी दुनिया में नहीं है। सबसे पहले जर्सी की व्युत्पत्ति की बात। जर्सी इंग्लिश चैनल में स्थित प्रसिद्ध चैनल आइलैंड्स नामक द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है जो ब्रिटेन का हिस्सा है। जर्सी द्वीप पर खास किस्म के ऊनी धागे का निर्माण होता है और जिससे एक बेहद नफ़ीस ऊनी कपड़े का निर्माण होता है जिसे वर्स्टेड क्लॉथ कहते हैं। भारत में भी वर्स्टेड ऊन की मांग है। जर्सी दरअसल इसी वर्स्टेड ऊन से बुनी हुई पोशाक है जिसका निर्माण जर्सीद्वीप पर शुरु हुआ और इसके नाम पर ही दुनियाभर में इस पोशाक को जाना गया। गौरतलब है कि ब्रिटेन एक ठण्डा मुल्क है इसलिए वहां सामान्य वस्त्र भी ऊनी धागे से ही बनते रहे हैं। इसे मोटे ऊनी वस्त्र और पतले ऊनी वस्त्र के तौर पर बांट सकते हैं। इसीलिए यूरोपीय देशों में जर्सी कमर से ऊपर पहना जाने वाला वर्स्टेड ऊन से बना एक सामान्य वस्त्र है जो पूरी बांह का भी हो सकता है, आधी बांह का भी और बिना बांह का भी। भारत की तरह जर्सी पर सर्दियों में पहने जाने वाले गरम कपड़े का ठप्पा नहीं लगा है। दुनियाभर के खिलाड़ियों की पहचान उनकी जर्सी के रंग और नंबर के आधार पर ही होती है।
दिलचस्प यह कि जिस वर्स्टेड ऊनी वस्त्र के लिए जर्सी का नाम ख्यात हुआ, वहीं ऊन की एक खास किस्म का वर्स्टेड नाम भी एक ब्रिटिश गांव के नाम पर ही ख्यात हुआ है। उत्तर पूर्वी ब्रिटेन के एक प्रान्त नॉरफॉक के वर्स्टेड गांव में बारहवीं सदी के आसपास बुनकर बिरादरी पनपी और उनके द्वारा तैयार भेड़ की नफीस ऊन ने इस देहाती नाम को फैशन की दुनिया में शोहरत दिलाई। ध्यान रहे है, दुग्धक्रान्ति के दौर में अपने देश में सर्वाधिक दूध देने वाली जिस जर्सी नस्ल की गाय का हल्ला था, उसका जन्म भी इसी जर्सी द्वीप पर हुआ था। सम्पूर्ण संशोधित और विस्तारित पुनर्प्रस्तुति

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Friday, December 11, 2009

सर्दियों में सदरी का ठाठ

chest सीने को ढक कर रखने, उसे सुरक्षा देने वाले वस्त्र के रूप में सद्र से सदरी शब्द बना
स र्दियां हमेशा सुहानी होती हैं। इस मौसम में कई किस्मों की फल तरकारियां खाने को मिलती हैं साथ ही लजीज चटपटी चीजों का लुत्फ तो है ही। ओढ़ने-पहनने की दृष्टि से भी यह मौसम खास होता है। जितनी किस्म के पहनावे इस मौसम के लिए हैं उतने किसी और मौसम में नहीं हैं। सामान्य पोशाक के साथ सर्दी से बचाव के लिए फैशनेबुल गरम कपड़ों से लदे फदे लोगों को इतराने का भी खूब मौका देती हैं सर्दियां। दिलचस्प तथ्य यह कि ज्यादातर गरम कपड़े सीने को सर्दी से बचाने के लिए पहने जाते हैं। इनके नामों पर गौर करें तो यह बात स्पष्ट होती है। सदरी एक ऐसा वस्त्र है जो शरीर के ऊपरी हिस्से यानी सीने को ठण्ड से बचाने के लिए पहना जाता है। हृदय और फेंफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों पर सर्दी का सर्वाधिक बुरा असर होता है। प्रकृति ने इसे महफूज रखने का नायाब बंदोबस्त किया है। मनुष्य का सीना एक मजबूत कवच का काम करता है। इसीलिए शौर्य के प्रतीक स्वरूप हमेशा सीना चौड़ा किया जाता है। हालांकि व्यावहारिक तौर पर सीने से ज्यादा मजबूत पीठ होती है।
सीना और पीठ के बीच जो कक्ष बनता है उसमें हृदय सुरक्षित रहता है।  सदरी बना है अरबी के सद्र शब्द से। यह मूल रूप से सेमिटिक धातु s-d-r से जन्मा है जिसमें सुरक्षित स्थान का भाव है। कुरआन में हृदय के लिए भी सद्र शब्द का उल्लेख है।  इसके मायने “सामने का”, “आगे का”  भी हैं। इन भावों के मद्देनजर सद्र sadr की जो अर्थवत्ता उभरती है उसमें सीना या छाती भी शामिल है क्योंकि यह शरीर सबसे प्रमुख हिस्सा है और सामने का हिस्सा है। शरीर के बीचोंबीच अवस्थित होना khadiभी खास बात है। सामने या आगे जैसे अर्थों पर गौर करें तो प्रमुख के तौर पर सद्र का अर्थ समझ में आता है। स्पष्ट है  कि सीने को ढक कर रखने, उसे सुरक्षा प्रदान करनेवाले वस्त्र के तौर पर सद्र से सदरी sdari शब्द बना जिसका मतलब होता है बिना बांह आस्तीन की बंडी या जैकेट। अरबी में सदरी को सद्री sadri कहते हैं।
प्रमुख के तौर पर भी अरबी, फारसी और उर्दू में सद्र शब्द है जो हिन्दी में सदर के रूप में प्रचलित है। सद्र में निहित सुरक्षित और प्रमुख स्थान का भाव भारत के कई हिस्सों के साथ जुड़े सदर शब्द से समझा जा सकता है। सदर बाजार sadar bazar, सदर मंजिल sadar manzil, चौक सदर, सदर डाकखाना sadar dakkhana यानी बड़ा डाकखाना या सदर अस्पताल यानी मुख्य अस्पताल जैसे नाम इन क्षेत्रों का महत्व बताते हैं। दीवानी अदालत के लिए भी सदर अदालत शब्द प्रचलित है और इसके न्यायाधीश को सद्रे-आला कहते थे। कई शहरों में मौजूद सदर बाजार दरअसल सरकारी मुलाजिमों, खासतौर पर फौजियों की आबादी में स्थित बाजार होता था। किसी प्रान्त या सूबे की राजधानी को मुकाम ए सद्र कहा जाता था जिसका बोलचाल वाला रूप सदर मुकाम बना। सद्रे-रियासत का मतलब हुआ राज्यप्रमुख। यह भी सदर रियासत के तौर पर प्रचलित है। सद्रे-आजम या सद्रे-दीवान प्रधानमंत्री का पद होता था। महफिलों-मजलिसों की अध्यक्षता करने की परिपाटी को सदारत कहते हैं जो इसी मूल से बना है। महफिल का प्रमुख व्यक्ति सद्र कहलाता है। ध्यान रहे, सभापति या अध्यक्ष का स्थान आयोजन में सबके मध्य होता है। सूर्योदय की वजह से दिशाओं में पूर्व दिशा को प्रमुख माना जाता है। इसीलिए सद्र का एक अर्थ पूर्व दिशा भी होता है। भोर के एक तारे को भी अरबी में अल-सद्र नाम मिला हुआ है। पूर्वाभिमुख आवासों को शुभ माना जाता है और इसीलिए किलों का प्रमुख द्वार भी पूर्व दिशा में बनाया जाता था जिसे सदरी दरवाजा sadari darvaza कहते थे।
सदरी से जुड़े कुछ अन्य शब्दों पर अगली कड़ी में चर्चा

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Thursday, December 10, 2009

स्नातक का दिव्य-नहान

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नि त्यकर्मों में नहाना एक ऐसी क्रिया है जिसके बिना कोई अपनी दिनचर्या शुरु नहीं करना चाहता। खासतौर पर हिन्दुओं में अंगप्रक्षालन को धार्मिक नैतिक कर्तव्य से जोड़ा गया है। हिन्दू धर्म के जितने भी आचार-संस्कार, मंगलकार्य हैं, वे प्रक्षालन अर्थात स्वच्छता के बिना सम्पन्न नहीं होते। आज घर के भीतर तक जूते पहन कर घूमने का चलन है मगर कुछ दशक पहले तक, बिना पानी से पैर धोए, घर के भीतर प्रवेश निषिद्ध था। यह क्रिया सिर्फ परिजन ही नहीं निभाते थे, बल्कि अतिथि और अन्य आगंतुकों के लिए भी आवश्यक थी। नहाना हिन्दी का क्रियापद है और यह संस्कृत के स्नान शब्द का तद्भव रूप है। स्नान में परिमार्जन, शुद्धिकरण जैसे भाव हैं। इसका जन्म स्ना धातु से हुआ है जिसमें मूलतः स्वच्छता का भाव है। इसका अर्थ है पानी से शरीर की सफाई करने का अनुष्ठान। शरीर को गीला करना, डुबकी लगाना, जल छिड़कना  आदि। गौरतलब है कि ज्यादातर धर्मों व जीवन पद्धतियों में स्वच्छता को महत्व दिया गया है। स्ना धातु में विशिष्ट प्रयोजनों के लिए नियत स्नान-विधियों का भी भाव भी निहित है।
महाविद्यालयीन शिक्षा के पहले सोपान को पार कर लेने वाला विद्यार्थी ग्रेज्युएट कहलाता है। हिन्दी में इस उपाधि को स्नातक कहते हैं और यह प्रचलित शब्द है। स्नातक शब्द का जन्म स्ना धातु से ही हुआ है। वाशि आपटे के कोश के मुताबिक प्राचीनकाल में विद्याध्ययन पूर्ण कर चुकने के बाद गुरुकुल छोड़ने से पहले एक विशिष्ट संस्कार के लिए अनुष्ठान होता था जिसके तहत ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए अपनी शिक्षा पूरी कर चुके ब्राह्मण बटुक को आनुष्ठेय स्नान की विधि से गुजरना होता था। यह स्नान दरअसल गृहस्थाश्रम में प्रवेश की भूमिका होती थी और यह समावर्तन संस्कार कहलाता था। प्रतीक रूप में यह स्नान ही विद्याध्ययन पूर्ण कर चुके ब्राह्मण की उपाधि और परिचय भी बना और इस तरह स्नातक शब्द बना।
 मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के अनुसार पुराणों में तीन तरह के स्नातक बताए गए है- (1) विद्या स्नातक वह है जो विद्याध्ययन पूरा करता है पर ब्रह्मचर्य आश्रम के सभी अनुशासनों को पूरा किए बिना गृहस्थाश्रम में प्रवेश की आज्ञा चाहता है। (2) व्रत स्नातक वह है जो ब्रह्मचर्य तो सिद्ध कर लेता है
 graphic1888 इलाहाबाद के माघ मेले (1888) के विभिन्न रूपों का एक ब्रिटिश कलाकार के द्वारा चित्रांकन
पर वेदाध्ययन नहीं कर पाता।(3) उभय स्नातक वह है जो विद्या और व्रत दोनों को सिद्ध कर गृहस्थ बनता है। पारंगत, प्रवीण और कुशल के अर्थ में हिन्दी में एक शब्द है निष्णात जो इसी मूल का है। स्ना धातु का एक अर्थ है गहरी डुबकी लगाना। निष्णात में इस भाव का बड़ा खूबसूरत विस्तार देखने को मिलता है। गहरी डुबकी का यहां अर्थ वही है जो गहरे पानी पैठ कहावत का है अर्थात किसी विद्या में खूब पारंगत होना, कुशल अध्येता अथवा ज्ञानी को निष्णात कहते हैं। नि+स्ना के मेल से बना है निष्ण जिसका अगला रूप निष्णात हुआ। संस्कृत के नि उपसर्ग में नीचे की ओर या गहराई प्रकट करने का भाव है। इस तरह निष्ण का अर्थ गहरी डुबकी सिद्ध हो रहा है। इसमें पूर्णता, विशेषज्ञता, विज्ञता, चतुर और कुशल का भाव है।
हिन्दी में स्नान के विविध रूप देखने को मिलते हैं जैसे नहान, न्हाण, असनान आदि। क्रिया के रूप में नहाना के साथ नहलाना भी प्रचलित है। स्नान में न सिर्फ शरीर की सामान्य सफाई का भाव है बल्कि पवित्र, शुद्ध जल से देवप्रतिमाओं, मांगलिक चिह्नों को अभिषिक्त करने का भाव भी है। नहान शब्द भी स्नान से ही बना है मगर इसमें विशिष्ट अवसर पर होने वाले स्नान का भाव ज्यादा है जैसे कुम्भ का नहान, छठी का नहान आदि। विशिष्ट तिथियों पर पवित्र नदियों के तट पर लगनेवाले मेलों के दौरान खास मुहुर्तों पर स्नानपर्व होते हैं जब श्रद्धालु जल में डुबकी लगाकर आराध्य का स्मरण करते हुए जलाभिषेक करते हैं। ज्योतिष की दृष्टि से भी स्नान का महत्व है। यह दरअसल प्राचीन सूर्योपासक संस्कृति की देन है। सूर्य जब मेष, तुला एव मकर राशियों में होता है तब नदियों में स्नान और सूर्योपासना का महत्व है। सूर्य जब मकर राशि में होता है तब माघ-स्नान का महत्व है। जनवरी में मकर संक्रान्ति पर्व पर देश भर के प्रमुख नदी तीर्थों पर माघ मेलों का आयोजन होता है जो खासतौर पर स्नानपर्व के तौर पर ख्यात हैं।
स्नान की कई विधियां प्रचलित हैं जैसे हस्त स्नान, चरण स्नान, पूर्ण स्नान, कटि स्नान आदि। हिन्दू धर्मकोश के मुताबिक स्नान के मुख्य तीन प्रकार हैः नित्य, नैमित्तिक और काम्य। नित्य स्नान वह है जो हर व्यक्ति को नैतिक-धार्मिक आधार पर करना अनिवार्य है। नैमित्तिक स्नान ग्रहण, अशौच आदि में होता है। काम्य स्नान का अर्थ पर्व-स्नान अथवा तीर्थ-स्नान भी होता है। इसके अलावा कई तरह के गौण स्नानों का भी उल्लेख है जैसेः 1.मान्त्र स्नान, जिसके तहत स्वयं या कोई पुराहित वेदमन्त्रों से अभिषिक्त करता है। 2.भौम स्नान अर्थात भूमि से स्नान। इसमें शरीर पर मिट्टी मली जाती है। 3.आग्नेय स्नान। इसमें शरीर पर पवित्र भस्म मली जाती है। 4.दिव्य स्नान। खिली हुई धूप में वर्षा-स्नान। 5.मानस स्नान अर्थात प्रभु का स्मरण करते हुए खुद में पवित्रता की अनुभूति करना।

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Wednesday, December 9, 2009

तौरतरीका और कार्यप्रणाली [लकीर-6]

bamboo c संबंधित कड़ियां-1.लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत [लकीर-1]2.रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2)3.कोलतार पर ऊंटों की क़तार [लकीर-3]4.मेहरौली, मुंगावली, दानाओली, दीपावली[लकीर-4]5.सूत्रपात, रेशम और धागा [रेखा-5]

प्र णाली का मतलब होता है किसी काम को करने की विधि या शैली। हिन्दी में इसके लिए तरीका शब्द सबसे आम है। प्रणाली का अर्थ है रास्ता, राह या रीति। कोई भी रास्ता एक रेखा या लीक होती है जिसके आधार पर लोग आगे बढ़ते हैं। प्रणाली बना है संस्कृत के प्रणालिका से जिसका अर्थ होता है किसी ताल या जलाशय से पानी निकलने का मार्ग या रास्ता। यह रास्ता नहर के रूप में भी हो सकता है और छोटी नाली के रूप में भी। पानी का गुण बहना है। अनियंत्रित बहाव से अव्यस्था होती है। इसलिए पानी को जिस मार्ग से होकर गुजारा जाता है, उसे प्रणाली कहते हैं। नदियां दरअसल प्राकृतिक रूप से निर्मित प्रणालियां ही हैं। मनुष्य ने प्राकृतिक जलप्रवाह को थाम कर बांध बनाए और उस पानी का नियंत्रित प्रयोग सिंचाई के लिए किया। प्रणाली या तरीका दरअसल किसी कार्य को करने की अनुशासित और स्वनियंत्रित व्यवस्था ही है। हिन्दी में परनाला या पनाला जैसे शब्द भी खूब चलते हैं जो प्रणाली से ही बने हैं, अलबत्ता इनका मतलब दूषित या गंदे पानी के बहाव का रास्ता है। स्वतंत्र रूप में कम मगर कार्यप्रणाली जैसे शब्द के जरिये प्रणाली का प्रयोग रोज बोलचाल में होता है। इसके लिए हिन्दी में तौरतरीका शब्दयुग्म भी खूब प्रचलित है।
प्रणाली के अर्थ में तरीका शब्द हिन्दी में सर्वाधिक इस्तेमाल होता है जो सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है। अरबी के तर्क Tarq से जन्मा है यह शब्द। अरबी में तर्क का मतलब होता है त्यागना, पीछे छोड़ना। भाव यही है कि किसी वस्तु, स्थान या वृत्ति को त्याग कर आगे बढ़ना। सो तर्क में पथ या रास्ते का अर्थ भी निहित है। इससे ही बना है तराका जिसका मतलब है राह, रास्ता, मार्ग, पथ, रोड आदि। मुख्य भाव है मनुष्यों और पशुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगातार विचरण करने से, पदचिह्नों के आधार पर बनी राह अर्थात पगडण्डी। इसमें नक्शेकदम का भाव भी है। पदचिह्न हमेशा मार्गदर्शक ही होते हैं। अरबी का तारिक शब्द भी इसी मूल का है जो फारसी उर्दू में भी प्रचलित है और पुरुष-नाम है। तारिक का मतलब होता है रात में सफर करने वाला। गौर करें, पुराने जमाने में अरब लोग रात में ही सफर करते थे क्योंकि दिन की तपिश सफर की इजाजत नहीं देती थी। सितारे भी रात में ही निकलते हैं। अरबी में सुबह के एक तारे का नाम भी यही है। तराका में पगडण्डी के भाव का विस्तार दिखता है इसी मूल से बने तरीकः या तरीका शब्द में। तरीका का अर्थ हुआ प्रणाली, शैली, युक्ति आदि। इसका अर्थ धार्मिक पंथ या परम्परा भी होता है। सूफी दर्शन में तरीक़त एक प्रमुख मार्ग है ईश्वर प्राप्ति का जिसका अर्थ आत्मशुद्धि या ब्रह्मज्ञान है।  तरीका व्यापक अर्थवत्ता वाला शब्द है। किसी किस्म की परम्परा, रिवाज अथवा धर्म जैसे अर्थ भी इसमें समाहित हैं। pathइस कड़ी का अगला शब्द है तरकीब जो हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में है। भाव वही है, युक्ति या उपाय। किसी काम को करने का विशिष्ट ढंग। खास तरह कि विधि।
प्रणाली बना है संस्कृत के नाड् से जिसका अर्थ है वनस्पति का खोखला तना। इससे ही बना है नाड़ी शब्द से जिसमें पोली टहनी या तने का भाव है। ट्यूब, नाली या पाईप जैसी संरचना का इसमें भाव है। शरीर की नसों, शिराओं, धमनियों को भी नाड़ी कहा जाता है। भाव रक्तवाहिकाओं की प्रणाली से ही है। यह जन्मा है नड् का मतलब होता है तटीय क्षेत्र में पाई जाने वाली घास, नरकुल, सरकंडा। गौर करें वनस्पति के इन सभी प्रकारों में तने का पोलापन जाना-पहचाना है। नाडि या नड का अर्थ बांसुरी भी होता है जो प्रसिद्ध सुषिर वाद्य है। है। बांस का पोलापन ही उसे सुरीलापन देता है जिससे बांसुरी नाम सार्थक होता है। नड् का पूर्वरूप है नल् जिसका अर्थ नालयुक्त वनस्पति है। अस्थी या हड्डी के लिए भी नल्ली शब्द प्रचलित है। हड्डी भी अंदर से पोली होती है। यह बना है नलकम् से जिसका अर्थ होता है शरीर की कोई भी लम्बी अस्थि। कमल के पौधे को नलिनी भी कहा जाता है क्योंकि इसका मुख्य आधार नालयुक्त होता है। धमनियों-शिराओं के लिए भी नाडि शब्द प्रचलित है। नलिन का अर्थ भी कमल ही है। ध्यान रहे, नहर जल मार्ग के अर्थ में प्रणाली शब्द पर विचार करते हुए हमें ध्यान रखना चाहिए कि दुनियाभर में सिंचाई और जलसंचार की पारम्भिक व्यवस्थाएं वनस्पतियों के पोले तनों को एक दूसरे से जोड़कर, उनमें जलप्रवाहित करने की तरकीब खोजने से ही बन पाई थीं। नाला, नाली, पनाला, परनाला जैसे शब्द इसी मूल से जन्मे हैं।
प्राचीन चिकत्साशास्त्र की एक प्रसिद्ध शाखा नाडी-चिकित्सा भी थी जिसके जरिये अधिकांशतः रनिवास की स्त्रियों की जांच की जाती थी क्योंकि साधारण लोगों की तरह रोग निदान के लिए उनका शरीर परीक्षण संभव नहीं था। नाडी-परीक्षण को ही फारसी में नब्ज देखना कहते हैं। मालवी राजस्थानी में आज भी सिंचाई की नालियों को नाडि या नाड़ा कहते हैं। कमरबंद को भी नाड़ा ही कहा जाता है। मूलतः यह होता सूत्र है मगर जिस वस्त्र को कमर पर बांधा जाता है उसके ऊपरी हिस्से में सूत्र डालने के लिए कपड़े को दोहरा कर पोली नाली बनाई जाती है। जाहिर है कमरबंद के रूप में धागा या सूत्र पिरोने के इस तरीके को प्रणाली कहा जा सकता है। नाडी से गुजरने की वजह से कमरबंद का नाम नाड़ा हुआ।

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Tuesday, December 8, 2009

सब ठाठ धरा रह जाएगा…[आश्रय-25]

banjaras  ताजा कड़ियां-पिट्सबर्ग से रामू का पुरवा तक…[आश्रय-24] शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22] मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16] ...

अं ग्रेजों के आने से पहले हिन्दुस्तान में फारसी के ठाठ थे क्योंकि वह सरकारी कामकाज की भाषा थी। जिसने फारसी पढ़ना लिखना सीख लिया, उसके ठाठ हो जाते थे। बाद में यह रुतबा अंगरेजी को मिल गया। अंगरेजी पढ़े-लिखे लोग बाबूसाब कहलाने लगे। जाहिर है साहब लोगों के ही ठाठ होते हैं। सैकड़ों सालों में विभिन्न भाषाओं के शब्दों के हेल-मेल से हिन्दी का जो स्वरूप ठाठदार बन गया था, वह उर्दू के हिस्से चला गया। बाद में जाति-धर्म के झमेले में उर्दू ऐसी फंसी कि इसके ठाठ अतीत की कहानी बन गए। चंद नेताओं को यह लगता रहा कि आजादी के बाद हिन्दुस्तान में उनके ठाठ नहीं रह जाएंगे सो उन्होंने पाकिस्तान का राग अलापा और उसे पा लिया। उनके ठाठ  के चलते वहां लोकतंत्र कुपोषण का शिकार हो गया और उसकी ठठरी भर रह गई है। इधर अपने देश में भी हिन्दी का बचाखुचा ठाठ धरा का धरा रह गया क्योंकि भाषा के पंडित राजभाषा भवन में इसके शुद्धिकरण का जाप करने लगे। हिन्दीवालों के कभी ठाठ नहीं हुए। हिन्दी के बूते जीने की इच्छा रखनेवाला सामान्य आदमी आज भी ठाठ को तरसता है। हिन्दी के जरिये मुंबइया सिनेमा और मीडिया घराने ज़रूर ठाठ कर रहे हैं, पर राष्ट्रभाषा के ठाठ के लिए वे कुछ नहीं कर रहे हैं।
भाषायी ठाठ के बहाने हम ठाठ पर ही चर्चा करना चाहते हैं। यह हिन्दी-उर्दू का खूब प्रचलित और मुहावरेदार अर्थवत्ता वाला शब्द है। आज ठाठ का इस्तेमाल शान-शौकत, एश्वर्य, तड़क-भड़क, दिखावा, आडम्बरपूर्ण जीवन आदि अर्थो में किया जाता है। ठाठ के मूल में संस्कृत की स्थ् धातु है जिसमें खड़े रहना, स्थिर होना, किसी जगह पर उपस्थिति होना, डटे रहना, विद्यमान होना, किसी आधार पर टिकना आदि भाव हैं। यह भारोपीय भाषा की धातु है और इस परिवार की सर्वाधिक व्यापक अर्थवत्ता वाली धातुओं में इसका शुमार है जिससे निकले

…ठाठ का असली अर्थ है घास-फूस या बांस के जरिये बनाया गया कोई ढांचा जिसे सब तरफ से ढक कर कोई आश्रय या निर्माण खड़ा किया जाए। इस तरह बड़े मकान वाले के बड़े ठाठ हुए…dhancha shelteBambooHutthhat 

शब्द दुनियाभर की कई भाषाओ में हैं। भाषाविज्ञानियों ने स्थ् से मिलती जुलती स्त् (sta) की कल्पना की है । अंगरेजी के स्टे stay यानी स्थिर होना, टिकना, स्टैंड यानी खड़े होना, स्टूल यानी मूढ़ा अथवा स्टेट यानी राज्य जैसे अनेक शब्दों के मूल में यही धातु है। गौर करें राज्य के अर्थ में स्टेट शब्द पर । राज्य दरअसल स्थान ही होता है। संस्कृत की स्थ धातु से ही बना है स्थानम् शब्द जिसका मतलब है राज्य, प्रांत, क्षेत्र या जगह। स्थान इसका ही रूप है। अवेस्ता होते हुए फारसी में इसका रूप हुआ स्तान जिसका मतलब वही रहा। तुर्की में भी इस शब्द की आमद हुई। रूसी भाषा में स्तान का अर्थ कैम्प या शिविर होता है। क्षेत्रीय नामों के साथ प्रत्यय के रूप में स्तान जुड़ने से देशो के नाम बने जैसे पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान आदि। आज हिन्दी में स्टेशन station के अर्थ में कोई शब्द नहीं मिलता है। देशी बोली का अड्डा शब्द विशेष अर्थों में प्रयुक्त होता है जैसे बस अड्डा। वैसे अड्डा समूहवाची शब्द है । संस्कृत में स्टेशन के लिए स्थानक शब्द है। महाराष्ट्र में स्टेशन के लिए कहीं कहीं स्थानक शब्द लिखा मिलता है, बाकी हिन्दी भाषियों के लिए यह लगभग अजनबी ही है। [स्थ धातु के अन्य शब्दों पर विस्तार से अगली किन्हीं कड़ियों में]
स्थ से ही बना है संस्कृत में स्थातृ शब्द जिसका अर्थ है ढांचा, आधार, थामनेवाला, स्थिरता देनेवाला। हिन्दी शब्दसागर में इसका अर्थ खड़ा होनेवाला बताया गया है। मोनियर विलियम्स के कोश में स्थातृ का मतलब है अगुआई करना, राह बताना, अधिकार, शक्ति आदि। इनका निहितार्थ समझें तो भाव थामने का ही उभर रहा है। स्थातृ से ही बना है ठठरी (ठाट्ठरी>ठठरी या ठटरी) जिसका अर्थ होता है कंकाल, ढांचा या पंजर। गौर करें कि मनुष्य का शरीर अस्थियों के ढांचे पर ही है। अस्थिपंजर के रूप में किसी भी जीव की देह को ठठरी कहा जाता है। ठठरी ही देह का आधार है। स्थातृ का देशज रूप ही ठाठ बना। ठाठ का असली अर्थ है घास-फूस या बांस के जरिये बनाया गया कोई ढांचा जिसे सब तरफ से ढक कर कोई आश्रय या निर्माण किया  जाए। स्पष्ट है कि निर्माण का यह स्वरूप आश्रय  का सबसे सस्ता और आधारभूत तरीका है जिसका इस्तेमाल अत्यंत प्राचीनकाल से होता आया है। हर युग में या तो गरीब की झोपड़ी घास-फूस और बांस बल्लियों से बनती रही या खानाबदोशों के डेरे इस ढंग से बनते रहे। जाहिर है, इसमें ऐश्वर्य या शानो-शौकत जैसी कोई बात नहीं थी। यहां घास फूस से बनाए गए फ्रेम या चौकोर पर्दे को टाटी, टट्टी या टट्टर शब्दों पर गौर करें। जान प्लैट्स टट्टी की व्युत्पत्ति तन्त्रकः से बताते हैं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत- इंग्लिश और वाशि आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में तन्त्रकः का अर्थ कपड़ा या कोरा कपड़ा बताया गया है। संस्कृत में तन्त्र का अर्थ करघा या धागा होता है। तन्तु इससे ही बना है। तन्तु+अग्र से ताग्गअ>ताग्गा होते हुए तागा और धागा का विकास हुआ है। भाव यही है कि घास-फूस से बुनी हुई रचना टट्टी है। किन्तु यह तार्किक नहीं लगती। हिन्दी शब्दसागर में टट्टी का विकास भी स्थातृ से  हुआ ही बताया गया है।
आश्रय की तात्कालिक व्यवस्था के संदर्भ में आवास के प्रारम्भिक ढांचे यानी ठाठ ने विकासक्रम में प्रतिष्ठा हासिल कर ली। घास-फूस और बांस से बने सामान्य आवासो से बड़ा आवास जब सामने आया तो जाहिर है वह बड़ा ठाठ कहलाया होगा। स्वाभाविक सी बात है, जिसके पास बड़ा आवास होगा उसे बड़े ठाठ वाला ही कहा जाएगा। ठाठ की महिमा मनुष्य के सुविधाजीवी होने से बढती गई। फिर तो एक दूसरे की देखा-देखी लोग अपना अपना ठाठ बदलते चले गए। इस तरह सबके निराले  ठाठ हुए। रहन-सहन के अंदाज से ही किसी के स्तर को जाना जा सकता है जिसमें आवास भी शामिल है। लोगों की पहचान झोपड़ी और हवेली से भी होती है। स्पष्ट है कि झोपड़ी वाले ठाठ ने हवेली वाले ठाठ का रूप ले लिया। इसीलिए अब चमक-दमक और तड़क-भड़क वाली जीवन शैली के लिए ठाठबाट जैसा शब्द इस्तेमाल होता है। ठाठ के साथ बाट यानी राह शब्द का अभिप्राय रीति या शैली से ही है। ठाठबाट से रहना यानी आभिजात्य जीवन शैली। बड़े तम्बू में सिनेमा दिखाए जाने की वजह से उमठवाड़ी बोली में टूरिंग टॉकीज को ठाठ्या टाकीज़ कहते है।
और अंत में नज़ीर अकबराबादी की इस पंक्ति से ठाठ का मार्मिक अर्थ प्रकट हो जाता है- सब ठाट पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बनजारा। गौर करें, बंजारों के डेरों पर। सूखी टहनियों से खड़े किए गए ढांचों पर चिथड़े-कपड़े टांग कर वे अपने अस्थायी आश्रय बनाते हैं। बंजारे किसी जगह ज्यादा दिन मुकाम नहीं करते। जब सामान बांध कर वे कूच करते हैं तब पीछे सिर्फ टहनियों के ढांचे भर रह जाते हैं। शरीर और आत्मा के संदर्भ में इसे देखें। आत्मा अनश्वर और गतिशील है। आयु पूरी होने पर आत्मा देह के बंधन से मुक्त हो जाती है और पीछे सिर्फ काया यानी ठाठ धरा रह जाता है।

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Sunday, December 6, 2009

किस्सा कुर्सी का

chair

आ सन के अर्थ में कुर्सी शब्द हिन्दी के सर्वाधिक बोलचाल वाले शब्दों में शामिल है। आज के ज़माने में का महत्व किसी से छुपा नहीं है। कुरसी अब पद और प्रतिष्ठा का पर्याय बन चुकी है। कुरसी सिर्फ एक आसन नहीं बल्कि प्रभाव, रुतबा और रुआब का प्रतीक बन चुकी है। राजनीति, प्रशासन में तो कुर्सी का महत्व है ही, अनाम किस्म के संगठन भी सिर्फ इसलिए चर्चा में आ जाते हैं क्योंकि वहां पद यानी कुर्सी हथियाने के किस्से आम हो जाते हैं। कुर्सी के लिए होने वाले जोड़ तोड़ से क़िस्सा कुर्सी का जैसा मुहावरा बनता है। हिन्दी में कई लोग इसे खुर्ची बोलते हैं, जो अशुद्ध प्रयोग है। दिलचस्प यह कि मराठी में खुर्ची रूप प्रचलित है और यह अशुद्ध नहीं है।
कुर्सी सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और हिन्दी तक पहुंचने में इसने लम्बा सफर तय किया है। इसका हिन्दी रूप कुरसी है मगर ज्यादातर लोग इसे अरबी की तरह कुर्सी ही लिखते हैं। भाषाविज्ञानियों ने इस शब्द का रिश्ता ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल और कुरआन में ढूंढा है। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक कुर्सी का मूल रूप प्राचीन आरमेइक भाषा के विभिन्न रूपों में मिलता है जिनमें बिब्लिकल आरमेइक भी है जिसमें kisse शब्द का उल्लेख राजसिंहासन, आसन, पीढा या पीठिका के अर्थ में है। इसकी मूल धातु अक्कद और आरमेइक में ks मानी गई है। अक्कद भाषा में इसका रुप kussu मिलता है। अरबी में इस धातु मे र वर्ण भी जुड़ता है और मूल धातु k-r-s बनती है। कुर्सी इसी से जन्मा है। इस धातु में  ईश्वर का आसन, शासक का राजसिंहासन जैसे भाव है साथ ही इसमें अध्ययन पीठ और राजभवन जैसे भाव भी शामिल हैं। chair_king_tutankhamunसिरियाई ज़बान मे यह कुर्सिया है जिसका मतलब है आसन या धर्माध्यक्ष, पंथप्रमुख। यहां अभिप्राय धर्मपीठाधीश्वर से है। सुडानी में इसका मतलब खटोला भी होता है। हिन्दी में कुर्सी नींव से ऊपर उठे उस चबूतरे को भी कहते हैं जिस पर सतह से ऊंचा रखने के लिए जिस पर मकान बनाया जाता है।
कुर्सी के लिए सीट seat शब्द भी प्रचलित है। प्रकारान्तर से सीट का अर्थ निर्वाचन क्षेत्र या चुनाव क्षेत्र होता चला गया। अंग्रेजी का सीट शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का है जिसके मूल में सेड sed धातु खोजी गई है जिसका अर्थ आसन या स्थिर होने से है। संस्कृत में भी सद् का अर्थ होता है बैठना, आसीन होना, वास करना आदि। पार्लियामेंट के लिए हिन्दी में संसद शब्द है। यह बना है सम+सद्=संसद। यानी जहां सभी सभासद साथ-साथ विराजमान हों। इसी तरह संस्कृत में आस् धातु में बैठने, लेटने, आराम करने का भाव है। इससे बने आसनम् का अर्थ है मूढ़ा, पीढ़ा, पीठिका, आसन आदि। आसन से अभिप्राय योगविधियों से भी है। व्यायाम की विभिन्न अवस्थाएं, प्रक्रियाएं भी आसन कहलाती हैं। योगमुद्रा भी आसन कहलाती हैं। आसन का अर्थ बैठने का स्थान भी होता है। आसन में पद की महत्ता समा जाती है, अतः उस पद के लिए भी आसन शब्द का प्रयोग होता है जैसे विधानसभा के स्पीकर के लिए आसन शब्द का प्रयोग किया जाता है। सिंहासन शब्द इसी मूल का है। प्राचीनकाल में शासक के बैठने की कुर्सी पर सिंहाकृति बनाने की परम्परा थी, जो शौर्य, वीरता की प्रतीक थी। सिंह शुरु से ही प्रभाव, पराक्रम और रुतबे का प्रतीक रहा है। इसी तरह आसन्दी शब्द का प्रयोग भी होता है आरामदेह, गद्देदार कुर्सी या आसन होता है। आसन शब्द से कई मुहावरे भी जुड़े है जैसे आसन डोलना यानी स्थिति कमजोर होना, आसन लगाना या आसन मारना अर्थात कहीं पर जम जाना या स्थायित्व का भाव।

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नाखुदा हम जिसे समझ बैठे…

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म नुष्य के शरीर का महत्वपूर्ण अंग है कान। इसकी व्युत्पत्ति हुई है संस्कृत की कर्ण् धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। कर्ण् धातु में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान की संरचना के संदर्भ में इन भावों का अर्थ स्पष्ट है। इससे बने कर्ण का अर्थ है किसी वस्तु को थामने वाली संरचना, बाहर निकला हुआ हिस्सा, हत्था, दस्ता या मूठ आदि। कर्ण शब्द की कान के संदर्भ में यहां गुणवाचक अर्थवत्ता भी है और भाववाचक भी। श्रवणेन्द्रिय होने की वजह से यहां स्पष्ट है कि कानों में ध्वनि प्रवेश करती है। इसी तरह सिर के दोनों और उगे कानों के संदर्भ में यह समझने की ज़रूरत नहीं है कि कान ही क्यों पकड़े जाते हैं। हाथ भी पकड़े जा सकते हैं, मगर हाथों पर मनुष्य का नियंत्रण है और उन्हें बांध कर किसी की गिरफ्त से बचा जा सकता है, जबकि कानों पर उसका नियंत्रण नहीं है, इसीलिए कोई भी इन्हें सहजता से थाम सकता है।

कर्ण से बना है कर्णधार शब्द जिसका हिन्दी में मुहावरेदार प्रयोग होता है। सर्वेसर्वा, जिम्मेदार, नेता, अगुआ अथवा  मुखिया के लिए कर्णधार शब्द का प्रयोग होता है। कर्ण का प्रयोग गणितीय शब्दावली में भी होता है जिसका मतलब त्रिभुज के सामने की रेखा से है। कर्ण का अर्थ किसी वृत्त की तिर्यक रेखा भी है। नाव के दोनो ओर तिर्यक स्थिति में लटकी पतवारों की रैखिक स्थिति भी कर्ण के गणितीय अर्थ को स्पष्ट करती है। कर्ण से कई शब्द बने हैं जैसे कर्णकटु अर्थात अरुचिकर ध्वनि, कर्णप्रिय यानी जो सुनने में भला लगे आदि। वैसे कर्णधार का मतलब होता है नाविक, मल्लाह या bellonaखिवैया। नेता या मुखिया के तौर पर कर्णधार का प्रयोग इसलिए होता है क्योंकि नाव सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति नाविक या मांझी ही होता है जिस पर यात्रियों को सही सलामत पार पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। सवाल है नाविक के संदर्भ में कर्णधार शब्द की व्याख्या क्या है। कर्ण+धार से बना है यह शब्द। धार से तात्पर्य धारण करने से है अर्थात जो कर्ण यानी पतवार को धारण करता हो, उसे थामता हो, वही है कर्णधार यानी नाविक। 
संस्कृत के कर्ण का एक अर्थ पतवार भी होता है। किसी वस्तु को थामने वाले अंग या हिस्से को भी कर्ण कहते हैं। नाव के पिछले हिस्से में चप्पू जैसा ही एक उपकरण होता है जो पतवार कहलाता है। यह आकार में कुछ त्रिकोणीय होता है। यह पानी में समाया रहता है और इसका जो हिस्सा पानी से ऊपर होता है वह डंडेनुमा होता है जिसकी मूठ नाविक यानी नायक के हाथ में होती है। पतवार के जरिये ही नाव को थामा जाता है, मोड़ा जाता है। यूं सभी नावों में पीछे की ओर पतवार नहीं होती। सामान्य तौर पर जो नावें होती हैं उनमें नाव की दोनो ओर पतवार थामने के ठीये होते हैं। चप्पू के जरिये ही नाव को खेया भी जाता है और मोड़ा भी जाता है। पतवार शब्द बना है पात्र+पालः से। पात्र का अर्थ हुआ किसी वस्तु का आधार, जलाशय, नदी का पाट आदि। पालः का अर्थ हुआ संभालना, दिशा बताना आदि। इस तरह पात्र+पालः > पात्तवड़>पत्तवाल>पतवार के क्रम में इसका रूपांतर हुआ।
नाविक के लिए फारसी, उर्दू में नाखुदा शब्द है। अनुदित या लिप्यंतरित उर्दू साहित्य के जरिये हिन्दीभाषी इससे परिचित हैं और नाखुदा शब्द का हिन्दी में भी सीमित प्रयोग होता है। नाखुदा बना है ना+खुदा से। ना से अभिप्राय है नौका या नाव और खुदा का मतलब हुआ मालिक या स्वामी। जाहिर है यहां नाव के मालिकाना हक की बात महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि नाव खेने वाले से ही अभिप्राय है। उर्दू शायरी में कर्णधार के अर्थ में नाखुदा शब्द का खूब इस्तेमाल होता रहा है-नाखुदा हम जिसे समझ बैठे। उसी कम्बख्त ने डुबोना था।।  आज राजनेताओं के संदर्भ में कर्णधार शब्द अपनी अर्थवत्ता खो चुका है। उनके बारे में तो यही शेर सही है। कर्णधार वही है जो मंझधार में डुबोए। अनेक सत्ता साझेदारों के प्रसंग में भी यही बात सही लगती है कि-राहज़न की बात कहूं किससे खुलकर। मीरे कारवाँ यारों, मीरे कारवाँ यारों।।
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Saturday, December 5, 2009

पिट्सबर्ग से रामू का पुरवा तक…[आश्रय-24]

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पिछली कड़ियां-शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22] मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

प र्वत हमेशा से मनुष्य का आश्रय रहे हैं। संस्कृत की कुट् धातु का एक अर्थ पहाड़ भी होता है। इससे ही कोट यानी किला शब्द बना है। कूट का अर्थ भी पर्वत है। पर्वतों पर मनुष्य का बसेरा दरअसल कंदराओं की वजह से था। पर्वतों की ऊंचाई पर आवास उसे शत्रुओं से भी बचाता था क्योंकि पर्वत हमेशा से दुर्गम रहे हैं। दुर्गम अर्थात जहां गमन करना दुष्कर हो, इसलिए पहाड़ का एक नाम दुर्ग भी है जो बाद में पहाड़ी किले का पर्याय हो गया। पहाड़ों पर बसने की वजह से ही देवी का नाम दुर्गा है जिन्हें पर्वतवासिनी होने की वजह से ही जनमानस ने पहाड़ांवाली भी कहा है। भाव यही है कि सुरक्षित आश्रय के लिए ऊंचाई का महत्व मनुष्य ने शुरु से ही जान लिया था। इसीलिए विकास के शुरुआती दौर में वह ऊंचे स्थानों पर रहता रहा। बाद में खुद के लिए ऊंची अट्टालिकाएं बनवाईं, ऊंची दीवारों वाले किले बनवाए। इसी कड़ी में आता है अरबी-फारसी का बुर्ज शब्द जो मूलतः इंडो-ईरानी भाषा परिवार का है।
बुर्ज का विस्तार और इसकी अर्थ-छाया भारोपीय परिवार की कई भाषाओं में देखने को मिलती है और इसके विभिन्न रूप कई शब्दों में साफ नजर आते हैं। प्रचलित अर्थ में बुर्ज का अर्थ होता है मीनार, टॉवर या गुंबद। बुर्ज की रिश्तेदारी संस्कृतbarh धातु बृह् (brih) या बर्ह (barh) से है जिसमें ऊंचाई, वृद्धि, खुरचना, बड़ा करना जैसे भाव हैं। वैदिक संस्कृत में इसका एक रूप vrih भी है। वृद्धि इसी से निकला है। बृहस्पति शब्द इसी मूल का है जिसमें गुरुता और विशालता दोनों हैं। इसी क्रम में आती है प्राचीन भारोपीय धातु bhergh जिसका अर्थ है किला या ऊंचाई पर स्थित आश्रय। वैदिक संस्कृत में इसी अर्थ में बर्हयति शब्द है जिसमें वृद्धि, विशाल, ऊंचाई, बारिश जैसे भाव हैं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में बर्हण् और बर्हिस्थ जैसे शब्द हैं जिनमें ऊंचाई, बुलंदी, पहाड़ जैसे भाव हैं। अवेस्ता में इसका रूप है बर्जन्त जो फारसी में बुर्ज हो गया। तुर्की में बर्ह (barh) का रूप बदल कर बोरा bora हो जाता है। अफगानिस्तान के प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र का नाम तोराबोरा में यही झांक रहा है। कभी यहां के शैल-शिखर कुख्यात आतंकी लादेन की शरण स्थली थे। मंगोलियाई, कज़ाख और तुर्की भाषाओं में बोरा का अर्थ बारिश, भारी वर्षा, बर्फबारी भी है। मूल रूप में भाव ऊंचाई का ही है। पानी आसमान से ही बरसता है और बर्फ पहाड़ों पर ही गिरती है। कुल मिलाकर बर्ह् में व्याप्त ऊंचाई का भाव बुर्ज में मीनार के तौर पर स्थिर हुआ। बाद में बुर्ज नगरकोट और किलों की पहचान बन गए। यूरोपीय भाषाओं में इसके विभिन्न रूप नगर, किला या बस्ती के अर्थ में प्रचलित हैं।
यूरोपीय भाषाओं में बुर्ज की व्याप्ति जबर्दस्त है। जर्मन में इसका रूप बर्ग burg है और अंग्रेजी में Berg. अर्थ वही है, घिरा हुआ स्थान, महल या किलेनुमा इमारत। बर्ग नाम वाले कई किले और कस्बे उन तमाम इलाकों में भरे पड़े हैं जहां जहां यूरोपीय पहुंचे जैसे स्ट्रॉसबर्ग, पिट्सबर्ग, ओल्डेनबर्ग। अंग्रेजी में इसका एक रूप borough (बरो या बरा) भी है जैसे एडिनबरा। स्कॉटिश में यह बर्घ है। ध्यान रहे बाद में बर्ग, बरो और बर्घJaisalmer-957_27 में आवासीय बस्ती का भाव समाहित हुआ। इसी कड़ी में आता है पुर्ग या पर्ग (purg) जो जर्मन और ग्रीक में अपेक्षाकृत कम प्रचलित शब्द है मगर इसमें भाव वहीं है। तुर्की के अनातोलिया प्रांत की भाषा है लीसियन जिसमें इसके प्रिज prije या प्रुवा pruwa  जैसे रूप मिलते हैं। यहां संस्कृत हिन्दी में नगर, बस्ती के अर्थ में व्यापक तौर पर प्रचलित पुर शब्द से इसकी साम्यता पर गौर करें। वेदों में इन्द्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ हुआ जो किलों को ध्वस्त करता है। वैदिक साहित्य में इन्द्र के द्वारा असुरों के भव्य दुर्गों को नष्ट करने का उल्लेख मिलता है।
मोनियर विलियम्स के इंग्लिश संस्कृत कोश में पुर् धातु का अर्थ विशाल दुर्ग है। इससे बने पुर या पुरी का अर्थ नगर, बस्ती, दुर्ग, किला, चहारदीवारी से घिरी बस्ती या आवास, कोठी है। पुर से कई शब्द बने हैं। पुरजन, पुरवासी का अर्थ है नागरिक, रहवासी। प्राचीन कलिंग राज्य की राजधानी का नाम पुरी था जो वर्तमान में उड़ीसा का महत्वपूर्ण शुहर है। प्राचीन भारत की सप्तपुरियों का उल्लेख पौराणिक ग्रंथो में मिलता है। अयोध्या मथुरा माया काशी काच्ञी अवंतिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तेता मोक्ष दायिकाः॥ ( अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी कांची अवंतिका और द्वारका ये सात मोक्षदायक तीर्थ क्षेत्र हैं) पूर्वी बोली में पुर या पुरी का पुरवा रूप मिलता है जिसका अर्थ मोहल्ला या टोला होता है जैसे रामू का पुरवा। इसका पुरा रूप भी मोहल्ले के अर्थ में ही है जैसे बिरजीपुरा अर्थात् ब्रिजपुर। विडम्बना देखिये कि अट्टालिका या कोट के अर्थ वाले पुर के पुरवा वाले स्वरूप में सिर्फ झोपड़ियां और कच्चे मकान ही मिलेगे। किसी साहूकार की एकाध पक्की मेड़ी वहां हो सकती है। यहां सुदूर एशिया माइनर में बोली जाने वाली लीसियन भाषा के प्रुवा pruwa शब्द की तुलना पुरवा से की जानी चाहिए।
आर्मीनियाई भाषा में यह burgn है, इसका एक रूप बुरगाना भी है जिसका मतलब पहाड़ी किला होता है। संभव है ताजिकिस्तान के एक पहाड़ी राज्य फरगाना के पीछे भी यह भर्ग, बुर्ज या बर्ग हो। भारत में मुगल वंश का संस्थापक बाबर फरगाना से ही भारत आया था। भारोपीय bhergh से ही जन्मा है अंग्रेजी का फोर्ट fort शब्द जिसका अर्थ है किला, कोट या दुर्ग। फोर्ट आया है लैटिन के फोर्टिस से। गौर करें इन तमाम शब्दों में प वर्णक्रम की ध्वनियां आपस में बदल रही हैं। उत्तरी ईरान के एक पर्वत शिखर का नाम एल्बुर्ज है जो करीब साढ़े पाच हजार मीटर ऊंचा है। इसमें बुर्ज शब्द साफ पहचाना जा सकता है। नाक के लिए भी इसी मूल से उपजे शब्द हैं जैसे रूसी में बुरुन burun और पर्शियन में बुर्ज़ burz. नाक मैं ऊंचाई का भाव अंतर्निहित है और इसीलिए नाक ऊंची रखना एक मुहावरा भी है और इन्सानी सिफ़त भी।  यूरोप में बर्ग उपनाम भी होता है। यह पदवी की तरह भी लगाया जाता है। जर्मन में इसका उच्चारण बोर्ग है।

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Friday, December 4, 2009

जागीर, जगह और जागीरदार

"जागीरदारियां तो खत्म हो गईं, पर लोकतंत्र में ये अभी कायम है। बस, जागीरों की परिभाषा बदल गई है."

स्था न के विकल्प रूप में जगह शब्द का इस्तेमाल सर्वाधिक होता रहा है। यह मूलतः फारसी का शब्द है और उर्दू, हिन्दी के अलावा भारत की ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाओं में इस्तेमाल होता है। जगह शब्द में स्थान के अलावा कई अन्य निहितार्थ भी हैं जिनके प्रयोग से मुहावरे का असर पैदा हो जाता है जैसे, जगह निकालना या जगह बनाना यानी अपने लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा करना, अवसर मिलना या बनाना। बोलचाल की हिन्दी में जगह का अर्थ नौकरी, पद या ओहदा भी होता है। दरअसल स्थान विशेष किसी वस्तु या व्यक्ति की स्थिति को बताता है। यही जगह है। अब ओहदा या पद भी स्थिति को ही दर्शाता है सो उसी अर्थ में जगह का इस्तेमाल भी होता है जैसे अक्सर नौकरी की सिफ़ारिश के संदर्भ में सुनने को मिलता है कि अच्छी जगह सेट करा दीजिए...
जगह फारसी शब्द है। फारसी में जा का मतलब होता है स्थान। समझ जा सकता है कि यह जा+गाह  के मेल से बना होगा। जा यानी स्थान और गाह यानी निवास, आवास, खेमा आदि। इस तरह जगह में किसी वस्तु या व्यक्ति के नियत स्थान का भाव है। उर्दू में जगह का उच्चारण जगा की तरह होता है। अक्सर लोग अपने नियत स्थान को जागीर भी मान लेते हैं। जागीर शब्द भी इसी मूल से उपजा है। यहां भी जा अर्थात स्थान या जगह की महिमा नजर आ रही है। फारसी के जा में गीर (जा+गीर) प्रत्यय लगने से  बना है जागीर। जा यानी स्थान और गीर यानी रखना, ग्रहण करना या धारण करना, अर्थात जागीर वह भूसम्पत्ति है जो शासन या राज्य की ओर से किसी व्यक्ति को राजस्व वसूली के उद्धेश्य या ईनाम के तौर पर दी गई हो। ऐसी भूमि के मालिक को जागीरदार का रुतबा मिलता था। जागीरदार दरअसल कोई पद  नहीं होता था, बल्कि परिस्थिति से पैदा रुतबा था, मगर अक्सर जागीरदार बनने के बाद लिप्सा बढ़ती थी और जागीरदार फिर जमींदार बनने के खेल में लग जाते थे। बादशाहों से गांव के गांव और रियासतें भी जागीर में मिलती थीं, सो ऐसे जागीरदार खुद को राजा से कम नहीं समझते थे। अंग्रेजों ने अपना काम निकालने के लिए ऐसे लोगों को ही राजा की उपाधि से भी नवाजा था। ऐसे लोगों के हक वाला इलाका जागीरदारी कहलाता था।
1857-1पुराने जमाने में सेवादारों को मुस्लिम शासकों की ओर से कुछ भूमि बख्शीश में दी जाती थी जिस पर उन्हें लगान नहीं देना होता था। गौरतलब है कि जागीर व्यक्ति विशेष को उसके आयुकाल के लिए ही दी जाती थी। व्यक्ति की मौत के बाद वह फिर शासन की सम्पत्ति कहलाती थी। इसी के चलते बाद में निम्नवर्ग के लोगों नें जागीरदार शब्द को अपना उपनाम भी बना लिया, क्योंकि पुरखे की मौत के बाद उनके पास जागीरदार का रुतबा तो जाता रहा, सो उस नाम को उन्होंने अपनी पहचान से जोड़ लिया। वैसे जागीरदार उच्चवर्गीय उपनाम है और उत्तर भारत से लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक तक इसकी मौजूदगी है।
जागीरदार से काफी ऊंचा होता था जमींदार का। जमींदार बना है जमीन+दार से जिसका अर्थ है भमिपति, भूस्वामी, जमीन का मालिक आदि। जागीरदार तो राज्य की कृपा पर निर्भर व्यक्ति था जबकि जमींदार राज्य के लिए काम करनेवाला, मगर खुदमुख्तार हैसियत वाला रुतबेदार व्यक्ति होता था। जमींदार प्रथा मुस्लिम शासकों के दौर में शुरु हुई थी जिसके जरिये राजस्व वसूली के लिए रुतबे और हैसियतवालों को शासन की ओर से बड़े क्षेत्र दे दिये जाते थे ताकि वे वहां से लगान वसूल कर राजा के खजाने को भर सकें। इस प्रथा से इन जमींदारों को प्रजा पर अत्याचार करने की छूट मिल जाती थी। अय्याश राजा इनसे आंखें मूंदे रहते थे, क्योंकि लगान वसूली के बूते ही उनकी ऐश टिकी हुई थी।

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Thursday, December 3, 2009

तंगहाली और आतंक का रिश्ता

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गरीबी अपने आप में डरावनी है
हि न्दी में फ़ारसी से आया तंग शब्द खूब प्रचलित है और इसके कई मुहारवरेदार प्रयोग मिलते हैं जिससे भाषा में रवानी और कहन में अनोखापन पैदा हो जाता है जैसे हाथ तंग होना यानी आर्थिक कष्ट होना या माली हालत ठीक न रहना। तंगी में गुज़ारा करना भी इसी कड़ी में है। तंग करना यानी परेशान करना। तंग-दिमाग़ यानी ओछी सोच रखना। उर्दू में तंग से बने कई शब्दयुग्म है जो कमोबेश उन्हीं अर्थों में हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे तंगहाल या तंगहाली यानी गरीबी, निर्धनता की अवस्था, तंगनजर या तंगज़ेहन यानि संकुचित दृष्टिकोणवाला, धर्मान्ध अथवा कट्टर धार्मिक, तंगदिल यानी ओछा, अनुदार, ओछी मानसिकता का व्यक्ति आदि। इसी तरह तंगख़याली का अर्थ भी संकीर्ण सोच वाला होता है। भाषायी कट्टरता से परे, जो लोग हिन्दुस्तानी जबान बोलने में यकीन रखते हैं, वे इन तमाम शब्दों का इस्तेमाल खूब करते हैं। कभी सोचा है कि हिन्दी के आतंक शब्द से फारसी के तंग की गहरी रिश्तेदारी है!!! तंगहाली में आटा गीला वाले मुहावरे को गरीबी में आटा गीला के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। गरीबी अपने आप में डरावनी है, आतंकित करती है। तंगी के चलते न जाने कितने लोग मौत को गले लगा लेते हैं। यह है तंगी का आतंक से रिश्ता।
तंग शब्द का अर्थ होता है संकीर्ण, संकुचित, कम, थोड़ा आदि। गौर करें कि किसी चीज़ की कमी या न्यूनता कष्टप्रद होती है। चाहे स्थान का छोटा या संकुचित होना हो या धन की कमी, अल्पबुद्धि हो या भाग्य की कमी ये सब तंग के दायरे में आ जाते हैं। इसीलिए तंग शब्द के साथ कष्ट, परेशानी, मुश्किल अथवा क्लेश का भाव भी जुड़ा हुआ है। कष्ट की अवस्था को तंगी में गुज़र इसलिए कहते हैं। किसी को परेशान करने के संदर्भ में अक्सर तंग होना या तंग करना का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में इससे तंगाई जैसा शब्द भी बना लिया गया है जिसमें खस्ता माली हालत का संकेत है। तंग शब्द इंडो-ईरानी परिवार का है और इसका संस्कृत रूप है तङकः जिसका अर्थ है बीमारी, व्याधि आदि। यह बना है तङकः धातु से जिसमें बर्दाश्त करना, सहन करना जैसे भाव हैं। सीधी सी बात है, शरीर के अवयवों को सुचारू कार्य करने में जब किसी कमी का सामना करना होता है, उससे ही विकार पैदा होते हैं जिसे व्याधि या बीमारी कहते हैं। इसीलिए इस शब्द में दुख झेलना, कष्ट में रहना, क्लेश या विपदा झेलना आदि भाव भी समाए हैं। तङ्कः का एक अन्य अर्थ है कष्ट में रहना, दुख atanki झेलना आदि। जाहिर सी बात है कि असामान्य परिस्थिति को ही सहन किया जाता है। संस्कृत में ही तङ्कः का अगला रूप बनता है तङ्गः जिसका अर्थ भी कष्टमय जीवन या अभाव ही है। मगर जब सहनशक्ति की सीमा चुक जाए तब इस तंगी या अभाव की कल्पना भी भयभीत करती है, सो तङगः में भय, डर का भाव भी निहित है।
संस्कृत की सहोदरा और प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता ने तङ्गः से ही तंग रूप ग्रहण किया जो फारसी में भी चला आया। यहां भी अर्थ वही रहे। गौर करें तङकः में जब आ उपसर्ग लगा तो बना आतङकः जिसका अर्थ है जरावस्था, रोग, व्याधि आदि क्योंकि ये सभी शरीर में किसी न किसी विकार या कमी के चलते ही उत्पन्न होते है। इसी के साथ आतंक में पीड़ा, कष्ट, व्यथा का भाव भी निहित है। व्याधि और पीड़ा का साहचर्य सहज ही है। पीड़ा का एक बार अनुभव हो जाने के बाद उसकी कल्पना भयकारी होती है सो आतङ्कः शब्द के साथ भय अथवा डर का भाव स्थायी हो गया और इससे बने हिन्दी के आतंक शब्द के साथ यह रूढ़ हो गया। हिन्दी में आतंक का मतलब सिर्फ भय, डर, दहशत है। मौजूदा दौर आतंक का दौर है। दिनभर समाचार माध्यमों के जरिये इस शब्द का इस्तेमाल होता है। आतंक से बना है आतंकवादी या आतंककारी अर्थात वह व्यक्ति जो भयादोहन के जरिये अपना काम साधता है। डर पैदा कर अपना मंतव्य सिद्ध करता है।  समाचार माध्यमों में कई भार आतंकवादी के वैकल्पिक रूप में उग्रवादी शब्द का प्रयोग भी होता है जो ठीक नहीं है। उग्रवादी और आतंकवादी में कर्म का फ़र्क है। उग्रवादी मूलतः उग्र राजनीतिक विचाराधारा का होता है, जबकि आतंकवादी हिंसक क्रिया-कलापों के जरिये अपना लक्ष्य पाना चाहता है। आज दुनियाभर में पसरे आतंकवाद के राजनीतिक निहितार्थ चाहे जो हों, पर इसके मूल में कहीं न कहीं किसी किस्म के अभाव, कमी, संकीर्णता जैसे कारण ही मौजूद हैं। जो लोग आतंकवादी बन रहे हैं उनमें कई ऐसे हैं, जिन्हें तंगहाली ने आतंकी बनने पर मजबूर किया है। हालांकि तंगहाली के अलावा तंगज़हनी, तंगनजरिया और तंगदिली भी आतंकवाद की बड़ी वजह है। 

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