Wednesday, March 18, 2009

क़िस्सा चावड़ी बाज़ार का [आश्रय-7]…

2667573250_7e35557867... पुराने ज़माने में सम्पन्न लोग पालकियों-बैलगाड़ियों में ही सफर करते थे। लबे सफर के बाद मुसाफिरों के लिए शहर के बीचों-बीच प्रशस्त स्थान पर ही सराय या धर्मशालानुमा व्यवस्था को चावड़ी कहा गया। 
भारत के कई शहरों में एक खास नाम का मौहल्ला, बाजार या बसाहट ज़रूर होती है जिसे चावड़ी या चावड़ी बाजार कहा जाता है। ग्वालियर और दिल्ली के चावड़ी बाजार का नाम इस संदर्भ में लिया जा सकता है। यूं भी चावड़ी chawdi शब्द अलग-अलग रूपों में हिन्दी में इस्तेमाल होता है। आखिर इस चावड़ी का मतलब क्या है ? पुराने समय से चली आ रही घनी आबादी के बीच चावड़ी बाजार नाम की बसाहट में तवायफों और नृत्यांगनाओं के डेरे भी होते रहे है। मुगल काल में दिल्ली के चावड़ी बाजार की एक खासियत यहां की तवायफें भी हुआ करती थीं। यहां की सघन गलियों में इनके ठिकाने हैं।
चावड़ी शब्द मूलतः दक्षिण भारतीय भाषाओं में विभिन्न रूपों में प्रचलित है। हिन्दी क्षेत्रों में इसका प्रयोग मराठों के उत्कर्षकाल में बढ़ा है मगर दक्षिणी भाषाओ में यह बहुत प्राचीनकाल से व्यवहृत होता रहा है। चावड़ी शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में ठोस जानकारी नहीं मिलती है। मलयालम में इसका रूप चावटी, तेलुगू और तमिल में यह चावडी है। उत्तर भारत में इसका चावड़ी रूप प्रचलित है। मोटे तौर पर चावड़ी शब्द का अर्थ है एक ऐसा सार्वजनिक स्थान जहां व्यापार-व्यवसाय के लिए लोगों की आमदरफ्त हो। गांव-देहात के विभिन्न मेलों-ठेलों से भी यह शब्द जुड़ा हुआ है। बहुप्रतीक्षित मेले के लिए जब भूमिपूजन होता है और पहले दौर की दुकाने आ जाती हैं उसे भी चावड़ी लगना कहते हैं। चावड़ी खुलना भी एक व्यापारिक टर्म है जो आमतौर पर पशु मेलों के समापन पर इस्तेमाल होती है। मेले  में व्यापारी पशुओं के सौदे करते हैं, उन्हें देखते-भालते और पसंद करते हैं। पेशगी रकम देकर सौदा पक्का किया जाता है मगर खरीद नहीं होती है। मेले के अंतिम दिन सौदे का पूरा भुगतान किया जाता है। सरकारी दस्तावेजों में जब इन सौदों का इन्द्राज शुरू होता है उसे कहते हैं चावड़ी खुलना। इस रूप में देखा जाए तो चावड़ी उस सरकारी दफ्तर को भी कहा जा रहा है जहां व्यापारिक सौदे पक्के हो रहे हैं।

चावड़ी में मूलतः अस्थायी मण्डप, छतरी, शामियाना या टैंट का भाव है । चावड़ी बाजार यानी जहाँ मण्डप, छाजन आदि डालकर दुकाने डाल ली गई हों । ऐसा वहीं होता है जहाँ काफिले, कारवाँ आकर रुकते हैं अथवा जहाँ व्यापारिक गतिविधियाँ होती हैं । चावड़ी खुलना का अर्थ यहाँ मेले का समापन भी है और दूसरे अर्थ में रजिस्ट्री के लिए उस पंडाल में कामकाज का शुरू होना भी है जहाँ सरकारी कारिंदा सौदों को दर्ज करता है ।
विभिन्न संदर्भों में चावड़ी का एक ऐसे स्थान के तौर पर उल्लेख है जहां लोगों का जमघट है। चावड़ी का एक अर्थ अदालत, पंचायत या कचहरी भी है। शहर के व्यस्ततम क्षेत्र में लोगों का जमाव ज्यादा होता है और ऐसा स्थान शहर का प्रमुख चौराहा होता है जहां चारों और से रास्ते मिलते हैं। हॉब्सन-जॉब्सन के प्रसिद्ध कोश में चावड़ी की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द चतुर+वाट से बताई गई है। चतुर का अर्थ चार की संख्या से है। संस्कृत की चत् धातु से यह बना है। चार या चौथा हिस्सा के लिए इस्तेमाल होने वाला चतुर्थ शब्द भी इसी मूल का है। चौकी, चौराहा, चौका जैसे आमफहम शब्द इससे ही निकले हैं। संस्कृत में वाट शब्द का अर्थ घिरा हुआ स्थान होता है। इसका एक अर्थ मार्ग या रास्ता भी है। इस तरह चातुर्वाट का अर्थ चारों और से घिरा हुआ स्थान या चौराहा हुआ। दक्षिणी बोलियों में प्रचलित इस शब्द का अपभ्रंश रूप चावटी-चावडी हुआ। एक ऐसा स्थान जहां लोगों के झगड़े सुलझाए जाते। एक तरह से अदालत। उपनिवेशकालीन एंग्लो-इंडियन शब्दावली में इसके लिए चौल्ट्री जस्टिस/चौल्ट्री कोर्ट्स शब्द खूब आया है। एक ऐसी इमारत जहां न्याय होता हो। इस इमारत के आस पास शहर के प्रमुख व्यक्तियों के निवास होते थे। पुराने ज़माने में सार्वजनिक स्थलों पर ही झगड़े सुलझाए जाते थे ताकि आबादी के बड़े हिस्से को इसकी जानकारी हो सके।
चावडी शब्द पहले दक्कनी हिन्दी में चावरी हुआ और फिर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में कुछ और बदले हुए रूप और अर्थ में चावड़ी बनकर पहुंचा। यहां इसका मतलब हुआ चारों और से घिरा हुआ ऐसा आश्रय,


chawri
ठिकाना जहां पद यात्रियों को आराम मिल सके।अलायड चैम्बर्स डिक्शनरी (p138) में भी इसका अर्थ कारवांसराय caravansary या राहगीरों के रुकने की जगह ही बताया गया है। कुछ संदर्भों में इसे पालकियों-गाड़ियों के रुकने की जगह भी कहा गया है।  जाहिर है पुराने ज़माने में सम्पन्न लोग पालकियों में ही सफर करते थे। लबे सफर के बाद मुसाफिरों के लिए शहर के बीचों-बीच प्रशस्त स्थान पर ही सराय या धर्मशालानुमा व्यवस्था को चावड़ी कहा गया। दूरदेश के मुसाफिर, जिनमें ज्यादातर व्यापारी ही होते थे, लंबे समय तक यहां मुकाम करते। यह क्षेत्र व्यस्त कारोबार की जगह बन जाते थे क्योंकि यात्रियों का आना-जाना लगा रहता था। इन्हें ही चावड़ी बाजार chawri bazar कहा गया। धनिकों के मनोरंजन के लिए ऐसे ठिकानों पर रूपजीवाओं के डेरे भी जुटने लगते हैं। इसीलिए चावड़ी बाजार शब्द के साथ तवायफों का ठिकाना भी जुड़ा है। ग्वालियर के चावड़ी बाजार की भी इसी अर्थ में किसी ज़माने में ख्याति थी।
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Monday, March 16, 2009

रिश्तों का धागा और डोला हिंडोला

 

rope 
रिश्ता शब्द के साथ संबंध का भाव पीछे से आता है मगर डोरी का भाव प्रमुख है। 
सं बंध के वैकल्पिक शब्द के बतौर रिश्ता शब्द बोलचाल में खूब प्रचलित हैं। संबंध यानी समान रूप से बंधे हुए। रिश्ता भी यही है। दो लोगों के बीच जुड़ाव ही रिश्ता होता है। संबंध तो चूंकि सम+बंध् से मिलकर बना है। बंध् में निहित बंधनकारी भाव स्पष्ट है। रिश्ता शब्द के साथ भी इसका प्रयोग होता है और रिश्तों का बंधन जैसा मुहावरा प्रचलित है। बंधन का काम तो डोरी से ही होता है। यही नहीं, रिश्तों की डोर भी मुहावरे के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है। जाहिर है डोर के साथ रिश्ते की रिश्तेदारी काफी मजबूत है।
रिश्ता शब्द यूं तो फारसी से आया है मगर यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसकी रिश्तेदारी संस्कृत, अवेस्ता और फारसी में है। इसके कई संबंधी इन भाषाओं में अलग-अलग रूपों में गुज़र-बसर कर रहे हैं। फारसी में रिश्ता का शुद्ध रूप है रिश्तः जिसका मतलब होता है धागा, सूत्र, डोरी, लाइन, कतार, भूमि की माप करने की डोरी अथवा सूत्र। संस्कृत की एक धातु है ‘ऋ’ जिसमें जाने और पाने का भाव है। इसी तरह ‘र’ वर्ण में भी रास्ते का भाव है जिसे ज्ञानमार्ग से जोड़ा जाता है। इससे बने संस्कृत के ऋषि शब्द का अर्थ गुरू ही है जो ज्ञान की राह बताता है।
ऋ से अवेस्ता में रस्तः शब्द बना जिसका फारसी रूप हुआ रास्तः जिसका मतलब है पथ, मार्ग, सरणि, पंथ आदि। फारसी-उर्दू में राह भी प्रचलित है और यह भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें कि पथ अथवा मार्ग की बनावट पर, इसके स्वभाव पर। यह एक रेखा होती है जो दो बिंदुओं को मिलाती है। रास्ता भी हमें कहीं न कहीं पहुंचाता है। दो गंतव्यों को जोड़ता है। सूत्र का काम भी यही होता है। धागा, डोरी, रस्सी, रास सबका काम यही है कहीं जाना और कुछ पाना। कुंए में रस्सी भेजी जाती है तभी जल आता है। रस्सी एक जरिया है, रस्सी राह है, रस्सी ही मार्ग है। रिश्ता शब्द में प्रमुखता से जिस डोर का भाव है वहीं दरअसल उसके सामान्य प्रचलित अर्थ यानी संबंध का आधार है। रिश्ता में जुड़ाव या बंधन का भाव ही प्रमुखता से उभर रहा है और संबंध के तौर पर ही इसका अर्थ प्रचलित है। रिश्ते बेहतर हों तो अक्सर उसकी तासीर में मिठास आ जाती है। मगर रिश्ता शब्द की रिश्तेदारी तो सचुमच मिठास से ही है। जिसे हम सेवईयां कहते हैं, फारसी में वह रिश्ता है। साफ है कि लंबे धागेनुमा आकृति की वजह से ही सेवईयों को रिश्ता नाम मिला है। रिश्ता समूचे ईरान, अरब, स्पेन, रूस, चीन, तुर्की आदि देशो में इसी नाम से जाना जाता है।
डोरी या रस्सी के लिए हिन्दी में धागा शब्द बेहद लोकप्रिय है। धागा शब्द काफी पुराना है। रहीम भी रिश्तों की बाबत जब कहते हैं तो धागा शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं-रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुडे़ गांठ पड़ जाए।। धागा शब्द बना है संस्कृत के तन्तु से। कहीं कहीं इसे तागा भी कहा जाता है। दरअसल धागा शब्द तागा का बिगड़ा हुआ रूप है। यह बना है तन्तु+अग्र के मेल से पहले यह ताग्गअ हुआ , फिर तागा और अगले क्रम में धागा बन गया। सुई में पिरोने से पहले धागे के अग्र भाग को ही छेद में डाला जाता है।
Bharat-Rahugana दोलन से बनी डोली में डोलने की क्रिया साफ नजर आ रही है। डोलने की क्रिया से ही रस्सी के अर्थ में डोर शब्द का निर्माण हुआ है।
तागा शब्द इसी आधार पर बना है।
इसी तरह धागे को सूत्र भी कहा जाता है। संस्कृत में सूत्र यानी कपास से बना हुआ तन्तु। सूत्र का मतलब होता है बांधना, कसना आदि। गौर करें कि कपास के लिए संस्कृत में सूत्रपुष्पः शब्द भी है। सूत्र का एक अर्थ गुर, संक्षिप्त विधि अथवा तरीका भी है। रस्सी के लिए डोर, डोरी जैसे शब्द भी हिन्दी-उर्दू में बहुप्रचलित हैं। संस्कृत धातु दुल् से बना है डोर शब्द। दुल में हिलाना, घुमाना जैसे भाव शामिल है। इससे बना है दोलः जिसका अर्थ होता है झूलना, हिलना, दोलन करना, एक जगह से दूसरी जगह जाना, घट-बढ़ होना। हिंडोला शब्द इससे ही बना है जिसका संक्षिप्त रूप डोला या डोली होता है। इसके लिए शिविका या पालकी शब्द भी प्रचलित है। दोलन से बनी डोली में डोलने की क्रिया साफ नजर आ रही है। डोलने की क्रिया से ही रस्सी के अर्थ में डोर शब्द का निर्माण हुआ है। झूलने के भाव से साफ है कि किसी जमाने में डोर उसी सूत्र को कहते रहे होंगे जिसे ऊपर से नीचे की ओर लटकाया जाए। मगर अब तो डोर का प्रयोग लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, गहराई हर तरह की माप में प्रयोग आने वाली रस्सी के लिए होने लगा है।

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Sunday, March 15, 2009

घर की रानी से नौकरानी तक…

ishtar_27[1]पिछली कड़ीः पुरुष की घबराहट का प्रतीक है महिला

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जननि के रूप में नारी पूरी कायनात में सबसे ऊंचे स्थान पर नजर आती है
त माम पूर्वग्रहों के बावजूद भारतीय संस्कृति में नारी के जो विभिन्न नाम मिलते हैं वे मातृसत्तात्मक समाज में उसके महिमामय रूप को प्रदर्शित करते हैं। इन नामों के देशज भाषाओं में बदले हुए रूपों में भी अतीत की नारी के गौरव के अवशेष नजर आते हैं। उदाहरण के लिए महिला शब्द मही में इलच् प्रत्यय से मिलकर बना है। कुछ विद्वान इसे मही+लास्य से मिलकर बना शब्द मानते हैं।
मही शब्द मह् धातु से बना है जिसमें गुरुता का भाव है। मही पृथ्वी को भी कहते हैं जिसे समस्त प्राणिजगत की जननि माना जाता है। मही का अर्थ राज्य, देश, साम्राज्य, भी है। मही नदीवाची शब्द भी है। अरावली पर्वत से एक नदी निकलती है जिसका नाम माही है, मूलतः मही से ही बना है। यह खम्भात की खाड़ी में समुद्र से मिलती है।  नारी अपने सबसे गौरवमयी रूप मां बनकर ही प्रकट होती है क्योंकि यही रूप उसे सृष्टि सृजन का प्रमुख भागीदार बनाता है। जननि के रूप में नारी पूरी कायनात में सबसे ऊंचे स्थान पर नजर आती है। क्योंकि वह उर्वरा है। वह सर्जक है। वह जीवनदायिनी है इसीलिए सर्वश्रेष्ठ है। मां के रूप में पृथ्वी के बाद सर्वाधिक सम्मानित गाय को भी महा कहा जाता है।  मही से बने महिला शब्द में नारी की महत्ता ही झलक रही है।
पुरुषाधीन होने के बाद गृहिणी के तौर पर चाहरदीवारी की सत्ता तक सीमित कर दी गई महिला से महिरारु, मिहरारू, महरारू, या मेहरारू जैसे अनेक रूप बने। हिन्दी की पूर्वी बोलियों में इसका अर्थ होता है पत्नी, घरवाली, भार्या आदि। महादेवी वर्मा के संस्मरण में एक निम्नवर्गीय स्त्री, दबंगों  को झिड़कती है-हम सिंह के मेहरारू होत सियारन के जाब ?  पत्नी की भूमिका जब जरूरत से ज्यादा घरेलू हो जाती है तो घरवाली भी होम मिनिस्टर की तथाकथित झूठी उपाधि की हकीकत समझ जाती है। अब उसकी सहायक के तौर पर कोई न कोई परिचारिका घर के कामकाज में हाथ बंटाती है। दिलचस्प यह है कि पत्नी को नौकरानी के रूप में देखनेवाले समाज ने सचमुच गृहसाम्राज्ञी की सहायिका के लिए मेहरारू से ही शब्द गढ़ लिया और महिला का एक नया रूप महरी या महिरी सामने आया जिसमें कामवाली बाई की अर्थवत्ता समायी है। नौकरानी शब्द हिन्दी में आम है मगर यह हमने फारसी से लिया है। नौकर में आनि प्रत्यय लगा कर हमने नौकरानी शब्द बना लिया। नौकरी शब्द भी इसी मूल का है।
मह् धातु की अवनति का एक अन्य उदाहरण मेहतर में सामने आता है। इसे पूरे देश में सफाईकर्मियों के लिए प्रयोग किया जाता है। शुद्ध रूप में यह है महत्तर यानी विशिष्ट, गुरुतर और बड़े काम करनेवाला। इस गुरुता का बोध रत्ती

  problog2महाराज्ञी से जुड़ी आन-बान-शान की कल्पना करते हुए लोगों मे अपनी लाड़ली के नाम के साथ रानी शब्द लगाना शुरू कर दिया।

भर भी मेहतर में नजर नहीं आता। ऐसा माना जाता है कि विदेशी आक्रमणों के वक्त पराजय की स्थिति में दासता और दंड से बचने के लिए विभिन्न सवर्ण वर्गों के लोग समय-समय पर अपने मूल स्थान से अन्यत्र स्थानों को पलायन करते रहे और आजीविका के लिए श्रमजीवी बने और महत्तर कहलाए। हर तरह की दुश्वारियां झेलते हुए इन्हीं में से कुछ समूह पनप गए और कुछ इस हद तक बदहाल हुए कि उन्हें जातीय गौरव की स्मृतियां तक छिन गईं क्योंकि ताकतवर वर्ग द्वारा उन्हें निकृष्ट कर्म अपनाने पर विवश किया गया। संभवतः मेहतर के मूल में यही हालात रहे हों। मेहतर से ही हमने मेहतरानी शब्द भी बना लिया।
कन्या के नाम के साथ रानी शब्द लगाने की भारत में परम्परा रही है। कई लड़कियों का नाम ही रानी होता है। सुधारानी, देविकारानी आदि ऐसे ही नाम हैं। रानी शब्द दरअसल राज्ञी से बना है जिसका अर्थ होता है राजमहिषी, मलिका, साम्राज्ञी आदि। आपटे कोश के मुताबिक यह राजन में ङीप् प्रत्यय लगने से बना है। संस्कृत के ज्ञ व्यंजन को हिन्दी में ग+य अर्थात ग्य की तरह से उच्चारा जाता है मगर इसमें ज+न अथवा ग+न की ध्वनि है। ङीप् प्रत्यय में ई का स्वर होता है जिसके लगने ले ज+न की ध्वनियां ज्ञ में बदल गई और बन गया राज्ञी शब्द जिसका अर्थ हुआ राजा की पत्नी, राजरानी। अपने तद्भव रूप में राज्ञी से फिर ज+न जैसी ध्वनियों का लोप हुआ और रानी शब्द जन्मा। साफ है कि रानी के पीछे राजा खड़ा हुआ है। महाराज्ञी से जुड़ी आन-बान-शान की कल्पना करते हुए लोगों मे अपनी लाड़ली के नाम के साथ रानी शब्द लगाना शुरू कर दिया। मह् धातु की महत्ता महाराज्ञी, महारानी, राजरानी, रानी में कायम रही। मगर फिर इसी रानी से कुछ स्त्रीवाची प्रत्ययों जैसे आनी, अनी, इन, आईन का निर्माण हुआ जिनसे क्रमशः नौकरानी(आनी), ज़मींदारनी, तहसीलदारनी(अनी), महाराजिन(इन), चौधराईन, ठकुराईन(आईन) जैसे शब्द भी बने। -जारी

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Saturday, March 14, 2009

मुफ्ती के फ़तवे…[संत-11]

पिछली कड़ियां:   glad_071508_chisti2_thumb[41] ख्वाजा मेरे ख्वाजा[संत-9] Colours-of-Holi-Festival-India-Print-C10100509[1] ये मतवाला,वो मस्ताना[संत-10]

मुफ्तियों को शरीयत के आईने में लोगों को राह दिखाने की जो जिम्मेदारी मिली थी उसमें धीरे-धीरे राजनीति प्रमुख होती चली गई। चिन्तन(क़ियास) का स्थान रूढिवादी सोच ने ले लिया।Gérôme_-_Mufti_Reading_in_His_Prayer_Stool
इ स्लामी संतों की आध्यात्मिक श्रंखला में ही आते हैं मुफ्ती। हालांकि मुफ्ती शब्द सूफी परंपरा के आध्यात्मिक गुरुओं की श्रेणी का नहीं है। आमतौर पर दरवेश, सूफी, कलंदर, फकीर आदि साधुपुरुष जहां इस्लाम के दायरे से कभी बंधे नहीं रहे और इस्लामी धर्मपद्धति शरीयत के हिसाब से नहीं चले इसीलिए इनमें से कई संतों को बेशरा भी कहा गया। इन्होंने जहां एकात्म ब्रह्मज्ञान का प्रचार-प्रसार धर्म की पारम्परिक प्रचलित व्यवस्था से हटकर किया वहीं मुफ्ती इस्लाम की धार्मिक व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा रहे है। मुफ्ती वह धर्मशास्त्री है जो कट्टर मुस्लिम धर्मप्राण लोगों की सामाजिक समस्याओं का निराकरण इस्लामी कानून के मद्देनजर प्रश्नोत्तर शैली में करता है और अंत में उसके आधार पर काग़ज़ के पुर्जे पर एक फ़तवा जारी करता है जो उस विवाद, मुद्दे या समस्या के संदर्भ में आइंदा भी मिसाल के तौर पर देखा जाता है। फ़तवा fatwa और मुफ्ती mufti में गहरी रिश्तेदारी है।
मुफ्ती शब्द बना है अरबी के अफ्ता afta से जिसमें वर्णन करना या जानकारी देना जैसे भाव हैं। इसका मतलब सामान्य कानूनी (शरई) सलाह भी है। इसके मूल में है सेमिटिक धातु प-त-व जिसका अरबी रूप होता है फ-त-व यानी सलाह, मश्वरा, राय देना। फतवा शब्द के मूल में भी यही धातु है। फतवा का मतलब है धार्मिक सलाह, व्यवस्था अथवा निराकरण। फतवा के बहुवचन रूप फतावी या फतावा हैं। मुफ्ती के पास किसी मामले में राय मांगने और फ़तवा जारी करने की पहल इस्तफ्ता कहलाती है। आमतौर पर लोग फतवा का मतलब निर्णय से लगाते हैं मगर ऐसा नहीं है। फतवा महज सलाह या राय है जिस पर अमल करना ज़रूरी नहीं है। मुफ्ती से अभिप्राय एक ऐसे प्रमुख धार्मिक व्यक्ति से है जो शरीयत के दायरे में विभिन्न मुद्दों पर लोगों को धर्मसम्मत सलाह देता है।
इस्लाम के सुन्नी पंथ के तहत मुफ्ती का पद बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लामी कानून शरीयत shariat के तहत इस्लाम का कोई भी अनुयायी मुफ्ती से सलाह ले सकता है। मुफ्ती इस्लामी कानून अर्थात शरीयत की व्याख्या चार प्रमुख दृष्टियों से करते हैं- कुरान, हदीस, इज्मा और क़ियास। शरीयत का अर्थ होता है मार्ग, रास्ता। इसकी व्युत्पत्ति शर् से बताई जाती है जिसमें आत्मज्ञान, इल्हाम अथवा दिव्यबोध का भाव है। शरीयत के चार प्रमुख स्रोतों में कुरान koran हदीस hadith , इज्मा ijma और कियास qiyas आते हैं। शरीयत में कुरान और हदीस को ही सर्वोपरि माना गया है। कुरान तो पैगंबर के वचनों का संग्रह है और उसे खुदाई माना जाता है जबकि हदीस में उनके हवाले से कही गई बातें लिखी हैं। विद्वानों का मानना है कि इसमें समय समय पर मिलावट होती रही है। ऐसा हर धर्म में, हर काल में होता रहा है। जब कुरान और हदीस की रोशनी में किसी मसले का हल या मार्गदर्शन नहीं मिलता है तब
fatwa_060108-1 ...प्रगतिशील उलेमा कियास के मार्ग में इस्लाम के उदारवादी भविष्य की राह देखते हैं...
इज्मा ऐ उम्मत अर्थात विद्वानों की मजलिस में बहुमत के आधार पर आम सहमति बनाई जाती है। अगर कोई पेचीदा मामला हो या ऐसी परिस्थिति पर फैसला लेना हो जिसका कुरान और हदीस की रोशनी में भी कोई हल न निकल रहा हो तब कियास (क़यास) के जरिये अर्थात आत्मज्ञान, अनुमान, स्वविवेक  से मुफ्ती अपनी राय कायम करता है और फ़तवा सुनाता है। प्रगतिशील नज़रियेवाले इस्लामी विद्वान शरीयत के इसी स्रोत में इस्लाम के नवोत्थान और उदारवादी भविष्य का मार्ग देखते हैं।
मुस्लिम आबादी वाले मुल्कों में मुफ्ती के अलग अलग रूप हैं मसलन अल्बानिया में इसे मिफ्ती, क्रोएशिया में मुफ्तिजा, रोमानिया में मुफ्त्यू, तुर्किक में मुफ्तू कहा जाता है। कई इस्लामी राष्ट्रों में मुफ्ती न्यायाधीश की तरह एक सरकारी पद होता है फर्क यही है कि उसके दिए गए फतवों को मानने के लिए कोई बाध्य नहीं होता। बीते कुछ वर्षों से भारत में भी मुफ्तियों के फ़तवे बहुत चर्चित हो रहे हैं। इन पर अमल कोई करे न करे मगर अपनी अनोखी सोच और प्रचारप्रियता के चलते थोक के भाव फ़तवे जारी करनेवाले मुफ्तियों की वजह से उनके पंथ के प्रति अन्य धर्मों के लोगों में गंभीरता का भाव कम हुआ है। सूफियों ने तौहिद अर्थात एकेश्वरवाद को अनलहक़ की रोशनी में देखा। निरंतर आत्मज्ञान की राह पकड़ी और ईश्वर, आत्मा, जीव,संसार के बारे में चिंतन करते रहे इसलिए एक ऐसा आध्यात्मिक साम्राज्य खड़ा कर पाए जिसकी बादशाहत किसी के पास नहीं थी। वहीं मुफ्तियों को शरीयत के आईने में लोगों को राह दिखाने की जो जिम्मेदारी मिली थी उसमें धीरे-धीरे राजनीति प्रमुख होती चली गई। चिन्तन (क़ियास) का स्थान रूढिवादी सोच ने ले लिया।

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Friday, March 13, 2009

बांकी चितवन और बांके की करतूत…

 

साठ के दशक की मुंबइया फिल्मों में अक्सर अक्सर खलनायक का नाम भी बांके हुआ करता था 14sld3
खू ब बन-ठन कर रहनेवाले व्यक्ति को हिन्दी में बांका भी कहा जाता है। अब यह कहने की ज़रूरत नहीं कि बांका जो भी होगा वह सजीला भी होगा। कोई भी व्यक्ति या तो पैदाइशी सुंदर होता है या बनाव-सिंगार से सजीला बनता है। पुरुषों में जब सजीले सलोनेपन की बात आती है तो कृष्ण की छवि ही मन में उभरती है। इसीलिए कृष्ण को बांकेबिहारी नाम भी मिला हुआ है।
बांका शब्द हिन्दी की अनेक बोलियों में भी प्रचलित है। अवधी से लेकर बृज, बांगड़ू, राजस्थानी, मालवी आदि कई भाषाओं में यह खूब प्रचलित है। गौरतलब है कि सजीले जवान के तौर पर बांका शब्द खूब प्रचलित है और इसमें श्रीकृष्ण की मनोहर मूरत भी नजर आती है मगर साठ के दशक की मुंबइया फिल्मों में अक्सर अक्सर खलनायक का नाम भी बांके हुआ करता था जिसकी करतूतों से यूं तो पूरा कस्बा मगर खासतौर पर नायिका ज्यादा परेशान रहती थी। कम से कम किसी नायक का नाम तो हमने बांके नहीं सुना। नायक और खलनायक की खूबियों वाले इस शब्द की जन्मकुंडली परखना दिलचस्प होगा। संस्कृत में एक एक धातु है वङ्क (वंक) जिसका अर्थ होता है टेढ़ा-मेढ़ा, मोड़ नदी का घुमाव आदि। वङ्क अथवा वंक से ही बना है संस्कृत-हिन्दी का वक्र शब्द जिसका मतलब होता है कुटिल, टेढ़ा, चक्करदार, घुमावदार आदि। दरअसल इसी वंक/वक्र से बना है बांका जिसमें कुटिलता और आकर्षण का भाव समाया हैं।
गौर करें कि कुटिल व्यक्ति हमेशा गोलमोल, घुमावदार बातें करता है, धोखेबाजी करता है, चक्कर में डालता है। उसके समूचे व्यक्तित्व में वक्रता होती है। इसीलिए वंक से बने बांके शब्द में खलनायक का भाव है। प्रसिद्ध रीतिमुक्त कवि घनानंद एक कवित्त में कहते हैं-अति सूधो सनेह को मारग है, जहां नैक सयानप बांक नही... अर्थात प्रेममार्ग में ज्यादा बांकपन यानी चतुराई नहीं चलती। सजीले, गबरू के तौर पर बांके शब्द का निहितार्थ समझना भी कठिन नहीं है। सज-धज के बाद चाल-ढाल भी बदल जाती है। जिसे अपने रूप, जवानी, और सज-धज का गुमान होता है वह जरा अकड़ कर चलता है। यह अकड़ ठीक वैसी ही होती है जिसका प्रयोग शतरंज के मुहावरे प्यादे से फ़र्जी भया, टेढ़ो टेढ़ो जात...में पूरी सटीकता से हुई है। अर्थात तरक्की होते ही चाल में अकड़ आ जाना। चाल की यह अकड़ ही व्यक्ति को बांका बनाती है। गौर करें तो पाएंगे कि अकड़ में ही टेढ़ापन है। बांका शब्द का खूबसूरती से कोई रिश्ता नहीं है। बल्कि बेहतर व्यक्तित्व के लिए बांका-सजीला होना जरूरी है। सिर्फ बांकपन से काम नहीं चलता। जिनके पास बांकपन के साथ सजीलापन नहीं होता दर असल वे बांकेबिहारी की जगह सिर्फ बांके बनकर रह जाते हैं। श्रीकृष्ण भी हर मुद्रा में बांकेबिहारी नहीं कहे जाते बल्कि होठों पर बांसुरी लगाए, कदम्ब के वृक्ष से कमर टिकाए हुए,एक पैर में दूसरे को फंसाए हुए तीन कोण पर झुकी हुई मुद्रा में ही उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है।
वंक का ही एक अन्य रूप है वंग जिसका अर्थ होता है लंगड़ाना। मालवी में किसी चीज़ के टेढ़ा होने को भी बांका होना कहा जाता है। इसी तरह टेढ़ी चाल वाले या अपाहिज व्यक्ति को देशी अंदाज़ में ढके छिपे ढंग से आड़ा-बांका भी कहा जाता है। वंग का ही एक रूप है

krishna-boy ...श्रीकृष्ण भी हर मुद्रा में बांकेबिहारी नहीं कहे जाते बल्कि होठों पर बांसुरी लगाए, कदम्ब के वृक्ष से कमर टिकाए हुए,एक पैर में दूसरे को फंसाए हुए तीन कोण पर झुकी हुई मुद्रा में ही उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है।

भङ्ग या भंग। संस्कृत में भङ्ग का मतलब भी टेढ़, तिरछा, मोड़ा हुआ, सर्पिल, घुमावदार आदि ही होता है। गौर करें भंगिमा शब्द पर। हाव-भाव के लिए नाटक या नृत्य में अक्सर भंगिमाएं बनाई जाती हैं। चेहरे पर विभिन्न हाव-भाव दर्शाने के लिए आंखों, होठों की वक्रगति से ही विभिन्न मुद्राएं बनाई जाती हैं जो भंगिमा कहलाती हैं। इस संदर्भ में बांकी चितवन या तिरछी चितवन को याद किया जा सकता है जिसका अर्थ ही चाहत भरी तिरछी नज़र होता है। श्रीकृष्ण की बांकेबिहारी वाली मुद्रा को इसी लिए त्रिभंगी मुद्रा भी कहते हैं। त्रिभंगीलाल भी उनका एक नाम है। भंग के टेढ़े-मेढ़े अर्थ में ही टूट फूट भी समायी हुई है। भंगुर या क्षणभंगुर का मतलब होता है टूटने योग्य जो इसी मूल से बना है। इस वंक या भंग से जब व और भ वर्ण (व्यंजन) को लुप्त किया जाता है तो शेष बचता है अंग या अंक जिसमें फिर टेढ़ा-मेढ़ा का भाव है। गौर करे कि शरीर के अंग अर्थात हाथ या पैर इसी वजह से अंग हैं क्योंकि इनमें मुड़ने, घूमने का स्वभाव निहित है। अंग से बनी हैं अंगुलियां जो अगर टेढ़ी न होतीं तो डिब्बे में से कभी घी भी नहीं निकलता अर्थात मुश्किल कामों को अंजाम नहीं दिया जा सकता था।
विस्तार से देखें... एंकर पर अंकुश नहीं

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Wednesday, March 11, 2009

हमने भी मना ली होली…

 HOLI09 019ऊपर- चलिये कुछ स्माइल हो जाए…

दाएं- राधिका बुधकर, स्मिता वडनेरकर, माला तैलंग, दिनकर तैलंग(दीदी व जीजाश्री), अबीर वडनेरकर और प्रयूष ताटके(भांजा)HOLI09 051सुनील, अभिराम बुधकर (कजिन) व पिताजी के साथ
HOLI09 027
HOLI09 022अभिराम-प्रयूष-अजित HOLI09 023अजित –स्मिता-दिनकरजी-माला
HOLI09 030  HOLI09 034 दाएं- राधिका अभिराम. ऊपर - प्रयूष(भतीजा) के साथ नन्ही आरोही और अंकिता (भतीजी

नीचे- बस, कुल जमा इतने ही लोग थे हम…
HOLI09 047HOLI09 055 ऊपर-माताजी के साथ मैं और अंकिता
नीचे- आरोही के साथ अबीर
HOLI09 042

बु धवार को होली खेलने का कोई मूड नहीं था। हमेशा की तरह सुबह तीन से चार बजे की बीच सोए थे और बारह बजे तक उठने का मूड था कि जगा दिये गए। बताया गया कि बड़ौदा से अभिराम और राधिका आए हैं। अभिराम हमारा छोटा भाई है-हरिद्वार वाले मामाश्री का बेटा। राधिका बुधकर उसकी जीवनसंगिनी है.. वीणा साधिका।  … अभिराम का होली पर भोपाल आने का कोई कार्यक्रम नहीं था। ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो होली पर भोपाल आए। यूं राधिका और अभिराम का भोपाल आना-जाना लगा ही रहता है। राधिका के वीणा वादन के सिलसिले में या अन्य पारिवारिक आयोजन में। राधिका ग्वालियर निवासी हैं और जब भी बड़ौदा से ग्वालियर जाती हैं, तब हमेशा अभिराम उन्हें भोपाल तक छोड़ जाते हैं और यहां से वे शताब्दी एक्सप्रेस में बैठ जाती हैं। सुबह आने और दोपहर को जाने के बीच के अंतराल का लाभ हम सब परिजनों को मिलता है। अभि-राधिका और इनकी प्यारी सी बिटिया अरु यानी आरोही से मिलने की इच्छा सभी की रहती है।
अभिराम इस बार भी होली के निमित्त नहीं बल्कि राधिका के छोटे भाई के यज्ञोपवीत कार्यक्रम में शरीक होने ग्वालियर जा रहे थे। उन्हें हमेशा की तरह दोपहर ढाई बजे वाली शताब्दी पकड़नी थी। बस, इस वक्त का लाभ उठाया गया और होली मना ली गई। भोपाल में हमारे कुटुम्ब के तीन प्रमुख परिवार पासपास ही रहते हैं सो सब लोग इकट्ठा हो गए  और रंग जम गया।  कुछ हल्का-फुल्का नाश्ता हुआ और फिर दोपहर को डेढ़ बजे सबने दीदी के घर पर भोजन किया। दम-आलू के साथ पुलाव। दहीबड़े। खाने में देर हो गई। मगर सड़कें खाली थीं। हमने रफ्तार पकड़ी और ट्रेन छूटने के ठीक दो मिनट पहले मेहमानों की सुखद रवानगी करा दी। इस बार जल संकट है। बारिश कम हुई। भोपाल का बड़ा ताल भी सूखता जा रहा है। हर साल सूखी होली की अपील खाली जाती है। मगर इस बार हमें भी लोग पानी की कमी को गंभीरता से लेते नजर आए। इस मौके की कुछ रंगबिरंगी छवियां आपके साथ साझा करने का मन हुआ। आप भी लें आनंद।
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Tuesday, March 10, 2009

ये मतवाला, वो मस्ताना…[संत-10]

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हो ली के साथ जो भाव सर्वाधिक जुड़ा हुआ है वह है मस्ती और उल्लास का। वसंत और फागुन का मिला-जुला आनंदातिरेक ही होली का उल्लास है मस्ती है। अतिशय उल्लास से ही उन्माद की सृष्टि होती है। मगर उन्माद के लिए लोग प्रायः नशा भी करते हैं उसकी वजह से कहीं रंग में भंग होता है और कहीं भंग (भांग) से रंग चढ़ता है। मस्ती, मस्ताना, मतवाला जैसे शब्दों की होली से खूब सोहबत है। होली के इन संगी-साथियों की कुछ खबर ली जाए।
हिन्दी में मस्त शब्द फारसी से आया है और यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है। फारसी में मस्तम, मस्तान, मस्ताना और मस्ती जैसे रूप मिलते हैं जो सभी उर्दू-हिन्दी में भी मौजूद हैं। फारसी का मस्त शब्द बरास्ता अवेस्ता संस्कृत के मत्त से रिश्ता रखता है जिसका अर्थ होता है आनंदातिरेक, नशे में चूर आदि। इस नशे की व्याख्या यहां नहीं है कि नशा मादक पदार्थ का है अथवा आध्यात्मिक है मगर यह साफ है कि मत्त वही व्यक्ति है जो अपने आपे में नहीं है, जो दुनिया के सामान्य क्रिया-कलापों से अनभिज्ञ है। जो खुद में गाफिल है।
हिन्दी उर्दू में मत्त से ही बना है मतवाला जिसका मतलब होता है नशे में चूर। मत्त अथवा मतवाला का अर्थ घमंडी अथवा गर्व से इतरानेवाला भी होता है। जाहिर है घमंड की वजह भी धन, बल, संतान, स्त्री, ज्ञान की अधिकता ही है। सो वह भी एकतरह का नशा ही उत्पन्न करती है। इसलिए घमंडी व्यक्ति का व्यवहार भी मतवालों जैसा ही होता है। मतवाला शब्द का प्रयोग ज़रूरी नहीं कि शराबी के लिए ही हो। मस्तमौला भी मतवाला ही है। हिन्दी की व्यंग्य पत्रकारिता में मतवाला नाम मीला के पत्थर की हैसियत रखता है। आज से करीब नब्बे साल पहले कलकत्ता से मतवाला का प्रकाशन होता था। तत्कालीन भारत के समाज, राजनीति और नेताओं पर की गई मुंशी नवजादिककलाल श्रीवास्तव और शिवपूजन सहाय की टिप्पणियां कालजयी हैं।  मत्त से ही बना है मत्सरः शब्द जिसका हिन्दी रूप मत्सर है। इसका मतलब होता है लालची, ईर्ष्यालु, द्वेष रखने वाला, घमंडी अथवा दुष्ट। धर्मग्रंथों में मत्सर को बड़ी बुराई बताया जाता है। हाथी जब कामभावना से उन्मत्त होता है तब उसके कान से एक द्रव का स्राव होता है जिसे मद कहते हैं। इस अवस्था में हाथी मनुष्य के काबू में नहीं रहता। इसीलिए हाथी को भी मत्त कहा जाता है क्योंकि वह “मदवाला” होता है। इस अवस्था में हाथी विक्षिप्त भी हो जाता है। मत्त का एक अर्थ पागल भी होता है। वैसे भी घमंड या नशे के प्रभाव में मनुष्य का स्वभाव सामान्य कहां रह पाता है।
होली पर जिस मस्ती की बात चली है वह मस्ती सूफी संतों पर तो बारहो महिने छायी रहती है। इसी लिए सूफियाना कलामों में और सूफी संतों को मस्ताना, मस्त कलंदर आदि कहा जाता है। खुशमिजाज़ तबीयत के इन्सान को मस्तमौला कहा जाता है। इस मुहावरे से भी सूफियाना सिफत

वसंतोत्सव को ही मदनोत्सव कहा गया है। होली के साथ नशा यूं ही नहीं जुड़ा है। होली ही दरअसल मदनोत्सव है। Colours-of-Holi-Festival-India-Print-C10100509

ही झलक रही है। सूफी दार्शनिकों की निगाह में मस्त वह है जो ईश्वर के प्रेम में निमग्न है। ईश्वर भक्ति में आनंदलीन है। प्रभु की भक्ति में खुद को इस कदर मशगूल रहना की दीन-दुनिया की ख़बर न हो, वही है मस्ती। मौला यानी सन्यासी, सूफी इस तरह जब भक्ति में निमग्न फकीर जब हाल की अवस्था में आता है तो उसे भी मस्ती ही कहा जाता है। ऐसे फकीरों को ही मस्तमौला कहते हैं।
मत्त शब्द बना है संस्कृत धातु मद् से। मद् में वही सारे भाव हैं जो मत्त में हैं। मद् से ही बना है मदः शब्द जिसमें मस्ती, नशीलापन, लालसा, लालित्य, उत्कण्ठा, उल्लास जैसे भाव हैं। जो नशा करे वह मादक है। मादकता में ही उन्माद है।  आनंददायक या उल्लास का भाव पैदा करे वह मदन है। कामदेव को इसीलिए मदन की उपमा दी गई है। कृष्ण को भी मदनगोपाल कहा जाता है। वसंत ऋतु को भी मदन कहा जाता है। वसंतोत्सव को ही मदनोत्सव कहा गया है। होली के साथ नशा यूं ही नहीं जुड़ा है। होली ही दरअसल मदनोत्सव है। मदिर अर्थात जिससे आनंद प्राप्त हो। मदिरा अर्थात शराब। आप्टे कोश के मुताबिक दुर्गा का नामान्तर भी मदिरा है। यूं भी शाक्त सम्प्रदाय में देवी अनुष्ठानों में मदिरा एक पवित्र सामग्री मानी जाती है। मद्य शब्द भी इसी मूल से निकला है।

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Monday, March 9, 2009

सूई चुभाने वाली सूचनाएं…

cartoon-notice-board-thumb6453353 सूचित शब्द में बींधा हुआ, सूराख किया हुआ के साथ निर्दिष्ट करना और संकेत का भाव भी शामिल है…
आ ज का वक्त इन्फॉरमेशन का है अर्थात सूचनाओं के महात्म्य का दौर। हमारे चारों तरफ सूचनाएं दौड़ रही हैं, सूचनाएं बन रही है, सूचनाओं का विस्तार हो रहा है। सूचना ही समाचार है, सूचना ही खबर है। सूचना ही खुशी है, सूचना ही ग़म है। एक सूचना से वारे न्यारे होते हैं और दूसरी सूचना से हाहाकार मच जाता है। दिन की शुरुआत किसी न किसी सूचना से होती है और शाम होते होते सूचनाओं की सूची तैयार हो जाती है। सूचनाओं के सूत्र कहां से कहां तक पहुंचते हैं मगर देखते हैं सूचना शब्द के जन्म-सूत्र हमें  कहां तक पहुंचाते हैं।
संस्कृत की धातु है सूच् जिसमें चुभोना, बींधना जैसे भाव तो हैं ही साथ ही निर्देशित करना, बतलाना, प्रकट करना जैसे अर्थ भी इसमें निहित हैं। दरअसल इसमें सम्प्रेषण का तत्व प्रमुख है इसीलिए संकेत करना, जतलाना, हाव-भाव से व्यक्त करना, अभिनय करना भी इसमें शामिल है। इन तमाम भावों का विस्तार है पता लगाना, भेद खोलना और भांडाफोड़ करना आदि। पत्रकारिता विभिन्न सूचनाओं के जरिये यह काम बखूबी कर रही है।  रास्तों में हमें कई जगह तीर के निशान लगे मिलते हैं जो हमें किसी निर्दिष्ट स्थान आदि का पता बतलाते हैं। इसे सूचक कहते हैं। सूच् धातु से बने सूचक में उपरोक्त तमाम भाव एक साथ नज़र आ रहे हैं। यही नहीं, बींधना, चुभोना जैसे तत्व भी इसमें मौजूद हैं।
EXIT RED WITH ARROW (1) 13X32 copyगौर करें सूचक की आकृति पर। यह प्राय तीर का निशान होता है। तीर आगे से नुकीला होता है। सबसे तेज चुभनेवाली कोई वस्तु अगर है तो वह है सूई। यह सूई इसी सूच् धातु की नोक से निकली है। संस्कृत में सूई को सूचिः कहते हैं। सूचिः > सूचिका > सूईया > सूई यह क्रम रहा है हिन्दी की सूई बनने में। सूचि और सूची दोनो ही रूप संस्कृत-हिन्दी में प्रचलित हैं। बड़ी सूई को सूआ कहते हैं। कोई दुखी करनेवाली या दिल को ठेस पहुंचानेवाली बात के लिए सूई चुभोना मुहावरा खूब बोला जाता है। कई सूचनाएं भी सूई चुभाने वाली साबित होती हैं।  आज जिसे हम लिस्ट के अर्थ में जानते हैं वह सूची दरअसल अधूरा शब्द है। मूल रूप में यह है सूचीपत्रकम्। हिन्दी में इसकी जगह सूचीपत्र शब्द भी चलता है मगर अक्सर सूची से काम चला लिया जाता है। प्राचीनकाल में यह सूचिपत्रकम् मार्कर जैसा पत्र होता था जो ग्रंथों के अलग अलग अध्यायों वाले पृष्ठों को निर्देशित करता था। एक ग्रंथ में ऐसे कई मार्कर होते थे जो सूचिपत्रकम् कहलाते होंगे। स्पष्ट है कि तब तक पृष्टों पर क्रम संख्या लिखने की तरकीब ईजा़द नहीं हुई होगी। बाद में जब पृष्टसंख्या लिखी जाने लगी तो विषयक्रम या अध्याय को इंगित करनेवाले सूचिपत्रकम् को ही ग्रंथ की शुरुआत में सूचिपत्र के रूप में स्थान मिल गया क्योंकि पृष्ठसंख्या के आधार पर अब सीधे ही निर्दिष्ट अध्याय तक पहुंचा जा सकता था। सूचीपत्र के लिए बाद में विषय सूची, अनुक्रमणिका, विषयानुक्रम जैसे शब्द भी चल पड़े।
सूचि एक नाट्यमुद्रा भी है जिसमें अंगचेष्टाओं के संकेतों द्वारा मनोभाव व्यक्त किए जाते हैं। प्राचीनकाल में युद्ध की एक खास व्यूहरचना भी सूचिः कहलाती थी। समझा जा सकता है की तीर की तरह शत्रु को भेदने की इसमें तरकीब लगाई गई होगी। संस्कृत में दर्जी के लिए सूचिक शब्द है क्योंकि वह 0923_03.jpgवस्त्र तैयार करने के लिए कपड़े को सूई से सिलता है। पुराने ज़माने हाथी की सूंड, एक खास किस्म की घास जिसे कुशा भी कहते हैं उसका अग्रभाग सूचः कहलाता है। सूचना शब्द आता है सूचः से बने सूचनम् शब्द से जिसमें संकेत करना, जतलाना, बतलाना, इशारा करना, समाचार देना आदि निहित है। इसमें  पढ़ाना और अवगत कराना भी शामिल है। जिसे हम ज्ञान कहते हैं दरअसल वे सूचनाएं ही तो हैं जो पढ़ने-पढ़ाने की क्रिया से हमें मिलती हैं। ये अलग बात है कि प्रचीनकाल के गुरु-ज्ञानी प्रकृति के संकेतों पर मनन चिन्तन करते थे, उसके इशारों  को समझते थे इसीलिए सूचना भी ज्ञान के दायरे में आती थी। इसीलिए आजकल महत्वपूर्ण सूचना के साथ बारह “भलीभांति” या “अच्छी तरह से” जैसे विशेषण लगाने की जरूरत पड़ती है ताकि वे ज्ञान के दायरे में आ सकें। सूचना के दायरे में अब सिर्फ खबर, रिपोर्ट, समाचार, न्यूज़ आदि बातें शामिल हो गईं हैं। सूचना देने की क्रिया सूचित करना कहलाती है। सूचित शब्द में बींधा हुआ, सूराख किया हुआ, छिद्रित किया हुआ, इंगित किया हुआ, आदि भाव शामिल है। हमे ज्यादातर वाणी के जरिये अवगत होने को ही सूचित करना या सूचित होना मानते हैं। मगर इसके मूलार्थ में हाव-भाव अथवा संकेत से निर्देशित करना ही महत्वपूर्ण है। संस्कृत मे सूअर के लिए एक मजेदार शब्द है सूचरोमन्। साफ है कि सूई जैसे नुकीले रोम अर्थात बालों की वजह से ही उसे यह अद्भुत नाम मिला होगा।

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Sunday, March 8, 2009

पुरुष की घबराहट का प्रतीक है महिला…

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च 2009
ishtar_2 कई भाषा वैज्ञानिक और इतिहासकार ऋग्वेदकालीन आर्यों का असूरियों-फिनिशियों से भाषायी-सामाजिक संबंध जोड़ते हैं और उनकी प्रधान देवी ईश्तर का संबंध संस्कृत शब्द स्त्री की व्युत्पत्ति से जोड़ते हैं।
सं स्कृत में महिला के लिए स्त्री या त्रिया दोनो ही शब्दरूप मिलते हैं। हिन्दी में , खास तौर पर लोक शैली में महिला को तिरिया कहा जाता है। शब्द शक्ति की अगर बात करें तों इसका ध्वन्यार्थ स्त्री की तुलना में नकारात्मक भाव उजागर करता है। इसमें संस्कृत- श्लोक त्रिया चरित्रम...की बड़ी भमिका रही है क्योंकि स्त्री से बने तिरिया में नारी के क्रिया-कलापों के  नकारात्मक पक्ष को समेट दिया है। तिरिया चरित्तर, तिरिया हठ जैसी उक्तियों में यह स्पष्ट है। पद्मावत में जायसी कहते है-तुम्ह तिरिया मतिहीन तुम्हारी....। तिरिया या तिरीया रूप बने हैं संस्कृत के त्रयी, त्रय या त्रि से जिनके विभिन्न अर्थों में एक अर्थ स्त्री का भी है।
women_symbol_200 स्त्री शब्द के मूल में संस्कृत की स्त्यै धातु है। यह समूहवाची शब्द है जिसमें ढेर, संचय, घनीभूत, स्थूल आदि भाव शामिल हैं। इसके अलावा कोमल, मृदुल, स्निग्ध आदि भाव भी निहित हैं। गौर करें कि स्त्री ही है जो मानव जीवन को धारण करती है। सूक्ष्म अणुओं को अपनी कोख में धारण करती है। उनका संचय करती है। नर और नारी में केवल नारी के पास ही वह कोश रहता है जहां ईश्वरीय जीवन का सृजन होता है। उसे ही कोख कहते हैं। कोख में ही जीवन के कारक अणुओं का भंडार होता है। वहीं पर वे स्थूल रूप धारण करते हैं। गर्भ में सृष्टि-सृजन का स्निग्ध, मृदुल, कोमल स्पर्श उसे मातृत्व का सुख प्रदान करता है। स्त्यै में ड्रप् प्रत्यय लगने से बनने वाले स्त्री शब्द में यही सारे भाव साकार होते है। गौर करें कि संस्कृत में किसी भी जीव के पूरक पात्र अर्थात मादा के लिए स्त्री शब्द है क्योंकि नए जीव की सृष्टि का अनोखा गुण उसी के पास है। इसीलिए वह मातृशक्ति है, इसीलिए वह स्त्री है। कई भाषा वैज्ञानिक और इतिहासकार ऋग्वेदकालीन आर्यों का असूरियों-फीनिशियों से भाषायी-सामाजिक संबंध जोड़ते हैं और फिनिशियों की प्रधान देवी ईश्तर का संबंध संस्कृत शब्द स्त्री के जन्म से जोड़ते हैं। डॉ भगवतशरण उपाध्याय की वृहत्तर भारत पुस्तक में सरसरी तौर पर यह उल्लेख आता है पर इसका कोई प्रमाण वहां नहीं मिलता। हालांकि ईश्तर में कई भारतीय देवियों से सादृश्यता है।  देवी दुर्गा की तरह वे सिंह वाहिनी है। ईश्तर शौर्य,युद्ध तथा काम की देवी है। लक्ष्मी की तरह उनके साथ भी उलूक नजर आते हैं। 
women_symbol_200संस्कृत की मह् धातु से बना है स्त्री के के लिए हिन्दी का सर्वाधिक प्रचलित शब्द महिला। यह शब्द स्त्री की महिमा दर्शाता है। इसी शब्द में उस युग की छाया नजर आती है जब पृथ्वी पर मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी। महानता, महान, महीयसी, महा, महत्तर जैसे तमाम प्रधानता स्थापित करनेवाले भावों के समेटे हुए शब्दों का जन्म भी उसी मह् से हुआ है जिससे महिला शब्द बना है। मह् में सम्मान, आदर, महत्ता, श्रद्धा महत्वपूर्ण समझना जैसे भाव हैं। जाहिर है मह् से बने महिला शब्द में यही सारे भाव शामिल हैं। हालांकि आप्टे कोश में महिला का अर्थ स्त्री के साथ साथ विलासिनी, मदमत्त स्त्री भी दिया हुआ है। गौरतलब है कि मातृसत्तात्मक समाज में मानव समूदायों का नेतृत्व स्त्री ही करती थी। वही किसी भी समूह की अधिष्ठात्री होती थी।Durga
उस दौर में रिश्तों का जन्म नहीं हुआ था। अपने कुनबे को बढ़ाने के लिए समूह की प्रमुख स्त्री अपनी पसंद से पुरुषों का वरण करती थी। कालांतर में सामाजिक तौर पर ज्यादा शक्ति अर्जित कर चुके मनुष्य की स्मृति में मातृसत्तात्मक नारी का वही रूप किरकिरी की तरह चुभता रहा होगा। लगता है हमारे मनीषियों ने विलासिनी या मदमत्त जैसे भाव इसीलिए मह् धातु से महत्वपूर्ण होने का आभास करानेवाले महिला शब्द के साथ तभी जोड़े होंगे। महिला शब्द पुरुष की घबराहट का प्रतीक लगता है। अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दौर में करीब तेईस साल पहले एक मठाधीशनुमा वरिष्ठ पत्रकार जो घनघोर परम्परावादी, सनातन हिन्दू पृष्ठभूमि के अखबार से आए थे, हमें महिला शब्द का अर्थ बताया करते थे कि जो महलों में रहे उसे ही महिला कहते हैं। हम उनके पीठ पीछे मजाक उड़ाते थे कि उर्दू कोशों में महल शब्द तो मिलता है तो महिला क्यों नहीं ? खैर , भाषा पर तब भी ज्यादा बात नहीं होती थी और अब भी नहीं होती।
women_symbol_200लोकबोली का ही एक और शब्द है लुगाई जो हिन्दी, राजस्थानी, बृज,अवधी, भोजपुरी आदि कई बोलियों में खूब प्रचलित है। आमतौर पर इसका अभिप्राय पत्नी से है मगर मूल अर्थ में स्त्री, औरत अथवा नारी के लिए ही लुगाई शब्द का प्रयोग होता है। लुगाई शब्द लोग का स्त्रीवाची है। लोग पुल्लिंग है। लोग शब्द सस्कृत धातु लोक् से जन्मा है जिसका मतलब होता है नज़र डालना, देखना अथवा प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना । इससे बने संस्कृत के लोकः का अर्थ हुआ दुनिया , संसार। मूल धातु लोक् में समाहित अर्थों पर गौर करें तो साफ है कि नज़र डालने ,देखने अथवा प्रत्यक्ष ज्ञान करने पर क्या हासिल होता है ? जाहिर है सामने दुनिया ही नज़र आती है। यही है लोक् का मूल भाव। लोक् से जुड़े भावों का अर्थविस्तार लोकः में अद्भुत रहा । पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्राणियों मे सिर्फ मनुश्यों के समूह को ही लोग कहा गया जिसकी व्युत्पत्ति लोकः से ही हुई है। लोकः का अर्थ मानव समूह, मनुष्य जाति, समुदाय, समूह, समिति, प्रजा, राष्ट्र के व्यक्ति आदि है
women_symbol_200मनुष्य की मेधा ने, मनीषा ने प्रकृति में स्वयं को भी रखा और लोक का एक अर्थ मनुष्य भी हुआ। यूं लोग शब्द में पुरुष-स्त्री का फर्क नहीं है। राष्ट्रभाषा हिन्दी भी इसका फर्क नहीं करती मगर लोकभाषाएं अपनी गहन
tellusarapacisगर्भ में सृष्टि-सृजन का स्निग्ध, मृदुल, कोमल स्पर्श नारी को मातृत्व का सुख प्रदान करता है।
और सूक्ष्म अभिव्यक्ति के लिए लगातार शब्द गढ़ती रहती हैं सो लोग का भी स्त्रीवाची रूप लुगाई बनकर सामने आया। इस लुगाई का बहुवचन लुगायां होता है। अब अब अगर स्त्री-पुरुष की सम्मिलित उपस्थिति की बात करनी हो तो औरत-मर्द की तरह से लोग-लुगाई शब्द का इस्तेमाल होता है। लोक में जागृत-दृष्टिगत विश्व का भाव है। जो कुछ भी सनातन सृष्टि है वह लोक है। नारी शब्द से जाहिर है कि नर का स्त्रीवाची रूप है। पर ऐसा है नहीं। नारायण शब्द में हमें नारी की व्युत्पत्ति का संकेत मिलता है। मनुस्मृति में नारायण की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा गया है-"आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः, ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायणः स्मृतः"। अर्थात "सृष्टिपूर्व ‘नार’ नामक जल ही ‘नर’ (स्वयंभू पुरुष) का आश्रय था। इसीलिए वह नारायण है।" वैदिक ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर थोड़े बहुत पाठान्तर के साथ यही बात कही गई है कि सृष्टि का आरम्भ जल तत्व से हुआ है उसमें ही पितृत्व व मातृत्व  है। यहाँ नर को परमब्रह्म माना गया है अर्थात सृष्टि को उत्पन्न करने वाला नर(पुरुष)। 'नार' अर्थात स्वयंभु परमब्रह्म की अन्तर्निहित विराट योनि यानी मातृतत्व। नारायण (नरसूनव- नरपुत्र या नारपुत्र)। सृष्टि निर्माण जल से हुआ है यह सर्वव्यापी परिकल्पना वैश्विक है।

women_symbol_200नारी की व्युत्पत्ति का एक अन्य आधार भी है। संस्कृत की एक धातु है नृ जिसका अर्थ होता है मानव, मनुष्य, मनुष्यजाति। इसमें स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। नृ से ही पुरुषवाची नर शब्द बना है और स्त्रीवाची नारी भी। नृ में ही सिंह, पालः या पतिः जैसे शब्दों की संधि से नृसिंह, नृपाल, नृपति जैसे शब्द बनते हैं। नृपाल या नृपति का अर्थ प्रभु, राजा, अधिपति आदि होता है। नृसिंह, नरसिंह का ही शुद्ध रूप है जो भगवान विष्णु का एक अवतार हैं। नृपशु का अर्थ नरपशु होता है। नृपशु में जहां मनुष्य के पशुत्व का भाव है वहीं इससे बने नर पशु में पुरुष के पशुत्व का आभास होता है जबकि ऐसा नहीं है। स्त्री को भी नरपशु की उपमा दी जा सकती है। इसी तर्क प्रणाली पर नृमेध यज्ञ के नरमेध यज्ञ को तौल कर देखें तो अर्थ यही होगा-मनुष्यों के लिए किया जाने वाला यज्ञ। कुल मिलाकर प्राचीन ज्ञान सृष्टिनिर्माण में जलतत्व का महत्व ही देखता रहा है। यही विज्ञान सम्मत भी है। अब कहीं पुरुष को महत्व मिला कहीं,स्त्री को। अम्ब का अर्थ भी जल है। अम्बा शब्द का मूलआधार संस्कृत धातु अम्ब् है। अम्बिका, अम्बालिका आदि शब्द भी इससे ही बने हैं जिनका अर्थ भी माता या देवी है। पार्वती को भी अम्बिका कहते हैं। गणेश का एक नाम आम्बिकेयः भी अम्बिकापुत्र होने के अर्थ में ही पड़ा। अम्ब् से ही बने अम्बः शब्द के मायने होते है पिता, आँख, जल आदि -जारी
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Saturday, March 7, 2009

वो लश्कर बरबाद हो, ये लश्कर आबाद रहे…

view.phpलश्कर का आबादी के तौर पर अस्तित्व शुरू से रहा है मगर एक धर्म विशेष के तथा कथित रक्षकों का समूह जिसका मकसद दहशत फैलाना है किसी भी तरह से लश्कर के प्राचीन मायनों से मेल नहीं खाता है।  
ल श्कर शब्द आतंक का पर्याय बना हुआ है। नई पीढ़ी के लिए इस लफ्ज के मायने है एक आतंकवादी संगठन जिसका नाम है लश्करे तैयबा  lashkar e toiba. इस शब्द का लगातार संचार माध्यमों के जरिये एक ही संदर्भ में बार-बार जिक्र होते रहने से इसने अपना असली अर्थ खो दिया है। यह एक लगभग वर्जित शब्द बन गया है। इसके उल्लेख मात्र से दिमाग में नकारात्मक प्रतिक्रियाएं उभरने लगती हैं। जबकि आज भी यह शब्द हमारे आसपास अनेक रूपों में मौजूद है।
विभिन्न जातियों में लश्करी उपनाम पाए जाते हैं। ग्वालियर का एक उपनगर लश्कर lashkar मशहूर है। इस देश की साझी संस्कृति की सबसे रंगीन पहचान उर्दू का एक नाम लश्करी भी है। पर इन सबको पीछे धकेल कर दहशत का लश्कर हावी हो गया है। लश्कर अरबी-फारसी के जरिये हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। शब्दकोशों के अनुसार लश्कर का अर्थ होता है सेना, वाहिनी या फौज। फारसी-अरबी में इसका अभिप्राय फौजी जमावड़े से ही है। उर्दू में आकर लश्कर का अर्थ हुआ फौजी पड़ाव। दरअसल छावनी या पड़ाव के तौर लश्कर अधूरा शब्द है, इसका शुद्ध रूप है लश्करगाह अर्थात जहां सेना के डेरे लगते हों। ग्वालियर के लश्कर उपनगर का नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि वहां फौजी पड़ाव था।
लश्कर यानी फौज के कार्मिकों को लश्करी कहा जाता था। लश्करी यानी सैन्यकर्मी। जरूरी नहीं कि लश्करी फौजी, सैनिक या लड़ाका ही हो। वह फौज का कोई भी कार्मिक हो सकता था। तोपची से लेकर रसद व्यवस्था देखनेवाला व्यक्ति लश्करी हो सकता था। लश्करी lashkari का एक अन्य अर्थ होता है सैना संबधी। मराठी में फौजी शासन अथवा मार्शल लॉ के लिए लश्करी कायदा शब्द खूब प्रचलित है। लश्कर अरबी शब्द अल-अस्कर al askar का बिगड़ा हुआ रूप है। अरबी में अस्कर का मतलब होता है रक्षक, लडाका अथवा इनका समूह। बाद में सिपाहियों के संगठित जमावड़े के तौर पर अस्करी को सेना या फौज का अर्थ भी मिल गया। अल-अस्कर जब फारस में दाखिल हुआ तो इसकी विभिन्न ज़बानों में अलग अलग उच्चारणों से होते हुए लश्कर में बदल गया।
अस्कर सेमेटिक भाषा परिवार का बहुत प्राचीन शब्द है जिसमें समूह के भाव की प्रधानता है। इसका प्रमाण है मिस्र का प्राचीन शहर अल अस्कर जो नवीं सदी के आसपास अब्बासियों के शासनकाल में मिस्र की राजधानी थी जिसका मतलब ही था खेमों का शहर। उर्दू-फारसी के शब्दकोशो में भी अस्कर का अर्थ फौज के अलावा एक नगर भी दिया हुआ है। askariदरअसल अस्कर शब्द मूलतः अरबी का भी नहीं है बल्कि हिब्रू शब्द सिचर/सिखर से बना है। बाइबल में वर्णित गोस्पेल के मुताबिक समारिया क्षेत्र में सिखर sychar नाम का एक कस्बा था। सिचर का ही अपभ्रंश रूप इस्ख़र ischar प्रसिद्ध हुआ। यह वर्णविपर्यय का उदाहरण है। जैसे स्कूल का इस्कूल। विद्वानों का मानना है कि यही अस्कर का प्रारम्भिक रूप था। बाइबल में इस्खर का उल्लेख एक कस्बे के रूप में हुआ। हिब्रू को अरबी से प्राचीन भाषा माना जाता है।  हिब्रू अरबी के बीच की कड़ी है आरमेइक जिसमें इस्खर का उल्लेख बस्ती, आबादी या घिरे हुए स्थान के तौर पर हुआ जिसने अरबी में अस्कर बन कर समूह, संगठन या फौज के रूप में स्वतंत्र अर्थवत्ता पा ली। अरबी में अल एक ज़रूरी उपसर्ग है। अस्कर के साथ इसके जुड़ने से बना अल-अस्कर जो बरास्ता फारसी लश्कर के रूप में हिन्दी में घुल-मिल गया। आज वणिक, ब्राह्मण और राजपूतों में लश्करी उपनामधारी अनेक परिवार हैं। यह ठीक वैसे ही हुआ जैसे सुमेरियाई शब्द कला ने कलां के रूप में अरबी, फारसी, तुर्की और हिन्दी में बड़ी आबादी के तौर पर अपनी जगह बनाई। फौजी ठिकाने के तौर पर किला शब्द भी इससे ही जन्मा। लश्कर का आबादी के तौर पर अस्तित्व शुरू से रहा है मगर एक धर्म विशेष के तथाकथित रक्षकों का समूह जिसका मकसद दहशत फैलाना है किसी भी तरह से लश्कर के प्राचीन मायनों से मेल नहीं खाता है।

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Friday, March 6, 2009

बुजुर्गवार बजरंगी मारुति हनुमान…

व योवृद्ध व्यक्ति के लिए हिन्दी में बुजुर्ग शब्द बड़ा आम है। बुजर्ग में कई प्रत्यय लगने से बुजुर्गवार, बुजुर्गीयत, बुजुर्गतर, बुजुर्गतरीन, बुजर्गाना जैसे कई और भी शब्द बने हैं जिनसे बुजुर्ग शब्द की वरिष्ठता, महत्ता और वरीयता ही पता चलती है। तुर्की, फारसी में इसके बोजोर्ग bozorg जैसे रूप भी प्रचलित हैं।
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बुजुर्ग शब्द हिन्दी-उर्दू में फारसी से आया है मगर यह मूलतः इंडो-ईरानी भाषा परिवार से ताल्लुक रखता है और इसकी रिश्तेदारी संस्कृत से है। संस्कृत में एक शब्द है वज्र वज्रम्। ईरानी के प्राचीन रूप अवेस्ता में भी इसका वज्र रूप ही मिलता है जिसका अर्थ है महान, शक्तिशाली, कठोर, चमक, बिजली होता है फिर वज्रका, वजारका होते हुए अवेस्ता से मध्यकालीन फारसी में इसने वुजुर्ग रूप धारण किया जो बोजुर्गh2 या बुजुर्ग बन कर प्रचलित है। बुजुर्ग में भी मूलतः आदरणीय, महान, प्रभुतासम्पन्न जैसे भाव ही हैं। मगर कालांतर में इसके साथ वरिष्ठता के विभिन्न भाव जुडते चले गए जिनका अर्थ विस्तार रसूख, प्रभाव में हुआ और बाद में आयु के उत्कर्ष के तौर पर ये सब बुजुर्ग में सिमट गए। पहले बड़ी आबादियों के साथ भी बुजुर्ग शब्द लगता था जैसे रामपुरबुजुर्ग। हिन्दी में भी वज्र के विविध रूप हैं जैसे बज्जर, बजर आदि। जहां बज्जर का मतलब कठोर, मुस्टण्ड होता है वहीं बजर का मतलब तड़ित या विद्युत होता है।
रामभक्त हनुमान के बजरंगबली नाम के पीछे भी वज्र शब्द का योगदान है। संस्कृत में वज्रः या वज्रम् का अर्थ है बिजली, इन्द्र का शस्त्र, हीरा अथवा इस्पात। इससे ही हिन्दी का वज्र शब्द बना है। इन्द्र के पास जो वज्र था वह महर्षि दधीचि की हडि्डयों से बना था। हनुमान वानरराज केसरी और अंजनी के पुत्र थे। केसरी को ऋषि-मुनियों ने अत्यंत बलशाली और सेवाभावी संतान होने का आशीर्वाद दिया। इसीलिए हनुमान का शरीर लोहे के समान कठोर था। इसीलिए उन्हें वज्रांग कहा जाने लगा। अत्यंत शक्तिशाली होने से वज्रांग के साथ बली शब्द जुड़कर उनका नाम हो गया वज्रांगबली जो बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली। वज्रांग का स्वतंत्र तद्भवरूप  बजरंगी या बजरंग भी बना। इन्हें मरूत यानी वायु देवता का पुत्र भी कहा जाता है इसलिए इनका एक नाम मारूति यानी
पुराणकथा के अनुसार जन्म लेते ही महाबली फल समझकर सूर्य को खाने लपके। Hanuman3t
वायु के समान वेगवान भी कहा जाता है। संस्कृत में मरुत का अर्थ होता है वायु, हवा, पवन। मरुतः पवनदेव का विशेषण था। इसका एक रूप मारुत भी है जिससे मारुति शब्द बना जो कि पवनसुत अथवा मरुतसुत के तौर पर ही हनुमान का एक विशेषण है।
अंग्रेजी का एक शब्द है चिन chin जिसका मतलब होता है चिबुक, ठुड्डी या ठोड़ी। यानी होठों के नीचे की हड्‍डी का उभार। यह इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत में इसके लिए हनुः शब्द है जिसका अर्थ भी ठोड़ी या जबड़ा होता है। इसकी मूल धातु है घनु जिसका मतलब कठोर है। ग्रीक में ठोड़ी या चिबुक को गेनुस और जर्मन में किन/किनुस कहते हैं। किन का ही विकसित रूप अंग्रेजी का चिन है। यूरोपीय भाषाओं के ये सभी शब्द मूल भारोपीय धातु genw या गेनु से बने हैं जिसका अर्थ भी यही है। संस्कृत की मूल धातु घनु से परवर्ती संस्कृत में ग ध्वनि का लोप हो गया और इसका रूप बना हनुः । गौरतलब है कि भक्तशिरोमणि हनुमान hanuman के नामकरण में भी इसी चिन या हनुः का योग रहा है। पुराणकथा के अनुसार जन्म लेते ही महाबली फल समझकर सूर्य को खाने लपके। सूर्य को इनकी पकड़ से छुड़ाने के लिए इन्द्र ने अपने वज्र से इन पर प्रहार किया जिससे इनका जबड़ा यानी हनु टेढ़ी हो गई। तभी से इन्हें हनुमान कहने लगे। –सम्पूर्ण संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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