Wednesday, December 7, 2011

हप्-हप् खाना या हड़पना ?

bullfrog

कि सी की वस्तु को जबर्दस्ती हथिया लेना, दूसरे की सम्पत्ति को जबर्दस्ती अपने स्वामित्व में लाने, चतुराई या बलप्रयोग से किसी अन्य के स्वामित्व वाली सम्पत्ति को अपना बनाने की कार्रवाई को हड़पना कहते हैं। हड़प शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर हिन्दी के प्रसिद्ध और आमफ़हम शब्दकोशों में विरोधाभासी जानकारी है जिससे भ्रम पैदा होता है। श्यामसुंदरदास सम्पादित हिन्दी शब्दसागर में हड़प प्रविष्टि को पढ़ने से लगता है मानो यह भोजन करने सम्बन्धी शब्दावली से आया है। कोश में इसे अनुकरणात्मक शब्द बताते हुए इसका अर्थ पेट में डाला हुआ, निगला हुआ बताया गया है। इन भावों का आधार लेते हुए हड़प का आशय गायब किया हुआ, अनुचित रीति या बेईमानी से ले लेना बताया गया है। सवाल उठता है कि भोजन करने वाली शब्दावली में हड़प जैसा शब्द नहीं है। भोजन करते हुए भी हड़प ध्वनि का उच्चार नहीं होता। जॉन प्लैट्स अपने हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश में इसी हप् ध्वनि से हड़प की सादृष्यता की बात कहते हैं। साथ ही वे प्राकृत के हडप्प से भी हड़प की तुलना करते हैं।
पहले हप् ध्वनि की बात। भोजन करने में चबाने की क्रिया खास है। दाँत, जीभ और तालु की स्पर्शीय क्रियाओं से चप्-चप् ध्वनि निकलती है, हप् हप् नहीं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में हप् वाली प्रविष्टि में इसका कोई स्वतंत्र अर्थ न देते हुए इसे संस्कृत धातु ह्लप् का पाठान्तर (लैटिनः वेरिया-लैक्शिओ) बताई गई है। अर्थात मूल शब्द ह्रप् जिसका अर्थ है to speak जिसमें आवाज़ करना, उच्चार करना, बोलना आदि भाव हैं। स्पष्ट है कि मोनियर विलियम्स ने इसका रिश्ता भोजन करने की ध्वनि से नहीं जोड़ा हैं। शब्दसागर में हड़प को ध्वनिअनुकरण पर बना शब्द तो बताया है पर इसके मूल का उल्लेख नहीं है। वहीं शब्दसागर में हप का रिश्ता ध्वनिअनुकरण के आधार पर कोई वस्तु चट से मुँह में रख कर होठ बन्द करने की आवाज से जोड़ा है। जब हड़प का अर्थ निगला हुआ, पेट में डाला हुआ बताया जाता है तो इसकी मूल ध्वनि हप् बताने कोशकार कैसे भूल गए, यह समझ से परे है। हिन्दी में हप् करना, हप कर जाना जैसे मुहावरे भी हैं और मीठा मीठा हप, कड़वा कड़वा थू जैसी कहावत भी है जिसका अर्थ पसंदीदा वस्तु को अपने पास रख लेना। जॉन प्लैट्स प्राकृत के जिस हड़प्प से हड़प की तुलना का सुझाव देते हैं, उस हड़प्प का अर्थ उनकी प्रविष्टि में chest, cupboard दिया हुआ है। चेस्ट यानी सीना, छाती, वक्ष आदि। दरअसल चेस्ट एक प्रकोष्ठ होता है जहाँ दिल महफ़ूज़ रहता है। इसे हृदय-प्रकोष्ठ कहा जा सकता है। मगर यह हड़पने के मूल भाव से मेल नहीं खाता।
मेरे विचार में दो बातें हैं। जल्दी से कोई चीज़ मुँह में रखने की क्रिया में होठ बन्द करने की ध्वनि हप् है और यह वही है जिसका उल्लेख प्लैट्स भी करते हैं। मगर मोनियर विलियम्स मगर इसका रिश्ता होठों से तो क्या, खाने की क्रिया से भी नहीं जोड़ते। मेरे अपने विचार में हप् ध्वनिअनुकरणात्मक शब्द तो है, मगर भक्षण सम्बन्धी अर्थों से जोड़ने में इसका ध्वनिअनुकरणात्मक होना कम और लक्षणात्मक होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी वस्तु को सीधे अपने मुँह में लपकने की कोशिश कर के देख लीजिए, हप् की ध्वनि नहीं निकलती। हप् में निश्वास की प्रक्रिया है, आश्वास की नहीं। अब अगर आप हप् का सायास उच्चार चाहते ही हैं तो वस्तु मुँह में जाने के बाद ही हप् उच्चार पाएँगे, अन्यथा नहीं। हाँ, बिना मुँह में कुछ डाले सिर्फ़ हवा में तैरती किसी काल्पनिक चीज़ को लपकने की कोशिश करें, सौ फ़ीसद साफ़ आवाज़ में हर बार हप् हप् का उच्चार सुनाई पड़ेगा। मेरा मानना है कि यह मानवेतर जीव-जंतुओं की भोजन करने की प्रक्रिया को देखते हुए उपजा लाक्षणिक शब्द है।
आदिकाल से मनुष्य ने मगरमच्छों, अजगरों, साँपों, सारसों, छिपकलियों, मेंढकों और नाना अन्य प्राणियों को इसी अंदाज़ में अन्य जंतुओं को चट-पट, झपाटे में अपना आहार बनाते देखा है। इस क्रिया की त्वरता, तीव्रता, शीघ्रता, विचित्रता, भीषणता और भयानकता को उसने वर्षों अनुभव किया है। इसके अनुकरण के प्रयास में यह हप् ध्वनि हाथ लगी है, अन्यथा न तो frog-_1837515bजानवर हप् की ध्वनि करते हैं और न ही मनुष्य। मेरे इस विचार की पुष्टि भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक कोश में रॉल्फ़ लिली टर्नर की प्रविष्टि से भी होती है। टर्नर हप् को हप्प लिखते हैं। हप का हप्प रूप भी प्रचलित है जैसे गप का गप्प। गल्प से जैसे गप्प बनता है वैसे ही ह्लप् से हप्प बनेगा। टर्नर ने हप्प का जो पहला आशय लिखा है- sudden movement, वो महत्वपूर्ण है। सडन मूवमेन्ट यानी अप्रत्याशित या आकस्मिक हरकत या क्रिया। टर्नर इसके बाद अन्य आर्य भाषाओं में इससे विकसित शब्दों के अर्थ बताते हैं जैसे कुमाऊँनी में हपकाउणो यानी भकोसना, नेपाली में हप्खानूँ यानी निगलना, हिन्दी मे हप यानी झपट्टा, हपकाना यानी भकोसना, हापर यानी पेटू. हपराना यानी चबर-चबर खाते रहना, मराठी में हप्का यानी झपाटेदार लहर, हपाटणे (अपटणे) यानी पछाड़ देना, झपाटे का विलोम, चित्त करना आदि। स्पष्ट है कि संस्कृत के मूल हप या हप्प का प्रमुख अर्थ टर्नर की निगाह में भी आकस्मिक हरकत ही है। आहार या भोजन की क्रिया के सम्बन्ध में भी आकस्मिकता इसके दायरे में आती है, न कि यह इसका प्रमुख अर्थ है।
ध्यान देने की बात है कि हप्प या हप के सन्दर्भ में जीवभक्षियों की त्वरित क्रिया का अनुकरण मनुष्य ने करने का प्रयास किया तो हप् ध्वनि निकली। दरअसल यह किसी क्रिया का आदिम रीक्रिएशन जैसा था। नाटक का जन्म अनुकरण से ही हुआ है। यह जो हप् है, नाटकीय रूपान्तर ही है। ध्यान रहे, मोनियर विलियम्स लैटिन की टर्म वेरिया-लैक्शिओ यानी पाठान्तर का प्रयोग कर रहे हैं, न कि ह्रप् को ह्लप् का रूपान्तर या क्रमिक विकास बता रहे हैं। गौरतलब है कि प्राचीन ग्रन्थों के विभिन्न भाष्यों में पाठान्तर इसलिए होता रहा क्योंकि हस्तलिखित प्रतियाँ टीकाकार पण्डित खुद भी बनाते थे और पेशेवर नक़लनवीस भी। इसलिए किन्हीं अक्षरों को समझने में भूल-चूक भी होती थी और श्रुतलेखन के दौरान उच्चारणभेद नहीं हो पाता था। इसीलिए दो पाठान्तर मिलने से मोनियर विलियम्स ने यहाँ इसीलिए ह्रप या ह्लप से उत्पन्न हप का रिश्ता भोजन सम्बन्धी क्रिया से नहीं जोड़ते हुए सिर्फ़ उच्चार से जोड़ा है। यही सावधानी टर्नर ने भी बरती है और वे भी हप्प को सिर्फ़ त्वरित, शीघ्रतापूर्ण, आकस्मिक क्रिया ही मानते हैं।
हड़प शब्द का जन्मसूत्र हप् से नहीं है, यह स्पष्ट है। यह भी लगता है कि हप् से हड़प नहीं बल्कि हड़पने की क्रिया में जो व्यापक आशय हैं, उससे हप् में निहित भावार्थ और भी पुष्ट हुए और धीरे धीरे कोशकार बजाय हप् को हड़प से सम्बद्ध करने के, हड़प के हप् से व्युत्पन्न होने की सम्भावना जताने लगे। विभिन्न सन्दर्भों को टटोलने के बाद मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि हड़प के मूल में वही हृ धातु है जिसमें मुग्ध करना, आकृष्ट करना, लेना, अधीन करना, वशीभूत, कब्जा करना, दबोचना, चुराना, डाका डालना, छीन लेना, हथियाना, ले जाना, स्वामित्व जताना, मालिक बनना, इच्छा जताना, अधिकार जताना जैसे भाव हैं। टर्नर कोश से इसकी पुष्टि होती है। टर्नर बताते हैं कि भारोपीय वैदिक हृत् हड़प के मूल में है। हृत् की धातु हृ है। हृत् का पाली रूप हटा है, प्राकृत रूप हड़ा है। दर्दी ज़बान में यह हूढ़ो है। पश्चिमी पहलवी में इसका एक रूप हड़ है। टर्नर सम्भावना जताते हैं कि इसका आशय बाढ़ से हो सकता है। गौरतलब है कि बाढ़ में भी हड़पने की लीला है।
हृ से ही हर, हरण, हारना, हराना जैसे शब्द बने हैं जिनमें पराभव, खोना, गँवाना, अधीन होना-करना जैसे भाव हैं। माला के अर्थ में हार भी इसी मूल से बना है। हार में जो अनुशासन है वह एक सूत्रता का है। इस सूत्र के अधीन होने के लिए विभिन्न वस्तुओं को अपनी निजता खोनी पड़ती है। एक रूपाकार में होकर ही वे माला में पिरोए जा सकते हैं। हार में पिरोए जाने के बाद बहुत सी चीज़ें आसानी से इधर-उधर ले जाई जा सकती हैं।

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Monday, December 5, 2011

दिलो-दिमाग़ की बातें

पिछली कड़ी-आखिर क्या है सौहार्द्र?Heart

फ़ा रसी ने कुछ ऐसे नायाब शब्द हिन्दी को दिए हैं कि जिनके बिना दिल की बात ज़ुबाँ पर आनी मुश्किल होती है। अब देखिए, इस दिल को ही लीजिए, दिल यानी हृदय। दिल से जुड़ी कितनी ही बातें मुहावरों की शक्ल में आज विभिन्न भाषाओं में समायी हैं। मराठी के दिलगीर शब्द से हिन्दी वाले अपरिचित हैं, मगर मूलतः मराठी में इसकी आमद फ़ारसी से ही हुई है। दिलगीर यानी दुखी, शोकाकूल, शोक-संतप्त आदि। दिलगीर का एक अन्य अर्थ खेद प्रकट करने वाला या पश्चाताप जताने वाला भी होता है। दिलफ़रेब, दिलरुबा, दिलबर, दिलकश, दिलेर, दिलावर, दिलवाला, दिलदार, दिलखुश, दिलचस्प जैसे न जाने कितने शब्दों का रोज़ बोलचाल में इस्तेमाल होता है। दिल से जो अभिव्यक्ति और लालित्य पैदा होता है, वह बात हृदय से नहीं आती। हिन्दी में आमतौर पर हृदय शब्द का प्रयोग अब शरीर के अंग की तरह चिकित्सकीय आशय में होता है। इस सन्दर्भ में हृदय-रोग, हृदय-रोगी आम शब्द हैं। यही हाल अंग्रेजी के हार्ट शब्द का है। हार्ट-प्रॉब्लम, हार्ट-पेशेन्ट जैसे शब्द आमतौर पर हिन्दी में प्रचलित हैं। दूसरी ओर दिल की अर्थवत्ता व्यापक है। शरीरांग के रूप में भी दिल शब्द का प्रयोग होता है, जैसे-दिल में छेद होना। मगर किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है। किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है।
संस्कृत हृदय के मूल में हृद् है जिसका अर्थ है दिल और इसके लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia है। हृदय का संबंध सोच-विचार करने से है। मलयालम में यह करुतु है जिसका साम्य कॉर्ड से जोड़ा जा सकता है। करुतु का अर्थ है सोचना, विचारना, कल्पना करना आदि। वैसे ख्यात भाषवाविद् डॉ रामविलास शर्मा द्वारा बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश से संग्रहित शब्दों में मलयालम के करिळ का उल्लेख है जिसे उन्होंने इसी शब्द शृंखला का हिस्सा बताया है। द्रविड़ परिवार की ही कोत भाषा में यह कर्ल है। वे इन शब्दों की ग्रीक कॉर्दिया से तुलना करते हैं- कर्द > कर्ल। हिन्दी का शृद्धा शब्द भी इसी परिवार का है जिसका अर्थ है आस्था, निष्ठा, भरोसा जिनका रिश्ता दिल से है। इसके अलावा मन की स्वस्थता और हृदय की शान्ति जैसे भाव भी इसमें हैं। हालाँकि इसका अर्थ थोड़ा भिन्न है मगर रामविलास शर्मा बड़ी आसानी से इसकी हृदय से रिश्तेदारी साबित करते हैं। उनके अनुसार शृद्धा का शृद् और हृदय का हृद दरअसल एक ही हैं। लिथुआनी का सिर्डिस और रूसी का सर्डेस / सेर्द्त्से इस सिलसिले में गौरतलब है जिसका उच्चारण शृद्धा से मिलता-जुलता है।
इंडो-ईरानी भाषा परिवार का दिल भी भारोपीय धातु कर्द kerd से ही तैयार हुआ है। यह दिलचस्प है कि इस धातु के पहले वर्ण का उच्चार पूर्व से पश्चिम तक अलग अलग होता रहा है। ये सभी ध्वनियाँ कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य और दन्त्यमूलीय हैं। इसी तरह इनकी प्रकृति भी कण्ठ्य, स्पर्श और स्पर्श संघर्षी रही है। इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए ध्वनियों की प्रकृति कण्ठ्य से तालव्य और फिर दन्त्य में तब्दील हुई है। पंचनद, उत्तरी ईरान, कुर्दिश, आर्मीनियाई और फिर जर्मन। चाहें तो इस क्रम को ठीक उलटा भी मान सकते हैं। संस्कृत के हृद् में मूल ध्वनि ह  है जो कण्ठ्य संघर्षी है। इससे हृदय शब्द बनता है। अवेस्ता में इस ह का रूपान्तर ज़ / झ़ में होता है और वहाँ हृदय के लिए ज़रेदा शब्द मिलता है। कुर्दिश में यह ज़ार है और बलूची में ज़ेर्दे तो आर्मीनियाई में ज़ का बदलाव स में होता है जो दन्त्यमूलीय ध्वनि है। यहाँ हृदय के लिए सिर्त शब्द है। रूसी में यह सर्डेस या सेर्द्स्ते है। जर्मन में यह हर्ज़ है मगर प्रोटो जर्मन में यह ख़ैर्तन था। बहरहाल, अवेस्ता के ज़रेदा zereda से पहलवी के दील और फिर फ़ारसी के दिल, देल का विकास हुआ है।
हृदय से दिल का विकास विस्यमकारी सा लगता है मगर जिस तरह हम सूक्ष्मतम एक कोशिकीय जीव-विभाजन के सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए तमाम जीवधारियों के विकसित होने की कल्पना को स्वीकार कर  लेते हैं, भाषा और शब्दों के विकास का सफ़र उतना दुरूह और असम्भव नहीं है। समूचे तुर्क-ईरान क्षेत्र में अवेस्ताई ज़रेदा के कई रूपान्तर हुए हैं जैसे ताज़िकिस्तान के पामीर और बदख्शाँ क्षेत्र की क़बाइली भाषा इशकाशिमी में यह ज़िल है तो पूर्वी तुर्की में बोली जाने वाली जज़ाकी में यह ज़ेर्री है। पामीर क्षेत्र की ही एक अन्य भाषा सारीगुल में इसका रूप झाँर्द है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक पार्थियाई भाषा में इसका एक रूप ज़िर्द रहा होगा। जॉर्जिया की एक बोली ओसेटिक में इसका रूप झ़िर्द मिलता है। डॉ शर्मा की बात तार्किक लगती है कि जैसे लैटिन कोर्द का रूप कोर हुआ, वैसे ही ज़िर्द ( ज़रेदा का एक रूप ) का रूपान्तर ज़िर हुआ होगा। ज़िर > जिर > दिर के बाद अगला रूपान्तर दिल हुआ होगा। गौर तलब है कि बदख्शाँ की इशकाशिमी भाषा में ज़िर का रूप ज़िल है।
दिल के साथ अक्सर दिमाग़ का ज़िक्र भी होता है। सयानों का कहना है कि “दिल की नहीं, दिमाग़ की बात सुननी चाहिए”। मगर जो लोग दिल से बोलते हैं, वे सुनते भी दिल की ही हैं। दिल की तरह दिमाग़ भारोपीय भाषा परिवार का न होकर सेमिटिक कुनबे का शब्द है। कुछ सेमिटिक भाषाओं में दिमाग़ का उच्चारण दिमाह की तरह होता है जैसे इथियोपिया की ग़ीज़ भाषा में। अरबी में दिमाग़ का अर्थ होता है मस्तिष्क, ब्रेन। इसका अर्थ होता है सिर, सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा, शिखर आदि। दिमाग़ के अन्तिम दो वर्णों से भारोपीय मस्ज्, मग्ज़, मज़्ग याद आते हैं जिनसे हिन्दी में प्रयोग होने वाले कुछ ख़ास शब्द बने हैं। मगज और भेजा इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं जबकि दिमाग अरबी मूल से आया है। संस्कृत में इसकी मूल धातु है मज्ज्।
यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी में मगज शब्द जहाँ फारसी से आया है वहीं भेजा शब्द इसके मूल तत्सम का तद्भव रूप है। मगज शब्द का मूल फारसी रूप मग्ज़ है। यह अवेस्ता के मज्ग mazga से बना है। इसका संस्कृत रूप है मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस आदि। इससे ही बना है संस्कृत और हिन्दी का मज्जा शब्द जिसका अर्थ है अस्थियों के भीतर का द्रव (बोनमेरो bonemarrow), वसा, चर्बी, पौधों का रस आदि। मुमकिन है अवेस्ता के मज़्ग से यह अरबी में आयात हुआ हो जहाँ इसका अरबीकरण दिमाग़ के रूप में हुआ हो। वैसे भी अन्य सेमिटिक भाषाओं में यह शब्द अरबी से ही गया है। यूँ भी अरबी और फ़ारसी में भाषायी लेन-देन रहा है। हिन्दी का भेजा शब्द मज्ज से बना है। संस्कृत के तद्भव रूपों में प ध्वनि का चरित्र भ में बदलता है। यहाँ मज्ज> मज्जस् > भज्जअ> भेजा के जरिये यह तैयार हुआ है। अक्सर दिलवाले दिल लिया दिया करते हैं, दिल से दिल लगाया करते हैं। बेवकूफ़ किस्म के लोग हमेशा दूसरों का दिमाग़ चाटते या दिमाग़ खाते हैं। व्यर्थ की बकवाद करने के अर्थ “भेजा खाना” या “भेजा चाटना” मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है।
-जारी

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Sunday, December 4, 2011

आखिर क्या है ये ‘सौहार्द्र’ ?

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श ब्दों की गहराई तक गए बिना उसे इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति के दौर में हिन्दी पत्रकारिता भला इस बुराई से कैसे बची रह सकती है। आए दिन सद्भाव के संदर्भों में सौहार्द्र शब्द का प्रयोग हम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर देखते-सुनते हैं। अब यह जानने-समझने की ज़रूरत नहीं रह गई है कि सौहार्द्र या सौहार्द्रता शब्द ग़लत है, इसका सही उच्चारण और वर्तनी है सौहार्द जिसका रिश्ता हार्दिकता से जुड़ता है। सौहार्द्र में ‘आर्द्रता’ का जो स्पर्श है उससे सौहार्द में निहित भाव प्रकट नहीं होता। सौहार्द्र जैसा कोई शब्द किसी कोश में नहीं मिलेगा, मगर यह शब्द चल पड़ा है। भाषा खुद अपना रास्ता चुनती है, मगर सौहार्द का सौहार्द्र हो जाना भाखा बहता नीर वाला उदाहरण नहीं है, क्योंकि सौहार्द्र की तुलना में सौहार्द उच्चारण कहीं सहज और आसान है। यह विशुद्ध भाषा के प्रति असावधानी और अगंभीर नज़रिये का परिणाम है।
सौहार्द में जो हार्दिकता का भाव है वह हृदय से आ रही है। हृदय भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की हृ धातु से हुई है जिसमें मुग्ध करना, आकृष्ट करना, लेना, अधीन करना, वशीभूत करना जैसे भाव हैं। इससे ही बना है हृद जिसका अर्थ है मन या दिल। हृ में समाविष्ट तमाम भाव मन से जुड़े हैं। हृदयम् शब्द भी इससे ही बना है। हृदयम की व्याप्ति द्रविड़ भाषा परिवार में भी हुई है और वहाँ इसका रूप है इरुतयम् irtayam. हिन्दी के हार्दिक शब्द का अर्थ होता है दिल से, मन से हृदय से जिसका रिश्ता है इसी मूल से बने हार्दम् से जिसमें स्नेह, प्रेम, कृपा, अभिप्राय जेसे भाव शामिल हैं। बोलचाल में हृदय से बने देसी रूप भी चलन में हैं जैसे हिया, हिरदय, हिय आदि। इसके अलावा सहृदय, हार्दिक आदि। हृद में सु उपसर्ग लगने से बनता है सुहृद अर्थात अच्छे हृदय से या अच्छे हृदयवाला। आपटे कोश के मुताबिक सुहृद में अण् प्रत्यय लगने से बना है सौहार्दः या सौहार्दम् जिसका अर्थ है हृदय की सरलता, स्नेह, सद्भाव या मैत्रीभाव। यही है सौहार्द का मूल जिसे हम सौहार्द्र पढ़ने के अभ्यस्त हो चुके हैं। हृद की व्याप्ति यूरोप की कई भाषाओं में है। अंग्रेजी के हार्ट heart का हृद से गहरा रिश्ता है। हार्दिकता के हार्द और अंग्रेजी के हार्ट की तुलना कर ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य पर विचार करें।
हृदय के लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd  तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia,

love_ljssqwvk... दिल पर दर्ज़ इबारतें जब काग़ज़ पर उतरती हैं तो साहित्य रचा जाता है।  लिथुआनी का रिकॉर्दारी शब्द ही अंग्रेजी के रिकॉर्ड के मूल में है। ...

लैटिन का कोर cor, लिथुआनी का सिर्डिस sirdis या रूसी का सर्डेस serdce शामिल है। इसी तरह जर्मन में हर्ज़ herz, पुरानी स्पैनी में हार्ता hearta और पुरानी इंग्लिश में होर्टे heorte होता हुआ यह अंग्रेजी में हार्ट heart हो गया। लैटिन का कोर शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में क और स ध्वनियों में भी रूपान्तर होता है। हृद की तरह ही लैटिन कोर की मूल धातु कॉर्द cord है। इस कोर्द से ही बना है अंग्रेजी का कोर core जिसका अर्थ है किसी वस्तु का आंतरिक हिस्सा, भीतरी भाग, केंद्र आदि। हृदय की शरीर में केंद्रीय स्थिति है और यह शरीर के भीतर होता है। इस अर्थ में कोर यानी हृदय। कोर शब्द से हिन्दी वाले भी परिचित हैं और कोर कमेटी या कोर ग्रुप जैसे शब्द खूब लिखे-बोले जाते हैं। इससे ही बना है cordial जिसे अंग्रेजी उच्चारण में कॉर्जल और हिन्दी में कॉर्डियल कहा जाता है। इसमें ठीक वही भाव है जो हार्दिकता या सौहार्द में है। लिथुआनी में इसी कॉर्द में उपसर्ग और प्रत्यय लगने से बनता है रिकॉर्दारी recordari जिसमें किसी तथ्य को दिल में जगह देने, मन में बिठाने का भाव  है। बाद में इसकी अर्थवत्ता का विस्तार हुआ और दर्ज करना, याद रखना, किसी रजिस्टर में इन्द्राज करना जैसे अर्थ भी विकसित हुए। अंग्रेजी का रिकॉर्ड इसी से निकला है। रिकॉर्ड शब्द अंग्रेजी से हिन्दी मे आए उन सैकड़ों शब्दों में शुमार है जिनका इस्तेमाल सुबह से रात तक आम हिन्दी भाषी खूब करता है। दिल पर दर्ज़ इबारतें जब काग़ज़ पर उतरती हैं तो साहित्य रचा जाता है। कॉन्कर्ड, डिस्कॉर्ड जैसे कितने ही शब्दों के साथ इस सिलसिले में दिल की बीमारी के लिए सुने जानेवाले चिकित्सा विज्ञान के पारिभाषिक शब्दों को भी याद किया जा सकता है।
अगली कड़ी में दिलो-दिमाग़ की बातें

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Saturday, December 3, 2011

भेद की दीवारें, दीवारों के भेद

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प रिनिष्ठित हो या बोलचाल की हिन्दी, दो कमरों को विभाजित करने वाली रचना के लिए आपको कितने शब्द याद आते हैं? किसी कक्ष को चारों और से सुरक्षित बनाने वाली वह रचना जिस पर छत टिकी होती है उसे तत्काल आप क्या कहेंगे? यक़ीनन दीवार ही इस आशय को अभिव्यक्त करने वाला वह शब्द है जो लगभग सभी के दिमाग़ में कौंधता है। बोली भाषा में भीत शब्द चल सकता है, मगर ज़रूरी नहीं कि हर हिन्दी भाषी इसका इस्तेमाल करना चाहे। दीवार रोजमर्रा की बोली में सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शुमार है। दीवार शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है। एक तरफ़ जहाँ इसमें विभाजन, अलगाव या दुराव वाला भाव है तो दूसरी और सुरक्षा और मज़बूती प्रदान करने का भाव भी खास है। “हम दोनों के बीच वह दीवार बन गया” में जहाँ अलगाव और विभाजनकर्ता का भाव है वहीं, “ उन दिनों वे दीवार की तरह मज़बूती से हर मुश्किल के सामने खड़े नज़र आए” इस वाक्य में सकारात्मक है।

दीवार इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है। यह अवेस्ता के एक सामासिक पद से बना है देगा-वरा [dega-vara]। पकोर्नी द्वारा खोजी गई प्रोटो भारोपीय धातुओं में dheigh ( -धिघ, मोनियर विलियम्स) से बना है अवेस्ता का देगा जिसका अर्थ है मिट्टी, काया अथवा लेपन। इसके अन्य रूप हैं दिज़, देज़, दाएज़ा जिनका अर्थ है किला या दीवार। संस्कृत की दिह् धातु का अर्थ भी लीपना, सानना, पोतना होता है। दिह् से ही बना है देह शब्द जिसका अर्थ काया, शरीर होता है मगर इसका मूलार्थ है आवरण। गौर करें दिह् में निहित लेपन के अर्थ पर। किसी वस्तु पर लेपन उसे सुरक्षित बनाने के लिए ही किया जाता है। देह एक तरह से शरीर के भीतरी अंगों का सुरक्षा कवच है। मोनियर विलियम्स के कोश के अनुसार देह का अर्थ है आवरण, लेपन, मिट्टी, ढांचा, साँचा, गूँथना, ढालना आदि। दार्शनिक अर्थों में देह को मिट्टी से निर्मित भी कहा जाता है और इसे किले की उपमा भी दी जाती है। गौरतलब है कि अंग्रेजी का डो dough भी इसी धिघ् dheigh से बना है जो इसके पोस्ट जर्मनिक रूप daigaz से तैयार हुआ। अंग्रेजी का लेडी शब्द भी हिन्दी में खूब प्रयोग होता है, जो इसी मूल का है। कबीर ने मनुष्य को माटी का पुतला यूँ ही नहीं कहा। देह, दिह्, दिज़् शब्दों के भावार्थों पर जाएँ तो माटी के पुतले के निर्माण की सारी क्रियाएँ स्पष्ट होती है यानी मिट्टी को पीटना, सानना, राँधना, गूँथना, साँचा बनाना और फिर पुतला बनाना।
अवेस्ता का दिज़ शब्द इसी मूल का है और जिसका अर्थ किला ही होता है। कुल मिला कर दिघ्, दिह्, दिज़, देगा, दाएज़ा में परिधि, कोट, किला और सुरक्षित स्थान का भाव विकसित होता चला गया। इस दाएज़ा से पूर्व जब अवेस्ता का उपसर्ग पइरी लगता है तो बनता है पइरी-दाएज़ा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में पर per / peri जैसी धातुएँ उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होती हैं। इसमें चारों ओर, आस-पास, इर्दगिर्द, घेरा जैसे भाव हैं। संस्कृत का परि उपसर्ग इसी से व्युत्पन्न है जिससे बने दर्जनों शब्द हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं जैसे परिवार, परिवहन, परिचर, परिधान आदि। इसका ही अवेस्ता रूप पइरी होता है। दाएज़ा से जुड़ कर बने पइरीदाएज़ा (pairidaeza) में ऐसे स्थान का आशय है जिसके चारों ओर सुरक्षित परकोटा है। इसका अर्थ हुआ सुरम्य वाटिका, आरामग़ाह। एटिमऑनलाइन के मुताबिक ग्रीक में इसका रूप हुआ paradeisos, लैटिन में यह पैराडिसस हुआ तो पुरानी फ्रैंच में यह पैरादिस और अंग्रेजी में इसका रूप पैराडाइज़ हुआ। इन तमाम रूपान्तरों में स्वर्ग, बहिश्त, वैकुण्ठ, जन्नत, ईडेनगार्डन जैसे अर्थ स्थिर हुए। बाद में अवेस्ता के पइरीदाएज़ा का बरास्ता पहलवी होते हुए फ़ारसी रूप बना फ़िर्दौस (हिन्दी में फ़िरदौस) अर्थवत्ता कायम रही। फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि फ़िर्दौसी के नाम का अर्थ फ़िर्दौस नाम की जगह का बाशिंदा ही होता है। बाद में अरबी में भी यह फ़िर्दौस पहुँचा।
फिर से लौटते हैं अवेस्ता के देगा-वरा पर। प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की धातु वर् wer में घुमाना, दोहरा करना, लपेटना जैसे भाव हैं। इससे मिलती जुलती संस्कृत धातु है वृ जिसमें व और र साफ नजर आ रहे हैं जिसका अर्थ है घेरना, लपेटना, ढकना, छुपाना और गुप्त रखना। इससे बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं। गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है। गोलाई दरअसल घुमाने, लपेटने की क्रिया का ही विस्तार है। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। छुपाने और गुप्त रखने के भाव पर गौर करें। किसी केन्द्र के इर्दगिर्द डाला हुआ घेरा, केन्द्र को सुरक्षित करता है, उसे छुपाता है, गुप्त रखता है। अर्थात वर् धातु में सुरक्षा का भाव भी प्रमुख है। इस तरह देगा-वरा का फ़ारसी रूप दीवार तैयार होता है जिसके हिन्दी में दीवाल, दिवार जैसे रूप बने। मराठी में इसे दिवाल, दिवार या दिवाळ लिखा जाता है। दिवाळ-शिकन्दर मराठी का सामासिक पद है जिसका आशय है सिकन्दर द्वारा बनाई गई मज़बूत दीवार।
दीवार के अर्थ में हिन्दी में अल्प प्रचलित किन्तु लोक बोलियों में खूब चलने वाला दूसरा शब्द है भीत जो बना है संस्कृत के भित्ति से। भित्ति में भी मूल रूप से विभाजित करने का भाव है। यह बना है संस्कृत धातु भिद् से जिसमें दरार, बाँटना, फाड़ना, विभाजित करने जैसे भाव हैं। कोई भी दीवार दरअसल किसी स्थान को दो हिस्सों में बाँटती है। एक समूचे मकान की दीवारें विभिन्न प्रकोष्ठों का निर्माण करती हैं। भित्ति से मराठी में भिन्त शब्द बनता है। प्राचीनकाल में विशाल चट्टानों पर चित्र बनाए जाते थे जिन्हें शैल-चित्र कहते हैं क्योंकि आदि मानव का निवास स्थान शैलाश्रयों में ही होता था। बाद में जब मनुष्य नें मकान बनाना सीख लिया तो उसकी दीवारें ही कैनवास बनीं। ऐसे चित्रों को भित्ति-चित्र कहा जाता है। भेद, भेदन, भेदना जैसे शब्द भी भिद् से तैयार हुए हैं। रहस्य के अर्थ में जो भेद है उसमें दरअसल आन्तरिक हिस्से में स्थित किसी महत्वपूर्ण बात का संकते है जो उजागर नहीं है। ज़ाहिर है इस बात को रहस्य की तरह माना गया, इसलिए भेद का एक अर्थ गुप्त या रहस्य की बात भी है। भेद को उजागर करने के लिए उस स्थान पर भेदने की क्रिया ज़रूरी है, तभी वह गुप्त बात सामने आएगी। भेदिया शब्द भी इसी धातु से तैयार हुआ है जिसका अर्थ है जासूस, भेदने वाला। कई बार प्रकार, अन्तर, फर्क आदि के अर्थ में भी भेद शब्द का प्रयोग होता है। बात वही विभाजन की है। किसी चीज़ के जितने विभाजन होंगे, उसे ही भेद कहेंगे जैसे नायिका-भेद यानी नायिकाओं के प्रकार। फूट डालने के अर्थ मे भेद ड़ालना मुहावरा भी प्रचलित है। “दीवारों के भी कान होते” हैं जैसी कहावत में दीवारों के पीछे छुपने वाले और वहाँ बसने वाले भेदों का ही तो संकेत मिलता है। -जारी
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Friday, December 2, 2011

उपन्यास की नवलकथा…

bankim

हि न्दी में अंग्रेजी के नॉवेल novel के लिए कोई पर्यायी शब्द नहीं है। उपन्यास शब्द इस अर्थ में बीते क़रीब डेढ़ सौ साल से हिन्दी में है मगर यह बांग्ला भाषा से आयात किया गया था। हिन्दीभाषियों ने इस शब्द को खुशी-खुशी अपनाया है। उपन्यास जैसी विधा का प्रचलन दुनिया की किसी भी साहित्यिक परम्परा में बहुत प्राचीन नहीं है क्योंकि पुराने ज़माने में अधिकांश साहित्यिक अभिव्यक्ति का आधार गद्य नहीं, पद्य ही था। अपने आधुनिक पुस्तकाकार रूप में अंग्रेजी में सत्रहवीं सदी में नॉवेल दुनिया के सामने आया। जिस तरह से संस्कृत साहित्य में चम्पू विधा गद्य और पद्य का मिला जुला रूप है उसी तरह नॉवेल के भी पूर्वरूप ग्यारहवी-बारहवीं सदी में नज़र आने लगे थे। बहरहाल, भारत में अंग्रेजी नॉवेल की तर्ज़ पर ही सबसे पहले मराठी और बांग्ला भाषा में विशिष्ट कथा-लेखन शुरू हुआ इसे गद्य शैली में वृहदाकार कथा-आख्यान कहा जा सकता है। खास बात यह कि मराठी, बांग्ला और गुजराती भाषियों ने इस नई और तेज़ी से लोकप्रिय होती साहित्य विधा को सबसे पहले अपनाया और इसे उनकी मातृभाषा में मौलिक पहचान मिले इसके लिए बौद्धिक कसरत भी शुरू हुई। हिन्दीभाषियों ने सदा की तरह उदार रुख अपनाते हुए नॉवेल के लिए बांग्ला भाषा के ‘उपन्यास’ को अपना लिया।
सबसे पहले ‘उपन्यास’ की बात। बांग्ला भाषा में अंग्रेजी के प्रभाव मे उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही नॉवेल के कलेवर वाला कथा साहित्य रचा जाने लगा था। बांग्ला मध्यमवर्ग, बाबू समाज, औपनिवेशिक काल के परिवर्तनों को आधार बना कर कथानक लिखे जा रहे थे। अधिकांश विद्वान बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय लिखित ‘दुर्गेशनन्दिनी’ (1865) से बांग्ला उपन्यास की शुरुआत मानते हैं। बंकिमबाबू ने अपनी रचनाओं को उपन्यास कहा तो इस विधा के लिए यह नाम लोकप्रिय हो गया। हालाँकि आज भी कई लोग इस तथ्य को जान कर कसमसाते हैं कि ‘उपन्यास’ शब्द हिन्दी का अपना नहीं है। उपन्यास बना है उप+न्यास से। संस्कृत - हिन्दी का ‘न्यास’ बना है संस्कृत के न्यासः से जिसकी व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक नि+अस् में घञ् प्रत्यय लगने से हुई है। न्यास का अर्थ है रखना, आरोपण करना, स्थापित करना आदि। इसमें ‘उप’ उपसर्ग लगने से बनता है उपन्यास जिसका अर्थ निकट रखना, अगल-बगल रखना, वक्तव्य, सुझाव, प्रस्ताव, भूमिका या प्रस्तावना आदि है। अमरकोश में तमाम अर्थों का सार बताते हुए उपन्यास का अर्थ बातचीत प्रारम्भ करना बताया गया है जिसका अर्थ है भूमिका या प्रस्तावना। इस अर्थ में अमरकोश में उपन्यास के अतिरिक्त ‘वाङ्मुखम’ शब्द भी है जिसमें इसी अर्थ का द्योतन होता है। बाणभट्ट रचित ‘कादम्बरी’ को कई विद्वान उपन्यास विधा का प्रथम ग्रन्थ मानते हैं। कादम्बरी को चम्पू-ग्रन्थ कहा जाता है अर्थात गद्यपद्य का मिश्रित रूप। इसके बावजूद यह संस्कृत की काव्यकृति के तौर पर ही साहित्य जगत में स्थापित है। इतना ज़रूर है कि प्रचलित काव्य प्रवृत्तियों से हट कर इसमें विवरणात्मकता अधिक है और इसीलिए इसे गद्य प्रभाव माना गया।
मराठीभाषियों का स्वभाव है कि वे अन्य भाषाओं के तकनीकी शब्दों को जस का तस स्वीकार नहीं करते। इसलिए उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब नॉवेल के लिए बांग्ला में ‘उपन्यास’ शब्द सामने आया तो मराठी में इसे क्या नाम दिया जाए, इस सवाल पर मराठी विद्वानों में विचार-मन्थन चल रहा था। शुरुआत में कल्पना के घोड़े अंग्रेजी के नॉवेल के आस-पास ही दौड़ रहे थे। इस आधार पर घड़े गए कुछ दिलचस्प नाम देखिए-नाव्हेल, नॉवल, नावेल, नाविल, नांवलु, नवलम्, नावले वगैरह वगैरह। इनमें से एक दो शब्दों को अन्य भाषाओं में अपनाया भी गया जैसे गुजराती में नवल-कथा। नवल, नवलम् में सुंदरता होने के बावजूद इसमें साहित्य सम्बन्धी अर्थ-बोध नहीं था। ऐसे में विद्वज्जनों को संस्कृत के उद्भट विद्वान की बाणभट्ट द्वारा सातवीं सदी में रची प्रसिद्ध

saraswat... आप्टे और मोनियर विलियम्स कोश में कादम्बरी का एक अर्थ सरस्वती भी मिलता है। दरअसल यह विद्या की देवी की एक उपाधि है। कदम्ब के वृक्ष के नीचे प्राचीन काल में ऋषि-मुनि विद्यादान किया करते थे। पुरानी तस्वीरों में सरस्वती की वीणावादिनी मुद्रा की पृष्ठभूमि में एक वृक्ष दिखाया जाता रहा है, शायद यह कदम्ब वृक्ष ही है। ...

रचना ‘कादम्बरी’ ने राह दिखाई। चर्चा चल पड़ी कि इस नई विधा को क्यों न कादम्बरी कहा जाए। यह बात भी सामने आई कि कादम्बरी तो इस आख्यान की नायिका है, उससे अभिप्राय कैसे सिद्ध होगा? पर ऐसा माना गया कि यह सर्वमान्य नहीं तो भी बहुमान्य अंग्रेजी के नॉवेल की तर्ज़ वाली कृति है, इसीलिए इसे नॉवेल का पर्याय बनाया जा सकता है।
संस्कृत का कादम्बरी शब्द कदम्ब से निकला है जो एक प्रसिद्ध वृक्ष का नाम है। कदम्ब का पेड़ यूँ तो समूचे भारत में है मगर दक्षिण भारत में बहुतायत में है। अक्सर नदियों के कछारों और नम इलाकों में यह होता है। संस्कृत में ‘अम्ब’ का अर्थ पानी होता है। ‘कदम्ब’ में निहित ‘अम्ब’ भी इस पेड़ के नामकरण के साथ इसी वजह से चस्पा है। ‘कादम्ब’ का अर्थ भी कदम्ब ही है और साथ ही इसका एक अर्थ है ‘बाण’। अब भला बाणभट्ट की प्रिय कृति का नाम तो कादम्बरी क्यों नहीं होना था? कादम्बरी का एक अन्य अर्थ है कदम्ब के फूलों से निर्मित शराब। मगर यह अर्थ उपन्यास के आशय से मेल नहीं खाता। मोनियर विलियम्स के अनुसार कादम्बरी पौराणिक पात्र चित्ररथ की पुत्री का नाम भी है। महामहोपाध्याय सिद्धेश्वरशास्त्री चित्राव के कोश के मुताबिक वैदिक युग से लेकर महाभारत काल तक चित्ररथ नाम के 15 पौराणिक पात्र मिलते हैं। कादम्बरी का एक अर्थ कोयल भी है। बहरहाल, कादम्बरी नाम का सही सन्दर्भ इससे भी पता नहीं चलता। आप्टे और मोनियर विलियम्स कोश में कादम्बरी का एक अर्थ सरस्वती भी मिलता है। दरअसल यह विद्या की देवी की एक उपाधि है। कदम्ब के वृक्ष के नीचे प्राचीन काल में ऋषि-मुनि विद्यादान किया करते थे। पुरानी तस्वीरों में सरस्वती की वीणावादिनी मुद्रा की पृष्ठभूमि में एक वृक्ष दिखाया जाता रहा है, शायद यह कदम्ब वृक्ष ही है। जो भी हो, कादम्बरी शब्द में विद्या, सरस्वती की अर्थस्थापना से नॉवेल का कादम्बरी नामान्तरण तार्किक लगता है। मराठी में और भारतीय भाषाओं में पहले उपन्यास का श्रेय भी विधवाओं के जीवन की दुर्दशा पर आधारित मराठी उपन्यास यमुना पर्यटन को दिया जाता है जिसे 1857 में बाबा पद्मजी ने लिखा था।
गुजराती में उपन्यास के लिए नवलकथा शब्द प्रचलित है। यह शब्द उन्हीं दिनों गुजराती में अपना लिया गया था, जब सवा सौ साल पहले मराठी में उपन्यास का पर्याय खोजने की बौद्धिक कवायद चल रही थी। दरअसल इस नवलकथा में नई कहानी का भाव न होकर नई गद्य विधा का भाव था। साथ ही यह उसी मूल से बनाया गया था जिस मूल से खुद नॉवेल शब्द उपजा है। नॉवल भारोपीय भाषा का शब्द है और अंग्रेजी में लैटिन के novella से आया जिसमें नया, नवल का ही भाव था। इस नवल और नॉवेल के बीच जो रिश्तेदारी है वह नएपन की ही है। इससे पहले यूरोप में उपन्यास के लिए रॉमाँ शब्द का प्रचलन था और अब भी है। यह फ्रैंच भाषा में पहले से परिचित है। उपन्यास की रंजकता, रुमानियत जैसे गुणों की वजह से एक विशिष्ट कथाशैली के लिए यह नाम रूढ़ हुआ। जर्मन में यह रोमान है और रूसी में रॉमान। आज यूरोपीय भाषाओं में इतालवी में उपन्यास के लिए रोमान्ज़ो, स्पैनी में नोविला, फ्रैंच में रॉमाँ, जर्मन् में रोमान, बास्क में एल्बेरी-नोबेला, वैनिशियन में रोमेन्सो और वेल्श में नोफेल है। आज हर विषय पर उपन्यास लिखे जा रहे हैं। उपन्यास नाम की विधा के मूल में चाहे रुमानियत भरी शुरुआत रही हो, मगर नॉवेल में जो नएपन की खुश्बू है, उसी वजह से देखते देखते सिर्फ़ डेढ़सौ बरसों में उपन्यास-लेखन साहित्य की सबसे पसंदीदा विधा बन गई है।

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Wednesday, November 30, 2011

हिन्दी में सिमट गई ‘वारदात’

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का मयाब घुसपैठिया कौन है? ज़ाहिर है जो मनचाही जगह में प्रवेश भी कर जाए और किसी को कानोकान ख़बर न हो। साथ ही उसका कुछ नुक़सान भी न हो। मगर समझदार घुसपैठिया इस कामयाबी के लिए बिना ज्यादा बोझ उठाए दूसरे की हद लांघता है। बहुत सारे बोझ के साथ घुसपैठ करने में कामयाबी नहीं मिलती। कई बार शक्ल भी बदलनी पड़ती है, बहुरूपिया बनना पड़ता है। एक भाषा से दूसरी भाषा में शब्दों की आवाजाही भी कुछ इसी अन्दाज़ में होती है। नई भाषा में घुसपैठ करने वाले शब्द की अर्थवत्ता कई बार वह नहीं रह जाती जो उसकी मूल भाषा में थी। वारदात भी ऐसा ही एक शब्द है। कुछ घटिन होने के सन्दर्भ में हिन्दी में आमतौर पर वारदात का प्रयोग होता है। वारदात के अरबी निहितार्थ कुछ और थे मगर हिन्दी में इस शब्द में अर्थसंकोच हुआ है।
वारदात सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी भाषा से फ़ारसी में होते हुए हिन्दी में आ समाया है। अरबी में वारदात की अर्थवत्ता व्यापक है मगर हिन्दी में इसे सीमित अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है। वारदात घटना है, मगर इस शब्द का प्रयोग सामान्य घटना के तौर पर नहीं होता। वारदात शब्द का प्रयोग हिन्दी में आमतौर पर आपराधिक गतिविधि के सन्दर्भ में होता है। जैसे चोरी, डकैती, हत्याकाण्ड, लूटमार, गिरफ्तारी आदि। चुनावी सभा में नेता का मंच से गिर जाना वारदात नहीं है, मगर इसी सभा में नेता पर हमले की घटना वारदात की श्रेणी में आती है। वारदात सेमिटिक धातु व-र-द से बना है। बदावी और हलीम की अरेबिक-इंग्लिश कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक इसमें व्याप्त होने, जाने, आने, गति करने, फूल का खिलना, फूलना, विकसित होना, पुष्पगुच्छ, नुमांया होना जैसे भाव भी हैं। इसके अलावा इसमें समूह, झुण्ड, एकत्रित होने, प्रविष्ट होने जैसे आशय भी हैं। कुल मिला कर व-र-द एक समूह वाची धातु भी है। किसी भी घटना में ज़ाहिर है, यही क्रियाएँ होती हैं। अरबी में इससे वारिद शब्द बनता है जिसका बहुवचन है वारिदा या वरादा। हिन्दी-फ़ारसी में इसका रूपान्तर वारिदात या वारदात होता है।
सेमिटिक धातु व-र-द में जो व्याप्त होने, आने और गति का जो भाव है उससे बने वारिदा / वरादा का अर्थ है घटना, प्रवेश या आमद। व-र-द के समूहवाची आशय पर ध्यान देते हुए बतौर घटना, इसकी अर्थवत्ता और स्पष्ट होती है। किसी घटना में बहुत सी चीज़ें एक साथ होती हैं और वहाँ क्रिया और प्रतिक्रिया दोनो नज़र आते हैं। उल्कापात सिर्फ़ उल्का का गिरना नहीं है, बल्कि उसके गिरने से उत्पन्न स्थितियाँ उसे घटना बनाती हैं। अरबी में यह वारिदा है, मगर हिन्दी में यह बड़ी घटना ही होगी, न कि वारदात। अलबत्ता वारदात में समूहवाची सारी बाते हैं। लोगों का आना-जाना, समूह का होना, किसी परिस्थिति का निर्माण होना जैसी बातें ही घटना होती हैं। दुर्घटना में भी यही सारी स्थितियाँ होती हैं। हाँ, संयोग-दुर्योग जैसी बातें भी वारदात में शामिल हैं मगर इन अर्थों में भी इसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता।कुल मिलाकर अरबी की व्यापक अर्थवत्ता वाली वरादा क्रिया हिन्दी में वारदात बनकर सिमट गया। हिन्दी में वारदात का अर्थ सिर्फ़ आपराधिक घटना है और यह पुलिस रोज़नामचे और अख़बारों में इसे ख़ास रुतबा मिला हुआ है।

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Monday, November 28, 2011

नीमहकीम और नीमपागल

Padahastasana 

इ स बार एक मराठी शब्द से सफ़र की शुरुआत। मराठी में आधा के अर्थ में निम्म, निम्मा, निम, निमा, निम्या जैसे शब्द बोलचाल की भाषा में सनाई पड़ते हैं। अक्सर कहा जाता है कि शिवाजी के काल में राजकाज की भाषा फ़ारसी थी और मराठी पर फ़ारसी का असर उसी दौर की देन है। मगर यह सरलीकरण है। राजकाज की भाषा होने से सिर्फ़ प्रशासनिक शब्दावली का लोक-व्यवहार बढ़ने की बात समझ में आती है। मुहम्मद तुग़लक से भी पहले से चौदहवीं सदी से पूर्व, तुर्क-मुसलमानों का दक्षिण भारत में मुकाम हो चुका था। समूचे देश में आज जो भाषाएँ बोली जा रही हैं उनके साथ फ़ारसी का सम्बन्ध निश्चित ही मुस्लिम शासन की देन है और यह रिश्ता सात-आठ सदी पुराना है। मगर देखा जाए तो भारत-फ़ारस सम्बन्ध तो ईसापूर्व से चले आ रहे हैं। ईरान में फ़ारसी से पहले पहलवी अस्तित्व में थी, उससे पहले अवेस्ता थी, तो इन भाषाओं का प्रभाव भी भारतीय भाषाओं पर रहा ही होगा। जब हम हिन्दी या मराठी पर फ़ारसी प्रभाव की बात करते हैं तो उस फ़ारसी से आशय होता है जो अरबी की छाप और इस्लामी संस्कार के साथ राजभाषा के रूप में भारत आई।
हिन्दी में नीम से जुड़े कुछ शब्द काफ़ी प्रचलित हैं जैसे- नीमहकीम यानी यानी अधकचरा ज्ञान रखने वाला। नीमपागल यानी आधा पागल,  नीमबेहोश यानी अर्धतंद्रा में, नीमशब यानी आधी रात वगैरह वगैरह। कुछ दशक पहले तक नीम से बने सामासिक शब्दों का प्रयोग हिन्दी में खूब होता था मगर बाद में इनका इस्तेमाल घटता चला गया जैसे नीमरोज़ यानी आधा दिन, नीमआस्तीन यानी आधी बाँहों वाला वस्त्र, नीमख्वाब अर्थात निन्द्रालस नेत्र, सपनीली आँखें, नीमबिस्मिल यानी अधमरा, जिसका गला आधार रेता गया हो, नीमकश यानी जिसे आधा खींचा गया हो, जो आधा धँसा हो, जैसे तीरे-नीमकश, नीमनिगाह यानी कनखियों से देखना, नीमबाज यानी मादक नेत्र वगैरह वगैरह। इसके विपरीत मराठी में नीम अर्थात निम से बने कई शब्द आज भी प्रचलित हैं जैसे निमकंठीदार यानी अंगरखा। भाव है ऐसा वस्त्र जो आधे गले का हो। ज़ाहिर ऐसी पोशाक सामने से खुली होती है। उसे जैकेट की तरह ही पहना जाता है। निमपट, निमशाई यानी आधा। निमसार यानी आधा महसूल, निमा यानी जैकेट, निमताजीम यानी आधा सम्मान देना, निमखाई यानी व्यापारिक या कृषि उत्पाद का आधा, निमगुंडीचा यानी जैकेट या अंगरखा, निमगोणी या निमकगोणी यानी कर या राजस्व सम्बन्धी या फिर आधी बोरी अनाज, निमगोरा यानी साँवला या गेहूँआ, निमगोल यानी चपटा या अर्धवलयाकार, निमचा यानी बरछी या छोटी तलवार, निमजरी यानी सोने-चांदी की आधी बुनावट का वस्त्र वगैरह वगैरह।
बहरहाल बात मराठी के निम या निम्म शब्दों की हो रही थी। फ़ारसी के नीम मे ‘न’ के साथ दीर्घ स्वर लगता है जबकि मराठी में इसका रूप ह्रस्व हो जाता है। मद्दाह कोश के मुताबिक फ़ारसी में नीम के दो रूप हैं। पहला है नीमः जिसका अर्थ है आधा या एक प्रकार का ऊँचा पजामा। दूसरे रूप में विसर्ग नहीं लगता अर्थात नीम जिसमें अल्प, न्यून, थोड़ा या आधा जैसे भाव हैं। फ़ारसी में नेम की आमद पहलवी के निम्क से हुई है जिसका आशय अर्धांश ही है। उत्तर पूर्वी ईरान की सोग्दियन भाषा में भी निम्क का यही अर्थ है। निम्क का एक रूपान्तर पारसिग भाषा में नेम या नेमग भी होता है। यहाँ गौरतलब है कि मराठी में किन्ही शब्दो में ‘निमका’ का इस्तेमाल भी हुआ है जिससे ज़ाहिर होता है कि इसकी आमद महाराष्ट्र में इस्लाम के शुरुआती दौर में ही हो गई थी। नीम के निम्क रूप से स्पष्ट होता है कि पहलवी या पारसिग का शुद्ध रूप तब भी बाकी था। इस्लाम के आगमन के बाद ईरान की मूल पारसी संस्कृति को बहुत नुकसान पहुँचा। फ़ारसी में अरबी शब्दों का रेला घुस आया। मूल पहलवी धीरे धीरे गायब होने लगी। पहलवी का एक नाम पारसिग भी है। ईरान में बचे-खुचे अग्निपूजक पारसी पारसिग के संरक्षण और विकास के लिए काम कर रहे हैं।
ईरानी भाषाओं में नीम के जितने भी रूपान्तर हैं वे अवेस्ता के नएम naema से उत्पन्न माने जाने चाहिए। अवेस्ता के नएम का अर्थ है अर्धांश, हिस्सा, या हाशिया आदि। ये सभी अर्थ नएम के संस्कृत रूप नेम से मिलते हैं। या यूँ कहें कि फ़ारसी का जो नीम है वही संस्कृत का नेम है। यह ज़रूर है कि जहाँ अवेस्ता के नएम और संस्कृत के नेम की अर्थवत्ता व्यापक है वहीं फ़ारसी तक आते आते इसके नीम रूपान्तर में अर्थसंकोच की प्रवृत्ति दिखाई देती है और इसमें थोड़ा, न्यून, अल्प या आधा जैसे भाव रह जाते हैं। संस्कृत के नेम का एक अर्थ है अर्ध अर्थात आधा। यह नेम उपसर्ग की तरह जब चन्द्र के आगे लगता है तब बनता है नेमचन्द्र अर्थात नवचन्द्र, नया चाँद, न्यूमून आदि। हिन्दी में नेमचन्द्र व्यक्तिनाम होता है। इसके अलावा नेम में परिधि, घेरा, अंश, थोड़ा, पार्ष्व, बगल, बाजू, किनारा, दायरा, काल, अवधि, आधार, नींव, छिद्र, blue-moon-1सन्ध्या, जड़ और चावल आदि। इतनी विस्तृत अर्थवत्ता के बावजूद नेम के अन्दर जो प्रमुख अर्थ है वह है अंश या भाग जिसका रूढ़ अर्थ है अर्ध या आधा। नेम के भीतर जो भाव है वह सम्पूर्णता का है। अंश कभी निरपेक्ष नहीं हो सकता। अंश निश्चित ही किसी सम्पूर्ण आकार की इकाई या हिस्सा है। मिसाल के तौर पर अर्धचन्द्र के आकार को देखें। आसमान में जब नया चान्द नज़र आता है तो हँसिये जैसी आकृति के बावजूद उसके चारों और वलयाकार दीप्ति स्पष्ट दिखती है यानी प्रकृति भी यह स्पष्ट करती है कि अर्धचन्द्र अपने आप में पूर्णचन्द्र का अंश है।
नेम की मूल धातु है नम्। ध्यान रहे यह वही नम् है जिससे नमस्कार, नमन, नमामि, नम्रता, नमिता जैसे शब्द बने हैं जिनमें विनय सम्मान में झुकने का भाव हैं। झुकने आदि के लिए हिन्दी में प्रचलित नमना या नवांना ( शीश नवांना ) जैसे शब्द भी नम् धातु से ही बने हैं । झुकने के अर्थ में ही नत् या नत शब्द भी है जो नम् से ही निकले हैं।  विनत, विनती और बिनती जैसे देसी शब्द जो प्रार्थना के अर्थ में खूब प्रचलित हैं। प्रणत, प्रणति, प्रणिपात आदि शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। नमनि, नमनीय और यहां तक की नमस्कारना जैसे शब्द भी विभिन्न बोलियों में चलते है। नम् धातु में झुकने, घूमने, मुड़ने, मोड़ने जैसे अर्थों पर गौर करें। योग मुद्राओं में नमनीयता का महत्व है क्योंकि इसमें शरीर को विभिन्न तरह से मोड़ा जाता है। सामान्य नमस्कार में भी शरीर मुड़ता है, झुकता है। नमना इसे ही कहते  हैं। इस अवस्था में शरीर के स्पष्ट रूप से दो भाग होते हैं। कमर से ऊपर का हिस्सा ज़मीन की ओर झुका होता है। ये दो भाग शरीर को आधे आधे या दो हिस्से में विभक्त करते हैं। यही भाव नम् से बने ‘नेम’ में और फिर फ़ारसी के ‘नीम’ में विस्तारित हुए हैं यानी आधा, हिस्सा, अंश आदि। वर्तुल, घेरा, दायरा जैसे अर्थं के मूल में मोड़ या घेरा ही है।
संस्कृत की कल् धातु में गणना का भाव निहित है। कल् का एक अर्थ काल की इकाई भी है। समूचा वक्त छोटे-छोटे अंशों में विभक्त है। ये अंश मिल कर ही काल बनते हैं। इसी तरह भाग्य का एक अर्थ काल भी है। भज् धातु से भाग्य बना है। बख्त, वक्त जैसे इसके रूपान्तर भी हैं जिनका अर्थ भी समय या काल ही है। भज् धातु का अर्थ भी मूलतः अंश ही है। यानी भज् से बना भाग्य। यहाँ भी अंश-अंश से सम्पूर्ण होने वाली बात स्पष्ट है। प्रसंगवश भज् से ही बना है भक्त जिसका अर्थ भी अंश ही है। इसका दूसरा अर्थ है आराधक। भक्त परमशक्ति यानी ईश्वर का अंश ही है। विभक्त यानी दूर होने की वजह से परमशक्ति में लीन होने की इच्छा, चाहना ही भक्ति है। चावल को भी भक्त कहते हैं। भात इससे ही बना है। नेम का एक अर्थ चावल भी है, मुझे लगता है यह बाद में भात के आधार पर ही नेम के लिए भी भात शब्द का प्रयोग विद्वानों ने कहीं किया होगा। बाद में किसी कोशकार ने इस अर्थ को भी चुन लिया होगा।

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Sunday, November 27, 2011

खेती भी वर्ज़िश है

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प्रा चीन समाज में कृषि-कर्म ही मूलतः श्रम का पर्याय था। यूँ काम के दायरे में बहुत सी क्रियाएँ आती हैं, मगर वह श्रम जो मूलतः रोज़ी रोटी से जुड़ा है, कर्म-संस्कृति में उसका महत्व सनातन काल से सर्वाधिक है। उदर-पोषण के लिए किए गए श्रम को अनादिकाल से ईश्वर आराधना से जोड़ा जाता रहा है। विभिन्न भाषा परिवारों में अनेक शब्दों का एक सा विकास, उनके अर्थान्तर की प्रक्रिया को देखते हुए इसे समझा जा सकता है। हिन्दी में व्यायाम के लिए फ़ारसी से आए हुए वर्ज़िश शब्द का प्रयोग भी होता है। वर्ज़िश मे शारीरिक श्रम ही खास है। वर्ज़िश को कसरत भी कहते हैं। आमतौर पर वर्ज़िश में उस श्रम को रखा जाता है जिसके ज़रिए शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है। वर्ज़िशी-बदन या वर्ज़िशी-जिस्म में व्यायाम से प्राप्त शारीरिक सौष्ठव का आशय ही उभरता है। कुल मिला कर ऐसा शारीरिक कर्म जिसके ज़रिए शरीर को स्वस्थ और बलवान बनाया जाए, वर्जिश कहलाता है। मगर पूर्व वैदिक काल में वर्जिश में मेहनत का भाव तो था, मगर इसमें अखाड़े में की गई क़सरत की बजाय खेत में पसीना बहाने का भाव अधिक था।
वर्ज़िश भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है जो मूलतः भारत-ईरानी परिवार से ताल्लुक रखता है। दरअसल प्राचीन भारतीय संस्कृति में कर्म को ही पूजा कहा गया है। वर्ज़िश शब्द बना है अवेस्ता के वरेज़ा से जिसका अर्थ है कार्य, क्रिया, कर्म आदि। जूलियस पकोर्नी ने वरेजा को उसी वर्ग werg धातुमूल से व्युत्पन्न माना है जिससे अंग्रेजी का वर्क work निकला है जो पोस्ट जर्मनिक के werkan से सम्बद्ध है। इसकी तुलना स्लोवानी, फ्रैंच,डच के आदि रूपों और आज की जर्मन के werk से की जा सकती है। गौरतलब है कि इन सभी शब्दों में कर्म या क्रिया का ही भाव है। वर्ग/werg का रिश्ता अंग्रेजी के अर्ज urge से भी है जिसकी आमद लैटिन के urgere मानी जाती है जिसमें दबाने, ज़ोर लगाने या मेहनत करने का भाव है। ग्रीक का ergon भी इसी मूल का है जिससे अंग्रेजी का ऑरगन शब्द बना है जिसका अर्थ है शरीर के अवयव या अंग।
मूल बात यह कि भारोपीय धातु वर्ग/werg का सुदूर ईरान में एक अन्य रूप बन रहा था और जिसमें ग के स्थान पर ज ध्वनि थी। भारोपीय भाषाओं में ग और ज का रूपान्तर सामान्य बात है। अवेस्ता के वरेज़ा का एक रूप फ़ारसी में वर्ज़ होता है जिसका अर्थ भी कर्म, कसरत और मेहनत है। वर्ज़ में यूँ तो निर्माण और कर्म का भाव है मगर इसका मूलार्थ है खेत। कर्म के सन्दर्भ में रोटी बनाने के लिए आटा गूँधने की क्रिया को वर्ज़-दादन कहते हैं। वैसे फ़ारसी में खेत को वर्ज़ कहते हैं। अमरकोश के रचयिता अमरसिंह (पाँचवी सदी) अपने इस प्रसिद्ध ग्रन्थ के द्वितीय काण्ड के भूमिवर्ग में वरिवस्या शब्द का उल्लेख करते हैं जिसका अर्थ है परिचर्या, सेवा, सुश्रुषा और उपासना। इस शब्द का रिश्ता आराधना से जोड़ा गया है-वरिवस शब्दः पूजार्थ। उन्नीसवीं सदी के महान भाषाविद् अल्बर्ट पाइक (1809–1891) ने अवेस्ता के वरेज़ा का रिश्ता वैदिक शब्द वरिवस्या से रिश्ता जोड़ा है जो कम व्याख्या के बावजूद तार्किक लगता है। पाइक लिखते हैं कि यह मूलतः कर्म है। आराधना करना भी कर्म है। गौर करें कि प्राचीन समय में कृषि कर्म के सभी आयाम अर्थात बुवाई, सिंचाई, बिनाई, कटाई आदि के वक्त याज्ञिक-अनुष्ठान होते थे। हमारा ऋतुचक्र इसी कृषि-संस्कृति से संचालित था। कृषि संस्कृति से जुड़े ये कार्य ही मूलतः श्रम की प्राचीन परिभाषा मे आते थे और इस तरह वरिवस्या शब्द का रूपान्तर या सहयोगी विकास अवेस्ता में वरेज़ा होना तार्किक लगता है। वरिवस्या को क्षेत्रपूजा के रूप में देखा जा सकता है। वरिवस्या से अवेस्ता में वरिवज्जा > वरेजा > वर्ज जैसे रूपान्तर मुमकिन हैं जिनमें खेत और खेती जैसे भाव हैं। सस्कृत की कृष् धातु में निहित खींचने का भाव ही कृषि शब्द के क्रिया रूप में अभिव्यक्त होता है। क्षेत्र से खेत बनता है और फिर उसके क्रिया रूप खेती का विकास होता है।
प्राचीन समय में कृषि कर्म के सभी आयाम अर्थात बुवाई, सिंचाई, बिनाई, कटाई आदि के वक्त याज्ञिक-अनुष्ठान होते थे। हमारा ऋतुचक्र इसी कृषि-संस्कृति से संचालित था। कृषि संस्कृति से जुड़े ये कार्य ही मूलतः श्रम की प्राचीन परिभाषा मे आते थे…pan
अवेस्ता के वरेज़ा से फ़ारसी में कुछ नए शब्द बने मसलन वर्ज़ीदन यानी काम करना, वर्ज़ यानी खेत, कर्म, वर्ज़ाव यानी ताक़तवर गाय, वर्ज़िश यानी क्रियाशीलता, खेती-बाड़ी, कृषि-कर्म, व्यायाम, खेल-कूद आदि। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं में ब और व में अदला-बदली होती है। फ़ारसी में वर्ज़ का रूपान्तर बर्ज़ भी हुआ। विशाल खेतों को भी वर्ज़ कहते हैं और यह शब्द श्रम के अर्थ में भी है। वर्ज़ीदन है तो बर्ज़ीदन भी है। प्रो. दाऊद एन. राहनी का एक आलेख कहता है कि बर्ज़िग-गार का अर्थ है बुवाई का मौसम, जो अक्सर बारिश में ही होती है। वर्ज़ या बर्ज़ का अर्थ है विशाल कृषि भूमि। भावुक अन्दाज़ में कह जा सकता है- सुजलाम सुफलाम् शस्य श्यामलाम् मातरम्। कुल मिला कर धरती माता हमें धारण करती है, पालन करती है, पोषण देती है इसीलिए वर्ज़ शब्द में ये सब है। फ़ारसी में वर्ज़नामा, बर्ज़नामा खेती सम्बन्धी ग्रन्थों के लिए प्रयुक्त होते हैं।
खेती का वर्ज़िश से रिश्ता तो बहुत कुछ साफ़ हो चुका है, मगर लगता है कि हिन्दी और बुन्देली में भी वरेज़ा का रूपान्तर मौजूद है। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश  में पान की खेती वाले इलाकों में पान की बाड़ियों को भी बरेजा कहते हैं। सम्भावना के तौर पर इसकी साम्यता फ़ारसी के वर्ज़, बर्ज़ या अवेस्ता के वरेज़ा से कर के देखिए...पान की बेलें जिन लम्बे चौड़े बाड़ों में ज़मीन से सात-आठ फुट ऊपर बाँस से बने ढाँचों पर लगाई जाती है, उसे कहते हैं, बरेजा। यानी कहने को यह भी खेत ही है, मगर कुछ ऊँचा खेत। अवेस्ता डिक्शनरी के मुताबिक बरेजा शब्द का एक अर्थ ऊँचा भी होता है। क्यों न हो, वर्ज़, बर्ज़, वरेज़ा, या वरिवस्या के ज़रिए हम ज़िस उपासना की बात कर रहे हैं, उसका उपास्य तो सबसे ऊपर ही है !!! जॉन प्लैट्स पान-बरेजा की व्युत्पत्ति संस्कृत के वृति [वृ+ज?] से होने की सम्भावना जताते हैं। गौर करें कि संस्कृत के वृत्ति में वृत् धातु है जिससे वृत्त बना। इसका रिश्ता ‘ऋ’ से है जिसमें मुड़ने, घूमने, घुमाने, चक्रगति का भाव है। बात यह है कि दुनिया की हर संस्कृति में ईश्वर आराधना के तौर पर, उपासना के तौर पर सर्वशक्तिमान प्रतीक के इर्द-गिर्द घूमने की प्रथा है। भारतीय-ईरानी परिवेश में अग्निपूजा के यज्ञ अनुष्ठान में भी अग्नि-पीठ के इर्द-गिर्द प्रदक्षिणा दरअसल आराध्य की उपासना का ही प्रावधान है। यही नहीं, सामान्य तौर पर रोज़ाना घरों में हम जो आरती करते हैं उसमें ईश्वर के चारो और अग्नि घुमाई जाती है। यह जो वर्तन का भाव है वही वरिवस्या के वर् में भी है और बरेजे में भी है। यानी घिरा हुआ, सुरक्षित, संरक्षित क्षेत्र।  पान बरेजा तो सचमुच  बाड़ा और कई बरेजों का संकुल होता है। बरेजा और वरेजा में बस ऊपर, नीचे का ही अन्तर है!

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Thursday, November 24, 2011

फ़ानूस की फ़ंतासी

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वि देशी भाषाओं से भारतीय भाषाओं में समाए शब्दों में ‘फ़ानूस’ और ‘फंतासी’ का शुमार भी होता है। फ़ानूस यानी छत से लटकता विशाल कंदील जिसमें शमा (ज्योति) के इर्दगिर्द शीशे का जारनुमा आवरण होता है जो उसे बुझने से बचाता है और रोशनी को कई गुना बढ़ा देता है। फिल्मों और नाटकों में कल्पनालोक को मूर्त रूप देने में रोशनियों का बेहद खूबसूरत प्रयोग होता है। झाड़ियों, पेड़ों से फूटती रंगबिरंगी रोशनियाँ दर्शकों को एक ऐसी रम्य-मरीचिका में ले जाती हैं जहाँ सब कुछ सुहाना लगता है। यही फंतासी है। हालाँकि सिर्फ़ दृष्यविधान ही फ़ंतासी नहीं होता बल्कि कथाविधान भी फंतासी है। फ़ानूस और फ़ंतासी का रिश्ता यूँ ही नहीं है। गौरतलब है कि ये दोनों शब्द क्रमशः फैंच और अंग्रेजी से हिन्दी में आए हैं। फानूस शब्द जहाँ सैकड़ों बरसों से भारतीय बोलियों में रचा-बसा है वहीं फंतासी बहुत पुराना नहीं है। ग्रीक ट्रैजेडी के लिए त्रासदी, कॉमेडी के लिए कामदी की तरह ही फैंटेसी का फंतासी रूपान्तर बीसवीं सदी के भारतीय रंगकर्म की देन है, ऐसा मुझे लगता है।
सबसे पहले ‘फ़ानूस’ की बात। प्रो. पी.डी. गुणे के मुताबिक ‘फ़ानूस’ बरास्ता फ्रैंच, मराठी में दाखिल हुआ। अपनी किताब-इन्ट्रोडक्शन ऑफ कॉम्पेरिटिव फ़िलोलॉजी में वे लिखते हैं कि फ्रैंच भाषा से फ़ैशन और सैन्य प्रबन्ध सम्बन्धी अनेक शब्द दिए हैं और उसी कड़ी में ‘फ़ानूस’ शब्द भी आता है। लालटेन के लिए इसका रूप फाणस है तो साधारण लैम्प के लिए फाणूस है। समझा जा सकता है कि दक्खनी शैली की हिन्दी में इसका रूप ‘फ़ानूस’ ही था। इस मत के बावजूद प्रो. गुणे फ़ानूस के लिए मूल फ्रैंच शब्द क्या था, इसका उल्लेख नहीं करते हैं। कई सन्दर्भों को टटोलने के बाद भी मुझे फ्रैंच भाषा में फ़ानूस शब्द नहीं मिला। अनुमान है कि‘फ़ानूस’ शब्द बरास्ता फ्रैंच ज़बान भारतीय भाषाओं में दाखिल नहीं हुआ बल्कि इसकी आमद अरबी, फ़ारसी, दक्खनी और उर्दू के ज़रिए ही हुई है। फ्रैंच लोगों के समुद्री रास्तों से हिन्दुस्तान दाखिल होने से पहले ही मुग़लकाल में फ़ानूस यहाँ आ चुका था। अरबी में फ़ानूस का बहुवचन फ़ानिस होता है। 
फ़ानूस सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द न होते हुए भी अरबी से ही हिन्दी में आया है। अरब में भी इसका रूप ‘फ़ानूस’ ही हैं और यह ग्रीक भाषा के ‘फ़ैनोस’ से बना है। अरबी और ग्रीक भाषाओं में पुरानी रिश्तेदारी रही है। ग्रीक फ़ैनोस का मतलब होता है लालटेन, दीपक, दीया, चिराग़ मगर ग्रीक ज़बान में फ़ैनोस का अर्थ मशाल है। यह मूलतः इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है और भारोपीय धातु ‘भा’ (bha) बना है जिसका आशय है चमक, प्रकाश। मोनियर विलियम्स के मुताबिक समकक्ष संस्कृत धातु है ‘भा’, ‘भात्’ जिसमें जगमग, स्वच्छ, पारदर्शकता, चमक जैसे भाव हैं। दुनिया को अपनी रोशनी से चकाचौंध कर देने वाले सूर्य का नाम ‘भास्कर’ इसी वजह से है। चमक, तेज जैसे भावों के लिए प्रभा और आभा में भी इस भा की मौजूदगी देखी जा सकती है। फ़ैनोस का रिश्ता ग्रीक ‘फॉस’ phos से भी है जिसमें किरणें बिखेरने का भाव है।
पर्व-त्योहारों हमारे उल्लास की ही अभिव्यक्ति हैं। इसलिए रोशनियों के ज़रिये इसे नुमायाँ करने की परम्परा दुनियाभर में है। ग्रीक फ़ैनोस सबसे पहले इजिप्शियन अरबी में दाखिल हुआ जहाँ ईसापूर्व मिस्र के प्रसिद्ध शासकों ‘फराओं’ के ज़माने से पांच दिवसीय विशिष्ट प्रकाशोत्सव मनाने की परम्परा रही थी। बाद में यह परिपाटी क्रिसमस-पर्व की विशिष्टता बन गई। तब यरुशलम में शहर को रोशनियों से सराबोर करने के लिए रास्तों के किनारे खम्भों पर कंदील टाँगे जाते थे। तब भी इन्हें फ़ानूस कहा जाता था क्योंकि पड़ौसी ग्रीस में मधुमक्खी के छत्तों से बनी मोमबत्तियों को ‘फैनोस’ कहा जाता था। इस्लामी दौर में फराओं की यही परम्परा मुस्लिम दौर के फ़ातमिद शासकों के काल में फलीफूली। भारत में फ़ानूस शब्द के साथ साथ ‘झाड़ फ़ानूस’ टर्म भी प्रचलित है। यह झाड़ क्या है? ऐसा लगता है छत से लटकते कंदील को कांच के जिस गिलाल में जलाया जाता है, उसे जार भी कहते हैं। अंग्रेजी में जार-लैम्प जैसी टर्म मौजूद है। कागज के आवरण वाले कंदील को सामान्य फ़ानूस कहाजाता होगा और जब कांच के कवच वाले फ़ानूस 4b799587dadebप्रचलित हुए तो उन्हें ज़ार फ़ानूस कहा जाने लगा होगा। मगर इस विचार का प्रमाण मुझे नहीं मिला। हालाँकि अंग्रेजी का जार शब्द अरबी से आया है। दरअसल लटकते हुए कंदील फ्रांसीसी सैनिक असबाब का एक ख़ास हिस्सा थे। मैदानों, जंगलों, रेगिस्तानों में जब सैनिक पड़ाव होते थे, तब पेड़ों पर या पेड़नुमा जंगलों पर  लालटेनों को लटका कर बड़े क्षेत्र को प्रकाशित किया जाता था। दरअसल पुरानी फ्रैंच में candeltreow शब्द दीपाधार के लिए प्रयुक्त होता था। बाद में अंग्रेजी में इससे कैंडल-ट्री कहा जाने लगा। मुझे लगता है इस कैंडल-ट्री की तर्ज पर ही फ़ानूस के साथ ट्री के अर्थ में झाड़ शब्द लगाकर हिन्दी में झाड़-फ़ानूस पद प्रचलित हुआ होगा।
अब आते हैं फंतासी पर। इसका मूल है फैंटेसी और यह फैंटेसिया से आ रहा है। फैंटेसी का आशय ऐसी प्रस्तुति से है जो ऐंद्रजालिक हो, अद्भुत हो, कल्पनाशील हो। फैंटेसी दरअसल मायालोक जैसा प्रदर्शन है। यह फैंटेसिया उसी फैनोस के संज्ञा रूप निकला है जिससे फ़ानूस बना है। संज्ञा रूप में फ़ैनोस का अर्थ होता है प्रकाश और इसके क्रियारूप फैनो का अर्थ है सबके सामने आना। फ़िनॉमिनॉन इसी मूल का है जिसमें इसी अद्भुत प्रस्तुति का आशय है। ध्यान रहे कोई चीज़ तभी नज़र आती है जब उस पर रोशनी पड़ती है, यह सामान्य प्रस्तुति है। लेकिन फैंटेसी दरअसल ऐसा आविर्भाव है जो चकाचौंध से भरा और चकित कर देने वाला है। फैंटेसी का हिन्दीकरण फंतासी भी खूब लोकप्रिय है।
प्रचलित अर्थों में फ़ानूस सिर्फ दीया अथवा रोशनी का ज़रिया नहीं बल्कि यह कंदील है जिसका अभिप्राय ऐसे दीये से है जिसकी लौ के इर्द-गिर्द हवा से बचाव के लिए शीशे का आवरण या कागज का कवच लगाया जाता है। एक प्रसिद्ध शेर में भी यही बात है- फानूस बनकर जिसकी हिफाज़त हवा करे। वो शम्अ क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे।। यहाँ फानूस का अर्थ रोशनी नहीं बल्कि लैम्प-शेड है। लालटेन, कंदील या फ़ानूस दरअसल दीये के ऐसे ही प्रकारों के नाम हैं जिसके चारों ओर शीशे का आवरण होता है और जिसकी जोत को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। जॉन शेक्सपीयर की हिन्दुस्तानी डिक्शनरी में शैन्डेलियर (फ्रैंच भाषा का शब्द जिसका अर्थ लटकने वाला लैम्पशेड ही है) को फानूस कहा गया है। लालटेन, कंदील को भी फ़ानूस कहा है। साथ ही झाड़-फानूस का अर्थ भी उसमें शैन्डेलियर बताया गया है।
हिन्दी में खूब प्रचलित कंदील शब्द अंग्रेजी के कैंडल का रूपान्तर है। यह भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और मूल kand से इसकी व्युत्पत्ति हुई है जिसमें चमक, प्रकाश का भाव है। खास बात यह कि प्रखरता, चमक में अगर ताप का गुण है तो शीतलता का भी। भारोपीय धातु कंद kand का एक रूप cand चंद् भी होता है। इससे बने चंद्रः का मतलब भी श्वेत, उज्जवल, कांति, प्रकाशमान आदि है। चंद्रमा, चांद, चांदनी जैसे शब्द इससे ही बने हैं। लैटिन के कैंडिड से जिसमें सच्चाई, सरलता और निष्ठा जैसे भाव निहित हैं। इसका प्राचीन रूप था कैंडेयर candere जिसका अर्थ है श्वेत, चमकदार, निष्ठावान। कैंडेयर से ही बना है मशाल, ज्योति के अर्थ मे अंग्रेजी का कैंडल शब्द जिसके हिन्दी अनुवाद के तौर पर मोमबत्ती शब्द सामने आता है। त्योहारों पर छत से रोशनी के दीपक लटकाए जाते हैं जिन्हें कंदील कहते हैं। यह शब्द अरबी से फारसी उर्दू होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ। अरबी में यह लैटिन के कैंडिला और Candela ग्रीक के कंदारोस kandaros से क़दील में तब्दील हुआ।
लालटेन तो हिन्दी में सबसे ज्यादा प्रचलित वस्तुओं और शब्दों में शुमार है। कमनज़र आदमी को भी कभी कभी लालटेन कह दिया जाता है। लालटेन में पढ़ना जैसी मुहावरेदार अभिव्यक्ति का आशय संघर्षों के बीच राह बनाने से है। लालटेन शब्द अंग्रेजी के लैन्टर्न से बना है। एटिमऑनलाइन के मुताबिक अंग्रेजी में इसकी आमद मध्यकालीन फ्रैंच के लैन्टर्ने से हुई। ग्रीक भाषा के लैम्पीन शब्द है, जिसमें चमक, द्युति का भाव है। इससे बने लैम्टर से लैटिन का लैन्टर्ना बना। गौरतलब है कि लैन्टर्ना, लैटिन के ही लुसर्न के आधार पर बना है जिसका अर्थ प्रकाश है। स्विट्ज़रलैण्ड के लुसर्न शहर का नाम भी इसी मूल से निकला है। अंग्रेजी के लैम्प शब्द की व्युत्पत्ति भी लैम्पीन से ही हुई है। लैम्प भी हिन्दी में प्रचलित है।

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Monday, November 21, 2011

शून्य में समृद्धि है…

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शू न्य की एक हक़ीकत तो क़रीब क़रीब हर पढ़ेलिखे व्यक्ति पर उजागर है कि अंकगणित की दुनिया के इस हीरो, जिसे अंग्रेजी में ज़ीरो कहा जाता है, का जन्म भारत में हुआ था। दुनिया को दाशमिक प्रणाली की सौगात भारत ने ही क़रीब डेढ़ हजार साल पहले दी थी और यही शून्य था जिसकी वजह से यह प्रणाली जन्म ले पायी और जिसके बिना अंक गणित की कल्पना भी मुश्किल है। इसके बावजूद आज बोलचाल की हिंदी में शून्य से ज्यादा इस्तेमाल अंग्रेजी के जीरो या सिफर का होता है। मजे़ की बात यह कि दोनो शब्दों के पीछे संस्कृत का शून्यम् हैं। आज इस शून्य को जीरो अंडा कह दिया जाता है। मूर्ख व्यक्ति के दिमाग को सिफर की उपमा दी जाती है। तंत्रिका तंत्र जब काम नहीं करता तो उसे सुन्न होना कहते हैं। जहाँ निविड़ एकांत होता है उसे सूनसान कहते हैं। सूना शब्द भी इसी अर्थ में प्रयोग होता है। ये सभी शब्द शून्य से ही जन्में हैं। संस्कृत के शून्यम् का अर्थ होता है खोखला, खाली या रिक्त स्थान, निर्वात यानी वेक्यूम अथवा आकाश, अंतरिक्ष। इस खोखलेपन में जो अकेलापन, खालीपन या नकारात्मकता का भाव है उसी वजह से मूर्ख व्यक्ति के दिमाग़ को खाली अण्डा, ज़ीरो अण्डा या कद्दू कहा जाता है। मराठी में कद्दू को भोपळा कहते हैं और वहाँ शून्य को भोपळा भी कहा जाता है। कद्दू के आकार पर अगर ध्यान दें तो यह नामकरण अजीब नहीं लगेगा। आखिर अण्डा भी तो गोल ही होता है ! कम समझ रखने वाले को उलाहना दिया जाता है- सिर है या कद्दू!! यहाँ खाली दिमाग़ वाली लक्षणा पर ध्यान देना चाहिए। शून्य के अन्य अर्थों में एकांत निर्जन, वीरान स्थान भी हैं। खिन्नमन, तटस्थता, उदासी, भी शून्य की श्रेणी में आती है। आकाश, अंतरिक्ष, बिंदु आदि भी शून्य हैं।
गौरतलब है कि शून्य की कल्पना के पीछे भारतीय मनीषा की विलक्षणता ही नज़र आती है। शून्य दरअसल क्या है? शून्य के आकार पर गौर करें। गोलाकार मण्डल की आकृति यूँ ही नहीं है। उसके खोखलेपन, पोलेपन पर गौर करें। एक सरल रेखा के दोनों छोर एक निर्दिष्ट बिन्दु की ओर बढ़ाते जाइए और फिर उन्हें मिला दीजिए। यह बन गया शून्य। यह शून्य बना है संस्कृत की ‘शू’ धातु से जिसमें फूलने, फैलने, बढ़ने, चढ़ने, बढ़ोतरी, वृद्धि, उठान, उमड़न और स्फीति का भाव है। मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश में ‘शू’ धातु की तुलना संस्कृत के ही ‘श्वि’ से भी की जाती है जिसमें विकसन, फलना-फूलना, समृद्ध होना जैसे भाव हैं। ये एक ही कड़ी में हैं। ‘श्वि’ से बना एक संस्कृत शब्द है ‘शून’ जिसमें सूजा हुआ, बढ़ा हुआ, उगा हुआ या समृद्ध जैसे ही भाव हैं। स्पष्ट है कि शू से बने शून्य में बाद में चाहे निर्वात, सूनापन, अर्थहीन, खोखला जैसे भाव उसकी आकृति की वजह से समाविष्ट हुए हों, मगर दाशमिक प्रणाली को जन्म देने वालों की निगाह में शून्य में दरअसल फूलने-फैलने, समृद्धि का आशय ही प्रमुख था। इसीलिए यह शून्य जिस भी अंक के साथ जुड़ जाता है, उसकी क्षमता को दस गुना बढ़ा देता है, अर्थात अपने गुण के अनुसार उसे फुला देता है। जब इसके आगे से अंक या इकाई गायब हो जाती है, तब यह सचमुच खोखलापन, निर्वात, शून्यता का बोध कराता है। शून्य के आकार में भी यही सारी विशेषताएँ समाहित हैं। गोलाकार, वलयाकार जिसमें लगातार विस्तार का, फैलने का, वृद्धि का बोध होता है। दरअसल शून्य ही समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है।
भारतीयों की ही तरह गणित और खगोलशास्त्र में अरब के विद्वानों की भी गहन रुचि थी। भारतीय विद्वानों की शून्य खोज का जब अरबों को पता चला तो उन्होंने अरबी भाषा में इसके मायने तलाशे। उन्हें मिला सिफ्र (sifr) जिसका मतलब भी रिक्त ही होता है। बारहवीं तेरहवीं सदी के आसपास योरप को जब दाशमिक प्रणाली का पता चला तो अरबी के सिफ्र ने यहां दो रूप ले लिए। पुरानी फ्रेंच में इसे शिफ्रे ( chiffre ) के रूप में जगह मिली जबकि अंग्रेजी में आने से पहले इसका लैटिनीकरण हुआ। पुरानी लैटिन में सिफ्र ने जे़फिरम का रूप लिया। बाद में यही zephirum या zephyrum > zeuero> zepiro> zero छोटा होकर ज़ीरो बन गया। बाद में फ्रेंच के रास्ते से अरबी के cifra का एक और  रूपान्तर cifre हुआ। यही सिफ्र एक बार फिर बदला और भाषा-समाज को मिला एक और नया लफ्ज सिफर।  गौरतलब है कि हिंदी में हम अंग्रेजी के सिफ़र cipher का उच्चारण करते हैं न कि अरबी, उर्दू के सिफ्र का। वैसे सिफ्र की व्युत्पत्ति सेमिटिक धातु sfr से भी मानी जाती है जिसका मतलब होता है उत्कीर्ण करना, लिखना, अंकन करना, गणितीय गणना आदि।
जूलियस पकोर्नी द्वारा खोजी गई इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की मूल धातुओं में शून्य शब्द की स्थिति को देखना भी दिलचस्प होगा। पकोर्नी के मुताबिक शून्य भी उसी आदिमूल  keu / *keue से उद्भूत है जिससे इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाओं के कई अन्य शब्द निकले हैं। डॉ अली
pumpkin1...सब कुछ शून्य  से ही प्रकट हुआ है और  शून्य में ही विलीन हो जाना है…
नूराई द्वारा बनाए रूट चार्ट से पता चलता है कि इस धातु का सम्बन्ध लात्वियाई भाषा के कुरोस से है जिसका अर्थ है सुराख। इसी तरह लैटिन के कुनोस शब्द का अर्थ होता है फूला हुआ, फैला हुआ। अवेस्ता में छिद्र के लिए सुरा sura शब्द है जो इसी मूल का है। पहलवी में इसका रूप surak होता है और फ़ारसी में आते आते सुराख़ साफ नज़र आने लगता है। लैटिन में cavea, cavus और अंग्रेजी के केव cave का अर्थ गुफा होता है, मगर इस धातु से रिश्तेदारी स्पष्ट है जिसमें खोखलापन साफ नज़र आ रहा है। इसी कड़ी में आगे शून्य आता है। डॉ अली नूराई आगे अरबी के सिफ़्र, लैटिन के ज़ेफिरम आदि का उल्लेख भी अपनी तालिका में करते हैं मगर सिर्फ सन्दर्भ बताने के लिए। । हालाँकि सिफ्र घोषित तौर पर संस्कृत के शून्य से प्रभावित होकर किया गया आनुवादिक शब्द है।
शून्य शब्द का दार्शनिक महत्व भी है। प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने शून्यवादी दर्शन की स्थापना की थी जिसके मुताबिक सृष्टि में किसी पदार्थ की सत्ता नहीं है बल्कि शून्य की सत्ता है। जीव, ईश्वर आदि की सत्ता को स्वीकार नहीं करने की वजह से इस मत को शून्यवाद नाम मिला। वैसे इसे वैनाशिक मत भी कहते थे। उनका मानना था कि पदार्थ के अस्तित्व को लेकर चार तरह के मत हो सकते हैं। अस्ति या नास्ति। अर्थात है अथवा नहीं। इसके बाद आता है तदुभयम अर्थात हो भी सकता है और नहीं भी। चौथा है नोभयम अर्थात तदुभयम का विलोम। नागार्जुन के मुताबिक परमसत्य इन चारों से हटकर है। सो इस विचार को शून्यवाद कहा गया। यह विचार इतना प्रसिद्ध हुआ कि बौद्धों या नास्तिकों को ही शून्यवादी कहा जाने लगा। यूँ ईश्वर की कल्पना को अगर छोड़ दिया जाए तो खगोल विज्ञान संबंधी आधुनिक खोजों से शून्य से सृष्टि के जन्म की बात को बल मिलता है। सब कुछ शून्य से प्रकट हुआ है और शून्य में विलीन हो जाना है।

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Saturday, November 12, 2011

अश्लील में ‘श्री’ की तलाश

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हि न्दी में किन्हीं विशिष्ट भावों को व्यक्त करने के लिए ‘अश्लील’ का प्रयोग होता है। ‘अश्लील’ का कोई ठोस पर्याय भी हिन्दी में नहीं है। सबसे पहले देखते हैं, ‘अश्लील’ क्या है। इसे भाषा के उदाहरण से समझते हैं। हर भाषा में असभ्य और फूहड़ शब्दावली होती है। ऐसी धारणा है कि जो कुछ प्राकृत है, पहले से बना हुआ है, वह सब अनघड़, विरूप या भद्दा है। मिसाल के तौर पर खदान से निकला हीरा और सामान्य पत्थर एक दूसरे से बहुत अलहदा नहीं होते। तराशने, चमकाने के बाद ही हीरे को अपनी असली पहचान मिलती है। भाषा के सन्दर्भ में एक और मिसाल देखते हैं। पेड़ के लिए ‘रुक्ख’ प्राकृत रूप है और ‘वृक्ष’ परिनिष्ठित रूप है। आमतौर पर नागरी भाषा परिनिष्ठित होती क्योंकि उसकी शब्दावली में तत्सम शब्द ज्यादा होते हैं। इसके विपरीत ग्रामीण बोलियाँ प्राकृत शब्दावली से प्रभावित होती हैं। ग्रामीण भाषा को इसलिए गँवारू कहा जाता है। नागरी बोलियों में जो सलीका होता है वह शब्द के मूल स्वरूप को सही ढंग से उच्चारने की वजह से आता है। उच्चारण की शुद्धता ही नागरी बोली की प्रमुख खासियत है। देशी बोली में उच्चारण अपने ठेठ अन्दाज़ में सामने आता है। दरअसल इसी ठेठपन, गँवारूपन, फूहड़ता को अश्लीलता कहते हैं। पंडितों की निगाह में यह भाषा श्रीहीन है। मगर ‘अश्लील’ के प्रचलित आशय से यह विवेचन मेल नहीं खाता।
हिन्दी में ‘अश्लील’ शब्द का प्रयोग एक खास सन्दर्भ में ही किया जाता है। काम (SEX) सम्बन्धी बुरी, घटिया सी कोई बात, कुत्सित मानसिकता से रची गई कोई कृति, उन्मुक्त यौनाचरण की रचना, किन्हीं व्यक्तियों के यौन सम्बन्धों पर अशोभनीय टिप्पणी, अपशब्द या गाली-गलौज समेत लज्जाजनक, फूहड़ और गंदी बातचीत या सामग्री का प्रदर्शन अश्लीलता की श्रेणी में आता है। यौन भावनाओं को उभारने के लिए देह का नग्न प्रदर्शन भी अश्लीलता है। इन अर्थों से हट कर कही गई कोई भी बात घटिया, भद्दा, गँवारू, असभ्य, अशिष्ट कह दी जाती है। मगर प्रचलित अर्थों में ‘अश्लील’ को अभिव्यक्त करने के लिए अगर ‘अश्लील’ का प्रयोग न किया जाए तब तो अशोभनीय, गंदी या लज्जाजनक जैसे शब्दों का ही प्रयोग करना पड़ता है। इसके बावजूद ‘अश्लीलता’ का भाव उजागर नहीं होता। ‘अश्लील’ शब्द की व्याप्ति जबर्दस्त है और हिन्दीभाषियों ने हर क्षेत्र में ‘अश्लील’ का प्रयोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए किया है जैसे वस्तु, संवाद, शब्द, भाषा, कला, विचारधारा, सोच, लोग, ग्रन्थ, संकेत, अभिव्यक्ति, शिक्षा वगैरह वगैरह।
अश्लील बना है ‘अश्रीर’ से। बोलचाल की भाषा में ‘र’ के स्थान पक ‘ल’ उच्चारने में लोगों को सुविधा होती है। अक्सर बालक या ग्रामीणजन ऐसा करते हैं क्योंकि शुद्ध उच्चारण से अधिक अभिव्यक्ति की उन्हें जल्दी रहती है। इसीलिए संस्कृत में उक्ति है- रलयोः अभेदः। ‘अश्रीर’ से बने ‘अश्लील’ में भी यही हो रहा है। ‘अश्रीर’ में अ + श्री स्पष्ट है। संस्कृत में ‘श्री’ का अर्थ है सौन्दर्य, वैभव, मांगल्य अथवा गुणकारी। मंगल, कल्याण, ऐश्वर्य और श्रेष्ठत्व से जुड़े सभी भाव “श्री” में समाहित हैं। ‘श्री’ तो स्वयंभू है। “श्री” का जन्म संस्कृत की ‘श्रि’ धातु से हुआ है जिसमें धारण करना और शरण लेना जैसे भाव हैं। जाहिर है समूची सृष्टि के मूल में स्त्री शक्ति ही है जो सबकुछ धारण करती है। इसीलिए उसे “श्री” कहा गया अर्थात जिसमें सब आश्रय पाए, जिसके गर्भ से सब जन्मे हों। सर्वस्व जिसका हो। ‘श्री’ आदि शक्ति है, मातृशक्ति है। प्रकृति ‘श्री’ है और वसुधा भी ‘श्री’ है।
blue_film_rollहिन्दी में मंगलकारी, वैभवकारी, सुंदर जैसे अर्थों में अकले ‘श्लील’ या ‘श्रीर’ का प्रयोग नहीं होता। ‘अ’ युक्त ‘श्लील’ यानी ‘अश्लील’को ही हिन्दी ने अपनाया क्योंकि ‘श्लील’ से जुड़े भावों को अभिव्यक्ति करनेवाली एक सुदीर्घ शब्दावली पहले से उसके पास थी।
इस तरह देखें तो लक्ष्मी, समृद्धि, सम्पत्ति, धन, ऐश्वर्य आदि सब कुछ श्रीमय है। सत्ता, राज्य, सम्मान, गौरव, महिमा, सद्गुण, श्रेष्ठता, बुद्धि आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। धर्म, अर्थ, काम भी इसमें शामिल हैं। वनस्पति जगत, जीव जगत इसमें वास करते हैं। अर्थात समूचा परिवेश श्रीमय है। भगवान विष्णु को ‘श्रीमान’ या ‘श्रीमत्’ की सज्ञा भी दी जाती है। गौरतलब है कि “श्री” स्त्रीवाची शब्द है। उपरोक्त जितने भी गुणों की महिमा “श्री” में है, उससे जाहिर है कि सारा संसार “श्री” में ही आश्रय लेता है। अर्थात समस्त संसार को आश्रय प्रदान करनेवाली “श्री” के साथ रहने के कारण भगवान विष्णु को ‘श्रीमान’ कहा गया है। इसलिए वे ‘श्रीपति’ हुए। इसीलिए ‘श्रीमत्’ हुए। भावार्थ यही है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं। “श्री” और ‘श्रीमान’ शब्द अत्यंत प्राचीन हैं। इनमें मातृसत्तात्मक समाज का स्पष्ट संकेत है। विष्णु सहस्रनाम के विद्वान टीकाकार पाण्डुरंग राव के अनुसार समस्त सृष्टि में स्त्री और पुरुष का योग है। ‘श्रीमान’ नाम में परा प्रकृति और परमपुरुष का योग है।
यहाँ “श्रीर” का अर्थ स्पष्टतः ‘श्री’ से युक्त समझ में आ रहा है। जिसमें ‘श्री’ से जुड़े सभी गुण हैं। विपुलता, वैभव, समृद्धि, सौभाग्यपूर्ण, मंगलकारी जैसे भाव हैं। इस महिमायुक्त “श्री” से पहले जब नकारात्मक उपसर्ग ‘अ’ लगता है तो “श्री” की महिमा श्रीहीन हो जाती है। अश्रीर का अर्थ हुआ अशोभनीय, लज्जाजनक, पतित, अमंगलकारी। ऐसी भाषा या शब्द जिनसे फूहड़ता, अभद्रता, अंमगल, अकल्याण की अभिव्यक्ति होती हो। निर्लज्जता की पराकाष्ठा, अश्रवणीय वचन या अश्रवणीय दृष्य या कृति सभी कुछ ‘अश्रीर’ है। इस तरह ‘श्रीहीन’ ही ‘अश्लील’ है। बोली भाषा में ‘श्रीर’ का ‘श्लील’ हुआ। संस्कृत के पौराणिक साहित्य में ये दोनों ही रूप हैं और समकालीन हैं।  मोनियर विलियम्स कोश के मुताबिक ब्राह्मण साहित्य अर्थात ऐतरेय ब्रह्मण, शाङ्खायन ब्राह्मण आदि में इनका प्रयोग मिलता है। मगर लकारयुक्त ‘श्लील’ का प्रचलन अधिक हुआ। हिन्दी में मंगलकारी, वैभवकारी, सुंदर जैसे अर्थों में अकले ‘श्लील’ या ‘श्रीर’ का प्रयोग नहीं होता। ‘अ’ युक्त ‘श्लील’ यानी ‘अश्लील’को ही हिन्दी ने अपनाया क्योंकि ‘श्लील’ से जुड़े भावों को अभिव्यक्ति करनेवाली एक सुदीर्घ शब्दावली पहले से उसके पास थी। बहरहाल, अश्लील में चाहे ‘श्री’ की महिमा से रहित होने का भाव है फिर भी इसमें ‘श्री’ मौजूद है।

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